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यह मेरी पहली कहानी है और इसमें भाई-बहन का रोमांस है, और बाद में शायद इनसेस्ट भी हो सकता है। लेकिन सिर्फ भाई-बहन दो ही किरदार नहीं होंगे। इसमें एडल्टरी और ककल्ड भी होगा। शुरू में सिर्फ भाई-बहन का रोमांस ही होगा। तो जिन्हें यह पसंद नहीं, वे इसे न पढ़ें। और कोई इस कहानी में लॉजिक की बात न करे।
मैं पहली बार लिख रहा हूँ, इसलिए लिखने का ज्यादा आइडिया नहीं है। मैं जैसे मन में आएगा वैसे ही लिखता जाऊँगा। आप सुझाव दे सकते हो। हफ्ते में एक बार अपडेट दूँगा। अभी के लिए यही प्लान है। आगे अगर ज्यादा समय मिला तो फ्रीक्वेंसी बढ़ सकती है, और अगर कम समय मिला तो फ्रीक्वेंसी कम भी हो सकती है।
कहानी लिखने का एकमात्र मकसद यह है कि मैंने xboard, exbii और xossip पर बहुत सारी कहानियाँ पढ़ी हैं और उन पर हिलाने में बहुत मजा लिया है। कहानी पढ़ते हुए हिलाना सबसे ज्यादा मजेदार है। पोर्न इसके आगे कुछ भी नहीं। लेकिन जो रीडिंग में दिलचस्पी रखते हैं, सिर्फ उन्हें ही यह अच्छा लगेगा। तो मेरी भी ड्यूटी है कि थोड़ा योगदान दूँ। लिखना मेरे बस की बात नहीं है, इसलिए भाषा सपाट/सादी होगी। अगर आपको अच्छा न लगे तो बताना। मैं बदलाव की कोशिश करूँगा।
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*कैरेक्टर्स*
1) हर्ष।
मेरी उम्र 18 साल है। मैंने 12वीं पूरी की है। मेरा लंड लंबा तो है ही, लेकिन मोटा ज्यादा है। मोटाई दूसरों से थोड़ी ज्यादा है। इस कहानी में जितने भी लंड आएंगे वो मोटाई में मेरे से कम ही होंगे और लंबाई भी मेरे लंड जितनी या उससे कम ही होगी। एग्जैक्ट साइज किसी का नहीं लिखूँगा, आपको जो अच्छा लगे इमेजिन कर लेना।
2) पीनल। हर्ष की सगी बहन पीनल हर्ष से 7 साल बड़ी है। हर्ष उनकी बहुत रिस्पेक्ट करता हूँ। 2 साल पहले उनकी शादी हुई और वो शादी के बाद अपने पति के साथ दूसरे शहर में रहती हैं। हर्षसे 7 साल बड़ी होने के कारण उन्होंने एक माँ की तरह हर्ष की देखभाल की है। हर्ष के दिल में उनके लिए बहुत रिस्पेक्ट है और हर्ष उनके लिए कुछ भी कर सकता हूँ। हर्ष अपनी दीदी को कभी उदास नहीं देख सकता।
3) राहुल। पीनल के पति बहुत हैंडसम और खुले विचारों वाले हैं और पीनल से बहुत प्यार करते हैं। वो भी हर्ष की तरह दीदी को कभी उदास नहीं देख सकते और पीनल के लिए कुछ भी कर सकते हैं। वो एक कंपनी में जॉब करते हैं।
और भी कैरेक्टर्स हैं लेकिन उनके बारे में अभी ठीक से सोचा नहीं है। जैसे-जैसे आएंगे बताता जाऊँगा।
और हाँ, मैं फालतू की बातें ज्यादा नहीं लिखूँगा। आपको शायद यह कहानी कभी-कभी फास्ट फॉरवर्ड में जाते हुए लगेगी।
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**अपडेट 1**
हर्ष..........
मैंने 12वीं पूरी कर ली और अब मैं आगे की पढ़ाई अपनी दीदी के शहर में करने वाला हूँ। मेरा एडमिशन उनके शहर में हुआ है। दीदी को कॉल करके पहले ही बता दिया था।
जब मैं दीदी के घर पहुँचा तो दीदी और जीजू मुझे देखकर बहुत खुश हो गए। जीजू ने मुझे गले लगा लिया। वैसे भी मेरी जीजू से अच्छी बनती थी।
वैसे मैं बता दूँ कि जीजू मुझसे 4 साल बड़े हैं और दीदी से 3 साल छोटे। जीजू ने दीदी को हमारे एक कॉमन रिलेटिव की शादी में देखा और दीदी उनको इतनी पसंद आ गई कि कैसे भी करके दीदी के साथ उनकी शादी हो गई।
तो मैं बता रहा था कि जीजू ने मुझे गले लगा लिया और बहुत खुश लग रहे थे। दीदी भी बहुत खुश थीं लेकिन हमारा रिश्ता ऐसा था कि हम एक-दूसरे को बहुत प्यार करते हुए भी कभी एक-दूसरे को गले नहीं लगाते थे। लेकिन जीजू ने दीदी से कहा – “ये क्या पीनल, तुम्हारा सगा भाई आया है और तुम खुश नहीं?”
दीदी: अरे किसने कहा मैं खुश नहीं। मैं बहुत खुश हूँ, अब कैसे बताऊँ कि मैं कितनी खुश हूँ...
जीजू: अरे तो कम से कम अपने भाई को गले तो मिलो...
दीदी यह सुनकर थोड़ी शर्माने लगीं और मुझे भी थोड़ी शर्म आ रही थी... हमारे बीच प्यार बहुत था लेकिन ऐसे कभी दिखाया नहीं था...
जीजू: अरे ऐसे खड़ी क्यों हो, चलो जल्दी से गले लगो...
और जीजू ने दीदी को पकड़ के मेरे गले लगा दिया। दीदी भी मेरे गले लग गईं...
मैंने भी दीदी को गले लगाया। हम भाई-बहन आराम से एक-दूसरे से गले मिल रहे थे, इतने में जीजू ने कहा – “ऐसे नहीं, कस के गले मिलो। तुम सगे भाई-बहन हो, कोई गैर नहीं...” और इतना बोलकर जीजू दीदी को पीछे से हग करने लगे लेकिन उनके हाथ मेरे पीछे लपेट लिए... दीदी हम दोनों के बीच में थीं...
आज पहली बार मैं दीदी को ऐसे गले मिल रहा था और वो भी इतना कसके। दीदी ने भी मुझे कसके गले लगाया... मुझे कुछ सूझा नहीं तो मैंने भी दीदी को कसके गले लगाया और मेरे हाथ जीजू के पीछे ले गया। ऐसा लग रहा था जैसे मैं और जीजू गले लग रहे हों...
दीदी ने अपना सर मेरे कंधे पे रख दिया और मैंने अपना सर दीदी के कंधे पे...
दीदी पता नहीं अभी-अभी नहाकर आई थीं या और कुछ था, लेकिन दीदी के शरीर से बहुत अच्छी खुशबू आ रही थी। दीदी के स्तन मुझे अपनी छाती पर महसूस हो रहे थे। यह पहली बार था कि मैं दीदी के स्तनों को इस तरह महसूस कर रहा था। हाँ, मेरे दिमाग में कोई गलत विचार नहीं था लेकिन दीदी की चूचियाँ अच्छे से महसूस हो रही थीं। दीदी के दोनों बूब्स बड़े-बड़े थे और सख्त भी थे... हम तीनों कुछ देर ऐसे ही गले लगे रहे...
फिर जीजू अलग हुए और कहा – “चलो भाई, अभी-अभी क्या सारा प्यार अपने भाई को दे दोगी। कुछ बाद के लिए भी बचा कर रखो।”
दीदी: भाई के लिए बहन का प्यार कभी खत्म नहीं होता, चाहे जितना प्यार वो अपने भाई पर लुटाए...
जीजू: अरे मैं तो मजाक कर रहा था। वो अभी आया है, उसे भूख लगी होगी, उसकी पसंद का कुछ बनाओ... मैं भाई-बहन के बीच में कैसे आ सकता हूँ। तुम चाहो तो पूरा दिन और रात अपने भाई के गले लगी रहो...
दीदी: हाँ हाँ, मेरा भाई है, मैं उसे दिन-रात गले लगाऊँगी, उसमें क्या...
मेरी कुछ समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या बोलूँ...
जीजू: मेरा कुछ काम है, हर्ष तुम फ्रेश हो जाओ, मैं थोड़ी देर में आता हूँ फिर साथ में खाएँगे...
और जीजू घर से निकल गए... और दीदी भी किचन में चली गईं...
मैं फ्रेश होकर सोफे पे बैठा था और मोबाइल देख रहा था। मेरा नेट स्लो था तो मैंने दीदी से हॉटस्पॉट करने को कहा। दीदी ने कहा – “मैं खाना बना रही हूँ, तू खुद ही कर ले।” मैं किचन में गया और दीदी का मोबाइल लेकर आया। दीदी ने मुझे पैटर्न बताई तो मैंने अनलॉक किया और हॉटस्पॉट किया।
तभी मुझे याद आया कि मैंने एक ऐप बनाई थी और उसका टेस्टिंग करना था, तो क्यों न दीदी के मोबाइल में ही टेस्टिंग करूँ। मैंने अपने फोन से ऐप शेयर की और दीदी के मोबाइल में इंस्टॉल कर दी।
वो ऐप ऐसी थी कि आप किसी की भी कॉल सुन सकते थे और माइक्रोफोन से आसपास की बातें भी सुन सकते थे। वो ऐप इंस्टॉल होने के बाद हाइड हो जाती और किसी को पता भी नहीं चलता...
मैं दीदी का फोन वापस दे आया। थोड़ी देर में जीजू भी आ गए। हमने साथ खाना खाया और बैठकर बातें करने लगे। दीदी खुश तो बहुत थीं लेकिन शायद उनके कपड़े उनको अनकंफर्टेबल लग रहे थे। दीदी ने सलवार-कुर्ता पहने थे लेकिन वो बार-बार उन्हें सही कर रही थीं। जीजू ने भी यह नोटिस किया लेकिन कुछ कहा नहीं।
फिर हम अपने-अपने रूम में चले गए। उनके बेडरूम के बगल वाले रूम मुझे दिया था। रूम के अंदर जाके मैं बेड पर लेट गया और दीदी ने जब गले लगाया था उसके बारे में सोचने लगा।
कितना अच्छा लगा था मुझे जब दीदी के गले लगा था। मुझे लगा मैं दीदी के और करीब आ गया हूँ और हमारा रिश्ता और मजबूत हो गया है। वैसे दीदी के दोनों बड़े-बड़े स्तन मुझे अब भी महसूस हो रहे थे लेकिन मुझे उसमें कुछ गलत नहीं लगा। अगर दो लोग गले मिलेंगे तो उनके अंग एक-दूसरे को महसूस तो होंगे ही, चाहे वो भाई-बहन ही क्यों न हों और इसमें गलत भी क्या है। उल्टा अब मुझे दीदी पर ज्यादा ही प्यार आने लगा था। ऐसा लग रहा था दीदी ही मेरा सब कुछ है। और ऐसे सोचते-सोचते मैं सो गया।
शाम को हम फ्रेश होकर हॉल में बैठे थे। दीदी चाय बनाने किचन में गईं और जीजू भी पीछे-पीछे गए। मैंने मोबाइल निकाला और तभी मुझे ख्याल आया कि चलो ऐप की टेस्टिंग करते हैं। वैसे जीजू और दीदी की बातें ऐसे सुनना मुझे ठीक नहीं लगा, फिर सोचा आखिर क्या ही बातें करेंगे, सुन लेता हूँ। मैंने इयरफोन लगाए और सुनने लगा...
जीजू: सुनो ना।
दीदी: क्या है।
जीजू: तुम्हारा भाई आया है तो मैं सोच रहा था कि हम रात को थोड़ी पार्टी कर लें...
दीदी: पार्टी मेरे भाई के साथ? वो पार्टी नहीं करता।
जीजू: तुम्हे कैसे पता तुम्हारा भाई पार्टी नहीं करता। बियर तो पक्का पीता होगा...
दीदी: नहीं, वो बियर भी नहीं पीता।
जीजू: तुम उसे बच्चा समझना बंद करो जानू। वो 18 साल का हो गया है और वो पक्का दोस्तों के साथ पार्टी करता होगा और उसकी कोई गर्लफ्रेंड भी होगी और हो सकता है तुम्हारे भाई ने उसे चोदा भी होगा...
(यह सुनके मुझे अजीब सा रोमांच हुआ। मैं पहली बार पति-पत्नी की बातें ऐसे सुन रहा था और पत्नी मेरी सगी बहन थी)
दीदी: मेरा भाई ऐसा नहीं है, मैं उसे जानती हूँ। और मेरे भाई के बारे में ऐसा मत बोलो।
जीजू: ओके सॉरी बाबा, लेकिन तुम्हे अपनी सोच बदलनी होगी। तुम उसे छोटे बच्चे जैसे हर वक्त ट्रीट नहीं कर सकतीं। हाँ, तुम थोड़ी देर उसे लाड़-प्यार करो वो ठीक है। लेकिन तुम्हे उसे उसकी उम्र और बॉडी के अनुसार समझना होगा। वो दिखने में मुझसे भी बड़ा लगता है, भले ही मुझसे 4 साल छोटा हो। अगर तुम ऐसे ही करती रही तो वो तुमसे दूर होता जाएगा।
थोड़ी देर कोई कुछ नहीं बोला और थोड़ी देर बाद...
दीदी: हाँ बाबू, तुम सही हो लेकिन क्या करूँ। वो मेरे सामने छोटे से बड़ा हुआ है। मैंने उसे अपना दूध न पिलाया हो लेकिन एक माँ के जैसे सँभाला है। कुछ भी होता तो वो मम्मी-पापा के पास नहीं जाता बल्कि मेरे पास आता। लेकिन तुम सही हो। मुझे उसे छोटे बच्चे जैसे ट्रीट नहीं करना चाहिए।
जीजू: थैंक गॉड तुम समझ गईं। मैं उसे पार्टी के बारे में पूछूँगा, अगर वो ना कहेगा तो मैं फोर्स नहीं करूँगा। ठीक है।
दीदी: ठीक है, लेकिन तुम दोनों पार्टी करोगे तो मैं क्या करूँगी।
जीजू: हम तीनों मिलकर पार्टी करेंगे और क्या...
दीदी: पागल, मैं अपने भाई के साथ कैसे पार्टी करूँ।
(वैसे यह सुनकर मुझे सरप्राइज हुआ कि दीदी भी पार्टी करती हैं। लेकिन अच्छा भी लगा कि दीदी अपनी मर्जी से जीती हैं और अपनी लाइफ खुलकर एंजॉय करती हैं। दीदी की बातें सुनकर मुझे दीदी के लिए बहुत अच्छा लग रहा था। बस ऐसे ही दीदी खुश रहें और खुलकर एंजॉय करें।)
जीजू: अब तुम्हे अपने भाई के लिए हमें तो छूट देनी होगी। इतना तो करना ही होगा...
दीदी: कोई नहीं। मेरे भाई के लिए मैं कुछ भी कर सकती हूँ। लेकिन अगर वो मना करे तो उसे फोर्स मत करना।
जीजू: फोर्स नहीं करूँगा बाबा। तुम मुझे नहीं जानती क्या।
और फिर किसिंग की आवाज़ आने लगी।
दीदी: क्या कर रहे हो। मेरा भाई हॉल में है।
जीजू: अरे तो क्या हुआ। उसे क्या नहीं पता होगा कि रोज रात को मैं उसकी बहन की चुदाई करता हूँगा।
दीदी: तो क्या मेरे भाई के सामने मुझे चोदोगे।
जीजू: अरे किस तो कर सकता हूँ ना।
दीदी: नहीं, भाई के सामने कोई किस नहीं।
जीजू: ठीक है बाबा, जैसा तुम कहो।
(जीजू और दीदी की बातें सुनके मेरा मूड बन गया था। पता नहीं क्यों मुझे अच्छा लग रहा था और मैं खुश था। मैं खुश था मेरी प्यारी दीदी के लिए। लेकिन मैं सोचने लगा कि दीदी शादी के बाद बोल्ड हो गई हैं। लेकिन वो खुश थीं और मैं उनके लिए खुश था। और आखिर पति-पत्नी का रिश्ता ऐसा ही होना चाहिए। वो मेरी दीदी थीं लेकिन जीजू की बीवी थीं। वैसे जीजू उनसे तीन साल छोटे थे।)
थोड़ी देर बाद जीजू बाहर आए और दीदी भी चाय लेकर आईं। हमने चाय पी और इधर-उधर की बातें करने लगे।
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Update 2
हर्ष.............
शाम को मैं और जीजू बगीचे में घूमने गए। वहाँ एक जगह बैठकर हम बातें करने लगे।
जीजू: और बताओ हर्ष, क्या चल रहा है?
मैं: कुछ नहीं जीजू, सब बढ़िया।
जीजू: कोई लड़की पटाई की नहीं?
मैं: कहाँ जीजू, अभी तक कोई नहीं पटी।
जीजू: अरे क्या बात कर रहे हो? यानी कि अभी तक चूत देखी भी नहीं?
मैं: हाँ जीजू।
जीजू: मैंने तेरी उम्र में तो चोद भी लिया था।
मैं: वाओ जीजू, कौन थी?
जीजू: मेरे एक दोस्त की बहन थी।
मैं: लेकिन दोस्त की बहन हमारी भी बहन जैसी होती है। दोस्त की बहन चोदना गलत नहीं?
जीजू: देख हर्ष, जब लड़की चुदवाना चाहती हो तो वो किसी से भी चुदवा कर ही रहती है। अगर मैं उसे नहीं चोदता तो वो किसी और से चुदवाने लगती। बेहतर था कि मैं ही उसे चोदूँ। उसकी सेफ़्टी तो रहेगी। और वैसे भी मैंने मेरे दोस्त को बता दिया था कि उसकी बहन मुझसे चुदवाना चाहती थी और मैं उसे चोदता हूँ।
मैं: फिर आपके दोस्त ने क्या कहा?
जीजू: उसे भी ठीक लगा। किसी अनजान से चुदवाने से बेहतर है मैं ही उसे चोदूँ। किसी गैर पे भरोसा नहीं कर सकते। क्या पता बाद में वो उसे ब्लैकमेल करे या अपने दोस्तों से भी चुदवाए या फिर उसकी वीडियो इंटरनेट पे डाल दे।
मैं: हाँ ये बात तो सही है। एक बार इज्जत चली गई फिर वापस नहीं आती।
जीजू: हाँ भाई, क्या करें, हमने लड़की की इज्जत को उसकी चूत के अंदर क़ैद कर लिया है। अगर किसी लड़की की चूत में लंड चला गया मतलब उसकी इज्जत चली गई। और लड़का चाहे कुछ भी करे।
मैं: हाँ जीजू, लेकिन क्या करें, हमारी सोसाइटी ऐसे ही चलती है। सबके लिए अलग नियम हैं।
जीजू: अच्छा चल, वो सब जाने दे। एक बात बता, तू दारू पीता है कि नहीं?
(मुझे पता था जीजू क्यों पूछ रहे हैं, लेकिन मैं क्या बोलता। जीजू से मैं झूठ बोलना नहीं चाहता था और सच बोलता तो दीदी का भरोसा टूट जाता। आख़िरकार मैंने सच बोला।)
मैं: हाँ जीजू, पीता हूँ।
जीजू: अरे तो इतना सोच क्यों रहे हो। ये तो नॉर्मल है और तुम कोई गलत काम तो नहीं कर रहे। चल आज रात को थोड़ी पार्टी कर लें।
मैं: नहीं जीजू, दीदी क्या सोचेंगी।
जीजू: देख हर्ष, जिनसे हम दिल से प्यार करते हैं उनके सामने कुछ छुपाना नहीं चाहिए और ऐसी दोहरी ज़िंदगी नहीं जीनी चाहिए। दुनिया के सामने हम ये सब छुपाने को मजबूर हैं लेकिन अपनों के साथ खुलकर जीना चाहिए। हो सकता है तुम्हारी दीदी को ये जानकर शॉक लगे लेकिन अगर बाद में पता चला कि तुमने झूठ बोला है तो उसे शॉक नहीं लगेगा बल्कि दुख होगा। और मैं पिनल को दुखी नहीं देख सकता। इसलिए बेहतर है कि तुम अपनी दीदी से कुछ न छुपाओ। और उसे उतना भी शॉक नहीं लगेगा जैसा तुम सोच रहे हो।
मैं: वो कैसे?
जीजू: वो रात को पार्टी करते वक्त बताऊँगा।
मैं: ठीक है जीजू।
जीजू: फिर पार्टी करते हैं रात को।
मैं: हाँ जीजू, करते हैं।
जीजू: अच्छा तुम सिर्फ़ बीयर पीते हो या सब कुछ?
मैं: कुछ भी चलेगा जीजू।
जीजू: ये हुई ना बात।
फिर हम घर आ गए।
घर आकर जीजू दीदी को अपने कमरे में ले गए। मेरे मन में ख्याल आया कि वह दोनों क्या बातें कर रहे होंगे और जीजू अचानक दीदी को अपने कमरे में क्यों ले गए। मैंने ईयरफ़ोन लगाए और दोनों की बातें सुनने लगा।
जीजू: आज मैं और तुम्हारा भाई पार्टी करने वाले हैं।
दीदी: क्या, इसका मतलब मेरा छोटा भाई शराब पीता है।
जीजू: अरे तुम इतना ओवररिएक्ट क्यों कर रही हो। वो छोटा बच्चा नहीं है। तुम्हीं उसे छोटा बच्चा समझ रही हो।
दीदी: हाँ शायद मैं उसे आज भी बहुत छोटा समझ रही हूँ लेकिन वह बड़ा हो गया है। मुझे समझना चाहिए था।
जीजू: अच्छा हम ऊपर वाले कमरे में जाकर पार्टी करते हैं और बाद में आकर सब साथ में खाना खाएँगे।
जीजू बाहर आए और मुझे ऊपर वाले कमरे में ले गए। फिर हम दोनों पार्टी करने बैठे। जीजू ने पेग बनाए और हम दारू पीने लगे।
मैं: अच्छा जीजू, आप बता रहे थे कि दीदी को शॉक नहीं लगेगा तो क्या बात थी।
जीजू: वैसे तो मुझे यह बात तुम्हें नहीं करनी चाहिए लेकिन फिर भी बताता हूँ। तुम्हारी दीदी भी दारू पीती है।
मेरा मुँह खुला रह गया।
मैं: क्या सच में?
जीजू: हाँ भाई, तुम्हारी दीदी को बीयर और वाइन बहुत पसंद है। वैसे वह सब कुछ पीती है। लेकिन तुम अपनी दीदी को जज मत करो। सबको अपनी लाइफ़ खुलकर जीने का पूरा अधिकार है। और मैंने तुम्हारी बहन को पूरी छूट दे रखी है। वह जैसे चाहे अपनी लाइफ़ जी सकती है।
मैं: नहीं जीजू, मैं दीदी को जज नहीं कर रहा हूँ लेकिन मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ, बस इतनी-सी बात है।
जीजू: तुम दोनों भाई-बहन एक जैसे हो। खुद तो सब कुछ करना चाहते हो और करते भी हो लेकिन सोचते हो कि दूसरा यह न करे।
मैं: नहीं नहीं जीजू, ऐसी बात नहीं है। दीदी कुछ भी करें, अगर दीदी खुश हैं तो मैं भी खुश हूँ।
अच्छा जीजू, और भी कुछ बताओ न दीदी के बारे में।
जीजू: नहीं हर्ष, और मैं कुछ नहीं बताऊँगा। ये तुम्हारी दीदी की पर्सनल लाइफ़ है। जितना तुम्हारी दीदी तुम्हें बताना चाहेंगी वो खुद बताएँगी। दारू वाली बात कोई बड़ी बात नहीं और तुम थोड़ा कंफ़र्टेबल हो इसलिए बताई।
मैं: हाँ जीजू, मुझे पूछना भी नहीं चाहिए था।
हमें ठीक-ठीक नशा हो गया था।
जीजू: एक और बात है।
मैं: क्या बात है?
जीजू: तुम्हारी दीदी ने आज तुम आने वाले थे इसीलिए सलवार-कुर्ता पहना है।
मैं: ऐसा क्यों जीजू?
जीजू: तुम्हारी दीदी को सलवार-कुर्ता पहनने की आदत नहीं। वो घर में हल्के-फुल्के कपड़े ही पहनती हैं। लेकिन उन्हें तुम्हारे सामने शर्म आ रही थी इसीलिए सलवार-कुर्ता पहना है।
मैं: अरे मुझसे कैसा शर्माना। मैं तो सगा भाई हूँ, वो भी सात साल छोटा। दीदी कुछ भी पहनें मैं जज नहीं करूँगा, आप दीदी को बता देना। वैसे मुझे लग रहा था कि दीदी कंफ़र्टेबल नहीं हैं कपड़ों में।
जीजू: ऐसा करते हैं, कल तुम्हारी दीदी के लिए नए कपड़े लेने चलते हैं। तुम ही पसंद करना अपनी दीदी के कपड़े।
मैं: अरे लेकिन मैं कैसे पसंद करूँ? मुझे तो कुछ समझ नहीं आएगा। और दीदी के पास घर में पहनने के कपड़े तो होंगे ही।
जीजू: कपड़े तो हैं लेकिन वो कुछ ज़्यादा ही छोटे हैं। तुम्हारी दीदी अकेली थीं तो पहनती थीं लेकिन तुम्हारे सामने उन्हें शर्म आएगी। और हम तीनों चलेंगे साथ में और मिलकर पसंद करेंगे।
मैं: ठीक है जीजू।
फिर हम खाना खाने नीचे आए। दीदी हमारा इंतज़ार कर रही थीं। मैं और जीजू थोड़े नशे में थे लेकिन ज़्यादा नहीं। दीदी मुझे देखकर मुस्कुरा रही थीं और खा रही थीं। वैसे दीदी बहुत प्यारी लग रही थीं। मेरा मन दीदी को फिर से गले लगाने का हो रहा था।
हमने खाना खाया और थोड़ी देर बैठकर बातें कीं फिर गुड नाइट बोलकर अपने-अपने कमरों में जाने लगे। लेकिन जीजू ने रोक लिया।
जीजू: अरे ऐसे कोई गुड नाइट बोलता है। एक-दूसरे से गले मिलो और अच्छे से गुड नाइट बोलो।
इस बार दीदी ने कुछ नहीं कहा और मेरी ओर आने लगीं। मैं भी थोड़ा नशे में था। दीदी के पास आते ही मैंने दीदी को बाँहों में भर लिया। दीदी ने भी मुझे गले लगा लिया। फिर से दीदी के कठोर स्तन मुझे महसूस होने लगे। थोड़ी देर बाद दीदी ने गुड नाइट कहा और मैंने भी, और हमने एक-दूसरे को छोड़ा। हम अपने-अपने कमरों में चले गए। कमरे में आते ही मैं ईयरफ़ोन लगाकर दीदी और जीजू की बातें सुनने लगा।
जीजू: अरे क्या कर रही हो। आओ ना।
दीदी: पहले ये सलवार-कुर्ता निकाल दूँ।
जीजू: मैं निकाल दूँगा।
दीदी: नहीं, मैं अभी निकाल देती हूँ। बहुत अनकंफ़र्टेबल लग रहा है।
थोड़ी देर बाद दीदी फिर से: हाँ अब ठीक लग रहा है। पता नहीं रोज़-रोज़ मैं कैसे पहनूँगी।
जीजू: फ़िकर मत करो, कल से पहनने की ज़रूरत नहीं।
दीदी: क्यों? हर्ष का क्या?
जीजू: मेरी हर्ष से बात हो गई है। उसने कहा कि दीदी कुछ भी पहनें मैं जज नहीं करूँगा।
दीदी: क्या, हर्ष ने ऐसा कहा? मैं नहीं मानती। मतलब मैं कुछ भी पहनूँगी तो उसे चलेगा। मेरा भाई मेरी कितनी रिस्पेक्ट करता है, वो ऐसा कह ही नहीं सकता।
जीजू: तुम्हारी कसम जानू।
(दीदी इमोशनल हो गईं)
दीदी: अरे इतनी-सी बात में तुमने कसम खाई, मुझे तुमपे पूरा यकीन है। मैं जानती हूँ तुम मुझसे कितना प्यार करते हो। मैंने तो ऐसे ही बोल दिया।
(सच तो था कि मैंने ऐसा कहा था लेकिन मैंने जिस तरह से कहा था और दीदी जिस तरह समझ रही थीं वो अलग था। मेरा मतलब था दीदी सलवार-कुर्ते के अलावा और कुछ भी पहन सकती हैं और दीदी समझ रही थीं कि कुछ भी मतलब कुछ भी पहनना। वैसे जीजू ने कसम झूठी नहीं खाई थी।)
दीदी: लेकिन कुछ भी मतलब क्या पहनूँ? मेरे पास जो है उसे तो बिल्कुल नहीं पहन सकती।
जीजू: क्यों?
दीदी: अरे वो कपड़े कैसे हैं तुम्हें पता है ना। नीचे बस मेरी गाँड़ कवर होगी बाकी सब खुला रहेगा और चलते-फिरते मेरी चड्डी दिखाई देगी। ऊपर भी आधे से ज़्यादा बूब्स बाहर रहते हैं।
जीजू: तो फिर ऐसा करते हैं, हर्ष को कहीं आसपास एक कमरा किराए पर ले देते हैं।
दीदी (गुस्से होकर): देखो आज तुमने कहा सो कहा, आज के बाद कभी ऐसी बात मत करना। चाहे कुछ भी हो, मेरा भाई मेरे साथ ही रहेगा। मैं इस अनजान शहर में उसे मुझसे जुदा नहीं रखूँगी। और मैं कितनी खुश हूँ कि मेरे भाई के साथ रहने का मुझे मौका मिला है, वो भी शादी के बाद। और तुम उसे मुझसे दूर करने की बात कर रहे हो।
जीजू (हँसते हुए): अरे मैं तो मज़ाक कर रहा था। मेरी हर्ष से बात हुई है। कल हम तीनों तुम्हारे लिए कपड़े लेने जाएँगे और तुम्हारा भाई खुद तुम्हारे लिए कपड़े पसंद करेगा। फिर तो कोई दिक्कत नहीं है ना। वो तो तुम भाई के सामने पहन सकती हो क्योंकि उसकी पसंद के ही कपड़े होंगे तो तुम्हें शर्म भी नहीं आएगी।
दीदी: हाँ ये ठीक है। लेकिन उसे मेरे कपड़ों की समझ नहीं होगी।
जीजू: फ़िकर मत करो, उसे सब समझ आती होगी और हम भी तो साथ होंगे। चलो अब आ भी जाओ।
फिर किसिंग की आवाज़ आने लगी। शायद अब उनकी चुदाई शुरू होने वाली थी। वैसे तो अब मुझे नहीं सुनना चाहिए था लेकिन मैं सुनता रहा। दीदी आह… ओह… धीरे… जानू… धीरे… करती रहीं। दीदी की आवाज़ें सुनकर मेरा लंड खड़ा हो गया। मैंने लंड शॉर्ट और जांघिए से बाहर निकाला और सहलाने लगा। दीदी की कामुक आवाज़ें सुनकर लंड सहलाना बहुत अच्छा लग रहा था। दीदी की आवाज़ पतली थी और दीदी की सिसकारियाँ बहुत मादक लग रही थीं। वैसे दीदी को लेकर मेरे मन में कोई गलत विचार नहीं था। मैं बस दीदी की सिसकारियाँ सुनके लंड हिला रहा था। दीदी भी चाटो जानू… अंदर जीभ डालके चाटो… आह… ओह… ऐसा कर रही थीं। शायद जीजू दीदी की चूत चाट रहे थे। थोड़ी देर बाद थप… थप… की आवाज़ें आने लगीं। शायद जीजू दीदी को चोद रहे थे। मेरा लंड पूरा तन गया था।
थोड़ी देर बाद दीदी को चोदते हुए जीजू ने कहा:
जीजू: जानू तुम हर्ष की फ़िक्र मत करना। मैं तुम्हें कभी तुम्हारे भाई से जुदा नहीं करूँगा। मैं भी उसे अपना छोटा भाई मानता हूँ।
दीदी: आह… अच्छा… हर्ष तुम्हारा छोटा भाई… तो फिर मैं भी तुम्हारी बड़ी बहन हो गई। आह… क्योंकि तुम मुझसे छोटे हो।
जीजू: हाँ ये तो हुआ।
दीदी: तो क्या तुम अभी अपनी दीदी को चोद रहे हो। बोलना बहन चोद। बोलता क्यों नहीं।
जीजू: हाँ मैं अपनी दीदी को चोद रहा हूँ। तुम मेरी बहन हो और मैं तुम्हारा भाई हूँ और मेरा लंड मेरी बहन की चूत में है। आह… कितना मज़ा आता है बहन को चोदने में।
उनकी बातें सुनकर मेरी हालत खराब हो गई थी। यह जीजू और दीदी क्या बातें कर रहे हैं। जीजू दीदी को अपनी बहन बोल रहे हैं और दीदी जीजू को अपना भाई बोल रही हैं और भाई-बहन बोलकर मज़े से चुदाई कर रहे हैं। वैसे ये बातें सुनकर मेरा पानी निकलने को हो गया था।
दीदी: चोदना भाई अपनी बहन को। देख तुम्हारी बहन कैसे तड़प रही है तुम्हारा लंड लेने के लिए। मज़ा आ रहा है ना अपनी बहन को चोदने में। बोलना बहन चोद, कैसा लग रहा है अपनी बहन को चोदते हुए।
जीजू: हाँ दीदी, बहुत अच्छा लग रहा है अपनी बहन को चोदने में। क्या चूत है तुम्हारी, ऐसा लगता है कि रात-दिन तुम्हें चोदता रहूँ।
दीदी: हाँ भाई, चोद अपनी बहन को। तुम्हारी बहन बहुत चुदक्कड़ है। उसे हर वक्त लंड चाहिए। खूब चोद अपनी बहन को और उसकी चूत की खुजली मिटा दे। आह… चोद बहनचोद… और तू नहीं चोद सकता तो किसी और को बुला ले, जो तुम्हारी बहन को तुम्हारे ही सामने चोदे।
जीजू: हाँ दीदी, मैं भी चोदूँगा और किसी बड़े और मोटे लंड वाले से चुदवाऊँगा। जो चोद-चोद कर तुम्हारी चूत फाड़ दे।
दीदी: हाँ भाई, मुझे तुम्हारे सामने चुदवाने में बहुत मज़ा आएगा। खूब चुदवाना अपनी बहन को और तू भी चोदना।
जीजू: हाँ दीदी, खूब चोदूँगा तुम्हें और बड़े-बड़े लंड से चुदवाऊँगा दीदी। खूब चुदवाऊँगा तुम्हें। आह… दीदी मेरा निकलने वाला है। दीदी… मेरा निकलने वाला है।
दीदी: आह… भाई निकाल दे अपना सारा पानी अपनी बहन की चूत के अंदर। भर दे अपने पानी से अपनी बहन की चूत।
फिर जीजू दीदी को बहुत तेज़-तेज़ चोदने लगे। शायद उनका निकलने वाला था। यहाँ मेरे लंड ने पिचकारियाँ छोड़ना शुरू कर दीं और वहाँ जीजू भी ज़ोर से चिल्लाए—आह… दीदी… दीदी मेरा निकल रहा है।
थोड़ी देर बिल्कुल शांति रही। थोड़ी देर बाद जीजू बोले…
जीजू: कैसा लगा जानू?
दीदी: बहुत मज़ा आया।
जीजू: याद है तुम्हें जब हम पहले भाई-बहन वाला रोल प्ले करते थे तब तुम कैसे गुस्से हो जाती थीं।
दीदी: हाँ बाबू, याद है। लेकिन उस वक्त जब तुम मेरी चूत में लंड डालकर मुझे चोदते थे और मुझे दीदी-दीदी बोलते थे तब मेरे सामने मेरे भाई का चेहरा आ जाता था और मुझे लगता था कि मैं अपने सगे भाई से चुदवा रही हूँ और मेरा सगा भाई मुझे चोद रहा है। इसीलिए मैं गुस्सा हो जाती थी। क्योंकि अपने भाई से चुदवाना कैसा अजीब लगता है तुम समझ सकते हो। और मेरा भाई तो मेरे बारे में ऐसा कभी सोच भी नहीं सकता।
लेकिन बाद में मुझे समझ आया कि मुझे तुम्हें ही भाई के रूप में इमेजिन करना है, ना कि अपने सगे भाई को।
(अब मेरे भी समझ में आ गया कि वह दोनों रोल प्ले कर रहे थे। यह भाई-बहन वाला रोल प्ले मैंने सुन रखा था लेकिन आज अपनी सगी बहन को भाई-बहन वाला रोल प्ले करते सुनके थोड़ा अजीब लगा था। लेकिन थोड़ी ही देर में मेरे लंड का पानी निकाल दिया था, वरना इतना जल्दी मेरा पानी नहीं निकलता। अब मुझे नींद आने लगी थी और शायद दीदी और जीजू भी सो गए थे। फिर पता नहीं मैं कब सो गया।)
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**Update 3**
इस अपडेट में दीदी अपनी फीलिंग्स शेयर करेंगी और जीजू भी।
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**दीदी का दृष्टिकोण**
जब मैंने सुना कि मेरा भाई हमारे पास आ रहा है तो मैं बहुत खुश हो गई। लेकिन थोड़ी देर बाद सोच में भी पड़ गई। यहाँ जिस तरह से मैं रहती थी और जैसी मेरी लाइफस्टाइल थी, मेरे भाई ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि घर पर सीधी-सादी रहने वाली उसकी दीदी इतनी बोल्ड और खुलकर लाइफ एंजॉय करने वाली बन जाएगी। वैसे ये सब कुछ मेरे पति की वजह से ही मुमकिन हुआ, वरना मैं ऐसे जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकती थी। शायद किसी के घर चूल्हा-चौका कर रही होती। थैंक्स टू माय डियर पति।
जब मैंने मेरे भाई को गले लगाया तब मुझे इतनी खुशी हुई कि मैं बता नहीं सकती। सोचने लगी कि क्यों आज तक मैं भाई से गले नहीं मिली। उस वक्त मेरी कठोर चुचियाँ मेरे भाई की छाती से पूरी तरह दब गई थीं, लेकिन मैं उस वक्त कुछ सोच नहीं रही थी। भाई से गले मिलने में इतना आनंद आएगा, यह मुझे पहली बार पता चला। मेरा प्यारा भाई, मेरा छोटा बच्चा, मेरी बाहों में था।
हालाँकि मेरे पति ने मुझे समझाया कि अब वो इतना भी छोटा नहीं रहा जितना मैं उसे समझती हूँ। मेरा दिल मेरे भाई को चूमने को हो रहा था, लेकिन शर्म के मारे मैं ऐसा नहीं कर पाई। हमारा रिश्ता ही कुछ ऐसा था। मम्मी-पापा के घर हम बहुत ही मर्यादा में पले-बढ़े थे।
और सुबह जब मैं भाई से गुड मॉर्निंग करते हुए गले मिली, उस वक्त मैंने ब्रा भी नहीं पहनी थी। हालाँकि मुझे ब्रा पहनने की जरूरत भी नहीं थी। दो साल से मैं अपने स्तनों को खास तेल से मालिश करती थी, जिसकी वजह से मेरे दोनों स्तन बहुत ही कड़क थे। कभी-कभी लगता था कि मेरी ब्रा मेरे दोनों स्तनों को सपोर्ट नहीं कर रही, बल्कि मेरे दोनों स्तन मेरी ब्रा को सपोर्ट कर रहे हैं।
जब मुझे पता चला कि मेरा भाई भी शराब पीता है तब मैं सच में सोच में पड़ गई। कितना गलत सोचती थी मैं अपने भाई के बारे में। लेकिन मुझे अपनी सोच बदलनी होगी। मेरा भाई अब वो छोटा बच्चा नहीं रहा। वो भी शराब पीता है और शायद दूसरी लड़कियों के पीछे घूमता भी होगा और वह सब करता होगा जो उसकी उम्र के लड़के करते हैं। शायद उसने किसी लड़की को पटाकर चोदा भी होगा या फिर पॉर्न देखकर मुठ मारता होगा। वह मेरा भाई है, इसका मतलब यह नहीं कि वह हमेशा छोटा बच्चा ही रहेगा।
रात को शराब पीकर नीचे आया तो मैं उसको देखकर मुस्कुरा रही थी और वह भी मुझे देखकर मुस्कुरा रहा था, लेकिन वह थोड़ा शर्मा रहा था। अब मुझे उसका शराब पीना बिल्कुल बुरा नहीं लग रहा था। मुझे लग रहा था कि उसे भी अपनी जिंदगी खुलकर जीने का पूरा अधिकार है। और बड़ी बहन होने के नाते ये देखना मेरा फर्ज है कि मेरा छोटा भाई भी खुलकर अपनी जिंदगी में मज़ा करे और खुलकर अपनी लाइफ एंजॉय करे। मैंने तय कर लिया था कि अब मैं मेरे और अपने भाई के बीच की दूरियाँ खत्म करूँगी, ताकि वह खुलकर मुझे अपनी चाहतें बता सके और मैं उसे पूरा करने में उसकी मदद कर सकूँ।
वह मुझे 7 साल छोटा है, इसलिए वो तो शर्माएगा, लेकिन मुझे ही अपनी शर्म छोड़नी होगी। लेकिन क्या करूँ, मेरे सगे भाई के सामने मुझे भी शर्म आती है।
आज पूरा दिन मैं अपने भाई के बारे में ही सोचती रही। रात को जब मैं मेरे पति से चुदवा रही थी तब रोल प्ले करते वक्त (आप तो जानते ही हैं कि हम भाई-बहन वाला रोल प्ले कर रहे थे) उस वक्त एक पल के लिए मेरे भाई का चेहरा मेरे सामने आ गया। शायद मैं पूरा दिन अपने भाई के बारे में सोच रही थी, उसी का यह असर था। और अंदर ही अंदर मुझे बहुत शर्म आ गई। कैसे मैं चुदवाते वक्त अपने सगे भाई के बारे में सोच सकती हूँ। कितनी बुरी हूँ मैं। मुझे हमारे बीच की दूरियाँ खत्म करनी थीं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मैं कुछ भी सोचने लगूँ।
और फिर जब सुबह गुड मॉर्निंग करते वक्त मैं मेरे भाई के गले लगी, तब मुझे कुछ मोटा सा महसूस हुआ। पहले तो मैं समझ ही नहीं पाई कि क्या है, लेकिन जब समझ में आया तो समझ ही नहीं आया कि क्या करूँ। भाई को तो इस बात का एहसास ही नहीं था। मेरे भाई ने नाइट पेंट पहनी थी और शायद मॉर्निंग इरेक्शन था। लेकिन अगर मॉर्निंग इरेक्शन होता तो खड़ा होता, यह तो लटका हुआ था। फिर भी कितना मोटा था। किसी का इतना मोटा कैसे हो सकता है। कितना मोटा है और वह भी मेरे सगे भाई का। लेकिन मुझे अपने इन विचारों पर शर्म आने लगी। यह मैं क्या सोच रही थी अपने भाई के बारे में। मुझे ऐसा नहीं सोचना चाहिए। वह मेरा सगा छोटा भाई था, मेरा बच्चा। और मोटा हो या कुछ भी हो, वह मेरे भाई के शरीर का एक अंग था जैसे सबका होता है। मुझे उसके बारे में ऐसे नहीं सोचना चाहिए।
कल वो मेरे लिए कपड़े पसंद करेगा। पता नहीं कैसे कपड़े पसंद करेगा। लेकिन वो जो भी पसंद करेगा, मैं पहनूँगी। वैसे मेरा भाई मेरे लिए ज्यादा छोटे कपड़े तो पसंद नहीं करेगा, उतना यकीन है मुझे। पहली बार मैं मेरे भाई की पसंद के कपड़े पहनने वाली थी। पता नहीं क्यों, लेकिन बहुत अच्छा लग रहा था।
एक भाई और बहन का रिश्ता कैसा बना दिया है। एक दूसरे पर सबसे ज्यादा भरोसा करने वाले खुलकर बात भी नहीं कर सकते। ना खुलकर गले मिल सकते हैं, ना एक दूसरे को खुलकर चूम सकते हैं। अपने अंगों को भाई की नज़र से बचाना होता है, जैसे कि अगर भाई देख लेगा तो उन्हें मसलने लगेगा। क्या ही हो जाएगा अगर भाई हमारे शरीर को देख लेगा। आखिर अपने ही भाई से इतना पर्दा क्यों करना है।
खैर, कल जाना है मेरे कपड़े लेने मेरे भाई और पति के साथ। मेरे पति कितने समझदार हैं। मैं कितनी खुशनसीब हूँ जो ऐसे पति मिले हैं।
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**जीजू (राहुल) का पॉइंट ऑफ व्यू**
मेरा साला घर आया है। लेकिन ये कैसे भाई-बहन हैं जो खुलकर गले भी नहीं मिलते। अगर ऐसा ही चलता रहा तो हमारी लाइफ फिर से उसी मुकाम पर आ जाएगी जैसे दो साल पहले थी। इन दो सालों में मैंने कितनी मेहनत से मेरी पत्नी को बदला था और आज हम पूरी तरह एंजॉय कर रहे थे। मुझे इन दोनों भाई-बहन को करीब लाना होगा, ताकि इनकी शर्म खत्म हो और दोनों अपनी लाइफ खुलकर एंजॉय कर सकें और मैं भी खुलकर एंजॉय कर सकूँ। वरना मेरी लाइफ झंड होने से कोई नहीं बचा सकता।
मेरा मानना है कि भाई-बहन को एक दूसरे के साथ खुलकर रहना चाहिए, ताकि अगर जीवन में कोई भी मुश्किल आए तो आप बिना किसी शर्म के अपने भाई या बहन के साथ शेयर कर सकें। आखिर भाई-बहन ही होते हैं जो कभी एक दूसरे का बुरा नहीं चाहते और सोचते हैं कि वो हमेशा खुश रहें।
यहाँ प्यार तो बहुत था, लेकिन शर्म की मोटी दीवार थी जिसे मुझे गिराना है। पीनल अभी भी अंदर से शरमाती है, लेकिन उसकी चूत जब गीली होती है तो वो कुछ भी मान जाती है। हर्ष को धीरे-धीरे इसकी आदत डालनी होगी। देखते हैं कब इन दोनों की शर्म टूटती है… और कब मैं सच में खुलकर मज़े ले पाता हूँ।
** हर्ष (भाई) का पॉइंट ऑफ व्यू**
आज हम दीदी के लिए कपड़े लेने जाने वाले थे। जैसे ही हम निकलने वाले थे कि जीजू ने कहा कि उन्हें कुछ काम है और वो नहीं आ सकते, आप दोनों चले जाओ। मैंने कहा बाद में जाएँगे, लेकिन दीदी ने कहा,
“कोई बात नहीं, हम दोनों चले जाएँगे।”
और मैं और दीदी आ गए।
दीदी को जीजू के सामने मेरे साथ ओपन होने में शर्म आती थी और जीजू भी समझते थे, इसलिए वो बहाना बनाकर नहीं आए।
हम दुकान में आ गए। दुकान वाला दीदी को पहचानता था। वो कुछ बोले इससे पहले दीदी ने मेरा परिचय करवाया,
“ये मेरा छोटा भाई है और हमें कुछ कपड़े चाहिए।”
दुकानदार बोला,
“अच्छा, आज भाई-बहन आए हैं। बहुत अच्छा। किस टाइप के चाहिए?”
दीदी ने कहा,
“मेरा भाई बताएगा।”
मैंने कहा,
“बस घर में कंफर्टेबल रहे।”
दुकानदार ने एक लड़की से कहा,
“रीना, इन्हें ऊपर ले जाओ और दिखा दो।”
दुकानदार ने सिर्फ “दिखा दो” कहा, लेकिन कपड़े नहीं बोला। लड़की मुस्कुराई और हमें लेकर ऊपर के फ्लोर पर आ गई।
रीना: “अच्छा, किस टाइप के चाहिए?”
मैं: “मुझे ज्यादा नहीं पता, लेकिन भाई के सामने बहन पहन सके ऐसे कपड़े चाहिए और कंफर्टेबल भी होने चाहिए।”
रीना: “लेकिन आजकल तो बहनें भाई के सामने कुछ भी पहन लेती हैं, सिवाय के भाई-बहन बहुत ही पुराने ख्यालात के हों। मैं खुद अपने भाई के सामने शॉर्ट्स पहन के घूमती हूँ और मेरी पूरी जाँघें खुली होती हैं और शॉर्ट्स भी पूरी स्किन-टाइट होती है, लेकिन हम भाई-बहन इतने खुले हैं कि मेरे भाई को ज्यादा फर्क नहीं पड़ता।”
दीदी मेरी ओर देखकर मुस्कुरा रही थीं।
मैंने कहा,
“नहीं-नहीं, हमें घुटनों तक की कोई अच्छी सी ड्रेस या फ्रॉक दिखाएँ।”
रीना हमें फ्रॉक दिखाने लगी। कुछ-कुछ फ्रॉक का कपड़ा तो इतना पतला था कि अंदर का सब कुछ नज़र आ जाता और मैं सोचने लगा कि दीदी इन कपड़ों में कैसी लगेंगी।
मैंने कुछ फ्रॉक पसंद कीं और फिर दीदी मुझे ट्रायल रूम की ओर ले गईं। दीदी ने पहली फ्रॉक पहनी और बाहर आईं और मुझे पूछने लगीं कि कैसी लग रही है। दीदी मेरे सामने देख रही थीं और मैं दीदी को देखने के लिए कि कहाँ देखना है, यह सोच रहा था। दीदी मेरे सामने पास में खड़ी थीं, इसलिए नीचे तो मैं नहीं देख सकता था, लेकिन मैं दीदी के स्तनों को देखने लगा। दीदी ने मुझे अपने स्तनों को देखते हुए देखा। दीदी के बड़े-बड़े स्तन बहुत ही गज़ब लग रहे थे।
मैंने कहा,
“दीदी, बहुत मस्त लग रही है यह फ्रॉक।”
फ्रॉक का कपड़ा ना ज्यादा मोटा था, ना ज्यादा पतला। फिर दीदी ने दूसरी, तीसरी और चौथी फ्रॉक ट्राई की। हर बार मैं दीदी के स्तनों को देखता और दीदी मेरी ओर देखतीं। फिर हमने उनमें से दो फ्रॉक पसंद कीं और लेकर घर आ गए।
दीदी फ्रॉक लेकर अपने कमरे में चली गईं और तुरंत ही पहनकर बाहर आईं।
मैंने पहली बार दीदी की टाँगों को नंगा देखा था। क्या गोरी-गोरी और भरी-भरी टाँगें थीं। मेरी नज़र तो दीदी की टाँगों पर से हट ही नहीं रही थी और दीदी ने भी यह देख लिया और शर्माने लगीं। दीदी की टाँगों को देखकर मेरे लंड में हलचल होने लगी थी। मुझे भी लगा कि मुझे ऐसे नहीं देखना चाहिए, वह मेरी सगी बहन है और सगी बहन को ऐसे देखना गलत है, लेकिन मैं अपने आप को रोक नहीं पा रहा था और दीदी भी और असहज महसूस कर रही थीं। लेकिन दीदी की टाँगें थीं ही ऐसी कि कोई भी अपने आप को देखने से रोक न पाए। बहुत ही गोरी-गोरी और मुलायम टाँगें थीं और एकदम भरी-भरी थीं। पूरा दिन मैं दीदी की टाँगों को देखता रहा। जब दीदी बैठतीं तो घुटनों से थोड़ा ऊपर भी मुझे दिख जाता था।
रात को दीदी ने जीजू को भी बताया कि मेरा भाई पूरा दिन मेरी टाँगें देख रहा था और मुझे बहुत शर्म आ रही थी। जीजू ने दीदी को बताया,
“ऐसा होना स्वाभाविक है। तुम्हारे भाई ने इतनी खूबसूरत टाँगें इतने करीब से पहली बार देखी हैं तो उसका देखना स्वाभाविक है, लेकिन धीरे-धीरे ठीक हो जाएगा। तुम एक काम करो, तुम अपने भाई को कहो कि तुम्हारे पैर दर्द कर रहे हैं और वह तुम्हारी टाँगें दबा दे। अगर दो-तीन दिन तक वह तुम्हारी टाँगें दबाएगा तो फिर उसका आकर्षण शायद कम हो जाए। क्योंकि जो चीज़ हमें नहीं मिलती वह हमें ज्यादा आकर्षित करती है, लेकिन अगर मिल जाए तो उसका आकर्षण कम हो जाता है।”
दीदी ने कहा,
“लेकिन मैं उसे कैसे बताऊँ, मुझे बहुत शर्म आती है।”
जीजू ने कहा,
“यह तो तुम्हें ही करना होगा।”
फिर दीदी ने कुछ नहीं कहा।
फिर दीदी और जीजू दोनों भाई-बहन वाला रोल प्ले करते हुए चुदाई करने लगे और मैं उनकी बातें सुनते हुए मुठ मारने लगा। भाई-बहन वाला रोल प्ले मुझे बहुत अच्छा लगा और शायद दीदी और जीजू को भी अच्छा लग रहा था।
सुबह को भी दीदी गुड मॉर्निंग करते हुए मुझे गले मिलीं और दीदी के दोनों स्तन मेरी छाती से लग गए। आज शायद दीदी ने ब्रा नहीं पहनी थी और दीदी के स्तन मुझे अच्छे से महसूस हो रहे थे।
फिर दोपहर को मेरे व्हाट्सएप पर दीदी का मैसेज आया कि उनके पैर दर्द कर रहे हैं, क्या मैं उनके पैर दबा सकता हूँ।
मैंने भी रिप्लाई दिया,
“अभी आया दीदी।”
जब मैं दीदी के कमरे में पहुँचा तो दीदी उल्टी लेटी हुई थीं, शायद उनको शर्म आ रही थी। दीदी को पता चल गया था कि मैं कमरे में आ गया हूँ, लेकिन दीदी कुछ नहीं बोलीं और ऐसे ही लेटी रहीं। मैं दीदी के पाँव के पास बैठ गया और दीदी की सुंदर टाँगों को देखने लगा और मेरे लंड में फिर से हलचल होने लगी।
मुझे कुछ न करता देखकर दीदी ने बिना सर घुमाए कहा,
“क्या कर रहे हो, दबाओ ना।”
दीदी की आवाज़ सुनकर मैं होश में आया और अपने हाथ दीदी की भारी-भारी टाँगों पर रख दिए और हल्के-हल्के दबाने लगा। थोड़ी देर बाद दीदी ने कहा,
“ऐसे नहीं, थोड़ा जोर से दबाओ।”
फिर मैं अच्छे से दीदी की टाँगों को मसलने लगा। दीदी हल्की-हल्की सिसकारियाँ ले रही थीं, शायद उन्हें अच्छा लग रहा था।
थोड़ी देर में मेरा लंड पूरा खड़ा हो गया था। अगर दीदी मेरी ओर देखतीं तो उन्हें नज़र आ जाता। फिर मैंने कहा,
“ठीक है दीदी, मैं चलता हूँ।”
और जैसे ही मैं खड़ा हुआ, दीदी ने अपना चेहरा मेरी ओर किया और मेरे लंड का पूरा उभार दीदी को नज़र आ गया। दीदी ने शर्माकर फिर से अपना चेहरा घुमा लिया।
मैं भागकर अपने रूम में आ गया और जल्दी से अपने कपड़े उतारे और नंगा होकर दीदी की भरावदार टाँगों को सोचते हुए मुठ मारने लगा। थोड़ी देर में मेरा पानी निकल गया, लेकिन फिर मैं सोचने लगा कि क्या अपनी ही सगी बहन की टाँगों को सोचते हुए मुठ मारना सही है क्या।
फिर तो यह चलता रहा। हर रोज़ दोपहर को दीदी मुझे मैसेज करतीं और मैं दीदी के रूम में जाता। दीदी वैसे ही उल्टी लेटी रहतीं और मैं दीदी की दोनों मुलायम और मखमली टाँगों को मसलता। फिर अपने रूम में आकर पूरा नंगा होकर दीदी की टाँगों को सोचते हुए मुठ मारता। लेकिन अब दीदी भी थोड़ा-थोड़ा मेरी ओर देखतीं और कभी-कभी मेरे लंड की तरफ देखतीं और शर्माकर मुँह फेर लेतीं।
दीदी की टाँगों को देखकर मेरे लंड का खड़ा होना मुझे बेचैन कर रहा था और मैं सोचता था कि यह गलत है या सही है, लेकिन आखिर बात किससे करूँ।
आखिरकार एक रात को जब मैं जीजू के साथ बैठकर दारू पी रहा था तब मैंने जीजू से पूछा कि एक भाई का अपनी बहन को देखकर उत्तेजित होना क्या सही है।
जीजू मेरी बात समझ गए और मुझे समझाने लगे,
“देखो हर्ष, ये रिश्ते-नाते सब 10,000 साल से ज्यादा पुराने नहीं हैं, लेकिन हम इंसान और यह पूरी दुनिया लाखों साल पुरानी है। जब हमारी समझ विकसित हुई तो हमने रिश्तों को बनाया और उनकी कुछ मर्यादाएँ बनाईं, लेकिन हमारे अंदर आज भी वह लाखों साल पुराना इंसान रहता है। आज भी मनुष्य के अलावा किसी भी प्राणियों में रिश्तों की ऐसी मर्यादाएँ नहीं हैं। यानी कि ये सारे रिश्ते मनुष्य के दिमाग की उपज हैं। आज भी सारे प्राणी अपने परिवार के साथ पूरे नंगे घूमते हैं और एक दूसरे को देखकर कामातुर भी होते हैं। प्राणियों में भाई-बहन के बीच सेक्स होना बिल्कुल आम बात है, यहाँ तक कि माँ और बेटे में भी कोई मर्यादा नहीं होती। यह बिल्कुल कुदरती है और मनुष्य भी कुदरत से ऊपर नहीं जा सकता, चाहे वह अपनी समझ से कितने ही प्रयत्न कर ले। अगर यह कुदरती नहीं होता तो बहन के शरीर को देखकर उत्तेजना ही नहीं होती। शरीर एक शरीर ही होता है, वह बहन का शरीर या किसी और का शरीर नहीं होता। अगर हम किसी के भी सुंदर शरीर को देखते हैं तो हमें उत्तेजना होना स्वाभाविक है। कई घरों में तो भाई-बहन आपस में सब कुछ करते हैं, लेकिन समाज की मर्यादा बनाए रखने के लिए छुपाकर रखते हैं। अगर गलत होता तो वे आपस में कुछ कर ही न पाते, लेकिन वे सब कुछ कर रहे हैं और पूरा इंजॉय कर रहे हैं, इसका मतलब कि यह होना स्वाभाविक है।”
मैं जीजू की बातों से पूरा संतुष्ट हो गया और मुझे भी लगने लगा कि दीदी की टाँगों को देखकर मेरे लंड का खड़ा होना कुदरती है और इसमें कुछ गलत नहीं।
अब मैं अच्छे से दीदी की टाँगों को मसलता और जब मेरा लंड खड़ा होता तो अपने कमरे में जाकर दीदी की टाँगों को सोचते हुए अच्छे से मुठ मारता।
धीरे-धीरे मैं और दीदी नॉर्मल होने लगे। अब मैं दीदी की टाँगों को पहले के जैसा नहीं घूरता था और दीदी को भी शर्म नहीं आती थी। रात को मैने एप के जरिए इयरफोन से सुना, दीदी ने जीजू को बताया कि दो-तीन दिन से हर्ष मेरी टाँगों को दबाता है और अब वह पहले के जैसे मेरी टाँगों को नहीं घूरता। जीजू ने भी कहा,
“मैं तो पहले ही बता रहा था कि जो चीज़ हमें मिल जाए उसका आकर्षण कम हो जाता है।”
हालाँकि मैं बहुत दिनों से दीदी की टाँगें दबा रहा था, लेकिन दीदी ने जीजू को सिर्फ दो-तीन दिन ही क्यों कहा, वह मेरी समझ में नहीं आया।
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20-10-2026, 10:13 AM
(This post was last modified: 20-10-2026, 11:22 PM by Rahulraj306. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
**Update 4**
Harsh continue........
अब हम भाई-बहन खुलकर, बिना किसी शर्म के एक दूसरे के गले मिलते थे। वह भी दोनों टाइम – सुबह को गुड मॉर्निंग करते वक्त और रात को गुड नाइट करते वक्त। दीदी अंदर ब्रा नहीं पहनती थीं तो उनके दोनों स्तन मुझे अच्छे से महसूस होते थे। दोपहर को जीजू के ऑफिस जाने के बाद मैं अच्छे से दीदी की दोनों टाँगें दबाता था और महसूस करता था। कभी-कभी फ्रॉक थोड़ा ऊपर चला जाता था तो उनकी जाँघें भी मुझे दिखाई देती थीं और उस वक्त मेरा लंड पूरा खड़ा हो जाता था।
एक रात को दीदी और जीजू दोनों बातें कर रहे थे और मैं अपने कमरे से ईयरफोन लगाकर सुन रहा था। मेरा ऐप बढ़िया काम कर रहा था।
दीदी ने कहा,
“सुनो ना, मुझे स्लीवलेस फ्रॉक चाहिए। इसमें बहुत परेशानी होती है।”
जीजू ने कहा,
“मेरे पास अभी वक्त नहीं है। ऐसा करो, तुम हर्ष को लेकर चली जाओ।”
दीदी के मन में भी यही था कि जीजू साथ न आए तो ही अच्छा है और जीजू भी यह बात समझते थे कि उनकी हाज़िरी में मैं और दीदी एक दूसरे से खुल नहीं पाएँगे।
फिर दीदी ने कहा,
“लेकिन हर्ष के सामने मुझे बहुत शर्म आएगी ऐसी ड्रेस पहनने में। क्या करूँ?”
जीजू ने कहा,
“कोई चिंता मत करो। थोड़े दिनों में तुम दोनों कंफर्टेबल हो जाओगे, जैसे अभी तुम इस ड्रेस में कंफर्टेबल हो गई हो और तुम्हारा भाई भी कंफर्टेबल हो गया है।”
वैसे दीदी तो कब से रेडी थीं मेरे सामने ऐसी ड्रेस पहनने के लिए, लेकिन वह जीजू के मुँह से बुलवाना चाहती थीं।
दूसरे दिन सुबह हम तैयार होकर उसी दुकान पर पहुँच गए।
दुकानदार दीदी को देखकर खुश हो गया। उसने दीदी से कहा,
“आइए बहन जी, मुझे पता था आप थोड़े ही दिनों में वापस ज़रूर आएँगी।”
दीदी ने कहा,
“आपको ऐसा क्यों लगा कि हम वापस आएँगे?”
दुकानदार ने कहा,
“जितना मैं आपको जानता हूँ और जैसी ड्रेस आप लेकर गई थीं, मुझे पता था कि आपको कंफर्टेबल नहीं होगा। सच है ना?”
दीदी ने कहा,
“हाँ, कुछ-कुछ ऐसा ही है।”
दुकानदार ने रीना को बुलाया और हम रीना के साथ ऊपर के फ्लोर पर चले गए।
रास्ते में दीदी ने मुझे बता दिया था कि उन्हें स्लीवलेस ड्रेस चाहिए।
मैंने रीना से कहा,
“दीदी के लिए स्लीवलेस फ्रॉक दिखाओ।”
रीना स्लीवलेस फ्रॉक दिखाने लगी। स्लीवलेस फ्रॉक सही मायनों में स्लीवलेस थे। उनमें कंधों पर पट्टियाँ थीं और गला भी खुला-खुला सा था, लेकिन सबसे बड़ी बात वह सिर्फ आधी जाँघों तक की लंबाई के थे।
दीदी ने पूछा,
“और कोई हो तो दिखाओ। यह तो बहुत छोटे हैं।”
रीना ने कहा,
“अरे दीदी, स्लीवलेस में तो यही चलते हैं। घर के अंदर पहनने के लिए सबसे अच्छे हैं।”
दीदी को डर था कि अगर यह थोड़ा ऊपर हो जाएँगे तो दीदी की चड्डी दिखने लगेगी। लेकिन रीना दीदी का डर समझ गई और कहा,
“दीदी, इसके नीचे शॉर्ट्स पहनते हैं। मैं भी घर पर यही पहनती हूँ। आपका तो भाई के साथ रूम शेयर करना नहीं होता होगा, आपका अलग रूम होगा, लेकिन मेरे यहाँ तो मैं और मेरा भाई एक ही रूम शेयर करते हैं, फिर भी हम दोनों बहुत कंफर्टेबल हैं।”
दीदी ने कहा,
“अगर शॉर्ट्स भी पहनेंगे तो नीचे बहुत टाइट हो जाएगा।”
और ऐसा बोलकर दीदी शर्मा गईं।
रीना समझ गई कि दीदी चड्डी के ऊपर शॉर्ट्स पहनना समझ रही हैं। रीना ने दीदी को बताया,
“दीदी, इसके अंदर चड्डी नहीं पहनते, सिर्फ शॉर्ट्स ही पहनते हैं।”
मैं भी पास में खड़ा यह सुन रहा था। मैंने दीदी की ओर देखा तो दीदी ने शर्माकर अपनी नज़रें नीचे कर लीं।
रीना बताए जा रही थी कि शॉर्ट्स भी ज्यादा बड़े नहीं होते, चड्डी से बस थोड़े बड़े होते हैं और कपड़ा भी पतला होता है और एकदम स्किन-टाइट होता है।
दीदी शर्मा रही थीं और “नहीं-नहीं” बोल रही थीं।
आखिर मैंने भी कहा,
“ले लो ना दीदी, आप पर यह बहुत अच्छा लगेगा।”
रीना भी बोली,
“हाँ दीदी, ले लीजिए। अब तो आपका भाई भी बोल रहा है। आखिर भाई से इतना क्यों शर्माना। आखिरकार भैया और सैया में एक अक्षर का ही फर्क होता है। कोई बहन अपने भाई से इतना भी शर्माती है? हम भाई-बहन तो कई बार एक ही बेड पर सो जाते हैं।”
दीदी ने पूछा,
“तुम्हारे भाई की उम्र क्या होगी?”
रीना ने बताया,
“मुझसे 2 साल छोटा है।”
आखिरकार दीदी मान गईं, लेकिन वह बहुत शर्मा रही थीं।
दीदी ने मुझसे कहा,
“तुम्हें जो पसंद हो वह ले लो।”
मैंने कहा,
“लेकिन दीदी, पहले ट्रायल कर लेते हैं।”
लेकिन दीदी ने मना कर दिया,
“नहीं, ट्रायल नहीं करनी है। घर जाकर पहन लूँगी, इसमें साइज़ का प्रॉब्लम नहीं होता। तुम बस पसंद कर लो।”
मेरा बहुत मन था अभी दीदी को इन कपड़ों में देखने का, लेकिन दीदी नहीं मानीं।
मैंने दीदी से कहा,
“आप नीचे जाकर बैठो, मैं पसंद करके ले आता हूँ।”
दीदी ने कहा,
“और शॉर्ट्स भी लेने होंगे।”
मैंने कहा,
“वह भी मैं पसंद करके ले आऊँगा। आप चिंता न करें।”
दीदी ने मुस्कुराकर मेरी तरफ देखा और नीचे चली गईं।
दीदी के जाने के बाद रीना मुझे और ऐसे ही कपड़े दिखाने लगी।
वैसे रीना का फिगर भी बहुत मस्त था। रीना ने घुटनों तक की स्कर्ट पहनी थी और ऊपर एक टॉप पहना था। टॉप थोड़ा छोटा था और टॉप के बार-बार ऊपर होने से नीचे से रीना की सेक्सी नाभि दिख रही थी। रीना का बदन भी भरा-भरा था और बूब्स भी भरावदार थे।
मैंने रीना से कहा,
“आपकी अपने भाई से बहुत बनती है। काफी क्लोज़ हैं आप दोनों।”
रीना ने कहा,
“हाँ, भाई-बहन को क्लोज़ ही होना चाहिए। सारी दुनिया हमें धोखा दे सकती है, लेकिन दिल से प्यार करने वाले भाई-बहन कभी एक दूसरे को धोखा नहीं देंगे। हर अच्छे-बुरे वक्त में साथ देते हैं। मुझे तो बॉयफ्रेंड के बिना चल जाएगा, लेकिन मेरे भाई के बिना एक दिन भी न चले।”
मैंने कहा,
“अच्छा, आपके बॉयफ्रेंड के बारे में आपके भाई को पता है?”
रीना ने कहा,
“हाँ-हाँ, क्यों नहीं। बल्कि जब भी मैं मेरे बॉयफ्रेंड से मिलने जाती हूँ तो भाई को साथ लेकर जाती हूँ।”
मैंने कहा,
“आपके भाई को कोई आपत्ति नहीं आपके लवर से?”
रीना ने कहा,
“अरे नहीं, उल्टा वो तो मुझे पूरा सपोर्ट करता है। वो मेरा सच्चा भाई है। मेरी खुशी में ही उसकी खुशी है।”
मैंने पूछा,
“अच्छा, आपको अपने भाई के सामने लवर से मिलने में संकोच नहीं होता? आप कैसे खुलके मिल पाती होंगी?”
रीना को भी समझ आ गया था कि मैं भी अपनी बहन से खुलना चाहता हूँ, इसलिए खुलकर बताने लगी,
“पहले बहुत शर्म आती थी, लेकिन अब तो हम भाई के सामने ही खुलकर एक दूसरे को किस कर लेते हैं और थोड़ी-बहुत ऊपर-ऊपर से मस्ती भी कर लेते हैं।”
मैंने पूछा,
“और कुछ ज्यादा करना हो तो?”
रीना ने कहा,
“मेरा भाई बहुत समझदार है। वो खुद थोड़ी देर के लिए इधर-उधर हो जाता है। पिछले हफ्ते ही हमारे घर पर मैं और भाई अकेले थे। मैं मना कर रही थी, फिर भी भाई ने मेरे लवर को फोन करके बुलाया और हम अंदर के कमरे में 2 घंटे तक थे और मेरा भाई कमरे के बाहर 2 घंटे तक बैठा पहरेदारी करता रहा, ताकि हम आराम से एंजॉय कर सकें।”
ऐसे ही बातें करते-करते मैंने दीदी के लिए फ्रॉक पसंद कर लिए। फिर रीना मुझे मैचिंग शॉर्ट्स दिखाने लगी। शॉर्ट्स बहुत ही मुलायम कपड़े के थे और छोटे-छोटे थे जैसे कि बड़ी साइज़ की चड्डी हो।
रीना ने कहा,
“इसका कपड़ा बहुत ही नरम होता है और नीचे पूरा चिपक जाता है। नीचे का पूरा शेप बहुत बारीकी से दिखाई देता है।”
मुझे रीना की बातों में बहुत मज़ा आ रहा था। रीना को भी ऐसी बातें करने में मज़ा आ रहा था। रीना ने मेरे और दीदी के रिश्तों के बारे में सब कुछ पूछ लिया और मैंने भी बताया। मैंने कहा कि मैं भी दीदी के बहुत करीब होना चाहता हूँ।
रीना ने कहा,
“तुम भी दीदी के बहुत करीब हो जाओगे। बस अपनी दीदी को हर एक चीज़ में सपोर्ट करो। दीदी की हर बात मानो और कुछ भी ऐसा मत करो जिससे दीदी को बुरा लगे। तुम्हारी दीदी हमारे पुरानी कस्टमर हैं और वो अपने सारे कपड़े हमारे यहीं से खरीदती हैं। मैं उन्हें अच्छे से जानती हूँ। मैं तुम्हारी दीदी से बात करूँगी। मेरे पास उनका नंबर है। तुम फिक्र मत करो। वैसे तुम्हें दीदी के बारे में बहुत कुछ नहीं पता।”
मैंने पूछा,
“क्या नहीं पता?”
रीना ने कहा,
“मैं नहीं बताऊँगी। शायद वक्त आने पर तुम्हारी दीदी ही तुम्हें बता देगी या फिर तुम्हें पता चल जाएगा। जल्दबाजी मत करना, तुम्हारा रिश्ता खराब हो सकता है।”
फिर हम कपड़े लेकर नीचे आने लगे। हमने दूर से देखा कि दीदी शॉप के मालिक से हँस-हँसकर बातें कर रही थीं। ऐसा लग रहा था जैसे उनकी बहुत करीबी पहचान हो। रीना ने बताया कि हमारे सर से तुम्हारी दीदी का बहुत करीबी रिश्ता है और रहस्यमय तरीके से मुस्कुरा दिया। मैंने इस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया और हम घर आ गए।
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**Update 5**
हर्ष..............
हम कपड़े लेकर घर तो आ गए, लेकिन घर आकर दीदी ने नए कपड़े नहीं पहने और वही फ्रॉक पहने रहीं जो हमने पहले खरीदा था। मुझे लगा था कि दीदी नए कपड़े ज़रूर ट्राई करेंगी। पता नहीं क्यों अपनी सगी बहन को छोटे कपड़ों में देखने का मन हो रहा था, और बहन जो मुझसे सात साल बड़ी थी।
रात को हम अपने-अपने कमरों में चले गए। मैं अपने ऐप के ज़रिए, जो मैंने दीदी की फोन में इंस्टॉल किया था, दीदी और जीजू की बातें सुनने लगा।
दीदी: “सुनो ना।”
जीजू: “क्या?”
दीदी: “आज हम मेरे लिए नए कपड़े लाए हैं, लेकिन स्लीवलेस के साथ थोड़े छोटे हैं। मुझे बहुत शर्म आएगी छोटे भाई के सामने पहनकर जाने में।”
जीजू: “मतलब पैंटी दिख जाएगी?”
दीदी: “अरे नहीं, उतने छोटे भी नहीं, लेकिन आधी जाँघें दिखाई देंगी।”
जीजू: “तुम तो ऐसे बात कर रही हो जैसे तुमने ऐसे कपड़े कभी पहने ही नहीं।”
दीदी: “पहने तो हैं, लेकिन छोटे भाई के सामने नहीं पहने। वो मुझसे सात साल छोटा है। क्या सोचेगा मेरे बारे में?”
जीजू: “कुछ नहीं सोचेगा। बस इतना सोचेगा कि दीदी मॉडर्न हो गई है। और तुम ही कहती थी कि मेरी टाँगों को देखता रहता है, तो अब जाँघों को देखेगा।”
दीदी: “तुम्हें तो बस मज़ाक सूझता है।”
जीजू: “अरे, इतनी छोटी सी बात को क्यों इतना लंबा करती हो। मैंने तुम्हारे भाई से बहुत बातें की हैं। वो बस तुम्हें खुश देखना चाहता है, चाहे तुम कुछ भी करो।”
दीदी: “हम्म… वो तो हर भाई अपनी बहन को खुश देखना चाहता है।”
जीजू: “लेकिन हर भाई को पता नहीं चलता कि बहन की खुशी किस चीज़ में है। वो बस अपने विचार अपनी बहन पर लादते हैं। ये मत करो, वो मत करो, ऐसे कपड़े मत पहनो, उससे मत मिलो… जबकि तुम्हारा भाई तुम जिसमें खुश हो, उसमें वो भी खुश है। तुम बहुत खुशनसीब हो जो ऐसा भाई मिला है।”
दीदी: “हाँ वो तो है। मेरा भाई मुझसे बहुत प्यार जो करता है।”
जीजू: “इतना प्यार करने वाले भाई से क्यों इतना शर्माना। तुम खुलकर रहो। अच्छा, चलो अब इस भाई के बारे में भी सोचो।”
अब जीजू चुदाई के मूड में थे और रोल प्ले शुरू करना चाहते थे। दीदी भी उनका साथ देने लगीं। लेकिन मैं मूड में नहीं था। मैं दीदी के बारे में सोच रहा था। मेरी दीदी मुझसे कितना प्यार करती है और मुझसे सात साल बड़ी होने के बावजूद मुझसे कितना शर्माती है। मेरे कारण दीदी खुलकर नहीं रह पातीं और मुझे दूर करने के बजाय अपनी इच्छाओं को दबा रही थीं। मुझे भी दीदी के साथ खुलकर रहना होगा तभी दीदी भी खुलकर रह पाएँगी। बस ऐसा सोचते-सोचते मैं सो गया।
दूसरे दिन मैं जैसे ही अपने रूम से निकला तो मैंने देखा कि दीदी अपनी नई फ्रॉक पहनकर बाहर आईं। मुझे देखते ही दीदी मेरे पास आईं और मुझे गले लगा लिया। दीदी के स्तन मेरी छाती से लग गए। मैंने भी दीदी को गले लगाया और हमने एक दूसरे को गुड मॉर्निंग कहा। आज दीदी बहुत खुश लग रही थीं। जब दीदी मुझसे अलग हुईं तो मैंने देखा कि फ्रॉक का गला थोड़ा नीचे था और दीदी के दोनों स्तनों का उभार ऊपर से दिख रहा था। मेरी नज़र दीदी के स्तनों पर ही अटक गई। दीदी ने मुझे देखते हुए देख लिया, लेकिन कुछ कहा नहीं, बस मुस्कुरा दिया।
मैं: “दीदी, आप इस ड्रेस में बहुत सुंदर लग रही हो।”
दीदी: “अच्छा, पहले सुंदर नहीं लगती थी?”
मैं: “अरे नहीं दीदी। आप तो पहले से सुंदर हो। ये ड्रेस आप पर बहुत अच्छी लग रही है।”
दीदी: “अच्छा, तुम्हें पसंद आई ये ड्रेस?”
मैं: “बहुत।”
दीदी: “क्या पसंद आया, ठीक से बताओ ना।”
मैं: “वो… सब कुछ पसंद आया दीदी।”
दीदी: “ऐसे नहीं। ठीक से देखो और बताओ क्या पसंद आया।”
मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या कहूँ और दीदी मेरे मज़े ले रही थीं। मैं दीदी के पूरे बदन को देखने लगा। कितना सेक्सी और हॉट नज़ारा था। दीदी की गोरी-गोरी बाँहें, बड़े-बड़े स्तन, मोटी जाँघें। मैं तो जैसे दीदी के स्तनों और जाँघों में खो सा गया था।
दीदी मेरी ओर देख रही थीं। जब मैंने कुछ नहीं कहा तो दीदी ने कहा,
“तुम बैठो, मैं नाश्ता लेकर आती हूँ।”
तभी मेरा ध्यान दीदी की ओर गया। दीदी मेरी ओर देखकर मुस्कुरा रही थीं और फिर नाश्ता बनाने किचन में जाने लगीं।
मैं पीछे से दीदी की गोल-गोल और मोटी-मोटी जाँघें देखने लगा। दीदी ने जाते-जाते पीछे देखा और मुझे अपनी जाँघों को देखते हुए देख लिया। मेरी नज़रें दीदी से मिलीं और मैं शर्मा गया। दीदी ने कुछ नहीं कहा और किचन में चली गईं। मुझसे रहा नहीं गया और मैं भी दीदी के पीछे किचन में चला गया।
दीदी ने कहा,
“अरे तुम क्यों आए? मैं बनाकर लाती हूँ ना।”
मैंने कहा,
“बस दीदी, ऐसे ही। आपके पास रहने का मन कर रहा था।”
दीदी: “अरे हम पूरा दिन पास ही तो होते हैं। आज बड़ा प्यार आ रहा है दीदी पर।”
मैं: “नहीं दीदी, प्यार तो मैं हमेशा से करता हूँ, कभी दिखाया नहीं।”
दीदी: “अच्छा तो अब दिखाओ।”
मैं: “कैसे दिखाऊँ?”
दीदी: “जैसे तुम्हारा मन करे।”
मैंने दीदी को बाँहों में भर लिया और दीदी के गालों को चूम लिया। पता नहीं मुझे क्या हो गया, वरना आज तक मैंने दीदी को चूमा नहीं था। दीदी ने भी मुस्कुराया और मेरे गाल चूम लिए।
दीदी: “अच्छा, आज के लिए इतना प्यार काफी है। तुम पास में खड़े रहो, मैं नाश्ता बनाती हूँ।”
मैं पास में खड़ा हो गया। मैं बार-बार दीदी के स्तनों को देख रहा था। दीदी के पूर्ण गोलाई लिए स्तन बहुत ही आकर्षक लग रहे थे। कितने गोरे-गोरे और सुंदर थे। तभी एक चम्मच नीचे गिरा और दीदी के पैरों के पास पीछे चला गया। तभी मैंने कहा,
“मैं उठा देता हूँ।”
मैं दीदी के पीछे गया और दीदी के पीछे कुछ ज्यादा ही झुका और चम्मच उठते हुए दीदी की जाँघों को पास से देखा और फ्रॉक के अंदर देखने की कोशिश की। वैसे तो फ्रॉक खुला-खुला सा था नीचे से, लेकिन ज्यादा कुछ दिखा नहीं और मैं ज्यादा देर देख भी नहीं सकता था। मैं चम्मच लेकर खड़ा हुआ और चम्मच दीदी को दिया। दीदी मुस्कुरा रही थीं। कहीं दीदी को पता तो नहीं चल गया कि मैं अंदर देखने की कोशिश कर रहा था।
फिर मैं चलते-फिरते दीदी की जाँघें ही देखता रहता था। दीदी को भी पता चल गया था और दीदी शरमा रही थीं, लेकिन मैं अपने आप को रोक नहीं पा रहा था। ऐसी गोरी-गोरी और भरावदार जाँघें मैंने इतने पास से कभी नहीं देखी थीं। मेरा लंड भी खड़ा हो रहा था।
ऊपर से दीदी जब भी अपने हाथ ऊपर उठातीं तो दीदी की मुलायम और गोरी-गोरी बगलें दिख जातीं। मन कर रहा था दीदी की दोनों बगलें चाट लूँ। दीदी की बगल में बहुत छोटे-छोटे बाल थे जो बगल की सुंदरता को और बढ़ा रहे थे। दीदी की बगल की खुशबू कैसी होगी, ये सोचके ही लंड ऊपर-नीचे होने लगता। वैसे मुझे भी इस तरह दीदी को देखते हुए शर्म आ रही थी। लेकिन दीदी की बगल और जाँघें देखने से मैं अपने आप को रोक नहीं पा रहा था।
दीदी जब मेरे सामने सोफे पर बैठीं तो दीदी की जाँघें और अंदर तक दिखने लगीं। मेरा लंड पूरा खड़ा हो गया था और शायद दीदी को भी पता चल गया था। दीदी नज़रें बचाकर मेरे लंड की ओर देखतीं और जैसे ही दीदी देखतीं तो उत्तेजना से लंड ऊपर की ओर झटका मारता। लेकिन दीदी देर तक मेरे सामने ऐसे ही बैठी रहीं और मुझसे बातें करती रहीं।
दोपहर को मैं राह देख रहा था कि कब दीदी का मैसेज आए और मैं जाके दीदी के पैर दबाऊँ और मौका मिले तो दीदी की गोरी-गोरी जाँघें भी दबाऊँ। लेकिन दीदी का कोई मैसेज नहीं आया, वरना दीदी दोपहर को अपने कमरे में जाके थोड़ी देर में मेरे व्हाट्सएप पर मैसेज करती थीं कि आ जाओ, पैर दर्द कर रहे हैं। मुझे अब दीदी के पैर दबाने की आदत पड़ गई थी। पैर दबाना तो बहाना था। असल में दीदी के गोरे-गोरे भरावदार पैरों को छूना, सहलाना और मसलना था। दीदी को भी शायद अच्छा लगता था। लेकिन आज दीदी क्यों मैसेज नहीं कर रही हैं। शायद दीदी ने जाँघों तक की ड्रेस पहनी थी इसलिए उनको शर्म आ रही होगी।
आखिर मुझसे रहा नहीं गया और मैंने खुद ही दीदी को मैसेज किया:
“दीदी, आज पैर दर्द नहीं कर रहे क्या?”
दीदी का ब्लू टिक आ गया लेकिन कोई रिप्लाई नहीं आया। मैं निराश हो गया और सोचने लगा कि मैंने आज कुछ ज्यादा ही दीदी की जाँघों और बगल को देखा है। शायद अब दीदी नहीं बुलाएँगी।
तभी दीदी का मैसेज आया:
“आ जाओ।”
मैं फौरन दौड़कर दीदी के कमरे में चला गया।
दीदी: “अरे, बाहर ही खड़े थे क्या?”
मैं: “नहीं-नहीं दीदी, अपने कमरे में था।”
दीदी मुस्कुराईं और कुछ नहीं कहा।
आज दीदी सीधी लेटी थीं।
दीदी: “आ जाओ।”
मैं दीदी के पैरों के पास बैठ गया और धीरे-धीरे दीदी के पैरों पर हाथ फिराने लगा।
दीदी ने अपनी आँखें बंद कर लीं।
दीदी: “थोड़ा जोर लगाओ ना।”
मैं थोड़ा कसकर पैरों पर हाथ घुमाने लगा। दीदी की आँखें बंद थीं।
मैं सोचने लगा कि जैसे दीदी की जाँघों को हाथ लगाऊँ। कहीं दीदी बुरा मान गईं तो। तभी दीदी धीरे से बोलीं,
“थोड़ा ऊपर भी।”
मैं तो बेकरार था लेकिन दिखाना नहीं चाहता था।
मैं: “हम्म…”
मैं धीरे-धीरे हाथ ऊपर ले जाता और वापस नीचे ले आता। फिर मैंने हाथ वापस नीचे लाना कम किया और घुटनों के ऊपर ज्यादा देर तक मसलता। दीदी का चेहरा अलग सा लग रहा था। थोड़ा-थोड़ा लाल हो गया था और आँखें और होंठ कसके बंद कर रखे थे। मैंने हाथ नीचे ले जाना बिल्कुल बंद कर दिया और सिर्फ जाँघों को सहलाने लगा। दीदी की साँसें थोड़ी तेज हुईं और मेरी भी। मेरा लंड पूरा अकड़ गया था और शायद थोड़ा पानी भी बाहर आ गया था। लेकिन आज मैं अपने लंड को हाथ नहीं लगा सकता था क्योंकि दीदी सीधी लेटी थीं। पता नहीं मैं लंड को सहलाऊँ और दीदी आँखें खोल दें तो।
दीदी ने दोनों हाथ सीधे रखे थे जिससे दीदी की बगल नहीं दिख रही थी। लेकिन मेरे लिए जाँघों को सहलाना ही बहुत हो गया था। मेरा मन लंड को थोड़ा सहलाने को हो रहा था। दीदी की गोरी-गोरी जाँघें मदहोश कर रही थीं। जाँघें चाट लूँ ऐसा हो रहा था। दीदी के स्तन भी ऊपर-नीचे हो रहे थे। दीदी ने अपनी आँखें बंद ही रखी थीं।
मैंने धीरे से कहा,
“दीदी।”
दीदी: “हम्मममम…”
मैं: “उल्टा हो जाओ ना।”
दीदी ने कुछ नहीं कहा, फिर धीरे-धीरे उल्टी लेट गईं। उल्टी होने से दीदी की पतली गाउन जैसी ड्रेस और ऊपर हो गई।
अब दीदी आँखें खोल भी लें तो मुझे नहीं देख सकतीं। मैंने अपने लंड को थोड़ा सहलाया। लंड पूरा कड़क हो रखा था। दीदी ने अपना सर एक तरफ कर लिया। दीदी की आँखें खुली थीं, लेकिन दीदी पीछे नहीं देख सकती थीं। इसके लिए दीदी को अपना सर पीछे घुमाना पड़ता।
मैं ऊपर सरक के दीदी की जाँघों के पास बैठ गया और जाँघों के पिछले हिस्से पर हाथ रख दिए। दीदी के शरीर में एक कंपन जैसा हुआ। मैंने जाँघों को सहलाना शुरू किया। फिर थोड़ा जोर लगा के मसलने लगा। दीदी की मुलायम जाँघों को सहलाना स्वर्ग जैसा था। दीदी मुझे देख नहीं सकती थीं तो मेरा डर थोड़ा कम हुआ और अपने हाथ की उंगलियाँ थोड़े-थोड़े फ्रॉक के अंदर भी ले जाने लगा। बीच-बीच में एक हाथ से लंड को थोड़ा सहला देता। लेकिन अब मुझे लगने लगा कि कहीं मेरा पानी छूट न जाए।
मैंने दीदी से कहा,
“दीदी, हो गया।”
दीदी: “हाँ।”
फिर मैं अपने लंड को छुपाता हुआ वहाँ से निकला और अपने कमरे में आकर पूरा नंगा हो गया और दीदी की जाँघों को याद करते हुए हिलाने लगा। थोड़ी देर में पिचकारियाँ निकलने लगीं।
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**Update 6**
**दीदी का POV**
जैसे कि मैंने बताया, हम तीनों मेरे लिए कपड़े लेने जाने वाले थे। लेकिन ऐन वक्त पर राहुल को कुछ काम आ गया और उन्होंने मुझे कहा कि मैं मेरे भाई के साथ चली जाऊँ। मेरा भी मन यही था कि मैं और मेरा भाई दोनों ही जाएँ, क्योंकि वे दोनों एक साथ होंगे तो मुझे ज्यादा शर्म आएगी।
हम उसी शोरूम पर गए जहाँ से मैं अपने सारे कपड़े खरीदती थी। और एक वजह ये भी थी कि शोरूम के मालिक से मैं कई बार चुदवा चुकी थी। वहाँ मैंने कभी पेमेंट नहीं किया था। हालाँकि आज मेरा भाई साथ था तो बात अलग थी। वहाँ एक लड़की थी रीना, जिसे हमारे रिश्ते के बारे में पता था और मेरे साथ कई बार थ्रीसम में शामिल हुई थी।
रीना हम भाई-बहन को देखकर समझ गई कि हम एक दूसरे से बहुत मर्यादा में रहते हैं, तो उसने अपनी बातों से माहौल हल्का बनाया। रीना ने ये भी बताया कि वो भी अपने भाई के सामने छोटे-छोटे कपड़ों में रहती है और उसके भाई को भी इससे कोई दिक्कत नहीं। उसकी बातों से मुझे भी अच्छा लगा कि ये सब इतना गलत या असामान्य नहीं है। फिर भी मैंने घुटनों तक की फ्रॉक ही दिखाने को कहा। मेरा भाई भी कपड़े देखने लगा। आखिर पसंद तो उसे ही करने थे। वैसे मुझे शर्म आ रही थी कि मेरा भाई मेरे लिए कपड़े पसंद कर रहा है और अंदर ही अंदर खुशी भी हो रही थी हमारे रिश्ते में आ रहे बदलाव को लेकर। वैसे मैं अपने भाई से बहुत ज्यादा प्यार करती हूँ।
जब हम ट्रायल रूम गए और मैं फ्रॉक पहनकर बाहर आई और भाई को दिखाने लगी तो उसकी नज़रें मेरे उन्नत स्तनों पर ही अटक गईं। क्या बताऊँ, मुझे कितनी शर्म आ रही थी। मेरा सगा भाई अपनी सगी बहन यानी कि मेरे स्तनों को देख रहा था। फिर मैंने सभी ड्रेस ट्राई किए और हर बार मेरा भाई मेरे स्तनों को देखता। वैसे मुझे मज़ा आ रहा था। हमने दो फ्रॉक पसंद किए और घर आ गए।
मैं फौरन उन्हें पहनना चाहती थी। मैं फौरन अपने कमरे में गई और नई फ्रॉक पहनकर बाहर आई। भाई ने अभी तक मेरी टाँगों को नहीं देखा था, लेकिन अब वो खुलकर मेरी टाँगें देख रहा था। मुझे बहुत शर्म आ रही थी। भाई के लंड का उभार दिख रहा था। मैं सोचने लगी कि कैसे कोई अपनी ही सगी बहन के पैरों को देखकर उत्तेजित हो सकता है। फिर मैं सोचने लगी कि मुझसे कोई रिश्ता न रखने वाले लोग मुझे चोद सकते हैं और मेरे चूत में लंड डालने के लिए मुझे पूरा नंगा कर सकते हैं, तो यह तो मेरा सगा भाई है, क्यों वह मेरे पैरों को नहीं देख सकता। और पैरों पर कहाँ लिखा होता है कि ये बहन की टाँगें हैं, इसे नहीं देख सकते। अगर ऐसा होता तो एक भाई को अपनी सगी बहन की टाँगें देखने का मन ही नहीं होता। क्या उससे हमारा रिश्ता बदल जाएगा या फिर हमारे बीच प्यार कम हो जाएगा। हाँ, कम तो नहीं होगा लेकिन शायद बढ़ सकता है। और मुझे भी मेरे भाई का इस तरह देखना अच्छा लग रहा था। मुझे शर्म तो आ रही थी, लेकिन मैंने सोच लिया था कि मैं भी अपनी टाँगें अपने भाई को खुलकर दिखाऊँगी।
फिर क्या था, मेरा भाई पूरा दिन बस मेरी टाँगें और मेरे स्तनों को देखता रहा। रात को मैंने मेरे पति को बताया तो उन्होंने मुझे समझाया कि यह होना एकदम स्वाभाविक है। मेरे भाई ने कभी मेरे जैसी खूबसूरत टाँगें इतने पास से नहीं देखी थीं, तो उसका देखना कुदरती है। मेरे पति ने उपाय बताया कि अगर मेरा भाई मेरी टाँगों को अच्छे से महसूस कर लेगा तो धीरे-धीरे उसका आकर्षण कम हो जाएगा। मुझे भी उनकी बात ठीक लगी, लेकिन मैंने उन्हें कुछ बताया नहीं।
सुबह को मैंने ब्रा नहीं पहनी और बिना ब्रा के अपने भाई से गले मिली और गुड मॉर्निंग कहा। मेरे स्तन जब मेरे भाई की छाती से लगे तो मुझे बहुत अच्छा लगा। पता नहीं क्यों मेरे भाई की हर चीज़ मुझे अच्छी लग रही थी और मुझे मेरे भाई पर बहुत प्यार आ रहा था। शायद भाई-बहन का रिश्ता ऐसा होता है जो पति-पत्नी के रिश्ते से भी मजबूत होता है। पति-पत्नी दोनों अलग हो सकते हैं, लेकिन अगर भाई-बहन के बीच सच्चा प्यार हो तो वह कभी अलग नहीं होंगे।
दोपहर को हम दोनों ही घर में थे। मैंने सोचा कि अपने भाई को बुलाऊँ, लेकिन मुझे शर्म आ रही थी। और जब मेरा भाई मेरी टाँगों को दबाने के बहाने सहलाएगा तो मैं शर्म से पानी-पानी हो जाऊँगी। मैंने सोचा कि मैं उल्टी लेट जाती हूँ ताकि मुझे मेरे भाई की आँखों में देखना न पड़े। फिर मैं उल्टी लेट गई और अपने भाई के व्हाट्सएप पर मैसेज किया। दरवाज़ा तो खुला ही था, सिर्फ परदा लगा हुआ था। परदा हटाकर जब मेरा भाई अंदर आया तो मुझे पता चल गया। शर्म के मारे मैं कुछ बोल नहीं पाई और मेरा भाई भी मेरे पास आकर खड़ा हो गया, लेकिन कुछ बोल नहीं रहा था। शायद वह मेरी टाँगों को देख रहा था।
आखिरकार मुझे ही बोलना पड़ा, तब जाकर मेरा भाई होश में आया और अपने हाथ मेरी टाँगों पर रख दिए। भाई के हाथ लगते ही मेरे बदन में अजब सी सिहरन होने लगी। वह बहुत ही हल्के-हल्के हाथ घुमा रहा था, फिर मैंने कहा,
“थोड़ा जोर से दबाओ।”
और वो पूरा मन लगाकर मेरी टाँगों को मसलने लगा। मेरी तो सिसकारियाँ निकलने लगीं। थोड़ी देर बाद अचानक उसने कहा,
“दीदी, मैं चलता हूँ।”
मैं सोचने लगी कि क्या हुआ। क्या उसे अच्छा नहीं लगा। और जैसे ही मैंने अपना सर घुमाया तो देखा कि उसका लंड पूरा खड़ा था। मैंने तुरंत अपना सर वापस घुमा लिया और सोचने लगी कि क्या सिर्फ टाँगों को छूने से भी ऐसा हो सकता है।
फिर तो मैं हर रोज़ दोपहर को अपने भाई को व्हाट्सएप पर मैसेज करती और वो आ जाता था और मेरी टाँगों को सहलाता, मसलता और उसका लंड खड़ा हो जाता। मुझे यह देखने में बहुत मज़ा आता था कि कैसे मेरी टाँगों को सहलाने से ही उसका लंड खड़ा हो जाता है। धीरे-धीरे उसकी झिझक खत्म हो रही थी और मेरी शर्म भी थोड़ी-थोड़ी दूर हो रही थी।
अब हम दोनों नॉर्मल हो रहे थे। उसने भी मेरी टाँगों को घूरना कम कर दिया था और अगर वो देखता तो भी मुझे अब ज्यादा शर्म नहीं आती थी। रात को मैंने मेरे पति को भी बताया कि मेरा भाई दो-तीन दिन से मेरी टाँगें दबा रहा है। हालाँकि वह बहुत दिनों से मेरी टाँगें दबा रहा था, लेकिन मेरे पति के सामने यह बताने में मुझे शर्म आ रही थी।
अब हम भाई-बहन खुलकर बिना शर्म के गले मिलते थे। छोटे की छाती से जब मेरी छाती मिलती तो बहुत सुखद अहसास होता। ऐसा मुझे किसी के साथ नहीं लगा था। मैंने सुबह को अंदर ब्रा पहनना छोड़ दिया और ऐसे ही छोटे से मिलती। पता नहीं वो क्या सोचता होगा, लेकिन मुझे अच्छा लग रहा था। दोपहर को मैं उसे अपने कमरे में बुलाती और पैर दबवाती। वो भी कम नहीं था, पैरों को दबाते-दबाते अंदर तक झाँकने की कोशिश करता। और उस वक्त उसके पेंट के ऊपर से बहुत मोटा उभार नज़र आता।
अब मुझे इतने में मज़ा नहीं आ रहा था। मैं सोचने लगी कि क्यों न मेरा भाई मेरी जाँघें भी दबाए। और फ्रॉक भी मुझे अच्छा नहीं लग रहा था। मैंने सोचा क्यों न इससे भी थोड़ी छोटी नाइटी पहनी जाए। छोटे को भी देखकर मज़ा आएगा। स्लीवलेस नाइटी होगी तो मेरे गोरे-गोरे हाथ भी ठीक से दिखेंगे।
मैंने राहुल से कहा, लेकिन उनके पास वक्त नहीं था या वो मेरे मन की बात समझ गए थे और उन्होंने ही कहा कि मैं मेरे भाई को लेकर नाइटी लेने चली जाऊँ। मुझे अंदर ही अंदर बहुत अच्छा लग रहा था, लेकिन मैं राहुल के सामने दिखाना नहीं चाहती थी। वैसे तो उन्होंने मुझे पूरी छूट दे रखी थी, लेकिन यहाँ बात मेरे सगे भाई की थी।
फिर हम उसी शोरूम पर पहुँच गए जहाँ से मैं अपने कपड़े खरीदती थी। यहाँ लेडीज़ के लिए सब तरह के कपड़े मिलते थे। शोरूम के मालिक का नाम संजय था और यहाँ आने के बाद मैं अपने सारे कपड़े यहीं से खरीदती थी। शोरूम का मालिक मुझ पर पूरी तरह लट्टू था। जब भी मैं कपड़े खरीदने जाती तो वो मेरे साथ ही रहता और मुझसे फ्लर्ट करने की कोशिश करता। वह तो जैसे मेरे पीछे पागल ही हो गया था। वो मुझे अच्छा-खासा डिस्काउंट भी देता। जब मैंने यह बात मेरे पति को बताई तो मेरे पति ने कहा कि अगर वो तुम्हें पसंद है और तुम उससे चुदवाना चाहती हो तो चुदवा लो। आखिरकार मैंने उससे चुदवा ही लिया, वो भी उसी शोरूम के अंदर उसके ऑफिस में। फिर तो मैं जब भी कपड़े लेने जाती, उससे चुदवाकर ही आती। फिर तो उसने कभी मुझसे कपड़ों के पैसे नहीं लिए।
जब हम स्लीवलेस नाइटी देख रहे थे तो मुझे पता था कि स्लीवलेस नाइटी कैसे होगी। लेकिन मैंने अपने भाई को दिखाने के लिए रीना से कहा कि नहीं-नहीं, हमें घुटनों तक लंबी नाइटी दिखाएँ। रीना ने कहा कि सारी स्लीवलेस नाइटी इतनी ही लंबी होगी। मैं सोचने लगी कि कहीं नाइटी के अंदर से मेरी चड्डी मेरे भाई को न दिख जाए। आखिर पूरे दिन कितना संभालती। लेकिन रीना ने कहा कि इसके अंदर शॉर्ट्स पहन सकते हैं। मेरा भी बहुत मन था इस तरह की नाइटी भाई के सामने पहनने का। लेकिन ऊपर-ऊपर से मैं “ना-ना” कर रही थी। आखिर मेरे भाई ने भी कहा कि दीदी, ये आप पर बहुत अच्छा लगेगा। मैं मेरे छोटे भाई की बात सुनकर थोड़ी शरमा गई। लेकिन मुझे अच्छा भी लग रहा था कि मेरा भाई मेरे सामने खुल रहा था। मुझे शर्म सच में आ रही थी या मैं शरमाने का नाटक कर रही थी, यह सच में तो मुझे भी समझ नहीं आ रहा था। मैं थोड़ा-बहुत शरमा रही थी और थोड़ा जानबूझकर शरमाने का नाटक भी कर रही थी, ताकि मेरा भाई मेरे बारे में कुछ गलत न सोचे।
जब मेरे भाई ने मुझे ट्रायल के लिए कहा तो मैंने मना कर दिया। मुझे पता था इसमें साइज़ की प्रॉब्लम नहीं होती, सिर्फ हाइट देखनी होती है। मैंने मेरे भाई को पसंद करने को कहा और मैं नीचे संजय के पास चली गई। संजय मुझे ऑफिस के अंदर जाने को बोल रहा था, लेकिन आज मेरा छोटा भाई मेरे साथ था और मेरा मन नहीं किया। मैंने उसे बता दिया कि जब भी मेरा भाई मेरे साथ हो तो हम कुछ नहीं करेंगे। उसने कहा भी कि उसे कुछ पता नहीं चलेगा। लेकिन मैंने फिर भी मना कर दिया। छोटे को पता चले या न चले, लेकिन उसकी पीठ पीछे कुछ करने का मन नहीं था। जैसे मैं अपने पति से बेवफाई नहीं कर सकती, उसी तरह ये भी मुझे कुछ-कुछ ऐसा ही लग रहा था। हालाँकि मेरे पति ने मुझे पूरी छूट दे रखी थी और मैं पति के सामने भी चुदाई करवाती थी। मैं मेरे भाई का यकीन जो मुझ पर था, उसे तोड़ना नहीं चाहती थी। चाहे उसकी पीठ पीछे ही क्यों न हो। फिर हम कपड़े लेकर घर आ गए।
हम कपड़े तो ले आए, पर उन्हें पहनकर छोटे के सामने जाने में शर्म आ रही थी। हम दुनिया के सामने कुछ भी करें, लेकिन परिवार के सामने शर्म आ ही जाती है। होना उल्टा चाहिए कि हम परिवार में खुलकर रहें और दुनिया के सामने एक लिमिट में। बाहरी दुनिया में कौन कैसा है, हम नहीं जानते।
छोटा मुझे उन कपड़ों में देखने को उतावला लग रहा था। लेकिन मेरी शर्म ने मुझे रोक रखा था।
रात को मैंने राहुल को बताया तो उन्होंने मेरी मज़ाक उड़ाई। लेकिन उनसे बात करके मैं आश्वस्त हुई। ये उतनी भी बड़ी बात नहीं थी जितना मैं सोच रही थी। लोग पता नहीं अपने घरों में क्या-क्या करते होंगे। और मेरा भाई तो मुझसे कितना प्यार करता है। राहुल ने बताया कि मैं कुछ भी करूँ, मेरा भाई मुझे बस खुश देखना चाहता है। अब इतना प्यार करने वाला भाई हो तो उसकी खुशी का ख्याल भी मुझे रखना चाहिए। मैंने मन बना लिया था।
दूसरे दिन मैंने नई फ्रॉक पहनी और अंदर ब्रा भी नहीं पहनी और भाई से गले मिली और गुड मॉर्निंग कहा। मेरे स्तन मेरे भाई की पतली टी-शर्ट से होते हुए उसकी छाती से लग गए। मैं छोटे से अलग हुई तो उसकी नज़र मेरे स्तनों से चिपक गई। स्तनों का उभार गले के ऊपर से भी थोड़ा दिख रहा था। छोटे को ये ड्रेस बहुत पसंद आई और उसने तारीफ भी की। मैंने कहा ठीक से बताओ क्या पसंद आया, तो मेरी जाँघों और स्तनों को देखने लगा। जैसे आँखों से बता रहा हो कि मेरे स्तन और खुली जाँघें पसंद आई हों। वो तो बस खो सा गया था। आखिर मैं किचन में नाश्ता बनाने जाने लगी। जाते वक्त अचानक मैंने पीछे देखा तो वो पीछे मेरी जाँघों को घूर रहा था। मेरी नज़र उससे मिली तो वो शरमा गया। उसे मेरी जाँघें इतनी पसंद आईं, ये सोचकर मैं भी खुश हो गई।
वो मेरे पीछे-पीछे किचन में भी आ गया। मुझे पता था वह मेरे पीछे क्यों आया है। उसने मुझे फिर से बाँहों में भर लिया और मेरे गालों को भी चूमा। और फिर मेरे पास खड़ा हो गया। वह तो बस मेरे स्तनों को देखे जा रहा था। लेकिन पास में खड़े होने से वह मेरी जाँघों को नहीं देख सकता था। मैंने भी शरारत करते हुए एक चम्मच अपने हाथ से नीचे गिराया जो जाकर मेरे बिल्कुल पाँव के पास पीछे चला गया। मैं उठाने को झुकने ही वाली थी कि छोटे ने कहा,
“रुको दीदी, मैं उठा देता हूँ।”
मुझे पता था वो क्या करेगा। उसने चम्मच उठाते हुए मेरी जाँघों को अच्छे से देखा और शायद मेरी फ्रॉक के अंदर भी देखने की कोशिश की। मेरे बदन में भी मस्ती की लहर दौड़ गई। मेरा सगा भाई मेरे नाजुक अंगों को देखने की कोशिश कर रहा था। शायद उसने कभी रियल में देखे नहीं थे। उसका आकर्षण स्वाभाविक था। और मुझे भी कोई आपत्ति नहीं थी। आखिर वह मेरा सगा भाई था।
लेकिन वो भी कम नहीं था। पूरा दिन बस मेरी जाँघों को देखता रहा और मेरे स्तनों को देखता रहा। मुझे बहुत शर्म आ रही थी, लेकिन अंदर से मज़ा भी आ रहा था। और उसके लंड का उभार। कितना मोटा दिख रहा था। उसे शायद पता भी नहीं चल रहा था कि उसका लंड खड़ा हो रहा है। और जब मैं हाथ ऊपर करती तो उसकी नज़र मेरी बगल पर चिपक जाती। मेरी बगल में बहुत छोटे-छोटे बाल भी आए थे। पता नहीं वो क्या सोच रहा होगा। जब वो मेरी बगल देखता तो मुझे बहुत शर्म आती। और जब मैं उसके सामने सोफे पर बैठी तो फ्रॉक थोड़ी और ऊपर हो गई और उसकी नज़रें मेरी दोनों जाँघों के बीच में थीं। उसका लंड तो पूरा खड़ा हो गया था। मैं भी नज़रें बचा-बचाकर उसके लंड को देखती। कितना मोटा था। मेरी चूत भी शायद गीली हो गई थी। अपने सगे भाई के लंड को देखकर चूत गीली हो गई है, यह सोचकर ही मुझे बहुत शर्म आ रही थी। लेकिन वह भी बेशर्म की तरह मेरी जाँघों के बीच में देख रहा था। उसे पता था कि कुछ दिखेगा नहीं, फिर भी देख रहा था। आखिर क्या देख रहा था। क्या था मेरी दोनों जाँघों के बीच में। वहाँ तो मेरी चूत थी। तो क्या मेरा भाई अपनी सगी बहन की चूत देखना चाहता है। यह सोचते ही मेरी चूत से पानी निकलने लगा। बीच-बीच में उसका लंड झटके भी मार रहा था।
और फिर हमारा वह रूटीन। मैं हर दोपहर को उसे अपने कमरे में बुलाती थी मेरे पैर दबाने। और वह भी मेरे पैर दबाने के बहाने मेरे पैरों को अच्छे से सहलाता। लेकिन आज मैं क्या करूँ। आज तो मेरी जाँघें भी खुली थीं। कहीं उसने मेरी जाँघों को सहलाया तो। और अंदर झाँकने की कोशिश की तो। क्योंकि मैं तो हमेशा उल्टी ही लेटती थी। मुझे तो पता भी नहीं चलेगा कि वह कितने अंदर तक देख रहा है। मैं मोबाइल हाथ में लेकर यह सोच रही थी कि उसे मैसेज करूँ या न करूँ। इतने में ही उसका मैसेज आया,
“दीदी, आज पैर दर्द नहीं कर रहे हैं क्या?”
मैंने उसका मैसेज देखा और सच में सोच में पड़ गई। कितना पागल हो रहा है मेरी जाँघों को देखने के लिए। मैं थोड़ी देर सोचती रही, फिर सोचा क्यों न सीधी लेट जाऊँ और उसे बुला लूँ। मैं सीधी लेट गई और रिप्लाई दिया,
“आ जाओ।”
वह फौरन अंदर आ गया, जैसे दरवाज़े पर ही खड़ा मेरे रिप्लाई का इंतज़ार कर रहा हो।
वह आकर मेरे पैरों के पास बैठ गया और मेरे पैरों को सहलाने लगा, लेकिन देख मेरी जाँघों को रहा था। मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं ताकि मुझे शर्म न आए। वह बहुत हल्के हाथों से सहला रहा था। मुझे लगा अगर थोड़ा जोर से दबाएगा तो और मज़ा आएगा। लेकिन उसे कैसे कहूँ। आखिर मैंने कहा,
“थोड़ा जोर से लगाओ ना।”
और जैसे वह यही इंतज़ार में था और मेरे पैरों को जोर से मसलने लगा।
लेकिन वह मेरे घुटनों तक ही सहला रहा था। घुटनों से ऊपर वह नहीं गया। आखिर मुझे ही रहा नहीं गया। मैंने शरमाते हुए कहा,
“थोड़ा ऊपर भी।”
वह भी तो यही चाहता था। लेकिन जैसे वह मुझे दिखाना नहीं चाहता था और हाथ ऊपर ले जाता और फिर वापस पैरों पर ले आता। लेकिन आखिर वह जाँघों को छोड़कर पैरों को क्यों सहलाएगा। फिर धीरे-धीरे उसने हाथ नीचे ले जाना बंद किया और सिर्फ जाँघों को ही सहलाता रहा। मुझे भी अच्छा लगने लगा। ऐसा कभी नहीं हुआ था कि जाँघें सहलाने से ही चूत गीली हो जाए। लेकिन आज वो हो रहा था। शायद मेरा सगा भाई था इसलिए। क्योंकि हमारे बीच कुछ मर्यादा थी। वो बहुत ज्यादा आगे नहीं बढ़ सकता था। उसे भी पता था और मुझे भी। और शायद यह मर्यादा और शर्म ही मुझे उत्तेजित कर रही थी। वह मेरे बगल को भी देखा, लेकिन मैंने अपने हाथ सीधे रखे थे। इतने पास से उसका इस तरह देखना और सहलाना मुझे रोमांचित कर रहा था। मेरी साँसें तेज हो गईं और मेरे स्तन ऊपर-नीचे होने लगे।
अचानक उसने मुझे उल्टा लेटने को कहा। मुझे पता था उसने ऐसा क्यों कहा। ताकि वह खुलकर मेरी जाँघों को देख सके और शायद मेरी जाँघों के अंदर भी देख सके। कितना बदमाश हो गया था मेरा भाई, अपनी ही सगी बहन की जाँघों के अंदर देखना चाहता था। अपनी सगी बहन की जाँघों के अंदर देखना। क्या दिखेगा उसे। मैं अंदर शॉर्ट्स पहनी थी। लेकिन शॉर्ट्स भी ज्यादा लंबी नहीं थी और ना ही ज्यादा मोटी थी।
लेकिन मेरा भी मन हो रहा था कि मेरा भाई अच्छे से देखे। मैं धीरे-धीरे उल्टा लेट गई। शायद मेरी फ्रॉक और ऊपर सरक गई थी। मैंने अपना सर एक तरफ कर लिया ताकि मैं थोड़ा-बहुत देख सकूँ कि वह क्या कर रहा है।
वह सरक कर मेरी जाँघों के पास आ गया। और जैसे ही मेरी जाँघों के पिछले हिस्से पर हाथ रखा, मेरे शरीर में एक कंपन सा हो गया। छोटे ने मेरी जाँघों को सहलाना शुरू किया। पहले बहुत हल्के-हल्के, फिर जोर लगाकर मसलने लगा। वह अपनी उंगलियों को थोड़ा-थोड़ा मेरे फ्रॉक के अंदर भी ले जाने लगा। और बीच-बीच में शायद वह अपना लंड भी सहलाता था, ऐसा मुझे लगा।
थोड़ी देर बाद वह अचानक खड़ा हो गया और कहा,
“दीदी, हो गया।”
मैं भी क्या कहती, मैंने “हाँ” कहा। मैंने पीछे देखा तो वो जा रहा था। उसका लंड पूरा खड़ा था और बॉक्सर के आगे शायद थोड़ा गीला-गीला भी लग रहा था। उसके जाते ही मैंने दरवाज़ा बंद किया और अपने सारे कपड़े उतार दिए और एक वाइब्रेटर निकाल कर अपनी चूत में घुसा लिया। थोड़ी देर में मेरी चूत ने पानी छोड़ दिया।
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*Update 7*
Harsh' POV
बस अब तो मेरे मजे थे। मैंने कभी सोचा नहीं था कि यहां आके इतना मजा आएगा।
मैंने कॉलेज में भी ज्यादा दोस्त नहीं बनाए। दीदी ही मेरी बेस्ट फ्रेंड थी। दोपहर को दीदी का मैसेज आ जाता। मैं दीदी के कमरे में जाता और फिर क्या था।
दीदी की मखमली जांघें, बड़ी-बड़ी और सख्त चूचियां, दीदी की मुलायम बगल। वैसे अभी तक मैंने बगल को छुआ नहीं था, लेकिन जरूर बहुत मुलायम होगी। दीदी की जांघों को सहलाना और दीदी की सिसकारियां।
पहले तो दीदी अपनी सिसकारियां काबू करने की कोशिश करती थी, लेकिन अब तो सिसकारियां ऐसे लेती थी कि मैं पागल हो जाऊं।
एक बार जब दीदी सिसकारियां ले रही थी तो मैंने पूछा भी—
मैं: दीदी क्या हो रहा है?
दीदी: दर्द है पैरों में, तू अच्छे से दबा ना छोटे।
मैं: दीदी मुझे छोटा मत कहो ना। अब मैं छोटा नहीं।
दीदी: हां हां पता है अब तू छोटा नहीं, मोटा है और लंबा भी हो गया है।
एक पल के लिए तो मुझे लगा दीदी मेरे लंड के बारे में बात कर रही है। लेकिन दीदी ने तो मेरा लंड देखा ही नहीं। मैं भी क्या सोच रहा हूं।
मैं: दीदी मैं लंबा हूं, मोटा नहीं।
दीदी: अच्छा बाबू, सिर्फ लंबा हो गया है, मोटा नहीं, अब खुश। चल बता तुझे क्या बुलाऊं।
मैं: आपको जो अच्छा लगे।
दीदी: ठीक है। मैं तुझे सोना बाबू कहूंगी।
दीदी की बात सुनकर मैं शरमा गया।
मैं: शोना बाबू लड़कियां उसे बुलाती हैं जिनसे वो प्यार करती हैं।
दीदी: मैं भी तो तुम्हें प्यार करती हूं। और तुम भी मुझे प्यार करते हो। करते हो कि नहीं?
मैं: हां दीदी, मैं भी आपको बहुत-बहुत-बहुत प्यार करता हूं। लेकिन ये भाई-बहन वाले प्यार की बात नहीं। लवर की बात है।
दीदी: अच्छा एक बात बता, प्यार को ही लव कहते हैं, और जो लव करे वो लवर। तो फिर तुम मेरे लवर और मैं तुम्हारी लवर हुई कि नहीं।
मैं: दीदी आप भी ना। मैं आप से नहीं जीत सकता। आपको जो अच्छा लगे उस नाम से बुलाओ, बस।
दीदी: अरे मैं तो तुम्हें यूं ही परेशान कर रही थी। एक काम करो, तुम मुझे शोना बुलाना और मैं तुम्हें बाबू कहूंगी।
मैं: ठीक है। लेकिन जीजू के सामने?
दीदी: जीजू के सामने भी। वो माइंड नहीं करेंगे। मैं उन्हें अच्छे से जानती हूं।
फिर तो मैं दीदी को शोना बुलाने लगा और दीदी भी मुझे बाबू ही बुलाती।
जीजू ने पहली बार सुना तो हंसते हुए—
जीजू: बड़ा प्यार है भाई-बहन में।
दीदी: क्यों ना हो, मैं सबसे ज्यादा प्यार अपने भाई को ही करती हूँ।
फिर हंसते हुए कहा: कहीं तुम्हें जलन तो नहीं हो रही।
जीजू: मुझे क्यूँ जलन होगी। मुझे तो अच्छा लगता है जब भी मैं भाई-बहन का प्यार देखता हूँ। भाई-बहन को ऐसे ही प्यार से रहना चाहिए।
********************************************
एक दिन ऐसे ही मैं दीदी के पांव दबा रहा था। पांव क्या, जांघें दबा रहा था और सहला रहा था। दीदी भी हल्के-हल्के सिसकारियां ले रही थी।
फिर दीदी उल्टा लेट गई। मैंने हिम्मत करते हुए दीदी के फ्रॉक को थोड़ा और ऊपर कर दिया। वैसे भी फ्रॉक छोटी ही थी। और थोड़ा ऊपर हो जाती तो दीदी की मस्त चूतड़ दिख जाते। फ्रॉक के ऊपर से ही उभरे हुए लग रहे थे। मेरा लंड पूरा तन गया। मैं थोड़ा-थोड़ा लंड पे भी हाथ फेर लेता।
दीदी: बाबू तुम मुझसे बात क्यों नहीं करते?
मैं: करता तो हूं दीदी।
दीदी: बाबू, मुझे शोना बुलाओ ना।
मैं: ठीक है शोना।
दीदी: बाबू, तुम पैर दबाने के बाद चले क्यों जाते हो? थोड़ी देर मेरे पास लेटो और बातें करो।
मैं: ठीक है शोना।
दीदी: तुम्हें शरम आती है क्या?
मैं: नहीं दीदी, ऐसी कोई बात नहीं।
दीदी: ठीक है तो मेरे पास लेटो थोड़ी देर।
अब मैं दीदी को कैसे बताऊं कि मैं क्यों जाता हूं। मेरा लंड पूरा तना हुआ होता है। अब खड़ा लंड लेकर अपनी सगी बहन के पास कैसे लेट जाऊं। लेकिन आज कोई चारा नहीं था।
मैं पैरों को दबाने के बाद दीदी के पास लेट गया। दीदी सीधी हो गई। दीदी भी लेटी हुई थी इसलिए शायद उन्हें मेरा तना हुआ लंड दिखाई नहीं दे रहा था। मैं दीदी और मेरे बीच थोड़ी जगह बनाके लेटा था।
दीदी: बाबू तुम अब बहुत शरमाते हो।
मुझे सच में शरम आ रही थी। अगर दीदी ने मेरा तना लंड देख लिया तो क्या सोचेंगी। कैसा भाई है जो सगी बहन को देख के लंड खड़ा करता है। और दीदी का शरीर भी ऐसा भरा-भरा था कि किसी का भी लंड खड़ा हो जाए।
मैं: नहीं नहीं दीदी, मैं कहां शरमा रहा।
दीदी: तो इतने दूर क्यों लेटे हो। पास आ जाओ।
वैसे इतनी दूर भी नहीं था। बस हम टच नहीं कर रहे थे। मैं खिसक कर दीदी के पास हो गया। हमारे बदन सट गए।
दीदी: याद है भाई, तुम बचपन में मेरे साथ सोने की जिद करते थे और फिर मुझसे लिपटकर मेरे पेट पर हाथ रख कर सोते थे।
वैसे मुझे ऐसा कुछ याद तो नहीं आ रहा था। लेकिन दीदी कह रही है तो सच ही होगा।
मैं: हां दीदी।
दीदी: आज भी ऐसे ही लेटो ना। मुझे बचपन की यादें ताजा करनी हैं।
अब मेरे लिए मुश्किल खड़ी हो गई। दीदी के पेट के ऊपर हाथ रखने के लिए मुझे दीदी की ओर घूमकर लेटना पड़ेगा और ऐसा करता तो मेरा लंड सीधा दीदी की जांघों से लग जाता।
मैं सावधानी से दीदी की ओर मुड़ा और मुड़ते हुए अपनी गांड़ को थोड़ा पीछे कर लिया। फिर मैंने अपना हाथ दीदी के पेट के ऊपर रख लिया। क्या नरम और मुलायम बदन था। मेरा जो थोड़ा नरम हुआ था फिर से खड़ा होने लगा।
मुझे डर था कि दीदी को खड़े लंड का पता न चल जाए। लेकिन अब क्या कर सकते थे। जो होना है होके रहेगा। अब मैं यहां से ऐसे ही जा भी नहीं सकता था। और लंड तो पूरा तनाव में आने लगा।
मैंने भी सोच लिया कि अब जो होगा देखा जाएगा। और मेरे लंड ने दीदी की जांघ को छुआ। लेकिन दीदी ने कोई रिएक्शन नहीं दिया। मैं थोड़ा रिलैक्स हुआ ही था कि दीदी के बदन में तनाव आ गया। दीदी का पेट भी थोड़ा सख्त हुआ और एक कंपकपी महसूस हुई। दीदी की सांसे तेज हो गईं।
थोड़ी देर लगी लेकिन दीदी रिलैक्स होने लगीं। उनका बदन भी नॉर्मल होने लगा।
मेरा लंड अभी भी तन कर खड़ा था और बीच-बीच में झटके भी ले रहा था। दीदी के मुलायम पेट का एहसास लंड को बैठने ही नहीं दे रहा था। और लंड भी दीदी की जांघों को छू रहा था। लंड जब झटका खाता तो जांघों को अच्छे से महसूस करता।
शायद दीदी को भी पछतावा हो रहा होगा कि क्यों मुझे पास लेटने को कहा। मासूम दीदी तो बचपन की यादें ताजा करना चाहती थी और मैंने मेरी जवानी महसूस करवा दी। मुझे लगा अब दीदी के पास ज्यादा लेटना ठीक नहीं।
मैं: अच्छा दीदी, मैं जाता हूं।
दीदी कुछ नहीं बोल पाईं। बस हम्ममम करा।
मैं उठकर अपने कमरे में आ गया।
********************************************
दूसरे दिन मुझे पक्का लगा कि अब दीदी मुझे नहीं बुलाएंगी। अब ऐसे भाई को कौन बहन पास बुलाएगी जो अपनी ही सगी बहन की जांघों से अपना खड़ा लंड रगड़ता हो। मैं ऐसे ही थोड़ा मायूस अपने कमरे में बैठा था।
और दीदी का मैसेज आ गया। मुझे आश्चर्य हुआ कि ये क्या। कल की घटना के बाद भी। शायद दीदी मुझे बहुत ज्यादा प्यार करती है तभी मेरी हरकतों को नजरअंदाज कर रही है।
मैं भी क्या करूं। दीदी के पास जाते ही सारा कंट्रोल खो देता हूं और ना करने वाली हरकत कर देता हूं। लेकिन आज फिर से कल वाली बात हुई तो। शायद आज दीदी मुझे पास सोने को नहीं बोलेंगी।
मैं दीदी के रूम में गया। दीदी सीधी लेती थीं और मेरी ओर मुस्कुरा के देख रही थीं। दीदी की मुस्कुराहट देख कर मैं सब भूल गया।
दीदी ने मुस्कुराते हुए कहा: बाबू इतनी देर क्यों लगी?
मैं: वो थोड़ा काम में था शोना।
दीदी: दीदी से भी जरूरी कोई काम है क्या?
मैं: आपसे जरूरी मेरे लिए कुछ भी नहीं। सब कुछ आपके बाद।
दीदी: इतना प्यार करते हो दीदी से।
मैं: हां दीदी, सच में।
दीदी: अच्छा चल पहले मेरे पास थोड़ी देर लेट जा, बाद में पैर दबाना।
मैं: ठीक है दीदी।
मैं सावधानी से दीदी के पास सीधा लेट गया।
दीदी: फिर से कल की तरह कर रहा है। अब मैं रोज-रोज नहीं बोलूंगी। मेरे पास आ और हाथ मेरे पेट के ऊपर रख। मुझे अच्छा लगता है। यहां एक तू ही तो है जो मुझे बचपन की यादें ताजा कराता है।
मैं फिर से सोच में पड़ गया। हाथ तो ठीक है लेकिन लंड का क्या। वो तो दीदी के जिस्म से लगते ही खड़ा हो जाएगा। वैसे अभी से लंड में हलचल शुरू हो गई थी।
दीदी: क्या हुआ?
मैं: अम्ममम, कुछ नहीं शोना।
फिर मैं दीदी की तरफ घूम गया और दीदी से थोड़ा चिपक के अपना हाथ दीदी के मुलायम पेट के ऊपर रख दिया। मेरा आधा खड़ा लंड जो थोड़ी देर में पूरा खड़ा होने वाला था, दीदी की जांघों से चिपक गया।
दीदी मुझे कितना प्यार करती है जो मेरे खड़े लंड को भी नजरअंदाज करते हुए मुझे अपने पास सुला रही थी।
दीदी के पेट के ऊपर हाथ रखना थोड़ा मुश्किल था। मैं और दीदी बिल्कुल समान हाइट पर सोए थे। दीदी के पेट पर हाथ रखने के लिए मुझे अपना हाथ थोड़ा संभल के रखना पड़ता था क्योंकि अगर मैं केयरफुल नहीं रहता तो मेरा हाथ दीदी के स्तनों को भी टच करने लगता।
दीदी मेरी तकलीफ समझ गईं।
दीदी: दिक्कत हो रही है क्या। ऐसा कर, मैं थोड़ा ऊपर हो जाती हूं और तू थोड़ा नीचे हो जा।
और दीदी थोड़ा ऊपर की ओर खिसक गईं और मैं थोड़ा नीचे। अब मैं आराम से दीदी के पेट के ऊपर हाथ रख पाया। मेरा सर अब बिल्कुल दीदी के गोरे-गोरे हाथ के सामने था। और हाथ के ऊपर नजर गई तो दीदी का मस्त कड़क स्तन था।
आज पहली बार दीदी के स्तन को इतने पास से देख रहा था। लंड का खड़ा होना स्वाभाविक था। और लंड भी दीदी की मुलायम जांघ से लगा हुआ था। लेकिन आज दूसरी बार था तो मैं थोड़ा कम घबराया हुआ था। अगर दीदी को इससे इतनी दिक्कत होती तो आज बुलाती ही नहीं और बुलाती तो पास लेटने को तो बिल्कुल नहीं कहतीं।
मैं धीरे-धीरे फ्रॉक के ऊपर से दीदी की नाभि को सहलाने लगा। आज दीदी नॉर्मल ही लग रही थीं। हां दीदी की सांसे थोड़ी तेज हुई थीं। बस और कुछ नहीं। मैं देख भी नहीं सकता था कि दीदी कहां देख रही हैं। दीदी का सर मेरे सर की ऊंचाई से ऊपर था। मैं ऐसे ही सोए हुए दीदी की नाभि को सहला रहा था। मेरा लंड दीदी की जांघ से साइड में लगा हुआ था। बहुत अच्छा लग रहा था।
दीदी शायद अभी नहाई थीं। दीदी के बदन से सुगंध आ रही थी। शायद साबुन की थी या परफ्यूम। मैं लंबी-लंबी सांसे लेते खुशबू को अंदर भरने लगा। बहुत मस्त खुशबू थी।
मेरी नजरें दीदी के स्तनों से हट ही नहीं रही थीं। मैं स्तनों के अलावा सबकुछ भूल सा गया। ये भी भूल गया कि ये उन्नत और कठोर स्तन मेरी सगी बहन के हैं जिसने मेरे प्रति अपने प्यार के चलते मुझे इस तरह अपने पास लिटाया है।
और फिर दीदी ने मेरी तरफ वाला हाथ ऊपर किया और अपने सर के भी ऊपर कर लिया। एक खुशबू की लहर मेरे नाक से टकराई। मैंने सर थोड़ा ऊपर किया और दीदी की बगल ठीक मेरी आंखों के सामने थी। खुशबू दीदी की बगल से आ रही थी। बगल में बहुत छोटे-छोटे बाल थे।
मैं दीदी की बगल सूंघने लगा और लंबी-लंबी सांसे लेने लगा। ये भी भूल गया कि ये मदमस्त बगल मेरी सगी बहन की है। नीचे मेरा लंड दीदी की जांघ से सटा हुआ था जो अब पूरा तन गया था। मैं दीदी की बगल सूंघने में खो सा गया। तभी दीदी की आवाज आई।
दीदी: क्या हुआ।
अब मेरी हालत थोड़ी खराब हो गई। मैंने हालात संभालते नॉर्मल बनते हुए कहा।
मैं: दीदी बहुत अच्छी खुशबू आ रही है। आपने अंडरआर्म स्प्रे लगाया है क्या।
दीदी: नहीं तो। कुछ भी नहीं लगाया।
मैंने फिर एक लंबी सांस खींची और कहा: तो फिर ये खुशबू कैसी।
मैं अपनी हरकत को नॉर्मल बनाना चाहता था। दीदी के चेहरे के एक्सप्रेशन तो देख नहीं पा रहा था लेकिन दीदी की आवाज नॉर्मल ही थी।
दीदी: अरे बाबू, अभी नहाई हूं तो साबुन की खुशबू होगी।
मैं: (नॉर्मल बनते हुए) कौन सा साबुन है? मस्त खुशबू है।
दीदी: (हंसते हुए) तू ही बता।
मैं अपनी नाक दीदी की बगल के बिल्कुल पास ले गया। मेरी नाक दीदी की बगल को टच हो गई। दीदी के शरीर का कंपन मैंने महसूस किया। मेरे लंड ने भी झटका किया। मैंने लंबी सांस ली। दीदी के बगल की खुशबू कमाल थी।
मैंने एक साबुन का नाम लिया जो कि दीदी बिल्कुल इस्तेमाल नहीं करती, मुझे पता था।
दीदी: नहीं।
मैंने फिर दीदी की बगल को सुंघा। इस बार मेरे होंठ भी दीदी की बगल को छू गए। दीदी ने कुछ नहीं कहा। मुझे भी अच्छा लगा। मैंने फिर से सुंघा। फिर से मेरे होंठ बगल को छूने लगे। मैंने होंठ हटाए बिना फिर एक साबुन का नाम लिया।
दीदी: नहीं। ठीक से बताओ। तुम्हें तो कुछ पता नहीं चलता। कैसे बुद्धू हो।
मैंने अब अच्छे से होंठ दीदी की बगल में चिपका दिए। दीदी के मुंह से सिसकारी निकल गई। मेरे लंड ने फिर से झटका लिया। मैंने फिर से एक साबुन का नाम लिया। मेरे होंठ दीदी की बगल पे ही थे। अब सूंघना नहीं, चूमना शुरू हो गया था। दीदी ने फिर से ना कहा। फिर से मैंने दीदी की बगल सूंघना और चूमना शुरू किया। अब मैंने देर तक दीदी की बगल को सुंघा। कई बार सुंघा और मेरे होंठ भी दीदी की बगल पे रगड़े। दीदी भी कसमसाने लगी थीं। मैंने फिर एक साबुन का नाम लिया। इस बार दीदी ने हां कहा।
अब मुझे मेरे होंठ हटाने पड़े।
दीदी: कितनी देर लगी पहचानने में।
मैं: हां दीदी, समझ ही नहीं आ रहा था। क्या आप यही साबुन इस्तेमाल करती हो?
मैं अपनी उत्तेजना को काबू में करने की कोशिश कर रहा था।
दीदी: नहीं नहीं, मैं अलग-अलग पांच छह साबुन रखती हूं बाथरूम में। हर रोज अलग-अलग साबुन इस्तेमाल करती हूं।
मैं: तभी आप इतनी खूबसूरत हो।
दीदी: अच्छा। पहले तो कभी नहीं कहा।
मैं: मेरे कहने से क्या फर्क पड़ता है। मैं कहूं या न कहूं, आप बहुत खूबसूरत हो दीदी।
दीदी: हम्ममम। चल अब थोड़े पैर भी दबा दे।
मेरे लिए अब रुकना मुश्किल था। लंड हिलाने का बहुत ज्यादा मन कर रहा था। लंड से चिकना पानी निकल के अंडरवीयर को भिगो दिया था।
मैं: दीदी आज रहने देते हैं ना। कल पक्का अच्छे से दबाऊंगा।
दीदी: ठीक है। जा जल्दी।
मुझे समझ नहीं आया कि दीदी ने जल्दी जाने को क्यों कहा। मैं बेड पर बैठ गया। दीदी की तरफ देखा। दीदी की आँखें नशीली लग रही थीं। मैं ज्यादा देर रुक नहीं सकता था। मैं लंड को छुपाते हुए बाहर निकल गया।
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**Update 8**
**दीदी का दृष्टिकोण**
मेरे पास आकर मेरा भाई बहुत खुश था और मैं भी। लेकिन थोड़े ही दिनों में हमारा रिश्ता बहुत बदल गया था। कहाँ वो मेरा छोटा सा मासूम सा भाई, और कहाँ मुझे देखकर ही जिसका लंड खड़ा हो जाता है वो भाई।
भाई पूरा दिन मेरे आस-पास ही घूमता रहता। मेरे कपड़ों में झाँकने की कोशिश करता। उसे परेशान करने में मुझे भी बड़ा आनंद आता। कभी हाथ ऊपर करके उसे अपनी बगल दिखाती और जब वो ध्यान से देखने लगता तो हाथ नीचे कर लेती। उस वक्त उसका चेहरा देखने लायक होता। कभी उसके सामने सोफे पर बैठकर अपनी जाँघें थोड़ी फैलाती तो वो जाँघों के बीच ध्यान से देखने लगता, और फिर मैं वापस जाँघें सिकुड़ लेती। जब भी उसका मूड नहीं होता तो मुझे बस अपनी जाँघें या बगल दिखानी होती और वो खुश हो जाता।
मुझे पता था उसने कभी किसी लड़की को चोदा नहीं था, यहाँ तक कि ठीक से नंगा भी नहीं देखा होगा। इसलिए उसकी उत्सुकता कुछ ज्यादा ही थी। उसने जो भी देखा था बस पॉर्न में देखा था, और मेरे पति ने बताया था कि उसे पॉर्न देखने की आदत भी नहीं थी। पता नहीं क्या सोचकर मूठ मारता होगा। इसीलिए उसका मुझे देखना बुरा नहीं लगता था। बुरा क्या, सच कहूँ तो मुझे भी अच्छा लगता था। जब वो मेरी जाँघों को घूरता था या मेरी बगल देखता तो मेरी चूत में गुदगुदी होने लगती। मुझे पता है ऐसा नहीं होना चाहिए था, वो मेरा सगा छोटा भाई था, लेकिन चूत को क्या कहूँ। जब वो मेरी जाँघें सहलाता तो चूत पानी छोड़ने लगती। उसका हाथ जाँघों पर लगते ही सिसकारियाँ निकलने लगतीं। पहले तो मैं सिसकारियाँ कंट्रोल करने की कोशिश करती, फिर वो भी छोड़ दिया। आखिर कब तक कंट्रोल करती। फिर तो जब भी वो मेरी जाँघें मसलता, मैं खुलकर सिसकारियाँ लेती। मन कर रहा था कि उसे बोल दूँ कि मेरा पूरा बदन सहलाए। वैसे मेरा भाई मुझे बहुत प्यार करता था और मैं भी उसे बहुत प्यार करती थी।
एक दिन वह ऐसे ही मेरी जाँघें दबा रहा था। मैं सीधी लेटी थी इसलिए मुझे बहुत शर्म आ रही थी। फिर मैं उल्टी हो गई। एक तो मेरी फ्रॉक छोटी सी थी और ऊपर से उल्टा लेटने की वजह से और थोड़ा ऊपर चढ़ गई। पता नहीं उसे क्या-क्या दिख रहा होगा। और वह भी बहुत शैतान हो गया था। उसने भी अपनी उंगलियों से मेरी फ्रॉक को धीरे-धीरे थोड़ा सा ऊपर सरकाया। उसे लगा मुझे पता नहीं चल रहा, लेकिन मुझे सब पता चल रहा था। वह तो गनीमत थी कि नीचे मेरी फ्रॉक मेरी टाँगों के कारण दबी हुई थी। वरना उसका बस चलता तो वह पूरी फ्रॉक ही ऊपर कर देता और मेरे बड़े-बड़े चूतड़ उसके सामने आ जाते। क्या नज़ारा होता। मेरे चूतड़ और मेरे सगे भाई के सामने होते।
मुझे पता था कि मेरी जाँघें सहलाते-सहलाते उसका लंड भी पूरा खड़ा हो जाता था। लेकिन मुझे बुरा नहीं लगता था। ऐसा होना स्वाभाविक था। जिस तरह उसका लंड खड़ा हो जाता था, उसी तरह मेरी चूत भी पानी छोड़ने लगती थी। किसी के भी जाँघें सहलाने से कभी मेरी चूत ने इतना पानी नहीं छोड़ा था जितना मेरे छोटे भाई के सहलाने से छोड़ती थी। पता नहीं ऐसा क्यों होता था। शायद वह मेरा सगा भाई था, यही कारण था। और एक कारण शायद यह भी था कि हम सगे भाई-बहन थे और हमारे रिश्ते की मर्यादा के कारण हम बहुत ज्यादा आगे नहीं बढ़ सकते थे।
मैं चाहती थी कि वह मुझे थोड़ा खुल जाए। ताकि मैं भी थोड़ा उसके सामने खुलकर रह सकूँ और वह भी अपनी लाइफ को थोड़ा इंजॉय करे। लेकिन वह मुझसे शर्माता बहुत था। जब मैंने उसे मेरे पास लेटने को कहा तो भी कितना शर्मा गया था। लेकिन वह मेरी कोई बात टालता नहीं था। आखिरकार वह मेरे पास लेट गया। लेकिन लेटने में भी उसने मुझे दूरी बनाए रखी। आखिरकार मेरे कहने पर वह मेरे करीब आया। वो कितनी रिस्पेक्ट करता था मेरी। आखिरकार मेरा सगा छोटा भाई जो था।
मैंने सोचा क्यों ना उसे थोड़ा और करीब लाया जाए। मैंने उसे झूठ-मूठ की कहानी सुनाई कि बचपन में तुम मेरे साथ सोने की जिद करते थे और मुझसे लिपटकर मेरे पेट पर हाथ रखकर सोते थे। आज भी मेरे साथ ऐसे ही सो जाओ। पता नहीं वह इतना क्यों शर्मा रहा था। अगर कोई और होता तो मुझसे पूरा लिपट जाता। लेकिन आखिरकार वह मेरा छोटा भाई था। उसे हमारे बीच की मर्यादा का पूरा ख्याल था। और उसकी यही बात से मुझे उसपर और प्यार आ रहा था। वह बड़ी सावधानी से मेरी ओर मुड़ा और मेरे शरीर को और कहीं छू न ले, यह ख्याल करते हुए अपना हाथ मेरे पेट पर रखा। मैं भी उसे कितना परेशान कर रही थी।
लेकिन तभी मुझे झटका सा लगा। मेरे भाई का मोटा लंड मेरी जाँघों को छू गया। यह पहली बार था कि मेरे भाई का लंड इस तरह मेरी जाँघों को छू रहा था। मेरा पूरा शरीर अकड़ गया और बुर पानी छोड़ने लगी। पता नहीं ऐसा क्यों हो रहा था। किसी और के साथ मेरी चूत कभी इतना पानी नहीं छोड़ती थी। लेकिन थोड़ी देर बाद मैंने अपने आप को नॉर्मल किया। जो मैं कर रही थी उससे यह तो होना ही था। अंदर से खुशी भी हो रही थी कि मेरे सगे भाई का लंड कितना मोटा है। जिसकी भी चूत में जाएगा पूरा फैला देगा। पता नहीं कौन खुशनसीब होगी जो मेरे भाई का लंड अपनी चूत में लेगी।
मैं शर्म के मारे कुछ बोल नहीं पा रही थी। उसका लंड भी पूरा खड़ा था और बीच-बीच में झटका ले रहा था। आखिर उसकी गलती भी क्या थी। मैंने ही उसे मजबूर किया मेरे पास सोने के लिए। शायद इसीलिए वह मेरे पास सोने में शर्मा रहा था। उसे पता था उसका लंड खड़ा हो जाएगा। वो इससे बचाना चाहता था लेकिन मैंने ही बचपन की झूठी कहानी सुनाकर उसे मजबूर किया। क्या सोचता होगा मेरे बारे में कि कैसी बहन है, अपने ही भाई का लोड़ा महसूस करना चाहती है। वह तो अच्छा हुआ कि उसने थोड़ी देर बाद जाने को कहा और चला गया।
दूसरे दिन मैं सोच में पड़ गई कि उसे बुलाऊँ या नहीं। अगर नहीं बुलाऊँगी तो वह समझ जाएगा कि उसके खड़े लंड की वजह से मैंने उसे नहीं बुलाया और फिर वह अपने आप को दोष देने लगेगा। मैं यह बिल्कुल नहीं चाहती थी कि वह अपने आप को गुनहगार समझे। मैं बस यही चाहती थी कि वह मेरे साथ थोड़ा खुलकर रहे। मैंने तय कर लिया कि मैं उसे बुलाऊँगी। अगर मेरी जाँघों को सहलाते-सहलाते उसका लंड खड़ा हो जाता है तो मैं पहले अपने पास उसे लेटाऊँगी और बाद में पैर दबाने को कहूँगी। और फिर भी उसका लंड खड़ा हो गया और मेरी जाँघों को छूने लगा तो कौन सी बड़ी बात हो गई। अगर वह अपने हाथों से मुझे छू सकता है तो उसका लंड भी उसके शरीर का अंग है। क्या हो जाएगा अगर एक भाई का लंड उसकी सगी बहन को छू जाए। कौन सी बड़ी बात हो जाएगी। और अगर हमें खुलकर रहना है तो एक दूसरे को छूना हमें नॉर्मल करना होगा, चाहे वह हाथ हो या लंड। वो लंड भी कोई पराया नहीं, मेरे सगे भाई का लंड है। मैं उस लंड को अपनी चूत में तो नहीं ले रही। मैंने उसे मैसेज कर दिया।
उसे आने में थोड़ी देर लगी। शायद कल की घटना के बाद वह शर्मा रहा था। उसे देखते ही मैं मुस्कुराई और पूछा भी कि इतनी देर क्यों लगा दी। मैंने उसे पहले मेरे पास लेटने को कहा। वो छोटे बच्चों की तरह मेरी बात मानकर मेरे पास सीधा लेट गया। उसने मुझे दूरी बनाए रखी। मुझे लगा कहीं यह दूरी बढ़ न जाए और वह अपने आप को गुनहगार न समझने लगे। मैंने उसे डाँटकर मेरे पास कल की तरह ठीक से पेट पर हाथ रखकर लेटने को कहा। उसने अपना हाथ मेरे पेट पर रखा और उसका आधा खड़ा लंड मेरी जाँघों से चिपक गया। उसका आधा खड़ा लंड भी बहुत मोटा लग रहा था।
मैंने महसूस किया कि उसे अपना हाथ मेरे पेट पर रखने में दिक्कत हो रही है। हम दोनों एक ही हाइट पर लेटे थे। वो शायद मेरे स्तनों को छूने से बचना चाहता था। वैसे अगर वो मेरे स्तनों को छू लेता तो भी मुझे दिक्कत नहीं थी। उसका लंड तो मुझे अच्छे से छू रहा था तो उसका हाथ मेरे स्तनों को छूता तो क्या गलत होता। शायद पेट पर हाथ घुमाते उसका हाथ मेरे स्तनों से रगड़ खाता। उसने कभी किसी के स्तनों को हाथ नहीं लगाया होगा। क्यों ना अपनी सगी बहन के स्तनों को ही महसूस कर ले। आखिर मेरे छोटे भाई को भी पता होना चाहिए कि स्तनों को छूना कैसा लगता है। और मेरे स्तनों को तो कितने मर्दों ने सहलाया है, मसला है, चूसा है, तो मेरे भाई की क्या गलती है। सिर्फ यही कि वो मेरा सगा भाई है। जिस तरह एक माँ के स्तनों को बेटा चूसता है, उसी तरह बहन के स्तनों पर भी उसके भाई का अधिकार होना चाहिए। आखिर क्यों एक भाई अपनी ही बहन के स्तनों को छूने से डरता है। क्यों भाई अपनी ही बहन के स्तनों को नहीं चूस पाता। कितना अच्छा होता अगर जैसे बेटा माँ के स्तनों से दूध पीते हुए माँ के स्तनों को चूसता है, भाई भी अपनी बहन के स्तनों को चूस पाता। और मेरा भाई तो मेरे बेटे जैसा है।
मैं मेरे भाई की तकलीफ समझ गई। मैंने उसे थोड़ा नीचे खिसकने को कहा और मैं थोड़ा ऊपर खिसक गई। अब उसका सर बिल्कुल मेरे स्तनों की लाइन में था। वो बस मेरे स्तनों को देखे जा रहा था। स्तनों पर नज़र पड़ते ही उसका लंड झटके खाने लगा और उसके लंड के झटके महसूस करके मेरी चूत भी पानी छोड़ने लगी। मैं उसे देख सकती थी और देख भी रही थी, लेकिन वो मेरी तरफ नहीं देख सकता था। उसे अपना सर ऊपर घुमाना पड़ता। मैं देख रही थी वो कैसे मेरे स्तनों को देख रहा था। मेरी साँसें भी तेज हो गईं और मेरे स्तन भी ऊपर-नीचे होने लगे। पता नहीं कैसे मेरा भाई अपने आप को मेरे स्तनों को छूने और सहलाने से रोक रहा था। उसका हाथ भी फ्रॉक के ऊपर से मेरी नाभि को सहलाने लगा।
भाई का मेरी नाभि और पेट को सहलाना बहुत अच्छा लग रहा था। कैसा होता अगर वो अपना हाथ फ्रॉक के अंदर डालके मेरे पेट और नाभि को सहलाता। उसका हाथ सीधा मेरे नंगे पेट पर होता, ये सोचकर ही मैं रोमांच से भर गई। लेकिन फ्रॉक में ये मुमकिन भी नहीं था। ऊपर से हाथ डालता तो पहले मेरे स्तनों को छूना पड़ता और नीचे मेरी चूत पहले आती। मैंने सोचा क्यों ना फ्रॉक की बजाय टॉप और स्कर्ट पहनी जाए। इससे मेरे पेट पर उसका हाथ सीधा पहुँच पाएगा।
बस यही सोचते-सोचते मैंने अपना हाथ सर के ऊपर की तरफ कर लिया। तभी मैंने महसूस किया कि मेरा भाई लंबी-लंबी साँसें ले रहा है जैसे कुछ सूँघ रहा हो। मैंने उसकी तरफ देखा तो वो मेरी बगल सूँघ रहा था। उसका इस तरह मेरी बगल सूँघना मुझे मदहोश कर दिया। क्या कोई बगल को भी इतने प्यार से सूँघ सकता है। मेरी बगल में छोटे-छोटे बाल थे जो शायद उसे दिख रहे होंगे। मेरा सगा भाई इतने करीब से मेरी बगल के बाल देख रहा है, ये सोचके मेरी चूत में गुदगुदी होने लगी। उसका लंड भी मेरी जाँघ से बार-बार रगड़ खा रहा था। वो तो जैसे बगल सूँघने में खो सा गया था। अब उसे होश में लाना जरूरी था वरना ऐसे ही कहीं लंड से पिचकारियाँ न निकल जाएँ।
मैंने धीरे से पूछा, “क्या हुआ?”
पहले तो वो थोड़ा घबराया लेकिन फिर होशियारी से बात को संभाल भी लिया। कहने लगा, “बड़ी अच्छी खुशबू आ रही है। क्या लगाया है?”
उसकी चालाकी पर मैं हल्के से मुस्कुरा पड़ी। जैसे बहन की बगल सूँघना नॉर्मल हो। मैंने भी नॉर्मल कहा, “कुछ भी तो नहीं।”
बदमाश ने फिर जोर से मेरी बगल सूँघा और फिर पूछा, “फिर ये खुशबू कैसी?”
हमारे बीच नया नॉर्मल सेट हो रहा था। मैं भी तो यही चाहती थी। जब मैंने कहा कि कौन सा साबुन है बता, तो वो पूरा मेरी बगल में घुस गया। उसकी नाक मेरी बगल को टच हुई। उसकी साँसें मुझे बगल में महसूस होने लगीं। उसका लंड भी ऊपर-नीचे होते महसूस हुआ। मेरी चूत ने भी फिर से थोड़ा पानी छोड़ा। पता नहीं क्यों मेरी चूत मेरे सगे भाई के स्पर्श से इतना पानी छोड़ रही थी। शायद मैं भी ज्यादा उत्तेजना महसूस कर रही थी। मुझे भी अच्छा लग रहा था।
जब उसके होंठों ने मेरी बगल को छुआ तो मैं उत्तेजना से भर गई। मेरा दूसरा हाथ अपने आप मेरी चूत पर चला गया और मैंने चूत को हाथ से मसल दिया। अच्छा हुआ उसे पता नहीं चला वरना क्या सोचता। कैसी बहन है जो भाई के पास लेटी है और अपनी चूत मसल रही है। वैसे उसका लंड भी तो खड़ा था और झटके भी ले रहा था तो मेरा चूत को मसलना भी तो कुछ वैसा ही था। वो भी क्या करे बेचारा। कैसे लंड को छुपाए। लंड खड़ा होता है तो पता चल ही जाता है। ऊपर से दिख जाता है। चूत गीली होती है तो किसी को पता नहीं चलता सिवा उसके जिसकी चूत है। मुझे इतना मज़ा आ रहा था कि क्या बताऊँ। मैं चाहती थी कि वो अपने होंठ अच्छे से मेरी बगल में लगाए। इसीलिए मैंने उसे डाँटा भी कि “कितने बुद्धू हो, कुछ पता नहीं चलता तुम्हें। ठीक से बताओ।”
फिर क्या था। उसने अपने होंठ अच्छे से मेरी बगल में लगा दिए। मेरे मुँह से सिसकारी निकल गई। अब तो जैसे मेरा छोटा भाई सबकुछ भूलकर अपनी सगी बहन की बगल को चूमने लगा। जैसे उसे नाक से नहीं, होंठों से सूँघना हो। मेरी हालत भी खराब होने लगी। चूत तो पानी छोड़े जा रही थी। उसने देर तक मेरी बगल चूमी। मेरी भी बर्दाश्त से बाहर होने लगा। आखिर उसने एक साबुन का नाम लिया तो मैंने “हाँ” कह दिया और उसे अपने होंठ दूर करने पड़े। मैंने भी राहत की साँस ली।
लेकिन इस नए नॉर्मल को नॉर्मल बनाए रखना था। मैंने कहा, “कितनी देर लगी पहचानने में।” जब मैंने उसे कहा कि चल अब थोड़े पैर भी दबा दे तो जाने की बात करने लगा। मेरा मन था कि वो अब मेरी जाँघों को सहलाए लेकिन उसकी हालत खराब थी। मैं समझ गई कि अब उससे रुका नहीं जाएगा। उसे फौरन अपने लंड को हिलाके अपना पानी निकालना होगा। मैंने भी बिना सोचे उसे जल्दी जाने को कहा। वो अपने लंड को छुपाते हुए जाने लगा लेकिन उसका मोटा लंड कहाँ छुप सकता था। उसके लोअर के आगे गीला हो गया था। शायद उसका प्री-कम होगा।
उसके जाते ही मैं भी नंगी हो गई और चूत को सहलाने लगी और सोचने लगी कि मेरा भाई क्या सोचके अपना तगड़ा लंड हिलाएगा। क्या वो अपनी सगी बहन की बगल को याद करेगा। या फिर स्तनों को या फिर जाँघें। उसके होंठ अब भी मुझे मेरी बगल के ऊपर महसूस हो रहे थे। ये नया नॉर्मल कितना अच्छा लग रहा था। क्यों मैं अब तक इस सुख से दूर रही।
अब वो कल आएगा तो मैं फिर से उसे साबुन पहचानने को कहूँगी।
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