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Incest परिवार के गंदे राज़
#41
रात भर अमन की आँखों में नींद नहीं आई।
माँ और दादा जी वाला दृश्य बार-बार दोहराया जा रहा था। दीये की रोशनी, बाबा के प्यार भरे शब्द, माँ की सिसकारियाँ, दोनों का एक-दूसरे में खो जाना—सब कुछ इतना साफ था कि जैसे अभी भी दरवाजे की दरार से देख रहा हो। कभी लगता था कि उसने सपना देखा है, लेकिन शरीर की काँप और दिल की धड़कन बता रही थी कि वह सपना नहीं था।
सुबह जब उठा तो सिर भारी था। आँखें सूजी हुई थीं। उसने देर तक बिस्तर पर बैठे रहकर हिम्मत जुटाई। फिर नहा-धोकर बाहर निकला।
आँगन में माँ सुशीला चूल्हे के पास बैठी चाय बना रही थीं। साड़ी का पल्लू सामान्य रूप से रखा हुआ था। चेहरे पर कोई थकान या अपराध भाव नहीं था। बल्कि एक शांत थकान सी थी। अमन ने उनकी तरफ देखा तो माँ ने सिर उठाया और सामान्य स्वर में बोलीं,
“उठ गए? चाय पी लो। आज चेहरा उतरा हुआ लग रहा है।”
अमन ने सिर्फ सिर हिलाया। आँखें मिला नहीं पाया। चाय का गिलास लिया और चुपचाप बैठ गया। माँ ने और कुछ नहीं पूछा।
थोड़ी देर बाद बाबा रामप्रसाद भी आँगन में आए। लाठी पकड़े हुए। उन्होंने अमन को देखा और सामान्य स्वर में कहा, “अमन बेटा, आज कॉलेज तो नहीं जाना?”
अमन ने फिर सिर हिलाया। “आज… थोड़ी तबीयत ठीक नहीं लग रही बाबा।”
बाबा ने उसके सिर पर हाथ रखा। हल्का सा। वही हाथ जिन्होंने रात को माँ को सहलाया था। अमन की रूह काँप गई। उसने जल्दी से बहाना करके अंदर चला गया।
दिन भर वह घर में ही रहा। कभी अपनी बहनों से बात की, कभी खिड़की से बाहर खेतों की तरफ देखा। लेकिन दिमाग बार-बार उसी कमरे में चला जाता। राधा का ख्याल आया तो मन और भारी हो गया। राजिया, कमला चाची, रुक्साना—सब कुछ अब फीका लग रहा था। घर का सबसे बड़ा खंभा ही दरक चुका था उसके लिए।
शाम होते-होते उसने तय कर लिया। रेणु को बताना ही होगा। वह उससे कुछ नहीं छुपाता था। यह बोझ अकेले नहीं उठाया जा सकता था।
रात के बारह बजे रेणु आई। लालटेन लेकर। दरवाजा बंद करके सिटकिनी लगाई। बिस्तर के किनारे बैठते ही उसने अमन का चेहरा देखा और समझ गई कि कुछ बहुत बड़ा हुआ है।
“क्या हुआ?” उसने धीमे स्वर में पूछा।
अमन कुछ बोल नहीं पाया। गला सूख गया था। आँखें भर आईं। उसने सिर झुका लिया। फिर बहुत धीमी और टूटी आवाज में बोला,
“दीदी… मैंने… मैंने रात को देख लिया…”
रेणु ने उसका हाथ पकड़ लिया। “क्या देख लिया?”
अमन की आवाज और काँप गई। आँसू निकलने लगे।
“बाबा… और माँ… दोनों… एक साथ… बिस्तर पर… बाबा माँ को… बहू कहकर… इतने प्यार से…”
वह और नहीं बोल पाया। रोने लगा। कंधे काँप रहे थे। रेणु ने उसे अपने से सटा लिया। अमन का सिर उसके कंधे पर था। वह बिना आवाज किए रो रहा था।
रेणु ने उसके बालों में हाथ फेरा। आवाज में हैरानी नहीं थी। बल्कि एक गहरी समझ थी। जैसे वह इस बात का इंतजार ही कर रही हो।
“शांत हो जाओ,” उसने बहुत धीमे स्वर में कहा। “मैं सुन रही हूँ।”
अमन ने रोते हुए पूरा बताना शुरू किया—कैसे पानी पीने गया, कैसे आवाजें सुनीं, कैसे दरवाजे की दरार से देखा, बाबा के शब्द, माँ की सिसकारियाँ, दोनों का एक-दूसरे को पति-पत्नी की तरह चाहना। हर बात आँसुओं के साथ निकल रही थी।
रेणु अंत तक चुपचाप सुनती रही। उसका हाथ लगातार अमन के बालों और पीठ पर घूम रहा था। जब अमन थककर चुप हुआ तो रेणु ने उसका चेहरा दोनों हाथों में लिया। आँसू पोंछे।
“अब धीरे से साँस लो,” उसने कहा। “मैं यहाँ हूँ।”
अमन ने उसकी आँखों में देखा। रेणु के चेहरे पर वह हैरानी नहीं थी जो वह उम्मीद कर रहा था। बल्कि एक शांत, पुरानी समझ थी। जैसे यह राज़ उसके लिए नया न हो।
“दीदी… तुम्हें… पहले से पता था?” अमन की आवाज अभी भी काँप रही थी।
रेणु ने उसकी आँखों में देखा। कुछ पल चुप रही। फिर धीरे से सिर हिलाया।
“हाँ… मुझे पता था।”
कमरे में सन्नाटा छा गया। सिर्फ अमन की भारी साँसें चल रही थीं। रेणु ने उसे और करीब खींच लिया।
“अब और मत रोओ,” उसने फुसफुसाकर कहा। “मैं तुम्हें समझाती हूँ… लेकिन धीरे-धीरे। सब एक साथ नहीं।”
अमन ने सिर उसके कंधे पर रख दिया। आँसू अभी भी बह रहे थे, लेकिन अब थोड़े धीमे हो गए थे। रेणु का हाथ उसके बालों में था। लालटेन की लौ काँप रही थी।
बात अभी शुरू ही हुई थी।


रेणु ने अमन को अपने से सटाए रखा। उसका सिर अभी भी उसके कंधे पर था। कमरे में सिर्फ लालटेन की छोटी सी लौ जल रही थी। बाहर हल्की हवा चल रही थी। दीवार पर दोनों की छायाएँ काँप रही थीं। अमन की साँसें धीरे-धीरे नियमित हो रही थीं, लेकिन आँखों से आँसू अभी भी रुक-रुककर बह रहे थे।
रेणु ने उसके बालों में उंगलियाँ फेरते हुए बहुत धीमे स्वर में कहा,
“अब सुनो… और शांत रहकर सुनो। मैं तुम्हें वह सब बताऊँगी जो तुम्हें जानना जरूरी है। लेकिन सिर्फ उतना ही जितना तुम इस वक्त सह सकते हो।”
अमन ने सिर नहीं हिलाया। बस और करीब सट गया। रेणु की आवाज में न कोई घबराहट थी, न हैरानी। बल्कि एक गहरी थकान और समझ थी—जैसे वह यह बात बहुत दिनों से अपने अंदर दबाए बैठी हो।
“दादी के मरने के बाद सब कुछ शुरू हुआ था,” रेणु ने कहा। आवाज बहुत साफ थी। “बाबा पूरी तरह टूट गए थे। दादी उनके जीवन की धुरी थीं। जब वे चली गईं तो बाबा जैसे सूख गए। खाना-पीना छोड़ दिया। रात-रात भर जागते रहते। घर का कामकाज, खेत, परिवार… सब कुछ उनके कंधों पर था। अगर बाबा गिर जाते तो यह पूरा घर बिखर जाता। तुम छोटे थे तब। तुम्हें याद भी नहीं होगा।”
अमन की साँसें थम गईं। रेणु का हाथ उसके बालों में रुक गया।
“तुम्हारी माँ ने उस समय सब कुछ संभाला,” रेणु ने आगे कहा। “सिर्फ घर का काम नहीं… बाबा का ख्याल हर तरह से रखा। उनकी दवा, उनका खाना, उनकी नींद, उनकी तन्हाई… सब कुछ। धीरे-धीरे बाबा फिर से जी उठे। घर फिर से चलने लगा। खेत बच गए। परिवार टूटा नहीं।”
अमन ने धीरे से सिर उठाया। आँखें लाल थीं। “लेकिन दीदी… मैंने जो देखा… वह तो… जैसे दोनों प्रेमी हों। इतना प्यार… इतनी नजदीकी…”
रेणु ने उसकी आँखों में देखा। कुछ पल चुप रही। फिर बहुत धीमे स्वर में बोली,
“तुम सही कह रहे हो। बाबा ने तुम्हारी माँ को अब दादी की जगह दे दी है। सिर्फ शरीर की नहीं… दिल की भी। और तुम्हारी माँ भी इससे खुश हैं। वे इसे अपना कर्तव्य नहीं, अपना प्रेम समझती हैं।”
अमन का चेहरा और सफेद पड़ गया। उसने फुसफुसाकर पूछा, “पिताजी… उन्हें पता है?”
रेणु ने सिर हिलाया। “हाँ। पिताजी को सब पता है। बल्कि… उन्होंने ही तुम्हारी माँ को इस रास्ते पर भेजा था।”
अमन की आँखें फटी की फटी रह गईं। “पिताजी ने…?”
“हाँ,” रेणु ने कहा। आवाज में न कोई आरोप था, न बचाव। सिर्फ सच्चाई थी। “पिताजी भी नहीं चाहते थे कि यह घर टूटे। बाबा घर के स्तंभ हैं। अगर वे टूट जाते तो सब कुछ खत्म हो जाता—खेत, इज्जत, परिवार, सब। इसलिए पिताजी ने चुपचाप इस रिश्ते को स्वीकार कर लिया। बल्कि बढ़ावा भी दिया। तुम्हारी माँ ने भी इसे स्वीकार किया। अब ये दोनों… एक-दूसरे के सहारे जी रहे हैं।”
अमन का सिर फिर से रेणु के कंधे पर गिर गया। वह कुछ बोल नहीं पा रहा था। दिमाग में बहुत सारे सवाल घूम रहे थे—पिताजी की सहमति, माँ की खुशी, बाबा का प्यार… सब कुछ एक साथ उलझ गया था।
रेणु ने उसके सिर को सहलाते हुए कहा,
“आज बहुत सारे सवाल हो गए। अगर मैं तुम्हें एक साथ सब बता दूँ तो तुम खुद को संभाल नहीं पाओगे। तुम अभी तैयार नहीं हो। कुछ चीजें समय के साथ समझ में आती हैं। जबरदस्ती जानने से सिर्फ नुकसान होता है।”
अमन ने धीरे से पूछा, “और कितना कुछ है दीदी… जो मुझे नहीं पता?”
रेणु ने हल्की मुस्कान दी। मुस्कान में थकान थी। “बहुत कुछ। लेकिन आज नहीं। आज बस इतना समझ लो कि घर के अंदर जो कुछ हो रहा है, वह सिर्फ वासना नहीं है। उसमें मजबूरी भी है, प्रेम भी है, और परिवार को बचाने की जिद भी है।”
अमन चुप रहा। रेणु ने उसका चेहरा दोनों हाथों में लिया। आँसू पोंछे। फिर उसके माथे पर बहुत हल्का और लंबा चुंबन किया। होंठों की गर्माहट माथे पर रह गई।
“अब सो जाओ,” उसने फुसफुसाकर कहा। “और कुछ मत सोचो। मैं यहाँ हूँ। तुम अकेले नहीं हो।”
अमन ने उसकी आँखों में देखा। रेणु की आँखों में एक अजीब सी मजबूती थी—जैसे वह खुद भी इन राज़ों का बोझ उठाए हुए हो। अमन ने धीरे से सिर हिलाया। रेणु ने उसे बिस्तर पर लिटा दिया। चादर डाल दी। खुद उसके बगल में बैठकर उसके बालों में हाथ फेरती रही।
लालटेन की लौ धीरे-धीरे छोटी होती गई। अमन की पलकें भारी हो रही थीं। दिमाग में अभी भी बहुत कुछ उलझा हुआ था, लेकिन रेणु की उंगलियाँ उसके बालों में थीं और उसकी मौजूदगी एक अजीब सा सुकून दे रही थी।
थोड़ी देर बाद अमन की साँसें नियमित हो गईं। वह सो गया।
रेणु उसके पास बैठी रही। अँधेरे में उसके चेहरे को देखती रही। फिर बहुत धीमे स्वर में अपने आप से बोली,
“अब तुम भी जान गए हो… घर के असली राज़।”
वह उठकर खड़ी हुई। लालटेन उठाई। दरवाजे तक जाकर एक बार पीछे मुड़ी। अमन शांति से सोया हुआ था। रेणु ने सिटकिनी खोली और चुपचाप कमरे से बाहर चली गई।
गलियारे में अँधेरा था। घर सोया हुआ था। लेकिन दीवारों के अंदर छुपे राज़ अब एक और व्यक्ति को पता चल चुके थे।


सुबह की रोशनी खिड़की से अंदर आ रही थी जब अमन की आँख खुली।
रात की बातें अभी भी दिमाग में थीं, लेकिन अब वे पहले जैसी तेज और काँपने वाली नहीं लग रही थीं। रेणु की आवाज बार-बार कानों में गूँज रही थी—“घर के स्तंभ हैं बाबा… अगर वे टूट जाते तो सब बिखर जाता… माँ ने हर तरह से ख्याल रखा… पिताजी को भी पता है…”
अमन ने बिस्तर पर बैठकर दोनों हाथों से चेहरा धोया। कुछ पल तक वह चुपचाप बैठा रहा। फिर उसने धीरे से अपने आप से कहा,
“जो भी हुआ… घर की भलाई के लिए ही हुआ होगा। दीदी झूठ नहीं बोलतीं। वे हमेशा सोच-समझकर ही कुछ कहती हैं।”
यह बात उसके अंदर उतरते ही जैसे एक बोझ हल्का हो गया। पूरा बोझ नहीं हटा था, लेकिन अब वह उसे तोड़ने वाला नहीं लग रहा था। वह समझ गया था कि कुछ रिश्ते सिर्फ शरीर के नहीं होते। कभी-कभी वे मजबूरी, जिम्मेदारी और छुपे हुए प्रेम का मिश्रण होते हैं। और रेणु ने उसे जितना बताया था, उतना ही उसके लिए काफी था। बाकी चीजें समय के साथ समझ में आएँगी।
उसने कपड़े बदले, मुँह धोया और बाहर निकला।
आँगन में माँ सुशीला चूल्हे पर रोटी बना रही थीं। अमन ने इस बार उनकी तरफ देखा। माँ ने भी सिर उठाया। दोनों की निगाहें एक पल के लिए मिलीं। अमन ने हल्की मुस्कान दी। माँ ने भी सामान्य स्वर में कहा,
“आज चेहरा थोड़ा हल्का लग रहा है। चाय पी लो।”
अमन ने चाय का गिलास लिया। इस बार हाथ नहीं काँपे। वह माँ के पास बैठ गया। थोड़ी देर दोनों चुपचाप रहे। फिर अमन ने सामान्य स्वर में पूछा, “बाबा कहाँ हैं?”
“अंदर आँगन में धूप सेक रहे हैं,” माँ ने जवाब दिया। आवाज में कोई तनाव नहीं था।
अमन ने सिर हिलाया। वह उठकर बाबा के पास गया। बाबा लाठी पकड़े चारपाई पर बैठे थे। अमन ने उनके पैर छुए। बाबा ने उसके सिर पर हाथ रखा।
“आज तबीयत ठीक लग रही है?” बाबा ने पूछा।
“हाँ बाबा,” अमन ने साफ स्वर में जवाब दिया। “अब ठीक हूँ।”
बाबा ने मुस्कुरा दिया। अमन ने भी मुस्कुराकर जवाब दिया। पहली बार रात वाले दृश्य के बाद वह दोनों के सामने सामान्य खड़ा हो सका था। दिल में अभी भी एक अजीब सा वजन था, लेकिन अब वह वजन उसे डरा नहीं रहा था।
कॉलेज के लिए निकलते समय राधा गली में मिली। उसने अमन का चेहरा देखा और पूछा, “कल से चेहरा उतरा हुआ था। आज ठीक लग रहे हो।”
अमन ने हल्की मुस्कान दी। “हाँ… अब ठीक हूँ।”
राधा ने उसके हाथ को हल्के से छुआ। “अगर कुछ हो तो बताना।”
अमन ने सिर हिलाया। “बताऊँगा।” दोनों साथ-साथ कॉलेज की तरफ चल दिए। बातें सामान्य थीं—पढ़ाई, मेले की याद, आने वाले दिनों की छोटी-छोटी बातें। अमन के अंदर फिर से वह हल्की सी गर्माहट लौट आई जो राधा के पास होती थी।
कॉलेज में राजिया की निगाहें फिर से उस पर पड़ीं। अमन ने इस बार सामान्य व्यवहार रखा। न ज्यादा देखा, न नजरें बचाईं। बस अपना काम करता रहा।
शाम को घर लौटा तो आँगन में कमला चाची और कविता दोनों थीं। कमला चाची ने उसे देखा तो आँखों में वही पुरानी चमक थी, लेकिन अमन ने इस बार सिर्फ नमस्ते कहा और अंदर चला गया। कविता ने पीछे से आवाज दी, “आज जल्दी आ गए?”
अमन ने मुड़कर मुस्कुराते हुए कहा, “हाँ दीदी। थकान हो रही थी।”
रात के खाने के बाद रेणु आई। लालटेन लेकर। दरवाजा बंद करके बिस्तर के किनारे बैठ गई। उसने अमन का चेहरा देखा और समझ गई कि वह अब पहले से बेहतर है।
“अब कैसा लग रहा है?” उसने पूछा।
अमन ने ईमानदारी से जवाब दिया, “अब समझ में आ रहा है दीदी। जो भी हुआ… घर की भलाई के लिए ही हुआ होगा। आपने जो कहा, वह सही ही होगा। आप हमेशा सोच-समझकर बोलती हैं।”
रेणु ने उसके बालों में हाथ फेरा। आँखों में हल्की राहत थी। “अच्छा किया जो समझ गए। अब आगे बढ़ो। अपनी जिंदगी जीयो। राधा के साथ जो बन रहा है, उसे संभालो। बाकी चीजें समय के साथ अपने आप सुलझती जाएँगी।”
अमन ने सिर हिलाया। रेणु ने उसके माथे पर हल्का चुंबन किया और बोली, “सो जाओ। कल से फिर अपनी सामान्य दिनचर्या शुरू करो।”
रेणु चली गई।
अमन बिस्तर पर लेट गया। आँखें बंद कीं। इस बार माँ और बाबा वाला दृश्य आया तो वह पहले की तरह नहीं काँपा। बल्कि एक अजीब सी समझ के साथ स्वीकार कर लिया। घर के राज़ गहरे थे। लेकिन अब वह जानता था कि हर राज़ के पीछे कोई न कोई मजबूरी और कोई न कोई प्रेम छुपा होता है।
वह धीरे-धीरे अपनी पुरानी दिनचर्या में लौट आया था।
नींद आसानी से आ गई।

 सुबह अमन अपनी सामान्य दिनचर्या में लौट चुका था।
रात को अच्छी नींद आई थी। सुबह उठकर उसने हाथ-मुँह धोया, चाय पी और कॉलेज के लिए तैयार होने लगा। माँ ने जैसे रोज़ होती है वैसे ही रोटी दी। बाबा आँगन में धूप सेक रहे थे। सब कुछ सामान्य लग रहा था। अमन के अंदर अब वह तेज उथल-पुथल नहीं थी। एक शांत समझ बस गई थी—घर के राज़ गहरे हैं, लेकिन वे घर को बचाने के लिए ही हैं।
कॉलेज से लौटने के बाद वह आँगन में बैठा था कि तभी गली की तरफ से आवाजें आईं। ठेले की घंटी और कई लोगों के बोलने की आवाज। अमन ने सिर उठाया।
एक ठेला आँगन के बाहर रुका। उस पर सामान लदा हुआ था। और ठेले के पीछे से एक परिचित आवाज आई—
“अरे अमन! कहाँ हो बेटा?”
अमन की आँखें चौड़ी हो गईं। वह तुरंत उठा और बाहर की तरफ भागा।
सरला चाची थीं।
रामेश चाचा की पत्नी। कई महीनों बाद घर लौटी थीं। वे अपने मायके गई हुई थीं। अब वापस आई थीं। साड़ी पहने, माथे पर हल्की बिंदी, चेहरे पर थकान और खुशी दोनों साफ दिख रहे थे। अमन को देखते ही उनके चेहरे पर बड़ी मुस्कान फैल गई।
“अरे मेरे राजू!” उन्होंने अमन को देखते ही दोनों हाथ फैला दिए।
अमन की आँखों में खुशी आ गई। वह दौड़कर उनके पास गया और उनके पैर छूए। सरला चाची ने उसे उठाकर अपने से सटा लिया। अमन को उनकी बाँहों में वही पुरानी गर्माहट महसूस हुई जो बचपन से महसूस होती आई थी। सरला चाची उसे हमेशा अपने बच्चे की तरह मानती थीं। खून का रिश्ता नहीं था, लेकिन दिल का रिश्ता गहरा था।
“कितना बड़ा हो गया तू!” सरला चाची ने उसके बाल सहलाते हुए कहा। आवाज में हल्की सिहरन थी। “मैं गई थी तब तू इतना नहीं था। अब तो पूरा जवान लग रहा है।”
अमन मुस्कुराया। “आप कब आईं चाची? बताती तो मैं स्टेशन ले आता।”
सरला चाची ने उसके गाल पर हल्का थप्पड़ जैसा स्पर्श किया। “अरे बाबा! इतनी फॉर्मैलिटी की क्या जरूरत। अपना घर है। चुपके से आ गई।”
माँ सुशीला भी आँगन में आ गईं। दोनों बहुएँ गले मिलीं। कमला चाची भी निकल आईं। घर में अचानक हलचल मच गई। सामान उतरने लगा। बच्चे इधर-उधर दौड़ने लगे। अमन सरला चाची के सामान में से भारी बैग उठाकर अंदर ले गया।
सरला चाची ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, “तू हमेशा से मेरा हाथ बंटाता आया है। आज भी वैसा ही है।”
अमन ने मुस्कुराकर जवाब दिया, “आपके लिए तो हमेशा तैयार रहता हूँ चाची।”
शाम होते-होते घर में फिर से वह पुरानी रौनक आ गई जो सरला चाची के जाने के बाद कम हो गई थी। रसोई में तीनों बहुओं की हँसी-मजाक की आवाजें आ रही थीं। बाबा आँगन में बैठे सबको देख रहे थे। पिताजी भी खेत से लौटकर आए और सरला चाची से हाल-चाल पूछने लगे।
अमन अपने कमरे में सामान रखने के बाद बाहर आया तो सरला चाची ने उसे बुलाया।
“इधर आ। बैठ।”
अमन उनके पास बैठ गया। सरला चाची ने उसके बाल ठीक करते हुए कहा, “तेरा चेहरा देखकर लग रहा है तू बहुत कुछ सोचने लगा है इन दिनों। पहले इतना गंभीर नहीं था।”
अमन ने हल्की मुस्कान दी। “अब थोड़ा समझदार हो गया हूँ चाची।”
सरला चाची ने उसकी आँखों में देखा। उनकी निगाह में माँ जैसी चिंता और प्यार दोनों थे। “समझदार होना अच्छी बात है। लेकिन ज्यादा बोझ मत ले लिया कर। तू अभी भी मेरा बच्चा है।”
अमन ने उनका हाथ पकड़ लिया। “मैं हमेशा आपका बच्चा ही रहूँगा चाची।”
सरला चाची मुस्कुरा दीं। उनकी आँखें थोड़ी गीली हो गई थीं। उन्होंने अमन के माथे पर हाथ रखा और बोलीं, “अच्छा। जा, हाथ-मुँह धो ले। आज तेरे लिए खास मिठाई बनाऊँगी।”
अमन उठकर चला गया। मन हल्का लग रहा था। घर में एक पुराना खालीपन भर गया था। सरला चाची की वापसी के साथ वह गर्माहट लौट आई थी जो उसे हमेशा सुकून देती थी।
रात के खाने में सब साथ बैठे। हँसी-मजाक चल रहा था। अमन बीच-बीच में सरला चाची की तरफ देख लेता। हर बार वे मुस्कुरा देतीं।
रात को जब रेणु आई तो अमन ने उसे बताया, “सरला चाची आ गईं दीदी। बहुत दिन बाद।”
रेणु ने मुस्कुराकर कहा, “अच्छा हुआ। घर में फिर से रौनक आ गई होगी। वे तुझे बहुत चाहती हैं।”
अमन ने सिर हिलाया। “हाँ। उन्हें देखकर अच्छा लगा।”
रेणु ने उसके बालों में हाथ फेरा। “अब घर फिर से पूरा लग रहा होगा तुझे।”
अमन चुप रहा। हाँ, घर फिर से थोड़ा पूरा लग रहा था।


सरला चाची के आने के अगले दिन घर में सामान्य हलचल थी।
सुबह से ही रसोई में उनकी हँसी की आवाज आ रही थी। वे माँ और कमला चाची के साथ मिलकर काम कर रही थीं। अमन कॉलेज जाने से पहले उनके पैर छूकर निकला। सरला चाची ने उसके सिर पर हाथ रखा और बोलीं, “ध्यान से जाना बेटा।” वही पुरानी गर्माहट थी। अमन के चेहरे पर मुस्कान रह गई।
दिन सामान्य बीता। कॉलेज में राधा से हल्की बात हुई। राजिया की निगाहें फिर से मिलीं, लेकिन अमन ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। शाम को घर लौटा तो सरला चाची आँगन में बैठी कपड़े सुखा रही थीं। अमन उनके पास गया।
“चाची, थक तो नहीं गईं इतनी दूर से आकर?”
सरला चाची ने मुस्कुराते हुए कहा, “तेरे घर आकर थकान कहाँ रहती है। तू है न यहाँ।” उन्होंने अमन के बालों में उंगलियाँ फेर दीं। अमन उनके पास बैठ गया। दोनों ने थोड़ी देर सामान्य बातें कीं—मायके का हाल, वहाँ के खेत, रिश्तेदार। सरला चाची बीच-बीच में अमन को देखकर मुस्कुरा देतीं। उनकी आँखों में एक पुरानी ममता थी।
रात के खाने के बाद सब अपने-अपने कमरों में चले गए। अमन अपने कमरे में लेटा हुआ सोच रहा था कि तभी दरवाजे पर दस्तक हुई। रेणु थी। लालटेन लेकर अंदर आई। दरवाजा बंद करके बिस्तर के किनारे बैठ गई।
“सरला चाची आ गईं,” अमन ने पहले ही बता दिया। “घर फिर से वैसा लगने लगा है जैसे पहले लगता था।”
रेणु ने सिर हिलाया। कुछ पल चुप रही। फिर धीमे स्वर में बोली,
“अमन… सरला चाची के बारे में तुम बहुत कम जानते हो।”
अमन ने सिर उठाया। रेणु के चेहरे पर वह गंभीर भाव था जो वह बड़े राज़ बताते समय लाती थी।
“क्या मतलब दीदी?”
रेणु ने लालटेन की लौ की तरफ देखा। फिर बोली,
“सरला चाची जब इस घर में आई थीं तब उनकी उम्र तुमसे भी कम थी। रामेश चाचा से शादी के बाद वे बहुत खुश थीं। लेकिन कुछ साल बाद… एक बात हुई।”
अमन चुपचाप सुन रहा था।
“रामेश चाचा… वे कभी-कभी बहुत बदल जाते हैं। गुस्से में या नशे में वे सरला चाची के साथ कठोर हो जाते थे। मारपीट तक हो जाती थी। एक बार तो हालत इतनी खराब हो गई थी कि सरला चाची अपने मायके भाग गई थीं। तब तुम छोटे थे। तुम्हें याद नहीं होगा।”
अमन की आँखें थोड़ी चौड़ी हो गईं। उसने कभी सरला चाची के चेहरे पर ऐसा कुछ नहीं देखा था।
रेणु ने आगे कहा, “बाबा और पिताजी ने बीच-बचाव किया। रामेश चाचा ने माफी माँगी। सरला चाची वापस आ गईं। लेकिन उस दिन के बाद… रामेश चाचा ने एक अजीब सा मौन अपना लिया। वे घर में रहते हैं, काम करते हैं, लेकिन सरला चाची के साथ अब बहुत कम बोलते हैं। जैसे कोई दीवार खड़ी हो गई हो दोनों के बीच।”
अमन ने धीमे स्वर में पूछा, “तो चाची… वे खुश हैं?”
रेणु ने गहरी साँस ली। “वे इस घर से जुड़ गई हैं। तुमसे, मुझसे, माँ से… सब से। वे तुम्हें अपने बच्चे की तरह चाहती हैं क्योंकि उनका अपना कोई संतान नहीं हो सकी। रामेश चाचा का मौन उनका दर्द है, लेकिन वे उसे चुपचाप सहती हैं। बाहर से वे हमेशा मुस्कुराती रहती हैं।”
अमन चुप रहा। दिमाग में सरला चाची की आज की मुस्कान घूम गई—वह मुस्कान जिसमें ममता थी, लेकिन उसके पीछे एक पुराना अकेलापन भी छुपा हो सकता था।
रेणु ने उसका हाथ पकड़ा। “मैंने तुम्हें इसलिए बताया क्योंकि तुम उन्हें बहुत चाहते हो। लेकिन इस बात को और फैलाने की जरूरत नहीं। सरला चाची ने जो चुप रहना चुना है, हमें भी उसी का सम्मान करना चाहिए।”
अमन ने सिर हिलाया। “मैं कुछ नहीं कहूँगा दीदी।”
रेणु ने उसके माथे पर हल्का हाथ फेरा। “अच्छा। अब सो जाओ। कल फिर से सामान्य दिन होगा।”
रेणु चली गई।
अमन अकेला रह गया। छत की तरफ देखता रहा। सरला चाची का चेहरा आँखों के सामने था—आज वाली मुस्कान, बचपन वाली गर्माहट, और अब रेणु द्वारा बताया गया वह छुपा दर्द। रामेश चाचा का मौन… घर के एक और राज़ की तरह।
वह समझ गया था कि इस घर में हर व्यक्ति के चेहरे के पीछे कोई न कोई अधूरी कहानी छुपी हुई है।
नींद धीरे-धीरे आई।


मंगलवार की सुबह अभी पूरी तरह रोशनी नहीं फैली थी। आज छुट्टी थी।
अमन गहरी नींद में सोया हुआ था। कमरे में हल्की ठंडक फैली हुई थी। खिड़की से बाहर मुर्गे की आवाज दूर से आ रही थी। तभी दरवाजा बहुत धीरे से खुला। कमला चाची अंदर आईं। उन्होंने दरवाजा बंद किया लेकिन सिटकिनी नहीं लगाई। उनके कदम फर्श पर कोई आवाज नहीं कर रहे थे।
वे बिस्तर के पास आकर रुकीं। अमन की साँसें नियमित थीं। चादर कमर तक खिसकी हुई थी। कमला ने झुककर उसके माथे पर बहुत हल्का सा चुंबन किया। फिर गाल पर। अमन की पलकें फड़कीं। आँखें धीरे-धीरे खुलीं।
कमला चाची उसके बहुत करीब थीं। उनके बाल उसके माथे से छू रहे थे। साड़ी का पल्लू आगे की तरफ झुका हुआ था। अमन नींद भरी आँखों से उन्हें देखता रहा।
“चाची…” उसने धीमी आवाज में कहा, “अगर आप रोज़ ऐसे उठाओगी… तो मैं कभी जागूँगा ही नहीं।”
कमला चाची हल्की मुस्कुराईं। उन्होंने उसके बालों में उंगलियाँ फेरते हुए कहा, “हत बदमश कहीं का!” आवाज में गुस्सा नहीं था। बल्कि एक हल्की, जाने-पहचाने वाली शरारत थी। फिर उनका चेहरा थोड़ा गंभीर हो गया।
“अब तू ठीक है न?” उन्होंने धीमे स्वर में पूछा। “थोड़े दिनों से परेशान लग रहा था तू। इसलिए मैंने तुझे तंग नहीं किया। सोचा सही समय आने दूँ।”
अमन ने उनकी आँखों में देखा। सुबह की धुँधली रोशनी में कमला चाची का चेहरा और भी आकर्षक लग रहा था। उसने अचानक दोनों हाथों से उनकी कमर पकड़ ली और उन्हें अपनी गोद में खींच लिया। कमला चाची हल्की सी सिसकारी के साथ अमन की गोद में आ बैठीं। साड़ी का पल्लू एक तरफ खिसक गया। उनकी भारी जाँघें अमन की जाँघों पर थीं।
अमन ने उनकी कमर में हाथ फेरते हुए कहा, “चाची, मैं तो फर्स्ट क्लास हूँ। अब पूरी तरह ठीक हूँ।”
फिर उसने दोनों हाथ आगे बढ़ाकर कमला चाची के भारी स्तनों को साड़ी के ऊपर से ही दबा दिया। जोर से नहीं, लेकिन साफ और साहस भरे अंदाज में। उंगलियाँ उनकी गोलाई को महसूस कर रही थीं। कमला चाची की लंबी सिसकारी निकल गई। उनके शरीर में एक झटका सा चला। वे अमन के ऊपर से हटने के बजाय एक पल के लिए और सट गईं।
“बदmash…!” उन्होंने फुसफुसाकर कहा। आवाज काँप रही थी। “इतनी सुबह…”
अमन ने उनके स्तनों को हल्के से और दबाया। “सुबह ही तो मजा है चाची।”
कमला चाची ने उसके हाथ पकड़कर हटा दिए। वे गोद से उतरकर खड़ी हो गईं। साँसें तेज थीं। पल्लू उन्होंने जल्दी से संभाल लिया। गाल हल्के लाल हो गए थे।
“बाद में आती हूँ,” उन्होंने धीमी आवाज में कहा। “आज थोड़ा काम है। चल, तू भी उठ जा। आज छुट्टी है तो दिन बर्बाद मत करना।”
अमन बिस्तर पर बैठा मुस्कुरा रहा था। “जैसा आप कहें चाची।”
कमला चाची ने उसकी तरफ एक लंबी, चमकदार निगाह डाली। आँखों में अभी भी वह भूख बाकी थी। फिर वे दरवाजे की तरफ मुड़ीं और निकल गईं। दरवाजा हल्के से बंद हुआ।
अमन लेटा रहा। हाथों में अभी भी उनके स्तनों की गर्माहट और वजन बाकी था। मन में एक अजीब सा उत्साह तैर रहा था। कमला चाची अब सिर्फ रात के इशारों तक सीमित नहीं रह गई थीं। वे सुबह भी साफ खेल खेल रही थीं।
वह उठकर बैठ गया। आज छुट्टी थी। दिमाग में एक ख्याल आया—खेत। रुक्साना। आम।
वह मुस्कुराया।

अमन ने नहा-धोकर काले रंग की सादी कमीज और पैंट पहन ली। आज छुट्टी थी। मन में एक ही ख्याल घूम रहा था—खेत और रुक्साना।
वह घर से निकला। सुबह की धूप अभी नरम थी। खेतों के बीच वाली पगडंडी पर चलते हुए हवा में मिट्टी और पत्तों की खुशबू आ रही थी। थोड़ी दूर जाकर उसने रुक्साना को देखा।
रुक्साना एक मेड़ पर खड़ी थीं। आज उन्होंने काला सलवार-सूट पहना था। सूट काफी टाइट था। 34D के भारी स्तन सूट के ऊपर से साफ उभर रहे थे। पतली कमर और फिर गोल, गदराई हुई गाँड सूट में कसकर पैक थी। काले रंग में उनका गोरा बदन और भी निखर रहा था। बाल खुले हुए थे और हवा में हल्के-हल्के उड़ रहे थे।
अमन के मन में तुरंत ख्याल आया—“क्या मस्त फिगर है… मन कर रहा है अभी पटक के चोद दूँ।” लेकिन तुरंत ही रेणु दीदी की आवाज याद आ गई—“सब्र का फल मीठा होता है।” उसने गहरी साँस ली और अपनी इच्छा को काबू में रखा।
रुक्साना ने उसे आता देखकर मुस्कुरा दिया।
“अरे बाबूजी के बेटे! आज छुट्टी है क्या? इतनी सुबह यहाँ?”
अमन पास जाकर बोला, “हाँ काकी। घूमने निकला था। सोचा आपसे मिल लूँ। आम तो अब पूरी तरह पक गए होंगे?”
रुक्साना ने उसकी तरफ देखा। आँखों में हल्की शरारत थी। “हाँ… बगीचे में अंदर अच्छे-अच्छे पके आम लटके हैं। तोड़ने लायक।”
अमन ने मुस्कुराते हुए कहा, “तो फिर चलिए काकी। आप मुझे अपने पके आम दिखा दो।”
रुक्साना हल्की हँसी। “चलो। लेकिन पेड़ पर चढ़ना पड़ेगा।”
दोनों बगीचे के अंदर की तरफ चल दिए। पेड़ों की घनी छाँव थी। चारों तरफ पके आमों की खुशबू फैली हुई थी। रुक्साना आगे-आगे चल रही थीं। उनका टाइट सूट पीछे से उनकी गाँड की गोलाई को और उभार रहा था। अमन की निगाह बार-बार वहीं चली जा रही थी।
एक बड़े पेड़ के नीचे पहुँचकर रुक्साना रुकीं। “यह वाला पेड़ अच्छा है। ऊपर जाकर तोड़ो।”
अमन पेड़ पर चढ़ गया। आम तोड़ने के बहाने वह ऊपर से नीचे नज़र रख रहा था। थोड़ी देर बाद उसने देखा कि नीचे कोई नहीं है। चारों तरफ सन्नाटा था। बस पत्तों की हल्की सरसराहट। वह धीरे से पेड़ से उतर आया।
रुक्साना थोड़ी दूर चली गई थीं। अमन ने उनकी दिशा में कदम बढ़ाए। झाड़ियों के बीच से उसने देखा—रुक्साना कुछ कदम आगे एक पेड़ के पीछे मुँह किए खड़ी थीं। सलवार नीचे की हुई थी। उनकी सफेद, संगमरमर जैसी चिकनी गाँड पूरी तरह नंगी थी। वे मूत रही थीं। पानी की धार नीचे गिर रही थी।
अमन की साँसें तेज हो गईं। वह चुपचाप खड़ा उन्हें देखने लगा।
रुक्साना को अंदाजा हो गया था कि पीछे कोई है। उन्होंने सिर तो नहीं घुमाया, लेकिन जानबूझकर अपना समय लंबा खींच लिया। गाँड को थोड़ा और ऊपर उठाया। कमर को हल्का सा मोड़ा। मूतने का सिलसिला जानबूझकर धीमा रखा। अमन की निगाहें उनकी गोरी, गोल गाँड पर जमी हुई थीं। बीच की दरार साफ दिख रही थी।
जब धार खत्म हुई तो रुक्साना ने धीरे-धीरे सलवार ऊपर की। उन्होंने पीछे मुड़कर देखा। अमन जल्दी से पेड़ की तरफ भागकर अपनी जगह पर जा खड़ा हुआ। जैसे वह अभी-अभी उतरे हों।
रुक्साना वापस आईं। चेहरे पर हल्की सी मुस्कान थी। आँखों में शरारत साफ झलक रही थी।
“आम तोड़े या सिर्फ पेड़ देख रहे थे?” उन्होंने पूछा।
अमन ने सामान्य स्वर में जवाब दिया, “तोड़े हैं काकी। लेकिन आपके बगीचे के आम… सच में बहुत पके हुए लग रहे हैं।”
रुक्साना ने उसकी तरफ देखा। “पके आम देखकर सबका मन ललचाता है। लेकिन तोड़ने से पहले पेड़ की इजाजत भी लेनी पड़ती है।”
अमन ने हल्की मुस्कान दी। “इजाजत मिल जाएगी काकी… जब समय आएगा।”
दोनों की निगाहें एक पल के लिए मिलीं। फिर रुक्साना ने पल्लू ठीक किया और बोलीं, “चलो, अब घर चलो। ज्यादा देर हो गई।”
अमन ने सिर हिलाया। दोनों बगीचे से बाहर निकले। रास्ते में बातें हल्की रहीं, लेकिन हवा में एक अजीब सी गर्माहट तैर रही थी। अमन के दिमाग में रुक्साना की नंगी गाँड बार-बार घूम रही थी—सफेद, चिकनी, और जानबूझकर उठाई हुई।
घर पहुँचते-पहुँचते उसका मन बेचैन हो चुका था। लेकिन रेणु दीदी की बात याद करके उसने खुद को काबू में रखा। सब्र का फल मीठा होता है।
Fuckuguy
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#42
रात के खाने के बाद घर धीरे-धीरे शांत हो गया।
अमन अपने कमरे में लेटा हुआ था। दिन भर की बातें दिमाग में घूम रही थीं—सुबह कमला चाची का गोद में बैठना और स्तन दबाना, फिर खेत में रुक्साना का टाइट काला सूट, बगीचे के अंदर उसकी नंगी सफेद गाँड, और वह जानबूझकर उठाया हुआ अंदाज। शरीर में एक बेचैनी थी।
बारह बजने से थोड़ा पहले दरवाजे पर हल्की दस्तक हुई। रेणु अंदर आईं। लालटेन लेकर। उन्होंने दरवाजा बंद किया, सिटकिनी लगाई और बिस्तर के किनारे बैठ गईं।
अमन उठकर बैठ गया।
“दीदी,” उसने सीधे पूछा, “मुझे आपके साथ पूरी रात बिताने का मौका कब मिलेगा?”
रेणु की आँखों में हल्की मुस्कान तैर गई। उन्होंने अमन का हाथ पकड़ लिया।
“बहुत जल्दी,” उन्होंने धीमे स्वर में कहा। “सब्र का फल मीठा होता है।”
अमन उनके करीब खिसक गया। रेणु ने उसका चेहरा दोनों हाथों में लिया और गहराई से चूम लिया। चुंबन इस बार पहले से लंबा और गहरा था। जीभ एक-दूसरे के मुँह में घूम रही थी। अमन के हाथ रेणु की कमर पर चले गए। उसने उन्हें और करीब खींच लिया।
रेणु ने अमन की पैंट का नाड़ा खोला। लंड बाहर निकल आया—सख्त और गर्म। रेणु ने उसे हाथ में लिया और धीरे-धीरे सहलाने लगीं। फिर झुककर लंड को मुँह में ले लिया। पहले सिर्फ सिर चूसा, जीभ घुमाई, फिर धीरे-धीरे और गहराई तक ले गईं। गले तक। अमन की उंगलियाँ उनके बालों में फँस गईं।
“दीदी…” अमन की आवाज काँप रही थी।
रेणु ने जवाब में और जोर से चूसा। कभी पूरा लंड मुँह में ले लेतीं, कभी निकालकर सिर्फ सिर को चाटतीं। उनकी जीभ नसों पर घूम रही थी। अमन की साँसें तेज हो गईं। कमर अपने आप हिलने लगी।
थोड़ी देर बाद रेणु ने लंड मुँह से निकाला। लार से चमक रहा था। उन्होंने खुद सलवार नीचे सरका दी और बिस्तर पर लेट गईं। पैर फैला दिए।
“अब तुम करो,” उन्होंने फुसफुसाकर कहा।
अमन उनके पैरों के बीच झुक गया। उसने पहले नाक से उनकी चूत की खुशबू ली। फिर जीभ निकालकर नीचे से ऊपर तक चाटा। रेणु की कमर हिल गई। अमन ने बीच वाली घुंडी को मुँह में लिया और हल्के-हल्के चूसने लगा। कभी जीभ अंदर डालता, कभी बाहर निकालकर चाटता।
रेणु की सिसकारियाँ दबी हुई निकल रही थीं। उनके हाथ अमन के बालों में कस गए।
“हाँ… वहीं… जीभ अंदर… और तेज…”
अमन ने वैसा ही किया। जीभ तेजी से अंदर-बाहर होने लगी। साथ में ऊपर वाली जगह को भी अंगूठे से सहलाता रहा। रेणु का शरीर काँपने लगा। जाँघें अमन के सिर को जकड़ रही थीं। थोड़ी देर में उनका शरीर अकड़ गया। पानी अमन के मुँह और ठुड्डी पर छूट गया। रेणु लंबी सिसकारी के साथ काँपती रहीं।
अमन ऊपर आया। रेणु ने उसे अपनी तरफ खींच लिया और उसके होंठ चूमने लगीं—अपना ही स्वाद लेते हुए। दोनों कुछ देर तक एक-दूसरे से चिपके रहे। साँसें तेज चल रही थीं।
रेणु ने अमन के माथे पर चुंबन करते हुए फिर कहा,
“सब्र का फल मीठा होता है अमन। बहुत जल्दी… पूरी रात बिताने का मौका मिलेगा। तब तुम जो चाहोगे, कर सकोगे।”
अमन ने उनकी आँखों में देखा। “मैं इंतजार करूँगा दीदी।”
रेणु मुस्कुराईं। उन्होंने अमन के बाल सहलाए। “आज दिन कैसा रहा? कुछ खास हुआ?”
अमन ने सुबह कमला चाची वाली बात संक्षेप में बता दी। रुक्साना वाले बगीचे और मूतने वाले दृश्य को उसने थोड़ा छुपाते हुए सिर्फ इतना कहा कि खेत में रुक्साना मिली थीं और आम तोड़े। रेणु ने गंभीर होकर सुना लेकिन ज्यादा नहीं पूछा।
“कमला चाची अब दिन में भी खेलने लगी हैं,” रेणु ने कहा। “संभाल के रहना। और बाहर की औरतों के साथ जल्दबाजी मत करना।”
अमन ने सिर हिलाया।
रेणु ने कपड़े ठीक किए और उठ खड़ी हुईं। लालटेन उठाई। दरवाजे तक जाकर बोलीं,
“सो जाओ। कल फिर मिलेंगे।”
वह चली गईं।
अमन अकेला रह गया। होंठों पर रेणु का स्वाद था। दिमाग में कमला चाची के स्तन, रुक्साना की सफेद गाँड और रेणु का वादा—सब एक साथ तैर रहे थे।
“बहुत जल्दी…” उसने अपने आप से दोहराया।
नींद धीरे-धीरे आई।


बुधवार की सुबह अमन कॉलेज पहुँचा।
दिन सामान्य लग रहा था। कक्षा में राधा अपनी जगह पर बैठी थी। अमन के जाते ही उसने मुस्कुरा दिया। दोनों की निगाहें मिलीं। ब्रेक में अमन ने राधा को पीछे वाले शांत कोने में बुलाया।
“कल छुट्टी नहीं है… लेकिन हम कॉलेज आकर भी नहीं आ सकते,” अमन ने धीमे स्वर में कहा।
राधा ने उसकी तरफ देखा। “मतलब?”
अमन ने थोड़ा करीब आकर कहा, “कल कॉलेज बंक करके पास के शहर चले जाते हैं। मूवी देखते हैं। पूरा दिन सिर्फ हम दोनों का।”
राधा की आँखें थोड़ी चौड़ी हो गईं। गाल हल्के लाल हो गए। “मूवी…? अकेले?”
अमन ने उसका हाथ पकड़ लिया। “हाँ। कोई नहीं जानेगा। सुबह कॉलेज की तरफ निकलेंगे, लेकिन बस पकड़कर शहर चले जाएँगे। शाम तक वापस आ जाएँगे।”
राधा कुछ पल चुप रही। फिर धीरे से मुस्कुराई। “ठीक है… चलते हैं।”
दोनों की आँखों में उत्साह था। वे और थोड़ी देर खड़े बातें करते रहे—कौन सी मूवी देखेंगे, कहाँ बैठेंगे, कैसे समय निकालेंगे। राधा बीच-बीच में शर्मा रही थी, लेकिन उसकी आँखों में खुशी साफ झलक रही थी।
वे दोनों इतने में व्यस्त थे कि उन्हें पता ही नहीं चला कि थोड़ी दूर, दीवार के पीछे कोई खड़ा उनकी सारी बातें सुन रहा था।
वह व्यक्ति राजिया का भाई था।
वह काफी दिनों से राधा को पसंद करता था। चुपके-चुपके देखा करता था। लेकिन आज जब उसने अमन और राधा की योजना सुनी—कॉलेज बंक करके शहर जाकर मूवी देखने की—तो उसके चेहरे पर गुस्सा तैर आया। आँखें त हो गईं। उसने मुट्ठी भींच ली।
“साला… मेरी राधा को लेकर घूमेगा?” उसने दबी आवाज में कहा। “मैं इसे छोड़ूँगा नहीं।”
उसके दिमाग में तुरंत एक खतरनाक ख्याल आया। वह अमन को सबक सिखाने का प्लान बनाने लगा।
कॉलेज खत्म होने के बाद अमन और राधा ने एक-दूसरे को नजरों से इशारा किया। कल का प्लान पक्का हो चुका था। अमन घर की तरफ निकला। दिल में हल्की सी बेचैनी और उत्साह दोनों थे।
घर पहुँचकर उसने जल्दी से हाथ-मुँह धोया। खाना खाया। सरला चाची ने उसके लिए मिठाई निकाली। कमला चाची ने दूर से ही एक लंबी निगाह डाली, लेकिन अमन ने इस बार ज्यादा देर नहीं ठहरी।
रात को खाना खाकर वह जल्दी अपने कमरे में चला गया। आज कोई खास बात नहीं हुई घर में। मन कल की मूवी और राधा के साथ बिताए जाने वाले समय में उलझा हुआ था।
रेणु भी नहीं आईं। शायद व्यस्त थीं।
अमन ने लाइट बुझा दी और बिस्तर पर लेट गया। आँखें बंद करते ही राधा का चेहरा आँखों के सामने आ गया—मुस्कान, शर्माना, और कल का वादा।
वह मुस्कुराया और जल्दी सो गया।
घर शांत था। लेकिन कहीं बाहर, राजिया के भाई के मन में एक काला प्लान पक रहा था।
[img=464x1400][Image: ff4f46ca9acd5e7fc27ce25243afe8ca.jpg][/img]

गुरुवार की सुबह अमन कॉलेज बैग लेकर निकला, लेकिन उसका मन कॉलेज में नहीं था।
गली के मोड़ पर राधा पहले से खड़ी थी। हल्के गुलाबी रंग का सलवार-सूट पहना था। बालों में दो छोटी लटें थीं। चेहरे पर हल्की सिंदूरी चमक और आँखों में उत्साह साफ दिख रहा था। अमन को देखते ही वह मुस्कुरा दी।
“तैयार हो?” अमन ने धीमे स्वर में पूछा।
राधा ने सिर हिलाया। “हाँ… चलो।”
दोनों कॉलेज की तरफ थोड़ा चलकर फिर दूसरी गली से निकल गए। बस स्टैंड पर जाकर पास के शहर जाने वाली बस पकड़ी। खिड़की वाली सीट पर बैठे। रास्ता लगभग एक घंटे का था। दोनों ज्यादा नहीं बोले, लेकिन कभी-कभी उनकी निगाहें मिल जातीं और दोनों मुस्कुरा देते। राधा का हाथ बीच-बीच में अमन के हाथ के करीब आ जाता। अमन ने धीरे से उसका हाथ पकड़ लिया। राधा ने छुड़ाया नहीं।
शहर पहुँचकर दोनों बस से उतरे। सिनेमा हॉल पास ही था। अमन ने दो टिकट लिए—सबसे आखिरी कतार के कोने वाले सीट की। हॉल में अंदर घुसते समय राधा की साँसें थोड़ी तेज हो गई थीं। अमन ने उसका हाथ फिर से पकड़ लिया।
मूवी शुरू होने में थोड़ी देर थी। हॉल में अँधेरा गहरा था। आखिरी कतार के कोने में दोनों बैठ गए। आसपास बहुत कम लोग थे। पीछे दीवार थी। कोई उन्हें आसानी से नहीं देख सकता था।
लाइट्स बुझ गईं। स्क्रीन पर ट्रेलर चलने लगे। अमन ने धीरे से राधा की तरफ देखा। राधा भी उसकी तरफ देख रही थी। दोनों की आँखें अँधेरे में मिलीं। अमन ने अपना हाथ बढ़ाकर राधा का हाथ पकड़ लिया। उंगलियाँ एक-दूसरे में फँस गईं।
थोड़ी देर बाद अमन ने और हिम्मत करके अपना हाथ राधा की जाँघ पर रख दिया। सलवार के ऊपर से। राधा सहम गई। उसने अमन की तरफ देखा, लेकिन कुछ नहीं बोली। अमन का हाथ धीरे-धीरे ऊपर सरकने लगा। जाँघ के अंदरूनी हिस्से तक। राधा की साँसें तेज हो गईं। उसने अमन का हाथ पकड़ लिया, लेकिन हटाया नहीं। बस पकड़े रखा।
मूवी शुरू हो गई। रोमांटिक गाने वाले सीन आ रहे थे। अमन ने राधा के कान के पास मुँह लाकर बहुत धीमे स्वर में कहा,
“तुम आज बहुत सुंदर लग रही हो… दिल नहीं भर रहा देखने से।”
राधा की आवाज काँप रही थी। “यहाँ… कोई सुन लेगा…”
अमन ने उसके कान की लौ को हल्के से होंठों से छुआ। “कोई नहीं सुन रहा। सिर्फ हम दोनों हैं।”
राधा ने आँखें बंद कर लीं। अमन ने उसका चेहरा अपनी तरफ मोड़ा और धीरे से होंठों पर अपने होंठ रख दिए। चुंबन बहुत नरम था। पहले सिर्फ होंठों का स्पर्श। फिर थोड़ा गहरा। राधा की साँस अमन के मुँह में मिल गई। उसने धीरे-धीरे जवाब देना शुरू कर दिया। अमन की जीभ उसके होंठों पर फिसली। राधा की उंगलियाँ अमन की कमीज में कस गईं।
चुंबन टूटने के बाद दोनों की साँसें तेज चल रही थीं। अमन ने फिर से उसके गाल, ठुड्डी और गर्दन पर हल्के-हल्के चुंबन दिए। राधा की गर्दन में सिहरन दौड़ गई। उसने अमन का सिर पकड़कर अपनी तरफ और खींच लिया।
“अमन…” उसकी आवाज बहुत धीमी और काँपती हुई थी। “मैं… डर रही हूँ…”
अमन ने उसके माथे पर चुंबन करते हुए कहा, “डरो मत। मैं हूँ न। कोई नहीं देख रहा हमें।”
उसने धीरे से अपना हाथ राधा की कमीज के अंदर सरका दिया। बाजू के नीचे से। उंगलियाँ उसके गर्म स्तन तक पहुँच गईं। ब्रा के ऊपर से। राधा की लंबी सिसकारी निकली। उसने अमन का हाथ पकड़ लिया, लेकिन फिर छोड़ दिया। अमन ने धीरे-धीरे स्तन को सहलाना शुरू किया। गोलाई को महसूस किया। निप्पल पर उंगली फेरी। राधा की कमर कुर्सी पर हिलने लगी।
“आह्ह… अमन… धीरे…” उसकी आवाज में डर और मजा दोनों थे।
अमन ने उसके होंठ फिर से चूम लिए। इस बार चुंबन और गहरा था। जीभ एक-दूसरे के मुँह में घूम रही थी। नीचे उसका हाथ लगातार राधा के स्तन को दबा रहा था, सहला रहा था। राधा की साँसें अब पूरी तरह बिखर चुकी थीं। वह अमन के कंधे पर सिर रखकर सिसकारियाँ ले रही थी।
मूवी का गाना चल रहा था। स्क्रीन पर हीरो-हीरोइन रोमांस कर रहे थे। लेकिन आखिरी कतार के कोने में दो और शरीर एक-दूसरे में खो रहे थे।
अमन ने राधा के कान में फुसफुसाया, “तुम्हारा दिल इतनी तेज धड़क रहा है… मुझे भी सुनाई दे रहा है।”
राधा ने जवाब में सिर्फ और करीब सट गई। अमन का हाथ अब ब्रा के अंदर तक पहुँच चुका था। नंगी गर्माहट उसके हाथ में थी। उसने निप्पल को हल्के से मरोड़ा। राधा की सिसकारी दब गई। उसने अमन के होंठों को फिर से पकड़ लिया।
पूरी मूवी के दौरान दोनों बार-बार चूमते रहे। कभी लंबे चुंबन, कभी गर्दन पर, कभी गाल पर। अमन का हाथ कभी स्तन पर रहता, कभी जाँघ के अंदर। राधा कभी उसका हाथ रोकती, कभी खुद और दबा देती। दोनों की दुनिया अब सिर्फ उस अँधेरे कोने तक सिमट चुकी थी।
मूवी का आधा हिस्सा खत्म हो चुका था। लेकिन अमन और राधा के लिए समय रुक सा गया था।

मूवी का दूसरा हाफ शुरू हो चुका था।
हॉल में अँधेरा और गहरा हो गया था। स्क्रीन पर रोमांटिक गाने चल रहे थे। हीरो हीरोइन को गोद में लेकर घूम रहा था। लेकिन आखिरी कतार के कोने में अमन और राधा की दुनिया अब पूरी तरह अलग हो चुकी थी।
अमन का हाथ अभी भी राधा की कमीज के अंदर था। ब्रा के अंदर। उसने उसके नरम, गर्म स्तन को पूरा मुट्ठी में भर रखा था। निप्पल उसकी उंगलियों के बीच में था। वह धीरे-धीरे निप्पल को मरोड़ रहा था, दबा रहा था, गोला बना रहा था। राधा की साँसें अब नियंत्रण में नहीं थीं। हर बार जब अमन निप्पल को कसता, राधा की कमर कुर्सी पर उठ जाती और दबी हुई सिसकारी निकलती।
“आह्ह… अमन… बहुत जोर से… मत…” राधा की आवाज काँप रही थी। लेकिन उसने अमन का हाथ नहीं हटाया। बल्कि अपनी हथेली उसके हाथ के ऊपर रखकर और जोर से दबाने लगी।
अमन ने उसका चेहरा अपनी तरफ मोड़ा। दोनों की साँसें एक-दूसरे के मुँह में मिल रही थीं। उसने राधा के निचले होंठ को दाँतों से हल्के से पकड़ा और खींचा। फिर जीभ से उसके पूरे होंठों को चाटा। राधा पागलों की तरह उसके मुँह से चिपक गई। चुंबन अब नरम नहीं रह गया था। गीला, गहरा और भूखा हो चुका था। दोनों की जीभ एक-दूसरे के मुँह में उलझ रही थीं। लार की हल्की आवाज अँधेरे में भी सुनाई दे रही थी।
अमन ने दूसरा हाथ भी राधा की जाँघ पर रखा। सलवार के ऊपर से अंदर की तरफ सरकाया। जाँघ के बिलकुल अंदरूनी हिस्से तक पहुँच गया। उंगलियाँ गर्म थीं। राधा की जाँघ काँपने लगी। अमन ने और ऊपर सरकाया। अब उसकी उंगलियाँ राधा की चूत के बिलकुल पास थीं—सलवार और पैंटी के ऊपर से।
राधा की आँखें खुली की खुली रह गईं। उसने अमन का हाथ पकड़ लिया।
“नहीं… अमन… यहाँ… मत…” उसकी आवाज में डर और इच्छा दोनों साफ थे।
अमन ने उसके कान में होंठ रखकर फुसफुसाया, “कोई नहीं देख रहा राधा… सिर्फ मैं और तुम… तुम्हारा शरीर कितना काँप रहा है मेरे हाथ में…”
उसने उंगलियों से हल्के से दबाव डाला। राधा की कमर जोर से उठी। एक लंबी, दबी हुई सिसकारी निकल गई। उसने अमन के कंधे में मुँह गड़ा दिया। अमन की उंगलियाँ अब धीरे-धीरे गोला बनाते हुए उसकी चूत को सहला रही थीं। सलवार गीली होने लगी थी।
“अमन… मैं… गीली हो रही हूँ…” राधा की आवाज रोने जैसी हो गई थी। शर्म और मजे से।
अमन ने उसका चेहरा ऊपर उठाया और फिर से चूम लिया। इस बार चुंबन में एक अजीब सी भूख थी। नीचे उसका हाथ लगातार काम कर रहा था। कभी हल्का, कभी थोड़ा जोर से। राधा की जाँघें अपने आप खुलने लगीं। उसने अमन का हाथ और जोर से अपनी तरफ दबा लिया।
अमन ने कमीज के अंदर वाले हाथ से ब्रा का हुक खोलने की कोशिश की। एक हुक खुला। राधा के स्तन और आजाद हो गए। अमन ने पूरा स्तन मुट्ठी में भर लिया। निप्पल को दो उंगलियों के बीच लेकर धीरे-धीरे घुमाने लगा। साथ ही नीचे वाली उंगलियाँ भी रुक नहीं रही थीं।
राधा अब पूरी तरह बिखर चुकी थी। उसका सिर अमन के कंधे पर था। मुँह से सिर्फ सिसकारियाँ और अस्पष्ट आवाजें निकल रही थीं।
“आह्ह… उंह्ह… अमन… मुझे… कुछ हो रहा है…”
अमन ने गति थोड़ी तेज कर दी। ऊपर निप्पल मरोड़ रहा था, नीचे चूत सहला रहा था। राधा की साँसें रुक-रुककर चल रही थीं। अचानक उसका शरीर अकड़ गया। जाँघें जोर से काँपीं। उसने अमन को इतनी जोर से जकड़ लिया कि अमन की साँस भी अटक गई। एक लंबी, काँपती हुई सिसकारी निकलते हुए राधा का पानी सलवार में छूट गया।
वह अमन के सीने से चिपकी हुई काँपती रही। बहुत देर तक।
अमन ने उसका चेहरा ऊपर उठाया। राधा की आँखें नम थीं। गाल लाल थे। होंठ सूजे हुए और खुले हुए। अमन ने उसके माथे, आँखों और होंठों पर बहुत नर्म चुंबन दिए।
“तुम… बहुत प्यारी लग रही हो इस हालत में,” उसने फुसफुसाकर कहा।
राधा ने शर्म से आँखें बंद कर लीं। “मैं… इतनी… यहाँ… क्या कर बैठी…”
अमन ने उसके बालों में हाथ फेरते हुए कहा, “तुमने कुछ नहीं किया। मैंने किया। और मुझे कोई पछतावा नहीं।”
उसने राधा को और करीब खींच लिया। दोनों की धड़कनें अभी भी तेज चल रही थीं। अमन का लंड पैंट में पूरी तरह तना हुआ था, लेकिन उसने आगे बढ़ने की कोशिश नहीं की। सिर्फ राधा को अपने से चिपकाए रखा। उसके बालों में मुँह रखकर साँस लेता रहा।
मूवी का आखिरी गाना चल रहा था। स्क्रीन पर हीरो-हीरोइन गले मिल रहे थे। लेकिन आखिरी कतार के कोने में दो शरीर पसीने और साँसों में नहाए हुए एक-दूसरे से चिपके थे।
राधा ने धीरे से अमन का हाथ पकड़ा। उंगलियाँ अभी भी काँप रही थीं।
“अमन… मैं तुमसे… बहुत प्यार करने लगी हूँ…”
अमन ने उसके हाथ को चूम लिया। “मैं भी राधा… तुमसे बहुत…”
मूवी खत्म होने वाली थी। लाइट्स जलने वाली थीं। दोनों ने जल्दी से कपड़े ठीक किए। राधा ने ब्रा का हुक वापस लगाया। अमन ने उसकी कमीज ठीक की। दोनों की आँखों में अभी भी वह भूख और प्यार बाकी था।
लाइट्स जल गईं। लोग उठने लगे। अमन और राधा भी उठे। हाथ पकड़े हुए। दोनों के चेहरे पर एक अलग ही चमक थी।
हॉल से बाहर निकलते समय राधा ने अमन का हाथ और कसकर पकड़ लिया।
“घर तक छोड़ना…” उसने धीमे स्वर में कहा।
अमन ने सिर हिलाया। दोनों अँधेरी गली से होते हुए बस स्टैंड की तरफ चल दिए। दिल अभी भी जोर से धड़क रहे थे। शरीर अभी भी एक-दूसरे की गर्माहट माँग रहे थे।
लेकिन दोनों को नहीं पता था कि उनके पीछे अँधेरे में कोई और भी चल रहा था। गुस्से और जलन से भरा हुआ।
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albertprince547;
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#43
मूवी खत्म होते ही हॉल की लाइटें जल उठीं।
अमन और राधा दोनों उठे। हाथ अभी भी एक-दूसरे में फँसे हुए थे। राधा के गाल हल्के लाल थे, आँखों में वह शर्मीली चमक बाकी थी जो सिर्फ अमन के लिए थी। दोनों धीरे-धीरे भीड़ के साथ बाहर निकले। शहर की शाम घिर चुकी थी। आसमान में नारंगी रंग के आखिरी निशान बचे थे। सड़क पर गाड़ियों की रोशनी तेज हो रही थी।
अमन ने राधा के कान के पास झुककर बहुत धीमे स्वर में कहा,
“आज का दिन… मैं जिंदगी भर नहीं भूलूँगा।”
राधा ने उसका हाथ और कस लिया। आवाज में हल्की सिहरन थी, “मैं भी नहीं… अमन।”
वे चुपचाप बस स्टैंड की तरफ चलने लगे। गली अपेक्षाकृत सुनसान थी। दोनों के कदम मिलकर चल रहे थे। दिल अभी भी जोर-जोर से धड़क रहे थे—मूवी वाले अँधेरे कोने की यादें अभी ताजा थीं।
तभी पीछे से एक तेज, गुस्से भरी इंजन की आवाज ने हवा को चीर दिया।
अमन ने झटके से पीछे मुड़ा।
एक मोटरसाइकिल पागलों की रफ्तार से उनकी तरफ आ रही थी। हेडलाइट इतनी तेज थी कि आँखें चौंधिया गईं। लेकिन रोशनी के पीछे का चेहरा अमन ने साफ पहचान लिया।
राजिया का भाई।
आँखें तरेरी हुईं। दाँत भींचे हुए। चेहरे पर पागलपन और जलन साफ लिखी थी। वह जानबूझकर अमन को कुचलने वाला था।
समय जैसे थम सा गया।
“राधा!!” अमन ने चीखते हुए राधा को पूरी ताकत से एक तरफ धकेल दिया।
खुद भी आखिरी पल में शरीर को मोड़ते हुए साइड में कूद पड़ा।
मोटरसाइकिल ठीक उसी जगह से गुजरी जहाँ एक सेकंड पहले अमन खड़ा था। हवा के झोंके ने दोनों के बाल उड़ा दिए। राजिया का भाई नियंत्रण पूरी तरह खो बैठा। हैंडल उसके हाथ से छूट गया। मोटरसाइकिल लड़खड़ाई, चीखी, और फिर सीधी सड़क के किनारे वाली गहरी खाई की तरफ उड़ गई।
एक जोरदार, दिल दहला देने वाली आवाज।
फिर… सन्नाटा।
अमन जमीन पर गिरा हुआ था। हाथ-पैर पर खरोंचें आ गई थीं। साँसें तेज चल रही थीं। उसने तुरंत उठकर राधा की तरफ देखा। राधा कुछ कदम दूर दीवार से सटकर खड़ी काँप रही थी। आँखों में आँसू और डर दोनों थे।
दोनों ने एक साथ खाई की तरफ देखा।
नीचे अँधेरा था। मोटरसाइकिल की हेडलाइट टेढ़ी होकर जल रही थी। रोशनी में राजिया के भाई का शरीर अजीब अंदाज में पड़ा दिख रहा था। हिल नहीं रहा था। बिल्कुल नहीं।
दूर से लोगों की आवाजें आने लगीं। किसी ने चिल्लाया, “एक्सीडेंट हो गया!” कोई दौड़ता हुआ आ रहा था। किसी ने फोन निकाला। सिक्युरिटी की सायरन दूर से सुनाई देने लगी।
अमन ने राधा का हाथ पकड़ा। आवाज कठोर और तेज थी,
“चल… अभी यहाँ से जाना है।”
राधा की आवाज टूट रही थी, “अमन… वह… वह तो मर गया न…?”
अमन ने जवाब नहीं दिया। सिर्फ उसका हाथ और कसकर पकड़ लिया और दोनों तेजी से बस स्टैंड की तरफ भागे। एक बस आ ही रही थी। दोनों ने बिना टिकट लिए ही चढ़कर पीछे की सीट पर बैठ गए। बस चल पड़ी।
खिड़की से पीछे देखते रहे। भीड़ जमा हो चुकी थी। रोशनी में लोग खाई के किनारे झुककर देख रहे थे। सिक्युरिटी की गाड़ी पहुँच चुकी थी।
राधा का सिर अमन के कंधे पर टिक गया। उसका पूरा शरीर काँप रहा था। अमन ने उसका हाथ अपने दोनों हाथों में ले लिया। खुद की धड़कन भी अभी तक नहीं थमी थी।
बहुत देर तक दोनों ने कुछ नहीं कहा। बस के अंदर सिर्फ इंजन की आवाज और राधा की काँपती साँसें थीं।
गाँव के स्टॉपेज पर बस रुकी। दोनों उतरे। रात का अँधेरा अब गहरा हो चुका था। गली सुनसान थी।
राधा ने अमन को देखते हुए बहुत धीमी आवाज में कहा,
“अमन… उसने जानबूझकर मारा था न?”
अमन ने उसकी आँखों में देखा। कुछ पल चुप रहा। फिर सिर हिलाया।
“हाँ। जानबूझकर।”
राधा की आँखों से आँसू बह निकले। अमन ने उसके आँसू पोंछे।
“घर जाओ राधा। आज और कुछ मत सोचना। मैं ठीक हूँ।”
राधा ने उसका हाथ नहीं छोड़ा। “तुम… संभाल के रहना। वादा करो।”
अमन ने उसके हाथ को अपने गाल से लगाया। “वादा। अब जाओ।”
राधा ने एक लंबी निगाह और डाली, फिर तेजी से अपने घर की तरफ चल दी। अमन अकेला खड़ा रहा। उसके हाथ अभी भी हल्के काँप रहे थे।
वह घर की तरफ बढ़ा। कदम भारी थे। दिमाग में सिर्फ एक ही बात घूम रही थी—
राजिया का भाई अब नहीं रहा।
लेकिन क्या यह घटना यहीं खत्म हो गई थी?
या यह तो बस शुरुआत थी किसी और बड़े तूफान की…
अमन ने गली के मोड़ पर रुककर पीछे मुड़ा। अँधेरा खाली था। लेकिन उसे ऐसा लग रहा था जैसे कोई अब भी उसे देख रहा हो।
वह नहीं जानता था कि इस रात के बाद गाँव में बहुत कुछ बदलने वाला था।
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albertprince547;
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#44
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पाठकों के लिए संदेश:
दोस्तों,
आज पार्ट्स थोड़े लेट डाले गए, इसके लिए दिल से माफी चाहता हूँ। आप सबके प्यार, सपोर्ट और इंतजार के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। आपकी वजह से ही यह कहानी लगातार आगे बढ़ रही है।
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#45
Nice update Maa ki majburi baap ki swikriti ko jankar Aman relex ho gaya Sarla Chachi ka achanak aana koi samanya ghatna nahi lag rahi Renu bhi sab kuchh ek sath nahi bata rahi jaldi hi puri raat sath mein bitane ka wada Radha ke sath college bunk karke moovi dekhna or Raziya ke bhai ke dwara attack karna Aman ka khud ko or Radha dono ko bachana fir Raziya ke bhai ka anth sab kuchh bahut jaldi mein achanak se ho gaya ab Radha or Aman kaise sthiti ko face karenge or kya naya or ghatit hog gaon mein or Aman ki life par iska kya asar hoga dekhne layak hoga .......... Waiting for next
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#46
wah mast hai
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#47
Rukana ke character ko dekh ke laga jaise meri hi baat ho Rahi hai ?? waiting for next ji ?
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#48
kya koi update ..........hai
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#49
अमन घर पहुँचा तो रात काफी बीत चुकी थी।
आँगन में हल्की रोशनी जल रही थी। ज्यादातर लोग सो चुके थे। उसने चुपके से अंदर प्रवेश किया। हाथ-पैर अभी भी हल्के काँप रहे थे। खरोंचें साफ दिख रही थीं। उसने जल्दी से मुँह-हाथ धोए और अपने कमरे में जाकर बिस्तर पर गिर गया।
आँखें बंद कीं तो दो दृश्य एक साथ घूमने लगे—मूवी वाले अँधेरे कोने में राधा का काँपता शरीर, उसकी सिसकारियाँ, उसका “मैं तुमसे बहुत प्यार करने लगी हूँ”… और फिर वह पागल रफ्तार, राजिया के भाई का गुस्से से भरा चेहरा, और खाई में गिरने की वह जोरदार आवाज।
नींद बहुत देर से आई। जब आई तो टूटी-फूटी थी।
सुबह गाँव में खबर आग की तरह फैल चुकी थी।
“राजिया के भाई की मोटरसाइकिल खाई में गिर गई… मर गया बेचारा।”
“कल रात शहर के पास हुआ है।”
“पता नहीं कैसे नियंत्रण खो बैठा।”
अमन चाय पीते हुए चुपचाप सुन रहा था। माँ किचन में बात कर रही थीं। बाबा आँगन में बैठे थे। सरला चाची भी चर्चा में शामिल थीं। किसी के चेहरे पर शक की कोई लकीर नहीं थी। सब इसे साधारण एक्सीडेंट मान रहे थे।
अमन ने सामान्य स्वर में पूछा, “कब हुआ बाबा?”
बाबा ने जवाब दिया, “कल रात। शहर की तरफ। गरीब का बेटा था… अब राजिया अकेली रह गई बेचारी।”
अमन ने सिर हिलाया और चुपचाप चाय खत्म करके कॉलेज के लिए निकल पड़ा।
कॉलेज में माहौल भारी था। राजिया नहीं आई थी। लड़के समूह में बातें कर रहे थे। अमन ने जानबूझकर उस चर्चा से दूर रखा। ब्रेक में राधा मिली। दोनों की निगाहें मिलीं तो एक पल के लिए समय थम सा गया। राधा के चेहरे पर थकान और डर दोनों थे।
अमन ने बहुत धीमे स्वर में पूछा, “ठीक हो?”
राधा ने सिर हिलाया। “तुम…?”
“हाँ। कुछ मत कहना किसी से।”
राधा ने हल्के से सिर हिलाया। दोनों अलग हो गए। लेकिन दोनों के दिल अभी भी जोर से धड़क रहे थे।
शाम को घर लौटा तो फिर वही चर्चा चल रही थी। अमन ने सामान्य व्यवहार बनाए रखा। खाना खाया। सरला चाची ने उसके बाल सहलाए। कमला चाची ने दूर से एक निगाह डाली, लेकिन कुछ नहीं बोलीं।
रात के बारह बजे रेणु आईं। लालटेन लेकर। दरवाजा बंद करके सिटकिनी लगाई और बिस्तर के किनारे बैठ गईं।
अमन ने इस बार सीधे आँखों में देखा।
“दीदी… कल रात… राजिया के भाई ने मुझे मारने की कोशिश की।”
रेणु की आँखें तेज हो गईं।
अमन ने पूरा बताया—मूवी, वापसी, मोटरसाइकिल, कैसे उसने राधा को बचाया, कैसे खुद बचा, और कैसे राजिया का भाई खाई में गिर गया। आखिर में बोला, “मैंने कुछ नहीं किया दीदी। वह खुद नियंत्रण खोकर गिरा। लेकिन… वह जानबूझकर मुझे कुचलने आया था।”
रेणु बहुत देर तक चुप रही। चेहरा गंभीर था। फिर उसने अमन का हाथ पकड़ा।
“तुमने सही किया जो वहाँ से तुरंत हट गए। और राधा को भी संभाला। अब सुनो—इस बात को दफना दो। किसी से एक शब्द भी नहीं। राजिया अभी सदमे में होगी। अगर किसी को थोड़ा भी शक हुआ तो तुम दोनों फँस सकते हो।”
अमन ने सिर हिलाया।
रेणु ने उसकी आँखों में देखा। “तुम डरे हुए हो?”
“थोड़ा… हाँ।”
रेणु ने उसके माथे पर हाथ रखा। “डरना स्वाभाविक है। लेकिन अब तुम्हें और मजबूत बनना होगा। यह घर, यह गाँव… यहाँ हर घटना के लंबे साये होते हैं। सावधान रहो। राधा के साथ भी अभी दूरी बनाए रखो कुछ दिनों तक।”
अमन चुप रहा। रेणु ने उसके बालों में हाथ फेरा।
“सो जाओ। कल फिर बात करेंगे।”
वह चली गईं।
अमन अकेला रह गया। कमरे में अँधेरा था। आँखें खुली थीं। दिमाग में एक सवाल घूम रहा था—
राजिया अब क्या करेगी…?
और क्या यह घटना सच में यहीं खत्म हो गई थी?
नींद बहुत देर से आई।

शुक्रवार की सुबह गाँव में अभी भी वही चर्चा चल रही थी।
राजिया के भाई की मौत की खबर अब पुरानी पड़ने लगी थी, लेकिन लोग अभी भी छोटे-छोटे समूहों में बातें कर रहे थे। कोई कह रहा था कि बाइक में ब्रेक फेल हो गए होंगे, कोई कह रहा था कि शायद नशे में था। किसी को शक नहीं था कि वह जानबूझकर किसी को कुचलने आया था।
अमन ने सामान्य दिनचर्या अपनाई। चाय पी, बाबा के पैर छुए, माँ से हल्की बात की और कॉलेज निकल पड़ा। चेहरे पर कोई खास भाव नहीं दिखने दिया। अंदर ही अंदर सावधानी का एक कवच सा बाँध लिया था।
कॉलेज में माहौल भारी था। राजिया आज भी नहीं आई थी। लड़के पहले जैसे जोर-जोर से बातें नहीं कर रहे थे। अमन ने अपनी जगह पर बैठकर किताब खोली। जानबूझकर किसी चर्चा में शामिल नहीं हुआ।
ब्रेक में राधा मिली। दोनों की निगाहें दूर से ही मिलीं। राधा के चेहरे पर थकान साफ थी। आँखों के नीचे हल्की कालिमा थी। अमन ने बहुत धीमे स्वर में सिर्फ इतना पूछा,
“ठीक हो?”
राधा ने हल्के से सिर हिलाया। “तुम?”
“हाँ।”
दोनों और कुछ नहीं बोले। बस एक पल के लिए आँखों में आँखें डालीं और फिर अलग हो गए। दोनों समझ रहे थे कि अभी कोई नजदीकी खतरनाक हो सकती है। रेणु की सलाह अमन के दिमाग में ताजा थी—“राधा के साथ भी अभी दूरी बनाए रखो कुछ दिनों तक।”
शाम को घर लौटा तो आँगन में सरला चाची बैठी थीं। उन्होंने अमन को देखते ही बुलाया।
“इधर आ बेटा। चेहरा थका लग रहा है।”
अमन उनके पास बैठ गया। सरला चाची ने उसके बालों में हाथ फेरा। “कुछ परेशानी है क्या? इन दिनों तुम थोड़े चुप से लग रहे हो।”
अमन ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “नहीं चाची। बस पढ़ाई का दबाव है।”
सरला चाची ने उसकी आँखों में देखा। कुछ और पूछना चाहती थीं, लेकिन उन्होंने नहीं पूछा। सिर्फ इतना कहा, “अगर कभी कुछ लगे तो मुझे बता देना। मैं हूँ न।”
अमन ने उनका हाथ दबाया। “हाँ चाची।”
रात के खाने के बाद रेणु आईं। लालटेन लेकर। दरवाजा बंद करके बिस्तर के किनारे बैठ गईं।
“आज कैसा रहा?” उन्होंने पूछा।
अमन ने बताया, “सब सामान्य रखने की कोशिश की। राधा से सिर्फ दो शब्द हुए। राजिया नहीं आई। गाँव वाले अभी भी एक्सीडेंट ही मान रहे हैं।”
रेणु ने सिर हिलाया। “अच्छा किया। अब और कुछ दिन ऐसे ही रहो। कोई जल्दबाजी मत करना। राजिया जब कॉलेज आएगी तो उसकी निगाहें तुम पर होंगी। संभल के।”
अमन चुप रहा। रेणु ने उसका हाथ पकड़ा।
“डर अभी भी है?”
“थोड़ा कम हुआ है… लेकिन पूरी तरह नहीं गया।”
रेणु ने उसके माथे पर हल्का हाथ फेरा। “समय के साथ जाएगा। तुमने उस रात सही फैसला लिया। अब बस चुप रहो और सामान्य जीवन जियो।”
उसने इस बार ज्यादा देर नहीं रुकी। बस अमन के बालों में हाथ फेरकर बोली, “सो जाओ। कल फिर मिलेंगे।”
रेणु चली गईं।
अमन अकेला रह गया। खिड़की से बाहर अँधेरे में देखा। गाँव सोया हुआ लग रहा था। लेकिन उसके मन में एक सवाल अभी भी बाकी था—
राजिया कब लौटेगी… और लौटकर क्या करेगी?
नींद धीरे-धीरे आई।


शनिवार की सुबह अमन ने महसूस किया कि गाँव की हवा थोड़ी हल्की पड़ने लगी है।
राजिया के भाई की मौत की चर्चा अब धीमी पड़ चुकी थी। लोग फिर से अपने कामों में लग गए थे। खेतों में हल चलने लगे थे। महिलाओं की बातें फिर से सामान्य हो गई थीं। लेकिन अमन के अंदर वह सावधानी अभी भी बाकी थी। वह जानता था कि कुछ घाव सतह से गायब हो जाते हैं, लेकिन उनके निशान लंबे समय तक रह जाते हैं।
कॉलेज पहुँचते ही उसकी नजर राजिया पर पड़ी।
आज वह आई थी।
काली साड़ी जैसी कोई गहरी रंग की सलवार-सूट पहने हुए थी। चेहरा सूजा हुआ था। आँखें लाल थीं। बाल बिखरे-बिखरे से लग रहे थे। वह अपनी जगह पर चुपचाप बैठी थी। किसी से बात नहीं कर रही थी। अमन ने जानबूझकर उसकी तरफ ज्यादा नहीं देखा। लेकिन एक बार जब उसकी निगाह राजिया से मिली तो राजिया ने उसे घूरा। लंबी, ठंडी, और कुछ कहने वाली निगाह। अमन ने नजरें घुमा लीं।
ब्रेक में राधा मिली। दोनों ने फिर से सिर्फ दो-एक शब्द किए।
“तुम ठीक हो न?” राधा ने बहुत धीमे स्वर में पूछा।
“हाँ। तुम?”
“अब थोड़ा बेहतर।”
दोनों अलग हो गए। दोनों समझ रहे थे कि अभी कोई लंबी बातचीत या नजदीकी ठीक नहीं।
शाम को घर लौटा तो आँगन में सरला चाची और कमला चाची दोनों बैठी थीं। सरला चाची ने अमन को देखते ही मुस्कुरा दिया।
“आ जाओ बेटा। आज चेहरा थोड़ा हल्का लग रहा है।”
अमन उनके पास बैठ गया। सरला चाची ने उसके बाल ठीक किए। कमला चाची ने दूर से ही एक निगाह डाली। आँखों में वह पुरानी चमक थी, लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस हल्की मुस्कान दी और उठकर किचन की तरफ चली गईं।
अमन ने सरला चाची से पूछा, “चाची, राजिया के घर का क्या हाल है?”
सरला चाची ने गहरी साँस ली। “बेचारी अकेली रह गई है। माँ भी बहुत टूट गई है। घर में सन्नाटा सा छा गया है।”
अमन चुप रहा। मन में एक अजीब सा भाव उठा—दया और सावधानी दोनों।
रात के खाने के बाद रेणु आईं। लालटेन लेकर। दरवाजा बंद करके बिस्तर के किनारे बैठ गईं।
“राजिया आज कॉलेज आई थी,” अमन ने बताया। “मुझे घूरा। लंबी निगाह से।”
रेणु ने गंभीर होकर सुना। “अब शुरू होगा। वह संदेह करेगी। शायद सीधे कुछ न बोले, लेकिन निगाहें रखेगी। तुम बिल्कुल सामान्य व्यवहार करना। न ज्यादा बचो, न ज्यादा पास जाओ। बस सामान्य।”
अमन ने सिर हिलाया।
रेणु ने उसका हाथ पकड़ा। “तुमने उस रात जो किया, वह सही था। अब बस चुप रहो। समय सब कुछ शांत कर देगा।”
उसने अमन के बालों में हाथ फेरा। इस बार ज्यादा देर नहीं रुकीं। बस इतना कहकर चली गईं, “सो जाओ। और ज्यादा मत सोचो।”
अमन अकेला रह गया। खिड़की से बाहर अँधेरे में देखा। मन में राजिया की वह लाल आँखें और लंबी निगाह घूम रही थी।
क्या वह सिर्फ शोक में थी… या कुछ और भी सोच रही थी?
नींद देर से आई।


(राजिया के अंदर की दुनिया)
रात का सन्नाटा राजिया के कमरे में भारी पड़ रहा था।
भाई की चारपाई खाली पड़ी थी। उसके कपड़े अभी भी खूँटी पर टंगे थे। तकिया वैसा ही रखा था जैसे वह छोड़कर गया हो। राजिया उस चारपाई के किनारे बैठी हुई थी। आँखों में आँसू खत्म हो चुके थे। अब सिर्फ एक सूखा, ठंडा गुस्सा बाकी था।
“तुम चले गए…” उसने बहुत धीमे स्वर में कहा। आवाज कमरे की दीवारों से टकराकर लौट आई। “इतनी आसानी से…?”
दिमाग में बार-बार वही रात घूम रही थी जब अजनबी मंकी कैप पहने आदमी ने उसे रात भर चोदा था। वह आदमी कौन था? क्यों आया था? और अब भाई भी नहीं रहा। दोनों घटनाएँ उसके दिमाग में एक-दूसरे से जुड़ने लगी थीं।
“कहीं… कहीं कोई रिश्ता तो नहीं?”
उसने आँखें बंद कीं। अमन का चेहरा आँखों के सामने आ गया। कॉलेज में उसकी सामान्य मुस्कान, राधा के साथ उसकी नजदीकी, और उस दिन की वह निगाह जब उसने अमन को घूरा था। अमन की आँखों में कुछ था… डर? या सिर्फ संयोग?
राजिया ने मुट्ठी भींच ली।
“अगर तूने मेरे भाई को कुछ किया हो अमन… तो मैं तुझे छोड़ूँगी नहीं।”
लेकिन सबूत कहाँ था? कुछ भी नहीं था। सिर्फ एक अजीब सा अहसास और भाई की मौत। वह जानती थी कि अगर उसने अभी कुछ कहा तो लोग उसे पागल कहेंगे। माँ पहले से टूटी हुई थी। घर में अब सिर्फ वे दोनों बची थीं।
उसने भाई के तकिये को कसकर पकड़ लिया। महक अभी भी बाकी थी। आँसू फिर निकल आए, लेकिन इस बार गुस्से के साथ।
“मैं पता लगाऊँगी… धीरे-धीरे। तू छुप नहीं सकता।”
कमरे में दीया की लौ काँप रही थी। राजिया ने आँखें बंद कीं। नींद नहीं आ रही थी। सिर्फ एक सवाल बार-बार घूम रहा था—
अमन… क्या सच में तू निर्दोष है?

(गाँव का सामाजिक माहौल)
राजिया के भाई की मौत के एक हफ्ते बाद गाँव की सतही जिंदगी सामान्य होने लगी थी।
लेकिन सतह के नीचे छोटी-छोटी लहरें अभी भी चल रही थीं।
चाय की दुकान पर पुरुष शाम को जमा होते तो बातें निकल आतीं। कोई कहता, “बेचारा जवान था… अचानक चला गया।” कोई कहता, “मोटरसाइकिलें इन दिनों खतरनाक हो गई हैं।” कुछ बुजुर्ग सिर हिलाते, “भाग्य का खेल है।” लेकिन कोई गहराई से पूछताछ नहीं कर रहा था। शहर की सिक्युरिटी ने इसे साधारण एक्सीडेंट मान लिया था। कोई गवाह नहीं मिला। कोई शक का प्रमाण नहीं था।
औरतों के समूह में बातें थोड़ी अलग थीं।
कोई कहता, “राजिया बेचारी अब अकेली रह गई। माँ भी बीमार रहने लगी है।”
कोई कहता, “घर का दीया बुझ गया। अब कौन संभालेगा खेत?”
कुछ औरतें धीमे स्वर में कहतीं, “शादी की उम्र की है राजिया… अब जल्दी रिश्ता देखना पड़ेगा।”
सरला चाची और कमला चाची भी इन चर्चाओं में शामिल होतीं। लेकिन दोनों ही सतर्क रहतीं। अमन के घर में इस विषय पर ज्यादा बात नहीं होती थी। बाबा रामप्रसाद सिर्फ इतना कहते, “भगवान की मर्जी।” पिता सुरेश चुप रहते। माँ सुशीला भी ज्यादा नहीं बोलतीं।
कॉलेज में माहौल थोड़ा बदल चुका था।
राजिया अब नियमित आने लगी थी। लेकिन वह पहले जैसी नहीं रही थी। बातें कम करती। हँसती नहीं थी। लड़के उससे दूरी बनाकर रखते। कोई चुटकुला नहीं मारता। राधा भी उससे सामान्य से ज्यादा बात नहीं करती थी। अमन जानबूझकर उसकी नजरों से बचता। दोनों के बीच एक अदृश्य दीवार खड़ी हो गई थी।
गाँव वाले अमन को सामान्य लड़के की तरह ही देखते थे। किसी को शक नहीं था। कोई यह नहीं सोचता था कि राजिया के भाई की मौत के पीछे कोई और कहानी हो सकती है। सबके लिए वह एक दुखद, लेकिन साधारण हादसा था।
लेकिन राजिया के मन में जो आग जल रही थी, वह गाँव की किसी चर्चा में नहीं आती थी।
वह चुपचाप सब देख रही थी।
चुपचाप सब याद रख रही थी।
और गाँव अपनी सामान्य लय में लौटता जा रहा था—जैसे कुछ हुआ ही न हो।


रात का खाना दोनों के लिए भारी पड़ रहा था।
थाली में रोटी ठंडी हो चुकी थी। सब्जी में तेल अलग हो गया था। राजिया और रुक्साना चूल्हे के पास फर्श पर बैठी थीं। घर में इतना सन्नाटा था कि दीये की लौ की हल्की सी आवाज भी साफ सुनाई दे रही थी। भाई की खाली चारपाई कोने में खड़ी थी। उसका तकिया अभी भी वैसा ही पड़ा था जैसे वह कल रात ही सोकर उठा हो।
रुक्साना ने बहुत धीमी आवाज में कहा, “थोड़ा खा ले बेटी… तू कितने दिन से कुछ ठीक से नहीं खा रही।”
राजिया ने थाली में देखने के बजाय सामने की दीवार की तरफ देखा। आवाज सूखी थी, “भूख नहीं लगती माँ। खाने से क्या होगा?”
रुक्साना की उंगलियाँ थाली के किनारे पर कस गईं। “मैं जानती हूँ… मुझे भी नहीं लगती। लेकिन हमें जीना है राजिया। तेरे भाई के बिना भी जीना है।”
राजिया ने अचानक सिर घुमाया। आँखें लाल थीं, लेकिन आँसू नहीं थे। सिर्फ एक ठंडा, तेज गुस्सा था।
“कैसे जीएँगे माँ?” उसकी आवाज काँप रही थी। “बताओ कैसे? घर में अब कौन बचा है? खेत कौन देखेगा? लोग क्या-क्या बोलेंगे हमारे बारे में? ‘देखो, बेटा मर गया, अब माँ-बेटी अकेली रह गईं’… सुन-सुनकर मैं पागल हो जाऊँगी।”
रुक्साना की आँखें भर आईं। उसने गला साफ किया। “लोग तो बातें करेंगे ही। करते आए हैं, करते रहेंगे। हम उनकी बातों से नहीं जीते। तू पढ़ाई जारी रख। मैं मजदूर रख लूँगी। खेत संभाल लूँगी। हम हार नहीं मानेंगे।”
राजिया ने थाली एक तरफ धकेल दी। आवाज अचानक तेज हो गई,
“माँ… भाई की मौत साधारण एक्सीडेंट नहीं थी।”
रुक्साना जैसे बिजली से सिहर उठीं। “क्या… क्या बकवास कर रही है तू? सिक्युरिटी ने साफ कहा है एक्सीडेंट है। कोई गवाह नहीं, कोई शक नहीं।”
“मुझे विश्वास नहीं होता!” राजिया अब खड़ी हो गई थी। आवाज में गुस्सा और दर्द दोनों थे। “भाई कितनी सावधानी से बाइक चलाता था, आप जानती हैं। वह नशे में कभी नहीं रहता था। फिर अचानक शहर के बाहर खाई में कैसे गिर गया? कैसे माँ? कोई तो वजह होगी!”
रुक्साना भी उठ खड़ी हुईं। आँखों से आँसू बह निकले। उन्होंने राजिया के दोनों कंधे पकड़ लिए।
“राजिया… मेरी बात सुन! अगर तूने ऐसे शक करना शुरू कर दिया तो लोग तुझे पागल कहेंगे। घर की जो इज्जत बची है वह भी चली जाएगी। मैं और कितना झेलूँ? बेटा चला गया… अब तू भी मुझे पागल बना रही है क्या?”
राजिया की आँखों में भी आँसू आ गए, लेकिन वह रुकी नहीं।
“मैं पागल नहीं हूँ माँ! मुझे लगता है कोई है पीछे। कोई है जिसने भाई को… ”
“चुप!” रुक्साना ने जोर से झकझोर दिया। आवाज टूट रही थी। “मैं नहीं सुनना चाहती। भगवान की मर्जी थी। हमें सिर झुकाकर मानना होगा। तू चुप रह। अपने दुख को अपने तक रख। दुनिया के सामने कुछ मत बोल… वरना हम दोनों सड़क पर आ जाएँगे।”
राजिया माँ की पकड़ से खुद को छुड़ाते हुए पीछे हट गई। साँसें तेज चल रही थीं। दोनों माँ-बेटी एक-दूसरे के सामने खड़ी थीं—एक टूटी हुई, दूसरी गुस्से और शक से जलती हुई।
बहुत देर तक कोई नहीं बोला। सिर्फ दोनों की साँसें चल रही थीं।
फिर राजिया ने बहुत धीमी, ठंडी आवाज में कहा,
“ठीक है माँ। मैं चुप रहूँगी। लोगों के सामने कुछ नहीं बोलूँगी। लेकिन अंदर से… मैं चुप नहीं रहूँगी।”
रुक्साना की टाँगें जैसे जवाब दे गईं। वह वापस फर्श पर बैठ गईं। हाथों से चेहरा ढक लिया।
“सो जा राजिया… कृपया सो जा। और मत बोल। मेरा दिल नहीं सह पा रहा।”
राजिया कुछ पल और खड़ी रही। फिर धीरे से बोली,
“मैं सो जाती हूँ माँ। लेकिन सवाल मेरे साथ सोएँगे।”
वह अंदर चली गई।
रुक्साना अकेली रह गईं। थाली के सामने। दीये की लौ काँप रही थी। उन्होंने भाई की खाली चारपाई की तरफ देखा और बहुत धीमे स्वर में कहा,
“बेटा… तू कहाँ छोड़ गया हमें…”
कमरे में सिर्फ सन्नाटा बचा था—और दो टूटे हुए दिल।


राजिया का बचपन साधारण नहीं रहा था।
गाँव के किनारे वाले छोटे से मकान में वह अपने भाई और माँ रुक्साना के साथ पलती बड़ी हुई। बाप की मौत हो चुकी थी जब वह सिर्फ सात साल की थी। ट्रैक्टर दुर्घटना में। उसके बाद से घर का सारा बोझ भाई के कंधों पर आ गया था। भाई उम्र में उससे सिर्फ चार साल बड़ा था, लेकिन जिम्मेदारी ने उसे जल्दी ही मर्द बना दिया था।
रुक्साना ने उस समय खेतों में मजदूरी की। कभी-कभी अमीर घरों में बर्तन भी माँजे। लोगों की निगाहें हमेशा उनके परिवार पर रहती थीं—“देखो, मर्द नहीं है घर में… कैसे चलेगा।” राजिया ने बचपन से ही ये बातें सुनीं। उसने सीखा कि औरत को चुप रहना चाहिए, सिर झुकाकर जीना चाहिए, और घर की इज्जत किसी भी कीमत पर बचानी चाहिए।
भाई उसके लिए सिर्फ भाई नहीं था। वह उसका संरक्षक था, उसका सहारा था। जब कॉलेज में लड़के छेड़ते तो भाई सामने आ जाता। जब घर में अनाज कम होता तो भाई रातभर जागकर मजदूरी करता। राजिया ने उसके लिए खाना बनाया, उसके कपड़े धोए, उसकी हर बात मानी। दोनों में एक गहरी निर्भरता थी।
लेकिन भाई के अंदर भी एक कमजोरी थी—राधा के प्रति उसका आकर्षण। वह राधा को दूर से देखा करता था। कभी हिम्मत नहीं जुटा पाया कुछ कहने की। और जब उसने अमन को राधा के करीब देखा तो जलन ने उसे अंदर ही अंदर खत्म कर दिया।
राजिया यह सब जानती थी। वह भाई की खामोश चाहत को समझती थी। इसलिए जब भाई की मौत हुई तो सिर्फ एक भाई नहीं मरा था। उसका पूरा सहारा, उसकी सुरक्षा की दीवार, और उसकी कुछ अधूरी ख्वाहिशें भी मर गई थीं।
अब वह अकेली थी।
माँ टूटी हुई थी।
और मन में एक सवाल गहराता जा रहा था—क्या भाई की मौत सच में हादसा थी… या किसी ने उसे हटाया?



गाँव में मौत सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं होती। वह पूरे परिवार की सामाजिक स्थिति को बदल देती है।
राजिया के भाई की मौत के बाद गाँव वाले सहानुभूति तो दिखा रहे थे, लेकिन उनके शब्दों के पीछे सामाजिक हिसाब-किताब भी चल रहा था। “अब घर में मर्द नहीं बचा… खेत कैसे चलेंगे?” “राजिया की उम्र हो गई है… जल्दी ब्याह देना चाहिए वरना लोग बातें बनाएँगे।” “माँ-बेटी अकेली रहेंगी तो इज्जत का क्या होगा?”
ग्रामीण समाज में औरत की इज्जत घर के मर्द से जुड़ी होती है। जब मर्द चला जाता है तो औरत की स्थिति अचानक कमजोर हो जाती है। लोग दया तो करते हैं, लेकिन साथ में निगाहें भी तेज कर देते हैं। हर कदम पर सवाल खड़े होते हैं—कहाँ गई, किससे बात की, क्यों अकेली निकली।
राजिया अब “अकेली लड़की” की श्रेणी में आ गई थी। कॉलेज में लड़के उससे दूरी बना रहे थे—कुछ इज्जत में, कुछ डर से। औरतें उसके घर के बारे में फुसफुसा रही थीं। रिश्ते की बातें शुरू हो गई थीं। कोई कह रहा था कि दूर गाँव में एक विधुर है, कोई कह रहा था कि उम्र में बड़ा लेकिन अच्छी जगह है।
रुक्साना यह सब जानती थी। इसलिए वह राजिया को बार-बार चुप रहने को कह रही थी। क्योंकि ग्रामीण समाज में शक करना, सवाल उठाना, या जोर से बोलना—तीनों ही औरत के लिए खतरनाक माने जाते हैं। चुप रहना सुरक्षा है। सिर झुकाना मजबूरी नहीं, रणनीति है।
अमन का परिवार इस सामाजिक ढाँचे का हिस्सा होते हुए भी थोड़ा अलग था। उनके पास जमीन थी, रुतबा था, बाबा जैसे स्तंभ थे। इसलिए उनकी गलतियाँ भी दब जाती थीं। लेकिन राजिया जैसे परिवार के पास वह सुरक्षा कवच नहीं था। उनके पास सिर्फ चुप्पी और मजबूरी थी।
गाँव की ये अनकही कायदे ही असल में सबसे बड़े राज़ थे।
और राजिया अब इन्हीं कायदों के खिलाफ अकेले खड़ी थी।


गाँव की ये अनकही कायदे ही असल में सबसे बड़े राज़ थे।
और राजिया अब इन्हीं कायदों के खिलाफ अकेले खड़ी थी।
रात गहराती जा रही थी।
कमरे में दीये की छोटी सी लौ बमुश्किल रोशनी दे रही थी। लौ हवा में काँप-काँपकर दीवार पर काली छायाएँ बना रही थी। मिट्टी के तेल की हल्की, तीखी गंध पूरे कमरे में फैली हुई थी। बाहर से ठंडी हवा खिड़की की दरारों से रिसकर अंदर आ रही थी, जिससे राजिया के बाजुओं पर रोंगटे खड़े हो गए थे।
वह भाई की खाली चारपाई के किनारे बैठी थी। चारपाई की रस्सियाँ पुरानी हो चुकी थीं। जब उसने हाथ रखा तो रस्सी की खुरदरी अनुभूति हथेली पर साफ महसूस हुई। तकिये पर अभी भी भाई के बालों की हल्की महक बाकी थी—सस्ते साबुन और पसीने की मिली-जुली गंध। राजिया ने तकिया उठाकर अपने चेहरे से लगा लिया। आँखें बंद कर लीं।
फिर उसने एक पुरानी कॉपी निकाली। कॉपी के पन्ने पीले पड़ चुके थे। कुछ पन्ने नमी से चिपक गए थे। जैसे ही उसने पन्ने पलटे, हल्की सी सरसराहट की आवाज कमरे के सन्नाटे में गूँज उठी। अचानक उसकी उंगलियाँ एक छोटे, फटे हुए कागज से टकराईं जो कॉपी के बीच में दबा था।
कागज निकालते ही उसके हाथ काँपने लगे।
कागज पुराना और मुलायम हो चुका था। किनारे फटे हुए थे। भाई की अजीब, मोटी हैण्डराइटिंग में कुछ नाम लिखे थे। कुछ तारीखें। और सबसे नीचे एक वाक्य—
“अगर मेरे साथ कुछ हुआ… तो अमन से पूछना।”
राजिया की साँसें अटक गईं। छाती के अंदर दिल इतने जोर से धड़क रहा था कि उसे खुद अपनी धड़कन सुनाई दे रही थी। कानों में एक अजीब सी सनसनाहट भर गई।
तभी दीये की लौ अचानक तेज काँपी। जैसे किसी ने जोर से फूँक मारी हो। कमरे में हवा का एक ठंडा झोंका आया। दीवार पर बन रही छायाएँ अचानक लंबी और टेढ़ी हो गईं। राजिया के शरीर में एक ठंडी धारा दौड़ गई। उसने तेजी से पीछे मुड़ा।
खिड़की बंद थी।
दरवाजा बंद था।
कमरा खाली था।
लेकिन हवा में एक अजीब सी भारीपन था। जैसे कोई साँस ले रहा हो। बहुत हल्की… बहुत करीब। राजिया के गर्दन के बाल काँप उठे। उसे साफ महसूस हुआ जैसे कोई उसकी पीठ के पीछे खड़ा हो।
उसने कागज को मुट्ठी में इतने जोर से भींच लिया कि कागज की धार उसके हथेली में चुभने लगी। आँखें तेज हो गईं। आवाज बिल्कुल धीमी लेकिन ठंडी निकली—
“अब मैं छोड़ूँगी नहीं…”
बाहर आँगन में सन्नाटा था। बस दूर से किसी कुत्ते की एक लंबी आवाज आई और फिर सब शांत हो गया। अँधेरा इतना गाढ़ा था कि हाथ को हाथ नहीं सुझाई दे रहा था।
लेकिन उस अँधेरे में…
किसी के कदम बहुत हल्के-हल्के, मिट्टी पर लगभग बिना आवाज किए, राजिया के घर की दीवार के बाहर रुककर खड़े थे।
कुछ पल तक वहाँ रहे।
फिर धीरे से… अँधेरे में घुल गए।
Fuckuguy
albertprince547;
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#50
Nice update aisa lag raha hai story apni mool bhavna se hat gayi hai or suspense thriller ka roop leti ja rahi hai ghar ke gahre razon se hatkar dusri disha mein bhatakne lagi hai soab main kya hi kahun samajh nahi arha..... Waiting for next
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#51
khatarnak mod kahani main lekin hero to hero hi rhega
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#52
Aaj ke updates kahan hai bro..... Humse intzar karna mushkil ho raha hai we are waiting
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#53
next update
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#54
Kya hua Bhai ji do din ho gaye koi update nahi hai na hi koi information kisi bhi prakar ki itni achchhi story bina kisi update ke kaise rah Sakti hai..... Please continue bro we are still waiting
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#55
next update....................
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#56
Waiting for next update
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#57
(10-09-2026, 11:20 AM)Fuckuguy Wrote: सोमवार की सुबह अमन कॉलेज के लिए निकला।
रात भर खँडहर का दृश्य उसके दिमाग में घूमता रहा। लड़की की आवाज, उसकी सिसकारियाँ, दोनों लड़कों की गालियाँ—सब साफ याद था। लेकिन उसका चेहरा नहीं दिखा था। दीवार के कोण और अँधेरे की वजह से सिर्फ शरीर दिखी थी। अब अमन का मन यही पूछ रहा था—वह कौन थी? कक्षा में है या किसी और सेक्शन में? जाना-पहचाना चेहरा तो नहीं?
कॉलेज पहुँचते ही उसने सामान्य दिनचर्या शुरू की। प्रार्थना, कक्षा, दोस्तों के साथ बैठना। लेकिन उसकी आँखें अब पहले से तेज थीं। हर लड़की को ध्यान से देख रहा था—आवाज मिलान करने की कोशिश में। जब कोई लड़की हँसती या बात करती तो वह कान लगा लेता। दोपहर के खाने के समय मैदान में बैठे दोस्तों के बीच भी उसका ध्यान चारों तरफ घूम रहा था।
एक बार उसे लगा कि पिछली बैंच पर बैठी लड़की की आवाज मिलती-जुलती है। लेकिन पक्का नहीं हो सका। छुट्टी के समय वह जानबूझकर उस समूह के पास से गुजरा जिसकी बात कल सुनी थी। दो लड़के तो वही लग रहे थे, लेकिन लड़की उनके साथ नहीं थी। अमन ने मन में नोट कर लिया—जल्दी पता चलेगा।
शाम को घर लौटा तो माँ ने सामान्य स्वर में पूछा, “आज कॉलेज कैसा रहा?” अमन ने सिर हिलाया और कमरे में चला गया। दिमाग में एक साथ दो चीजें चल रही थीं—खँडहर वाली लड़की का चेहरा ढूँढना और रात को रेणु के आने का इंतजार।
रात के खाने के बाद सब अपने कमरों में चले गए। अमन बैठा इंतजार कर रहा था। ठीक बारह बजे दरवाजे पर दस्तक हुई। रेणु अंदर आई। लालटेन कम रोशनी में थी। उसने दरवाजा बंद किया।
“कल सो गए थे,” रेणु ने सीधे कहा। “आज जगे हुए हो?”
अमन ने सिर हिलाया। रेणु बिस्तर के किनारे बैठ गई। उसकी आँखें अमन के चेहरे पर थीं।
“तुमने कुछ देखा है। बातों से लग रहा है। बताओ।”
अमन ने संक्षेप में बता दिया—पुराने मंदिर के खँडहर में तीन लोग, लड़की का चेहरा नहीं दिखी, लेकिन शरीर और आवाजें साफ याद हैं। रेणु सुनती रही। फिर हल्के से मुस्कुराई।
“कॉलेज में पता लगाने की कोशिश कर रहे हो न?”
अमन ने स्वीकार किया।
रेणु ने कहा, “अच्छा। आँखें खुल रही हैं। लेकिन याद रखना—बाहर की चीजें सिर्फ उत्तेजना देती हैं। असली शिक्षा यहीं है, इस घर में।”
वह थोड़ा करीब आई। “आज तुमने खुद चुंबन शुरू किया था। लंड भी दिखाया। आज मैं आगे बढ़ाऊँगी।”
रेणु ने अपना पल्लू हटाया। साड़ी के नीचे सिर्फ ब्लाउज था। उसने अमन का हाथ पकड़कर अपनी छाती पर रखा। ब्लाउज के ऊपर से ही। स्तन नरम और भारी थे। निप्पल कपड़े के नीचे सख्त हो रहे थे।
“महसूस करो,” रेणु ने धीरे से कहा। “यह सिर्फ बहन का शरीर नहीं। यह इच्छा का शरीर है। तुम्हारा लंड अभी कैसा है?”
अमन की आवाज कम थी, “पूरी तरह खड़ा है।”
रेणु ने उसका हाथ अपनी छाती पर और दबाया। “आज चुंबन तुमने लिया था। आज मैं लेती हूँ।”
वह आगे झुकी और अमन के होंठ पकड़ लिए। चुंबन इस बार गहरा था। जीभ अंदर तक चली गई। अमन ने जवाब दिया। दोनों की साँसें तेज हो गईं। रेणु का एक हाथ अमन की गर्दन पर था, दूसरा उसकी पैंट के नाड़े पर। उसने नाड़ा खोला। दस इंच का लंड बाहर निकल आया—सख्त, नसें फूली हुई, भारी।
रेणु ने उसे देखा। आँखों में फिर वही अचरज थी।
“इतना मोटा और लंबा… सच में बदल गया है।” उसने इसे अपने हाथ में लिया। हल्के से सहलाया। “आज सिर्फ इतना। मैं इसे पकड़ूँगी। तुम महसूस करो।”
उसकी उंगलियाँ धीरे-धीरे चलने लगीं—जड़ से लेकर सिर तक। कभी हल्के, कभी थोड़ा कसकर। अमन की कमर काँपने लगी। रेणु उसके कान में बोली,
“कल तुमने दूसरों को चोदते देखा। आज समझो कि शरीर कैसे प्रतिक्रिया देता है। जल्दी मत करना। बस महसूस करो।”
कुछ देर तक रेणु ने उसे अपने हाथ से सहलाया। अमन की साँसें तेज हो गईं, लेकिन रेणु ने पूरा नहीं होने दिया। उसने हाथ रोक लिया।
“बस। आज की शिक्षा यहीं खत्म।” उसने अमन का लंड छोड़ दिया और पल्लू ठीक किया। “कल रात और आगे बढ़ेंगे। शायद मुँह से भी सिखाऊँ। लेकिन सब्र रखो।”
रेणु उठ खड़ी हुई। दरवाजे तक जाकर बोली,
“कॉलेज में वह लड़की ढूँढते रहो। लेकिन घर की शिक्षा को प्राथमिकता देना। बाहर की चीजें तुम्हें सिर्फ उत्तेजित करेंगी। असली ताकत यहीं बनेगी।”
वह चली गई।
अमन अकेला रह गया। लंड अभी भी तना हुआ था, रेणु के हाथ की गर्माहट उस पर बची हुई थी। उसने खिड़की से बाहर देखा। हवेली शांत थी। लेकिन उसके अंदर अब दो आग जल रही थीं—एक खँडहर वाली अज्ञात लड़की की पहचान की, दूसरी रेणु की अगली शिक्षा की।
वह लेट गया। आँखें खुली थीं। दिमाग में रेणु के स्तनों का स्पर्श और खँडहर की सिसकारियाँ एक साथ घूम रही थीं।
कॉलेज की दिनचर्या वही रहेगी। लेकिन अब हर कक्षा, हर ब्रेक, हर लड़की की आवाज उसके लिए एक सवाल बन गई थी—क्या वही है?
और रातें… रातें अब रेणु की शिक्षा के लिए थीं।


मंगलवार की सुबह अमन कॉलेज गया।
कल रात रेणु के हाथ का स्पर्श और खँडहर की सिसकारियाँ दोनों उसके दिमाग में थीं। कक्षा में बैठे-बैठे वह बार-बार लड़कियों की आवाजें सुन रहा था। एक लड़की ने जब पानी माँगा तो उसकी आवाज कुछ मिलती-जुलती लगी। अमन ने ध्यान से देखा—चेहरा साधारण था, लेकिन पक्का अंदाजा नहीं लगा। ब्रेक में उसने उस समूह के दो लड़कों को दूर से देखा। वे सामान्य बातें कर रहे थे। लड़की उनके साथ नहीं थी। अमन ने मन में लिखा—जल्दी पता चलेगा।
पूरे दिन उसका ध्यान बँटा रहा। एक तरफ पढ़ाई, दूसरी तरफ वह अज्ञात आवाज। छुट्टी होते ही वह घर की तरफ निकला। दिमाग में एक ही सवाल घूम रहा था—वह लड़की कौन है?
शाम को घर लौटा तो माँ ने सामान्य स्वर में पूछा, “आज कॉलेज कैसा रहा?” अमन ने सिर हिलाया और सीधे अपने कमरे में चला गया। वह इंतजार कर रहा था—रात का।
रात के खाने के बाद रेणु आई। लालटेन लेकर। दरवाजा बंद करके वह बिस्तर के किनारे बैठ गई।
अमन ने इस बार खुद पहल की। “दीदी, एक बात पूछनी है।”
रेणु ने देखा। “पूछो।”
“बाबा के कमरे से जो आवाज आई थी… वह कौन थी?”
रेणु कुछ पल चुप रही। फिर बोली, “तुमने सुना तो था। मैंने मना किया था फिर भी कान लगा लिए।” उसने अमन की आँखों में देखा। “अभी बताने का समय नहीं। जब तुम और तैयार हो जाओगे तब खुद देख लोगे। जबरदस्ती मत पूछो।”
अमन चुप नहीं बैठा। “तुम्हें घर के सारे मर्दों के बारे में कैसे पता? उनके… साइज के बारे में भी। तुमने कितनों को…”
रेणु की आँखों में हल्की चमक आई। उसने अमन का हाथ पकड़ा। “तुम अब सवाल पूछने लगे हो। यह अच्छी बात है। लेकिन जवाब एक साथ नहीं मिलेंगे। सबके अपने राज़ हैं। मैंने बहुत कुछ देखा और जाना है। तुम्हें भी धीरे-धीरे पता चलेगा। आज इतना काफी है।”
वह थोड़ा करीब आई। “आज तुम्हारी शिक्षा जारी रखनी है।”
रेणु ने अपना पल्लू हटाया। ब्लाउज के बटन खोले। उसके स्तन बाहर आ गए—सख्त निप्पल, गोल और भारी। उसने अमन का हाथ पकड़कर उन पर रख दिया।
“आज सीधे छुओ। कपड़े के बिना।”
अमन की हथेली पर नरम मांस और सख्त निप्पल महसूस हुए। रेणु ने आँखें बंद कर लीं। “हल्के से दबाओ… ऐसे…”
अमन ने वैसा ही किया। रेणु की साँस तेज हो गई। उसने अमन के लंड पर हाथ रखा—पैंट के ऊपर से। दस इंच का तनाव साफ महसूस हो रहा था।
“निकालो,” रेणु ने कहा।
अमन ने पैंट खोली। लंड बाहर आया। रेणु ने इसे अपने दोनों हाथों में लिया। धीरे-धीरे सहलाने लगी।
“कल तुमने दूसरों को देखा। आज समझो कि हाथ कैसे चलते हैं। जल्दी मत। मैं बताऊँगी कब रोकना है।”
उसकी उंगलियाँ जड़ से सिर तक फिसल रही थीं। कभी हल्के, कभी कसकर। अमन की कमर काँपने लगी। रेणु ने एक हाथ से उसके लंड को पकड़े रखा और दूसरे हाथ से अपना एक स्तन अमन के मुँह के पास ले गई।
“चूसो… हल्के से।”
अमन ने निप्पल मुँह में लिया। जीभ घुमाई। रेणु की सिसकारी निकली। दोनों की साँसें तेज हो गईं। कुछ देर तक यह चलता रहा—रेणु का हाथ उसके लंड पर, अमन का मुँह उसके स्तन पर।
फिर रेणु ने अचानक रोक दिया।
“बस। आज यहीं तक।” उसने अमन का लंड छोड़ दिया और ब्लाउज पहन लिया। “तुम पूछ रहे हो—कौन सबसे ज्यादा चुदाई कर चुकी है, किसका लंड कैसा है। जवाब धीरे-धीरे मिलेंगे। अभी अपनी शिक्षा पर ध्यान दो।”
रेणु दरवाजे तक गई। मुड़कर बोली,
“कॉलेज में वह लड़की ढूँढते रहो। लेकिन याद रखना—बाहर की उत्तेजना सिर्फ आग लगाती है। असली खेल यहीं है।”
वह चली गई।
अमन अकेला रह गया। मुँह में रेणु के निप्पल का स्वाद था, लंड पर उसके हाथ की गर्माहट। दिमाग में बाबा वाले कमरे का सवाल और खँडहर वाली लड़की दोनों घूम रहे थे।
वह लेट गया। आँखें खुली थीं। अब वह सिर्फ देखने वाला नहीं रह गया था। वह सवाल पूछने वाला बन चुका था। और रेणु उसके हर सवाल का जवाब एक नई शिक्षा के साथ दे रही थी।


बुधवार की सुबह अमन कॉलेज पहुँचा।
कक्षा में बैठते ही उसका ध्यान फिर लड़कियों की आवाजों पर था। वह लगातार उस अज्ञात आवाज को ढूँढ रहा था। ब्रेक के समय वह पानी लेने गया तो बरामदे के कोने से परिचित आवाजें सुनाई दीं। वही दो लड़के और वह लड़की बात कर रहे थे। अमन ने दीवार के सहारे खड़े होकर कान लगा दिए।
“रविवार को पुराने मंदिर के पीछे ही मिलना है,” एक लड़के ने कहा। “इस बार एक और लड़की लाएँगे।”
लड़की ने हँसते हुए पूछा, “कौन?”
“राधा। हमारी ही क्लास वाली। उसे कहेंगे कि वहाँ कोई नया वाला फोन या कुछ दिखाना है। जब पहुँच जाएगी तो… दोनों का मजा ले लेंगे। तू भी उस पर चढ़ जाना।”
दूसरे लड़के ने जोड़ा, “राधा थोड़ी सीधी है। पहले मना करेगी। लेकिन जब दोनों तरफ से दब जाएगी तो चुपचाप ले लेगी। तू बस उसे लेकर आ जा।”
लड़की ने सिर हिलाया। “ठीक है। रविवार दोपहर को ले चलूँगी। बाकी तुम दोनों सँभाल लेना।”
अमन की मुट्ठियाँ भींच गईं। राधा। उसकी अपनी क्लास की लड़की। शांत रहने वाली, कम बोलने वाली। वह उन्हें उस खँडहर में ले जाकर उसी हालत में पहुँचाने वाले थे जैसे कल उसने देखा था। अमन का दिल जोर से धड़कने लगा। वह वहीं से हट गया और सीधा अपनी कक्षा में लौट आया।
पूरे दिन उसका मन अशांत रहा। राधा को बचाना है—यह बात उसके दिमाग में बार-बार घूम रही थी। लेकिन कैसे?  सिक्युरिटी में बताए तो सब सामने आ जाएगा। खुद जाकर रोके तो लड़के उससे लड़ सकते हैं। वह सोचता रहा, लेकिन कोई साफ रास्ता नहीं सूझा।
शाम को घर लौटा तो सामान्य दिनचर्या निभाई। खाना खाया, थोड़ी देर पढ़ाई की, लेकिन दिमाग राधा और रविवार के प्लान पर ही अटका रहा।
रात के बारह बजे रेणु आई। लालटेन लेकर। दरवाजा बंद करके वह बिस्तर के किनारे बैठ गई।
अमन ने इस बार थोड़ा उदास स्वर में कहा, “दीदी, आज कॉलेज में कुछ सुना।”
रेणु ने पूछा, “क्या?”
अमन ने संक्षेप में बता दिया—रविवार का प्लान, राधा को बहाने से ले जाना, फिर दोनों लड़कों और उस लड़की का इरादा। रेणु सुनती रही। फिर धीरे से बोली,
“तुम बचाना चाहते हो?”
अमन ने सिर हिलाया।
रेणु ने उसका हाथ पकड़ा। “सोच लो। दखल दोगे तो खुद फँस सकते हो। लेकिन अगर मन बना लिया है तो सोच-समझकर करना। अभी जल्दबाजी मत करो। रविवार अभी दूर है।”
फिर उसने अपना पल्लू हटाया। ब्लाउज के बटन खोले। स्तन बाहर आ गए।
“आज की शिक्षा जारी रखो। बाहर की बातें बाद में। पहले अपना शरीर और इच्छा समझो।”
उसने अमन का हाथ अपने स्तनों पर रखा। फिर उसकी पैंट खोली। दस इंच का लंड बाहर निकला। रेणु ने इसे अपने हाथ में लिया और धीरे-धीरे सहलाने लगी। इस बार वह और करीब झुकी।
“आज मुँह से भी सिखाऊँगी,” उसने फुसफुसाकर कहा। “देखो और महसूस करो।”
रेणु ने अपना मुँह अमन के लंड के सिर के पास ले जाकर हल्के से जीभ फेरी। फिर धीरे से होंठों में लिया। अमन की कमर झटक उठी। रेणु ने धीरे-धीरे आगे बढ़ाया—आधा लंड मुँह में लेते हुए। उसकी जीभ घूम रही थी। एक हाथ से जड़ को सहला रही थी।
अमन की साँसें तेज हो गईं। उसने रेणु के बाल पकड़ लिए। रेणु ने कुछ देर तक यही किया—कभी गहरा, कभी सिर्फ सिर चूसते हुए। फिर अचानक रुक गई।
“बस। आज यहीं तक।” उसने मुँह हटाया और लंड को छोड़ दिया। “तुम्हारा शरीर अब अच्छी तरह प्रतिक्रिया दे रहा है। कल और आगे बढ़ेंगे।”
रेणु ने ब्लाउज पहन लिया। दरवाजे तक जाकर बोली,
“राधा वाली बात सोचो। लेकिन याद रखना—हर किसी को नहीं बचाया जा सकता। और जो बचाना चाहो, उसके लिए खुद मजबूत बनो। शिक्षा जारी रहेगी।”
वह चली गई।
अमन अकेला रह गया। मुँह में अभी भी रेणु की गर्माहट का अहसास था। लंड तना हुआ था। लेकिन दिमाग में राधा का चेहरा और रविवार का प्लान घूम रहा था।
वह लेट गया। आँखें खुली थीं। पहली बार उसने महसूस किया कि सिर्फ देखने और सीखने से आगे कुछ करना होगा। रविवार आ रहा था। और वह तय नहीं कर पा रहा था कि ठीक क्या करेगा।

banana sex bahut mast story
Namaskar
Raj

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#58
Ab kya hi kaha ja sakta hai lag raha hai story incomplete hi rahne wali hai intezaar kafi lamba ho raha hai hum lo update ke liye request or intzar hi kar sakte hain.... Agar itni achchhi story aduri rahti hai to ye ek vidambana hi hogi....... Bhai ji please continue this awesome story
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#59
Pariwar ke raj to abhi bhi bache huye hai shayad next update
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#60
Bahut badiya

sasur bahu

[Image: 45502320-9da4-4800-8a57-3e45b4d68078.png]
Namaskar
Raj

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