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Incest परिवार के गंदे राज़
#21
Nice updates bahut hi sahi tarike se dhire dhire aage badh rahe ho aapne jo pictures Dali hain Raziya or Radha ke alawa uske upar kiske hain sasur Bahu ya jeth bahu jaise lag rahi hain nokar malkin ya other nahi lag rahi dekhne se or lgta hai Renu apne ander bahut kuchh dabaye baithi hai or mujhe to ye bhi lag raha hai ki Renu Aman ko ek hathiyar ke roop mein taiyar kar rahi hai baki aap behtar jante ho kyun ki kathanak aapka hai.... Waiting for next eagerly
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#22
shandar.................picture ke sath
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#23
सोमवार की सुबह अमन कॉलेज पहुँचा।
रात भर रेणु की बातें उसके दिमाग में घूमती रहीं—दिल जीतना, समय देना, दबाव न डालना। कक्षा में राधा अपनी जगह पर पहले से बैठी हुई थी। अमन ने उसकी तरफ देखा। राधा ने भी इस बार नजरें नहीं फेरीं। कुछ पल तक दोनों एक-दूसरे को देखते रहे। फिर राधा ने बहुत हल्के से सिर हिलाया—जैसे नमस्ते के बदले कोई छोटी सी स्वीकृति दे रही हो। अमन ने भी सिर हिला दिया और अपनी जगह पर बैठ गया।
ब्रेक के समय अमन पानी लेने गया तो राधा भी वहीं खड़ी थी। इस बार उसने खुद अमन की तरफ देखा और धीरे से बोली,
“कल… तुमने मुझे वहाँ से बचा लिया। मैंने ठीक से धन्यवाद भी नहीं कहा।”
अमन थोड़ा चौंका। उसने सोचा था राधा अभी भी दूर रहेगी। लेकिन उसकी आवाज में डर नहीं था। थकान थी, शर्म थी, लेकिन बात करने का इरादा साफ था।
“कोई बात नहीं,” अमन ने धीमे स्वर में जवाब दिया। “तुम ठीक तो हो?”
राधा ने हल्की मुस्कान दी—बहुत हल्की। “अब बेहतर हूँ। रात भर नींद नहीं आई… लेकिन अब समझ में आ गया कि कुछ लोग कितने गंदे हो सकते हैं।” उसने थोड़ा रुककर कहा, “तुमने समय पर बता दिया इसलिए मैं बच गई। शुक्रिया अमन।”
अमन ने सिर्फ सिर हिलाया। रेणु की बात याद आ रही थी—जबरदस्ती मत करना, समय दो। इसलिए उसने और गहरा सवाल नहीं पूछा। दोनों कुछ पल चुप रहे। फिर घंटी बज गई और वे अपनी-अपनी कक्षाओं की तरफ चल दिए। लेकिन पहली बार राधा ने खुद उससे बात की थी। यह छोटी सी बात अमन के लिए बड़ी लग रही थी।
शाम को घर लौटा तो आँगन में माँ सुशीला कपड़े सुखा रही थीं। उन्होंने अमन को देखकर बुलाया और उसके माथे से बाल हटाते हुए पूछा, “आज चेहरा थोड़ा हल्का लग रहा है।” अमन ने मुस्कुराकर सिर हिलाया। माँ की उंगलियाँ उसके गाल पर थोड़ी देर रुक गईं, फिर उन्होंने हाथ हटा लिया।
रात के खाने के बाद रेणु आई। लालटेन की रोशनी कम थी। उसने दरवाजा बंद किया और बिस्तर के किनारे बैठ गई।
“आज राधा से बात हुई?” उसने पूछा।
अमन ने पूरी बात बता दी—राधा ने खुद धन्यवाद कहा, डर नहीं दिखाया, और सामान्य स्वर में बात की। रेणु ने सुनकर धीरे से मुस्कुराया।
“अच्छा संकेत है। वह तुम्हें खतरा नहीं मान रही। धीरे-धीरे विश्वास बन रहा है। अब उसे और समय दो। रोज थोड़ी-थोड़ी बात बढ़ेगी।”
रेणु थोड़ा पास खिसकी। “आज की शिक्षा में थोड़ा बदलाव रखेंगे। सिर्फ एकतरफा नहीं।”
उसने अमन का चेहरा दोनों हाथों में लिया और अपने होंठ उसके होंठों से लगा दिए। चुंबन इस बार गहरा था। जीभ अंदर तक गई। अमन ने भी जवाब दिया। दोनों की साँसें तेज हो गईं। रेणु ने अमन का हाथ पकड़कर अपने स्तनों पर रखा—ब्लाउज के ऊपर से। फिर धीरे-धीरे उसके हाथ को ब्लाउज के अंदर ले गई। नंगे स्तन की गर्माहट अमन की हथेली में फैल गई।
“आज तुम भी कुछ करो,” रेणु ने फुसफुसाकर कहा। “सिर्फ लेते मत रहो।”
अमन ने हिम्मत करके रेणु के होंठ फिर से चूमे। इस बार उसने खुद पहल की। उसकी जीभ रेणु के मुँह में गई। एक हाथ से वह उसके स्तन को सहला रहा था। रेणु ने पैंट का नाड़ा खोला और अमन का लंड बाहर निकाला। दस इंच का तनाव उसकी मुट्ठी में आ गया। उसने धीरे-धीरे सहलाना शुरू किया, लेकिन बीच-बीच में रुक-रुककर अमन को चूमती रही।
अमन ने इस बार खुद नीचे झुकने की कोशिश की। रेणु ने उसके बाल पकड़कर रोका नहीं। अमन ने पहली बार खुद रेणु के निप्पल को मुँह में लिया। जीभ घुमाई। रेणु की सिसकारी निकली।
“हाँ… ऐसे ही… सीख रहे हो,” उसने धीमी आवाज में कहा।
थोड़ी देर दोनों एक-दूसरे को चूमते और छूते रहे। रेणु ने अमन के लंड को अपने हाथ में लेकर फिर से मुँह में लिया—लेकिन इस बार सिर्फ थोड़ी देर। फिर उसने खुद रोक दिया।
“बस। आज यहीं तक। तुमने खुद कोशिश की, यह अच्छी बात है। कल और आगे बढ़ेंगे।”
रेणु ने कपड़े ठीक किए। दरवाजे तक जाकर बोली,
“राधा के साथ धीरे-धीरे बढ़ो। बात करते रहो, लेकिन सीमा में रहो। और मुझसे कुछ मत छुपाना। जैसा आज बताया, वैसे ही आगे भी बताते रहना।”
वह चली गई।
अमन अकेला रह गया। होंठों पर रेणु के चुंबन का स्वाद था, हाथ पर उसके स्तन की गर्माहट, और मन में राधा की हल्की मुस्कान। पहली बार लगा कि चीजें सिर्फ शरीर तक सीमित नहीं रह गईं। दिल की बात भी शुरू हो चुकी थी—बहुत धीरे-धीरे।
वह लेट गया। आँखें खुली थीं।
कल फिर कॉलेज था। राधा शायद फिर बात करे। और रेणु की शिक्षा अब सिर्फ एकतरफा नहीं रह गई थी।

मंगलवार की सुबह अमन कॉलेज पहुँचा।
कक्षा में राधा पहले से बैठी थी। अमन अपनी जगह पर बैठते ही उसकी तरफ देखा। राधा ने इस बार हल्की मुस्कान दी—बहुत छोटी सी, लेकिन साफ। अमन ने भी मुस्कुराकर जवाब दिया। कोई बात नहीं हुई, लेकिन वह छोटी सी मुस्कान पूरे दिन उसके दिमाग में रही।
ब्रेक में दोनों फिर पानी की टंकी के पास मिले। राधा ने खुद पहले बात शुरू की।
“कल रात सो पाई तुम?” उसने धीमे स्वर में पूछा।
अमन ने सिर हिलाया। “तुम?”
राधा ने हल्की साँस छोड़ी। “अब बेहतर है। मन थोड़ा हल्का लग रहा है। तुमने जो किया… वह आसान नहीं था। ज्यादातर लड़के चुप रह जाते।”
अमन ने जवाब में सिर्फ इतना कहा, “जरूरी था।”
दोनों कुछ पल चुप रहे। फिर राधा ने अपनी किताब दबाई और बोली, “चलो, घंटी बजने वाली है।” वह चली गई, लेकिन जाते-जाते एक बार फिर पीछे मुड़कर अमन की तरफ देखा। अमन को लगा कि उनके बीच की दूरी थोड़ी और कम हुई है—बहुत धीरे, लेकिन कम हुई है।
शाम को घर लौटा तो आँगन में कविता कपड़े सुखा रही थी। साड़ी का पल्लू थोड़ा खिसका हुआ था। अमन के पास से गुजरते समय कविता ने सिर उठाया और उसकी तरफ देखा। निगाहें एक पल के लिए मिलीं। कविता ने कुछ नहीं कहा, बस हल्के से मुस्कुरा दी और फिर अपना काम करने लगी। अमन ने नजरें झुका लीं और अंदर चला गया।
रात के खाने के बाद रेणु आई। लालटेन लेकर। दरवाजा बंद करके बिस्तर के किनारे बैठ गई।
“आज राधा से फिर बात हुई?” उसने पूछा।
अमन ने बताया—राधा ने खुद बात शुरू की, धन्यवाद दोहराया, और जाते समय पीछे मुड़कर देखा। रेणु ने सुनकर संतुष्ट होकर सिर हिलाया।
“धीरे-धीरे बढ़ रहा है। अच्छा है। अब तुम भी थोड़ा आगे बढ़ो, लेकिन सीमा में। कभी-कभी खुद भी छोटी सी बात पूछ लिया करो—जैसे खाना खाया या नहीं, या पढ़ाई कैसी चल रही है। दबाव वाली बातें मत करना।”
रेणु थोड़ा करीब आई। “आज फिर तुम खुद कोशिश करना।”
उसने अमन का चेहरा पकड़कर चूम लिया। चुंबन गहरा था। अमन ने भी जवाब दिया। इस बार उसने खुद रेणु के होंठों को और गहराई से चूसा। एक हाथ से उसने रेणु के बाल सहलाए, दूसरे हाथ से उसकी कमर पकड़ ली। रेणु ने अमन का हाथ पकड़कर अपने स्तनों पर रखा—सीधे ब्लाउज के अंदर।
“आज तुम छुओ,” रेणु ने फुसफुसाकर कहा। “जैसा तुम्हें सही लगे।”
अमन ने दोनों स्तनों को धीरे-धीरे सहलाया। निप्पल उंगलियों के बीच ले करके हल्के से दबाए। रेणु की साँस तेज हो गई। उसने अमन की पैंट खोली और लंड बाहर निकाल लिया। इस बार उसने खुद नहीं चूसा। बल्कि अमन का हाथ पकड़कर अपने होंठों पर ले गई।
“आज तुम मेरे होंठों पर रखो,” उसने कहा।
अमन ने अपना लंड रेणु के होंठों पर लगाया। रेणु ने जीभ निकाली और सिर को चाटा। फिर धीरे से मुँह में लिया—लेकिन नियंत्रण अमन के हाथ में छोड़ दिया। अमन ने धीरे-धीरे आगे-पीछे किया। रेणु ने उसकी जाँघ पकड़ रखी थी। कुछ देर तक यही चला। फिर रेणु ने खुद पीछे हट गया।
“बस। आज इतना काफी है,” उसने कहा। आवाज थोड़ी भारी थी। “तुम खुद आगे बढ़ रहे हो। यह अच्छी बात है। कल और सीखेंगे।”
रेणु ने कपड़े ठीक किए। दरवाजे तक जाकर बोली,
“राधा के साथ यही गति रखो। धीरे-धीरे। और घर में आँखें खुली रखना। यहाँ भी बहुत कुछ चलता रहता है।”
वह चली गई।
अमन अकेला रह गया। होंठों पर रेणु का स्वाद था, हाथ पर उसके स्तनों की गर्माहट, और मन में राधा की छोटी सी मुस्कान। पहली बार लगा कि दोनों रिश्ते—एक घर के अंदर और एक कॉलेज में—बहुत धीमी गति से लेकिन सही दिशा में बढ़ रहे हैं।
वह लेट गया। आँखें खुली थीं।
कल फिर एक नया दिन था।


बुधवार की सुबह कॉलेज पहुँचते ही अमन की नजर राधा पर गई। वह अपनी जगह पर पहले से बैठी हुई थी। अमन के बैठते ही राधा ने सिर उठाया और इस बार हल्की लेकिन साफ मुस्कान दी। अमन ने भी मुस्कुराकर जवाब दिया। कक्षा के दौरान कई बार उनकी निगाहें मिलीं। हर बार राधा जल्दी से नजरें नहीं फेरेगी, बल्कि एक पल और देखती रहती।
ब्रेक की घंटी बजते ही अमन पानी की टंकी की तरफ गया। राधा भी लगभग उसी समय वहाँ पहुँची। दोनों अकेले थे। थोड़ी देर तक कोई नहीं बोला। फिर राधा ने अपनी किताब दोनों हाथों में दबाए हुए धीमे स्वर में कहा,
“अमन… एक बात कहनी थी।”
अमन ने उसकी तरफ पूरा ध्यान दिया।
“पास वाले गाँव में इस रविवार को बड़ा मेला लग रहा है। मैं बचपन से सुनती आई हूँ लेकिन कभी जा नहीं पाई। अकेली नहीं जा सकती… और घर वाले भी नहीं जाने देंगे। तुम मेरे साथ चलोगे? पूरी तरह चुपके से। किसी को कुछ पता नहीं चलना चाहिए।”
अमन कुछ पल चुप रहा। माँ का चेहरा आँखों के सामने आ गया। माँ आसानी से बाहर जाने की अनुमति नहीं देती थीं, खासकर लड़की के साथ। राधा उसकी चुप्पी समझ गई। उसने जल्दी से कहा,
“अगर मुश्किल है तो छोड़ दो। मैंने सिर्फ सोचा कि तुम… भरोसे के लायक हो।”
अमन ने सिर हिलाया। “मैं चलूँगा। लेकिन घर पर कैसे कहूँ, यह सोचना पड़ेगा। शाम को या कल सुबह तक बताता हूँ।”
राधा के चेहरे पर राहत की हल्की मुस्कान फैली। “ठीक है। मैं इंतजार करूँगी।” दोनों कुछ पल और खड़े रहे। न कोई और बात हुई, न कोई वादा। लेकिन हवा में एक नया तरह का विश्वास तैर रहा था।
शाम को घर लौटकर अमन ने सामान्य दिनचर्या निभाई। खाना खाया, थोड़ी देर किताब खोली, लेकिन दिमाग मेले और माँ को मनाने के तरीके में उलझा रहा। रात के बारह बजते-बजते रेणु आई। लालटेन की रोशनी कम थी। उसने दरवाजा बंद किया, सिटकिनी लगाई और बिस्तर के किनारे बैठ गई।
अमन ने देर नहीं लगाई। “दीदी, राधा ने मेले में चलने को कहा है। पास वाले गाँव में। रविवार को। चुपके से। लेकिन माँ को कैसे मनाऊँ? सीधे कहूँगा तो मना कर देंगी।”
रेणु ने अमन की आँखों में देखा। थोड़ी देर सोचा, फिर बोली,
“सीधे मेला मत कहना। कहना कि कॉलेज का ग्रुप प्रोजेक्ट है। पास के गाँव में जाकर कुछ जानकारी इकट्ठा करनी है। दो-तीन और लड़के भी जा रहे हैं। शिक्षक ने कहा है कि शाम तक लौटना है। पढ़ाई का नाम आते ही माँ ज्यादातर बार मान जाती हैं। आज़माकर देखना। अगर और पूछें तो कह देना कि बहुत जरूरी है, नंबर में फायदा होगा।”
अमन ने सिर हिलाया। रेणु थोड़ा और करीब खिसकी। उसकी आँखों में वह परिचित चमक थी।
“अब आज की शिक्षा की बारी है। आज तुम और आगे बढ़ोगे।”
रेणु ने दोनों हाथों से अमन का चेहरा पकड़ा और अपने होंठ उसके होंठों से लगा दिए। चुंबन धीरे शुरू हुआ, फिर गहरा होता गया। जीभ अंदर तक चली गई। अमन ने भी जवाब दिया। दोनों की साँसें तेज हो गईं। रेणु ने अमन की पैंट का नाड़ा खोला और उसका लंड बाहर निकाल लिया। दस इंच का तनाव उसकी मुट्ठी में आ गया। वह झुकी और लंड को मुँह में ले लिया। पहले सिर्फ सिर चूसा, फिर धीरे-धीरे और गहराई तक ले गई। जीभ घुमाती रही। अमन की उंगलियाँ उसके बालों में फँस गईं।
कुछ देर तक रेणु उसे चूसती रही। फिर अमन ने अचानक खुद से हाथ बढ़ाया। उसने रेणु की सलवार के ऊपर से ही उसकी चूत पर हथेली रख दी। रेणु की लंबी सिसकारी निकली। लंड उसके मुँह से बाहर निकल आया।
“अमन…” उसकी आवाज काँप रही थी।
अमन ने उसे फिर से चूम लिया। चुंबन के दौरान ही उसने रेणु को धीरे-धीरे बिस्तर पर लिटा दिया। एक हाथ से उसके स्तन सहला रहा था और दूसरा हाथ सलवार के ऊपर से उसकी चूत पर गोल-गोल फेर रहा था। नमी बढ़ती जा रही थी। रेणु की कमर हल्के-हल्के हिलने लगी। उसकी साँसें तेज हो गईं।
थोड़ी देर बाद अमन उठा। उसने दोनों हाथों से रेणु की सलवार और पैंटी एक साथ पकड़ी और नीचे खींच ली। रेणु की गीली, हल्की गुलाबी चूत पूरी तरह सामने आ गई। अमन बिना किसी हिचकिचाहट के झुक गया और अपनी जीभ सीधे उसकी चूत पर रख दी।
“आह्ह्ह्ह… अमन…” रेणु की लंबी और कामुक सिसकारी निकली।
अमन ने जीभ से चाटना शुरू किया। पहले धीरे-धीरे नीचे से ऊपर की ओर। फिर बीच की सबसे संवेदनशील जगह पर जीभ को गोल-गोल घुमाने लगा। रेणु की जाँघें काँपने लगीं। उसने एक हाथ उठाकर अमन के सिर पर रखा और उसे अपनी चूत पर और जोर से दबाने लगी।
“जीभ अंदर डालो… हाँ… ऐसे… और गहरा… चूसो… वहीं… वहीं रखो… मत रोको…”
अमन ने जीभ अंदर तक डाली और तेजी से अंदर-बाहर करने लगा। साथ ही ऊपर वाली घुंडी को भी चूसता और चाटता रहा। रेणु अब पागलों की तरह सिसकारियाँ ले रही थी। उसकी कमर बार-बार बिस्तर से उठ रही थी। नाखून अमन के बालों में गड़ गए थे।
“हाँ… ऐसे ही… बहुत अच्छा… अमन… मैं… आ रही हूँ… मत छोड़ना… जीभ मत निकालना…”
अमन ने और तेज कर दिया। जीभ अंदर तक डाले हुए वह ऊपर की जगह को भी लगातार चाट रहा था। कुछ ही पल में रेणु का पूरा शरीर अकड़ गया। उसकी कमर जोर से उठी, जाँघें काँपने लगीं और एक लंबी, दबी हुई चीख निकलते हुए उसका पानी अमन की जीभ, होंठ और ठुड्डी पर छूट गया। रेणु कई सेकंड तक काँपती रही। फिर उसका शरीर पूरी तरह ढीला पड़ गया। साँसें तेज चल रही थीं। छाती ऊपर-नीचे हो रही थी।
अमन धीरे से उठा। उसके होंठ और ठुड्डी चमक रहे थे। रेणु ने आँखें खोलीं। चेहरे पर गहरी संतुष्टि और थकान दोनों साफ थे। उसने अमन को अपनी तरफ खींचकर उसके माथे पर लंबा चुंबन दिया।
“बहुत अच्छा किया,” उसने थकी हुई लेकिन खुश आवाज में कहा। “अगर तुम किसी भी लड़की, भाभी या औरत को ऐसे चूसोगे… तो वह तुम्हारे सामने खुद अपनी चूत खोलकर लेट जाएगी। कोई मना नहीं कर पाएगी।”
रेणु ने गहरी साँस ली। आँखों में एक अलग सी चमक थी—गर्व और खुशी मिली-जुली।
“तुम तेजी से सीख रहे हो अमन। एक परफेक्ट मर्द बनाने में अब बस कुछ ही कदम बाकी हैं। शरीर भी संभालना सीख रहे हो, दिमाग भी, और दिल भी।”
उसने धीरे-धीरे सलवार ऊपर की और बिस्तर पर उठकर बैठ गई।
“माँ को जैसे बताया है वैसे कहना। रविवार को मेला जाना। राधा के साथ सीमा में रहना। और मुझसे कुछ मत छुपाना।”
रेणु ने लालटेन उठाई और दरवाजे तक गई। मुड़कर एक बार फिर अमन को देखा, फिर चुपचाप चली गई।
अमन अकेला रह गया। मुँह में रेणु का स्वाद अभी भी बाकी था। शरीर में एक नई तरह की शक्ति और आत्मविश्वास घूम रहा था। मन में मेले का विचार और राधा की मुस्कान दोनों एक साथ थे।
कल माँ को मनाना था। रविवार को राधा के साथ पहली बार अकेले कहीं जाना था। और रातें अब और गहरी होती जा रही थीं।

गुरुवार की सुबह अमन ने नाश्ते के समय माँ को बात रखी।
सुशीला रसोई में रोटी बना रही थीं। अमन ने उनके पास जाकर सामान्य स्वर में कहा,
“माँ, कॉलेज का एक ग्रुप प्रोजेक्ट है। पास वाले गाँव में जाकर कुछ जानकारी इकट्ठा करनी है। शिक्षक ने कहा है कि दो-तीन लड़के साथ जाएँ। रविवार को जाना है। शाम तक लौट आऊँगा।”
सुशीला ने रोटी हाथ में लिए हुए उसकी तरफ देखा। “कौन-कौन जा रहा है?”
अमन ने पहले से सोची हुई बात कही, “राहुल और एक-दो और लड़के। प्रोजेक्ट के नंबर अच्छे आएँगे तो बोर्ड में फायदा रहेगा।”
सुशीला कुछ पल चुप रही। फिर बोली, “ठीक है। लेकिन शाम को देर मत करना। और ध्यान रखना।”
अमन ने मन ही मन राहत की साँस ली। रेणु की सलाह काम आ गई थी।
कॉलेज पहुँचते ही उसने राधा को संकेत किया। ब्रेक में दोनों पानी की टंकी के पीछे मिले। अमन ने धीमे स्वर में कहा,
“माँ मान गईं। रविवार को चल सकते हैं।”
राधा के चेहरे पर खुशी साफ झलकी। उसने हल्की मुस्कान दी। “सच? तो फिर सुबह आठ बजे गाँव के बाहर वाली सड़क पर मिलते हैं। वहाँ से बस मिल जाएगी।”
अमन ने सिर हिलाया। दोनों कुछ पल और खड़े रहे। राधा ने इस बार थोड़ा और देर तक उसकी आँखों में देखा, फिर धीरे से बोली, “शुक्रिया अमन… तुमने सच में मदद की।” वह चली गई, लेकिन उसके चेहरे की मुस्कान अमन के दिमाग में रह गई।
शाम को घर लौटा तो आँगन में कमला चाची बैठी थीं। उन्होंने अमन को देखकर बुलाया। जब वह पास गया तो कमला ने उसके बाल सहलाते हुए कहा, “अब तुम सच में बड़े लगने लगे हो। पहले जैसे बच्चे नहीं रहे।” उसकी उंगलियाँ गर्दन पर थोड़ी देर रुक गईं। अमन ने विनम्रता से सिर हिलाया और अंदर चला गया।
रात के बारह बजे रेणु आई। लालटेन की रोशनी कम थी। उसने दरवाजा बंद किया और बिस्तर के किनारे बैठ गई।
“माँ मान गईं?” उसने पूछा।
अमन ने बताया कि हाँ, प्रोजेक्ट वाला बहाना काम आ गया। राधा से भी मिल लिया है, रविवार को जाना तय हो गया।
रेणु ने संतुष्ट होकर सिर हिलाया। “अच्छा। अब सीमा में रहना। मेला में बहुत भीड़ होती है। किसी गलत इरादे वाले से बचकर रहना। और राधा का ख्याल रखना।”
फिर वह थोड़ा करीब आई। “आज की शिक्षा जारी रखेंगे।”
रेणु ने अमन का चेहरा दोनों हाथों में लिया और गहराई से चूम लिया। जीभ अंदर तक गई। अमन ने भी जवाब दिया। दोनों की साँसें तेज हो गईं। रेणु ने अमन की पैंट खोली और लंड निकालकर पहले की तरह मुँह में ले लिया। धीरे-धीरे, गहराई से चूसने लगी। अमन की उंगलियाँ उसके बालों में फँस गईं।
इस बार अमन ने खुद पहल की। उसने रेणु को चूमते हुए बिस्तर पर लिटा दिया। एक हाथ से उसके स्तन सहलाए, दूसरे हाथ से सलवार के ऊपर से उसकी चूत पर फेरने लगा। नमी जल्दी बढ़ गई। रेणु की कमर हिलने लगी।
थोड़ी देर बाद अमन ने उसकी सलवार और पैंटी एक साथ नीचे कर दी। रेणु की गीली चूत सामने आ गई। अमन झुक गया और जीभ से चाटना शुरू किया। पहले धीरे, फिर तेजी से। बीच वाली जगह पर जीभ घुमाता, चूसता, कभी अंदर डालता।
रेणु की सिसकारियाँ तेज हो गईं। उसने दोनों हाथों से अमन का सिर पकड़ लिया और उसे अपनी चूत पर और जोर से दबाने लगी।
“हाँ… ऐसे ही… जीभ अंदर… और तेज… अमन… बहुत अच्छा…”
अमन ने जीभ अंदर तक डाले हुए ऊपर की घुंडी को भी लगातार चाटा। रेणु की जाँघें काँपने लगीं। उसकी कमर बार-बार उठ रही थी। कुछ ही देर में उसका शरीर अकड़ गया। लंबी सिसकारी निकलते हुए उसका पानी अमन के मुँह पर छूट गया। रेणु कई सेकंड तक काँपती रही, फिर ढीली पड़ गई।
अमन उठा। रेणु ने आँखें खोलीं। चेहरे पर संतुष्टि साफ थी। उसने अमन को अपनी तरफ खींचकर उसके होंठों पर चुंबन दिया।
“तुम दिन-ब-दिन बेहतर हो रहे हो,” उसने धीमी आवाज में कहा। “रविवार को मेले में जाओ। राधा का ख्याल रखना। और लौटकर मुझे सब बताना।”
रेणु ने कपड़े ठीक किए। दरवाजे तक जाकर बोली,
“अब तुम सिर्फ शरीर नहीं संभाल रहे। दिमाग और दिल भी संभालना सीख रहे हो। यही तुम्हें बाकियों से अलग बनाएगा।”
वह चली गई।
अमन अकेला रह गया। मुँह में रेणु का स्वाद था। मन में रविवार का मेला और राधा की मुस्कान दोनों घूम रहे थे। शरीर में एक नई तरह का विश्वास था।
कल फिर कॉलेज था। फिर एक दिन और। फिर रविवार।
और हर रात के साथ वह थोड़ा और बदल रहा था।

शुक्रवार की सुबह कॉलेज में ब्रेक का समय था। अमन और राधा पानी की टंकी के पीछे खड़े थे। आसपास कोई नजदीक नहीं था, लेकिन थोड़ी दूर पेड़ों और पुरानी दीवार के कोने से एक छाया कभी-कभी हिलती हुई महसूस हो रही थी। अमन को लगा कोई उन्हें देख रहा है, लेकिन उसने राधा से कुछ नहीं कहा।
राधा ने धीमे स्वर में पूछा, “मेले में सबसे पहले क्या देखोगे?”
अमन ने जवाब दिया, “पहले पूरी जगह घूम लेंगे। देखेंगे कहाँ-कहाँ क्या है। झूले जरूर होंगे। बड़े-बड़े वाला झूला और छोटा वाला भी। फिर खाने की दुकानें—चना-भुनना, जलेबी, कुल्फी… जो तुम्हें अच्छा लगे।”
राधा की आँखों में हल्की चमक आ गई। “मैं झूले जरूर बैठूँगी। तुम साथ रहना, ऊँचा वाला झूला थोड़ा डरावना लगता है। और एक दुकान पर रंग-बिरंगे गुब्बारे मिलते हैं, वह भी लूँगी। फिर अगर सर्कस या जादू का खेल लगा हो तो वह भी देखेंगे। शाम को वापस लौटते समय कोई छोटी सी चीज यादगार के लिए ले लेंगे।”
अमन ने सिर हिलाया। “हाँ। भीड़ में तुम मेरे पास ही रहना। कहीं दूर मत जाना।”
राधा ने हल्की मुस्कान दी। “तुम भी। अकेले मत खो जाना।” दोनों हँसे। बातचीत सहज और हल्की थी। लेकिन अमन बार-बार महसूस कर रहा था कि कोई उनकी तरफ देख रहा है। उसने एक बार पीछे मुड़कर देखा। दीवार के कोने पर कोई छाया जल्दी से हट गई। कोई साफ नहीं दिखा। अमन ने बात जारी रखी, लेकिन मन में सवाल रह गया।
शाम को घर लौटा तो आँगन में कमला चाची चारपाई पर बैठी थीं। उन्होंने अमन को देखते ही बुलाया।
“इधर आओ बेटा।”
अमन पास गया। कमला चाची ने उसका हाथ पकड़ा और उसे थोड़ा नीचे झुकाया। फिर उसके दाहिने गाल पर हल्का लेकिन साफ चुंबन कर दिया। गाल पर उनके होंठों की गर्माहट और हल्की नमी रह गई।
“बड़े हो गए हो अब,” कमला ने धीमी आवाज में कहा। आँखों में एक अजीब सी चमक थी। “पहले जैसे बच्चे नहीं रहे। अब ध्यान रखना… अपना भी, और घर का भी। समझे?”
अमन ने विनम्रता से सिर हिलाया। “हाँ चाची।” कमला ने उसके बाल एक बार सहलाए, फिर छोड़ दिया। अमन अंदर चला गया। गाल पर अभी भी उनके चुंबन का अहसास बाकी था।
रात के खाने पर पूरा परिवार बैठा था। बाबा, पिता सुरेश, माँ सुशीला, रेणु, कविता और बाकी लोग। खाना चल रहा था जब अमन ने पिता की तरफ देखा और सामान्य स्वर में कहा,
“पिताजी, रविवार को कॉलेज का ग्रुप प्रोजेक्ट है। पास वाले गाँव में जाकर कुछ जानकारी इकट्ठा करनी है। दो-तीन और लड़के भी जाएँगे। शाम तक लौट आऊँगा।”
सुरेश ने उसकी तरफ देखा। कुछ पल चुप रहे, फिर बोले, “ठीक है। ध्यान से जाना। कोई गलत कंपनी में मत पड़ना। शाम को देर मत करना।”
माँ ने भी सिर हिला दिया। “खाना खाकर जाना और समय पर लौटना।” बात वहीं खत्म हो गई। अमन ने मन ही मन राहत महसूस की।
रात के बारह बजे रेणु आई। लालटेन लेकर। दरवाजा बंद करके सिटकिनी लगाई और बिस्तर के किनारे बैठ गई।
“सब बताओ,” उसने कहा।
अमन ने विस्तार से बताया—राधा से मेले की बातें, पीछे कोई देख रहा था, कमला चाची का गाल पर चुंबन और उनकी बात, और पिता को बताने का तरीका।
रेणु ने ध्यान से सुना। “पीछे कोई देख रहा था… गाँव में आँखें बहुत होती हैं। सावधान रहना। कमला चाची की बात भी नोट कर लो। वे बिना मतलब के कुछ नहीं कहतीं।”
फिर वह थोड़ा करीब आई। आँखों में वह चमक थी। “आज की शिक्षा थोड़ी अलग होगी।”
रेणु ने अमन का चेहरा दोनों हाथों में लिया और गहराई से चूम लिया। जीभ अंदर तक गई। अमन ने भी जवाब दिया। दोनों की साँसें तेज हो गईं। चुंबन लंबा चला। बीच-बीच में दोनों एक-दूसरे के होंठ काटते और फिर गहराई से चूमते रहे।
रेणु ने अमन की पैंट खोली और लंड बाहर निकाला। अमन ने भी उसकी सलवार और पैंटी नीचे की। फिर रेणु ने अमन को बिस्तर पर लिटाया और खुद उसके ऊपर उल्टी दिशा में लेट गई—69 की पोजीशन में।
उसका मुँह अमन के लंड के सामने था और उसकी चूत अमन के मुँह के ऊपर। रेणु ने बिना देर किए अमन का लंड मुँह में ले लिया और गहराई से चूसने लगी। अमन ने भी उसकी गीली चूत पर जीभ फेर दी। दोनों एक साथ एक-दूसरे को चूसने और चाटने लगे।
रेणु की सिसकारियाँ लंड मुँह में होने की वजह से दबी हुई निकल रही थीं। अमन की जीभ उसकी चूत के अंदर और बाहर जा रही थी। ऊपर वाली घुंडी को वह लगातार चूस रहा था। रेणु भी अमन के लंड को गहराई तक ले जाकर चूस रही थी। दोनों की साँसें तेज थीं। शरीर काँप रहे थे।
थोड़ी देर बाद रेणु की जाँघें जोर से काँपने लगीं। उसने अमन का लंड और गहराई तक ले लिया और उसी समय उसका पानी अमन के मुँह पर छूट गया। अमन भी खुद को रोक नहीं सका। उसका पानी रेणु के मुँह में छूट गया। दोनों एक साथ चरम पर पहुँचे।
कुछ देर तक दोनों उसी हालत में पड़े रहे। साँसें तेज चल रही थीं। फिर रेणु धीरे से एक तरफ हट गई। उसने मुँह साफ किया और अमन के पास लेट गई।
“आज तुमने अच्छी तरह निभाया,” उसने थकी हुई आवाज में कहा। “रविवार को मेले में जाओ। राधा का ख्याल रखना। और जो कुछ भी हो… लौटकर मुझे सब बताना।”
रेणु ने कपड़े ठीक किए। दरवाजे तक जाकर बोली,
“अब तुम शरीर और दिल दोनों संभालना सीख रहे हो। यही तुम्हें आगे ले जाएगा।”
वह चली गई।
अमन अकेला रह गया। शरीर में थकान और संतुष्टि दोनों थी। गाल पर कमला चाची के चुंबन का अहसास, मुँह में रेणु का स्वाद, और मन में मेले का इंतजार—सब एक साथ घूम रहे थे। साथ ही वह अज्ञात व्यक्ति जो उन्हें कॉलेज में देख रहा था, उसका सवाल भी दिमाग में बाकी था।

शनिवार की सुबह अमन कॉलेज गया।
आज रविवार वाले मेले का इंतजार साफ महसूस हो रहा था। ब्रेक में राधा पहले से पानी की टंकी के पास खड़ी थी। अमन के पास आते ही उसने हल्की मुस्कान दी।
“कल के लिए तैयार हो?” राधा ने धीमे स्वर में पूछा।
अमन ने सिर हिलाया। “हाँ। सुबह आठ बजे वाली सड़क पर मिलना है न?”
राधा ने हाँ कहा। दोनों थोड़ी देर खड़े रहे। अमन ने इस बार थोड़ी हिम्मत करके कहा,
“तुम आज और सुंदर लग रही हो। बाल ऐसे खुले हुए अच्छे लगते हैं।”
राधा का चेहरा हल्का सा लाल हो गया। उसने नजरें झुकाईं, लेकिन मुस्कान छुप नहीं पाई। “बातें मत बनाओ।”
अमन ने हल्के से हँसते हुए कहा, “बना नहीं रहा। सच कह रहा हूँ।”
राधा ने उसकी तरफ देखा। आँखों में एक नई तरह की नजदीकी थी। “तुम भी… अब पहले जैसे नहीं लगते। कुछ बदल गए हो।”
दोनों हँसे। बातचीत में हल्का सा फ्लर्ट का पुट आ गया था। वे इतने में व्यस्त थे कि पीछे दीवार के कोने पर खड़ी छाया को बिल्कुल महसूस नहीं कर पाए। कोई उन्हें चुपके से देख रहा था—बहुत देर तक। दोनों को जरा भी अंदाजा नहीं हुआ।
शाम को घर लौटा तो आँगन में कमला चाची अकेली बैठी थीं। उन्होंने अमन को देखते ही बुलाया।
“इधर आओ।”
अमन पास गया। कमला चाची ने उसका हाथ पकड़ा और इस बार पहले से थोड़ा ज्यादा देर तक पकड़े रखा।
“आज चेहरा खिल रहा है,” उन्होंने धीमी आवाज में कहा। “कोई खास बात है क्या?”
अमन ने इस बार पीछे नहीं हटा। उसने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया, “चाची जब बुलाती हैं तो चेहरा खिल ही जाता है।”
कमला चाची एक पल के लिए ठिठक गईं। उनकी आँखों में हल्का सा अचरज दिखा, लेकिन उन्होंने जल्दी से सामान्य मुस्कान बना ली। उंगलियाँ अमन की कलाई पर थोड़ी और रुक गईं।
“बातें बनाना सीख गए हो लगते हो,” उन्होंने धीरे से कहा। आवाज में नाराजगी नहीं थी। बल्कि एक अजीब सी स्वीकृति थी। “जाओ, हाथ-मुँह धो लो।”
अमन ने सिर हिलाया और अंदर चला गया। मन में हल्की सी जीत का अहसास था। पहली बार उसने कमला चाची की फ्लर्टिंग का जवाब दिया था।
रात का खाना खत्म होने के बाद अमन अपने कमरे में आया। आज रेणु के आने का समय बीतता जा रहा था, लेकिन कोई दस्तक नहीं हुई। थोड़ी देर बाद कविता ने दरवाजे पर आकर कहा,
“रेणु दीदी रिश्तेदारों के घर गई हैं। आज रात नहीं आएंगी। कल लौटेंगी।”
अमन ने सिर हिलाया। पहली बार कई रातों बाद रेणु नहीं आने वाली थी। कमरा खाली-खाली लग रहा था। उसने खिड़की से बाहर देखा। हवेली शांत थी।
वह बिस्तर पर लेट गया। दिमाग में राधा की मुस्कान, कमला चाची की अचरज भरी निगाहें, और वह अज्ञात व्यक्ति जो उन्हें कॉलेज में देख रहा था—सब घूम रहे थे। साथ ही रविवार का मेला अब बस कुछ घंटों दूर था।
आज रात अमन अकेला सोया। पहली बार बिना रेणु की शिक्षा के।
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albertprince547;
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#24
Very good update Aman or Renu kafi aage Tak badh gaye hain baat 69 tak agayi hai Radha se bhi najdikiyan badh rahi hain Mele mein kuchh to hoga hi Saya kon hai shayad Raziya and party mein se koi Kamla Chachi bhi intrest le rahi hai Renu bina bataye Chali gayi Kavita ne inform Kiya matlab ghar walon ko Renu ke Aman ki class ka routeen pata hai ya sirf Kavita ko inform karne ka bol ke gayi hai or khas baat ghar mein bhi koi activity nahi ho rahi hai ya Aman dhyan nahi de pa raha hai Renu ke bolne ke baad bhi..... Waiting for next eagerly kal bhi pure din wait Kiya tha
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#25
(12-09-2026, 07:30 AM)Skb21 Wrote: Very good update Aman or Renu kafi aage Tak badh gaye hain baat 69 tak agayi hai Radha se bhi najdikiyan badh rahi hain Mele mein kuchh to hoga hi Saya kon hai shayad Raziya and party mein se koi Kamla Chachi bhi intrest le rahi hai Renu bina bataye Chali gayi Kavita ne inform Kiya matlab ghar walon ko Renu ke Aman ki class ka routeen pata hai ya sirf Kavita ko inform karne ka bol ke gayi hai or khas baat ghar mein bhi koi activity nahi ho rahi hai ya Aman dhyan nahi de pa raha hai Renu ke bolne ke baad bhi..... Waiting for next eagerly kal bhi pure din wait Kiya tha

Thanks for your support brother ☺️
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albertprince547;
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#26
रविवार की सुबह अमन आठ बजे से थोड़ा पहले ही गाँव के बाहर वाली सड़क पर पहुँच गया।
थोड़ी देर बाद राधा भी आ गई। हल्के गुलाबी रंग की सलवार-सूट में थी। बालों में दो छोटी लटें बाँधी हुई थीं। चेहरे पर हल्की सिंदूरी चमक और आँखों में उत्साह साफ दिख रहा था। अमन ने उसे देखते ही मुस्कुरा दिया।
“तैयार हो?” उसने पूछा।
राधा ने सिर हिलाया। “हाँ। चलो।”
दोनों पास वाली बस स्टैंड तक पैदल गए। छोटी सी बस आई। भीड़ कम थी। दोनों ने टिकट लिया और खिड़की वाली सीट पर बैठ गए। रास्ता लगभग आधे घंटे का था। खिड़की से हरे-भरे खेत, छोटे-छोटे तालाब और दूर तक फैली धूल भरी सड़क दिख रही थी। दोनों ज्यादा बात नहीं कर रहे थे, लेकिन सन्नाटा असहज नहीं लग रहा था।
मेला जिस मैदान में लगा था, वह गाँव के किनारे एक बड़ा खुला मैदान था। दूर से ही रंग-बिरंगे झंडे, गुब्बारे और लाउडस्पीकर की आवाजें सुनाई देने लगीं। जैसे-जैसे बस पास पहुँची, नजारा और साफ होता गया।
मेला सच में बहुत बड़ा था।
एक तरफ ऊँचे-ऊँचे झूले लगे थे—कुछ लोहे के बड़े वाले, कुछ लकड़ी के पारंपरिक। दूसरी तरफ खाने की लंबी कतारें थीं। तंदूरी चना, जलेबी की कड़ाहियाँ, गोलगप्पे, चाट, कुल्फी, मकई भुनी हुई… हर तरफ खुशबू फैली हुई थी। बीच में एक छोटा सा सर्कस का तंबू लगा था। जादूगर की दुकान पर बच्चे जमा थे। आगे की तरफ मिट्टी के बर्तन, खिलौने, चूड़ियाँ, बिंदियाँ और सस्ते गहने बेचने वाले दुकानदार चिल्ला-चिल्लाकर ग्राहक बुला रहे थे। धूल हवा में उड़ रही थी, लेकिन धूप अभी नरम थी। बच्चों की चीखें, हँसने की आवाजें और लाउडस्पीकर पर बजता पुराना गाना—सब मिलकर एक जीवंत माहौल बना रहे थे।
अमन और राधा बस से उतरे। दोनों एक पल के लिए रुककर पूरा नजारा देखते रहे।
“बड़ा है,” राधा ने धीमे स्वर में कहा। आँखें चमक रही थीं।
अमन ने सिर हिलाया। “पहले झूले चलें?”
राधा ने तुरंत हाँ कह दी।
वे भीड़ के बीच से होते हुए झूलों की तरफ बढ़े। ऊँचा वाला लोहे का झूला देखकर राधा थोड़ी हिचकिचाई। अमन ने कहा, “छोटा वाला पहले बैठते हैं। फिर चाहो तो ऊँचे वाले पर।”
दोनों ने छोटे झूले पर जगह बनाई। झूला आगे-पीछे होने लगा। राधा पहले थोड़ी सख्ती से बैठी हुई थी, लेकिन धीरे-धीरे वह हँसने लगी। बाल हवा में उड़ रहे थे। अमन उसके बगल में बैठा उसे देख रहा था। राधा की हँसी साफ और बेफिक्र थी—जैसी वह कॉलेज में कभी नहीं हँसी थी।
झूला रोकने के बाद राधा ने कहा, “अब जलेबी खाते हैं।”
वे जलेबी वाली दुकान पर गए। गरम-गरम जलेबी की कड़ाही में तेल खौल रहा था। अमन ने दो प्लेट लीं। दोनों ने एक साथ जलेबी तोड़ी। राधा के होंठों पर मीठा चिपक गया। उसने हँसते हुए कहा, “बहुत गरम है।” अमन ने भी हँसी में सिर हिलाया। दोनों ने खड़े-खड़े जलेबी खाई। आसपास भीड़ थी, धूल थी, शोर था, लेकिन उन दोनों को जैसे अपना एक छोटा सा संसार मिल गया हो।
जलेबी के बाद राधा ने चाट की तरफ इशारा किया। “अब वह भी खाते हैं।”
चाट वाले ने दो प्लेट में भरकर दी—पूरी, आलू, चना, दही, चटनी और सेव। दोनों ने एक साथ खाया। राधा की आँखें तीखे स्वाद से भर आईं। उसने पानी माँगा। अमन ने हँसते हुए पानी का गिलास पकड़ा दिया।
“बहुत तीखा कर दिया साले ने,” राधा ने कहा और हँसी।
अमन ने भी हँसी में जवाब दिया, “तुम्हारे चेहरे से लग रहा है।”
दोनों फिर हँसे।
खाना खाने के बाद वे धीरे-धीरे मेले में घूमने लगे। कभी गुब्बारे वाली दुकान के पास रुके, कभी मिट्टी के खिलौने देखे, कभी बच्चों को सर्कस के तंबू में घुसते देखा। राधा कभी-कभी अमन का हाथ पकड़ लेती जब भीड़ ज्यादा हो जाती। अमन उसका हाथ छोड़ता नहीं था। दोनों एक-दूसरे के साथ इतनी आसानी से चल रहे थे जैसे सालों से साथ घूम रहे हों।
दूर लाउडस्पीकर पर कोई पुराना गाना बज रहा था। धूप अब थोड़ी तेज हो चली थी। हवा में धूल और मिठास की मिली-जुली खुशबू तैर रही थी।
अमन ने राधा की तरफ देखा। वह गुब्बारे की दुकान पर खड़ी एक लाल गुब्बारा चुन रही थी। उसके चेहरे पर जो शांति और खुशी थी, वह अमन ने पहली बार देखी थी।
मेला अभी शुरू ही हुआ था।

जलेबी और चाट खा लेने के बाद दोनों ने थोड़ी देर और मेला घूमा। धूप अब तेज हो चली थी। लाउडस्पीकर पर गाने बदलते जा रहे थे। तभी राधा की नजर एक बड़े तंबू पर पड़ी। तंबू के बाहर बड़े-बड़े पोस्टर लगे थे—जादूगर की तस्वीर और नीचे लिखा था “लड़की को टुकड़े-टुकड़े करके फिर जोड़ने वाला अद्भुत जादू”।
राधा ने अमन का हाथ हल्के से खींचते हुए कहा, “चलो यह देखें।”
अमन ने सिर हिलाया। दोनों तंबू के अंदर घुसे। अंदर काफी अँधेरा था। आगे की तरफ छोटी सी स्टेज बनी हुई थी। बीच में रोशनी का एक घेरा था, बाकी जगह धुँधली। लोग आगे की कुर्सियों पर बैठे थे। आखिरी कोने में दो खाली सीटें बची थीं—दीवार के बिल्कुल पास, जहाँ रोशनी लगभग नहीं पहुँच रही थी।
अमन और राधा वहीं जाकर बैठ गए। जगह कम थी। दोनों के कंधे एक-दूसरे से छू रहे थे। बैठते समय राधा का हाथ अनजाने में अमन के हाथ पर पड़ गया। उसने हटाया नहीं। अमन ने भी नहीं हटाया। दोनों के हाथ अँधेरे में एक-दूसरे से जुड़े रह गए।
थोड़ी देर बाद जादूगर स्टेज पर आया। काले कपड़ों में था। उसने जोर-जोर से बातें कीं, फिर एक लड़की को स्टेज पर बुलाया। लड़की एक लंबे बक्से में लेट गई। जादूगर ने बक्से के ढक्कन बंद किए और बड़ी आरी निकालकर बक्से को बीच से काटना शुरू कर दिया। आरी की आवाज और जादूगर की जोर-जोर से की गई बातें तंबू में गूँज रही थीं।
राधा की पकड़ अमन के हाथ पर अचानक कस गई। जब जादूगर ने बक्से के दोनों हिस्से अलग किए और लड़की के शरीर के दो टुकड़े दिखाए, तो राधा डरकर अमन की तरफ झुक गई। उसका शरीर अमन के शरीर से चिपक गया।
“डर लग रहा है…” उसने बहुत धीमी आवाज में कहा। आवाज काँप रही थी।
अमन ने उसका हाथ और कसकर पकड़ लिया। फिर धीरे से अपना दूसरा हाथ बढ़ाकर उसकी कमर पर रख दिया और उसे अपनी तरफ खींच लिया। राधा पूरी तरह उसकी बाँहों में समा गई। अमन ने उसे अपने से सटा लिया। राधा का सिर उसके कंधे के पास था। उसकी साँसें तेज चल रही थीं।
स्टेज पर जादूगर बक्से के दोनों हिस्से जोड़ रहा था। लेकिन अँधेरे कोने में बैठे दोनों को अब जादू से ज्यादा एक-दूसरे की गर्माहट महसूस हो रही थी। राधा अमन की बाँहों में सिमटी हुई थी। अमन उसके बालों में मुँह किए हुए था। दोनों की साँसें एक-दूसरे से मिल रही थीं।
जादू खत्म हुआ। लोग ताली बजाने लगे। रोशनी थोड़ी बढ़ी। राधा ने धीरे से अमन की बाँहों से खुद को अलग किया। उसका चेहरा लाल हो चुका था। आँखें झुकी हुई थीं।
“मैं… डर गई थी,” उसने बहुत धीमी आवाज में कहा। शर्म से उसका गला बैठ गया था।
अमन ने भी धीमे स्वर में जवाब दिया, “कोई बात नहीं।”
दोनों तंबू से बाहर निकले। धूप में आने के बाद भी राधा का चेहरा लाल था। वह अमन की तरफ सीधे देख नहीं पा रही थी। अमन के शरीर पर अभी भी उसकी गर्माहट बाकी थी। हाथों में उसकी हथेली की नमी थी।
मेला अभी बाकी था। लेकिन दोनों के बीच की दूरी थोड़ी और कम हो चुकी थी।

जादू के तंबू से निकलने के बाद दोनों मेले में धीरे-धीरे चलने लगे। भीड़ थी, धूल उड़ रही थी, लाउडस्पीकर पर गाने बज रहे थे, लेकिन दोनों के बीच एक अलग सी चुप्पी थी। राधा अभी भी थोड़ी शर्माई हुई थी। जादू वाले तंबू में जो हुआ था, वह उसके चेहरे पर साफ दिख रहा था।
अमन ने हल्के स्वर में कहा, “तुम्हारे बाल हवा में ऐसे उड़ रहे हैं… अच्छे लग रहे हैं।”
राधा ने उसकी तरफ देखा और जल्दी से नजरें झुका लीं। “बातें मत बनाओ।”
अमन मुस्कुराया। “बना नहीं रहा। सच लग रहे हो तुम आज। मेले में आने के बाद और भी।”
राधा का चेहरा और लाल हो गया। वह थोड़ा तेज चलने लगी। अमन उसके साथ कदम मिलाता रहा। थोड़ी देर तक दोनों चुपचाप चलते रहे। फिर राधा ने अचानक धीमी आवाज में कहा,
“इतना प्यार करते हो मुझसे? मैं तो एक गरीब घर की लड़की हूँ… और तुम अमीर घर के लड़के हो।”
अमन रुक गया। राधा भी दो कदम आगे जाकर रुकी। उसने पीछे मुड़कर अमन की तरफ देखा। अमन की आँखों में एक गंभीर भाव था। उसने राधा का हाथ हल्के से पकड़ा और उसे भीड़ से थोड़ा हटाकर एक शांत कोने की तरफ ले गया। वहाँ एक बड़ा पेड़ था और उसके पीछे थोड़ी खाली जगह। लोग कम आ-जा रहे थे।
अमन ने राधा को पेड़ के पास खड़ा किया। दोनों हाथों से उसके कंधे पकड़कर कहा,
“आज यह बात कह दी। आज के बाद ऐसा मत कहना। कभी मत कहना।”
राधा की आँखें उसकी आँखों में थीं। अमन की आवाज में एक अजीब सी सच्चाई थी।
“मैं तुमसे बहुत समय से प्यार करता हूँ राधा,” अमन ने धीमे लेकिन साफ स्वर में कहा। “कॉलेज में भी… तुम्हें दूर से देखता था। लेकिन बोल नहीं पाता था। हिम्मत नहीं होती थी। अब जब तुम मेरे इतने करीब आई हो… तो मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता। गरीब-अमीर की बात मत करना। मेरे लिए तुम सिर्फ राधा हो।”
राधा की आँखों में धीरे-धीरे आँसू भर आए। वह कुछ बोल नहीं पाई। आँसू उसकी पलकों पर टिक गए। अमन ने दोनों हाथों से उसका चेहरा पकड़ा और धीरे से उसका सर ऊपर उठाया। फिर अपने होंठों से उसके आँसुओं को चूम लिया—पहले एक आँख के नीचे, फिर दूसरी के। आँसू उसके होंठों पर लग गए।
राधा की साँसें काँप रही थीं। अमन ने उसके माथे से लेकर नाक तक हल्के चुंबन दिए। फिर धीरे से उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए।
चुंबन बहुत नरम था। जल्दबाजी में नहीं। प्यार से भरा हुआ। राधा ने आँखें बंद कर लीं। उसके होंठ काँप रहे थे, लेकिन उसने अमन के होंठों को धक्का नहीं दिया। दोनों के होंठ कुछ पल तक जुड़े रहे। न जीभ थी, न कोई जल्दी। सिर्फ एक लंबा, नरम और भरा हुआ चुंबन।
जब अमन ने होंठ हटाए तो राधा की आँखें अभी भी बंद थीं। गालों पर आँसुओं के निशान थे और होंठ हल्के से खुले हुए। उसने आँखें खोलीं तो अमन को देखते हुए बहुत धीमी आवाज में कहा,
“अमन…”
सिर्फ इतना ही। बाकी शब्द उसके गले में अटक गए।
अमन ने उसके बालों को सहलाते हुए कहा, “अब रो मत। और गरीब-अमीर की बात भी मत करना। ठीक है?”
राधा ने धीरे से सिर हिलाया। उसकी आँखों में अभी भी नमी थी, लेकिन मुस्कान भी हल्की सी तैर रही थी।
दोनों पेड़ के नीचे थोड़ी देर और खड़े रहे। भीड़ की आवाजें दूर से आ रही थीं। मेला जारी था। लेकिन उस कोने में दो लोगों का एक छोटा सा संसार बन चुका था।
Fuckuguy
albertprince547;
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#27
Heart 
[img=464x1400][Image: 872d21668ea411b0c7f58de33ea523f5.jpg][/img]
It's a humble request to my readers if you like my story plzz go to first page and rate the first thread so we can grow more and this story become an epic one so please support like and plz do not forgot to rate my thread thank you 
Fuckuguy
albertprince547;
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#28
भाई अपडेट का इंतज़ार रहेगा
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#29
Khubsurat update Radha or Aman ki chemistry bahut hi jabardast lagi waiting for next
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#30
lajabav ..............maza aa rha hai dheere dheere
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#31
[img=464x3400][Image: 03a2c6da11c72c04ab3ec3c2506a5e8d.jpg][/img]
बरगद के पेड़ के नीचे दोनों कुछ देर और खड़े रहे। राधा की आँखों में अभी भी हल्की नमी थी, लेकिन उसके चेहरे पर एक शांत मुस्कान तैर रही थी। अमन का हाथ उसकी कमर पर था। दोनों एक-दूसरे से कुछ नहीं बोल रहे थे, लेकिन चुप्पी में भी बहुत कुछ कहा जा रहा था।
थोड़ी देर बाद राधा ने धीरे से कहा, “चलते हैं… देर हो रही है।”
अमन ने सिर हिलाया। दोनों पेड़ की छाँव से निकलकर फिर मेले की भीड़ में मिल गए। अब उनकी चाल पहले से धीमी थी। राधा कभी-कभी अमन की तरफ देख लेती और जल्दी से नजरें फेर लेती। अमन भी उसके चेहरे को बार-बार देख रहा था—जैसे पहली बार देख रहा हो।
वे एक छोटी सी दुकान के पास रुके। राधा ने एक हल्का गुलाबी रंग का चूड़ा चुना। अमन ने पैसे दे दिए। राधा ने मना किया, लेकिन अमन ने जिद की। “यादगार के लिए रख लो।” राधा ने चुपचाप चूड़ा ले लिया और अपनी कलाई में पहन लिया।
धूप ढलने लगी थी। आसमान में नारंगी रंग फैलने लगा। लाउडस्पीकर की आवाजें धीमी पड़ने लगी थीं। दोनों ने वापस बस स्टैंड की तरफ कदम बढ़ाए। रास्ते में राधा का हाथ अचानक अमन के हाथ में आ गया। इस बार उसने जानबूझकर पकड़ा था। अमन ने भी कसकर पकड़ लिया। दोनों हाथ जुड़े हुए बस तक पहुँचे।
बस में फिर खिड़की वाली सीट मिली। राधा खिड़की की तरफ बैठी। अमन उसके बगल में। बस चल पड़ी। खेत, पेड़ और धूल भरी सड़क पीछे छूटने लगी। दोनों काफी देर तक चुप रहे। फिर राधा ने बहुत धीमी आवाज में कहा,
“आज… सब कुछ बदल गया लग रहा है।”
अमन ने उसकी तरफ देखा। “हाँ।”
राधा ने आगे कहा, “मैं डरती थी कि तुम मुझे सिर्फ… वैसे ही देखोगे जैसे और लड़के देखते हैं। लेकिन तुमने…” वह पूरा वाक्य नहीं बोल पाई।
अमन ने उसका हाथ अपनी हथेली में लेकर कहा, “अब डरो मत। मैं हूँ न।”
राधा ने सिर हिलाया। उसकी उंगलियाँ अमन की उंगलियों में सिमट गईं। बाकी सफर दोनों ने चुपचाप हाथ पकड़े हुए तय किया।
गाँव पहुँचने पर बस से उतरे। शाम के अँधेरे में दोनों एक-दूसरे के सामने खड़े थे। राधा ने धीरे से कहा, “मैं घर जा रही हूँ।”
अमन ने सिर हिलाया। “ठीक से पहुँचना।”
राधा दो कदम चलकर रुकी। पीछे मुड़ी। आँखों में एक अलग सी चमक थी। “अमन… शुक्रिया।” फिर वह तेजी से अपने घर की तरफ चल दी।
अमन अपने घर की तरफ बढ़ा। दिमाग में पूरा दिन घूम रहा था—झूले, जलेबी, जादू का तंबू, बरगद के पेड़ के नीचे का चुंबन, और राधा के आँसू। पहली बार लगा कि उसने सिर्फ शरीर नहीं, दिल भी छू लिया है।
घर पहुँचकर उसने हाथ-मुँह धोया। खाना खाया। माँ ने पूछा, “प्रोजेक्ट कैसा रहा?” अमन ने सामान्य जवाब दिया। रात के खाने के बाद वह अपने कमरे में आया।
बारह बजने से पहले ही दरवाजे पर दस्तक हुई। रेणु थी। वह रिश्तेदारों के घर से लौट चुकी थी। लालटेन लेकर अंदर आई और दरवाजा बंद कर दिया।
“बताओ,” उसने सीधे कहा। “मेला कैसा रहा?”
अमन ने इस बार भी कुछ नहीं छुपाया। शुरू से अंत तक सब बता दिया—राधा के साथ घूमना, जादू के तंबू में उसका डर और सिमटना, बरगद के पेड़ के नीचे गरीब-अमीर वाली बात, उसका प्यार का इजहार, आँसू, और वह नरम चुंबन।
रेणु अंत तक चुपचाप सुनती रही। जब अमन खत्म हुआ तो उसने धीरे से पूछा, “तुमने सच में दिल से कहा?”
अमन ने सिर हिलाया। “हाँ।”
रेणु थोड़ी देर चुप रही। फिर बोली, “अच्छा किया। लेकिन याद रखना—प्यार सिर्फ शब्दों और चुंबन से नहीं निभता। उसे निभाना पड़ता है। राधा गरीब घर की है, तुम इस घर के हो। आगे बहुत सी मुश्किलें आएंगी। तैयार रहना।”
उसने अमन का हाथ पकड़ा। “आज तुमने एक बड़ा कदम उठाया। दिल का कदम। शरीर का सबक तो मैं देती रहूँगी, लेकिन दिल का सबक तुम्हें खुद सीखना होगा।”
रेणु ने और ज्यादा कुछ नहीं कहा। बस उसके माथे पर हल्का सा हाथ फेरा और उठकर खड़ी हो गई।
“सो जाओ। कल बात करेंगे।”
वह चली गई।
अमन अकेला रह गया। कमरे में अँधेरा था। आँखें खुली थीं। हाथों में अभी भी राधा के हाथ की गर्माहट बाकी थी। होंठों पर उसके आँसुओं और चुंबन का अहसास था।
आज पहली बार उसने सिर्फ सीखा नहीं था।
आज उसने महसूस भी किया था।


सोमवार की सुबह अमन की आँख खुली तो उसने देखा कि कमला चाची उसके बिस्तर के ठीक सामने चारपाई पर बैठी हुई हैं।
वे उसे घूर रही थीं।
अमन की नींद एकदम उड़ गई। उसने धीरे से सिर उठाया। सुबह की उलझन में उसका लंड पूरी तरह खड़ा था और चादर के ऊपर साफ उभर रहा था। कमला चाची की निगाहें ठीक उसी जगह पर टिकी हुई थीं। उनकी आँखों में एक भूखी, प्यासी चमक थी। होठ हल्के से खुले हुए थे। अमन के मन में अचानक ख्याल आया—“चाची आज बहुत प्यासी लग रही हैं… लगता है इनके लिए कुछ करना पड़ेगा।”
वह उठकर बैठ गया। चादर संभालते हुए बोला, “अरे चाची… आप आज मेरे कमरे में कैसे?”
कमला चाची ने निगाहें उसके चेहरे पर उठाईं। आवाज में हल्की सी शरारत थी, “अपने बेटे के कमरे में नहीं आ सकती क्या?”
अमन ने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया, “आपका ही कमरा है चाची। जब मन करे आ जाइए… दिन हो या रात।”
कमला चाची की आँखें थोड़ी चौड़ी हुईं। फिर उन्होंने हँसते हुए कहा, “बहुत बड़ी-बड़ी बातें करने लगे हो। मुझसे उठाने की ताकत भी है तुम्हारे में?”
अमन ने आँखों में आँखें डालकर धीरे से जवाब दिया, “अरे चाची… चूहा बोरी नहीं उठा सकता। लेकिन फाड़ तो सकता है।”
कमला चाची एक पल के लिए स्तब्ध रह गईं। फिर जोर से हँस पड़ीं। उनकी हँसी में एक अजीब सी स्वीकृति थी। उन्होंने अमन को सिर से पाँव तक एक बार फिर घूरा, फिर धीरे से उठीं और कमरे से बाहर चली गईं। जाते समय दरवाजे पर खड़े होकर एक बार पीछे मुड़ीं। आँखों में वही प्यासी चमक बाकी थी।
अमन ने गहरी साँस ली। शरीर में एक अजीब सा उत्साह था।
कॉलेज पहुँचने पर राधा पहले से अपनी जगह पर बैठी थी। अमन के जाते ही उसने मुस्कुरा दिया। ब्रेक में दोनों टंकी के पास मिले। इस बार बातें और भी हल्की और प्यार भरी थीं। राधा ने उसके कॉलर का मुड़ा हुआ हिस्सा ठीक करते हुए कहा, “कल का दिन… बार-बार याद आ रहा है।”
अमन ने धीमे स्वर में जवाब दिया, “मुझे भी।”
घंटी बजने से पहले राधा ने अचानक उसके गाल पर हल्का सा चुंबन कर दिया। बहुत जल्दी और हल्का। फिर शर्माते हुए तेजी से अपनी कक्षा की तरफ चल दी। अमन खड़ा रह गया। गाल पर उसके होंठों की गर्माहट बाकी थी।
वह लौट ही रहा था कि पीछे से हल्की फुसफुसाहट सुनाई दी। दीवार के कोने के पास राजिया और वह तीसरा लड़का (भाई नहीं) खड़े थे। अमन ने रुककर कान लगा दिए।
राजिया धीमे स्वर में कह रही थी, “भाई आज घर के काम से बाहर गया है। रात को माँ जल्दी सो जाती है… पिताजी भी ऊपर वाले कमरे में रहते हैं। तू आ जा। आज खुलकर मजे लेंगे।”
लड़के ने जवाब दिया, “कितने बजे?”
“ग्यारह के बाद। पिछवाड़े वाले दरवाजे से आना। मैं खुला रखूँगी।”
दोनों की बातें साफ सुनाई दे रही थीं। अमन ने मन में नोट कर लिया। राजिया आज रात अकेली थी। और वह तीसरा लड़का उसके घर जाने वाला था।
अमन वहाँ से चुपचाप निकल गया। दिमाग में कई बातें एक साथ घूम रही थीं—सुबह कमला चाची की प्यासी निगाहें, राधा का गाल पर चुंबन, और अब राजिया का रात वाला प्लान।
शाम को घर लौटकर उसने सामान्य दिनचर्या निभाई। लेकिन मन बार-बार उन तीनों चीजों पर जा रहा था।
रात का इंतजार था।


रात के खाने के बाद अमन अपने कमरे में बैठा सोच रहा था।
सुबह कमला चाची की प्यासी निगाहें, राधा का गाल पर चुंबन, और सबसे ऊपर राजिया का रात वाला प्लान—सब एक साथ घूम रहे थे। तीसरा लड़का ग्यारह बजे के बाद पिछवाड़े वाले दरवाजे से आने वाला था। राजिया का भाई बाहर गया हुआ था। मौका साफ था।
बारह बजने से पहले रेणु आई। लालटेन लेकर। दरवाजा बंद करके बिस्तर के किनारे बैठ गई।
अमन ने सीधे पूछा, “दीदी… अगर आज रात मैं उस लड़के की जगह राजिया के पास चला जाऊँ… तो?”
रेणु की आँखें एकदम गंभीर हो गईं। वह कुछ देर चुप रही। कमरे में सिर्फ लालटेन की लौ काँप रही थी। फिर उसने धीरे से कहा,
“तुमने सोचा-समझा? यह खेल खतरनाक है। अगर पकड़े गए तो सब खुल जाएगा।”
अमन ने सिर हिलाया। “चेहरा ढक लूँगा। बोलूँगा नहीं। जो तुमने सिखाया है… वही इस्तेमाल करूँगा।”
रेणु ने लंबी साँस ली। कई पल तक अमन की आँखों में देखती रही। फिर बोली,
“जा सकते हो। लेकिन सुन लो—दिमाग से काम लेना। किसी को पता नहीं चलना चाहिए कि तुम हो। चेहरा पूरी तरह ढके रहना। आवाज मत निकालना। और जल्दी वापस आ जाना। समझे?”
अमन ने सिर हिलाया। रेणु ने उसका हाथ पकड़ा।
“यह तुम्हारा पहला पूरा अनुभव होगा। जो सीखा है सब याद रखना। और नियंत्रण मत खोना।”
रेणु चली गई।
अमन ने तैयारी शुरू की। काले रंग की पैंट-कमीज पहनी। सिर पर मंकी कैप पहनी जिससे उसका पूरा चेहरा ढक गया। सिर्फ आँखें दिख रही थीं। ग्यारह बजने से थोड़ा पहले वह घर से निकल गया।
राजिया के घर का पिछवाड़ा सुनसान था। अमन एक पेड़ की छाँव में छिपकर खड़ा हो गया। थोड़ी देर बाद वह तीसरा लड़का नजर आया। धीरे-धीरे दरवाजे की तरफ बढ़ रहा था।
जैसे ही वह पास आया, अमन ने जोर से चिल्लाया,
“चोर… चोर… चोर!”
लड़का डर के मारे काँप उठा। इधर-उधर देखा और भागते हुए गली की तरफ गायब हो गया। अमन ने कुछ पल इंतजार किया। फिर खुद धीरे से पिछवाड़े वाले दरवाजे की तरफ बढ़ा। दरवाजा खुला था।
अंदर हल्की सी रोशनी थी। राजिया अपने कमरे में खड़ी थी। उसने दरवाजे की आहट सुनी तो मुस्कुरा दी।
“आ गया… देर कर दी तूने।”
अमन ने कुछ नहीं कहा। मंकी कैप पहने वह अंदर घुस गया और दरवाजा बंद कर दिया। राजिया ने उसकी तरफ देखा। चेहरा ढका हुआ देखकर थोड़ी हैरान हुई, लेकिन बोली,
“आज ड्रामा कर रहा है क्या? चल उतार टोपी।”
अमन ने टोपी नहीं उतारी। वह सीधे उसके पास गया। दोनों हाथों से उसका चेहरा पकड़ा और गहराई से चूम लिया। जीभ अंदर तक धंस गई। राजिया पहले चौंकी, फिर जवाब देने लगी। चुंबन लंबा और गहरा होता गया। अमन के हाथ उसकी कमर पर फिसल गए। उसने राजिया की कुर्ती ऊपर की और स्तनों को पकड़ लिया।
राजिया की साँसें तेज हो गईं। “आज तू बहुत अलग लग रहा है… जोर से चूम रहा है…”
अमन ने उसे बिस्तर पर लिटा दिया। कुर्ती और ब्रा एक साथ उतार दी। गोरे, गोल स्तन बाहर आ गए। अमन ने दोनों निप्पलों को बारी-बारी से मुँह में लिया। जीभ घुमाई, हल्के से काटा। राजिया की कमर उठने लगी।
“आह्ह… आज तू पागल हो रहा है क्या…”
अमन ने उसकी सलवार और पैंटी एक साथ नीचे खींच ली। राजिया की चूत पहले से गीली थी। अमन बिना किसी देर के उसके पैर फैलाकर झुक गया और जीभ चूत पर रख दी।
राजिया की लंबी सिसकारी निकली। “आह्ह्ह… क्या कर रहा है… जीभ… अंदर…”
अमन ने वही किया जो रेणु ने सिखाया था। जीभ से नीचे से ऊपर तक चाटा। बीच वाली घुंडी को चूसा। फिर जीभ अंदर तक डालकर तेजी से अंदर-बाहर करने लगा। राजिया की जाँघें काँपने लगीं। उसने अमन का सिर पकड़कर और जोर से दबाने लगी।
“वहीं… वहीं रख… मत रुक… मैं… आ रही हूँ…”
कुछ ही देर में राजिया का शरीर अकड़ गया। उसका पहला पानी अमन के मुँह पर छूट गया। वह काँपती रही। अमन रुका नहीं। वह फिर से चाटने लगा। राजिया की सिसकारियाँ तेज होती गईं। दूसरी बार फिर से पानी निकला।
राजिया पागलों की तरह कराह रही थी। “तू… तू कौन है… आज इतना अलग… आह्ह्ह…”
अमन ने अभी भी कुछ नहीं कहा। उसने अपनी पैंट खोली। दस इंच का सख्त लंड बाहर निकला। राजिया की आँखें फटी की फटी रह गईं। लेकिन वह कुछ बोल नहीं पाई। अमन ने उसके पैर उसके कंधों पर रखे और एक झटके में पूरा लंड उसकी चूत में धंसा दिया।
“आह्ह्ह्ह… धीरे… बहुत मोटा… फट जाएगी…” राजिया चीख उठी।
अमन ने रुककर उसे चूमा। फिर धीरे-धीरे धक्के लगाने शुरू किए। पहले प्यार से, गहराई से। हर धक्के के साथ राजिया की सिसकारी निकल रही थी। अमन उसके स्तनों को मसल रहा था, निप्पलों को चूस रहा था।
थोड़ी देर बाद गति तेज हो गई। अमन ने उसके दोनों हाथ ऊपर की तरफ पकड़ लिए और जोर-जोर से चोदने लगा।
“ले… ले पूरी… आज तेरी चूत फाड़ दूँगा…” उसने पहली बार गाली दी। आवाज बदलकर।
राजिया की आँखें खुली की खुली रह गईं। यह आवाज उस तीसरे लड़के की नहीं थी। लेकिन शरीर इतना मजा दे रहा था कि वह कुछ बोल नहीं पाई।
अमन ने पोजीशन बदली। राजिया को घुटनों के बल किया और पीछे से प्रवेश किया। एक हाथ से उसके बाल पकड़े और दूसरे हाथ से उसकी गाँड पर थप्पड़ मारे।
“आह्ह्ह… जोर से… और जोर से चोद… आज तू मार डालेगा…” राजिया बेलगाम हो चुकी थी।
अमन ने उसकी गाँड के छेद पर भी लंड का सिर लगाया। राजिया सहम गई।
“वहाँ… धीरे…”
अमन ने थूक लगाकर धीरे-धीरे गाँड में धंसाना शुरू किया। राजिया की चीखें दबी हुई निकल रही थीं। पूरा लंड अंदर जाने के बाद अमन ने जोर के धक्के लगाने शुरू कर दिए।
“ले रंडी… दोनों छेद तेरे आज खोल रहा हूँ…”
राजिया के मुँह से सिर्फ सिसकारियाँ और गालियाँ निकल रही थीं। अमन उसके हर छेद को बारी-बारी से इस्तेमाल कर रहा था। चूत, गाँड, फिर वापस चूत। राजिया बार-बार पानी छोड़ रही थी।
अभी रात लंबी थी।
अमन ने अभी सिर्फ शुरुआत की थी।


राजिया के कमरे में सिर्फ सिसकारियाँ और मांस की टकराहट की आवाजें गूँज रही थीं।
अमन अभी भी मंकी कैप पहने हुए था। चेहरा पूरी तरह ढका था। उसने राजिया को फिर से चित लिटा दिया। उसके दोनों पैर अपने कंधों पर रखे और पूरा लंड एक झटके में चूत में धंसा दिया। राजिया की पीठ बिस्तर से उठ गई।
“आह्ह्ह्ह… धीरे… बहुत गहरा… तू मार डालेगा आज…”
अमन ने जवाब में और जोर के धक्के लगाए। हर धक्के के साथ उसके अंडकोष राजिया की गाँड से टकरा रहे थे। उसने झुककर राजिया के दोनों स्तनों को मुँह में लिया और जोर से चूसने लगा। दाँतों से निप्पल हल्के काटे। राजिया की उंगलियाँ उसकी पीठ पर नाखून गड़ा रही थीं।
“ले… ले पूरी चूत… आज तेरी यह फट जाएगी,” अमन ने आवाज बदलकर गाली दी।
राजिया की आँखें बार-बार अमन के ढके चेहरे पर जा रही थीं। यह आवाज, यह ताकत, यह तरीका—तीसरे लड़के का नहीं था। लेकिन शरीर इतना मजा ले रहा था कि वह कुछ बोलने की हिम्मत नहीं कर पा रही थी।
अमन ने अचानक लंड बाहर निकाला। राजिया कराह उठी। फिर उसने राजिया को अपनी तरफ खींचकर बैठने की पोजीशन में कर दिया। राजिया उसकी गोद में बैठ गई। अमन ने नीचे से लंड उसकी चूत में लगाया और राजिया की कमर पकड़कर उसे जोर-जोर से ऊपर-नीचे करने लगा।
“खुद चल… रंडी की तरह बैठ जा मेरे लंड पर,” अमन ने कहा।
राजिया ने दोनों हाथ उसके कंधों पर रखे और खुद हिलेने लगी। उसके बड़े स्तन अमन के चेहरे के सामने ऊपर-नीचे हो रहे थे। अमन ने दोनों स्तनों को पकड़कर मुँह में भर लिया। राजिया की गति तेज होती गई। थोड़ी देर में उसका तीसरा पानी छूट गया। वह अमन के गले से चिपक गई और काँपती रही।
अमन ने उसे फिर से बिस्तर पर लिटाया। इस बार उसने राजिया के पैर पूरी तरह फैला दिए और कुत्ते की तरह पीछे से प्रवेश किया। एक हाथ से उसके बाल पकड़े और दूसरे हाथ से उसकी गाँड पर जोर-जोर से थप्पड़ मारे।
“आह्ह्ह… थप्पड़… और मार… जोर से चोद…” राजिया बेलगाम हो चुकी थी।
अमन ने लंड निकालकर इस बार उसकी गाँड में फिर से धंसा दिया। राजिया की चीख निकल गई।
“गाँड… फट रही है… लेकिन मत निकाल… पूरा अंदर रख…”
अमन ने दोनों हाथ उसकी कमर पर रखे और गाँड में जोर के धक्के लगाने लगा। हर धक्के के साथ राजिया की गोरी गाँड लाल होती जा रही थी। थोड़ी देर बाद उसने फिर लंड चूत में डाल दिया। अब वह बारी-बारी से दोनों छेदों में घुस रहा था—कभी चूत, कभी गाँड। राजिया की सिसकारियाँ एक न रुकने वाली लड़ी बन गई थीं।
चौथी बार राजिया का पानी उसके लंड पर ही छूट गया। वह बिस्तर पर मुँह गड़ाकर कराह रही थी। अमन रुका नहीं। उसने राजिया को किनारे खींचकर बिस्तर के किनारे लिटाया। खुद खड़े होकर उसके पैर फैलाए और फिर से चोदने लगा। इस पोजीशन में लंड और गहरा जा रहा था।
“देख… कितना अंदर तक जा रहा है… तेरी चूत मेरे लंड की आकार ले रही है,” अमन ने गाली दी।
राजिया की आँखें उल्टी हो रही थीं। वह बस बार-बार कह रही थी, “और… और चोद… फाड़ दे… आज पूरी रंडी बना दे मुझे…”
अमन ने उसकी दोनों टाँगें अपने हाथों में लीं और उन्हें फैलाते हुए और तेज गति से धक्के लगाने लगा। कमरा सिसकारियों, थप्पड़ों और गीली आवाजों से भर चुका था। राजिया का पाँचवाँ पानी भी निकल गया। उसका शरीर अब काँप रहा था। पसीने से तर था। बाल बिखरे हुए थे।
अमन ने लंड बाहर निकाला। राजिया की चूत और गाँड दोनों से पानी रिस रहा था। उसने राजिया को घुटनों के बल बिस्तर पर किया और अपना लंड उसके मुँह के सामने ले गया।
“चूस… दोनों छेद इस्तेमाल हो चुके हैं… अब मुँह भी सँभाल…”
राजिया ने आँखें खोलीं। मंकी कैप पहने आदमी का लंड उसके होंठों पर था—गीला, चमकता हुआ, उसकी ही पानी से लथपथ। उसने मुँह खोला। अमन ने लंड उसके गले तक धंस दिया। राजिया गैग करते हुए भी चूसने लगी। अमन ने उसके बाल पकड़कर जोर-जोर से मुँह चोदना शुरू कर दिया।
“ले… ले गले तक… अच्छी रंडी है तू…”
राजिया की आँखों से आँसू बह रहे थे लेकिन वह रोक नहीं रही थी। अमन कुछ देर तक उसका मुँह इस्तेमाल करता रहा। फिर लंड निकाला और फिर से उसकी चूत में धंसा दिया।
राजिया अब बोलने लायक नहीं रह गई थी। सिर्फ सिसकारियाँ और अस्पष्ट गालियाँ निकल रही थीं। अमन ने उसके दोनों हाथ पीछे मोड़कर पकड़ लिए और पूरे जोर से चोदने लगा। बिस्तर चरमरा रहा था।
छठा पानी राजिया का तब निकला जब अमन ने उसके निप्पल को जोर से काटते हुए सबसे गहरा धक्का मारा। राजिया की चीख पूरे कमरे में गूँज गई। उसका शरीर बार-बार अकड़ रहा था।
अमन अभी भी अंदर था। कठोर। और भूखा।
रात अभी खत्म नहीं हुई थी।


राजिया बिस्तर पर पसीने से तर पड़ी थी। शरीर काँप रहा था। छह बार पानी निकलने के बाद भी अमन का लंड उसके अंदर कठोर था। मंकी कैप अभी भी उसके चेहरे पर थी। आँखें चमक रही थीं।
अमन ने राजिया को फिर से घुटनों के बल कर दिया। डॉगी स्टाइल। उसने उसके दोनों हाथ पीछे मोड़कर पकड़े और एक झटके में पूरा लंड चूत में धंसा दिया।
“आह्ह्ह्ह… फिर से… इतना जोर से… तू रुकेगा ही नहीं क्या…” राजिया की आवाज अब बैठ चुकी थी।
अमन ने जवाब में और तेज धक्के लगाए। हर धक्के के साथ राजिया की गोरी गाँड उसके पेट से टकरा रही थी। थप्पड़ की आवाजें कमरे में गूँज रही थीं। अमन ने एक हाथ से उसके बाल पकड़कर सिर पीछे खींच लिया।
“बोल… कैसी लग रही है आज तेरी चूत?”
“फट रही है… लेकिन मजा आ रहा है… और चोद… रंडी बना दे पूरी…”
अमन ने लंड निकाला और इस बार सीधे उसकी गाँड में धंसा दिया। राजिया की चीख निकल गई।
“गाँड… पूरी भर गई… धीरे… आह्ह्ह…”
अमन ने दोनों हाथ उसकी कमर पर रखे और गाँड में जोर-जोर से धक्के लगाने लगा। राजिया का चेहरा बिस्तर में गड़ा हुआ था। सिसकारियाँ दबी हुई निकल रही थीं। थोड़ी देर बाद अमन ने लंड बाहर निकाला। राजिया की गाँड खुली हुई काँप रही थी।
फिर अमन खुद बिस्तर पर लेट गया। उसने राजिया को अपनी तरफ खींचा और 69 की पोजीशन में उसके ऊपर उल्टा लिटा दिया। राजिया का मुँह उसके लंड के सामने था और उसकी चूत अमन के मुँह के ऊपर।
“चूस… और अपनी चूत मेरे मुँह में दबा…” अमन ने कहा।
राजिया ने थकी हुई हालत में भी अमन का लंड मुँह में ले लिया। अमन ने उसकी चूत पर जीभ फेर दी। दोनों एक साथ एक-दूसरे को चूसने लगे। राजिया के मुँह से लंड की सिसकारी निकल रही थी और अमन की जीभ उसकी चूत के अंदर तक जा रही थी। थोड़ी देर में राजिया का शरीर फिर से अकड़ने लगा।
अमन ने उसे फिर से नीचे उतारा। डॉगी स्टाइल में लाया। इस बार उसने लंड उसकी गाँड में डाला और एक हाथ से उसकी चूत में उंगलियाँ घुमा दीं। राजिया पागल हो रही थी।
“आह्ह्ह… दोनों जगह… एक साथ… मार डालेगा…”
अमन की गति बहुत तेज हो गई थी। गाँड में लंड और चूत में उंगलियाँ। राजिया की सिसकारियाँ अब चीखें बन चुकी थीं। अचानक उसका शरीर जोर से काँपा। आखिरी बार उसका पानी उंगलियों पर छूट गया। वह बिस्तर पर ढेर हो गई।
अमन ने उसके बाल पकड़े और गाँड में और तेज धक्के लगाने लगा। कुछ गहरे और जोरदार धक्कों के बाद उसका शरीर अकड़ गया। गरम, गाढ़ा पानी की धार उसने राजिया की गाँड के अंदर छोड़ दी। एक… दो… तीन… कई धारें। राजिया की गाँड पूरी भर गई। पानी बाहर भी रिसने लगा।
अमन कुछ देर तक उसी हालत में रहा। साँसें तेज चल रही थीं। फिर उसने धीरे से लंड बाहर निकाला। राजिया की गाँड से सफेद पानी निकल रहा था। चूत भी सूजी हुई और गीली थी।
राजिया पेट के बल पड़ी हुई काँप रही थी। अमन ने उसकी कमर पर हल्का हाथ फेरा। फिर अपनी पैंट पहनी। मंकी कैप अभी भी सिर पर थी।
राजिया ने थकी हुई आवाज में कहा, “तू… तू वह नहीं है… मैं जान गई थी… लेकिन…”
अमन ने कुछ नहीं कहा। वह दरवाजे की तरफ बढ़ा। राजिया ने पीछे मुड़कर देखने की कोशिश की लेकिन शरीर में ताकत नहीं बची थी।
अमन ने दरवाजा खोला और चुपचाप अँधेरे में निकल गया।
राजिया अकेली बिस्तर पर पड़ी रही। शरीर दर्द से भरा हुआ था, लेकिन संतुष्टि भी गहरी थी। आँखों में एक अजीब सा सवाल तैर रहा था—वह आदमी आखिर था कौन?
अमन घर की तरफ बढ़ रहा था। शरीर में थकान थी, लेकिन मन में एक अजीब सी जीत का अहसास था। पहली बार उसने किसी लड़की के साथ पूरा रात बिताया था। जो रेणु ने सिखाया था, लगभग सब इस्तेमाल कर लिया था।
रात गहरी थी।
Fuckuguy
albertprince547;
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#32
Wow ? bahot time baad itni shandaar story padhi eagerly waiting for next update ?
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#33
Lajwab romantic or kamottejak update Aman ko pahli Choot or Gaand chodne ko mili wo bhi Raziya ki Kamla Chachi bhi intrest le rahi hai Renu kab degi or puri sachhai kab batayegi..... Waiting for next
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#34
(13-09-2026, 06:59 AM)Skb21 Wrote: Lajwab romantic or kamottejak update Aman ko pahli Choot or Gaand chodne ko mili wo bhi Raziya ki Kamla Chachi bhi intrest le rahi hai Renu kab degi or puri sachhai kab batayegi..... Waiting for next
Fuckuguy
albertprince547;
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#35
lajabav Aman
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#36
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राजिया बिस्तर पर पेट के बल पड़ी हुई थी।
शरीर में दर्द हो रहा था। चूत और गाँड दोनों सूजी हुई थीं। जाँघों के अंदर अभी भी उस अजनबी का पानी चिपचिपा लगा हुआ था। कमरा अँधेरा था। बाहर हल्की हवा आ रही थी। लेकिन राजिया की आँखें खुली हुई थीं।
वह सोच रही थी।
“क्या रात थी… क्या आदमी था वह…”
उसने आँखें बंद कीं। फिर से पूरा रात आँखों के सामने घूमने लगा। मंकी कैप पहने वह आदमी। उसकी चुप्पी। उसका तरीका। उसकी जीभ। उसका मोटा और लंबा लंड। जिसने उसकी चूत और गाँड दोनों को फाड़कर रख दिया था।
“आज तक कोई मुझे इतना संतुष्ट नहीं कर पाया… कोई नहीं…”
राजिया ने धीरे से कराहते हुए करवट बदली। दर्द तेज हो गया। लेकिन दर्द के साथ एक गहरी संतुष्टि भी थी। शरीर थका हुआ था, लेकिन मन में एक अजीब सी भूख बाकी थी।
“उसने मुझे पता नहीं कितनी बार पानी निकाल दिया… छह… सात… मैंने गिनना छोड़ दिया था… शरीर काँप-काँप जाता था… और वह रुकता ही नहीं था…”
उसने अपना हाथ धीरे से अपनी चूत पर रखा। हल्की सूजन महसूस हुई। उंगलियों पर अभी भी गीलापन था।
“कौन था वह… आवाज अलग थी… तरीका अलग था… ताकत अलग थी… वह तीसरा वाला तो बिल्कुल नहीं था… वह तो कभी इतना कुछ नहीं कर पाता…”
राजिया की आँखों में एक जिद सी आ गई।
“पता लगाके रहूँगी… कौन है वह… कहाँ रहता है… कैसे आया… मैं उसे ढूँढूँगी… और…”
उसने होंठ दबाए। मन में एक ख्याल आया जो पहले कभी नहीं आया था।
“उसे अपना बनाके रहूँगी… या फिर उसकी रंडी बन जाऊँगी… अगर वह कहे तो… बस मुझे वही चाहिए… वही आदमी… वही लंड… वही तरीका…”
सोचते-सोचते उसकी पलकें भारी होने लगीं। शरीर दर्द से भरा हुआ था, लेकिन थकान अब नींद में बदल रही थी। उसने धीरे से अपने आप से कहा,
“इतना दर्द हो रहा है… मजे के बाद… अब तो दो दिन कॉलेज भी नहीं जा पाऊँगी…”
आखिरी ख्याल उसी अजनबी का था—मंकी कैप, चुपचाप चोदता हुआ, और आखिर में उसकी गाँड में पानी छोड़कर गायब हो जाना।
राजिया की आँखें बंद हो गईं।
वह सो गई।
कमरे में सन्नाटा छा गया। सिर्फ उसकी भारी साँसें बाकी रह गईं।



अमन घर पहुँचा तो रात काफी बीत चुकी थी।
पिछवाड़े वाले रास्ते से चुपके से अंदर घुसा। मंकी कैप और काले कपड़े अभी भी उस पर थे। शरीर में थकान थी, लेकिन एक अजीब सी शक्ति भी थी। पहली बार उसने किसी लड़की के साथ पूरी रात बिताई थी। जो कुछ रेणु ने सिखाया था, लगभग सब इस्तेमाल कर लिया था। राजिया की सिसकारियाँ, उसके शरीर का काँपना, और आखिर में उसकी गाँड में पानी छोड़ना—सब अभी भी दिमाग में ताजा था।
उसने कपड़े बदले। हाथ-मुँह धोया। फिर अपने कमरे में जाकर बिस्तर पर बैठ गया। दिल अभी भी जोर से धड़क रहा था।
थोड़ी देर बाद दरवाजे पर हल्की दस्तक हुई। रेणु थी। लालटेन लेकर अंदर आई। दरवाजा बंद करके बिस्तर के किनारे बैठ गई। उसने अमन के चेहरे को ध्यान से देखा।
“हो गया?” उसने सीधे पूछा।
अमन ने सिर हिलाया। “हाँ।”
रेणु ने उसकी आँखों में देखा। “सब बताओ। कुछ मत छुपाओ।”
अमन ने शुरू से अंत तक सब बता दिया। कैसे उसने उस लड़के को डराकर भगाया, कैसे मंकी कैप पहनकर राजिया के कमरे में घुसा, कैसे पहले प्यार से शुरू किया, फिर जीभ से उसे पागल किया, कैसे अलग-अलग पोजीशन में उसे चोदा, कैसे उसके छह बार पानी निकाले, और आखिर में उसकी गाँड में अपना पानी छोड़कर चला आया।
रेणु अंत तक चुपचाप सुनती रही। जब अमन खत्म हुआ तो उसने धीरे से पूछा,
“चेहरा नहीं देखा उसने?”
“नहीं। टोपी नहीं उतारी मैंने। आवाज भी बदली हुई रखी।”
रेणु ने गहरी साँस ली। “अच्छा किया। लेकिन याद रखना—ऐसी रातें दोबारा उतनी आसानी से नहीं मिलतीं। और राजिया अब तुम्हें ढूँढने की कोशिश करेगी। गाँव छोटा है। सावधान रहना।”
अमन चुप रहा। रेणु ने उसका हाथ पकड़ा।
“तुमने जो किया, वह सिर्फ शरीर का खेल नहीं था। तुमने नियंत्रण रखा। चेहरा नहीं दिखाया। जल्दी वापस आ गए। यह अच्छी बात है। लेकिन घमंड में मत आना। एक रात ने तुम्हें उस्ताद नहीं बना दिया।”
अमन ने सिर हिलाया।
रेणु थोड़ा करीब आई। “शरीर कैसा महसूस कर रहा है?”
“थकान है… लेकिन हल्का भी लग रहा है।”
रेणु ने उसके बालों में हाथ फेरा। “सो जाओ। कल बात करेंगे। और हाँ—राधा के बारे में मत भूलना। जो कुछ तुमने राजिया के साथ किया, वह शरीर की भूख थी। राधा के साथ दिल का रिश्ता है। दोनों को मिलाकर मत बैठना।”
अमन ने फिर सिर हिलाया।
रेणु उठ खड़ी हुई। दरवाजे तक जाकर बोली,
“तुम सीख रहे हो। लेकिन रास्ता अभी लंबा है। रात अच्छी रही तुम्हारी… अब आराम करो।”
वह चली गई।
अमन अकेला रह गया। कमरे में अँधेरा था। आँखें बंद कीं तो राजिया की सिसकारियाँ और रेणु की सलाह दोनों एक साथ घूमने लगीं। साथ ही राधा का चेहरा भी आँखों के सामने आ गया—मेले वाला चुंबन, उसके आँसू, उसका हल्का सा गाल पर किया गया चुंबन।
आज पहली बार उसने किसी लड़की को पूरी तरह से जिया था।
लेकिन मन में यह भी था कि यह खेल खतरनाक था।
वह लेट गया। थकान ने धीरे-धीरे उसे अपनी चपेट में ले लिया।
नींद आ गई।

मंगलवार की सुबह अमन अभी गहरी नींद में था।
कमला चाची चुपके से कमरे में आईं। उन्होंने दरवाजा धीरे से बंद किया और बिस्तर के पास आ गईं। चाँदनी फीकी पड़ चुकी थी, सुबह की हल्की रोशनी खिड़की से आ रही थी। उन्होंने धीरे से चादर हटाई। अमन का लंड सुबह की अवस्था में आधा सख्त था।
कमला ने अपने नरम हाथों से उसे पकड़ लिया। उंगलियाँ बहुत हल्की और अनुभवी थीं। उन्होंने धीरे-धीरे सहलाना शुरू किया—जड़ से लेकर सिर तक। लंड उनके हाथ में और सख्त होता गया। उनकी साँसें तेज हो रही थीं। आँखें लंड पर टिकी हुई थीं।
तभी अमन की साँसें थोड़ी बदलीं। वह करवट लेने वाला था। कमला चाची तुरंत समझ गईं कि वह जागने वाला है। उन्होंने फौरन चादर वापस डाल दी, हाथ छुड़ाया और चुपके से कमरे से बाहर निकल गईं। दरवाजा हल्के से बंद किया।
अमन की आँख खुली। कमरा खाली था। लेकिन चादर के नीचे उसका लंड पूरी तरह तना हुआ था और हल्की सी गर्माहट बाकी थी जैसे कोई हाथ अभी-अभी लगा हो। उसने इधर-उधर देखा। कोई नहीं था। मन में अजीब सा ख्याल आया, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।
उठकर नहाया-धोया और कॉलेज के लिए निकल पड़ा।
कॉलेज में राधा पहले से बैठी थी। ब्रेक में दोनों टंकी के पास मिले। इस बार राधा थोड़ी और करीब खड़ी हुई। अमन ने हल्के से उसका हाथ पकड़ लिया।
“तुम आज और प्यारी लग रही हो,” उसने धीमे स्वर में कहा।
राधा का चेहरा लाल हो गया। “बातें बनाने लगे हो अब।” लेकिन उसने हाथ नहीं छुड़ाया। दोनों की नजदीकी थोड़ी और बढ़ी।
downstream में अमन ने देखा कि वह तीसरा लड़का राजिया के भाई के साथ खड़ा गंभीर बातें कर रहा था। दोनों की सूरतें तनाव में लग रही थीं। अमन ने दूर से नजर रखी। मन में ख्याल आया—कहीं उस रात वाली बात तो नहीं खुल रही। उसने अपना चेहरा सामान्य रखा।
शाम को घर लौटा तो आँगन में कविता और मीना दोनों बैठी थीं। कविता ने सिर उठाकर कहा, “आज थके लग रहे हो।”
मीना ने हँसते हुए जोड़ा, “कॉलेज में पढ़ाई ज्यादा हुई या कुछ और?”
अमन ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “पढ़ाई ही हुई दीदी।” दोनों बहनें हल्की मुस्कान के साथ उसे देखती रहीं। उनकी निगाहों में हल्की जिज्ञासा थी। अमन अंदर चला गया।
रात के खाने के बाद रेणु आई। लालटेन लेकर। दरवाजा बंद करके बिस्तर के किनारे बैठ गई।
“दिन कैसा रहा?” उसने पूछा।
अमन ने सब बता दिया—सुबह की अजीब सी गर्माहट (उसने कमला का नाम नहीं लिया, सिर्फ अहसास बताया), राधा के साथ बढ़ती नजदीकी, तीसरे लड़के का राजिया के भाई से बात करना, और बहनों की हल्की बातें।
रेणु ने गंभीर होकर सुना। “तीसरे लड़के वाली बात पर नजर रखना। राजिया अब भी तुम्हें ढूँढ रही होगी। और घर के अंदर भी आँखें खुली रखना।”
फिर वह थोड़ा करीब आई। “आज थक गए हो, लेकिन शिक्षा जारी रखनी है।”
रेणु ने अमन को चूमा। गहराई से। फिर उसकी पैंट खोली और लंड निकालकर मुँह में ले लिया। धीरे-धीरे, नियंत्रण के साथ चूसने लगी। अमन की उंगलियाँ उसके बालों में फँस गईं। कुछ देर बाद रेणु ने खुद उसे बिस्तर पर लिटाया, सलवार हटाई और अमन की जीभ अपनी चूत पर रख दी।
“जैसा सिखाया है वैसा करो,” उसने फुसफुसाकर कहा।
अमन ने जीभ से चाटा, चूसा, अंदर तक डाला। रेणु की सिसकारियाँ धीमी लेकिन तेज होती गईं। थोड़ी देर में उसका पानी अमन के मुँह पर छूट गया। रेणु काँपती रही। फिर उसने अमन को अपनी तरफ खींचकर कहा,
“अच्छा किया। नियंत्रण रखना सीख रहे हो। अब सो जाओ।”
रेणु कपड़े ठीक करके चली गई।
अमन अकेला रह गया। सुबह की रहस्यमयी गर्माहट, राधा की मुस्कान, तीसरे लड़के की बातचीत और रेणु की शिक्षा—सब एक साथ दिमाग में घूम रहे थे।
रात गहरी होती गई।


बुधवार की सुबह अभी अँधेरा पूरी तरह नहीं छटा था।
अमन गहरी नींद में सोया हुआ था। कमरे में हल्की ठंडक थी। खिड़की से बाहर मुर्गे की आवाज दूर से आ रही थी। तभी दरवाजा बहुत धीरे से खुला। कमला चाची अंदर आईं। इस बार उन्होंने दरवाजा पूरी तरह बंद किया और सिटकिनी तक लगा दी। उनके कदम बिलकुल आवाज नहीं कर रहे थे।
वे बिस्तर के पास आकर रुकीं। अमन की साँसें नियमित थीं। चादर कमर तक थी। कमला ने धीरे से चादर हटाई। फिर उसकी पैंट और कच्छे का नाड़ा खोला। अमन का लंड सुबह की अवस्था में आधा सख्त बाहर निकल आया। कमला की आँखों में भूख साफ झलक रही थी।
उन्होंने दोनों नरम हाथों से लंड को पकड़ लिया। इस बार सिर्फ सहलाना नहीं था। वे उसे अच्छी तरह मलने लगीं। एक हाथ से जड़ को कसकर पकड़े हुए ऊपर-नीचे कर रही थीं, दूसरे हाथ से सिर को गोलाकार सहला रही थीं। कभी हल्के, कभी थोड़ा जोर से। लंड उनके हाथों में तेजी से सख्त और गर्म होता जा रहा था। नसें फूल गई थीं। कमला की साँसें तेज हो रही थीं। उनके होंठ हल्के से खुले हुए थे। कभी-कभी वे लंड के सिर पर अपने अंगूठे से गोला बना रही थीं।
अमन की साँसों में हल्का बदलाव आया। उसकी पलकें फड़कने लगीं। कमला तुरंत समझ गईं। उन्होंने फौरन लंड को कच्छे में वापस रखा, नाड़ा बाँधा, चादर डाल दी और चुपके से सिटकिनी खोली। दरवाजा हल्के से बंद करके वे गलियारे में गायब हो गईं।
अमन की आँख खुली। कमरा खाली था। लेकिन कच्छे के अंदर उसका लंड पूरी तरह तना हुआ था और हल्की सी गीली गर्माहट बाकी थी। उसने इधर-उधर देखा। कोई नहीं था। मन में एक अजीब सा ख्याल घूम गया—फिर वही अहसास। उसने गहरी साँस ली और उठकर बैठ गया।
नहा-धोकर कॉलेज के लिए निकला।
कॉलेज में राधा पहले से बैठी थी। अमन के जाते ही उसने मुस्कुरा दिया। ब्रेक में दोनों टंकी के पास मिले। इस बार राधा और करीब खड़ी हुई। अमन ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“तुम रोज़ और प्यारी लगने लगती हो,” उसने धीमे स्वर में कहा।
राधा का चेहरा लाल हो गया। उसने नजरें झुकाईं लेकिन हाथ नहीं छुड़ाया। “अब बहुत बातें बनाने लगे हो तुम।”
अमन ने हल्के से उसकी उंगलियाँ दबाईं। “सच कह रहा हूँ।” दोनों की निगाहें एक पल के लिए मिलीं। नजदीकी साफ बढ़ रही थी।
राजिया आज भी कॉलेज नहीं आई थी। अमन ने उसकी खाली जगह की तरफ देखा। मन में उस रात की सिसकारियाँ घूम गईं।
दोपहर में घर लौटा तो आँगन में कविता और मीना दोनों कपड़े सुखा रही थीं। कविता ने सिर उठाकर कहा, “आज चेहरा थोड़ा लाल लग रहा है। कॉलेज में गर्मी ज्यादा थी क्या?”
मीना ने हँसते हुए जोड़ा, “या किसी ने गाल पर कुछ कर दिया?” दोनों बहनें एक-दूसरे की तरफ देखकर हँसीं। अमन ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “पढ़ाई की गर्मी थी दीदी।” वह अंदर चला गया। दोनों बहनों की निगाहें उसकी पीठ पर थोड़ी देर और रहीं।
आँगन के दूसरे कोने में कमला चाची बैठी थीं। उन्होंने अमन को देखते ही बुलाया।
“इधर आओ।”
अमन पास गया। कमला ने उसका हाथ पकड़ा। उंगलियाँ उसकी कलाई पर घूमने लगीं।
“सुबह जल्दी उठ गए लगते हो,” उन्होंने धीमी आवाज में कहा। आँखों में हल्की चमक थी। “नींद पूरी नहीं हुई होगी।”
अमन ने उनकी आँखों में देखा। इस बार उसने पीछे नहीं हटा। “नींद तो पूरी थी चाची… लेकिन किसी ने शायद सपना अच्छा दिखा दिया।”
कमला चाची एक पल के लिए ठिठक गईं। फिर धीरे से मुस्कुराईं। उनके हाथ ने अमन की कलाई थोड़ा और दबाया। “सपने में भी सीमा रखनी चाहिए।” आवाज में नाराजगी नहीं थी। बल्कि एक अजीब सी चुनौती थी। अमन ने भी हल्की मुस्कान दी और अंदर चला गया।
रात के खाने के बाद रेणु आई। लालटेन लेकर। दरवाजा बंद करके सिटकिनी लगाई और बिस्तर के किनारे बैठ गई।
“दिन भर की बात बताओ,” उसने कहा।
अमन ने सब कुछ विस्तार से बताया—सुबह की अजीब गर्माहट और कच्छे के अंदर का अहसास, राधा के साथ बढ़ती नजदीकी, राजिया की अनुपस्थिति, बहनों की हल्की चिढ़ाने वाली बातें, और कमला चाची के साथ आँगन वाली फ्लर्टिंग।
रेणु ने गंभीर होकर सुना। “कमला चाची अब स्पष्ट इशारे कर रही हैं। तुम भी जवाब दे रहे हो। यह खतरनाक खेल है। घर के अंदर की आग बाहर की आग से ज्यादा जलती है। सावधान रहना।”
फिर वह थोड़ा करीब आई। आँखों में वह चमक थी। “आज शिक्षा में एक नया कदम रखेंगे।”
रेणु ने अमन को गहराई से चूमा। जीभ अंदर तक गई। दोनों की साँसें तेज हो गईं। उसने अमन की पैंट खोली और लंड निकालकर कुछ देर सहलाया। फिर खुद बिस्तर पर लेट गई और सलवार नीचे सरका दी।
“आज उंगलियों से करो,” उसने फुसफुसाकर कहा। “मैं बताती रहूँगी।”
अमन उसके पास लेट गया। एक हाथ से उसके स्तन सहलाते हुए दूसरे हाथ की मध्यमा उंगली धीरे से उसकी चूत पर फेरने लगा। रेणु की कमर हिलने लगी। अमन ने उंगली अंदर डाली। पहले एक, फिर धीरे से दूसरी। रेणु की सिसकारी निकली।
“हाँ… ऐसे… अंदर तक… मोड़ो थोड़ा… ऊपर वाली जगह पर जोर से…”
अमन ने वैसा ही किया। उंगलियाँ अंदर-बाहर हो रही थीं। कभी तेज, कभी धीमी। रेणु की साँसें तेज होती गईं। उसने अमन का हाथ पकड़कर और गहराई तक दबाने लगी। थोड़ी देर में उसका शरीर अकड़ गया। पानी अमन की उंगलियों पर छूट गया। रेणु काँपती रही।
अमन ने उंगलियाँ निकालीं। रेणु ने आँखें खोलीं। चेहरे पर संतुष्टि थी। उसने अमन को अपनी तरफ खींचकर माथे पर चुंबन दिया।
“अच्छा किया। उंगलियों का इस्तेमाल भी जरूरी है। कभी-कभी लंड से पहले यह ज्यादा असर करता है।”
रेणु ने कपड़े ठीक किए। दरवाजे तक जाकर बोली,
“कमला चाची और राधा… दोनों अलग-अलग खेल हैं। मिला मत देना। और राजिया वाली बात पर नजर रखना।”
वह चली गई।
अमन अकेला रह गया। उंगलियों पर रेणु की नमी बाकी थी। दिमाग में सुबह कमला चाची के हाथों का अहसास, राधा की मुस्कान और रेणु की शिक्षा एक साथ घूम रहे थे।
रात गहरी होती गई। शरीर में एक नई बेचैनी थी।


गुरुवार की सुबह अभी पूरी तरह अँधेरा नहीं छटा था।
अमन गहरी नींद में सोया हुआ था। कमरे में हल्की ठंडक फैली हुई थी। खिड़की से बाहर मुर्गे की पहली आवाज दूर से आ रही थी। तभी दरवाजा बहुत धीरे से खुला। कमला चाची अंदर आईं। उन्होंने इस बार दरवाजा बंद करके सिटकिनी भी लगा दी। उनके कदम फर्श पर कोई आवाज नहीं कर रहे थे।
वे बिस्तर के पास आकर रुकीं। अमन की साँसें नियमित थीं। चादर कमर तक खिसकी हुई थी। कमला ने धीरे से चादर हटाई। फिर उसकी पैंट और कच्छे का नाड़ा खोला। अमन का लंड सुबह की अवस्था में आधा सख्त बाहर निकल आया। कमला की आँखों में वही भूखी चमक थी।
उन्होंने दोनों नरम हाथों से लंड को पकड़ लिया और धीरे-धीरे सहलाने लगीं। इस बार उनका हाथ और अनुभवी था। जड़ से सिर तक पूरा मल रही थीं। थोड़ी देर में लंड पूरी तरह खड़ा हो गया। नसें फूल गईं। कमला की साँसें तेज हो रही थीं। तभी लंड के सिर पर हल्का सा सफेद द्रव दिखाई दिया—थोड़ा सा वीर्य।
कमला ने झुककर अपनी जीभ निकाली और उस वीर्य को चाट लिया। स्वाद लेते हुए उन्होंने आँखें बंद कीं। फिर बिना किसी हिचकिचाहट के लंड के सिर को मुँह में ले लिया और चूसने लगीं। हल्के-हल्के, गोल-गोल जीभ घुमाते हुए। कभी सिर को पूरा मुँह में लेकर चूसतीं, कभी सिर्फ जीभ से चाटतीं। अमन की साँसों में हल्का बदलाव आने लगा। उसकी पलकें फड़कने लगीं।
कमला तुरंत समझ गईं कि वह जागने वाला है। उन्होंने फौरन लंड को मुँह से निकाला, कच्छे में वापस रखा, नाड़ा बाँधा, चादर डाल दी और चुपके से सिटकिनी खोली। दरवाजा हल्के से बंद करके वे गलियारे में गायब हो गईं।
अमन की आँख खुली। कमरा खाली था। लेकिन कच्छे के अंदर उसका लंड पूरी तरह तना हुआ था और सिर पर हल्की गीली गर्माहट बाकी थी—जैसे कोई मुँह अभी-अभी लगा हो। उसने गहरी साँस ली। मन में एक अजीब सा एहसास घूम गया।
नहा-धोकर कॉलेज के लिए निकला।
कॉलेज पहुँचते ही उसकी नजर राधा पर गई। राधा ने मुस्कुराकर उसका स्वागत किया। ब्रेक में अमन ने राधा का हाथ पकड़ा और उसे कॉलेज के पीछे वाले शांत कोने में ले गया। वहाँ दीवार के पीछे दोनों खड़े हो गए।
अमन ने दोनों हाथों से राधा का चेहरा पकड़ा और धीरे से उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए। चुंबन नरम था, लेकिन इस बार थोड़ा और गहरा। राधा पहले सहम गई, फिर धीरे-धीरे जवाब देने लगी। अमन की जीभ उसके होंठों पर फिसली। राधा की साँसें तेज हो गईं। अमन ने उसके निचले होंठ को हल्के से काटा।
“अमन…” राधा ने फुसफुसाकर कहा। गाल लाल थे।
अमन ने उसके कान के पास धीमे स्वर में कहा, “तुम रोज़ और सुंदर लगती हो। अब तो तुम्हें देखकर दिल नहीं भरता।”
राधा शर्मा गई। उसने अमन की कमीज का कोना पकड़ लिया। “यहाँ कोई देख लेगा…”
अमन ने फिर से उसके होंठ चूम लिए। छोटा सा लेकिन प्यार भरा चुंबन। राधा की उंगलियाँ उसकी कमीज में और कस गईं। दोनों कुछ पल और उसी कोने में खड़े रहे।
वे दोनों इतने में व्यस्त थे कि उन्हें पता ही नहीं चला कि थोड़ी दूर, पेड़ों की छाँव में वही अज्ञात व्यक्ति फिर से खड़ा उन्हें देख रहा था। उसकी निगाहें दोनों पर टिकी हुई थीं।
कक्षा में लौटते समय अमन ने देखा कि राजिया आज कॉलेज आई थी। वह अपनी जगह पर बैठी थी। चलने में हल्की तकलीफ साफ दिख रही थी। चेहरा थोड़ा थका हुआ था। अमन ने जानबूझकर उसकी तरफ ज्यादा नहीं देखा।
शाम को घर लौटा तो आँगन में कविता कपड़े सुखा रही थी। अमन उसके पास से गुजरा तो कविता ने सिर उठाया।
“आज देर से आए हो,” उसने कहा। आवाज में हल्की शरारत थी। “कॉलेज में कोई खास बात हो गई क्या?”
अमन ने रुककर उसकी तरफ देखा। कविता की साड़ी का पल्लू थोड़ा खिसका हुआ था। गले की हड्डियाँ साफ दिख रही थीं। अमन ने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया, “खास तो नहीं… लेकिन दिन अच्छा जरूर रहा।”
कविता ने उसकी आँखों में देखा। थोड़ी देर निगाहें मिली रहीं। फिर उसने धीरे से मुस्कुरा दिया। “अच्छा रहा तो ठीक है।” अमन अंदर चला गया। कविता की निगाहें उसकी पीठ पर थोड़ी देर और रहीं।
रात के खाने के बाद रेणु आई। लालटेन लेकर। दरवाजा बंद करके बिस्तर के किनारे बैठ गई।
अमन ने दिन की सारी बातें बता दीं—सुबह की अजीब गर्माहट और गीला अहसास, राधा के साथ कोने वाला चुंबन और फ्लर्टिंग, राजिया का कॉलेज आना, और कविता के साथ हल्की बात।
रेणु ने गंभीर होकर सुना। “कमला चाची अब और आगे बढ़ रही हैं। कविता भी इशारे समझने लगी है। घर के अंदर आग धीरे-धीरे फैल रही है। सावधान रहना। और राजिया… वह अब तुम्हें ढूँढने की कोशिश करेगी। उसकी नजरों से बचके रहना।”
रेणु ने और ज्यादा शारीरिक शिक्षा नहीं दी। बस अमन का हाथ पकड़कर बोली, “आज बस इतना। तुम बहुत सारी चीजें एक साथ संभाल रहे हो। थोड़ा ठहरो। नियंत्रण रखना।”
वह चली गई।
अमन अकेला रह गया। सुबह की गीली गर्माहट, राधा के होंठों का स्वाद, कविता की निगाहें और रेणु की चेतावनी—सब एक साथ दिमाग में घूम रहे थे।
रात गहरी होती गई।


RUKSANA


[img=464x1400][Image: 3ad5d5d767290eccc07e73f95eed3fe9.jpg][/img]
शुक्रवार की शाम का समय था।
अमन कॉलेज से लौटकर अभी कपड़े भी नहीं बदल पाया था कि पिता सुरेश ने आँगन से आवाज लगाई,
“अमन! इधर आ। खेत में एक काम है। जल्दी चल।”
अमन ने जल्दी से चप्पल पहनी और पिता के साथ निकल पड़ा। सूरज ढलने लगा था। आसमान में नारंगी और बैंगनी रंग फैल रहे थे। रास्ते में धूल उड़ रही थी। दोनों चुपचाप चल रहे थे। पिताजी ने सिर्फ इतना कहा,
“हल की मरम्मत करवानी थी। देख लेना कि काम हो गया या नहीं। मजदूरों से पूछ लेना।”
खेत तक पहुँचने में लगभग बीस मिनट लगे। खेत के किनारे वाली मिट्टी की मेड़ पर कुछ औजार पड़े थे। थोड़ी दूर पर एक औरत झुकी हुई हल की फाल साफ कर रही थी। उसकी पीठ अमन की तरफ थी। साड़ी का पल्लू कमर में तना हुआ था। कमर पतली और गोल थी। जब वह सीधी हुई तो अमन की नजरें एक पल के लिए रुक गईं।
वह औरत रुक्साना थी—राजिया की माँ।
उम्र करीब अड़तीस-चालीस के आसपास होगी। गोरा-सा रंग। चेहरा अभी भी जवान लग रहा था। आँखें तेज थीं। सबसे ज्यादा ध्यान खींच रहा था उसका बदन। साड़ी के नीचे 34D के भारी स्तन साफ उभर रहे थे। कमर पतली (34) और फिर नीचे चौड़ी गाँड (36) के साथ गदराया हुआ बदन। साड़ी का पल्लू बार-बार खिसक रहा था और उसकी गोल कमर और नाभि की झलक मिल रही थी।
अमन ने मन ही मन सोचा, “क्या मस्त फिगर है… इसे तो पटा के जरूर चोदूँगा एक दिन।”
रुक्साना ने अमन को देखा। थोड़ी देर निगाहें मिलीं। फिर उसने पल्लू संभालते हुए कहा,
“अरे बाबूजी के बेटे हो न? क्या बात है?”
अमन ने सामान्य स्वर में जवाब दिया, “काकी, पिताजी ने भेजा है। हल की मरम्मत हो गई क्या? मजदूरों ने कहा था आज तक हो जाएगी।”
रुक्साना ने हल की तरफ इशारा किया। “हो गई है। अभी अभी साफ करके रखी हूँ। तुम चेक कर लो।”
अमन पास गया। रुक्साना भी उसके बगल में खड़ी हो गई। दोनों की दूरी बहुत कम थी। रुक्साना के शरीर से हल्की मिट्टी और पसीने की खुशबू आ रही थी। अमन ने जानबूझकर हल को ध्यान से देखा, लेकिन उसकी नजरें बार-बार रुक्साना के स्तनों और कमर पर चली जा रही थीं। साड़ी का पल्लू फिर खिसका। भारी स्तनों की गोलाई और भी साफ दिखने लगी।
रुक्साना ने पल्लू ठीक करते हुए हल्की मुस्कान दी। “बाबूजी के बेटे हो, इसलिए काकी कह रहे हो। वरना उम्र में ज्यादा फर्क नहीं है।” आवाज में हल्की शरारत थी।
अमन ने सिर उठाकर उसकी आँखों में देखा। “काकी ही सही। आप तो घर की जैसी लगती हो।”
रुक्साना की आँखों में एक पल के लिए चमक आई। उसने अमन को सिर से पाँव तक एक बार घूरा। फिर धीरे से बोली, “बातें बनाना सीख गए हो लगते हो। जाओ, बाबूजी से कह देना काम हो गया है।”
अमन ने सिर हिलाया। “ठीक है काकी।”
वह लौटने लगा। कुछ कदम चलकर पीछे मुड़ा। रुक्साना अभी भी खड़ी उसे देख रही थी। साया हवा में उड़ रहा था। गदराया हुआ बदन धूप की आखिरी किरणों में चमक रहा था। अमन ने मन में फिर से वही बात दोहराई—“एक दिन जरूर…”
घर लौटकर उसने पिताजी को बता दिया कि काम हो गया है। पिताजी ने सिर हिला दिया।
रात के खाने के बाद रेणु आई। लालटेन लेकर। दरवाजा बंद करके बिस्तर के किनारे बैठ गई।
अमन ने दिन की बातें बतानी शुरू कीं। जब रुक्साना वाली बात पर आया तो रेणु की आँखें थोड़ी तेज हो गईं।
“राजिया की माँ?” उसने पूछा।
अमन ने सिर हिलाया। “हाँ। खेत में मिलीं। फिगर… बहुत गदराया हुआ है।”
रेणु ने उसकी आँखों में देखा। “तुमने सिर्फ बात की न?”
“हाँ। बस हल के बारे में पूछा। काकी कहा।”
रेणु ने गहरी साँस ली। “अच्छा किया जो अभी कुछ नहीं किया। लेकिन याद रखना—राजिया की माँ है। अगर उसके साथ कुछ उलझा तो राजिया वाली रात भी खुल सकती है। घर की औरतों में पहले से ही आग लगी है। बाहर की आग में हाथ मत डालो अभी।”
अमन चुप रहा। रेणु ने उसका हाथ पकड़ा।
“आज बस इतना। तुम बहुत सारी चीजें एक साथ देख रहे हो। थोड़ा ठहरो। नियंत्रण रखना।”
रेणु चली गई।
अमन अकेला रह गया। आँखें बंद कीं तो रुक्साना का गदराया हुआ बदन, उसके भारी स्तन और पतली कमर आँखों के सामने घूमने लगे। साथ में कमला चाची के हाथ, राधा के होंठ और रेणु की चेतावनी भी।
रात गहरी होती गई। मन बेचैन था।


शनिवार की सुबह अमन की नींद हल्की थी।
रात भर रुक्साना का गदराया हुआ बदन बार-बार आँखों के सामने घूमता रहा था। भारी स्तन, पतली कमर, गोल गाँड—सब कुछ साफ याद था। सुबह जब आँख खुली तो कमरा अभी भी धुँधला था। उसने करवट बदली। तभी दरवाजे पर हल्की सी आहट हुई।
कमला चाची अंदर आईं। इस बार उन्होंने सिटकिनी नहीं लगाई। बस दरवाजा बंद करके बिस्तर के पास आ गईं। अमन ने आँखें बंद रखीं। कमला ने चादर नहीं हटाई। सिर्फ उसके बालों में उंगलियाँ फेरते हुए धीरे से बोलीं,
“आज जल्दी उठ जाओ। चाय ठंडी हो जाएगी।”
अमन ने आँखें खोलीं। कमला चाची उसके बहुत करीब थीं। उनकी साड़ी का पल्लू आगे की तरफ झुका हुआ था। भारी स्तनों की गोलाई साफ दिख रही थी। अमन की निगाह वहीं रुक गई। कमला ने भी उसकी निगाह को पकड़ लिया। दोनों की आँखें एक पल के लिए मिलीं। कमला ने हल्की मुस्कान दी और बालों से हाथ हटा लिया।
“देखते मत रहो… उठो,” उन्होंने धीमी आवाज में कहा। आवाज में नाराजगी नहीं थी। बल्कि एक अजीब सी शरारत थी। फिर वे कमरे से बाहर चली गईं।
अमन उठकर बैठ गया। दिल की धड़कन तेज हो रही थी। कमला चाची अब छूने के बजाय निगाहों से खेलने लगी थीं। यह और खतरनाक था।
नहा-धोकर कॉलेज निकल पड़ा।
कॉलेज में राधा पहले से बैठी थी। अमन के जाते ही उसने मुस्कुरा दिया। ब्रेक में दोनों फिर पीछे वाले कोने में मिले। इस बार अमन ने राधा का हाथ पकड़कर उसे दीवार से सटा दिया। दोनों की साँसें करीब थीं।
“तुम रोज़ मेरे दिमाग में रहती हो,” अमन ने धीमे स्वर में कहा।
राधा का चेहरा लाल हो गया। उसने अमन की कमीज का कोना पकड़ लिया। “यहाँ कोई आ जाएगा…”
अमन ने उसका चेहरा दोनों हाथों में लिया और हल्के से होंठों पर चुंबन कर दिया। छोटा सा, लेकिन गहरा। राधा की पलकें बंद हो गईं। चुंबन टूटने के बाद उसने धीरे से कहा, “अब बहुत हिम्मत हो गई है तुम्हारी।”
अमन मुस्कुराया। “तुम्हारी वजह से।” दोनों कुछ पल और उसी कोने में खड़े रहे। हाथ पकड़े हुए।
कक्षा में लौटते समय अमन की नजर राजिया पर गई। राजिया आज भी कॉलेज में थी। वह अपनी जगह पर बैठी थी, लेकिन उसकी निगाहें अमन पर बार-बार जा रही थीं। जब अमन ने उसकी तरफ देखा तो राजिया ने नजरें नहीं फेरीं। बल्कि कुछ पल तक घूरती रही। उसकी आँखों में एक अजीब सा सवाल और जिद दोनों थे। अमन ने सामान्य व्यवहार बनाए रखा, लेकिन मन में ख्याल आया—वह संदेह करने लगी है।
शाम को घर लौटा तो आँगन में कविता अकेली बैठी थी। साड़ी का पल्लू एक तरफ गिरा हुआ था। अमन उसके पास से गुजरा तो कविता ने सिर उठाया।
“आज जल्दी आ गए,” उसने कहा। आवाज में हल्की गर्माहट थी। “बैठ जाओ थोड़ी देर।”
अमन ने उसके पास चौकी पर बैठ गया। कविता ने पानी का गिलास दिया। उंगलियाँ अमन की उंगलियों से छू गईं। दोनों ने कुछ नहीं कहा। कविता ने धीरे से पूछा, “तुम अब बहुत बदल गए हो लगते हो। पहले इतने चुप नहीं रहते थे।”
अमन ने उसकी आँखों में देखा। “बदलना तो समय के साथ लगता है दीदी।”
कविता ने हल्की मुस्कान दी। उसकी निगाह अमन के चेहरे पर थोड़ी देर और टिकी रही। फिर उसने पल्लू संभाला और उठ गई। “चाय पी लो।”
अमन अंदर जा ही रहा था कि कमला चाची आँगन के दूसरे कोने से निकलकर आईं। उन्होंने अमन का हाथ पकड़ लिया।
“शाम हो गई… चेहरा थका लग रहा है,” उन्होंने धीमी आवाज में कहा। उंगलियाँ उसकी कलाई पर घूमने लगीं। “नींद पूरी नहीं होती होगी इन दिनों।”
अमन ने उनकी आँखों में देखा। “नींद तो आती है चाची… लेकिन सपने बहुत ज्यादा आने लगे हैं।”
कमला चाची की आँखों में चमक आ गई। उन्होंने अमन की कलाई थोड़ा और दबाई। “सपने में भी हद रखनी चाहिए।” फिर उन्होंने हाथ छुड़ाया और अंदर चली गईं। अमन खड़ा रह गया। कमला चाची की उंगलियों की गर्माहट अभी भी कलाई पर बाकी थी।
रात के खाने के बाद रेणु आई। लालटेन लेकर। दरवाजा बंद करके बिस्तर के किनारे बैठ गई।
अमन ने दिन की हर बात विस्तार से बताई—सुबह कमला चाची की निगाहें और बालों में उंगलियाँ, राधा के साथ कोने वाला चुंबन, राजिया की घूरने वाली निगाहें, कविता के साथ आँगन वाली बात, और फिर कमला चाची की कलाई वाली फ्लर्टिंग। आखिर में रुक्साना का ख्याल भी बता दिया जो अभी भी दिमाग में था।
रेणु ने अंत तक चुपचाप सुना। चेहरा गंभीर हो गया।
“तुम एक साथ बहुत सारी आग लगा रहे हो,” उसने धीमे लेकिन सख्त स्वर में कहा। “कमला चाची अब निगाहों से खेल रही हैं। कविता भी इशारे समझने लगी है। राजिया तुम्हें संदेह की नजर से देख रही है। और रुक्साना… वह तो खतरे की जड़ है। राजिया की माँ है। अगर उसके साथ कुछ उलझा तो वह रात भी खुल जाएगी जो तुमने राजिया के साथ बिताई थी।”
अमन चुप रहा। रेणु ने उसका हाथ पकड़ा।
“मैं तुम्हें शरीर सिखा रही हूँ, दिल समझा रही हूँ। लेकिन नियंत्रण तुम्हें खुद रखना होगा। एक साथ सब कुछ मत चाहो। राधा के साथ जो बन रहा है उसे संभालो। बाकी चीजों में जल्दबाजी मत करो।”
रेणु ने इस बार ज्यादा शारीरिक शिक्षा नहीं दी। बस अमन के बालों में हाथ फेरा और बोली, “आज बस इतना। सो जाओ। कल फिर बात करेंगे।”
वह चली गई।
अमन अकेला रह गया। कमरे में अँधेरा था। आँखें बंद कीं तो एक साथ कई चेहरे घूमने लगे—राधा के होंठ, कमला चाची की निगाहें, कविता की मुस्कान, राजिया की संदेह भरी आँखें और रुक्साना का गदराया हुआ बदन।
सब कुछ एक साथ उलझता जा रहा था।
रात गहरी होती गई। नींद देर से आई।
Fuckuguy
albertprince547;
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#37
रविवार की सुबह थी। छुट्टी का दिन।
अमन अभी गहरी नींद में था। कमरे में हल्की ठंडक फैली हुई थी। तभी दरवाजा बहुत धीरे से खुला। कमला चाची अंदर आईं। इस बार उन्होंने सिटकिनी लगा दी। बिस्तर के पास आकर उन्होंने चादर हटाई और अमन की पैंट व कच्छा दोनों नीचे सरका दिए। लंड सुबह की अवस्था में आधा सख्त बाहर आ गया।
कमला ने दोनों हाथों से उसे पकड़ा और बिना किसी हिचकिचाहट के मुँह में ले लिया। पहले सिर्फ सिर चूसा, फिर धीरे-धीरे और गहराई तक ले गई। जीभ घुमाती रहीं। अमन की साँसें तेज होने लगीं। उसकी पलकें फड़कने लगीं। अचानक उसकी आँखें खुल गईं।
कमला चाची उसके लंड को मुँह में लिए हुए थीं।
अमन ने एक पल में स्थिति समझ ली। उसने तेजी से कमला का सिर पकड़ा और उन्हें ऊपर खींच लिया। दोनों की आँखें मिलीं। कमला की आँखों में हैरानी और उत्तेजना दोनों थी। अमन ने उनके होंठों पर जोर से अपने होंठ रख दिए। गहरा चुंबन। जीभ अंदर तक चली गई। कमला पहले सहम गईं, फिर जवाब देने लगीं।
अमन ने उनका ब्लाउज ऊपर किया। भारी स्तन बाहर आ गए। उसने दोनों निप्पलों को बारी-बारी से मुँह में लिया और जोर से चूसने लगा। कमला की सिसकारी निकली। उनके हाथ अमन के बालों में फँस गए।
“अमन… धीरे…” वे फुसफुसाईं।
तभी बाहर से आवाज आई।
“कमला! कहाँ हो? बाबा तुम्हें बुला रहे हैं!”
कमला की आँखें फटी की फटी रह गईं। उन्होंने तेजी से ब्लाउज ठीक किया, अमन को धक्का दिया और कमरे से भाग निकलीं। दरवाजा खुला छोड़ गईं।
अमन बिस्तर पर बैठा रह गया। लंड अभी भी तना हुआ था। साँसें तेज चल रही थीं। कमला चाची का स्वाद अभी भी होंठों पर बाकी था।
थोड़ी देर बाद उसने कपड़े पहने और घर से निकल पड़ा। छुट्टी का दिन था। मन बेचैन था। वह गाँव की तरफ घूमने निकल गया। खेतों के बीच वाली पगडंडी पर चलते हुए उसकी नजर रुक्साना पर पड़ी। वह एक मेड़ पर बैठी हुई थीं। साड़ी का पल्लू हल्का खिसका हुआ था। गदराया हुआ बदन सुबह की धूप में चमक रहा था।
अमन पास गया।
“काकी, कैसे हैं?” उसने पूछा।
रुक्साना ने सिर उठाया। आँखों में हल्की मुस्कान थी। “बाबूजी के बेटे? इतनी सुबह यहाँ?”
अमन ने उनके बगल में खड़े होकर कहा, “घूमने निकला था। काकी, आम तो अब मीठे आ गए होंगे खेत में?”
रुक्साना ने उसकी तरफ देखा। “हाँ… बगीचे में अंदर आम पक गए हैं।”
अमन ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “आप मुझे दिखा देंगी? अगर मैं आऊँ तो… आपके वाले आम।” आवाज में हल्की शरारत थी।
रुक्साना की आँखों में चमक आ गई। उन्होंने धीरे से जवाब दिया, “बिल्कुल… पके आम तो खाने के लिए ही होते हैं।”
दोनों की निगाहें एक पल के लिए मिलीं। तभी पीछे से आवाज आई।
“माँ!”
राजिया आ रही थी। रुक्साना ने तुरंत पल्लू ठीक किया। अमन ने भी सामान्य मुस्कान बना ली। राजिया ने दोनों को एक साथ देखकर थोड़ी देर घूरा। फिर रुक्साना ने कहा, “चल बेटी, घर चलते हैं।”
तीनों अपने-अपने रास्ते निकल गए। अमन के मन में रुक्साना की आँखों वाली चमक रह गई।
घर लौटकर अमन ने हाथ-मुँह धोया। आँगन में कमला चाची अकेली थीं। उन्होंने अमन को देखते ही बुलाया।
“इधर आ।”
अमन पास गया। कमला ने धीमी आवाज में कहा, “तू बहुत शैतान हो गया है।”
अमन ने उनकी आँखों में देखा। “चाची, शुरुआत तो आपने ही की थी। साँप की बिल में हाथ डालोगे तो साँप तो डसेगा ही ना।”
कमला चाची कुछ कहने वाली थीं कि अमन ने अचानक आगे बढ़कर उनके गाल पर जोर से एक चुंबन कर लिया। फिर तेजी से मुड़कर अंदर भाग गया। कमला चाची स्तब्ध खड़ी रह गईं। गाल पर अमन के होंठों की गर्माहट बाकी थी।
रात के खाने के बाद रेणु आई। लालटेन लेकर। दरवाजा बंद करके बिस्तर के किनारे बैठ गई।
अमन ने दिन की बातें बताईं—सुबह कमला चाची वाला पूरा घटनाक्रम (चूसना, उसका जाग जाना, चुंबन और स्तन चूसना, फिर बाधित होना), घर आकर कमला से बात और अचानक किया गया चुंबन। रुक्साना वाली मुलाकात उसने जानबूझकर नहीं बताई।
रेणु ने गंभीर होकर सुना। “कमला चाची के साथ अब तुमने सीमा पार कर दी। यह घर के अंदर की आग है। बहुत सावधानी से चलना। एक गलती और सब खुल सकता है।”
रेणु ने इस बार ज्यादा कुछ नहीं किया। बस अमन के बालों में हाथ फेरा और चली गई।
रात गहरी हो चुकी थी। अमन को प्यास लगी। वह पानी पीने के लिए उठा। गलियारे से गुजरते हुए पीछे की तरफ से हल्की आवाजें आ रही थीं—सिसकारियाँ और बिस्तर की हल्की चरमराहट। अमन ने धीरे से आवाज की दिशा में कदम बढ़ाए।
बाबा रामप्रसाद के कमरे का दरवाजा आधा खुला था। अंदर हल्की दीये की रोशनी थी। अमन ने दरार से अंदर झाँका।
आँखें फटी की फटी रह गईं।
बिस्तर पर बाबा रामप्रसाद अपनी माँ सुशीला के ऊपर थे। सुशीला की साड़ी कमर तक उठी हुई थी। बाबा उनके बीच में थे और जोर-जोर से धक्के लगा रहे थे। सुशीला के मुँह से दबी हुई सिसकारियाँ निकल रही थीं।
“आह्ह… बाबा… धीरे…” सुशीला की आवाज काँप रही थी।
बाबा ने जवाब में और जोर से धक्का मारा। “आज पूरी लूँगा तुझे…”
अमन पत्थर की तरह खड़ा रह गया। साँसें अटक गई थीं। माँ और दादा…
दृश्य अभी शुरू ही हुआ था।



अमन दरवाजे की दरार से अंदर देखता रह गया। साँसें अटक गई थीं। दिमाग समझ नहीं पा रहा था कि वह क्या देख रहा है।
कमरे में हल्की दीये की रोशनी थी। बिस्तर पर बाबा रामप्रसाद अपनी बहू सुशीला के ऊपर थे। सुशीला की साड़ी कमर तक उठी हुई थी। उनकी दोनों टाँगें बाबा की कमर के आसपास लिपटी हुई थीं। बाबा धीरे-धीरे लेकिन गहराई से धक्के लगा रहे थे। हर धक्के के साथ सुशीला की हल्की सिसकारी निकल रही थी।
बाबा ने सुशीला का चेहरा दोनों हाथों में लिया। आँखों में आँखें डालकर बोले,
“बहू… आज तुम बहुत सुंदर लग रही हो।”
सुशीला की आँखें नम थीं। उन्होंने बाबा की दाढ़ी में उंगलियाँ फेरते हुए धीरे से कहा,
“बाबा… आप मुझे इस उम्र में भी ऐसी नजरों से देखते हो…”
बाबा ने उनके होंठों पर बहुत नर्म चुंबन किया। जीभ नहीं थी, सिर्फ होंठों का धीमा स्पर्श। फिर उन्होंने सुशीला के गले, ठुड्डी और गालों पर हल्के-हल्के चुंबन दिए। सुशीला की साँसें तेज हो गईं। उन्होंने बाबा को और करीब खींच लिया।
बाबा ने धीरे से लंड बाहर निकाला। सुशीला कराह उठीं। फिर बाबा उनके बगल में लेट गए और सुशीला को अपनी तरफ मोड़ लिया। दोनों आमने-सामने थे। बाबा ने सुशीला की एक टाँग अपनी कमर पर चढ़ाई और फिर से अंदर प्रवेश किया। इस बार गति और भी धीमी और गहरी थी।
“बहू… तुम्हारी यह गर्माहट… सालों से वैसी की वैसी है,” बाबा ने फुसफुसाकर कहा।
सुशीला ने आँखें बंद कर लीं। उनके होंठ बाबा के होंठों से जा लगे। चुंबन लंबा और भावुक था। दोनों एक-दूसरे को सहला रहे थे। बाबा का एक हाथ सुशीला की पीठ पर था, दूसरा उनके घने बालों में। सुशीला के नाखून बाबा की पीठ पर हल्के-हल्के घूम रहे थे।
थोड़ी देर बाद बाबा उठे। उन्होंने सुशीला को गोद में उठा लिया। सुशीला ने दोनों हाथ उनके गले में डाल दिए। बाबा खड़े-खड़े उन्हें सहारा देते हुए अंदर तक चले गए। सुशीला का वजन उनके हाथों में था। हर बार जब बाबा ऊपर उठाते, सुशीला की सिसकारी निकलती।
“बाबा… इतना उठाकर… आप थक जाओगे…” सुशीला ने काँपती आवाज में कहा।
बाबा ने उनके माथे पर चुंबन करते हुए जवाब दिया, “बहू को गोद में लेकर प्यार करना थकान नहीं देता।”
वे कुछ देर तक खड़े-खड़े ही धीमे-धीमे हिलते रहे। फिर बाबा सुशीला को फिर से बिस्तर पर लिटा दिए। इस बार उन्होंने सुशीला के दोनों पैर अपने कंधों पर रख लिए। पूरा शरीर करीब था। बाबा झुके और सुशीला के स्तनों को बारी-बारी से चूमने लगे। निप्पल को मुँह में लेकर हल्के से चूसा। सुशीला की कमर उठ गई।
“आह्ह… बाबा… वहाँ…”
बाबा ने मुस्कान के साथ फिर से गहराई से धक्के लगाने शुरू कर दिए। हर धक्का प्यार से भरा हुआ था। कोई जल्दबाजी नहीं थी। सिर्फ दो शरीर एक-दूसरे में समा रहे थे।
सुशीला ने बाबा का चेहरा पकड़कर अपनी तरफ खींचा। दोनों की साँसें एक-दूसरे से मिल रही थीं। आँखों में आँखें थीं।
“बाबा… आप मुझे कभी बहू की तरह नहीं… पत्नी की तरह चाहते हो,” सुशीला ने बहुत धीमी आवाज में कहा।
बाबा ने उनके होंठों पर फिर से चुंबन किया। “बहू हो तुम… लेकिन मेरे दिल में पत्नी की जगह भी रखती हो।”
कमरे में सिर्फ सिसकारियाँ और धीमी चरमराहट की आवाजें थीं। दीये की लौ काँप रही थी। दीवार पर दोनों की छायाएँ हिल रही थीं।
अमन दरवाजे के बाहर पत्थर की तरह खड़ा था। आँखें फटी हुई थीं। साँस लेने में तकलीफ हो रही थी। माँ और दादा… इतने प्यार से…



दीये की लौ अभी भी काँप रही थी। कमरे में पसीने और हल्की सुगंध की मिली-जुली खुशबू फैली हुई थी। बाबा रामप्रसाद ने सुशीला को धीरे से पलटा। सुशीला अब घुटनों और हाथों के बल बिस्तर पर थी। उनकी साड़ी पूरी तरह कमर के ऊपर उठ चुकी थी। गोल और कोमल गाँड दीये की रोशनी में चमक रही थी।
बाबा ने पीछे से दोनों हाथों से उनकी कमर पकड़ी। बहुत धीरे से अपने लंड को उनकी चूत पर लगाया और अंदर तक चला गया। सुशीला की लंबी, काँपती सिसकारी निकली।
“बाबा… इतना गहरा…”
बाबा ने झुककर उनकी पीठ पर चुंबन किए। कंधे की हड्डी से लेकर कमर तक। हर चुंबन के साथ वे धीरे-धीरे अंदर-बाहर हो रहे थे। कोई जल्दबाजी नहीं थी। सिर्फ गहराई और प्यार।
“बहू… तुम्हारा यह शरीर… आज भी वैसा ही लगता है जैसे पहली बार छुआ था,” बाबा ने फुसफुसाकर कहा। उनकी आवाज में एक अजीब सी गर्माहट और यादें दोनों थीं।
सुशीला ने सिर घुमाकर पीछे देखा। आँखें नम थीं। “बाबा… आप मुझे हमेशा इतना संभालकर रखते हो… जैसे मैं आपके सिवा किसी की नहीं।”
बाबा ने उनकी कमर और कसकर पकड़ी। धक्के थोड़े गहरे हो गए, लेकिन फिर भी कोमल। हर बार जब वे अंदर जाते, सुशीला की सिसकारी निकलती और वे उनकी पीठ पर अपना माथा टिका देते।
थोड़ी देर बाद बाबा रुके। उन्होंने सुशीला को फिर से अपनी तरफ मोड़ा। दोनों आमने-सामने हो गए। बाबा ने सुशीला को गोद में उठा लिया। सुशीला ने दोनों टाँगें उनकी कमर पर लपेट लीं। बाबा खड़े-खड़े उन्हें सहारा देते हुए फिर से अंदर तक चले गए।
सुशीला का वजन पूरी तरह उनके हाथों में था। बाबा उन्हें हल्के-हल्के ऊपर-नीचे कर रहे थे। हर बार जब सुशीला नीचे आतीं, उनका सीना बाबा के सीने से चिपक जाता। दोनों के दिल की धड़कनें एक-दूसरे से मिल रही थीं।
“बाबा… मुझे पकड़कर… आप थक तो नहीं रहे?” सुशीला ने काँपती आवाज में पूछा।
बाबा ने उनके माथे से बाल हटाते हुए जवाब दिया, “बहू को इस तरह पास रखना… थकान नहीं, सुकून देता है।”
वे कुछ देर तक खड़े-खड़े ही धीमे-धीमे हिलते रहे। फिर बाबा सुशीला को संभालते हुए बिस्तर पर ले आए। इस बार उन्होंने सुशीला को अपने ऊपर बैठा लिया। सुशीला की दोनों टाँगें उनकी कमर के दोनों तरफ थीं। बाबा ने नीचे से धीरे-धीरे धक्के लगाए। सुशीला ने दोनों हाथ उनके सीने पर रख दिए।
दोनों की आँखें मिली हुई थीं। बाबा ने सुशीला के स्तनों को दोनों हाथों से सहलाया। फिर उठकर बैठ गए। अब दोनों एक-दूसरे के बहुत करीब थे। बाबा ने सुशीला के होंठों को पकड़ लिया। चुंबन गहरा और लंबा था। जीभ धीरे-धीरे एक-दूसरे के मुँह में घूम रही थी।
सुशीला की सिसकारियाँ चुंबन के बीच में दबी हुई निकल रही थीं। बाबा का एक हाथ उनकी पीठ पर था, दूसरा उनके बालों में। सुशीला की उंगलियाँ बाबा की सफेद दाढ़ी में फँसी हुई थीं।
“बहू… आज तुम और भी ज्यादा प्यार कर रही हो,” बाबा ने होंठ अलग करते हुए कहा।
सुशीला ने उनकी आँखों में देखा। “क्योंकि आज आप मुझे सिर्फ बहू नहीं… अपनी स्त्री की तरह चाह रहे हो।”
बाबा ने उन्हें फिर से अपनी छाती से लगा लिया। धक्के अब थोड़े तेज हो गए थे, लेकिन फिर भी उनमें प्यार की गर्माहट बाकी थी। सुशीला की साँसें तेज होने लगीं। उनकी कमर अपने आप हिलने लगी। बाबा ने उनकी कमर पकड़कर उन्हें और करीब खींच लिया।
“आह्ह… बाबा… मैं… आ रही हूँ…” सुशीला की आवाज टूट रही थी।
बाबा ने उनके गले में मुँह रखकर कहा, “आ जाओ बहू… मेरे साथ…”
सुशीला का शरीर अकड़ गया। उन्होंने बाबा को जोर से जकड़ लिया। लंबी सिसकारी निकलते हुए उनका पानी निकल गया। बाबा ने भी कुछ गहरे धक्कों के बाद उन्हें कसकर पकड़ लिया। गरम पानी की धार उन्होंने सुशीला के अंदर छोड़ दी। दोनों एक-दूसरे से चिपके हुए काँपते रहे।
बहुत देर तक कोई नहीं बोला। सिर्फ साँसें चल रही थीं। बाबा ने सुशीला के बालों में हाथ फेरा। सुशीला ने उनका माथा अपने होठों से छू लिया।
“बाबा…” उन्होंने बहुत धीमी आवाज में कहा।
“हाँ बहू।”
“आप मुझे हमेशा ऐसे ही रखना… छुपकर ही सही।”
बाबा ने उनके माथे पर लंबा चुंबन किया। “जब तक साँस है… रखूँगा।”
दोनों उसी हालत में लेटे रहे। दीये की लौ धीरे-धीरे छोटी होती जा रही थी। कमरे में एक अजीब सी शांति छा गई थी—पाप की नहीं, बल्कि एक गहरे, छुपे हुए प्यार की शांति।
दरवाजे के बाहर अमन अभी भी खड़ा था। शरीर काँप रहा था। आँखों में जो कुछ देखा था, वह दिमाग में बार-बार दोहराया जा रहा था। माँ की सिसकारियाँ… दादा के प्यार भरे शब्द… दोनों का एक-दूसरे में खो जाना…
वह धीरे से पीछे हटा। गलियारे में अँधेरा था। पैर काँप रहे थे। उसने पानी पीना तो दूर, कमरे तक पहुँचने में भी मुश्किल महसूस की।
बिस्तर पर लेटते समय उसकी आँखें खुली की खुली रह गईं। छत की तरफ देखता रहा।
आज घर के सबसे बड़े राज़ ने उसके सामने अपना चेहरा खोल दिया था।
Fuckuguy
albertprince547;
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#38
Excellent and kamottejak update Aman aage badh raha hai Radha ke sath kavita ke sath or Kamla Chachi kafi aage badh gayi Ruksana ke sath bhi flirt najdikiyan badh rahi hain Raziya to diwani ho gayi or Last main Maa ka ek or raaz As accepted Dada or Maa ko ek sath chudai main lean dekhna jo ki bahut purana lag raha hai Raaj or bhi gahare honge Renu ne bhi ab aage badhana band kar diya hai lag raha tha ungli ke baad baad chudai hogi but sirf batein..... Waiting for next eagerly
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#39
shaandaar.................aur bhi kuch hai kya
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#40
Aaj ke updates kahan hai brother

Update please

We are waiting
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