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08-09-2026, 11:23 AM
(This post was last modified: 09-09-2026, 02:29 AM by Fuckuguy. Edited 2 times in total. Edited 2 times in total.)
“परिवार के गंदे राज़”
रसूलपुर।
बाहर से देखने पर यह साधारण सा गाँव लगता था—कच्ची सड़कें, पुराने पीपल, लहलहाते खेत और शाम को जलने वाली लालटेनें। लेकिन इंटरनेट पर यह गाँव किसी और नाम से बदनाम था। लोग फुसफुसाकर कहते थे कि यहाँ के बड़े परिवारों के अंदर ऐसी चीजें चलती हैं जो बाहर वाले कल्पना भी नहीं कर सकते। कोई सबूत नहीं था, लेकिन अफवाहें सालों से जिंदा थीं।
चौधरी परिवार उन्हीं में से एक था। हवेली पुरानी थी, दीवारें मोटी थीं, और अंदर जितना दिखाया जाता था उससे कहीं ज्यादा छिपा था।
परिवार का मुखिया था बाबा रामप्रसाद चौधरी। सत्तर साल के करीब, लेकिन शरीर अभी भी डरावना मजबूत। छह फुट का कद, चौड़े कंधे, सफेद बालों वाला मोटा सीना, बाँहें नसों वाली। उनका लंड परिवार की महिलाओं के बीच किंवदंती था—मोटा, लंबा, भारी। बाबा कम बोलते थे, लेकिन जब बोलते थे तो पूरा घर चुप हो जाता था। उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक रहती थी, जैसे वे हर चीज जानते हों।
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अमन के पिता थे सुरेश चौधरी। पैंतालीस साल के। कद छह फुट के करीब, शरीर मजबूत और मेहनत से कसा हुआ। खेतों में काम करने के कारण उनके हाथ कठोर थे, कंधे चौड़े, छाती घनी। उनका लंड बाबा जितना नहीं था, लेकिन मोटा और भारी था। सुरेश घर में कम बोलते थे। ज्यादातर समय खेत या बाहर रहते। पत्नी सुशीला के साथ उनके संबंध सामान्य लगते थे, लेकिन अमन कभी-कभी रात को उनके कमरे से दबी आवाजें सुन लेता था। सुरेश अमन को सख्ती से देखते थे। “मर्द बन, लड़का मत बन,” यही उनकी सबसे आम सलाह थी।
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चाचा रमेश चौधरी। बाबा के छोटे भाई। बयालीस साल के। शरीर थोड़ा मोटा, लेकिन ताकतवर। गंजा सिर, मोटी मूंछें, और भारी आवाज। उनका लंड परिवार में चर्चा का विषय रहता था—बहुत मोटा। रमेश की पहली पत्नी मर चुकी थी। अब उनकी दूसरी पत्नी सरला थी। रमेश घर में अक्सर हँसते-बोलते रहते, लेकिन उनकी निगाहें महिलाओं पर कभी-कभी बहुत देर तक ठहर जातीं।
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अमन की माँ सुशीला। पैंतालीस साल की। गेहुँआ रंग, भारी और लटकते स्तन जो साड़ी के नीचे हमेशा हिलते। स्तन इतने बड़े थे कि पल्लू कभी उन्हें पूरी तरह ढँक नहीं पाता। निप्पल गाढ़े भूरे और मोटे। कमर पर थोड़ी चर्बी, लेकिन गाँड गोल, मुलायम और बड़ी। जब वे झुकतीं तो दरार साफ झलक जाती। सुशीला अमन को बहुत लाड़ करतीं। “मेरा छोटा राजकुमार,” यही कहतीं।
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बड़ी बहन रेणु। बाईस साल। गोरी, लंबे काले बाल, सख्त और ऊपर उठी हुई छाती, पतली कमर, चौड़े कूल्हे। उसकी चूत के बाल घने और काले थे। रेणु शांत रहती, लेकिन उसकी आँखों में एक तेज चमक थी। वह परिवार की सबसे होशियार औरत लगती थी। अमन को वह हमेशा कुछ ज्यादा ही ध्यान से देखती।
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दूसरी बहन कविता। बीस साल। शरीर भरा हुआ, बड़े नरम स्तन, मोटी गाँड। चुप रहने वाली, लेकिन निगाहें तेज।
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चाची कमला। रमेश की पहली पत्नी की बहन, अड़तीस साल की, विधवा। शरीर अभी भी भरा हुआ। बड़े ढीले स्तन, मोटी गाँड। वह अमन को “बेटा” कहतीं, लेकिन उसका हाथ कभी-कभी उसकी पीठ पर जरूरत से ज्यादा देर रुक जाता।
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चचेरी बहन मीना। उन्नीस साल। पतली कमर, सख्त स्तन, गोल कूल्हे। मुस्कान में चंचलता थी।
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परिवार में और भी थे—रमेश और सरला का बेटा गौरव, बाईस साल का। शरीर मजबूत, कद लंबा, लंड मोटा। गौरव शहर में कॉलेज जाता था, लेकिन छुट्टियों में घर रहता। अमन से वह थोड़ी ऊँचाई से बात करता था। “तू अभी बच्चा है,” यही कहता।
अमन खुद अठारह साल का था। बारहवीं कक्षा में। कद पाँच फुट सात इंच, शरीर दुबला-पतला, कंधे पतले, छाती पर बालों की शुरुआत मात्र। उसका लंड आराम में साढ़े चार इंच, खड़ा होने पर सात इंच—अभी भी परिवार के पुरुषों के सामने छोटा लगता। वह भोला था। कॉलेज जाता, दोस्तों के साथ क्रिकेट खेलता, घर आकर पढ़ाई करता। सेक्स के बारे में सिर्फ अस्पष्ट सी बातें सुनता। घर की औरतों के शरीर को देखकर शर्म महसूस करता, इच्छा नहीं।
उसकी जिंदगी बहुत सीधी थी। सुबह उठना, नहाना, कॉलेज जाना, शाम को घर लौटना, बाबा को प्रणाम करना, माँ के हाथ का खाना खाना, और सो जाना। दुनिया छोटी थी—कॉलेज, मैदान, हवेली।
एक मंगलवार की बात है। कॉलेज की छुट्टी जल्दी हो गई। अमन साइकिल लेकर घर आया। आँगन खाली था। बाबा और पिता खेत गए हुए थे। चाचा रमेश बाजार गए थे। गौरव अपने कमरे में था। अमन ने किताबें रखीं और पानी पीने रसोई की तरफ बढ़ा। तभी हवेली के पिछले हिस्से से आवाज आई—कोठरी की तरफ से।
औरत की दबी सिसकारी और मर्द की भारी साँसें।
अमन रुक गया। पैर अपने आप बढ़े। कोठरी का दरवाजा अधखुला था। उसने साँस रोककर झाँका।
अंदर उसकी माँ सुशीला थीं। साड़ी कमर तक उठी हुई। भारी स्तन बाहर, निप्पल सख्त। उनके पीछे एक मर्द खड़ा था—गाँव का ही कोई आदमी, जिसे अमन कभी-कभी मजदूरों के साथ देखता था। मर्द की पैंट खुली थी। उसका मोटा लंड सुशीला की चूत में जोर-जोर से अंदर-बाहर हो रहा था। सुशीला के हाथ दीवार पर टिके थे। गाँड हिल रही थी। मुँह से आवाजें निकल रही थीं—“जोर से… हाँ… और अंदर…”
अमन की साँस अटक गई। शरीर काँपने लगा। उसका लंड अपनी इच्छा के खिलाफ सख्त हो गया। वह भागना चाहता था, लेकिन हिल नहीं पाया। मर्द ने कमर पकड़कर और जोर लगाया। सुशीला की सिसकारी तेज हो गई।
अमन ने आँखें मूंद लीं और काँपते हुए अपने कमरे में पहुँच गया। दरवाजा बंद करके बिस्तर पर गिर पड़ा। आँखों के सामने माँ के स्तन, उनकी हिलती गाँड और उस मर्द का लंड घूम रहा था। शर्म, डर, और एक अजीब सी गर्मी उसके शरीर में फैल रही थी।
रात भर वह सो नहीं पाया।
सुबह जब माँ आईं और सामान्य स्वर में बोलीं, “अमन उठ जा… कॉलेज का समय हो गया,” तो अमन उनकी आँखों में नहीं देख पाया। सुशीला ने उसके बाल सहलाए। उंगलियाँ गर्दन तक गईं। अमन का शरीर सिहर उठा।
उस दिन कॉलेज में वह बिल्कुल चुप रहा। दोस्तों ने पूछा तो टाल गया। मैदान में खेलते समय भी उसका ध्यान नहीं था।
शाम को घर लौटा तो रेणु आँगन में बैठी थी। उसने अमन को देखते ही सिर उठाया। आँखों में वह तेज चमक थी।
“तुमने कुछ देखा है न?” उसने बहुत धीमी आवाज में पूछा।
अमन का चेहरा सफेद पड़ गया। रेणु ने और कुछ नहीं कहा। बस इतना बोली, “डरो मत। इस घर में बहुत कुछ होता है। तुम अभी भोले हो। लेकिन भोलापन यहाँ नहीं चलेगा।”
उसने अमन के कंधे पर हाथ रखा। उंगलियाँ थोड़ी देर दबकर रही।
“मैं तुम्हें सिखाऊँगी। धीरे-धीरे। दिमाग से, शरीर से… हर तरह से। बस सब्र रखना।”
रेणु उठकर चली गई।
अमन वहीं खड़ा रह गया। उसके मन में माँ का दृश्य और रेणु के शब्द एक साथ घूम रहे थे। पहली बार उसने महसूस किया कि हवेली की दीवारें जितनी मोटी दिखती हैं, उतनी मजबूत नहीं हैं। और उसकी भोली जिंदगी अब खत्म होने वाली है।
बाप खेत से लौटे तो अमन ने उनकी तरफ देखा। सुरेश सामान्य लग रहे थे। जैसे कुछ पता ही न हो। चाचा रमेश हँसते हुए आँगन में बैठे थे। गौरव अपने कमरे से निकला और अमन को देखकर बोला, “क्या हुआ छोरे, चेहरा उतर गया है?”
अमन ने कुछ नहीं कहा।
रात गहरी होती गई। हवेली के अंदर कई साँसें चल रही थीं। और अमन पहली बार समझ रहा था कि परिवार के गंदे राज़ अब उसे भी अपनी चपेट में लेने वाले हैं।
आँखें बंद करता तो माँ का ही दृश्य आ जाता—साड़ी कमर तक उठी हुई, भारी स्तन हवा में झूलते हुए, निप्पल सख्त, और उस मजदूर का मोटा लंड उनकी चूत में जोर-जोर से धंसता हुआ। सुशीला की सिसकियाँ कानों में गूँजतीं। अमन का अपना लंड बार-बार सख्त हो जाता। वह शर्म से काँपता, खुद को गालियाँ देता, फिर भी शरीर नहीं मानता। तकिया से मुँह दबाए वह लेटा रहा जब तक कि आसमान में हल्की रोशनी नहीं फैल गई।
सुबह पाँच बजे बाबा के कमरे से आवाज आई। रामप्रसाद रोज़ की तरह उठ चुके थे। अमन ने भी बिस्तर छोड़ दिया। नहाने गया तो आईने में अपना चेहरा देखा—आँखें सूजी हुई, चेहरा थका हुआ। लंड अभी भी हल्का सख्त था। उसने ठंडे पानी से नहाया, लेकिन गर्मी अंदर से नहीं गई।
नाश्ते के समय पूरा परिवार आँगन में बैठा था। बाबा चारपाई पर बैठे तंबाकू लगा रहे थे। पिता सुरेश चुपचाप चाय पी रहे थे। उनके मजबूत हाथ में गिलास छोटा लग रहा था। चाचा रमेश हँसते हुए गौरव से कुछ बात कर रहे थे। गौरव ने अमन को देखते ही कहा, “अरे छोरे, रात भर जागा क्या? आँखें लाल हो रखी हैं।”
अमन ने सिर झुका लिया। माँ सुशीला रसोई से निकलकर आईं। साड़ी का पल्लू ठीक से डाला हुआ था, लेकिन स्तनों का भारीपन छुप नहीं पा रहा था। उन्होंने अमन के सामने थाली रखी और उसके बाल सहलाए। उंगलियाँ गर्दन तक गईं।
“आज मन नहीं है?” सुशीला ने पूछा। आवाज बिल्कुल सामान्य थी। जैसे कल कोठरी में कुछ हुआ ही न हो।
अमन ने जवाब नहीं दिया। रेणु उसके ठीक सामने बैठी थी। उसने धीरे से सिर उठाया और अमन की आँखों में देखा। कोई मुस्कान नहीं, सिर्फ एक शांत समझ। जैसे कह रही हो—मैं जानती हूँ।
पिता सुरेश ने अचानक बात की। “अमन, कॉलेज से वापस आकर खेत में आजा। कुछ काम है।” आवाज सख्त थी। अमन ने सिर हिलाया। सुरेश की निगाह कुछ पल के लिए उस पर टिकी रही—जैसे वे कुछ भाँप रहे हों। फिर उन्होंने चाय खत्म की और उठ गए।
कॉलेज में अमन बिल्कुल अलग था। दोस्तों के बीच बैठकर भी वह चुप रहा। जब वे लड़कियों की बातें करने लगे—कौन कितनी गरम है, किसकी क्या अदा है—तो अमन पहले की तरह शर्म से दूर नहीं हुआ। वह चुपचाप सुनता रहा। दिमाग में रेणु के शब्द घूम रहे थे—“भोलापन यहाँ नहीं चलेगा।” पहली बार उसने महसूस किया कि दोस्तों की बातें अब उसे अजीब लग रही हैं। वे सिर्फ कल्पना कर रहे थे। उसने तो अपनी माँ को असली हालत में देख लिया था।
छुट्टी में क्रिकेट के मैदान में वह विकेट के पास खड़ा रहा। गेंद आई तो उसने बल्ला चलाया, लेकिन दिमाग कहीं और था। बार-बार कोठरी का दृश्य आँखों के सामने आ जाता। माँ की गाँड कैसे हिल रही थी, मर्द के हाथ कैसे उनकी कमर पर दबे थे… अमन का लंड पैंट में हल्का तन गया। वह झेंप गया और मैदान से अलग हो गया।
शाम को कॉलेज से लौटा तो सीधे खेत की तरफ चला गया। पिता सुरेश वहाँ पहले से मौजूद थे। शरीर पर पसीना चमक रहा था। कमीज के बटन खुले हुए थे, छाती के घने बाल और मजबूत मांसपेशियाँ साफ दिख रही थीं। सुरेश ने अमन को देखते ही कहा, “इधर आ। यह रस्सी पकड़।”
अमन ने रस्सी पकड़ी। दोनों पिता-पुत्र चुपचाप काम करने लगे। कुछ देर बाद सुरेश ने अचानक पूछा, “रात को नींद नहीं आई तुझे?”
अमन का हाथ रुक गया। “नहीं… यानी… थोड़ी देर जागा था।”
सुरेश ने उसकी तरफ देखा। आँखों में वही सख्ती थी। “मर्द को रात की नींद पूरी रखनी चाहिए। कमजोरी दिखेगी तो घर वाले भी कमजोर समझेंगे।” उन्होंने फिर से काम शुरू कर दिया। “और हाँ, घर की औरतों को ज्यादा घूर मत। आँखें झुकाकर रह। समझा?”
अमन ने सिर हिलाया। पिता की बात सुनकर उसके मन में और उलझन बढ़ गई। क्या सुरेश को माँ के बारे में कुछ पता है? या वे सिर्फ सामान्य सलाह दे रहे हैं? अमन तय नहीं कर पा रहा था।
घर लौटे तो शाम के खाने का समय हो चुका था। चाचा रमेश आँगन में बैठे हुए थे। उनकी मोटी मूंछों पर मुस्कान थी। उन्होंने अमन को देखकर कहा, “अर्रे भतीजा, आज चेहरा उतरने का क्या कारण है? कोई कॉलेज वाली याद आ रही है क्या?” फिर जोर से हँसे। गौरव भी साथ में हँस दिया। अमन ने कुछ नहीं कहा।
रात का खाना खत्म होने के बाद सब अपने-अपने कमरों में चले गए। अमन अपने कमरे में लेटा तो दिमाग फिर से उलझ गया। तभी दरवाजे पर हल्की दस्तक हुई। रेणु अंदर आई। हाथ में छोटी लालटेन थी। उसने दरवाजा बंद किया।
“सोया नहीं?” उसने पूछा।
अमन उठकर बैठ गया। रेणु बिस्तर के किनारे आकर बैठ गई। कुछ पल चुप रही, फिर बोली, “तुमने माँ को देखा। वह मजदूर… उसका नाम भोलू है। खेतों में कभी-कभी आता है। माँ उससे सालों से मिलती है।”
अमन की आँखें फटी की फटी रह गईं। “सालों से…?”
रेणु ने सिर हिलाया। “हाँ। बाबा जानते हैं। पिता भी जानते हैं। सब जानते हैं। बस कोई बोलता नहीं।” उसने अमन की तरफ देखा। “यह घर ऐसा ही है। यहाँ शरीर की भूख को पाप नहीं माना जाता। बस छुपाकर रखा जाता है। बाहर वाले को पता नहीं चलना चाहिए।”
अमन का गला सूख गया। “पिता जानते हैं… और फिर भी?”
“पिता के भी अपने राज़ हैं,” रेणु ने शांत स्वर में कहा। “चाचा रमेश के भी। गौरव के भी। हर मर्द के, हर औरत के। तुम अभी सिर्फ किनारे पर खड़े हो। अंदर आने के लिए दिमाग तेज करना होगा।”
उसने अमन का हाथ पकड़ा। उंगलियाँ उसकी हथेली पर धीरे से फिरीं। “कल रात तुम्हारा शरीर प्रतिक्रिया दे रहा था। शर्म मत करना। शरीर सच बोलता है। दिमाग झूठ बोलता है।”
अमन चुप रहा। रेणु ने अपना हाथ छुड़ाया और उठ खड़ी हुई।
“आज बस इतना ही। सो जाओ। कल रात फिर आऊँगी। तब तुम्हें और बताऊँगी—इस घर के मर्दों के बारे में, औरतों के बारे में… और अपने बारे में भी।”
वह दरवाजे तक गई, फिर मुड़ी। “एक बात याद रखना अमन। इस परिवार में जो भोला रहता है, वह सिर्फ देखा जाता है। जो समझदार बनता है, वह खुद देखने लगता है।”
रेणु चली गई।
अमन अकेला रह गया। कमरे में अँधेरा था। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। पहली बार उसने महसूस किया कि उसका बाप, चाचा, बाबा—सब इस गंदे चक्र के हिस्से हैं। माँ अकेली नहीं थी। और रेणु… रेणु तो जानबूझकर उसे इस चक्र के अंदर खींच रही थी।
उसने खिड़की से बाहर देखा। हवेली के पिछले हिस्से में कोठरी का दरवाजा बंद था। लेकिन अमन जानता था कि अंदर क्या हो चुका था। और अब वह यह भी समझने लगा था कि आगे और बहुत कुछ होने वाला है।
उसकी भोली दुनिया दरक रही थी। टुकड़े-टुकड़े होकर गिर रही थी। और रेणु उन टुकड़ों को अपने हाथों से उठा-उठाकर उसे एक नई तस्वीर दिखा रही थी—गंदी, खतरनाक, लेकिन सच्ची।
रात गहरी होती गई। अमन लेटा रहा। आँखें खुली थीं। दिमाग में एक नया सवाल घूम रहा था—पिता के अपने राज़ क्या हैं?
और सबसे बड़ा सवाल—रेणु खुद इस खेल में कितनी गहराई तक है?
Fuckuguy
albertprince547;
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अमन बिस्तर पर लेटा हुआ था, लेकिन नींद दूर थी। पिता की बातें, रेणु के शब्द और माँ का दृश्य सब एक साथ उसके दिमाग में घूम रहे थे। “इस घर में जो भोला रहता है, वह सिर्फ देखा जाता है।” रेणु की यह बात उसके कानों में बार-बार गूँज रही थी। पहली बार उसने महसूस किया कि वह अब सिर्फ कॉलेज का लड़का नहीं रह गया। हवेली उसे अपनी तरफ खींच रही थी।
दरवाजे पर हल्की दस्तक हुई। रेणु अंदर आई। लालटेन की रोशनी बहुत कम थी। उसने दरवाजा बंद किया और सिटकिनी लगा दी। बिस्तर के किनारे बैठकर कुछ पल तक अमन को देखती रही।
“सोया नहीं?” उसने धीरे से पूछा।
अमन ने सिर हिलाया।
रेणु ने लालटेन एक तरफ रख दी। “आज तुम्हें थोड़ा और बताऊँगी। सुनो और समझो। सवाल बाद में पूछना।”
अमन चुपचाप बैठ गया। रेणु की आवाज शांत लेकिन साफ थी।
“बाबा रामप्रसाद इस घर के असली मालिक हैं। शरीर से कमजोर होते जा रहे हैं, लेकिन दिमाग अभी भी तेज है। वे सब कुछ जानते हैं। माँ का भोलू से संबंध… वे सालों से जानते हैं। रोकते नहीं क्योंकि उन्हें लगता है कि घर की औरतों की भूख को दबाना गलत है। बस बाहर पता नहीं चलना चाहिए।”
अमन की आँखें थोड़ी चौड़ी हो गईं। रेणु ने आगे कहा,
“पिता सुरेश… वे सख्त दिखते हैं। खेत-खलिहान, मर्दाना बातें। लेकिन उनकी भी कमजोरी है। गाँव की एक औरत है, नाम सुनोगे तो पहचान लोगे। वे उससे मिलते हैं। कभी-कभी रात को निकल जाते हैं। माँ जानती हैं। दोनों एक-दूसरे के राज़ जानते हैं, इसलिए चुप रहते हैं।”
अमन का गला सूख गया। पिता की सख्त छवि उसके मन में हिलने लगी।
रेणु ने थोड़ा आगे बढ़कर कहा, “चाचा रमेश सबसे खुले हैं। वे हँसते-बोलते हैं, लेकिन उनकी निगाहें घर की औरतों पर बहुत घूमती हैं। गौरव भी अब समझने लगा है। शहर से आता है तो अपनी कहानियाँ लेकर आता है। तुम अभी छोटे हो, इसलिए वे तुम्हें बच्चा समझते हैं। लेकिन जल्दी ही वे भी तुम्हें देखने लगेंगे—कि तुम कितना समझते हो।”
अमन ने धीरे से पूछा, “तुम… तुम कैसे इतना जानती हो?”
रेणु की आँखों में हल्की चमक आई। “क्योंकि मैं देखती हूँ। सुनती हूँ। और कभी-कभी… शामिल भी होती हूँ।” उसने बात को वहीं रोक दिया। “अभी तुम्हें इतना जानना काफी है। बाकी धीरे-धीरे।”
वह थोड़ी देर चुप रही। फिर बोली, “अब तुम्हारी बारी है। आज तुम्हें अपना शरीर स्वीकार करना होगा। शर्म छोड़ो।”
अमन सहम गया। रेणु ने उसका हाथ पकड़ा।
“पैंट खोलो। खुद से। मैं देखूँगी। छूऊँगी नहीं… अभी नहीं।”
अमन के हाथ काँप रहे थे। उसने नाड़ा खोला। पैंट थोड़ी नीचे सरकी। उसका लंड आधा सख्त था। रेणु ने ध्यान से देखा। कोई हँसी नहीं, कोई मजाक नहीं। सिर्फ निरीक्षण।
“अभी भी किशोरों जैसा है,” उसने साधारण स्वर में कहा। “लेकिन नसें साफ हैं। संभावना है। अब इसे अपने हाथ में लो। धीरे-धीरे सहलाओ। जल्दी नहीं। महसूस करो कि कहाँ ज्यादा अच्छा लगता है।”
अमन का चेहरा जल रहा था। लेकिन उसने वैसा ही किया। उंगलियाँ अपने लंड पर फिरीं। रेणु बैठी देखती रही। उसकी साँसें शांत थीं, लेकिन आँखों में गणना साफ थी।
कुछ देर बाद रेणु ने कहा, “बस करो।”
अमन ने हाथ रोक लिया। लंड अब पूरी तरह तना हुआ था। रेणु ने पैंट ठीक करने का इशारा किया।
“आज तुमने पहली बार किसी के सामने खुद को स्वीकार किया। यह छोटी बात नहीं। कल से तुम आँखें खोलकर घर देखना। माँ की चाल, पिता की निगाह, चाचा की हँसी, गौरव की बातें… सब नोट करना। जो दिखाई दे, मुझे बताना।”
वह उठ खड़ी हुई। दरवाजे तक जाकर रुकी।
“एक और बात। कविता तुम्हें देखती है। मीना भी। कमला चाची भी। तुम्हारा शरीर अभी अधूरा है, लेकिन वे जानती हैं कि जल्दी बदलने वाला है। तुम तैयार रहो।”
रेणु चली गई।
अमन अकेला रह गया। कमरे में उसकी उत्तेजना की हल्की गंध फैली हुई थी। उसने पैंट सही की और लेट गया। दिल तेज धड़क रहा था। पहली बार उसने महसूस किया कि रेणु सिर्फ बता नहीं रही। वह उसे गढ़ रही है—दिमाग से, शरीर की समझ से, और परिवार के गंदे राज़ों की गहराई में धकेलकर।
अगली सुबह नाश्ते के समय अमन ने सबको नए नजरिए से देखा।
बाबा तंबाकू लगाते समय उसकी तरफ एक बार देखकर मुस्कुरा दिए—जैसी मुस्कान पहले कभी नहीं देखी थी। पिता सुरेश सामान्य लग रहे थे, लेकिन जब माँ उनके पास चाय लेकर गईं तो दोनों की निगाहें एक पल के लिए मिलीं और फिर हट गईं। चाचा रमेश हँसते हुए गौरव से बात कर रहे थे। गौरव ने अमन को देखकर कहा, “आज चेहरा थोड़ा ठीक लग रहा है छोरे।”
माँ ने अमन के बाल सहलाए। उंगलियाँ गर्दन पर थोड़ी देर रुक गईं। अमन ने इस बार उनकी आँखों में देखा। सुशीला मुस्कुरा दीं, लेकिन मुस्कान में एक अजीब सा आराम था।
रेणु चुपचाप बैठी थी। उसने अमन की तरफ देखा और बहुत हल्के से सिर हिलाया। जैसे कह रही हो—अच्छा शुरू हुआ।
कॉलेज जाते समय अमन का मन पहले से अलग था। दोस्तों की बातें अब उसे سطही लग रही थीं। मैदान में खेलते समय भी वह बीच-बीच में रुककर सोचता—घर में अभी क्या हो रहा होगा? कोठरी में कोई है क्या? पिता कहाँ हैं?
शाम को घर लौटा तो उसने ध्यान से सबको देखा। कविता रसोई में थी। उसने अमन को देखकर एक पल के लिए निगाहें मिलाईं और फिर झुका लीं। मीना आँगन में खड़ी थी। उसने मुस्कुराकर कहा, “आज जल्दी आ गए?” आवाज में हल्की चंचलता थी।
रात का इंतजार फिर शुरू हो गया।
अमन अब समझ रहा था कि उसकी शिक्षा सिर्फ शब्दों की नहीं है। रेणु उसे आँखें खोलकर देखना सिखा रही है। शरीर की प्रतिक्रिया स्वीकार करना सिखा रही है। और सबसे महत्वपूर्ण—परिवार के गंदे राज़ों को बिना डरे देखना सिखा रही है।
वह अभी भी भोला था। लेकिन भोलापन अब तेजी से छूट रहा था। उसकी जगह एक नई जिज्ञासा ले रही थी—गंदी, खतरनाक और रोकने वाली नहीं।
रात गहरी हुई। हवेली के अंदर कई साँसें चल रही थीं। और अमन पहली बार सोच रहा था—अगली बार रेणु क्या सिखाएगी?
भाग 3 समाप्त।
इस भाग में अमन का मानसिक विकास आगे बढ़ा है। रेणु ने परिवार के पुरुषों के राज़ों का खुलासा किया, अमन को अपना शरीर स्वीकार करने का अभ्यास कराया, और उसे घर को नई नजर से देखने का निर्देश दिया। slow burn बनाए रखा गया है—कोई पूर्ण शारीरिक संबंध नहीं, केवल निर्देश, अवलोकन और आंतरिक बदलाव।
सुबह का समय था। अमन ने आज कॉलेज जाने से पहले घर को पहले से ज्यादा ध्यान से देखा।
बाबा रामप्रसाद चारपाई पर बैठे तंबाकू लगा रहे थे। उनकी आँखें अमन पर एक पल के लिए टिकीं। कोई सख्ती नहीं थी, बल्कि एक हल्की सी स्वीकृति जैसी चमक थी। पिता सुरेश खेत जाने की तैयारी कर रहे थे। कमीज के बटन खुले हुए थे, छाती के घने बाल और मजबूत शरीर साफ दिख रहा था। जब माँ सुशीला उनके पास चाय लेकर गईं तो दोनों की निगाहें मिलीं। सुशीला ने प्याला देते समय उंगलियाँ सुरेश के हाथ पर थोड़ी देर टिकाईं। सुरेश ने कुछ नहीं कहा, बस सिर हिला दिया। अमन ने यह छोटा सा स्पर्श नोट कर लिया।
चाचा रमेश आँगन में खड़े हँस रहे थे। गौरव उनके पास था। दोनों की बातचीत में अमन का नाम आया। गौरव ने कहा, “अमन अब थोड़ा समझने लगा है लगता है।” रमेश जोर से हँसे और बोले, “समय आने पर सब समझ जाते हैं।” अमन ने अनसुना किया, लेकिन दिल तेज धड़कने लगा।
नाश्ते के समय रेणु चुपचाप बैठी थी। उसने अमन की तरफ देखा और बहुत हल्के से आँखें झपकाईं। जैसे याद दिला रही हो—देखते रहो।
कॉलेज में अमन पहले से ज्यादा शांत था। दोस्तों की गंदी बातें अब उसे बचकानी लग रही थीं। मैदान में खेलते समय भी उसका ध्यान घर की तरफ भटक जाता। सोचता—अभी कोठरी में कोई है क्या? माँ कहाँ हैं? पिता सच में खेत गए हैं या कहीं और?
शाम को घर लौटा तो आँगन खाली था। वह धीरे से अंदर घुसा। रसोई से माँ की आवाज आ रही थी। कविता आँगन के दूसरे कोने में कपड़े सुखा रही थी। साड़ी का पल्लू थोड़ा खिसका हुआ था। उसके बड़े स्तनों का भार और गाँड का गोल आकार साफ झलक रहा था। कविता ने अमन को देख लिया। निगाहें एक पल के लिए मिलीं। कविता ने जल्दी से पल्लू ठीक किया, लेकिन उसके चेहरे पर हल्की सी लाली थी। अमन ने नजरें फेर लीं, लेकिन दृश्य दिमाग में रह गया।
रात का खाना खत्म होने के बाद सब बिखर गए। अमन अपने कमरे में गया। दिमाग में आज के छोटे-छोटे संकेत घूम रहे थे—पिता और माँ का स्पर्श, चाचा की हँसी, कविता की निगाह। तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।
रेणु अंदर आई। लालटेन कम रोशनी में थी। उसने दरवाजा बंद किया।
“आज क्या देखा?” उसने सीधे पूछा।
अमन ने बताया—पिता और माँ का छोटा स्पर्श, चाचा-गौरव की बात, कविता की निगाह। रेणु सुनती रही। फिर सिर हिलाया।
“अच्छा। आँखें खुल रही हैं। अब आगे बढ़ो।” वह बिस्तर के किनारे बैठ गई। “आज तुम्हें एक नई बात बताऊँगी। इस घर में शरीर सिर्फ सुख के लिए नहीं है। कभी सत्ता के लिए, कभी समझौते के लिए, कभी चुप रहने के लिए इस्तेमाल होता है। माँ भोलू के पास इसलिए जाती हैं क्योंकि पिता भी बाहर जाते हैं। दोनों एक-दूसरे को आजादी देते हैं। बाबा इसे जानते हुए भी रोकते नहीं क्योंकि उन्हें घर का संतुलन चाहिए।”
अमन चुपचाप सुन रहा था। रेणु ने आगे कहा,
“तुम्हारा शरीर अभी बदल रहा है। इच्छाएँ तेज होंगी। शर्म छोड़नी होगी। कल रात तुमने खुद को छुआ। आज थोड़ा और आगे बढ़ो।”
उसने अमन का हाथ पकड़ा और अपनी जाँघ पर रख दिया। साड़ी के ऊपर से ही। जाँघ गरम और मुलायम थी। अमन का हाथ काँप गया। रेणु ने उसे हटाया नहीं।
“महसूस करो। यह सिर्फ बहन की जाँघ नहीं है। यह शरीर है। गर्मी है। तुम्हारा लंड अभी प्रतिक्रिया दे रहा होगा। स्वीकार करो।”
अमन की साँसें तेज हो गईं। पैंट में उसका लंड सख्त होने लगा। रेणु ने उसका हाथ अपनी जाँघ पर और थोड़ा ऊपर सरकाया—कूल्हे के पास तक। फिर रोक दिया।
“बस। आज सिर्फ इतना। कल और आगे बढ़ेंगे।” उसने अमन का हाथ छोड़ दिया। “अब बताओ, तुम्हें कैसा लग रहा है?”
अमन ने गले की सूखी आवाज में कहा, “गरमी… और शर्म।”
रेणु हल्के से मुस्कुराई। “शर्म धीरे-धीरे कम होगी। गरमी बढ़ेगी। यही शिक्षा है।”
वह उठ खड़ी हुई। दरवाजे तक जाकर बोली, “रात को देर से सोना। मैं फिर आ सकती हूँ। और हाँ… कल कविता पर नजर रखना। वह तुम्हें देख रही है। मीना भी। वे दोनों अभी सिर्फ देखती हैं। लेकिन जल्दी कुछ और कर सकती हैं।”
रेणु चली गई।
अमन अकेला रह गया। हाथ पर अभी भी रेणु की जाँघ की गर्माहट महसूस हो रही थी। लंड पूरी तरह तना हुआ था। उसने इस बार खुद को छुआ—धीरे-धीरे, रेणु की बातें याद करते हुए। पहली बार उसने महसूस किया कि शर्म के नीचे इच्छा साफ दिख रही है।
उसने खिड़की से बाहर देखा। हवेली के पिछले हिस्से में एक कमरे की रोशनी जल रही थी। पिता का कमरा। माँ वहाँ थीं या नहीं, अमन नहीं जानता था। लेकिन अब वह सवाल पूछने लगा था।
रात गहरी होती गई। अमन लेटा रहा। दिमाग में रेणु की जाँघ, कविता की निगाह, पिता-माँ का स्पर्श और बाबा की चुप स्वीकृति सब घूम रहे थे।
वह अब सिर्फ भोला लड़का नहीं रह गया था। आँखें खुल रही थीं। इच्छाएँ जाग रही थीं। और रेणु उसे कदम-कदम पर इस गंदे राज़ की गहराई में ले जा रही थी।
अगली सुबह क्या होगा, अमन नहीं जानता था। लेकिन वह जानता था कि अब पीछे नहीं लौट सकता।
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अगली सुबह अमन पहले से ज्यादा सतर्क था।
नाश्ते के समय उसने सबकी हरकतें नोट कीं। बाबा रामप्रसाद तंबाकू लगाते समय उसकी तरफ एक लंबी निगाह डालकर मुस्कुरा दिए। पिता सुरेश सामान्य लग रहे थे, लेकिन जब माँ सुशीला उनके पीछे से गुजरीं तो सुरेश की आँखें उनकी गाँड पर एक पल के लिए रुक गईं। सुशीला ने पीछे मुड़कर देखा और हल्के से मुस्कुरा दीं। अमन ने यह छोटा सा आदान-प्रदान पकड़ लिया। चाचा रमेश गौरव के साथ बैठे हँस रहे थे। गौरव ने अमन को देखकर कहा, “आज तो तुम बिल्कुल मर्दों वाली निगाह से देख रहे हो छोरे।” रमेश जोर से हँसे। अमन ने जवाब नहीं दिया, बस सिर झुका लिया।
कॉलेज में उसका मन घर पर ही अटका रहा। दोस्तों ने जब गंदी बातें कीं तो अमन ने पहली बार थोड़ा हिस्सा लिया। एक वाक्य बोला—बहुत साधारण सा। दोस्त हैरान रह गए। अमन खुद भी हैरान था। रेणु की शिक्षा उसके अंदर काम कर रही थी। शर्म कम हो रही थी, जगह जिज्ञासा ले रही थी।
शाम को घर लौटा तो आँगन में मीना खड़ी थी। उसने अमन को देखकर मुस्कुराया और पास आ गई।
“आज चेहरा थोड़ा अलग लग रहा है,” मीना ने कहा। आवाज में हल्की चंचलता थी। “कुछ सोच रहे हो क्या?”
अमन ने सिर हिलाया। मीना और करीब आ गई। उसका शरीर अमन के शरीर से हल्का सा छू गया। स्तनों का नरम स्पर्श साड़ी के ऊपर से महसूस हुआ। मीना हँसकर पीछे हट गई।
“बस ऐसे ही पूछा,” उसने कहा और चली गई।
अमन की साँसें तेज हो गईं। लंड हल्का तन गया। उसने जल्दी से अपना कमरा पकड़ा।
रात का खाना खत्म होने के बाद रेणु फिर आई। लालटेन कम रोशनी में थी। दरवाजा बंद करके वह बिस्तर के किनारे बैठ गई।
“आज क्या देखा?” उसने पूछा।
अमन ने बताया—पिता की निगाह, माँ की मुस्कान, गौरव की बात, मीना का स्पर्श। रेणु सुनती रही। फिर सिर हिलाया।
“अच्छा। मीना जल्दी शुरू कर देती है। वह चंचल है। कविता ज्यादा चुप रहती है, लेकिन उसकी भूख कम नहीं। कमला चाची तो और अनुभवी हैं।” रेणु ने अमन का हाथ पकड़ा। “आज तुम्हें एक नई चीज सिखाऊँगी। अपनी इच्छा को नाम दो। उसे छुपाओ मत।”
अमन चुप रहा। रेणु ने उसका हाथ अपनी जाँघ पर रखा—इस बार साड़ी थोड़ी ऊपर सरकाकर। नंगी जाँघ की गर्माहट अमन की हथेली में फैल गई।
“बोलो,” रेणु ने धीरे से कहा। “तुम्हें क्या महसूस हो रहा है?”
अमन का गला सूखा था। “गरमी… और… खड़ा हो रहा है।”
रेणु ने सिर हिलाया। “सही। अब और साफ बोलो। लंड खड़ा हो रहा है। कहो।”
अमन ने हिचकिचाते हुए कहा, “लंड… खड़ा हो रहा है।”
रेणु की आँखों में संतुष्टि थी। “अच्छा। अब इसे अपने हाथ में लो। मेरे सामने। धीरे-धीरे।”
अमन ने पैंट का नाड़ा खोला। लंड बाहर आया—सख्त, नसें उभरी हुई। उसने उसे पकड़ा। रेणु देखती रही।
“सहलाओ। सोचो कि यह किसी और का हाथ है। माँ का, मेरा, कविता का… जो मन करे। दिमाग को आजाद छोड़ो।”
अमन ने आँखें बंद कर लीं। हाथ चलने लगा। दिमाग में माँ का दृश्य आ गया—उनकी हिलती गाँड, सिसकियाँ। फिर रेणु की जाँघ, मीना का स्पर्श। लंड और सख्त हो गया। रेणु की आवाज उसके कानों में पड़ी,
“तेज मत करो। धीरे। महसूस करो। यह तुम्हारी शिक्षा है। शरीर को जानो, इच्छा को स्वीकार करो।”
कुछ देर बाद रेणु ने कहा, “बस करो।”
अमन ने हाथ रोक लिया। साँसें तेज थीं। रेणु ने पैंट ठीक करने का इशारा किया।
“आज तुमने इच्छा को नाम दिया। यह बड़ी बात है। कल से तुम और साहस बढ़ाओ। घर में घूमो। गलियारों में कान लगाओ। जो आवाज आए, नोट करो। जो निगाह मिले, याद रखो।”
वह उठ खड़ी हुई। दरवाजे तक जाकर रुकी।
“एक बात और। बाबा तुम्हें देख रहे हैं। वे जानते हैं कि तुम बदल रहे हो। पिता भी भाँप रहे हैं। घबराओ मत। बस अपनी जगह बनाओ। भोलापन अब छोड़ दो पूरी तरह।”
रेणु चली गई।
अमन अकेला रह गया। हाथ पर जाँघ की गर्माहट और लंड की सख्ती दोनों बची हुई थीं। उसने खिड़की से बाहर देखा। हवेली के एक कमरे में रोशनी जल रही थी। धीमी आवाजें आ रही थीं—किसी औरत की सिसकारी जैसी। अमन ने साँस रोक ली। आवाज साफ नहीं थी, लेकिन पर्याप्त थी। दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।
वह दरवाजे तक गया, फिर रुक गया। रेणु की बात याद आई—“कान लगाओ।” उसने हिम्मत की और धीरे से गलियारे की तरफ बढ़ा। आवाज पिता के कमरे से आ रही थी। दरवाजा बंद था। अंदर से सुशीला की दबी हुई आवाज आ रही थी और सुरेश की भारी साँसें। अमन वहाँ ज्यादा देर नहीं रुका। काँपते हुए अपने कमरे में लौट आया।
उस रात उसने पहली बार महसूस किया कि परिवार के गंदे राज़ अब सिर्फ कहानियाँ नहीं रह गए। वे उसके चारों तरफ जीवित थे। माँ और पिता एक-दूसरे के साथ भी थे, और बाहर भी। रेणु सच कह रही थी।
अमन बिस्तर पर लेटा रहा। आँखें खुली थीं। दिमाग में आज की सारी बातें घूम रही थीं—मीना का स्पर्श, रेणु की जाँघ, पिता-माँ की आवाजें, और अपनी ही इच्छा का स्वीकार।
वह अब वापस नहीं लौट सकता था। भोलापन छूट चुका था। जगह एक नई भूख ले रही थी—देखने की, समझने की, और धीरे-धीरे शामिल होने की।
रात गहरी होती गई। हवेली के अंदर कई साँसें चल रही थीं। और अमन पहली बार सोच रहा था—अगली बार जब रेणु आएगी, तो वह खुद कुछ पूछेगा।
सुबह होते ही अमन का मन पहले से अलग था।
नाश्ते के समय उसने जानबूझकर सबकी निगाहें पकड़ने की कोशिश की। बाबा रामप्रसाद ने तंबाकू लगाते हुए उसकी तरफ देखा और इस बार सिर हिला दिया—जैसे कोई छोटी सी मंजूरी दे रहे हों। पिता सुरेश चुपचाप चाय पी रहे थे। उनकी आँखों में थकान थी, लेकिन जब माँ सुशीला उनके पास से गुजरीं तो सुरेश की निगाह उनकी कमर पर रुक गई। सुशीला ने पीछे मुड़कर एक पल के लिए देखा। दोनों के बीच कोई शब्द नहीं हुआ, फिर भी अमन को लगा जैसे कोई समझौता हवा में तैर रहा हो।
चाचा रमेश आज ज्यादा बातूनी थे। गौरव के साथ बैठे उन्होंने अमन की तरफ इशारा करके कहा, “यह तो अब आँखें खोलने लगा है। जल्दी ही मर्दों वाली बातें समझने लगेगा।” गौरव हँसा और बोला, “अभी तो बच्चा है चाचा। थोड़ा समय लगेगा।” अमन ने इस बार नजर नहीं झुकाई। उसने सीधे गौरव की तरफ देखा। गौरव की हँसी थोड़ी थम गई।
कॉलेज में अमन ने दोस्तों के बीच पहले से ज्यादा ध्यान से सुना। जब वे लड़कियों के शरीर की बात करने लगे तो अमन ने एक वाक्य और जोड़ दिया—साफ, बिना शर्म के। दोस्त हैरान रह गए। अमन खुद भी हैरान था, लेकिन अंदर एक अजीब सा सुकून था। रेणु की शिक्षा काम कर रही थी।
शाम को घर लौटा तो आँगन में कविता कपड़े सुखा रही थी। साड़ी का पल्लू खिसका हुआ था। उसके बड़े स्तनों का भार और गाँड का गोल उभार साफ दिख रहा था। अमन ने जानबूझकर निगाह डाली। कविता ने देख लिया। इस बार उसने पल्लू जल्दी नहीं ठीक किया। कुछ पल तक अमन की निगाह सहती रही, फिर धीरे से मुस्कुराई और पल्लू संभाल लिया। अमन का लंड हल्का तन गया।
रात का खाना खत्म होने के बाद रेणु आई। लालटेन की रोशनी कम थी। दरवाजा बंद करके वह बिस्तर के किनारे बैठ गई।
“आज क्या नया देखा?” उसने पूछा।
अमन ने बताया—बाबा की मंजूरी भरी निगाह, पिता-माँ का चुप संवाद, चाचा-गौरव की बात, कविता की मुस्कान। रेणु सुनती रही। फिर बोली,
“अच्छा। कविता ने मुस्कुराया तो समझ लो वह तैयार है देखने के लिए। मीना तो पहले से चंचल है। कमला चाची और अनुभवी हैं। वे सब तुम्हें अब बच्चा नहीं समझेंगी।”
रेणु ने अमन का हाथ पकड़ा और अपनी जाँघ पर रखा। इस बार साड़ी काफी ऊपर सरकी हुई थी। नंगी जाँघ की गर्माहट अमन की हथेली में फैल गई। रेणु ने उसका हाथ और ऊपर सरकाया—कूल्हे के पास तक।
“आज और आगे बढ़ो,” उसने धीरे से कहा। “अपना लंड निकालो। मेरे सामने। और इस बार आँखें खुली रखो। मुझे देखते हुए करो।”
अमन के हाथ काँप रहे थे, लेकिन उसने नाड़ा खोला। लंड बाहर आया—सख्त, नसें फूली हुई। रेणु ने ध्यान से देखा।
“अब सहलाओ। धीरे। और बोलो कि तुम्हें क्या लग रहा है। साफ-साफ।”
अमन ने हाथ चलाना शुरू किया। आवाज काँपती हुई निकली, “गरमी हो रही है… लंड और सख्त हो रहा है… तुम्हारी जाँघ गरम है…”
रेणु ने सिर हिलाया। “सही। अब सोचो कि यह हाथ मेरा है। या माँ का। या कविता का। दिमाग को रोको मत।”
अमन की साँसें तेज हो गईं। हाथ की गति बढ़ने लगी। रेणु ने अचानक उसका हाथ रोक दिया।
“बस। आज इतना काफी है।” उसने अमन का हाथ अपनी जाँघ से हटाया। “तुम Progressive हो रहे हो। शर्म कम हो रही है। इच्छा साफ हो रही है। कल रात और आगे बढ़ेंगे।”
वह उठ खड़ी हुई। दरवाजे के पास जाकर रुकी।
“एक बात याद रखना। इस घर में जो दिखता है वह आधा सच होता है। जो नहीं दिखता वह असली खेल होता है। तुम अब आधा देख चुके हो। जल्दी पूरा देखने लगोगे।”
रेणु चली गई।
अमन अकेला रह गया। लंड अभी भी तना हुआ था। उसने इस बार जल्दीबाजी नहीं की। रेणु की बातें याद करते हुए धीरे-धीरे खुद को सहलाया। पहली बार उसने महसूस किया कि उत्तेजना के साथ-साथ एक नई समझ भी आ रही है। वह अब सिर्फ भोक्त नहीं रहना चाहता था। वह समझना चाहता था। शामिल होना चाहता था।
रात के लगभग एक बजे अमन को प्यास लगी। वह पानी पीने गलियारे की तरफ बढ़ा। तभी उसे हल्की सी आवाज सुनाई दी—चाचा रमेश के कमरे से। दरवाजा अधखुला था। अंदर से रमेश की भारी आवाज आ रही थी और एक औरत की दबी सिसकारियाँ। अमन ने साँस रोक ली। आवाज कमला चाची जैसी लग रही थी।
“जोर से मत… कोई सुन लेगा…” औरत की आवाज थी।
रमेश की हँसी गूँजी, “आज बाबा सो गए हैं। डरने की जरूरत नहीं।”
अमन वहाँ ज्यादा देर नहीं रुका। काँपते हुए अपने कमरे में लौट आया। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। पहली बार उसने चाचा और कमला चाची के बीच का राज़ अपनी आँखों और कानों से छू लिया था। रेणु सही कह रही थी—हर किसी के अपने गंदे राज़ हैं।
उस रात अमन देर तक जागता रहा। दिमाग में कविता की मुस्कान, रेणु की गरम जाँघ, पिता-माँ का चुप संबंध और अब चाचा-कमला की आवाजें सब एक साथ घूम रहे थे।
वह अब परिवार के गंदे राज़ों के किनारे से अंदर की तरफ बढ़ चुका था। भोलापन लगभग छूट चुका था। जगह एक नई भूख ने ले ली थी—देखने की, समझने की, और धीरे-धीरे खुद भी उस खेल का हिस्सा बनने की।
रात गहरी होती गई। हवेली के अंदर कई साँसें चल रही थीं। और अमन सोच रहा था—अगली बार रेणु क्या सिखाएगी। और कब वह खुद कुछ और देखने या करने की हिम्मत करेगा।
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09-09-2026, 08:55 PM
(This post was last modified: 09-09-2026, 09:00 PM by Skb21. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
Gajab ka kathanak hai bhai ji Renu ka kirdar jabardast or rahasyamayi lag raha hai or Aman ko thoda or active joshila or uske Lund ko bhi pariwar me sabse bada or mota karwa do or Gorav ko itna importance mat do pariwar ke gande raaz ke bare mein aage batao waiting for next
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UPDATE
सुबह की रोशनी हवेली के आँगन में फैल रही थी जब अमन ने आँखें खोलीं।
नींद अधूरी थी। रात भर चाचा रमेश और कमला चाची की दबी सिसकारियाँ उसके कानों में गूँजती रहीं। पहली बार उसने महसूस किया कि परिवार के गंदे राज़ अब सिर्फ सुनी-सुनाई बातें नहीं रह गए। वे उसके इतने करीब थे कि साँस लेने पर भी उनका वजन महसूस होता था।
नाश्ते के समय अमन ने जानबूझकर सबको ध्यान से देखा। बाबा रामप्रसाद चारपाई पर बैठे थे। उनकी आँखें अमन पर टिकीं और इस बार उन्होंने धीरे से सिर हिलाया—जैसे कोई चुप मंजूरी दे रहे हों। पिता सुरेश की निगाहें थकी हुई थीं। माँ सुशीला जब उनके पास चाय लेकर गईं तो सुरेश की उंगलियाँ उनके हाथ से छूती हुई थोड़ी देर रुक गईं। सुशीला ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, बस प्याला रखकर चली गईं। अमन ने यह छोटा सा स्पर्श नोट कर लिया।
चाचा रमेश आज सामान्य से ज्यादा हँस रहे थे। कमला चाची रसोई से निकलकर आईं तो रमेश की निगाह उनकी गाँड पर एक पल के लिए रुक गई। कमला ने पीछे मुड़कर देखा और हल्के से मुस्कुरा दीं। गौरव ने अमन की तरफ देखकर कहा, “आज तुम बिल्कुल चुप हो छोरे। कोई नई बात समझ में आ गई क्या?” अमन ने इस बार जवाब दिया, आवाज साफ थी, “हाँ… कुछ-कुछ।” गौरव की भौंहें थोड़ी चढ़ीं, लेकिन उसने और कुछ नहीं कहा।
कॉलेज में अमन का मन घर पर ही अटका रहा। दोस्तों की बातें अब उसे और भी बचकानी लगने लगी थीं। मैदान में खेलते समय भी वह बीच-बीच में रुककर सोचता—अभी हवेली में क्या हो रहा होगा। कौन किसके कमरे में होगा। कौन सी आवाज दब रही होगी।
शाम को घर लौटा तो आँगन में मीना और कविता दोनों थीं। मीना ने अमन को देखकर पास बुलाया।
“आज चेहरा और गंभीर लग रहा है,” उसने कहा। फिर बिना किसी प्रस्तावना के उसका हाथ पकड़ लिया और अपनी कमर पर रख दिया। साड़ी के ऊपर से ही। “गर्म है न?”
अमन का हाथ काँप गया। मीना हँसकर हाथ छोड़ दिया और चली गई। कविता थोड़ी दूर खड़ी यह सब देख रही थी। उसने अमन की तरफ देखा और बहुत हल्के से सिर हिलाया—जैसे कोई चुप संदेश दे रही हो। अमन की साँसें तेज हो गईं। लंड पैंट में तनने लगा।
रात का खाना खत्म होने के बाद रेणु आई। लालटेन की रोशनी बहुत कम रखी हुई थी। उसने दरवाजा बंद किया और सिटकिनी लगा दी। बिस्तर के किनारे बैठकर सीधे पूछा,
“आज क्या नया देखा या सुना?”
अमन ने सब बता दिया—बाबा की मंजूरी, पिता-माँ का स्पर्श, चाचा-कमला की निगाहें, मीना का हाथ, कविता का इशारा। रेणु सुनती रही। फिर धीरे से बोली,
“तुम तेजी से सीख रहे हो। आँखें खुल रही हैं। अब शरीर भी खुलने लगा है।”
उसने अमन का हाथ पकड़ा और अपनी जाँघ पर रखा। साड़ी काफी ऊपर सरकी हुई थी। नंगी जाँघ की गर्माहट अमन की हथेली में फैल गई। रेणु ने उसका हाथ और ऊपर ले जाकर अपनी जाँघ के अंदरूनी हिस्से तक पहुँचा दिया।
“आज यहाँ तक,” उसने कहा। “महसूस करो। यह सिर्फ मांस नहीं है। यह गर्मी है। इच्छा है। तुम्हारा लंड अभी पूरी तरह खड़ा हो चुका होगा। बोलो।”
अमन की आवाज काँपती हुई निकली, “हाँ… पूरी तरह खड़ा है।”
रेणु ने सिर हिलाया। “अच्छा। अब निकालो। मेरे सामने। और इस बार मेरी आँखों में देखते हुए सहलाओ। कोई शर्म नहीं। कोई झिझक नहीं।”
अमन ने नाड़ा खोला। लंड बाहर आया—सख्त, नसें फूली हुई, सिर चमक रहा था। उसने उसे अपने हाथ में लिया। रेणु की निगाहें उसकी आँखों में थीं।
“धीरे,” रेणु ने निर्देश दिया। “जल्दी मत। सोचो कि यह हाथ मेरा है। या माँ का। या कविता का। या कमला चाची का। दिमाग को पूरी तरह आजाद छोड़ दो।”
अमन ने आँखें खुली रखते हुए हाथ चलाना शुरू किया। साँसें तेज हो गईं। रेणु बैठी देखती रही। कोई छुआ नहीं, कोई और मदद नहीं की। सिर्फ देखती रही और कभी-कभी धीरे से बोलती रही,
“हाँ… ऐसे ही… अपनी इच्छा को स्वीकार करो… तुम अब भोले नहीं रह गए…”
कुछ देर बाद रेणु ने उसका हाथ रोक दिया।
“बस। आज इतना काफी है।” उसने अमन का हाथ अपनी जाँघ से हटाया। “तुम Progressive हो रहे हो। कल रात और आगे बढ़ेंगे। शायद तुम्हें कुछ और दिखाने का समय भी आ गया है।”
वह उठ खड़ी हुई। दरवाजे के पास जाकर रुकी।
“रात को अगर प्यास लगे या नींद न आए तो गलियारे में मत घूमना। आज घर में कुछ और चल रहा हो सकता है। तुम अभी तैयार नहीं हो सब देखने के लिए। सब्र रखो।”
रेणु चली गई।
अमन अकेला रह गया। लंड अभी भी तना हुआ था। उसने इस बार जल्दीबाजी नहीं की। रेणु की बातें और जाँघ की गर्माहट याद करते हुए धीरे-धीरे खुद को सहलाया। पहली बार उसने महसूस किया कि उत्तेजना के साथ-साथ एक नई शक्ति भी आ रही है—देखने की, समझने की, और धीरे-धीरे खुद भी उस चक्र का हिस्सा बनने की।
रात के लगभग डेढ़ बजे अमन को प्यास लगी। उसने रेणु की चेतावनी याद की, लेकिन फिर भी दरवाजे तक गया। गलियारे में हल्की सी आवाज आ रही थी—इस बार बाबा के कमरे की तरफ से। आवाज बहुत दबी हुई थी, लेकिन एक औरत की सिसकारी साफ पहचानी जा सकती थी। अमन ने साँस रोक ली। वह ज्यादा देर नहीं रुका। काँपते हुए वापस अपने कमरे में आ गया।
दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। बाबा… सत्तर साल के बाबा…
अमन बिस्तर पर लेटा रहा। आँखें खुली थीं। दिमाग में आज की सारी बातें घूम रही थीं—मीना का हाथ, कविता का इशारा, रेणु की गरम जाँघ, और अब बाबा के कमरे से आती सिसकारियाँ।
परिवार के गंदे राज़ अब उसके इतने करीब थे कि वह उन्हें छू सकता था। भोलापन लगभग खत्म हो चुका था। जगह एक गहरी, खतरनाक जिज्ञासा ने ले ली थी।
वह जानता था कि अगली बार रेणु और आगे ले जाएगी। और वह तैयार था—डर के साथ, लेकिन तैयार।
रात के बारह बजने वाले थे।
अमन बिस्तर पर बैठा हुआ था। आज का दिन उसके अंदर कुछ बदल चुका था। बाबा के कमरे से सुनाई दी सिसकारियाँ, मीना का छूना, कविता का इशारा, और रेणु की गरम जाँघ—सबने मिलकर उसकी भोली दीवारों को लगभग गिरा दिया था। वह अब सिर्फ देखने वाला नहीं रहना चाहता था। कुछ करना चाहता था।
दरवाजे पर दस्तक हुई। रेणु अंदर आई। लालटेन की रोशनी कम थी। उसने दरवाजा बंद किया और सिटकिनी लगा दी। बिस्तर के किनारे बैठते हुए उसने देखा कि अमन की आँखें आज पहले जैसी नहीं हैं। उनमें एक नई चमक थी—डर कम, इच्छा ज्यादा।
“आज तुम अलग लग रहे हो,” रेणु ने धीरे से कहा।
अमन ने जवाब नहीं दिया। वह उठा और रेणु के बहुत करीब आ गया। दोनों की साँसें एक-दूसरे से टकरा रही थीं। रेणु की आँखों में थोड़ी हैरानी थी, लेकिन उसने पीछे नहीं हटी। अमन ने धीरे से अपना हाथ बढ़ाया और रेणु के गाल को छुआ। उंगलियाँ उसके होंठों तक गईं।
“दीदी…” अमन की आवाज काँप रही थी, लेकिन उसमें हिम्मत थी। “आज मैं सिर्फ सुनना और देखना नहीं चाहता।”
रेणु की साँस थोड़ी तेज हो गई। अमन ने और हिम्मत की। वह आगे झुका और अपने होंठ रेणु के होंठों से लगा दिए। पहला चुंबन कच्चा था—काँपता हुआ, अधूरा, लेकिन सच्चा। रेणु एक पल के लिए सहम गई, फिर धीरे से जवाब देने लगी। उसके होंठ नरम थे, गर्म थे। अमन की जीभ अनजान अंदाज में आगे बढ़ी। रेणु ने हल्के से दाँत से उसके निचले होंठ को दबाया। चुंबन गहरा होता गया।
जब वे अलग हुए तो दोनों की साँसें तेज थीं। रेणु की आँखों में पहली बार असली हैरानी थी।
“तुम… बदल गए हो,” उसने फुसफुसाकर कहा।
अमन ने जवाब में अपनी पैंट का नाड़ा खोला। पहले की तरह झिझक नहीं थी। पैंट नीचे सरकी। उसका लंड बाहर आया।
रेणु की आँखें फटी की फटी रह गईं।
पहले जो सात इंच का किशोरों जैसा लंड था, वह अब पूरी तरह बदल चुका था। दस इंच लंबा, मोटा, नसें साफ उभरी हुई, सिर चमकदार और भारी। गुलाबी रंग अब गहरा हो चुका था। पूरा खड़ा था—तनाव से फड़कता हुआ। रेणु उसे देखती रह गई। उसके होंठ थोड़े खुले रह गए।
“यह… यह पहले वाला नहीं है,” रेणु की आवाज में अचरज साफ था। “कब… कैसे इतना…”
अमन ने धीरे से कहा, “पता नहीं। पिछले कुछ दिनों से… जैसे शरीर खुद बदल रहा हो। तुम्हारी बातें… घर की ये सब चीजें… सब मिलकर।”
रेणु ने हाथ बढ़ाया, लेकिन छुआ नहीं। बस हवा में ही उसके आकार को मापती रही। आँखों में गणना और हैरानी दोनों थीं।
“दस इंच… पूरा,” उसने धीरे से कहा। “मोटा भी है। नसें साफ। यह तो… परिवार के किसी भी मर्द से कम नहीं। बाबा के बाद शायद सबसे…”
अमन और करीब आ गया। उसने फिर से रेणु के होंठ पकड़ लिए। इस बार चुंबन में पहली वाली झिझक नहीं थी। जीभ और गहरी चली गई। रेणु ने जवाब दिया। उसका एक हाथ अमन की गर्दन पर चला गया, दूसरा उसकी छाती पर। चुंबन लंबे समय तक चलता रहा। दोनों की साँसें एक-दूसरे के मुँह में घुल रही थीं।
जब अलग हुए तो रेणु की आँखें थोड़ी नम थीं—उत्तेजना से।
“आज बस इतना,” उसने काँपती आवाज में कहा। “तुम बहुत आगे बढ़ गए हो एक ही रात में। लंड भी… और हिम्मत भी।” उसने अमन के लंड की तरफ एक बार फिर देखा। “इसे मैंने सोचा नहीं था। इतना जल्दी…”
अमन ने उसका हाथ पकड़ा और अपनी ओर खींचा। “दीदी… और सिखाओ।”
रेणु ने सिर हिलाया। “सिखाऊँगी। लेकिन आज नहीं। आज तुमने खुद पहली बार कदम बढ़ाया। चुंबन तुमने शुरू किया। लंड तुमने खुद दिखाया। यह बड़ी बात है।”
वह उठी और दरवाजे की तरफ बढ़ी। मुड़कर बोली,
“कल रात और आगे बढ़ेंगे। इस बार मैं भी कुछ करूँगी। तुम्हारा यह नया रूप… मुझे भी तैयार होने दो।”
रेणु चली गई।
अमन अकेला रह गया। लंड अभी भी पूरी तरह तना हुआ था—दस इंच, भारी, फड़कता हुआ। उसने इसे अपने हाथ में लिया। पहली बार उसने महसूस किया कि यह सिर्फ उत्तेजना नहीं है। यह एक नई पहचान है। शरीर ने जवाब दे दिया था। दिमाग ने हिम्मत दे दी थी।
उसने खिड़की से बाहर देखा। हवेली के कई कमरों में अभी भी हल्की रोशनी थी। कहीं न कहीं कोई न कोई जाग रहा था। कोई न कोई अपने गंदे राज़ जी रहा था।
अमन बिस्तर पर लेटा। आँखें खुली थीं। होंठों पर अभी भी रेणु के होंठों का स्वाद था। हाथ में अपने लंड का वजन था।
वह अब पूरी तरह भोला नहीं रह गया था। पहला चुंबन उसने खुद लिया था। अपना असली रूप उसने खुद दिखाया था। और रेणु… पहली बार सच में हैरान हुई थी।
रात गहरी होती गई। अमन जानता था कि कल से शिक्षा का रूप बदलने वाला है। अब सिर्फ देखना और सुनना काफी नहीं रहेगा। कुछ और होने वाला था।
और वह तैयार था।
अगली सुबह अमन कॉलेज के लिए निकला।
रात के चुंबन और अपने बदले हुए शरीर का वजन अभी भी उसके अंदर था। दस इंच का लंड पैंट में भारी लग रहा था। कॉलेज पहुँचकर वह अपनी कक्षा की तरफ जा रहा था तभी उसे बरामदे के कोने से आवाजें सुनाई दीं। दो लड़के और एक लड़की बात कर रहे थे—आवाजें दबी हुई लेकिन साफ।
“आज छुट्टी के बाद पुराने मंदिर के पीछे खँडहर में मिलना,” एक लड़के ने कहा। “वहाँ कोई नहीं आता।”
लड़की ने हल्के से हँसते हुए जवाब दिया, “तुम दोनों एक साथ? हिम्मत है तो आ जाना।”
दूसरे लड़के ने कहा, “आएँगे। आज पूरा मजा लेंगे।”
अमन ने अनसुना किया और आगे बढ़ गया। लेकिन बात उसके दिमाग में रह गई। पुराना मंदिर गाँव के किनारे था। उसके पीछे टूटा-फूटा खँडहर सालों से खाली पड़ा था।
कॉलेज की छुट्टी होते ही अमन घर पहुँचा। माँ ने पूछा, “आज जल्दी आ गए?” अमन ने सिर हिलाया और कहा, “दोस्तों के साथ मैदान में खेलने जा रहा हूँ। थोड़ी देर में लौटऊँगा।”
वह निकला और सीधे पुराने मंदिर की तरफ बढ़ा। खँडहर के पास पहुँचकर उसने साँस रोकी। अंदर से हल्की आवाजें आ रही थीं। वह धीरे-धीरे एक टूटी दीवार के पीछे छिप गया और झाँका।
अंदर तीनों थे। लड़की की सालवार नीचे सरकी हुई थी। उसकी चूत पूरी तरह खुली थी—बाल थोड़े घने, फाड़ चमक रही थी। एक लड़का उसके पीछे खड़ा था। उसका लंड मोटा और सख्त था। उसने लड़की की गाँड पर थप्पड़ मारा और बोला,
“गाँड फैला, रंडी। आज दोनों तरफ से चोदूँगा।”
लड़की ने कराहते हुए कहा, “पहले चूत में डाल… जोर से…”
लड़के ने अपना लंड उसकी चूत पर लगाया और एक झटके में अंदर धंस दिया। लड़की की चीख निकल गई।
“आह्ह… मादरचोद… कितना मोटा है तेरा लंड… और अंदर…”
दूसरा लड़का उसके मुँह के सामने खड़ा हो गया। उसने अपना लंड निकाला और लड़की के होंठों पर मारते हुए बोला,
“मुँह खोल चुदाई की प्यासी। दोनों तरफ से लेगी आज।”
लड़की ने मुँह खोला। दूसरा लंड उसके मुँह में चला गया। गले तक। वह गैग करते हुए भी चूसने लगी। पीछे वाला लड़का जोर-जोर से धक्के मार रहा था। हर धक्के के साथ लड़की की गाँड हिल रही थी। चूत की गीली आवाजें—थप-थप-थप—खँडहर में गूँज रही थीं।
“साली की चूत कितनी टाइट है… पानी छोड़े जा रही है,” पीछे वाले ने गाली दी। “ले रंडी… ले पूरा लंड…”
लड़की की आवाज मुँह भरे होने के कारण अस्पष्ट थी, लेकिन सिसकारियाँ साफ थीं। “उम्मhh… उम्मhh… जोर से चोदो… दोनों…”
थोड़ी देर बाद पीछे वाले ने लंड निकाला और गाँड की छेद पर लगा दिया।
“अब गाँड ले। ढीली कर।”
लड़की ने मुँह से लंड निकालकर चीखते हुए कहा, “आहिस्ता… पहली बार गाँड में… आह्ह्ह… माँ की चुदाई… कितना मोटा… फट जाएगी…”
लंड धीरे-धीरे उसकी गाँड में धंस गया। लड़की की आँखें बंद हो गईं। दर्द और मजे की मिली-जुली आवाजें निकल रही थीं। दोनों लड़के अब एक साथ उसका इस्तेमाल कर रहे थे—एक मुँह में, एक गाँड में। गालियाँ और कराहें एक साथ गूँज रही थीं।
“चूस जोर से… गला खोल…”
“गाँड कितनी गरम है साली… आज दोनों छेद भर दूँगा…”
“आह्ह… और गहरा… हाँ… ऐसे ही चोदो…”
अमन दीवार के पीछे काँप रहा था। उसका अपना लंड पूरी तरह खड़ा हो चुका था—दस इंच, पैंट में तनाव से फड़कता हुआ। उसने पहली बार इतने करीब से दूसरों का संभोग देखा था। गंदी गालियाँ, गीली आवाजें, शरीर की टकराहट—सब उसके दिमाग में बसता जा रहा था।
दृश्य काफी देर चला। दोनों लड़कों ने बारी-बारी से लड़की की चूत और गाँड में जाकर पानी गिराया। लड़की थककर जमीन पर गिर गई। उसकी चूत और गाँड दोनों से सफेद पानी रिस रहा था।
अमन वहाँ से धीरे-धीरे खिसक गया। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। शरीर में गर्मी और उत्तेजना का तूफान था। वह सीधे घर की तरफ भागा।
घर पहुँचकर उसने माँ-बाप को बताया कि खेलकर थक गया है। जल्दी से नहाया, खाना खाया और अपने कमरे में जाकर लेट गया। दिमाग में खँडहर का पूरा दृश्य घूम रहा था—लड़की की चीखें, लंडों का अंदर-बाहर होना, गालियाँ, पानी। उसका लंड अभी भी भारी था, लेकिन उसने कुछ नहीं किया। थकान और उत्तेजना ने उसे जकड़ लिया। वह गहरी नींद में सो गया।
रात के लगभग ग्यारह बजे रेणु उसके कमरे में आई। लालटेन लेकर। उसने दरवाजा धीरे से खोला और अंदर झाँका। अमन गहरी नींद में सोया हुआ था। साँसें नियमित थीं। चेहरे पर थकान और एक अजीब सी शांति थी।
रेणु कुछ पल तक खड़ी उसे देखती रही। आज वह कुछ और सिखाने वाली थी, लेकिन अमन सो चुका था। उसने धीरे से दरवाजा बंद किया और चली गई।
कमरे में अँधेरा रह गया। अमन सोता रहा। सपनों में खँडहर की आवाजें और रेणु के होंठ दोनों मिलकर एक हो रहे थे।
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Nice job Aman aage badh raha hai Baba ke kamre mein kon thi shayad Renu hi thi isiliye dekhne ko mana Kiya hoga Aman ko mana karne ke bawajood dekhna chahiye tha ya shayad pahchan bhi liya ho ki kon thi ya fir Renu se puchhna chahiye tha ki wo kon thi or Renu ko Ghar ke sab mardon ke Lund ke size ke bare mein kaise pata hai kya wo sabse chudwa chuki hai. Dhire dhire Gaurav ko hata hi dijiye please or wo college wali ladki or dono ladke kon the ye bhi nahi bataya so waiting for next eagerly
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(Yesterday, 10:20 AM)Skb21 Wrote: Nice job Aman aage badh raha hai Baba ke kamre mein kon thi shayad Renu hi thi isiliye dekhne ko mana Kiya hoga Aman ko mana karne ke bawajood dekhna chahiye tha ya shayad pahchan bhi liya ho ki kon thi ya fir Renu se puchhna chahiye tha ki wo kon thi or Renu ko Ghar ke sab mardon ke Lund ke size ke bare mein kaise pata hai kya wo sabse chudwa chuki hai. Dhire dhire Gaurav ko hata hi dijiye please or wo college wali ladki or dono ladke kon the ye bhi nahi bataya so waiting for next eagerly
I will try to make it fast as possible brother
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(This post was last modified: Yesterday, 11:24 AM by Fuckuguy. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
सोमवार की सुबह अमन कॉलेज के लिए निकला।
रात भर खँडहर का दृश्य उसके दिमाग में घूमता रहा। लड़की की आवाज, उसकी सिसकारियाँ, दोनों लड़कों की गालियाँ—सब साफ याद था। लेकिन उसका चेहरा नहीं दिखा था। दीवार के कोण और अँधेरे की वजह से सिर्फ शरीर दिखी थी। अब अमन का मन यही पूछ रहा था—वह कौन थी? कक्षा में है या किसी और सेक्शन में? जाना-पहचाना चेहरा तो नहीं?
कॉलेज पहुँचते ही उसने सामान्य दिनचर्या शुरू की। प्रार्थना, कक्षा, दोस्तों के साथ बैठना। लेकिन उसकी आँखें अब पहले से तेज थीं। हर लड़की को ध्यान से देख रहा था—आवाज मिलान करने की कोशिश में। जब कोई लड़की हँसती या बात करती तो वह कान लगा लेता। दोपहर के खाने के समय मैदान में बैठे दोस्तों के बीच भी उसका ध्यान चारों तरफ घूम रहा था।
एक बार उसे लगा कि पिछली बैंच पर बैठी लड़की की आवाज मिलती-जुलती है। लेकिन पक्का नहीं हो सका। छुट्टी के समय वह जानबूझकर उस समूह के पास से गुजरा जिसकी बात कल सुनी थी। दो लड़के तो वही लग रहे थे, लेकिन लड़की उनके साथ नहीं थी। अमन ने मन में नोट कर लिया—जल्दी पता चलेगा।
शाम को घर लौटा तो माँ ने सामान्य स्वर में पूछा, “आज कॉलेज कैसा रहा?” अमन ने सिर हिलाया और कमरे में चला गया। दिमाग में एक साथ दो चीजें चल रही थीं—खँडहर वाली लड़की का चेहरा ढूँढना और रात को रेणु के आने का इंतजार।
रात के खाने के बाद सब अपने कमरों में चले गए। अमन बैठा इंतजार कर रहा था। ठीक बारह बजे दरवाजे पर दस्तक हुई। रेणु अंदर आई। लालटेन कम रोशनी में थी। उसने दरवाजा बंद किया।
“कल सो गए थे,” रेणु ने सीधे कहा। “आज जगे हुए हो?”
अमन ने सिर हिलाया। रेणु बिस्तर के किनारे बैठ गई। उसकी आँखें अमन के चेहरे पर थीं।
“तुमने कुछ देखा है। बातों से लग रहा है। बताओ।”
अमन ने संक्षेप में बता दिया—पुराने मंदिर के खँडहर में तीन लोग, लड़की का चेहरा नहीं दिखी, लेकिन शरीर और आवाजें साफ याद हैं। रेणु सुनती रही। फिर हल्के से मुस्कुराई।
“कॉलेज में पता लगाने की कोशिश कर रहे हो न?”
अमन ने स्वीकार किया।
रेणु ने कहा, “अच्छा। आँखें खुल रही हैं। लेकिन याद रखना—बाहर की चीजें सिर्फ उत्तेजना देती हैं। असली शिक्षा यहीं है, इस घर में।”
वह थोड़ा करीब आई। “आज तुमने खुद चुंबन शुरू किया था। लंड भी दिखाया। आज मैं आगे बढ़ाऊँगी।”
रेणु ने अपना पल्लू हटाया। साड़ी के नीचे सिर्फ ब्लाउज था। उसने अमन का हाथ पकड़कर अपनी छाती पर रखा। ब्लाउज के ऊपर से ही। स्तन नरम और भारी थे। निप्पल कपड़े के नीचे सख्त हो रहे थे।
“महसूस करो,” रेणु ने धीरे से कहा। “यह सिर्फ बहन का शरीर नहीं। यह इच्छा का शरीर है। तुम्हारा लंड अभी कैसा है?”
अमन की आवाज कम थी, “पूरी तरह खड़ा है।”
रेणु ने उसका हाथ अपनी छाती पर और दबाया। “आज चुंबन तुमने लिया था। आज मैं लेती हूँ।”
वह आगे झुकी और अमन के होंठ पकड़ लिए। चुंबन इस बार गहरा था। जीभ अंदर तक चली गई। अमन ने जवाब दिया। दोनों की साँसें तेज हो गईं। रेणु का एक हाथ अमन की गर्दन पर था, दूसरा उसकी पैंट के नाड़े पर। उसने नाड़ा खोला। दस इंच का लंड बाहर निकल आया—सख्त, नसें फूली हुई, भारी।
रेणु ने उसे देखा। आँखों में फिर वही अचरज थी।
“इतना मोटा और लंबा… सच में बदल गया है।” उसने इसे अपने हाथ में लिया। हल्के से सहलाया। “आज सिर्फ इतना। मैं इसे पकड़ूँगी। तुम महसूस करो।”
उसकी उंगलियाँ धीरे-धीरे चलने लगीं—जड़ से लेकर सिर तक। कभी हल्के, कभी थोड़ा कसकर। अमन की कमर काँपने लगी। रेणु उसके कान में बोली,
“कल तुमने दूसरों को चोदते देखा। आज समझो कि शरीर कैसे प्रतिक्रिया देता है। जल्दी मत करना। बस महसूस करो।”
कुछ देर तक रेणु ने उसे अपने हाथ से सहलाया। अमन की साँसें तेज हो गईं, लेकिन रेणु ने पूरा नहीं होने दिया। उसने हाथ रोक लिया।
“बस। आज की शिक्षा यहीं खत्म।” उसने अमन का लंड छोड़ दिया और पल्लू ठीक किया। “कल रात और आगे बढ़ेंगे। शायद मुँह से भी सिखाऊँ। लेकिन सब्र रखो।”
रेणु उठ खड़ी हुई। दरवाजे तक जाकर बोली,
“कॉलेज में वह लड़की ढूँढते रहो। लेकिन घर की शिक्षा को प्राथमिकता देना। बाहर की चीजें तुम्हें सिर्फ उत्तेजित करेंगी। असली ताकत यहीं बनेगी।”
वह चली गई।
अमन अकेला रह गया। लंड अभी भी तना हुआ था, रेणु के हाथ की गर्माहट उस पर बची हुई थी। उसने खिड़की से बाहर देखा। हवेली शांत थी। लेकिन उसके अंदर अब दो आग जल रही थीं—एक खँडहर वाली अज्ञात लड़की की पहचान की, दूसरी रेणु की अगली शिक्षा की।
वह लेट गया। आँखें खुली थीं। दिमाग में रेणु के स्तनों का स्पर्श और खँडहर की सिसकारियाँ एक साथ घूम रही थीं।
कॉलेज की दिनचर्या वही रहेगी। लेकिन अब हर कक्षा, हर ब्रेक, हर लड़की की आवाज उसके लिए एक सवाल बन गई थी—क्या वही है?
और रातें… रातें अब रेणु की शिक्षा के लिए थीं।
मंगलवार की सुबह अमन कॉलेज गया।
कल रात रेणु के हाथ का स्पर्श और खँडहर की सिसकारियाँ दोनों उसके दिमाग में थीं। कक्षा में बैठे-बैठे वह बार-बार लड़कियों की आवाजें सुन रहा था। एक लड़की ने जब पानी माँगा तो उसकी आवाज कुछ मिलती-जुलती लगी। अमन ने ध्यान से देखा—चेहरा साधारण था, लेकिन पक्का अंदाजा नहीं लगा। ब्रेक में उसने उस समूह के दो लड़कों को दूर से देखा। वे सामान्य बातें कर रहे थे। लड़की उनके साथ नहीं थी। अमन ने मन में लिखा—जल्दी पता चलेगा।
पूरे दिन उसका ध्यान बँटा रहा। एक तरफ पढ़ाई, दूसरी तरफ वह अज्ञात आवाज। छुट्टी होते ही वह घर की तरफ निकला। दिमाग में एक ही सवाल घूम रहा था—वह लड़की कौन है?
शाम को घर लौटा तो माँ ने सामान्य स्वर में पूछा, “आज कॉलेज कैसा रहा?” अमन ने सिर हिलाया और सीधे अपने कमरे में चला गया। वह इंतजार कर रहा था—रात का।
रात के खाने के बाद रेणु आई। लालटेन लेकर। दरवाजा बंद करके वह बिस्तर के किनारे बैठ गई।
अमन ने इस बार खुद पहल की। “दीदी, एक बात पूछनी है।”
रेणु ने देखा। “पूछो।”
“बाबा के कमरे से जो आवाज आई थी… वह कौन थी?”
रेणु कुछ पल चुप रही। फिर बोली, “तुमने सुना तो था। मैंने मना किया था फिर भी कान लगा लिए।” उसने अमन की आँखों में देखा। “अभी बताने का समय नहीं। जब तुम और तैयार हो जाओगे तब खुद देख लोगे। जबरदस्ती मत पूछो।”
अमन चुप नहीं बैठा। “तुम्हें घर के सारे मर्दों के बारे में कैसे पता? उनके… साइज के बारे में भी। तुमने कितनों को…”
रेणु की आँखों में हल्की चमक आई। उसने अमन का हाथ पकड़ा। “तुम अब सवाल पूछने लगे हो। यह अच्छी बात है। लेकिन जवाब एक साथ नहीं मिलेंगे। सबके अपने राज़ हैं। मैंने बहुत कुछ देखा और जाना है। तुम्हें भी धीरे-धीरे पता चलेगा। आज इतना काफी है।”
वह थोड़ा करीब आई। “आज तुम्हारी शिक्षा जारी रखनी है।”
रेणु ने अपना पल्लू हटाया। ब्लाउज के बटन खोले। उसके स्तन बाहर आ गए—सख्त निप्पल, गोल और भारी। उसने अमन का हाथ पकड़कर उन पर रख दिया।
“आज सीधे छुओ। कपड़े के बिना।”
अमन की हथेली पर नरम मांस और सख्त निप्पल महसूस हुए। रेणु ने आँखें बंद कर लीं। “हल्के से दबाओ… ऐसे…”
अमन ने वैसा ही किया। रेणु की साँस तेज हो गई। उसने अमन के लंड पर हाथ रखा—पैंट के ऊपर से। दस इंच का तनाव साफ महसूस हो रहा था।
“निकालो,” रेणु ने कहा।
अमन ने पैंट खोली। लंड बाहर आया। रेणु ने इसे अपने दोनों हाथों में लिया। धीरे-धीरे सहलाने लगी।
“कल तुमने दूसरों को देखा। आज समझो कि हाथ कैसे चलते हैं। जल्दी मत। मैं बताऊँगी कब रोकना है।”
उसकी उंगलियाँ जड़ से सिर तक फिसल रही थीं। कभी हल्के, कभी कसकर। अमन की कमर काँपने लगी। रेणु ने एक हाथ से उसके लंड को पकड़े रखा और दूसरे हाथ से अपना एक स्तन अमन के मुँह के पास ले गई।
“चूसो… हल्के से।”
अमन ने निप्पल मुँह में लिया। जीभ घुमाई। रेणु की सिसकारी निकली। दोनों की साँसें तेज हो गईं। कुछ देर तक यह चलता रहा—रेणु का हाथ उसके लंड पर, अमन का मुँह उसके स्तन पर।
फिर रेणु ने अचानक रोक दिया।
“बस। आज यहीं तक।” उसने अमन का लंड छोड़ दिया और ब्लाउज पहन लिया। “तुम पूछ रहे हो—कौन सबसे ज्यादा चुदाई कर चुकी है, किसका लंड कैसा है। जवाब धीरे-धीरे मिलेंगे। अभी अपनी शिक्षा पर ध्यान दो।”
रेणु दरवाजे तक गई। मुड़कर बोली,
“कॉलेज में वह लड़की ढूँढते रहो। लेकिन याद रखना—बाहर की उत्तेजना सिर्फ आग लगाती है। असली खेल यहीं है।”
वह चली गई।
अमन अकेला रह गया। मुँह में रेणु के निप्पल का स्वाद था, लंड पर उसके हाथ की गर्माहट। दिमाग में बाबा वाले कमरे का सवाल और खँडहर वाली लड़की दोनों घूम रहे थे।
वह लेट गया। आँखें खुली थीं। अब वह सिर्फ देखने वाला नहीं रह गया था। वह सवाल पूछने वाला बन चुका था। और रेणु उसके हर सवाल का जवाब एक नई शिक्षा के साथ दे रही थी।
बुधवार की सुबह अमन कॉलेज पहुँचा।
कक्षा में बैठते ही उसका ध्यान फिर लड़कियों की आवाजों पर था। वह लगातार उस अज्ञात आवाज को ढूँढ रहा था। ब्रेक के समय वह पानी लेने गया तो बरामदे के कोने से परिचित आवाजें सुनाई दीं। वही दो लड़के और वह लड़की बात कर रहे थे। अमन ने दीवार के सहारे खड़े होकर कान लगा दिए।
“रविवार को पुराने मंदिर के पीछे ही मिलना है,” एक लड़के ने कहा। “इस बार एक और लड़की लाएँगे।”
लड़की ने हँसते हुए पूछा, “कौन?”
“राधा। हमारी ही क्लास वाली। उसे कहेंगे कि वहाँ कोई नया वाला फोन या कुछ दिखाना है। जब पहुँच जाएगी तो… दोनों का मजा ले लेंगे। तू भी उस पर चढ़ जाना।”
दूसरे लड़के ने जोड़ा, “राधा थोड़ी सीधी है। पहले मना करेगी। लेकिन जब दोनों तरफ से दब जाएगी तो चुपचाप ले लेगी। तू बस उसे लेकर आ जा।”
लड़की ने सिर हिलाया। “ठीक है। रविवार दोपहर को ले चलूँगी। बाकी तुम दोनों सँभाल लेना।”
अमन की मुट्ठियाँ भींच गईं। राधा। उसकी अपनी क्लास की लड़की। शांत रहने वाली, कम बोलने वाली। वह उन्हें उस खँडहर में ले जाकर उसी हालत में पहुँचाने वाले थे जैसे कल उसने देखा था। अमन का दिल जोर से धड़कने लगा। वह वहीं से हट गया और सीधा अपनी कक्षा में लौट आया।
पूरे दिन उसका मन अशांत रहा। राधा को बचाना है—यह बात उसके दिमाग में बार-बार घूम रही थी। लेकिन कैसे? सिक्युरिटी में बताए तो सब सामने आ जाएगा। खुद जाकर रोके तो लड़के उससे लड़ सकते हैं। वह सोचता रहा, लेकिन कोई साफ रास्ता नहीं सूझा।
शाम को घर लौटा तो सामान्य दिनचर्या निभाई। खाना खाया, थोड़ी देर पढ़ाई की, लेकिन दिमाग राधा और रविवार के प्लान पर ही अटका रहा।
रात के बारह बजे रेणु आई। लालटेन लेकर। दरवाजा बंद करके वह बिस्तर के किनारे बैठ गई।
अमन ने इस बार थोड़ा उदास स्वर में कहा, “दीदी, आज कॉलेज में कुछ सुना।”
रेणु ने पूछा, “क्या?”
अमन ने संक्षेप में बता दिया—रविवार का प्लान, राधा को बहाने से ले जाना, फिर दोनों लड़कों और उस लड़की का इरादा। रेणु सुनती रही। फिर धीरे से बोली,
“तुम बचाना चाहते हो?”
अमन ने सिर हिलाया।
रेणु ने उसका हाथ पकड़ा। “सोच लो। दखल दोगे तो खुद फँस सकते हो। लेकिन अगर मन बना लिया है तो सोच-समझकर करना। अभी जल्दबाजी मत करो। रविवार अभी दूर है।”
फिर उसने अपना पल्लू हटाया। ब्लाउज के बटन खोले। स्तन बाहर आ गए।
“आज की शिक्षा जारी रखो। बाहर की बातें बाद में। पहले अपना शरीर और इच्छा समझो।”
उसने अमन का हाथ अपने स्तनों पर रखा। फिर उसकी पैंट खोली। दस इंच का लंड बाहर निकला। रेणु ने इसे अपने हाथ में लिया और धीरे-धीरे सहलाने लगी। इस बार वह और करीब झुकी।
“आज मुँह से भी सिखाऊँगी,” उसने फुसफुसाकर कहा। “देखो और महसूस करो।”
रेणु ने अपना मुँह अमन के लंड के सिर के पास ले जाकर हल्के से जीभ फेरी। फिर धीरे से होंठों में लिया। अमन की कमर झटक उठी। रेणु ने धीरे-धीरे आगे बढ़ाया—आधा लंड मुँह में लेते हुए। उसकी जीभ घूम रही थी। एक हाथ से जड़ को सहला रही थी।
अमन की साँसें तेज हो गईं। उसने रेणु के बाल पकड़ लिए। रेणु ने कुछ देर तक यही किया—कभी गहरा, कभी सिर्फ सिर चूसते हुए। फिर अचानक रुक गई।
“बस। आज यहीं तक।” उसने मुँह हटाया और लंड को छोड़ दिया। “तुम्हारा शरीर अब अच्छी तरह प्रतिक्रिया दे रहा है। कल और आगे बढ़ेंगे।”
रेणु ने ब्लाउज पहन लिया। दरवाजे तक जाकर बोली,
“राधा वाली बात सोचो। लेकिन याद रखना—हर किसी को नहीं बचाया जा सकता। और जो बचाना चाहो, उसके लिए खुद मजबूत बनो। शिक्षा जारी रहेगी।”
वह चली गई।
अमन अकेला रह गया। मुँह में अभी भी रेणु की गर्माहट का अहसास था। लंड तना हुआ था। लेकिन दिमाग में राधा का चेहरा और रविवार का प्लान घूम रहा था।
वह लेट गया। आँखें खुली थीं। पहली बार उसने महसूस किया कि सिर्फ देखने और सीखने से आगे कुछ करना होगा। रविवार आ रहा था। और वह तय नहीं कर पा रहा था कि ठीक क्या करेगा।
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Nice job kya Renu kisi task ke tahat kisi ke kahane par ya apne dil se Aman ko ye sab sikha Rahi hai iske peeche ka karan par bhi to Aman ko dhyan dena chahiye or Renu se puchha bhi ja sakta hai iske bare mein or kya ghar ki sabhi ladkiyan chud chuki hain ya fir Aman ke liye koi kunwari bachi hai shayad Kavita or Meena. Waiting for next
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UPDATE
गुरुवार की सुबह अमन कॉलेज गया।
राधा वाली बात उसके दिमाग में बार-बार आ रही थी। कक्षा में वह राधा को दूर से देखता रहा। वह शांत बैठी थी, नोट्स बना रही थी। अमन के मन में एक अजीब सा बोझ था—रविवार आ रहा है और वह अभी भी तय नहीं कर पाया था कि ठीक क्या करेगा। ब्रेक में उसने फिर से उस समूह को ढूँढा, लेकिन वे आज अलग-अलग दिखे। कोई नई बात नहीं सुनाई दी।
शाम को घर लौटकर उसने सामान्य दिनचर्या निभाई। खाना खाया, थोड़ी देर किताब खोली, लेकिन ध्यान नहीं लगा। दिमाग में दो सवाल घूम रहे थे—राधा को कैसे बचाए, और रेणु यह सब क्यों सिखा रही है।
रात के बारह बजे रेणु आई। लालटेन लेकर। दरवाजा बंद करके वह बिस्तर के किनारे बैठ गई।
अमन ने इस बार थोड़ा रुककर पूछा, “दीदी… एक बात पूछनी है।”
रेणु ने सिर हिलाया। “पूछो।”
“तुम मुझे यह सब क्यों सिखा रही हो? क्या किसी ने कहा है… कोई टास्क है, या… खुद से?”
रेणु कुछ पल चुप रही। उसकी आँखों में पहली बार एक अलग तरह की गंभीरता दिखी। फिर उसने धीरे से कहा,
“अभी जवाब पूरा नहीं दे सकती। इतना समझ लो कि यह सिर्फ मन बहलाने के लिए नहीं है। इस घर में हर चीज का एक हिसाब होता है। तुम बदल रहे हो, इसलिए तुम्हें तैयार करना जरूरी है। बाकी… जब समय आएगा तब बताऊँगी।”
अमन ने और पूछना चाहा, लेकिन रेणु ने सिर हिलाकर मना कर दिया।
“आज इतना काफी है। जल्दबाजी मत करो। सवाल सही हैं, लेकिन जवाब धीरे-धीरे ही मिलेंगे।”
वह थोड़ा करीब आई। “अब शिक्षा की बारी।”
रेणु ने ब्लाउज के बटन खोले। स्तन बाहर आ गए। उसने अमन का हाथ उन पर रखा, फिर उसकी पैंट खोली। दस इंच का लंड सख्त निकल आया। रेणु ने इसे अपने हाथ में लिया और धीरे-धीरे सहलाने लगी। इस बार वह और झुकी।
पिछली रात की तरह उसने मुँह में लिया—पहले सिर्फ सिर, फिर धीरे-धीरे और अंदर। जीभ घुमाती रही। एक हाथ से जड़ को सहलाती रही। अमन की साँसें तेज हो गईं। उसने रेणु के बाल पकड़ रखे थे।
कुछ देर बाद रेणु ने मुँह हटाया। लार से चमकता लंड उसके हाथ में था।
“आज यहीं तक,” उसने कहा। आवाज थोड़ी भारी थी। “तुम्हारा शरीर अब अच्छी तरह जवाब दे रहा है। कल और आगे बढ़ेंगे।”
उसने ब्लाउज पहन लिया। दरवाजे तक जाकर रुकी।
“एक बात और। तुम घर की औरतों को भी ध्यान से देखो। सब एक जैसी नहीं हैं। कोई बहुत आगे निकल चुकी है, कोई अभी भी… अलग है। समझोगे धीरे-धीरे।”
रेणु चली गई।
अमन अकेला रह गया। मुँह में रेणु की गर्माहट बची हुई थी। लंड तना हुआ था। लेकिन दिमाग में उसके सवाल और भी साफ हो गए थे। रेणु कुछ छुपा रही थी। कोई वजह थी इस शिक्षा के पीछे। और घर की लड़कियों में भी फर्क था—कोई पूरी तरह अनुभव से गुजर चुकी थी, कोई अभी भी अलग थी।
वह लेट गया। आँखें खुली थीं। राधा का चेहरा, रेणु के अधूरे जवाब, और घर के राज़—सब एक साथ घूम रहे थे।
रविवार नजदीक आ रहा था। और अमन महसूस कर रहा था कि उसकी जिंदगी अब सिर्फ कॉलेज और घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं रह गई है।
शुक्रवार की सुबह अमन कॉलेज गया।
कक्षा में राधा अपनी जगह पर बैठी थी। अमन ने आज जानबूझकर उसका ध्यान रखने की कोशिश की। वह शांत थी, शिक्षिका की बातें लिख रही थी। ब्रेक में अमन ने देखा कि वह अकेली बैठी है। उस समूह के दो लड़के मैदान की तरफ गए हुए थे। लड़की भी कहीं और थी। अमन के मन में फिर वही सवाल उठा—रविवार को कैसे रोके? सीधे जाकर बताए तो राधा शायद डरे या विश्वास न करे। चुप रहे तो वह फँस जाएगी। कोई साफ रास्ता अभी भी नहीं सूझ रहा था।
पूरे दिन उसका ध्यान बँटा रहा। छुट्टी होते ही वह घर लौट आया। माँ ने पूछा, “आज थके लग रहे हो?” अमन ने सिर हिलाया और कमरे में चला गया।
रात के खाने के बाद रेणु आई। लालटेन लेकर। दरवाजा बंद करके बिस्तर के किनारे बैठ गई।
अमन ने इस बार धीरे से पूछा, “दीदी… कल तुमने कहा था कि घर की औरतें सब एक जैसी नहीं हैं। कुछ… अलग हैं।”
रेणु ने उसकी तरफ देखा। “हाँ। कहा था।”
“कौन… अभी भी…” अमन ने पूरा वाक्य नहीं बनाया।
रेणु थोड़ी देर चुप रही। फिर बोली, “अभी नाम नहीं लूँगी। इतना समझ लो कि कुछ बहुत आगे निकल चुकी हैं। कुछ अभी भी अपनी जगह पर हैं। तुम्हारे लिए सब खुला नहीं है। न ही सब बंद है। समय आने पर खुद समझ जाओगे।”
अमन ने और पूछना चाहा, लेकिन रेणु ने सिर हिलाकर रोक दिया।
“आज शिक्षा की बारी है। सवाल बाद में।”
रेणु ने ब्लाउज खोला। स्तन बाहर आ गए। उसने अमन का हाथ उन पर रखा, फिर उसकी पैंट खोली। लंड सख्त निकल आया। रेणु ने इसे अपने हाथ में लिया और मुँह के करीब ले गई।
इस बार उसने पहले की तुलना में थोड़ा और गहरा लिया। जीभ घुमाती रही, कभी सिर चूसती, कभी और अंदर ले जाती। एक हाथ से जड़ को सहलाती रही। अमन की साँसें तेज हो गईं। उसकी उंगलियाँ रेणु के बालों में फँस गईं।
रेणु ने कुछ देर तक यही किया। फिर अचानक रुक गई और मुँह हटा लिया। लंड लार से चमक रहा था।
“बस। आज यहीं तक,” उसने कहा। आवाज थोड़ी भारी थी। “तुम्हारा शरीर अब अच्छी तरह तैयार हो रहा है। कल और आगे बढ़ेंगे।”
उसने ब्लाउज पहन लिया। दरवाजे तक जाकर बोली,
“राधा वाली बात अभी भी दिमाग में है न? सोचते रहो। लेकिन जल्दबाजी में कोई कदम मत उठाना। और घर के सवाल भी धीरे-धीरे ही पूछना। सब एक साथ नहीं मिलेगा।”
रेणु चली गई।
अमन अकेला रह गया। मुँह में रेणु की गर्माहट बची हुई थी। लंड तना हुआ था। दिमाग में राधा का चेहरा और रेणु के अधूरे जवाब दोनों घूम रहे थे। घर की कौन सी लड़की अभी भी अलग है—यह सवाल भी अब साफ होकर बैठ गया था।
वह लेट गया। आँखें खुली थीं। रविवार और करीब आ रहा था। और अमन महसूस कर रहा था कि हर रात के साथ वह थोड़ा और बदल रहा है—शरीर से भी, सोच से भी।
शनिवार की सुबह अमन कॉलेज गया।
कक्षा में राधा अपनी जगह पर बैठी थी। अमन ने उसे एक बार देखा और फिर नजरें फेर लीं। रविवार अब बस एक दिन दूर था। उसके मन में बार-बार वही सवाल घूम रहा था—कैसे रोके? लेकिन कोई जवाब नहीं मिल रहा था। ब्रेक में उसने उस समूह को दूर से देखा। वे सामान्य बातें कर रहे थे। कोई नया प्लान नहीं सुनाई दिया। अमन चुपचाप अपनी जगह पर लौट आया।
शाम को घर पहुँचा तो आँगन में माँ सुशीला कपड़े सुखा रही थीं। साड़ी का पल्लू थोड़ा खिसका हुआ था। जब अमन पास से गुजरा तो उन्होंने उसका हाथ पकड़ लिया।
“आज थके लग रहे हो,” सुशीला ने कहा। उंगलियाँ उसके हाथ पर थोड़ी देर रुक गईं। “अंदर जाकर आराम कर लो।”
अमन ने सिर हिलाया। माँ की उंगलियों की गर्माहट उसके हाथ पर रह गई।
रसोई में कविता थी। उसने अमन को देखकर सिर उठाया। निगाहें एक पल के लिए मिलीं। कविता ने कुछ नहीं कहा, बस हल्के से मुस्कुरा दी। मुस्कान में एक अजीब सी शांति थी। अमन ने नजरें झुका लीं और आगे बढ़ गया।
गलियारे में मीना मिली। उसने अमन का हाथ पकड़कर रोका।
“कल छुट्टी है न? कुछ प्लान है?” मीना ने पूछा। आवाज में हल्की चंचलता थी। उसका शरीर अमन के बहुत करीब था। स्तनों का हल्का स्पर्श हुआ। अमन ने सिर हिलाया और कहा, “नहीं।” मीना हँसकर छोड़ दी।
कमला चाची आँगन के दूसरे कोने में बैठी थीं। उन्होंने अमन को देखते ही बुलाया।
“इधर आ बेटा।” जब अमन पास गया तो कमला ने उसके बाल सहलाए। हाथ गर्दन तक चला गया। “तुम अब बड़े लगने लगे हो।” आवाज सामान्य थी, लेकिन उंगलियाँ थोड़ी देर और रुक गईं।
अमन अपने कमरे में आया। दिमाग में माँ का स्पर्श, कविता की मुस्कान, मीना का करीब आना और कमला चाची की उंगलियाँ सब घूम रही थीं। घर की हर औरत अब अलग नजर आने लगी थी।
रात के बारह बजे रेणु आई। लालटेन लेकर। दरवाजा बंद करके बिस्तर के किनारे बैठ गई।
अमन ने धीरे से पूछा, “दीदी… घर की औरतें… माँ, कविता, मीना, चाची… सब अलग-अलग क्यों लगती हैं?”
रेणु ने उसकी तरफ देखा। “क्योंकि वे हैं। कुछ बहुत कुछ जी चुकी हैं। कुछ अभी भी अपनी सीमाओं में हैं। तुम देख रहे हो, यह अच्छी बात है। लेकिन अभी नाम लेकर मत पूछो। समय आने पर खुद समझ में आ जाएगा।”
वह थोड़ा करीब आई। “आज शिक्षा की बारी है।”
रेणु ने ब्लाउज खोला। स्तन बाहर आ गए। उसने अमन का हाथ उन पर रखा, फिर उसकी पैंट खोली। लंड सख्त निकल आया। रेणु ने इसे अपने हाथ में लिया और मुँह के पास ले गई।
इस बार उसने पहले से थोड़ा और गहरा और देर तक लिया। जीभ घुमाती रही, कभी सिर चूसती, कभी और अंदर ले जाती। अमन की साँसें तेज हो गईं। उसकी उंगलियाँ रेणु के बालों में फँस गईं। रेणु ने कुछ देर तक यही किया, फिर अचानक रुक गई।
“बस। आज यहीं तक,” उसने कहा। आवाज भारी थी। “तुम्हारा शरीर अब अच्छी तरह तैयार हो रहा है। कल रविवार है। सोच-समझकर रहना।”
उसने ब्लाउज पहन लिया। दरवाजे तक जाकर बोली,
“घर की औरतों को देखते रहो। वे भी तुम्हें देख रही हैं। और राधा वाली बात… फैसला तुम्हारा है।”
रेणु चली गई।
अमन अकेला रह गया। मुँह में रेणु की गर्माहट थी। लंड तना हुआ था। दिमाग में माँ, कविता, मीना, कमला चाची और राधा सब एक साथ घूम रहे थे।
रविवार अब बस कुछ घंटों दूर था। और अमन महसूस कर रहा था कि घर के अंदर और बाहर दोनों जगह उसके फैसले का इंतजार हो रहा है।
रविवार की सुबह थी।
अमन अभी बिस्तर पर ही था कि माँ सुशीला कमरे में आईं। हाथ में एक थैला था।
“अमन, उठो। बाबूजी खेत पर हैं। उनका खाना ले जाओ। मजदूर अभी तक नहीं पहुँचे होंगे, जल्दी पहुँचा दो।”
अमन ने आँखें रगड़ते हुए सिर हिलाया। राधा वाला प्लान अभी भी उसके दिमाग में था, लेकिन माँ के कहने पर वह तैयार हो गया। नहाया, कपड़े पहने और थैला लेकर निकल पड़ा।
खेत गाँव से थोड़ी दूर था। सुबह का समय होने की वजह से रास्ता सुनसान था। जब वह खेत पहुँचा तो सच में कोई मजदूर नहीं दिखा। पूरा खेत खाली पड़ा था। बाबूजी का छोटा सा कमरा (जहाँ औजार और कभी-कभी आराम करने का सामान रहता) एक तरफ बना था।
अमन कमरे की तरफ बढ़ा ही था कि अंदर से आवाजें आने लगीं।
महिला की दबी हुई लेकिन साफ सिसकारियाँ और पुरुष की भारी साँसें।
अमन रुक गया। दिल जोर से धड़कने लगा। वह धीरे-धीरे खिड़की के पास गया। खिड़की बंद थी, लेकिन कundi नहीं लगी थी। उसने हल्के से धक्का दिया। खिड़की बिना आवाज किए थोड़ी खुल गई।
अंदर नजारा साफ दिख रहा था।
बाबूजी सुरेश चारपाई पर थे। उनकी कमीज पूरी तरह खुली हुई थी, पैंट घुटनों तक नीचे थी। उनके मोटे और लंबे लंड पर एक औरत सवार थी। औरत की साड़ी कमर तक उठी हुई थी, ब्लाउज खुला हुआ था। उसके स्तन बड़े और गोल थे—साफ 36 साइज के, निप्पल सख्त और काले। कमर पतली (32), और गाँड भारी और गोल (36)।
अमन ने पहचान लिया। वह गाँव के मुखिया की पत्नी थी—बाबूजी के बहुत करीबी दोस्त की बीवी। नाम था सुमन।
सुमन उस समय पूरी तरह बेकाबू थी। वह बाबूजी के लंड पर ऊपर-नीचे हो रही थी। स्तन हवा में झूल रहे थे। मुँह से गंदी और मजे भरी आवाजें निकल रही थीं।
“आह्ह्ह… सुरेश… कितना मोटा लंड है तेरा… मेरी चूत फाड़ रहा है… जोर से… और जोर से चोदो इस रंडी को…”
बाबूजी ने उसकी गाँड पर जोरदार थप्पड़ मारा।
“साली मुखिया की बीवी बनके घूमती है, और यहाँ आकर मेरी लंड पर चढ़ जाती है। बोल, तू क्या है?”
सुमन ने कराहते हुए जवाब दिया, “मैं… मैं तेरी रंडी हूँ… तेरी चुदाई की प्यासी रंडी… आह्ह… और अंदर तक डाल… पूरा लंड दे मुझे…”
बाबूजी ने उसकी कमर पकड़ी और नीचे से जोर-जोर से धक्के मारने लगे। हर धक्के के साथ सुमन की बड़ी गाँड बाबूजी की जाँघों से टकरा रही थी। चूत की गीली आवाजें—छप-छप-छप—कमरे में गूँज रही थीं।
“ले रंडी… ले पूरा… तेरे मुखिया पति को पता है कि उसकी बीवी दूसरों की लंड पर कितनी मस्त होती है?” बाबूजी ने गाली दी।
सुमन ने सिर पीछे फेंक दिया। स्तन और जोर से हिलने लगे।
“पता चले तो चले… आज तो तू मुझे चोद… मेरी चूत में अपना पूरा पानी भर दे… आह्ह्ह… सुरेश… और तेज… मुझे अपनी रंडी बनाकर चोद…”
बाबूजी ने अचानक उसे नीचे गिराया। सुमन चारपाई पर पेट के बल लेट गई। बाबूजी ने पीछे से उसका कमर उठाया और एक झटके में फिर से लंड चूत में डाल दिया।
“गाँड भी फैला… आज दोनों छेद इस्तेमाल करूँगा तेरे।”
सुमन ने दोनों हाथों से चारपाई पकड़ ली और चीख निकाली,
“हाँ… कर ले… मेरी गाँड भी चोद… मैं तेरी पूरी रंडी हूँ आज… चाहे जितना चाहे वैसा इस्तेमाल कर…”
बाबूजी ने उसके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और जोर-जोर से धक्के मारने लगे। कमरा सिसकारियों, गालियों और मांस की टकराहट से भर गया।
अमन खिड़की के पीछे पत्थर की तरह खड़ा था। उसका अपना लंड पैंट में पूरी तरह तन चुका था। आँखों के सामने बाबूजी अपनी पूरी ताकत से मुखिया की बीवी को रंडी बनाकर चोद रहे थे। सुमन मजे से ले रही थी—बिल्कुल जैसी कोई अनुभवी रंडी लेती है।
दृश्य जारी था।
खिड़की के पीछे अमन अभी भी काँप रहा था।
अंदर बाबूजी सुरेश ने सुमन को चारपाई पर पेट के बल लिटा रखा था। उनका मोटा लंड उसकी चूत में जोर-जोर से अंदर-बाहर हो रहा था। हर धक्के के साथ सुमन की बड़ी गाँड हिल रही थी और उसकी सिसकारियाँ तेज होती जा रही थीं।
“आह्ह्ह… सुरेश… और गहरा… मेरी चूत फाड़ दे… आज पूरी रंडी बना दे मुझे…” सुमन चीख रही थी।
बाबूजी ने उसके बाल और जोर से पकड़े और सिर पीछे खींच लिया।
“बोल साली… तू क्या है मेरे सामने?”
“मैं… मैं तेरी चुदाई की रंडी हूँ… मुखिया की बीवी होकर भी तेरी लंड की प्यासी रंडी… आह्ह… जोर से चोदो…”
बाबूजी ने एक जोरदार थप्पड़ उसकी गाँड पर मारा। लाल निशान उभर आया। फिर उन्होंने गति और तेज कर दी। कमरे में सिर्फ मांस की टकराहट और गीली आवाजें गूँज रही थीं।
थोड़ी देर बाद बाबूजी ने लंड निकाला। सुमन कराहते हुए पलट गई। उसके बड़े स्तन हवा में फैल गए। बाबूजी ने उसके पैर फैलाए और फिर से लंड चूत में धंस दिया। इस बार आमने-सामने।
सुमन ने बाबूजी की गर्दन पकड़ ली और बोली, साँस फूलती हुई,
“आज तू मुझे इतना जोर से चोद रहा है… जैसे गुस्सा निकाल रहा हो…”
बाबूजी ने धक्का मारते हुए जवाब दिया, “गुस्सा नहीं… मजा है। तेरी यह 36-32-36 वाली बॉडी देखकर नियंत्रण नहीं रहता।”
सुमन हँसी—कराहते हुए। फिर अचानक उसकी आवाज थोड़ी गंभीर हो गई, भले ही धक्के जारी थे।
“सुरेश… तू जानता है न… तेरे घर में भी सब कुछ साफ नहीं है…”
बाबूजी की गति थोड़ी धीमी पड़ी। “क्या मतलब?”
सुमन ने कमर ऊपर उठाते हुए लंड और अंदर लिया और बोली,
“तेरी बीवी सुशीला… सिर्फ तेरे साथ नहीं सोती। गाँव में और भी नाम चलते हैं। और तेरी बड़ी बेटी रेणु… वह भी साधारण नहीं है। वह सब कुछ जानती है घर का। शायद तुझसे भी ज्यादा।”
बाबूजी ने जोर से धक्का मारा। सुमन चीख पड़ी।
“आह्ह्ह… हाँ… ऐसे ही… और सुन… तेरा छोटा बेटा अमन… अब आँखें खोलने लगा है। लोग बातें करने लगे हैं कि चौधरी के छोटे लड़के की निगाहें बदल गई हैं।”
बाबूजी ने सुमन के दोनों स्तन जोर से दबाए और और तेज गति से चोदने लगे।
“तू ज्यादा बकवास मत कर साली। अपनी चूत पर ध्यान दे।”
सुमन ने बाबूजी का चेहरा दोनों हाथों से पकड़ लिया। आँखों में मजा और एक अजीब सी चमक दोनों थीं।
“मैं बकवास नहीं कर रही… मैं सच कह रही हूँ। इस गाँव में सबके राज़ सबको पता होते हैं। मुखिया होने के नाते मेरे पति भी बहुत कुछ जानते हैं… और मैं उनके कानों तक पहुँचाती हूँ। तू मुझे चोद रहा है, तो सुन भी ले…”
बाबूजी ने उसके मुँह पर हाथ रख दिया।
“चुप कर रंडी। आज सिर्फ चोदने का मूड है।”
सुमन ने हाथ हटाया और कराहते हुए बोली,
“ठीक है… आज चुप रहूँगी… लेकिन याद रखना… तेरे घर के राज़ भी बाहर आने वाले हैं। अब चोद… जोर से चोद… मेरी चूत में अपना सारा पानी भर दे…”
बाबूजी ने दोनों हाथों से उसकी कमर पकड़ी और पूरे जोर से धक्के मारने लगे। सुमन की चीखें कमरे में गूँजने लगीं।
“आह्ह्ह… सुरेश… फाड़ दे… रंडी बना दे पूरी… हाँ… हाँ… ऐसे ही… और तेज…”
अमन खिड़की से यह सब देख और सुन रहा था। उसका शरीर काँप रहा था। बाबूजी की बीवी वाली बातें, रेणु वाली बातें, और खुद के बारे में सुमन के शब्द—सब उसके दिमाग में धमाके की तरह बज रहे थे।
दृश्य अभी खत्म नहीं हुआ था। बाबूजी अभी भी पूरी ताकत से सुमन को चोद रहे थे।
खिड़की के पीछे अमन की साँसें अटक रही थीं।
अंदर बाबूजी सुरेश ने सुमन को चारपाई के किनारे खींच लिया था। उसके दोनों पैर उनके कंधों पर थे। मोटा लंड पूरी तरह उसकी चूत में धंसा हुआ था और बाबूजी अब बिना रुके धक्के मार रहे थे। हर धक्के के साथ सुमन के बड़े स्तन जोर से हिल रहे थे और उसकी गाँड चारपाई से टकरा रही थी।
“आह्ह्ह… सुरेश… मार डालेगा क्या… इतना जोर से… मेरी चूत फट जाएगी… लेकिन मत रुक… चोद… रंडी की तरह चोद मुझे…” सुमन चीख-चीखकर कह रही थी।
बाबूजी ने उसके दोनों स्तनों को जोर से मसलते हुए गाली दी,
“साली मुखिया की बीवी… घर में इज्जतदार बनके घूमती है और यहाँ मेरी लंड पर चढ़कर रंडी बन जाती है। बोल, तेरी चूत किसकी है?”
सुमन ने आँखें बंद करके जवाब दिया,
“तेरी… सिर्फ तेरी… आज पूरी तरह तेरी रंडी हूँ… चाहे जितना चाहे वैसा इस्तेमाल कर… आह्ह्ह… और गहरा… हाँ… वहीं… वहीं मार…”
बाबूजी ने अचानक लंड निकाला। सुमन कराह उठी। फिर उन्होंने उसे पलट दिया। सुमन चारपाई पर घुटनों के बल झुक गई। बाबूजी ने उसकी गाँड के दोनों भाग फैलाए और लंड को उसकी गाँड की छेद पर लगा दिया।
“अब यह छेद भी लेगी। ढीली कर।”
सुमन ने चारपाई कसकर पकड़ ली और चीख निकाली,
“आहिस्ता… पहली बार नहीं है लेकिन तू बहुत मोटा है… आह्ह्ह… धीरे… अरे बाप रे… जा रहा है अंदर… सुरेश… फाड़ मत देना…”
बाबूजी ने धीरे-धीरे लेकिन मजबूती से लंड उसकी गाँड में धंसाना शुरू किया। आधा अंदर जाने पर सुमन की सिसकारी और तेज हो गई।
“पूरा… पूरा डाल… मैं सह लूँगी… मैं तेरी रंडी हूँ न… दोनों छेद तेरे हैं आज…”
बाबूजी ने एक झटके में बाकी लंड अंदर कर दिया। सुमन की लंबी चीख निकली। फिर बाबूजी ने उसकी कमर पकड़कर जोर-जोर से धक्के मारने शुरू कर दिए। गाँड की टकराहट और सुमन की कामुक चीखें कमरे में गूँज रही थीं।
“ले साली… ले पूरी गाँड में… आज तुझे याद रहेगा… मुखिया की बीवी को मैंने कैसे चोदा…”
सुमन बेलगाम हो चुकी थी।
“हाँ… याद रहेगा… हर बार जब मेरे पति मुझे छूएँगे तब तेरा लंड याद आएगा… आह्ह्ह… और तेज… दोनों छेद खराब कर दे मेरे… रंडी बना दे पूरी…”
बाबूजी ने कुछ देर गाँड में चोदा, फिर लंड निकाला और फिर से चूत में डाल दिया। अब उनकी गति बहुत तेज हो गई थी। दोनों पसीने से तर थे। सुमन के नाखून चारपाई में गड़ गए थे।
“सुरेश… आ रहा है… मैं झड़ने वाली हूँ… साथ में झड़… मेरी चूत में भर दे अपना पानी… पूरा…”
बाबूजी ने उसकी कमर और जोर से दबोच ली। कुछ तेज धक्कों के बाद उनका शरीर अकड़ गया। गरम पानी की धार सुमन की चूत में छूट गई। सुमन भी उसी समय काँप उठी। उसकी लंबी सिसकारी निकली और शरीर ढीला पड़ गया।
दोनों कुछ देर तक उसी हालत में पड़े रहे। साँसें तेज चल रही थीं। बाबूजी का लंड अभी भी उसकी चूत में था, धीरे-धीरे ढीला पड़ रहा था। सुमन के स्तन और जाँघें पसीने से चमक रही थीं।
बाबूजी ने आखिरकार लंड निकाला। सफेद पानी सुमन की चूत से बाहर रिसने लगा। उन्होंने उसकी गाँड पर एक आखिरी थप्पड़ मारा और बोले,
“अब उठ। मजदूर आने वाले होंगे। साफ-सुथरा हो जा।”
सुमन धीरे-धीरे उठी। उसकी टाँगें काँप रही थीं। उसने बाबूजी को देखकर थकी हुई मुस्कान दी।
“अगली बार और जोर से चोधियो… आज तो मेरी हड्डियाँ गल गईं।”
बाबूजी ने कमीज के बटन बंद करते हुए कहा, “जा। और ज्यादा बकवास मत करियो घर जाकर।”
अमन ने इतना देखते ही धीरे से खिड़की बंद कर दी। उसका पूरा शरीर काँप रहा था। लंड पैंट में दर्द कर रहा था। उसने थैला उठाया और काँपते हुए खेत से दूर चला गया। खाना वह वहीं किसी पत्थर पर छोड़ आया।
घर की तरफ लौटते समय उसके दिमाग में सिर्फ एक ही बात घूम रही थी—बाबूजी, सुमन, उनके गंदे शब्द, और सुमन के खोले हुए राज़।
माँ के बारे में।
रेणु के बारे में।
और खुद अमन के बारे में।
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albertprince547;
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Story ka agla update kal subah aayega until then enjoy the rest and plz don't forget to rate my thread and like thankyou everyone for your support
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shandar raj hai pariwar ka
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(11 hours ago)saya Wrote: shandar raj hai pariwar ka
Thankyou so much for your wishes and support
Fuckuguy
albertprince547;
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koi ummid hai kya rat main
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(3 hours ago)saya Wrote: koi ummid hai kya rat main
I will try ?
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(3 hours ago)Fuckuguy Wrote: I will try ?
thanx
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