12-03-2026, 01:15 AM
(This post was last modified: 12-03-2026, 01:30 AM by rohitkapoor. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
मैं सुबह जल्दी ही उठ गयी और देखा तो अनिल के उठने से पहले ही उसका लंड उठ चुका था। उसका मोर्निंग इरेक्शन देख कर मैं मुस्कुरा दी और उसके हिलते हुए लंड को अपने हाथ में पकड़ के पूछा, “क्या ये अभी भी भूखा है? सारी रात तो चोदता रहा मुझे और अब फिर से अकड़ गया....” तो वो आँखें बंद किये हुए मुस्कुराया और बोला कि “ऐसी प्यारी चूत मिले तो ये रात दिन खड़ा ही रहे” और फिर हम दोनों हँसने लगे।
दोनों नंगे ही थे और उसने मुझे अपने ऊपर खींच लिया और एक बार फिर से मुझे चोद डाला। सुबह की पहली चुदाई में भी एक अजीब बात होती है, जल्दी कोई भी नहीं झड़ता। ये चुदाई भी काफ़ी देर तक चलती रही। उसका लोहे के मूसल जैसा लंड मेरी चूत को चोद-चोद कर भोंसड़ा बनाता रहा और तकरीबन आधे घंटे की फर्स्ट-क्लास चुदाई के बाद हम दोनों झड़ गये और कुछ देर तक ऐसे ही नंगे एक दूसरे से लिपट कर लेटे रह और एक दूसरे को किस करते रहे। कभी वो चूचियों को चूसता रहा और कभी मैं उसके लंड को ऐसे दबाती रही जैसे मुझे और चुदाई करनी है और लंड पकड़ के सिसकारियाँ भरती रही।
जल्दी ही मेरी चूत में लगी क्रीम सूख गयी और फिर थोड़ी देर के बाद हम दोनों उठ गये। वहाँ उसके पास शॉवर लेने की कोई जगह तो थी नहीं, बस मैंने वैसे ही अपने कपड़े पहन लिये और अभी मैं अंदर ही बैठी रही। बाहर से रोशनी अंदर आ रही थी।
मेरे घर में भी कोई नहीं था तो मुझे कोई प्रॉबलम नहीं थी कि रात कहाँ सोयी थी। रात भर तेज़ बारिश हो रही थी, इसलिये बिजली और टेलीफोन के तार लूज़ हो गये थे। ना बिजली थी और ना टेलीफोन के कनेक्शन। आज छुट्टी होने की वजह से उसकी दुकान भी बंद थी और उसके पास कोई वर्कर भी नहीं आने वाले थे। इसलिए हमें कोई मुश्किल नहीं हुई। सुबह के करीब दस बजे के करीब उसने दुकान का शटर आधा उठा दिया और मैं अभी भी अंदर के रूम में ही बैठी थी। बाहर अभी भी थोड़ी-थोड़ी बारिश हो रही थी। थोड़ी देर के बाद वो करीब के होटल से कुछ नाश्ता पैक करवा के ले आया और चाय भी। हम दोनों ने नाश्ता किया और चाय पी कर थोड़ी देर अंदर ही बैठे रहे। उसने मुझे बहुत किस किया और मेरी चूचियों को दबाता ही रहा। मुझे लगा कि मेरी चूत फिर से गीली होनी शुरू हो गयी है और वो अब फिर से फ़ुल चुदाई के मूड में आ गया है पर उसने चोदा नहीं। शायद ये सोचा होगा कि फिर कभी मौके से चुदाई करेगा।
जब देखा मार्केट की कुछ दुकानें खुल चुकी हैं तो मैं पहले तो दुकान के बाहर काऊँटर पे आ कर क ऐसे खड़ी हो गयी जैसे कोई कस्टमर खड़ा होता है। अनिल ने कपड़े एक हफते के बाद देने का वादा किया और कुछ देर के बाद मैं अपने घर को चली गयी। घर जा कर पहले तो गरम पानी का शॉवर लिया। फिर गरम-गरम चाय पी और बेड में लेट के रात की चुदाई के बारे में सोचने लगी जिससे मेरे चेहरे पे खुद-ब-खुद मुस्कुराहट आ गयी और मेरा हाथ खुद-ब-खुद मेरी चूत पे आ गया और मैं चूत का मसाज करने लगी। थोड़ी देर के बाद मैं झड़ गयी और गहरी नींद सो गयी।
अब तो ज़िंदगी बेहद हसीन हो गयी थी। वैसे मैं इस कदर हवस-परस्त (सेक्स-ऐडिक्ट) हो चुकी थी कि मेरी चुदाई की तलब मिटती ही नहीं थी। हर वक़्त ‘ये चूत माँगे मोर’ वाली बात थी। खुदा के फ़ज़ल से चुदाने के लिये अब तो दो-दो मस्त लौड़ों का इंतज़ाम था और लेस्बियन सेक्स के लिये भी सलमा आँटी और डॉली थी। वैसे भी अब तो मैं मुकर्रर बाइसेक्सुअल हो चुकी थी और मर्दों और औरतों को एक ही नज़र से देखती थी। फिर तीन हफ़्तों बाद एक और वाक़िया हुआ जिसके बाद मेरी हवस-परस्ती अगले मक़ाम पे पहुँच गयी और मैं कुत्ते से भी चुदवाने लगी। मेरी इस बेरहरवी का क्रेडिट भी सलमा आँटी को ही जाता है जिहोंने मुझे इस लुत्फ़ से वाक़िफ़ करवाया।
दोनों नंगे ही थे और उसने मुझे अपने ऊपर खींच लिया और एक बार फिर से मुझे चोद डाला। सुबह की पहली चुदाई में भी एक अजीब बात होती है, जल्दी कोई भी नहीं झड़ता। ये चुदाई भी काफ़ी देर तक चलती रही। उसका लोहे के मूसल जैसा लंड मेरी चूत को चोद-चोद कर भोंसड़ा बनाता रहा और तकरीबन आधे घंटे की फर्स्ट-क्लास चुदाई के बाद हम दोनों झड़ गये और कुछ देर तक ऐसे ही नंगे एक दूसरे से लिपट कर लेटे रह और एक दूसरे को किस करते रहे। कभी वो चूचियों को चूसता रहा और कभी मैं उसके लंड को ऐसे दबाती रही जैसे मुझे और चुदाई करनी है और लंड पकड़ के सिसकारियाँ भरती रही।
जल्दी ही मेरी चूत में लगी क्रीम सूख गयी और फिर थोड़ी देर के बाद हम दोनों उठ गये। वहाँ उसके पास शॉवर लेने की कोई जगह तो थी नहीं, बस मैंने वैसे ही अपने कपड़े पहन लिये और अभी मैं अंदर ही बैठी रही। बाहर से रोशनी अंदर आ रही थी।
मेरे घर में भी कोई नहीं था तो मुझे कोई प्रॉबलम नहीं थी कि रात कहाँ सोयी थी। रात भर तेज़ बारिश हो रही थी, इसलिये बिजली और टेलीफोन के तार लूज़ हो गये थे। ना बिजली थी और ना टेलीफोन के कनेक्शन। आज छुट्टी होने की वजह से उसकी दुकान भी बंद थी और उसके पास कोई वर्कर भी नहीं आने वाले थे। इसलिए हमें कोई मुश्किल नहीं हुई। सुबह के करीब दस बजे के करीब उसने दुकान का शटर आधा उठा दिया और मैं अभी भी अंदर के रूम में ही बैठी थी। बाहर अभी भी थोड़ी-थोड़ी बारिश हो रही थी। थोड़ी देर के बाद वो करीब के होटल से कुछ नाश्ता पैक करवा के ले आया और चाय भी। हम दोनों ने नाश्ता किया और चाय पी कर थोड़ी देर अंदर ही बैठे रहे। उसने मुझे बहुत किस किया और मेरी चूचियों को दबाता ही रहा। मुझे लगा कि मेरी चूत फिर से गीली होनी शुरू हो गयी है और वो अब फिर से फ़ुल चुदाई के मूड में आ गया है पर उसने चोदा नहीं। शायद ये सोचा होगा कि फिर कभी मौके से चुदाई करेगा।
जब देखा मार्केट की कुछ दुकानें खुल चुकी हैं तो मैं पहले तो दुकान के बाहर काऊँटर पे आ कर क ऐसे खड़ी हो गयी जैसे कोई कस्टमर खड़ा होता है। अनिल ने कपड़े एक हफते के बाद देने का वादा किया और कुछ देर के बाद मैं अपने घर को चली गयी। घर जा कर पहले तो गरम पानी का शॉवर लिया। फिर गरम-गरम चाय पी और बेड में लेट के रात की चुदाई के बारे में सोचने लगी जिससे मेरे चेहरे पे खुद-ब-खुद मुस्कुराहट आ गयी और मेरा हाथ खुद-ब-खुद मेरी चूत पे आ गया और मैं चूत का मसाज करने लगी। थोड़ी देर के बाद मैं झड़ गयी और गहरी नींद सो गयी।
अब तो ज़िंदगी बेहद हसीन हो गयी थी। वैसे मैं इस कदर हवस-परस्त (सेक्स-ऐडिक्ट) हो चुकी थी कि मेरी चुदाई की तलब मिटती ही नहीं थी। हर वक़्त ‘ये चूत माँगे मोर’ वाली बात थी। खुदा के फ़ज़ल से चुदाने के लिये अब तो दो-दो मस्त लौड़ों का इंतज़ाम था और लेस्बियन सेक्स के लिये भी सलमा आँटी और डॉली थी। वैसे भी अब तो मैं मुकर्रर बाइसेक्सुअल हो चुकी थी और मर्दों और औरतों को एक ही नज़र से देखती थी। फिर तीन हफ़्तों बाद एक और वाक़िया हुआ जिसके बाद मेरी हवस-परस्ती अगले मक़ाम पे पहुँच गयी और मैं कुत्ते से भी चुदवाने लगी। मेरी इस बेरहरवी का क्रेडिट भी सलमा आँटी को ही जाता है जिहोंने मुझे इस लुत्फ़ से वाक़िफ़ करवाया।


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