15-09-2026, 12:34 PM
रात भर अमन की आँखों में नींद नहीं आई।
माँ और दादा जी वाला दृश्य बार-बार दोहराया जा रहा था। दीये की रोशनी, बाबा के प्यार भरे शब्द, माँ की सिसकारियाँ, दोनों का एक-दूसरे में खो जाना—सब कुछ इतना साफ था कि जैसे अभी भी दरवाजे की दरार से देख रहा हो। कभी लगता था कि उसने सपना देखा है, लेकिन शरीर की काँप और दिल की धड़कन बता रही थी कि वह सपना नहीं था।
सुबह जब उठा तो सिर भारी था। आँखें सूजी हुई थीं। उसने देर तक बिस्तर पर बैठे रहकर हिम्मत जुटाई। फिर नहा-धोकर बाहर निकला।
आँगन में माँ सुशीला चूल्हे के पास बैठी चाय बना रही थीं। साड़ी का पल्लू सामान्य रूप से रखा हुआ था। चेहरे पर कोई थकान या अपराध भाव नहीं था। बल्कि एक शांत थकान सी थी। अमन ने उनकी तरफ देखा तो माँ ने सिर उठाया और सामान्य स्वर में बोलीं,
“उठ गए? चाय पी लो। आज चेहरा उतरा हुआ लग रहा है।”
अमन ने सिर्फ सिर हिलाया। आँखें मिला नहीं पाया। चाय का गिलास लिया और चुपचाप बैठ गया। माँ ने और कुछ नहीं पूछा।
थोड़ी देर बाद बाबा रामप्रसाद भी आँगन में आए। लाठी पकड़े हुए। उन्होंने अमन को देखा और सामान्य स्वर में कहा, “अमन बेटा, आज कॉलेज तो नहीं जाना?”
अमन ने फिर सिर हिलाया। “आज… थोड़ी तबीयत ठीक नहीं लग रही बाबा।”
बाबा ने उसके सिर पर हाथ रखा। हल्का सा। वही हाथ जिन्होंने रात को माँ को सहलाया था। अमन की रूह काँप गई। उसने जल्दी से बहाना करके अंदर चला गया।
दिन भर वह घर में ही रहा। कभी अपनी बहनों से बात की, कभी खिड़की से बाहर खेतों की तरफ देखा। लेकिन दिमाग बार-बार उसी कमरे में चला जाता। राधा का ख्याल आया तो मन और भारी हो गया। राजिया, कमला चाची, रुक्साना—सब कुछ अब फीका लग रहा था। घर का सबसे बड़ा खंभा ही दरक चुका था उसके लिए।
शाम होते-होते उसने तय कर लिया। रेणु को बताना ही होगा। वह उससे कुछ नहीं छुपाता था। यह बोझ अकेले नहीं उठाया जा सकता था।
रात के बारह बजे रेणु आई। लालटेन लेकर। दरवाजा बंद करके सिटकिनी लगाई। बिस्तर के किनारे बैठते ही उसने अमन का चेहरा देखा और समझ गई कि कुछ बहुत बड़ा हुआ है।
“क्या हुआ?” उसने धीमे स्वर में पूछा।
अमन कुछ बोल नहीं पाया। गला सूख गया था। आँखें भर आईं। उसने सिर झुका लिया। फिर बहुत धीमी और टूटी आवाज में बोला,
“दीदी… मैंने… मैंने रात को देख लिया…”
रेणु ने उसका हाथ पकड़ लिया। “क्या देख लिया?”
अमन की आवाज और काँप गई। आँसू निकलने लगे।
“बाबा… और माँ… दोनों… एक साथ… बिस्तर पर… बाबा माँ को… बहू कहकर… इतने प्यार से…”
वह और नहीं बोल पाया। रोने लगा। कंधे काँप रहे थे। रेणु ने उसे अपने से सटा लिया। अमन का सिर उसके कंधे पर था। वह बिना आवाज किए रो रहा था।
रेणु ने उसके बालों में हाथ फेरा। आवाज में हैरानी नहीं थी। बल्कि एक गहरी समझ थी। जैसे वह इस बात का इंतजार ही कर रही हो।
“शांत हो जाओ,” उसने बहुत धीमे स्वर में कहा। “मैं सुन रही हूँ।”
अमन ने रोते हुए पूरा बताना शुरू किया—कैसे पानी पीने गया, कैसे आवाजें सुनीं, कैसे दरवाजे की दरार से देखा, बाबा के शब्द, माँ की सिसकारियाँ, दोनों का एक-दूसरे को पति-पत्नी की तरह चाहना। हर बात आँसुओं के साथ निकल रही थी।
रेणु अंत तक चुपचाप सुनती रही। उसका हाथ लगातार अमन के बालों और पीठ पर घूम रहा था। जब अमन थककर चुप हुआ तो रेणु ने उसका चेहरा दोनों हाथों में लिया। आँसू पोंछे।
“अब धीरे से साँस लो,” उसने कहा। “मैं यहाँ हूँ।”
अमन ने उसकी आँखों में देखा। रेणु के चेहरे पर वह हैरानी नहीं थी जो वह उम्मीद कर रहा था। बल्कि एक शांत, पुरानी समझ थी। जैसे यह राज़ उसके लिए नया न हो।
“दीदी… तुम्हें… पहले से पता था?” अमन की आवाज अभी भी काँप रही थी।
रेणु ने उसकी आँखों में देखा। कुछ पल चुप रही। फिर धीरे से सिर हिलाया।
“हाँ… मुझे पता था।”
कमरे में सन्नाटा छा गया। सिर्फ अमन की भारी साँसें चल रही थीं। रेणु ने उसे और करीब खींच लिया।
“अब और मत रोओ,” उसने फुसफुसाकर कहा। “मैं तुम्हें समझाती हूँ… लेकिन धीरे-धीरे। सब एक साथ नहीं।”
अमन ने सिर उसके कंधे पर रख दिया। आँसू अभी भी बह रहे थे, लेकिन अब थोड़े धीमे हो गए थे। रेणु का हाथ उसके बालों में था। लालटेन की लौ काँप रही थी।
बात अभी शुरू ही हुई थी।
रेणु ने अमन को अपने से सटाए रखा। उसका सिर अभी भी उसके कंधे पर था। कमरे में सिर्फ लालटेन की छोटी सी लौ जल रही थी। बाहर हल्की हवा चल रही थी। दीवार पर दोनों की छायाएँ काँप रही थीं। अमन की साँसें धीरे-धीरे नियमित हो रही थीं, लेकिन आँखों से आँसू अभी भी रुक-रुककर बह रहे थे।
रेणु ने उसके बालों में उंगलियाँ फेरते हुए बहुत धीमे स्वर में कहा,
“अब सुनो… और शांत रहकर सुनो। मैं तुम्हें वह सब बताऊँगी जो तुम्हें जानना जरूरी है। लेकिन सिर्फ उतना ही जितना तुम इस वक्त सह सकते हो।”
अमन ने सिर नहीं हिलाया। बस और करीब सट गया। रेणु की आवाज में न कोई घबराहट थी, न हैरानी। बल्कि एक गहरी थकान और समझ थी—जैसे वह यह बात बहुत दिनों से अपने अंदर दबाए बैठी हो।
“दादी के मरने के बाद सब कुछ शुरू हुआ था,” रेणु ने कहा। आवाज बहुत साफ थी। “बाबा पूरी तरह टूट गए थे। दादी उनके जीवन की धुरी थीं। जब वे चली गईं तो बाबा जैसे सूख गए। खाना-पीना छोड़ दिया। रात-रात भर जागते रहते। घर का कामकाज, खेत, परिवार… सब कुछ उनके कंधों पर था। अगर बाबा गिर जाते तो यह पूरा घर बिखर जाता। तुम छोटे थे तब। तुम्हें याद भी नहीं होगा।”
अमन की साँसें थम गईं। रेणु का हाथ उसके बालों में रुक गया।
“तुम्हारी माँ ने उस समय सब कुछ संभाला,” रेणु ने आगे कहा। “सिर्फ घर का काम नहीं… बाबा का ख्याल हर तरह से रखा। उनकी दवा, उनका खाना, उनकी नींद, उनकी तन्हाई… सब कुछ। धीरे-धीरे बाबा फिर से जी उठे। घर फिर से चलने लगा। खेत बच गए। परिवार टूटा नहीं।”
अमन ने धीरे से सिर उठाया। आँखें लाल थीं। “लेकिन दीदी… मैंने जो देखा… वह तो… जैसे दोनों प्रेमी हों। इतना प्यार… इतनी नजदीकी…”
रेणु ने उसकी आँखों में देखा। कुछ पल चुप रही। फिर बहुत धीमे स्वर में बोली,
“तुम सही कह रहे हो। बाबा ने तुम्हारी माँ को अब दादी की जगह दे दी है। सिर्फ शरीर की नहीं… दिल की भी। और तुम्हारी माँ भी इससे खुश हैं। वे इसे अपना कर्तव्य नहीं, अपना प्रेम समझती हैं।”
अमन का चेहरा और सफेद पड़ गया। उसने फुसफुसाकर पूछा, “पिताजी… उन्हें पता है?”
रेणु ने सिर हिलाया। “हाँ। पिताजी को सब पता है। बल्कि… उन्होंने ही तुम्हारी माँ को इस रास्ते पर भेजा था।”
अमन की आँखें फटी की फटी रह गईं। “पिताजी ने…?”
“हाँ,” रेणु ने कहा। आवाज में न कोई आरोप था, न बचाव। सिर्फ सच्चाई थी। “पिताजी भी नहीं चाहते थे कि यह घर टूटे। बाबा घर के स्तंभ हैं। अगर वे टूट जाते तो सब कुछ खत्म हो जाता—खेत, इज्जत, परिवार, सब। इसलिए पिताजी ने चुपचाप इस रिश्ते को स्वीकार कर लिया। बल्कि बढ़ावा भी दिया। तुम्हारी माँ ने भी इसे स्वीकार किया। अब ये दोनों… एक-दूसरे के सहारे जी रहे हैं।”
अमन का सिर फिर से रेणु के कंधे पर गिर गया। वह कुछ बोल नहीं पा रहा था। दिमाग में बहुत सारे सवाल घूम रहे थे—पिताजी की सहमति, माँ की खुशी, बाबा का प्यार… सब कुछ एक साथ उलझ गया था।
रेणु ने उसके सिर को सहलाते हुए कहा,
“आज बहुत सारे सवाल हो गए। अगर मैं तुम्हें एक साथ सब बता दूँ तो तुम खुद को संभाल नहीं पाओगे। तुम अभी तैयार नहीं हो। कुछ चीजें समय के साथ समझ में आती हैं। जबरदस्ती जानने से सिर्फ नुकसान होता है।”
अमन ने धीरे से पूछा, “और कितना कुछ है दीदी… जो मुझे नहीं पता?”
रेणु ने हल्की मुस्कान दी। मुस्कान में थकान थी। “बहुत कुछ। लेकिन आज नहीं। आज बस इतना समझ लो कि घर के अंदर जो कुछ हो रहा है, वह सिर्फ वासना नहीं है। उसमें मजबूरी भी है, प्रेम भी है, और परिवार को बचाने की जिद भी है।”
अमन चुप रहा। रेणु ने उसका चेहरा दोनों हाथों में लिया। आँसू पोंछे। फिर उसके माथे पर बहुत हल्का और लंबा चुंबन किया। होंठों की गर्माहट माथे पर रह गई।
“अब सो जाओ,” उसने फुसफुसाकर कहा। “और कुछ मत सोचो। मैं यहाँ हूँ। तुम अकेले नहीं हो।”
अमन ने उसकी आँखों में देखा। रेणु की आँखों में एक अजीब सी मजबूती थी—जैसे वह खुद भी इन राज़ों का बोझ उठाए हुए हो। अमन ने धीरे से सिर हिलाया। रेणु ने उसे बिस्तर पर लिटा दिया। चादर डाल दी। खुद उसके बगल में बैठकर उसके बालों में हाथ फेरती रही।
लालटेन की लौ धीरे-धीरे छोटी होती गई। अमन की पलकें भारी हो रही थीं। दिमाग में अभी भी बहुत कुछ उलझा हुआ था, लेकिन रेणु की उंगलियाँ उसके बालों में थीं और उसकी मौजूदगी एक अजीब सा सुकून दे रही थी।
थोड़ी देर बाद अमन की साँसें नियमित हो गईं। वह सो गया।
रेणु उसके पास बैठी रही। अँधेरे में उसके चेहरे को देखती रही। फिर बहुत धीमे स्वर में अपने आप से बोली,
“अब तुम भी जान गए हो… घर के असली राज़।”
वह उठकर खड़ी हुई। लालटेन उठाई। दरवाजे तक जाकर एक बार पीछे मुड़ी। अमन शांति से सोया हुआ था। रेणु ने सिटकिनी खोली और चुपचाप कमरे से बाहर चली गई।
गलियारे में अँधेरा था। घर सोया हुआ था। लेकिन दीवारों के अंदर छुपे राज़ अब एक और व्यक्ति को पता चल चुके थे।
सुबह की रोशनी खिड़की से अंदर आ रही थी जब अमन की आँख खुली।
रात की बातें अभी भी दिमाग में थीं, लेकिन अब वे पहले जैसी तेज और काँपने वाली नहीं लग रही थीं। रेणु की आवाज बार-बार कानों में गूँज रही थी—“घर के स्तंभ हैं बाबा… अगर वे टूट जाते तो सब बिखर जाता… माँ ने हर तरह से ख्याल रखा… पिताजी को भी पता है…”
अमन ने बिस्तर पर बैठकर दोनों हाथों से चेहरा धोया। कुछ पल तक वह चुपचाप बैठा रहा। फिर उसने धीरे से अपने आप से कहा,
“जो भी हुआ… घर की भलाई के लिए ही हुआ होगा। दीदी झूठ नहीं बोलतीं। वे हमेशा सोच-समझकर ही कुछ कहती हैं।”
यह बात उसके अंदर उतरते ही जैसे एक बोझ हल्का हो गया। पूरा बोझ नहीं हटा था, लेकिन अब वह उसे तोड़ने वाला नहीं लग रहा था। वह समझ गया था कि कुछ रिश्ते सिर्फ शरीर के नहीं होते। कभी-कभी वे मजबूरी, जिम्मेदारी और छुपे हुए प्रेम का मिश्रण होते हैं। और रेणु ने उसे जितना बताया था, उतना ही उसके लिए काफी था। बाकी चीजें समय के साथ समझ में आएँगी।
उसने कपड़े बदले, मुँह धोया और बाहर निकला।
आँगन में माँ सुशीला चूल्हे पर रोटी बना रही थीं। अमन ने इस बार उनकी तरफ देखा। माँ ने भी सिर उठाया। दोनों की निगाहें एक पल के लिए मिलीं। अमन ने हल्की मुस्कान दी। माँ ने भी सामान्य स्वर में कहा,
“आज चेहरा थोड़ा हल्का लग रहा है। चाय पी लो।”
अमन ने चाय का गिलास लिया। इस बार हाथ नहीं काँपे। वह माँ के पास बैठ गया। थोड़ी देर दोनों चुपचाप रहे। फिर अमन ने सामान्य स्वर में पूछा, “बाबा कहाँ हैं?”
“अंदर आँगन में धूप सेक रहे हैं,” माँ ने जवाब दिया। आवाज में कोई तनाव नहीं था।
अमन ने सिर हिलाया। वह उठकर बाबा के पास गया। बाबा लाठी पकड़े चारपाई पर बैठे थे। अमन ने उनके पैर छुए। बाबा ने उसके सिर पर हाथ रखा।
“आज तबीयत ठीक लग रही है?” बाबा ने पूछा।
“हाँ बाबा,” अमन ने साफ स्वर में जवाब दिया। “अब ठीक हूँ।”
बाबा ने मुस्कुरा दिया। अमन ने भी मुस्कुराकर जवाब दिया। पहली बार रात वाले दृश्य के बाद वह दोनों के सामने सामान्य खड़ा हो सका था। दिल में अभी भी एक अजीब सा वजन था, लेकिन अब वह वजन उसे डरा नहीं रहा था।
कॉलेज के लिए निकलते समय राधा गली में मिली। उसने अमन का चेहरा देखा और पूछा, “कल से चेहरा उतरा हुआ था। आज ठीक लग रहे हो।”
अमन ने हल्की मुस्कान दी। “हाँ… अब ठीक हूँ।”
राधा ने उसके हाथ को हल्के से छुआ। “अगर कुछ हो तो बताना।”
अमन ने सिर हिलाया। “बताऊँगा।” दोनों साथ-साथ कॉलेज की तरफ चल दिए। बातें सामान्य थीं—पढ़ाई, मेले की याद, आने वाले दिनों की छोटी-छोटी बातें। अमन के अंदर फिर से वह हल्की सी गर्माहट लौट आई जो राधा के पास होती थी।
कॉलेज में राजिया की निगाहें फिर से उस पर पड़ीं। अमन ने इस बार सामान्य व्यवहार रखा। न ज्यादा देखा, न नजरें बचाईं। बस अपना काम करता रहा।
शाम को घर लौटा तो आँगन में कमला चाची और कविता दोनों थीं। कमला चाची ने उसे देखा तो आँखों में वही पुरानी चमक थी, लेकिन अमन ने इस बार सिर्फ नमस्ते कहा और अंदर चला गया। कविता ने पीछे से आवाज दी, “आज जल्दी आ गए?”
अमन ने मुड़कर मुस्कुराते हुए कहा, “हाँ दीदी। थकान हो रही थी।”
रात के खाने के बाद रेणु आई। लालटेन लेकर। दरवाजा बंद करके बिस्तर के किनारे बैठ गई। उसने अमन का चेहरा देखा और समझ गई कि वह अब पहले से बेहतर है।
“अब कैसा लग रहा है?” उसने पूछा।
अमन ने ईमानदारी से जवाब दिया, “अब समझ में आ रहा है दीदी। जो भी हुआ… घर की भलाई के लिए ही हुआ होगा। आपने जो कहा, वह सही ही होगा। आप हमेशा सोच-समझकर बोलती हैं।”
रेणु ने उसके बालों में हाथ फेरा। आँखों में हल्की राहत थी। “अच्छा किया जो समझ गए। अब आगे बढ़ो। अपनी जिंदगी जीयो। राधा के साथ जो बन रहा है, उसे संभालो। बाकी चीजें समय के साथ अपने आप सुलझती जाएँगी।”
अमन ने सिर हिलाया। रेणु ने उसके माथे पर हल्का चुंबन किया और बोली, “सो जाओ। कल से फिर अपनी सामान्य दिनचर्या शुरू करो।”
रेणु चली गई।
अमन बिस्तर पर लेट गया। आँखें बंद कीं। इस बार माँ और बाबा वाला दृश्य आया तो वह पहले की तरह नहीं काँपा। बल्कि एक अजीब सी समझ के साथ स्वीकार कर लिया। घर के राज़ गहरे थे। लेकिन अब वह जानता था कि हर राज़ के पीछे कोई न कोई मजबूरी और कोई न कोई प्रेम छुपा होता है।
वह धीरे-धीरे अपनी पुरानी दिनचर्या में लौट आया था।
नींद आसानी से आ गई।
सुबह अमन अपनी सामान्य दिनचर्या में लौट चुका था।
रात को अच्छी नींद आई थी। सुबह उठकर उसने हाथ-मुँह धोया, चाय पी और कॉलेज के लिए तैयार होने लगा। माँ ने जैसे रोज़ होती है वैसे ही रोटी दी। बाबा आँगन में धूप सेक रहे थे। सब कुछ सामान्य लग रहा था। अमन के अंदर अब वह तेज उथल-पुथल नहीं थी। एक शांत समझ बस गई थी—घर के राज़ गहरे हैं, लेकिन वे घर को बचाने के लिए ही हैं।
कॉलेज से लौटने के बाद वह आँगन में बैठा था कि तभी गली की तरफ से आवाजें आईं। ठेले की घंटी और कई लोगों के बोलने की आवाज। अमन ने सिर उठाया।
एक ठेला आँगन के बाहर रुका। उस पर सामान लदा हुआ था। और ठेले के पीछे से एक परिचित आवाज आई—
“अरे अमन! कहाँ हो बेटा?”
अमन की आँखें चौड़ी हो गईं। वह तुरंत उठा और बाहर की तरफ भागा।
सरला चाची थीं।
रामेश चाचा की पत्नी। कई महीनों बाद घर लौटी थीं। वे अपने मायके गई हुई थीं। अब वापस आई थीं। साड़ी पहने, माथे पर हल्की बिंदी, चेहरे पर थकान और खुशी दोनों साफ दिख रहे थे। अमन को देखते ही उनके चेहरे पर बड़ी मुस्कान फैल गई।
“अरे मेरे राजू!” उन्होंने अमन को देखते ही दोनों हाथ फैला दिए।
अमन की आँखों में खुशी आ गई। वह दौड़कर उनके पास गया और उनके पैर छूए। सरला चाची ने उसे उठाकर अपने से सटा लिया। अमन को उनकी बाँहों में वही पुरानी गर्माहट महसूस हुई जो बचपन से महसूस होती आई थी। सरला चाची उसे हमेशा अपने बच्चे की तरह मानती थीं। खून का रिश्ता नहीं था, लेकिन दिल का रिश्ता गहरा था।
“कितना बड़ा हो गया तू!” सरला चाची ने उसके बाल सहलाते हुए कहा। आवाज में हल्की सिहरन थी। “मैं गई थी तब तू इतना नहीं था। अब तो पूरा जवान लग रहा है।”
अमन मुस्कुराया। “आप कब आईं चाची? बताती तो मैं स्टेशन ले आता।”
सरला चाची ने उसके गाल पर हल्का थप्पड़ जैसा स्पर्श किया। “अरे बाबा! इतनी फॉर्मैलिटी की क्या जरूरत। अपना घर है। चुपके से आ गई।”
माँ सुशीला भी आँगन में आ गईं। दोनों बहुएँ गले मिलीं। कमला चाची भी निकल आईं। घर में अचानक हलचल मच गई। सामान उतरने लगा। बच्चे इधर-उधर दौड़ने लगे। अमन सरला चाची के सामान में से भारी बैग उठाकर अंदर ले गया।
सरला चाची ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, “तू हमेशा से मेरा हाथ बंटाता आया है। आज भी वैसा ही है।”
अमन ने मुस्कुराकर जवाब दिया, “आपके लिए तो हमेशा तैयार रहता हूँ चाची।”
शाम होते-होते घर में फिर से वह पुरानी रौनक आ गई जो सरला चाची के जाने के बाद कम हो गई थी। रसोई में तीनों बहुओं की हँसी-मजाक की आवाजें आ रही थीं। बाबा आँगन में बैठे सबको देख रहे थे। पिताजी भी खेत से लौटकर आए और सरला चाची से हाल-चाल पूछने लगे।
अमन अपने कमरे में सामान रखने के बाद बाहर आया तो सरला चाची ने उसे बुलाया।
“इधर आ। बैठ।”
अमन उनके पास बैठ गया। सरला चाची ने उसके बाल ठीक करते हुए कहा, “तेरा चेहरा देखकर लग रहा है तू बहुत कुछ सोचने लगा है इन दिनों। पहले इतना गंभीर नहीं था।”
अमन ने हल्की मुस्कान दी। “अब थोड़ा समझदार हो गया हूँ चाची।”
सरला चाची ने उसकी आँखों में देखा। उनकी निगाह में माँ जैसी चिंता और प्यार दोनों थे। “समझदार होना अच्छी बात है। लेकिन ज्यादा बोझ मत ले लिया कर। तू अभी भी मेरा बच्चा है।”
अमन ने उनका हाथ पकड़ लिया। “मैं हमेशा आपका बच्चा ही रहूँगा चाची।”
सरला चाची मुस्कुरा दीं। उनकी आँखें थोड़ी गीली हो गई थीं। उन्होंने अमन के माथे पर हाथ रखा और बोलीं, “अच्छा। जा, हाथ-मुँह धो ले। आज तेरे लिए खास मिठाई बनाऊँगी।”
अमन उठकर चला गया। मन हल्का लग रहा था। घर में एक पुराना खालीपन भर गया था। सरला चाची की वापसी के साथ वह गर्माहट लौट आई थी जो उसे हमेशा सुकून देती थी।
रात के खाने में सब साथ बैठे। हँसी-मजाक चल रहा था। अमन बीच-बीच में सरला चाची की तरफ देख लेता। हर बार वे मुस्कुरा देतीं।
रात को जब रेणु आई तो अमन ने उसे बताया, “सरला चाची आ गईं दीदी। बहुत दिन बाद।”
रेणु ने मुस्कुराकर कहा, “अच्छा हुआ। घर में फिर से रौनक आ गई होगी। वे तुझे बहुत चाहती हैं।”
अमन ने सिर हिलाया। “हाँ। उन्हें देखकर अच्छा लगा।”
रेणु ने उसके बालों में हाथ फेरा। “अब घर फिर से पूरा लग रहा होगा तुझे।”
अमन चुप रहा। हाँ, घर फिर से थोड़ा पूरा लग रहा था।
सरला चाची के आने के अगले दिन घर में सामान्य हलचल थी।
सुबह से ही रसोई में उनकी हँसी की आवाज आ रही थी। वे माँ और कमला चाची के साथ मिलकर काम कर रही थीं। अमन कॉलेज जाने से पहले उनके पैर छूकर निकला। सरला चाची ने उसके सिर पर हाथ रखा और बोलीं, “ध्यान से जाना बेटा।” वही पुरानी गर्माहट थी। अमन के चेहरे पर मुस्कान रह गई।
दिन सामान्य बीता। कॉलेज में राधा से हल्की बात हुई। राजिया की निगाहें फिर से मिलीं, लेकिन अमन ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। शाम को घर लौटा तो सरला चाची आँगन में बैठी कपड़े सुखा रही थीं। अमन उनके पास गया।
“चाची, थक तो नहीं गईं इतनी दूर से आकर?”
सरला चाची ने मुस्कुराते हुए कहा, “तेरे घर आकर थकान कहाँ रहती है। तू है न यहाँ।” उन्होंने अमन के बालों में उंगलियाँ फेर दीं। अमन उनके पास बैठ गया। दोनों ने थोड़ी देर सामान्य बातें कीं—मायके का हाल, वहाँ के खेत, रिश्तेदार। सरला चाची बीच-बीच में अमन को देखकर मुस्कुरा देतीं। उनकी आँखों में एक पुरानी ममता थी।
रात के खाने के बाद सब अपने-अपने कमरों में चले गए। अमन अपने कमरे में लेटा हुआ सोच रहा था कि तभी दरवाजे पर दस्तक हुई। रेणु थी। लालटेन लेकर अंदर आई। दरवाजा बंद करके बिस्तर के किनारे बैठ गई।
“सरला चाची आ गईं,” अमन ने पहले ही बता दिया। “घर फिर से वैसा लगने लगा है जैसे पहले लगता था।”
रेणु ने सिर हिलाया। कुछ पल चुप रही। फिर धीमे स्वर में बोली,
“अमन… सरला चाची के बारे में तुम बहुत कम जानते हो।”
अमन ने सिर उठाया। रेणु के चेहरे पर वह गंभीर भाव था जो वह बड़े राज़ बताते समय लाती थी।
“क्या मतलब दीदी?”
रेणु ने लालटेन की लौ की तरफ देखा। फिर बोली,
“सरला चाची जब इस घर में आई थीं तब उनकी उम्र तुमसे भी कम थी। रामेश चाचा से शादी के बाद वे बहुत खुश थीं। लेकिन कुछ साल बाद… एक बात हुई।”
अमन चुपचाप सुन रहा था।
“रामेश चाचा… वे कभी-कभी बहुत बदल जाते हैं। गुस्से में या नशे में वे सरला चाची के साथ कठोर हो जाते थे। मारपीट तक हो जाती थी। एक बार तो हालत इतनी खराब हो गई थी कि सरला चाची अपने मायके भाग गई थीं। तब तुम छोटे थे। तुम्हें याद नहीं होगा।”
अमन की आँखें थोड़ी चौड़ी हो गईं। उसने कभी सरला चाची के चेहरे पर ऐसा कुछ नहीं देखा था।
रेणु ने आगे कहा, “बाबा और पिताजी ने बीच-बचाव किया। रामेश चाचा ने माफी माँगी। सरला चाची वापस आ गईं। लेकिन उस दिन के बाद… रामेश चाचा ने एक अजीब सा मौन अपना लिया। वे घर में रहते हैं, काम करते हैं, लेकिन सरला चाची के साथ अब बहुत कम बोलते हैं। जैसे कोई दीवार खड़ी हो गई हो दोनों के बीच।”
अमन ने धीमे स्वर में पूछा, “तो चाची… वे खुश हैं?”
रेणु ने गहरी साँस ली। “वे इस घर से जुड़ गई हैं। तुमसे, मुझसे, माँ से… सब से। वे तुम्हें अपने बच्चे की तरह चाहती हैं क्योंकि उनका अपना कोई संतान नहीं हो सकी। रामेश चाचा का मौन उनका दर्द है, लेकिन वे उसे चुपचाप सहती हैं। बाहर से वे हमेशा मुस्कुराती रहती हैं।”
अमन चुप रहा। दिमाग में सरला चाची की आज की मुस्कान घूम गई—वह मुस्कान जिसमें ममता थी, लेकिन उसके पीछे एक पुराना अकेलापन भी छुपा हो सकता था।
रेणु ने उसका हाथ पकड़ा। “मैंने तुम्हें इसलिए बताया क्योंकि तुम उन्हें बहुत चाहते हो। लेकिन इस बात को और फैलाने की जरूरत नहीं। सरला चाची ने जो चुप रहना चुना है, हमें भी उसी का सम्मान करना चाहिए।”
अमन ने सिर हिलाया। “मैं कुछ नहीं कहूँगा दीदी।”
रेणु ने उसके माथे पर हल्का हाथ फेरा। “अच्छा। अब सो जाओ। कल फिर से सामान्य दिन होगा।”
रेणु चली गई।
अमन अकेला रह गया। छत की तरफ देखता रहा। सरला चाची का चेहरा आँखों के सामने था—आज वाली मुस्कान, बचपन वाली गर्माहट, और अब रेणु द्वारा बताया गया वह छुपा दर्द। रामेश चाचा का मौन… घर के एक और राज़ की तरह।
वह समझ गया था कि इस घर में हर व्यक्ति के चेहरे के पीछे कोई न कोई अधूरी कहानी छुपी हुई है।
नींद धीरे-धीरे आई।
मंगलवार की सुबह अभी पूरी तरह रोशनी नहीं फैली थी। आज छुट्टी थी।
अमन गहरी नींद में सोया हुआ था। कमरे में हल्की ठंडक फैली हुई थी। खिड़की से बाहर मुर्गे की आवाज दूर से आ रही थी। तभी दरवाजा बहुत धीरे से खुला। कमला चाची अंदर आईं। उन्होंने दरवाजा बंद किया लेकिन सिटकिनी नहीं लगाई। उनके कदम फर्श पर कोई आवाज नहीं कर रहे थे।
वे बिस्तर के पास आकर रुकीं। अमन की साँसें नियमित थीं। चादर कमर तक खिसकी हुई थी। कमला ने झुककर उसके माथे पर बहुत हल्का सा चुंबन किया। फिर गाल पर। अमन की पलकें फड़कीं। आँखें धीरे-धीरे खुलीं।
कमला चाची उसके बहुत करीब थीं। उनके बाल उसके माथे से छू रहे थे। साड़ी का पल्लू आगे की तरफ झुका हुआ था। अमन नींद भरी आँखों से उन्हें देखता रहा।
“चाची…” उसने धीमी आवाज में कहा, “अगर आप रोज़ ऐसे उठाओगी… तो मैं कभी जागूँगा ही नहीं।”
कमला चाची हल्की मुस्कुराईं। उन्होंने उसके बालों में उंगलियाँ फेरते हुए कहा, “हत बदमश कहीं का!” आवाज में गुस्सा नहीं था। बल्कि एक हल्की, जाने-पहचाने वाली शरारत थी। फिर उनका चेहरा थोड़ा गंभीर हो गया।
“अब तू ठीक है न?” उन्होंने धीमे स्वर में पूछा। “थोड़े दिनों से परेशान लग रहा था तू। इसलिए मैंने तुझे तंग नहीं किया। सोचा सही समय आने दूँ।”
अमन ने उनकी आँखों में देखा। सुबह की धुँधली रोशनी में कमला चाची का चेहरा और भी आकर्षक लग रहा था। उसने अचानक दोनों हाथों से उनकी कमर पकड़ ली और उन्हें अपनी गोद में खींच लिया। कमला चाची हल्की सी सिसकारी के साथ अमन की गोद में आ बैठीं। साड़ी का पल्लू एक तरफ खिसक गया। उनकी भारी जाँघें अमन की जाँघों पर थीं।
अमन ने उनकी कमर में हाथ फेरते हुए कहा, “चाची, मैं तो फर्स्ट क्लास हूँ। अब पूरी तरह ठीक हूँ।”
फिर उसने दोनों हाथ आगे बढ़ाकर कमला चाची के भारी स्तनों को साड़ी के ऊपर से ही दबा दिया। जोर से नहीं, लेकिन साफ और साहस भरे अंदाज में। उंगलियाँ उनकी गोलाई को महसूस कर रही थीं। कमला चाची की लंबी सिसकारी निकल गई। उनके शरीर में एक झटका सा चला। वे अमन के ऊपर से हटने के बजाय एक पल के लिए और सट गईं।
“बदmash…!” उन्होंने फुसफुसाकर कहा। आवाज काँप रही थी। “इतनी सुबह…”
अमन ने उनके स्तनों को हल्के से और दबाया। “सुबह ही तो मजा है चाची।”
कमला चाची ने उसके हाथ पकड़कर हटा दिए। वे गोद से उतरकर खड़ी हो गईं। साँसें तेज थीं। पल्लू उन्होंने जल्दी से संभाल लिया। गाल हल्के लाल हो गए थे।
“बाद में आती हूँ,” उन्होंने धीमी आवाज में कहा। “आज थोड़ा काम है। चल, तू भी उठ जा। आज छुट्टी है तो दिन बर्बाद मत करना।”
अमन बिस्तर पर बैठा मुस्कुरा रहा था। “जैसा आप कहें चाची।”
कमला चाची ने उसकी तरफ एक लंबी, चमकदार निगाह डाली। आँखों में अभी भी वह भूख बाकी थी। फिर वे दरवाजे की तरफ मुड़ीं और निकल गईं। दरवाजा हल्के से बंद हुआ।
अमन लेटा रहा। हाथों में अभी भी उनके स्तनों की गर्माहट और वजन बाकी था। मन में एक अजीब सा उत्साह तैर रहा था। कमला चाची अब सिर्फ रात के इशारों तक सीमित नहीं रह गई थीं। वे सुबह भी साफ खेल खेल रही थीं।
वह उठकर बैठ गया। आज छुट्टी थी। दिमाग में एक ख्याल आया—खेत। रुक्साना। आम।
वह मुस्कुराया।
अमन ने नहा-धोकर काले रंग की सादी कमीज और पैंट पहन ली। आज छुट्टी थी। मन में एक ही ख्याल घूम रहा था—खेत और रुक्साना।
वह घर से निकला। सुबह की धूप अभी नरम थी। खेतों के बीच वाली पगडंडी पर चलते हुए हवा में मिट्टी और पत्तों की खुशबू आ रही थी। थोड़ी दूर जाकर उसने रुक्साना को देखा।
रुक्साना एक मेड़ पर खड़ी थीं। आज उन्होंने काला सलवार-सूट पहना था। सूट काफी टाइट था। 34D के भारी स्तन सूट के ऊपर से साफ उभर रहे थे। पतली कमर और फिर गोल, गदराई हुई गाँड सूट में कसकर पैक थी। काले रंग में उनका गोरा बदन और भी निखर रहा था। बाल खुले हुए थे और हवा में हल्के-हल्के उड़ रहे थे।
अमन के मन में तुरंत ख्याल आया—“क्या मस्त फिगर है… मन कर रहा है अभी पटक के चोद दूँ।” लेकिन तुरंत ही रेणु दीदी की आवाज याद आ गई—“सब्र का फल मीठा होता है।” उसने गहरी साँस ली और अपनी इच्छा को काबू में रखा।
रुक्साना ने उसे आता देखकर मुस्कुरा दिया।
“अरे बाबूजी के बेटे! आज छुट्टी है क्या? इतनी सुबह यहाँ?”
अमन पास जाकर बोला, “हाँ काकी। घूमने निकला था। सोचा आपसे मिल लूँ। आम तो अब पूरी तरह पक गए होंगे?”
रुक्साना ने उसकी तरफ देखा। आँखों में हल्की शरारत थी। “हाँ… बगीचे में अंदर अच्छे-अच्छे पके आम लटके हैं। तोड़ने लायक।”
अमन ने मुस्कुराते हुए कहा, “तो फिर चलिए काकी। आप मुझे अपने पके आम दिखा दो।”
रुक्साना हल्की हँसी। “चलो। लेकिन पेड़ पर चढ़ना पड़ेगा।”
दोनों बगीचे के अंदर की तरफ चल दिए। पेड़ों की घनी छाँव थी। चारों तरफ पके आमों की खुशबू फैली हुई थी। रुक्साना आगे-आगे चल रही थीं। उनका टाइट सूट पीछे से उनकी गाँड की गोलाई को और उभार रहा था। अमन की निगाह बार-बार वहीं चली जा रही थी।
एक बड़े पेड़ के नीचे पहुँचकर रुक्साना रुकीं। “यह वाला पेड़ अच्छा है। ऊपर जाकर तोड़ो।”
अमन पेड़ पर चढ़ गया। आम तोड़ने के बहाने वह ऊपर से नीचे नज़र रख रहा था। थोड़ी देर बाद उसने देखा कि नीचे कोई नहीं है। चारों तरफ सन्नाटा था। बस पत्तों की हल्की सरसराहट। वह धीरे से पेड़ से उतर आया।
रुक्साना थोड़ी दूर चली गई थीं। अमन ने उनकी दिशा में कदम बढ़ाए। झाड़ियों के बीच से उसने देखा—रुक्साना कुछ कदम आगे एक पेड़ के पीछे मुँह किए खड़ी थीं। सलवार नीचे की हुई थी। उनकी सफेद, संगमरमर जैसी चिकनी गाँड पूरी तरह नंगी थी। वे मूत रही थीं। पानी की धार नीचे गिर रही थी।
अमन की साँसें तेज हो गईं। वह चुपचाप खड़ा उन्हें देखने लगा।
रुक्साना को अंदाजा हो गया था कि पीछे कोई है। उन्होंने सिर तो नहीं घुमाया, लेकिन जानबूझकर अपना समय लंबा खींच लिया। गाँड को थोड़ा और ऊपर उठाया। कमर को हल्का सा मोड़ा। मूतने का सिलसिला जानबूझकर धीमा रखा। अमन की निगाहें उनकी गोरी, गोल गाँड पर जमी हुई थीं। बीच की दरार साफ दिख रही थी।
जब धार खत्म हुई तो रुक्साना ने धीरे-धीरे सलवार ऊपर की। उन्होंने पीछे मुड़कर देखा। अमन जल्दी से पेड़ की तरफ भागकर अपनी जगह पर जा खड़ा हुआ। जैसे वह अभी-अभी उतरे हों।
रुक्साना वापस आईं। चेहरे पर हल्की सी मुस्कान थी। आँखों में शरारत साफ झलक रही थी।
“आम तोड़े या सिर्फ पेड़ देख रहे थे?” उन्होंने पूछा।
अमन ने सामान्य स्वर में जवाब दिया, “तोड़े हैं काकी। लेकिन आपके बगीचे के आम… सच में बहुत पके हुए लग रहे हैं।”
रुक्साना ने उसकी तरफ देखा। “पके आम देखकर सबका मन ललचाता है। लेकिन तोड़ने से पहले पेड़ की इजाजत भी लेनी पड़ती है।”
अमन ने हल्की मुस्कान दी। “इजाजत मिल जाएगी काकी… जब समय आएगा।”
दोनों की निगाहें एक पल के लिए मिलीं। फिर रुक्साना ने पल्लू ठीक किया और बोलीं, “चलो, अब घर चलो। ज्यादा देर हो गई।”
अमन ने सिर हिलाया। दोनों बगीचे से बाहर निकले। रास्ते में बातें हल्की रहीं, लेकिन हवा में एक अजीब सी गर्माहट तैर रही थी। अमन के दिमाग में रुक्साना की नंगी गाँड बार-बार घूम रही थी—सफेद, चिकनी, और जानबूझकर उठाई हुई।
घर पहुँचते-पहुँचते उसका मन बेचैन हो चुका था। लेकिन रेणु दीदी की बात याद करके उसने खुद को काबू में रखा। सब्र का फल मीठा होता है।
माँ और दादा जी वाला दृश्य बार-बार दोहराया जा रहा था। दीये की रोशनी, बाबा के प्यार भरे शब्द, माँ की सिसकारियाँ, दोनों का एक-दूसरे में खो जाना—सब कुछ इतना साफ था कि जैसे अभी भी दरवाजे की दरार से देख रहा हो। कभी लगता था कि उसने सपना देखा है, लेकिन शरीर की काँप और दिल की धड़कन बता रही थी कि वह सपना नहीं था।
सुबह जब उठा तो सिर भारी था। आँखें सूजी हुई थीं। उसने देर तक बिस्तर पर बैठे रहकर हिम्मत जुटाई। फिर नहा-धोकर बाहर निकला।
आँगन में माँ सुशीला चूल्हे के पास बैठी चाय बना रही थीं। साड़ी का पल्लू सामान्य रूप से रखा हुआ था। चेहरे पर कोई थकान या अपराध भाव नहीं था। बल्कि एक शांत थकान सी थी। अमन ने उनकी तरफ देखा तो माँ ने सिर उठाया और सामान्य स्वर में बोलीं,
“उठ गए? चाय पी लो। आज चेहरा उतरा हुआ लग रहा है।”
अमन ने सिर्फ सिर हिलाया। आँखें मिला नहीं पाया। चाय का गिलास लिया और चुपचाप बैठ गया। माँ ने और कुछ नहीं पूछा।
थोड़ी देर बाद बाबा रामप्रसाद भी आँगन में आए। लाठी पकड़े हुए। उन्होंने अमन को देखा और सामान्य स्वर में कहा, “अमन बेटा, आज कॉलेज तो नहीं जाना?”
अमन ने फिर सिर हिलाया। “आज… थोड़ी तबीयत ठीक नहीं लग रही बाबा।”
बाबा ने उसके सिर पर हाथ रखा। हल्का सा। वही हाथ जिन्होंने रात को माँ को सहलाया था। अमन की रूह काँप गई। उसने जल्दी से बहाना करके अंदर चला गया।
दिन भर वह घर में ही रहा। कभी अपनी बहनों से बात की, कभी खिड़की से बाहर खेतों की तरफ देखा। लेकिन दिमाग बार-बार उसी कमरे में चला जाता। राधा का ख्याल आया तो मन और भारी हो गया। राजिया, कमला चाची, रुक्साना—सब कुछ अब फीका लग रहा था। घर का सबसे बड़ा खंभा ही दरक चुका था उसके लिए।
शाम होते-होते उसने तय कर लिया। रेणु को बताना ही होगा। वह उससे कुछ नहीं छुपाता था। यह बोझ अकेले नहीं उठाया जा सकता था।
रात के बारह बजे रेणु आई। लालटेन लेकर। दरवाजा बंद करके सिटकिनी लगाई। बिस्तर के किनारे बैठते ही उसने अमन का चेहरा देखा और समझ गई कि कुछ बहुत बड़ा हुआ है।
“क्या हुआ?” उसने धीमे स्वर में पूछा।
अमन कुछ बोल नहीं पाया। गला सूख गया था। आँखें भर आईं। उसने सिर झुका लिया। फिर बहुत धीमी और टूटी आवाज में बोला,
“दीदी… मैंने… मैंने रात को देख लिया…”
रेणु ने उसका हाथ पकड़ लिया। “क्या देख लिया?”
अमन की आवाज और काँप गई। आँसू निकलने लगे।
“बाबा… और माँ… दोनों… एक साथ… बिस्तर पर… बाबा माँ को… बहू कहकर… इतने प्यार से…”
वह और नहीं बोल पाया। रोने लगा। कंधे काँप रहे थे। रेणु ने उसे अपने से सटा लिया। अमन का सिर उसके कंधे पर था। वह बिना आवाज किए रो रहा था।
रेणु ने उसके बालों में हाथ फेरा। आवाज में हैरानी नहीं थी। बल्कि एक गहरी समझ थी। जैसे वह इस बात का इंतजार ही कर रही हो।
“शांत हो जाओ,” उसने बहुत धीमे स्वर में कहा। “मैं सुन रही हूँ।”
अमन ने रोते हुए पूरा बताना शुरू किया—कैसे पानी पीने गया, कैसे आवाजें सुनीं, कैसे दरवाजे की दरार से देखा, बाबा के शब्द, माँ की सिसकारियाँ, दोनों का एक-दूसरे को पति-पत्नी की तरह चाहना। हर बात आँसुओं के साथ निकल रही थी।
रेणु अंत तक चुपचाप सुनती रही। उसका हाथ लगातार अमन के बालों और पीठ पर घूम रहा था। जब अमन थककर चुप हुआ तो रेणु ने उसका चेहरा दोनों हाथों में लिया। आँसू पोंछे।
“अब धीरे से साँस लो,” उसने कहा। “मैं यहाँ हूँ।”
अमन ने उसकी आँखों में देखा। रेणु के चेहरे पर वह हैरानी नहीं थी जो वह उम्मीद कर रहा था। बल्कि एक शांत, पुरानी समझ थी। जैसे यह राज़ उसके लिए नया न हो।
“दीदी… तुम्हें… पहले से पता था?” अमन की आवाज अभी भी काँप रही थी।
रेणु ने उसकी आँखों में देखा। कुछ पल चुप रही। फिर धीरे से सिर हिलाया।
“हाँ… मुझे पता था।”
कमरे में सन्नाटा छा गया। सिर्फ अमन की भारी साँसें चल रही थीं। रेणु ने उसे और करीब खींच लिया।
“अब और मत रोओ,” उसने फुसफुसाकर कहा। “मैं तुम्हें समझाती हूँ… लेकिन धीरे-धीरे। सब एक साथ नहीं।”
अमन ने सिर उसके कंधे पर रख दिया। आँसू अभी भी बह रहे थे, लेकिन अब थोड़े धीमे हो गए थे। रेणु का हाथ उसके बालों में था। लालटेन की लौ काँप रही थी।
बात अभी शुरू ही हुई थी।
रेणु ने अमन को अपने से सटाए रखा। उसका सिर अभी भी उसके कंधे पर था। कमरे में सिर्फ लालटेन की छोटी सी लौ जल रही थी। बाहर हल्की हवा चल रही थी। दीवार पर दोनों की छायाएँ काँप रही थीं। अमन की साँसें धीरे-धीरे नियमित हो रही थीं, लेकिन आँखों से आँसू अभी भी रुक-रुककर बह रहे थे।
रेणु ने उसके बालों में उंगलियाँ फेरते हुए बहुत धीमे स्वर में कहा,
“अब सुनो… और शांत रहकर सुनो। मैं तुम्हें वह सब बताऊँगी जो तुम्हें जानना जरूरी है। लेकिन सिर्फ उतना ही जितना तुम इस वक्त सह सकते हो।”
अमन ने सिर नहीं हिलाया। बस और करीब सट गया। रेणु की आवाज में न कोई घबराहट थी, न हैरानी। बल्कि एक गहरी थकान और समझ थी—जैसे वह यह बात बहुत दिनों से अपने अंदर दबाए बैठी हो।
“दादी के मरने के बाद सब कुछ शुरू हुआ था,” रेणु ने कहा। आवाज बहुत साफ थी। “बाबा पूरी तरह टूट गए थे। दादी उनके जीवन की धुरी थीं। जब वे चली गईं तो बाबा जैसे सूख गए। खाना-पीना छोड़ दिया। रात-रात भर जागते रहते। घर का कामकाज, खेत, परिवार… सब कुछ उनके कंधों पर था। अगर बाबा गिर जाते तो यह पूरा घर बिखर जाता। तुम छोटे थे तब। तुम्हें याद भी नहीं होगा।”
अमन की साँसें थम गईं। रेणु का हाथ उसके बालों में रुक गया।
“तुम्हारी माँ ने उस समय सब कुछ संभाला,” रेणु ने आगे कहा। “सिर्फ घर का काम नहीं… बाबा का ख्याल हर तरह से रखा। उनकी दवा, उनका खाना, उनकी नींद, उनकी तन्हाई… सब कुछ। धीरे-धीरे बाबा फिर से जी उठे। घर फिर से चलने लगा। खेत बच गए। परिवार टूटा नहीं।”
अमन ने धीरे से सिर उठाया। आँखें लाल थीं। “लेकिन दीदी… मैंने जो देखा… वह तो… जैसे दोनों प्रेमी हों। इतना प्यार… इतनी नजदीकी…”
रेणु ने उसकी आँखों में देखा। कुछ पल चुप रही। फिर बहुत धीमे स्वर में बोली,
“तुम सही कह रहे हो। बाबा ने तुम्हारी माँ को अब दादी की जगह दे दी है। सिर्फ शरीर की नहीं… दिल की भी। और तुम्हारी माँ भी इससे खुश हैं। वे इसे अपना कर्तव्य नहीं, अपना प्रेम समझती हैं।”
अमन का चेहरा और सफेद पड़ गया। उसने फुसफुसाकर पूछा, “पिताजी… उन्हें पता है?”
रेणु ने सिर हिलाया। “हाँ। पिताजी को सब पता है। बल्कि… उन्होंने ही तुम्हारी माँ को इस रास्ते पर भेजा था।”
अमन की आँखें फटी की फटी रह गईं। “पिताजी ने…?”
“हाँ,” रेणु ने कहा। आवाज में न कोई आरोप था, न बचाव। सिर्फ सच्चाई थी। “पिताजी भी नहीं चाहते थे कि यह घर टूटे। बाबा घर के स्तंभ हैं। अगर वे टूट जाते तो सब कुछ खत्म हो जाता—खेत, इज्जत, परिवार, सब। इसलिए पिताजी ने चुपचाप इस रिश्ते को स्वीकार कर लिया। बल्कि बढ़ावा भी दिया। तुम्हारी माँ ने भी इसे स्वीकार किया। अब ये दोनों… एक-दूसरे के सहारे जी रहे हैं।”
अमन का सिर फिर से रेणु के कंधे पर गिर गया। वह कुछ बोल नहीं पा रहा था। दिमाग में बहुत सारे सवाल घूम रहे थे—पिताजी की सहमति, माँ की खुशी, बाबा का प्यार… सब कुछ एक साथ उलझ गया था।
रेणु ने उसके सिर को सहलाते हुए कहा,
“आज बहुत सारे सवाल हो गए। अगर मैं तुम्हें एक साथ सब बता दूँ तो तुम खुद को संभाल नहीं पाओगे। तुम अभी तैयार नहीं हो। कुछ चीजें समय के साथ समझ में आती हैं। जबरदस्ती जानने से सिर्फ नुकसान होता है।”
अमन ने धीरे से पूछा, “और कितना कुछ है दीदी… जो मुझे नहीं पता?”
रेणु ने हल्की मुस्कान दी। मुस्कान में थकान थी। “बहुत कुछ। लेकिन आज नहीं। आज बस इतना समझ लो कि घर के अंदर जो कुछ हो रहा है, वह सिर्फ वासना नहीं है। उसमें मजबूरी भी है, प्रेम भी है, और परिवार को बचाने की जिद भी है।”
अमन चुप रहा। रेणु ने उसका चेहरा दोनों हाथों में लिया। आँसू पोंछे। फिर उसके माथे पर बहुत हल्का और लंबा चुंबन किया। होंठों की गर्माहट माथे पर रह गई।
“अब सो जाओ,” उसने फुसफुसाकर कहा। “और कुछ मत सोचो। मैं यहाँ हूँ। तुम अकेले नहीं हो।”
अमन ने उसकी आँखों में देखा। रेणु की आँखों में एक अजीब सी मजबूती थी—जैसे वह खुद भी इन राज़ों का बोझ उठाए हुए हो। अमन ने धीरे से सिर हिलाया। रेणु ने उसे बिस्तर पर लिटा दिया। चादर डाल दी। खुद उसके बगल में बैठकर उसके बालों में हाथ फेरती रही।
लालटेन की लौ धीरे-धीरे छोटी होती गई। अमन की पलकें भारी हो रही थीं। दिमाग में अभी भी बहुत कुछ उलझा हुआ था, लेकिन रेणु की उंगलियाँ उसके बालों में थीं और उसकी मौजूदगी एक अजीब सा सुकून दे रही थी।
थोड़ी देर बाद अमन की साँसें नियमित हो गईं। वह सो गया।
रेणु उसके पास बैठी रही। अँधेरे में उसके चेहरे को देखती रही। फिर बहुत धीमे स्वर में अपने आप से बोली,
“अब तुम भी जान गए हो… घर के असली राज़।”
वह उठकर खड़ी हुई। लालटेन उठाई। दरवाजे तक जाकर एक बार पीछे मुड़ी। अमन शांति से सोया हुआ था। रेणु ने सिटकिनी खोली और चुपचाप कमरे से बाहर चली गई।
गलियारे में अँधेरा था। घर सोया हुआ था। लेकिन दीवारों के अंदर छुपे राज़ अब एक और व्यक्ति को पता चल चुके थे।
सुबह की रोशनी खिड़की से अंदर आ रही थी जब अमन की आँख खुली।
रात की बातें अभी भी दिमाग में थीं, लेकिन अब वे पहले जैसी तेज और काँपने वाली नहीं लग रही थीं। रेणु की आवाज बार-बार कानों में गूँज रही थी—“घर के स्तंभ हैं बाबा… अगर वे टूट जाते तो सब बिखर जाता… माँ ने हर तरह से ख्याल रखा… पिताजी को भी पता है…”
अमन ने बिस्तर पर बैठकर दोनों हाथों से चेहरा धोया। कुछ पल तक वह चुपचाप बैठा रहा। फिर उसने धीरे से अपने आप से कहा,
“जो भी हुआ… घर की भलाई के लिए ही हुआ होगा। दीदी झूठ नहीं बोलतीं। वे हमेशा सोच-समझकर ही कुछ कहती हैं।”
यह बात उसके अंदर उतरते ही जैसे एक बोझ हल्का हो गया। पूरा बोझ नहीं हटा था, लेकिन अब वह उसे तोड़ने वाला नहीं लग रहा था। वह समझ गया था कि कुछ रिश्ते सिर्फ शरीर के नहीं होते। कभी-कभी वे मजबूरी, जिम्मेदारी और छुपे हुए प्रेम का मिश्रण होते हैं। और रेणु ने उसे जितना बताया था, उतना ही उसके लिए काफी था। बाकी चीजें समय के साथ समझ में आएँगी।
उसने कपड़े बदले, मुँह धोया और बाहर निकला।
आँगन में माँ सुशीला चूल्हे पर रोटी बना रही थीं। अमन ने इस बार उनकी तरफ देखा। माँ ने भी सिर उठाया। दोनों की निगाहें एक पल के लिए मिलीं। अमन ने हल्की मुस्कान दी। माँ ने भी सामान्य स्वर में कहा,
“आज चेहरा थोड़ा हल्का लग रहा है। चाय पी लो।”
अमन ने चाय का गिलास लिया। इस बार हाथ नहीं काँपे। वह माँ के पास बैठ गया। थोड़ी देर दोनों चुपचाप रहे। फिर अमन ने सामान्य स्वर में पूछा, “बाबा कहाँ हैं?”
“अंदर आँगन में धूप सेक रहे हैं,” माँ ने जवाब दिया। आवाज में कोई तनाव नहीं था।
अमन ने सिर हिलाया। वह उठकर बाबा के पास गया। बाबा लाठी पकड़े चारपाई पर बैठे थे। अमन ने उनके पैर छुए। बाबा ने उसके सिर पर हाथ रखा।
“आज तबीयत ठीक लग रही है?” बाबा ने पूछा।
“हाँ बाबा,” अमन ने साफ स्वर में जवाब दिया। “अब ठीक हूँ।”
बाबा ने मुस्कुरा दिया। अमन ने भी मुस्कुराकर जवाब दिया। पहली बार रात वाले दृश्य के बाद वह दोनों के सामने सामान्य खड़ा हो सका था। दिल में अभी भी एक अजीब सा वजन था, लेकिन अब वह वजन उसे डरा नहीं रहा था।
कॉलेज के लिए निकलते समय राधा गली में मिली। उसने अमन का चेहरा देखा और पूछा, “कल से चेहरा उतरा हुआ था। आज ठीक लग रहे हो।”
अमन ने हल्की मुस्कान दी। “हाँ… अब ठीक हूँ।”
राधा ने उसके हाथ को हल्के से छुआ। “अगर कुछ हो तो बताना।”
अमन ने सिर हिलाया। “बताऊँगा।” दोनों साथ-साथ कॉलेज की तरफ चल दिए। बातें सामान्य थीं—पढ़ाई, मेले की याद, आने वाले दिनों की छोटी-छोटी बातें। अमन के अंदर फिर से वह हल्की सी गर्माहट लौट आई जो राधा के पास होती थी।
कॉलेज में राजिया की निगाहें फिर से उस पर पड़ीं। अमन ने इस बार सामान्य व्यवहार रखा। न ज्यादा देखा, न नजरें बचाईं। बस अपना काम करता रहा।
शाम को घर लौटा तो आँगन में कमला चाची और कविता दोनों थीं। कमला चाची ने उसे देखा तो आँखों में वही पुरानी चमक थी, लेकिन अमन ने इस बार सिर्फ नमस्ते कहा और अंदर चला गया। कविता ने पीछे से आवाज दी, “आज जल्दी आ गए?”
अमन ने मुड़कर मुस्कुराते हुए कहा, “हाँ दीदी। थकान हो रही थी।”
रात के खाने के बाद रेणु आई। लालटेन लेकर। दरवाजा बंद करके बिस्तर के किनारे बैठ गई। उसने अमन का चेहरा देखा और समझ गई कि वह अब पहले से बेहतर है।
“अब कैसा लग रहा है?” उसने पूछा।
अमन ने ईमानदारी से जवाब दिया, “अब समझ में आ रहा है दीदी। जो भी हुआ… घर की भलाई के लिए ही हुआ होगा। आपने जो कहा, वह सही ही होगा। आप हमेशा सोच-समझकर बोलती हैं।”
रेणु ने उसके बालों में हाथ फेरा। आँखों में हल्की राहत थी। “अच्छा किया जो समझ गए। अब आगे बढ़ो। अपनी जिंदगी जीयो। राधा के साथ जो बन रहा है, उसे संभालो। बाकी चीजें समय के साथ अपने आप सुलझती जाएँगी।”
अमन ने सिर हिलाया। रेणु ने उसके माथे पर हल्का चुंबन किया और बोली, “सो जाओ। कल से फिर अपनी सामान्य दिनचर्या शुरू करो।”
रेणु चली गई।
अमन बिस्तर पर लेट गया। आँखें बंद कीं। इस बार माँ और बाबा वाला दृश्य आया तो वह पहले की तरह नहीं काँपा। बल्कि एक अजीब सी समझ के साथ स्वीकार कर लिया। घर के राज़ गहरे थे। लेकिन अब वह जानता था कि हर राज़ के पीछे कोई न कोई मजबूरी और कोई न कोई प्रेम छुपा होता है।
वह धीरे-धीरे अपनी पुरानी दिनचर्या में लौट आया था।
नींद आसानी से आ गई।
सुबह अमन अपनी सामान्य दिनचर्या में लौट चुका था।
रात को अच्छी नींद आई थी। सुबह उठकर उसने हाथ-मुँह धोया, चाय पी और कॉलेज के लिए तैयार होने लगा। माँ ने जैसे रोज़ होती है वैसे ही रोटी दी। बाबा आँगन में धूप सेक रहे थे। सब कुछ सामान्य लग रहा था। अमन के अंदर अब वह तेज उथल-पुथल नहीं थी। एक शांत समझ बस गई थी—घर के राज़ गहरे हैं, लेकिन वे घर को बचाने के लिए ही हैं।
कॉलेज से लौटने के बाद वह आँगन में बैठा था कि तभी गली की तरफ से आवाजें आईं। ठेले की घंटी और कई लोगों के बोलने की आवाज। अमन ने सिर उठाया।
एक ठेला आँगन के बाहर रुका। उस पर सामान लदा हुआ था। और ठेले के पीछे से एक परिचित आवाज आई—
“अरे अमन! कहाँ हो बेटा?”
अमन की आँखें चौड़ी हो गईं। वह तुरंत उठा और बाहर की तरफ भागा।
सरला चाची थीं।
रामेश चाचा की पत्नी। कई महीनों बाद घर लौटी थीं। वे अपने मायके गई हुई थीं। अब वापस आई थीं। साड़ी पहने, माथे पर हल्की बिंदी, चेहरे पर थकान और खुशी दोनों साफ दिख रहे थे। अमन को देखते ही उनके चेहरे पर बड़ी मुस्कान फैल गई।
“अरे मेरे राजू!” उन्होंने अमन को देखते ही दोनों हाथ फैला दिए।
अमन की आँखों में खुशी आ गई। वह दौड़कर उनके पास गया और उनके पैर छूए। सरला चाची ने उसे उठाकर अपने से सटा लिया। अमन को उनकी बाँहों में वही पुरानी गर्माहट महसूस हुई जो बचपन से महसूस होती आई थी। सरला चाची उसे हमेशा अपने बच्चे की तरह मानती थीं। खून का रिश्ता नहीं था, लेकिन दिल का रिश्ता गहरा था।
“कितना बड़ा हो गया तू!” सरला चाची ने उसके बाल सहलाते हुए कहा। आवाज में हल्की सिहरन थी। “मैं गई थी तब तू इतना नहीं था। अब तो पूरा जवान लग रहा है।”
अमन मुस्कुराया। “आप कब आईं चाची? बताती तो मैं स्टेशन ले आता।”
सरला चाची ने उसके गाल पर हल्का थप्पड़ जैसा स्पर्श किया। “अरे बाबा! इतनी फॉर्मैलिटी की क्या जरूरत। अपना घर है। चुपके से आ गई।”
माँ सुशीला भी आँगन में आ गईं। दोनों बहुएँ गले मिलीं। कमला चाची भी निकल आईं। घर में अचानक हलचल मच गई। सामान उतरने लगा। बच्चे इधर-उधर दौड़ने लगे। अमन सरला चाची के सामान में से भारी बैग उठाकर अंदर ले गया।
सरला चाची ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, “तू हमेशा से मेरा हाथ बंटाता आया है। आज भी वैसा ही है।”
अमन ने मुस्कुराकर जवाब दिया, “आपके लिए तो हमेशा तैयार रहता हूँ चाची।”
शाम होते-होते घर में फिर से वह पुरानी रौनक आ गई जो सरला चाची के जाने के बाद कम हो गई थी। रसोई में तीनों बहुओं की हँसी-मजाक की आवाजें आ रही थीं। बाबा आँगन में बैठे सबको देख रहे थे। पिताजी भी खेत से लौटकर आए और सरला चाची से हाल-चाल पूछने लगे।
अमन अपने कमरे में सामान रखने के बाद बाहर आया तो सरला चाची ने उसे बुलाया।
“इधर आ। बैठ।”
अमन उनके पास बैठ गया। सरला चाची ने उसके बाल ठीक करते हुए कहा, “तेरा चेहरा देखकर लग रहा है तू बहुत कुछ सोचने लगा है इन दिनों। पहले इतना गंभीर नहीं था।”
अमन ने हल्की मुस्कान दी। “अब थोड़ा समझदार हो गया हूँ चाची।”
सरला चाची ने उसकी आँखों में देखा। उनकी निगाह में माँ जैसी चिंता और प्यार दोनों थे। “समझदार होना अच्छी बात है। लेकिन ज्यादा बोझ मत ले लिया कर। तू अभी भी मेरा बच्चा है।”
अमन ने उनका हाथ पकड़ लिया। “मैं हमेशा आपका बच्चा ही रहूँगा चाची।”
सरला चाची मुस्कुरा दीं। उनकी आँखें थोड़ी गीली हो गई थीं। उन्होंने अमन के माथे पर हाथ रखा और बोलीं, “अच्छा। जा, हाथ-मुँह धो ले। आज तेरे लिए खास मिठाई बनाऊँगी।”
अमन उठकर चला गया। मन हल्का लग रहा था। घर में एक पुराना खालीपन भर गया था। सरला चाची की वापसी के साथ वह गर्माहट लौट आई थी जो उसे हमेशा सुकून देती थी।
रात के खाने में सब साथ बैठे। हँसी-मजाक चल रहा था। अमन बीच-बीच में सरला चाची की तरफ देख लेता। हर बार वे मुस्कुरा देतीं।
रात को जब रेणु आई तो अमन ने उसे बताया, “सरला चाची आ गईं दीदी। बहुत दिन बाद।”
रेणु ने मुस्कुराकर कहा, “अच्छा हुआ। घर में फिर से रौनक आ गई होगी। वे तुझे बहुत चाहती हैं।”
अमन ने सिर हिलाया। “हाँ। उन्हें देखकर अच्छा लगा।”
रेणु ने उसके बालों में हाथ फेरा। “अब घर फिर से पूरा लग रहा होगा तुझे।”
अमन चुप रहा। हाँ, घर फिर से थोड़ा पूरा लग रहा था।
सरला चाची के आने के अगले दिन घर में सामान्य हलचल थी।
सुबह से ही रसोई में उनकी हँसी की आवाज आ रही थी। वे माँ और कमला चाची के साथ मिलकर काम कर रही थीं। अमन कॉलेज जाने से पहले उनके पैर छूकर निकला। सरला चाची ने उसके सिर पर हाथ रखा और बोलीं, “ध्यान से जाना बेटा।” वही पुरानी गर्माहट थी। अमन के चेहरे पर मुस्कान रह गई।
दिन सामान्य बीता। कॉलेज में राधा से हल्की बात हुई। राजिया की निगाहें फिर से मिलीं, लेकिन अमन ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। शाम को घर लौटा तो सरला चाची आँगन में बैठी कपड़े सुखा रही थीं। अमन उनके पास गया।
“चाची, थक तो नहीं गईं इतनी दूर से आकर?”
सरला चाची ने मुस्कुराते हुए कहा, “तेरे घर आकर थकान कहाँ रहती है। तू है न यहाँ।” उन्होंने अमन के बालों में उंगलियाँ फेर दीं। अमन उनके पास बैठ गया। दोनों ने थोड़ी देर सामान्य बातें कीं—मायके का हाल, वहाँ के खेत, रिश्तेदार। सरला चाची बीच-बीच में अमन को देखकर मुस्कुरा देतीं। उनकी आँखों में एक पुरानी ममता थी।
रात के खाने के बाद सब अपने-अपने कमरों में चले गए। अमन अपने कमरे में लेटा हुआ सोच रहा था कि तभी दरवाजे पर दस्तक हुई। रेणु थी। लालटेन लेकर अंदर आई। दरवाजा बंद करके बिस्तर के किनारे बैठ गई।
“सरला चाची आ गईं,” अमन ने पहले ही बता दिया। “घर फिर से वैसा लगने लगा है जैसे पहले लगता था।”
रेणु ने सिर हिलाया। कुछ पल चुप रही। फिर धीमे स्वर में बोली,
“अमन… सरला चाची के बारे में तुम बहुत कम जानते हो।”
अमन ने सिर उठाया। रेणु के चेहरे पर वह गंभीर भाव था जो वह बड़े राज़ बताते समय लाती थी।
“क्या मतलब दीदी?”
रेणु ने लालटेन की लौ की तरफ देखा। फिर बोली,
“सरला चाची जब इस घर में आई थीं तब उनकी उम्र तुमसे भी कम थी। रामेश चाचा से शादी के बाद वे बहुत खुश थीं। लेकिन कुछ साल बाद… एक बात हुई।”
अमन चुपचाप सुन रहा था।
“रामेश चाचा… वे कभी-कभी बहुत बदल जाते हैं। गुस्से में या नशे में वे सरला चाची के साथ कठोर हो जाते थे। मारपीट तक हो जाती थी। एक बार तो हालत इतनी खराब हो गई थी कि सरला चाची अपने मायके भाग गई थीं। तब तुम छोटे थे। तुम्हें याद नहीं होगा।”
अमन की आँखें थोड़ी चौड़ी हो गईं। उसने कभी सरला चाची के चेहरे पर ऐसा कुछ नहीं देखा था।
रेणु ने आगे कहा, “बाबा और पिताजी ने बीच-बचाव किया। रामेश चाचा ने माफी माँगी। सरला चाची वापस आ गईं। लेकिन उस दिन के बाद… रामेश चाचा ने एक अजीब सा मौन अपना लिया। वे घर में रहते हैं, काम करते हैं, लेकिन सरला चाची के साथ अब बहुत कम बोलते हैं। जैसे कोई दीवार खड़ी हो गई हो दोनों के बीच।”
अमन ने धीमे स्वर में पूछा, “तो चाची… वे खुश हैं?”
रेणु ने गहरी साँस ली। “वे इस घर से जुड़ गई हैं। तुमसे, मुझसे, माँ से… सब से। वे तुम्हें अपने बच्चे की तरह चाहती हैं क्योंकि उनका अपना कोई संतान नहीं हो सकी। रामेश चाचा का मौन उनका दर्द है, लेकिन वे उसे चुपचाप सहती हैं। बाहर से वे हमेशा मुस्कुराती रहती हैं।”
अमन चुप रहा। दिमाग में सरला चाची की आज की मुस्कान घूम गई—वह मुस्कान जिसमें ममता थी, लेकिन उसके पीछे एक पुराना अकेलापन भी छुपा हो सकता था।
रेणु ने उसका हाथ पकड़ा। “मैंने तुम्हें इसलिए बताया क्योंकि तुम उन्हें बहुत चाहते हो। लेकिन इस बात को और फैलाने की जरूरत नहीं। सरला चाची ने जो चुप रहना चुना है, हमें भी उसी का सम्मान करना चाहिए।”
अमन ने सिर हिलाया। “मैं कुछ नहीं कहूँगा दीदी।”
रेणु ने उसके माथे पर हल्का हाथ फेरा। “अच्छा। अब सो जाओ। कल फिर से सामान्य दिन होगा।”
रेणु चली गई।
अमन अकेला रह गया। छत की तरफ देखता रहा। सरला चाची का चेहरा आँखों के सामने था—आज वाली मुस्कान, बचपन वाली गर्माहट, और अब रेणु द्वारा बताया गया वह छुपा दर्द। रामेश चाचा का मौन… घर के एक और राज़ की तरह।
वह समझ गया था कि इस घर में हर व्यक्ति के चेहरे के पीछे कोई न कोई अधूरी कहानी छुपी हुई है।
नींद धीरे-धीरे आई।
मंगलवार की सुबह अभी पूरी तरह रोशनी नहीं फैली थी। आज छुट्टी थी।
अमन गहरी नींद में सोया हुआ था। कमरे में हल्की ठंडक फैली हुई थी। खिड़की से बाहर मुर्गे की आवाज दूर से आ रही थी। तभी दरवाजा बहुत धीरे से खुला। कमला चाची अंदर आईं। उन्होंने दरवाजा बंद किया लेकिन सिटकिनी नहीं लगाई। उनके कदम फर्श पर कोई आवाज नहीं कर रहे थे।
वे बिस्तर के पास आकर रुकीं। अमन की साँसें नियमित थीं। चादर कमर तक खिसकी हुई थी। कमला ने झुककर उसके माथे पर बहुत हल्का सा चुंबन किया। फिर गाल पर। अमन की पलकें फड़कीं। आँखें धीरे-धीरे खुलीं।
कमला चाची उसके बहुत करीब थीं। उनके बाल उसके माथे से छू रहे थे। साड़ी का पल्लू आगे की तरफ झुका हुआ था। अमन नींद भरी आँखों से उन्हें देखता रहा।
“चाची…” उसने धीमी आवाज में कहा, “अगर आप रोज़ ऐसे उठाओगी… तो मैं कभी जागूँगा ही नहीं।”
कमला चाची हल्की मुस्कुराईं। उन्होंने उसके बालों में उंगलियाँ फेरते हुए कहा, “हत बदमश कहीं का!” आवाज में गुस्सा नहीं था। बल्कि एक हल्की, जाने-पहचाने वाली शरारत थी। फिर उनका चेहरा थोड़ा गंभीर हो गया।
“अब तू ठीक है न?” उन्होंने धीमे स्वर में पूछा। “थोड़े दिनों से परेशान लग रहा था तू। इसलिए मैंने तुझे तंग नहीं किया। सोचा सही समय आने दूँ।”
अमन ने उनकी आँखों में देखा। सुबह की धुँधली रोशनी में कमला चाची का चेहरा और भी आकर्षक लग रहा था। उसने अचानक दोनों हाथों से उनकी कमर पकड़ ली और उन्हें अपनी गोद में खींच लिया। कमला चाची हल्की सी सिसकारी के साथ अमन की गोद में आ बैठीं। साड़ी का पल्लू एक तरफ खिसक गया। उनकी भारी जाँघें अमन की जाँघों पर थीं।
अमन ने उनकी कमर में हाथ फेरते हुए कहा, “चाची, मैं तो फर्स्ट क्लास हूँ। अब पूरी तरह ठीक हूँ।”
फिर उसने दोनों हाथ आगे बढ़ाकर कमला चाची के भारी स्तनों को साड़ी के ऊपर से ही दबा दिया। जोर से नहीं, लेकिन साफ और साहस भरे अंदाज में। उंगलियाँ उनकी गोलाई को महसूस कर रही थीं। कमला चाची की लंबी सिसकारी निकल गई। उनके शरीर में एक झटका सा चला। वे अमन के ऊपर से हटने के बजाय एक पल के लिए और सट गईं।
“बदmash…!” उन्होंने फुसफुसाकर कहा। आवाज काँप रही थी। “इतनी सुबह…”
अमन ने उनके स्तनों को हल्के से और दबाया। “सुबह ही तो मजा है चाची।”
कमला चाची ने उसके हाथ पकड़कर हटा दिए। वे गोद से उतरकर खड़ी हो गईं। साँसें तेज थीं। पल्लू उन्होंने जल्दी से संभाल लिया। गाल हल्के लाल हो गए थे।
“बाद में आती हूँ,” उन्होंने धीमी आवाज में कहा। “आज थोड़ा काम है। चल, तू भी उठ जा। आज छुट्टी है तो दिन बर्बाद मत करना।”
अमन बिस्तर पर बैठा मुस्कुरा रहा था। “जैसा आप कहें चाची।”
कमला चाची ने उसकी तरफ एक लंबी, चमकदार निगाह डाली। आँखों में अभी भी वह भूख बाकी थी। फिर वे दरवाजे की तरफ मुड़ीं और निकल गईं। दरवाजा हल्के से बंद हुआ।
अमन लेटा रहा। हाथों में अभी भी उनके स्तनों की गर्माहट और वजन बाकी था। मन में एक अजीब सा उत्साह तैर रहा था। कमला चाची अब सिर्फ रात के इशारों तक सीमित नहीं रह गई थीं। वे सुबह भी साफ खेल खेल रही थीं।
वह उठकर बैठ गया। आज छुट्टी थी। दिमाग में एक ख्याल आया—खेत। रुक्साना। आम।
वह मुस्कुराया।
अमन ने नहा-धोकर काले रंग की सादी कमीज और पैंट पहन ली। आज छुट्टी थी। मन में एक ही ख्याल घूम रहा था—खेत और रुक्साना।
वह घर से निकला। सुबह की धूप अभी नरम थी। खेतों के बीच वाली पगडंडी पर चलते हुए हवा में मिट्टी और पत्तों की खुशबू आ रही थी। थोड़ी दूर जाकर उसने रुक्साना को देखा।
रुक्साना एक मेड़ पर खड़ी थीं। आज उन्होंने काला सलवार-सूट पहना था। सूट काफी टाइट था। 34D के भारी स्तन सूट के ऊपर से साफ उभर रहे थे। पतली कमर और फिर गोल, गदराई हुई गाँड सूट में कसकर पैक थी। काले रंग में उनका गोरा बदन और भी निखर रहा था। बाल खुले हुए थे और हवा में हल्के-हल्के उड़ रहे थे।
अमन के मन में तुरंत ख्याल आया—“क्या मस्त फिगर है… मन कर रहा है अभी पटक के चोद दूँ।” लेकिन तुरंत ही रेणु दीदी की आवाज याद आ गई—“सब्र का फल मीठा होता है।” उसने गहरी साँस ली और अपनी इच्छा को काबू में रखा।
रुक्साना ने उसे आता देखकर मुस्कुरा दिया।
“अरे बाबूजी के बेटे! आज छुट्टी है क्या? इतनी सुबह यहाँ?”
अमन पास जाकर बोला, “हाँ काकी। घूमने निकला था। सोचा आपसे मिल लूँ। आम तो अब पूरी तरह पक गए होंगे?”
रुक्साना ने उसकी तरफ देखा। आँखों में हल्की शरारत थी। “हाँ… बगीचे में अंदर अच्छे-अच्छे पके आम लटके हैं। तोड़ने लायक।”
अमन ने मुस्कुराते हुए कहा, “तो फिर चलिए काकी। आप मुझे अपने पके आम दिखा दो।”
रुक्साना हल्की हँसी। “चलो। लेकिन पेड़ पर चढ़ना पड़ेगा।”
दोनों बगीचे के अंदर की तरफ चल दिए। पेड़ों की घनी छाँव थी। चारों तरफ पके आमों की खुशबू फैली हुई थी। रुक्साना आगे-आगे चल रही थीं। उनका टाइट सूट पीछे से उनकी गाँड की गोलाई को और उभार रहा था। अमन की निगाह बार-बार वहीं चली जा रही थी।
एक बड़े पेड़ के नीचे पहुँचकर रुक्साना रुकीं। “यह वाला पेड़ अच्छा है। ऊपर जाकर तोड़ो।”
अमन पेड़ पर चढ़ गया। आम तोड़ने के बहाने वह ऊपर से नीचे नज़र रख रहा था। थोड़ी देर बाद उसने देखा कि नीचे कोई नहीं है। चारों तरफ सन्नाटा था। बस पत्तों की हल्की सरसराहट। वह धीरे से पेड़ से उतर आया।
रुक्साना थोड़ी दूर चली गई थीं। अमन ने उनकी दिशा में कदम बढ़ाए। झाड़ियों के बीच से उसने देखा—रुक्साना कुछ कदम आगे एक पेड़ के पीछे मुँह किए खड़ी थीं। सलवार नीचे की हुई थी। उनकी सफेद, संगमरमर जैसी चिकनी गाँड पूरी तरह नंगी थी। वे मूत रही थीं। पानी की धार नीचे गिर रही थी।
अमन की साँसें तेज हो गईं। वह चुपचाप खड़ा उन्हें देखने लगा।
रुक्साना को अंदाजा हो गया था कि पीछे कोई है। उन्होंने सिर तो नहीं घुमाया, लेकिन जानबूझकर अपना समय लंबा खींच लिया। गाँड को थोड़ा और ऊपर उठाया। कमर को हल्का सा मोड़ा। मूतने का सिलसिला जानबूझकर धीमा रखा। अमन की निगाहें उनकी गोरी, गोल गाँड पर जमी हुई थीं। बीच की दरार साफ दिख रही थी।
जब धार खत्म हुई तो रुक्साना ने धीरे-धीरे सलवार ऊपर की। उन्होंने पीछे मुड़कर देखा। अमन जल्दी से पेड़ की तरफ भागकर अपनी जगह पर जा खड़ा हुआ। जैसे वह अभी-अभी उतरे हों।
रुक्साना वापस आईं। चेहरे पर हल्की सी मुस्कान थी। आँखों में शरारत साफ झलक रही थी।
“आम तोड़े या सिर्फ पेड़ देख रहे थे?” उन्होंने पूछा।
अमन ने सामान्य स्वर में जवाब दिया, “तोड़े हैं काकी। लेकिन आपके बगीचे के आम… सच में बहुत पके हुए लग रहे हैं।”
रुक्साना ने उसकी तरफ देखा। “पके आम देखकर सबका मन ललचाता है। लेकिन तोड़ने से पहले पेड़ की इजाजत भी लेनी पड़ती है।”
अमन ने हल्की मुस्कान दी। “इजाजत मिल जाएगी काकी… जब समय आएगा।”
दोनों की निगाहें एक पल के लिए मिलीं। फिर रुक्साना ने पल्लू ठीक किया और बोलीं, “चलो, अब घर चलो। ज्यादा देर हो गई।”
अमन ने सिर हिलाया। दोनों बगीचे से बाहर निकले। रास्ते में बातें हल्की रहीं, लेकिन हवा में एक अजीब सी गर्माहट तैर रही थी। अमन के दिमाग में रुक्साना की नंगी गाँड बार-बार घूम रही थी—सफेद, चिकनी, और जानबूझकर उठाई हुई।
घर पहुँचते-पहुँचते उसका मन बेचैन हो चुका था। लेकिन रेणु दीदी की बात याद करके उसने खुद को काबू में रखा। सब्र का फल मीठा होता है।
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albertprince547;
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