26-01-2026, 11:39 PM
(This post was last modified: 27-01-2026, 12:35 AM by rohitkapoor. Edited 2 times in total. Edited 2 times in total.)
दिन और रात ऐसे ही गुज़रते रहे और मैं कभी एस-के, कभी अशफाक, कभी सलमा आँटी तो कभी डॉली के बीच झूलने लगी पर किसी को भी ऐसे शक नहीं होने दिया कि मैं किसी और के साथ भी हूँ। सब यही समझते थे कि मैं सिर्फ़ उसके ही साथ हूँ। कईं दफ़ा लंच से पहले एस-के के साथ उसके ऑफिस में या अपने घर पे उसके लंड से चुदवा कर मज़े करती, दोपहर में सलमा आँटी और फिर शाम को डॉली के साथ लेस्बियन चुदाई का मज़ा लेती। रात को अशफ़ाक के होने या ना होने से कोई फर्क़ नहीं पड़ता था।
दिन ऐसे ही गुज़रते चले गये। अब मैं कभी-कभी ऑफिस भी जाने लगी थी। जो काम घर बैठ कर किया उसकी सी-डी बना कर और पेपर लेकर ऑफिस जाती और वहाँ से दूसरे इनवोयस एंट्री के लिये लेकर आ जाती। कभी-कभी तो एस-के अपने ऑफिस में ही मुझे चोद देता और ऑफिस में व्हिस्की के एक-दो पैग भी पिला देता। मुझे भी व्हिस्की की हल्की से मदहोशी में चुदाई का दुगना-तिगुना मज़ा आता। मैंने ऑफिस जाने के टाईम पे हमेशा अच्छे से तैयार होती पर मैंने ब्रेज़ियर और पैंटी पहनना छोड़ दिया था क्योंकि एस-के कभी बिज़ी होता तो फटाफट जल्दबाज़ी की चुदाई के लिये मैं बगैर ब्रा और पैंटी के रेडी रहती। मुझे बगैर ब्रा और पैंटी के कपड़े पहनना अब बहुत अच्छा लगने लगा क्योंकि कमीज़ जब निप्पल से डायरेक्ट टच करती तो चलने के टाईम पे बहुत मज़ा आता और निप्पल खड़े हो जाते और सलवार की चूत के पास की सीवन (सिलाई) जब चूत के दोनों लिप्स ले बीच में घुस जाती तो क्लीटोरिस से रगड़ते- रगड़ते मज़ा आता और कभी-कभी तो जब सलवार चूत में घुस जाती तो मैं ऐसे ही झड़ भी जाती। कभी ऐसे होता कि एस-के अपनी चेयर पे बैठा होता और मैं अपने सलवार नीचे कर के उसकी दोनों जाँघों के दोनों तरफ़ अपनी टाँगें रख के उसके रॉकेट लंड पे बैठ जाती और वो मेरी कमी उठा कर मेरी चूचियाँ चूसने लगता और मैं उसके ऊपर उछल-उछल कर लंड अंदर-बाहर करती। मेरी चूचियाँ एस-के के मुँह के सामने डाँस करती और एस-के उनको पकड़ के मसल देता और चूसने लगता तो मज़ा आ जाता। ऐसी पोज़िशन में मुझे बेहद मज़ा आता और लगता जैसे मूसल जैसा लौड़ा चूत फाड़ के पेट में घुस गया हो। कभी तो वो मुझे अपनी टेबल पे ही झुका देता और पीछे से डॉगी स्टाईल में चोद देता। ऐसे में हाई-हील सैंडल पहने होने का बहुत फायदा होता क्योंकि एक तो मेरी चूत एस-के लंड ले लेवल में आ जाती और एस-के का कहना था कि मेरी लंबी सुडौल टाँगें, हाई-हील सैंडलों में और भी सैक्सी लगती हैं। दिन ऐसे ही गुज़रते रहे और मस्त चुदाई चल रही थी और ज़िंदगी ऐसे ही खुशग़वार गुज़र रही थी।
![[Image: off052.jpg]](https://i.ibb.co/qLgkXXsH/off052.jpg)
मेरे घर से ऑफिस का पैदल रास्ता तकरीबन बीस-पच्चीस मिनट का होगा। मैं पैदल ही आती जाती थी ताकि कुछ चलना भी हो जाये और अगर घर के लिये कुछ सामान की ज़रूरत हो तो बज़ार से खरीद भी लेती थी। वैसे तो घर वापिस आते वक्त मैं हमेशा थोड़े-बहुत नशे में ही होती थी पर मुझे एहसास था कि इससे हाई-हील सैंडलों में मेरी चाल और भी हिरनी जैसी सैक्सी हो जाती थी। घर और ऑफिस के बीच में बहुत सारी अलग-अलग तरह के मॉल और शॉपिंग कॉम्प्लेक्स हैं और उन में एक शॉपिंग कॉम्प्लेक्स में एक लेडीज़ टेलर की दुकान भी है। दुकान के बिल्कुल शॉपिंग कॉम्प्लेक्स के बाहर के हिस्से में सड़क की तरफ है और उसके बोर्ड पे एक बहुत ही खूबसूरत लड़की की फिगर बनी हुई है जिसके बूब्स मस्त शेप में थे और बोर्ड पे इंगलिश में लिख था "एम एल लेडीज़ टेलर एंड बुटीक: आल काइंड ऑफ लेडीज़ नीड्स। दूसरी लाईन में लिखा था, "वी सेटिसफायी ऑल अवर कस्टमर्स और तीसरी लाईन में लिखा था सेटिसफाईड एंड कस्टमर प्लेज़र इज़ अवर ट्रेज़र" और सबसे आखिरी लाईन में लिखा था, "ट्राई अस टुडे" और उसके नीचे लिखा था, “प्रॉपराईटर एंड मास्टर टेलर अन्द फेशन डिज़ाईनर: अनिल कुमार, बी.कॉम।“
ये अनिल कुमार अच्छी शकल सूरत का लड़का था और बहुत यंग था। उसी शॉपिंग कॉम्प्लेक्स में ब्यूटी पॉर्लर या ग्रोसरी की दुकान में आते-जाते उसकी दुकान के आगे से गुज़रते हुए कभी हम दोनों की नज़र मिल जाती तो दोनों ही एक दूसरे को कुछ पल तक नज़र गड़ा कर देखते रहते। कभी-कभी तो मैं उसकी दुकान से आगे जाने के बाद मुस्कुरा देती जिसका मतलब मुझे भी नहीं समझ में आता था। थोड़े ही दिनों में मुझे अनिल अच्छा लगने लगा और उससे बात करने को मेरा मन करने लगा। अच्छे कपड़े पहनता था। मीडियम हाईट, एथलेटिक बॉडी, रंग गोरा और स्मार्ट। काले बाल जिनको स्टाईल से सेट करता था और लाईट ब्राऊन बड़ी-बड़ी आँखें। देखने से ही लगाता था जैसे किसी अच्छे खानदान का है। मैंने सोच लिया कि किसी दिन अनिल से ज़रूर अपने कपड़े सिलवाऊँगी। उसकी दुकान पे लड़कियाँ बहुत आती जाती थीं। हमेशा कोई ना कोई लड़की खड़ी होती और कभी-कभी तो एक से ज़्यादा भी लड़कियाँ होतीं अपने कपड़े सिलवाने या खरीदने के लिये। ज़ाहिराना उसकी दुकान खूब चलती थी और ज्यादातर वक्त उसकी दुकान पे भीड़ ही रहती थी। काफ़ी बिज़ी टेलर था।
दिन ऐसे ही गुज़रते चले गये। अब मैं कभी-कभी ऑफिस भी जाने लगी थी। जो काम घर बैठ कर किया उसकी सी-डी बना कर और पेपर लेकर ऑफिस जाती और वहाँ से दूसरे इनवोयस एंट्री के लिये लेकर आ जाती। कभी-कभी तो एस-के अपने ऑफिस में ही मुझे चोद देता और ऑफिस में व्हिस्की के एक-दो पैग भी पिला देता। मुझे भी व्हिस्की की हल्की से मदहोशी में चुदाई का दुगना-तिगुना मज़ा आता। मैंने ऑफिस जाने के टाईम पे हमेशा अच्छे से तैयार होती पर मैंने ब्रेज़ियर और पैंटी पहनना छोड़ दिया था क्योंकि एस-के कभी बिज़ी होता तो फटाफट जल्दबाज़ी की चुदाई के लिये मैं बगैर ब्रा और पैंटी के रेडी रहती। मुझे बगैर ब्रा और पैंटी के कपड़े पहनना अब बहुत अच्छा लगने लगा क्योंकि कमीज़ जब निप्पल से डायरेक्ट टच करती तो चलने के टाईम पे बहुत मज़ा आता और निप्पल खड़े हो जाते और सलवार की चूत के पास की सीवन (सिलाई) जब चूत के दोनों लिप्स ले बीच में घुस जाती तो क्लीटोरिस से रगड़ते- रगड़ते मज़ा आता और कभी-कभी तो जब सलवार चूत में घुस जाती तो मैं ऐसे ही झड़ भी जाती। कभी ऐसे होता कि एस-के अपनी चेयर पे बैठा होता और मैं अपने सलवार नीचे कर के उसकी दोनों जाँघों के दोनों तरफ़ अपनी टाँगें रख के उसके रॉकेट लंड पे बैठ जाती और वो मेरी कमी उठा कर मेरी चूचियाँ चूसने लगता और मैं उसके ऊपर उछल-उछल कर लंड अंदर-बाहर करती। मेरी चूचियाँ एस-के के मुँह के सामने डाँस करती और एस-के उनको पकड़ के मसल देता और चूसने लगता तो मज़ा आ जाता। ऐसी पोज़िशन में मुझे बेहद मज़ा आता और लगता जैसे मूसल जैसा लौड़ा चूत फाड़ के पेट में घुस गया हो। कभी तो वो मुझे अपनी टेबल पे ही झुका देता और पीछे से डॉगी स्टाईल में चोद देता। ऐसे में हाई-हील सैंडल पहने होने का बहुत फायदा होता क्योंकि एक तो मेरी चूत एस-के लंड ले लेवल में आ जाती और एस-के का कहना था कि मेरी लंबी सुडौल टाँगें, हाई-हील सैंडलों में और भी सैक्सी लगती हैं। दिन ऐसे ही गुज़रते रहे और मस्त चुदाई चल रही थी और ज़िंदगी ऐसे ही खुशग़वार गुज़र रही थी।
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![[Image: 0212.jpg]](https://i.ibb.co/zHCnSgs9/0212.jpg)
ये अनिल कुमार अच्छी शकल सूरत का लड़का था और बहुत यंग था। उसी शॉपिंग कॉम्प्लेक्स में ब्यूटी पॉर्लर या ग्रोसरी की दुकान में आते-जाते उसकी दुकान के आगे से गुज़रते हुए कभी हम दोनों की नज़र मिल जाती तो दोनों ही एक दूसरे को कुछ पल तक नज़र गड़ा कर देखते रहते। कभी-कभी तो मैं उसकी दुकान से आगे जाने के बाद मुस्कुरा देती जिसका मतलब मुझे भी नहीं समझ में आता था। थोड़े ही दिनों में मुझे अनिल अच्छा लगने लगा और उससे बात करने को मेरा मन करने लगा। अच्छे कपड़े पहनता था। मीडियम हाईट, एथलेटिक बॉडी, रंग गोरा और स्मार्ट। काले बाल जिनको स्टाईल से सेट करता था और लाईट ब्राऊन बड़ी-बड़ी आँखें। देखने से ही लगाता था जैसे किसी अच्छे खानदान का है। मैंने सोच लिया कि किसी दिन अनिल से ज़रूर अपने कपड़े सिलवाऊँगी। उसकी दुकान पे लड़कियाँ बहुत आती जाती थीं। हमेशा कोई ना कोई लड़की खड़ी होती और कभी-कभी तो एक से ज़्यादा भी लड़कियाँ होतीं अपने कपड़े सिलवाने या खरीदने के लिये। ज़ाहिराना उसकी दुकान खूब चलती थी और ज्यादातर वक्त उसकी दुकान पे भीड़ ही रहती थी। काफ़ी बिज़ी टेलर था।


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