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अध्याय 1: गिरते नंबर
सुबह छह बजकर दस मिनट हुए थे जब कमरे में हल्की सी रोशनी फैलने लगी। छत का पंखा धीमी गति से घूम रहा था, उसकी आवाज़ घर की खामोशी में साफ़ सुनाई दे रही थी। रसोई से हल्की कॉफ़ी की खुशबू आने लगी थी—फ़िल्टर कॉफ़ी, जैसी हर सुबह बनती थी।
वह पहले उठ चुकी थी। हमेशा की तरह। बालों को एक साधारण जूड़े में बाँधा, चेहरे पर पानी के छींटे मारे, और अलमारी से साड़ी निकाली। आज हल्के नीले रंग की कॉटन साड़ी थी, किनारे पर पतली सफ़ेद बॉर्डर। ब्लाउज़ गहरा नीला, आस्तीन कोहनी तक, नेकलाइन सामान्य लेकिन स्तनों के उभार को पूरी तरह छुपा न पाने वाला। उसने साड़ी को कमर पर कसकर लपेटा, पल्लू को बाएँ कंधे पर डाला और उसे कमर में ठूँस दिया। उंगलियाँ कपड़े पर फिसलीं—कमर की मुलायम त्वचा, फिर थोड़ा ऊपर, जहाँ ब्लाउज़ का किनारा स्तनों के निचले हिस्से को छू रहा था। उसने दर्पण में खुद को देखा। चेहरा शांत, आँखें सख्त, लेकिन शरीर… शरीर अब भी वैसा ही था जैसा बीस साल पहले था—भरा हुआ, गोल, और जब साड़ी सही से न लपेटी जाए तो आसानी से ध्यान खींचने वाला।
वह रसोई में गई। गैस ऑन किया, दूध गरम किया, कॉफ़ी पाउडर डाला। उसी समय बेटे के कमरे से हलचल सुनाई दी। दरवाज़ा खुला। वह निकल आया—नीली टी-शर्ट, काले शॉर्ट्स, बाल बिखरे हुए। उन्नीस साल का हो चुका था, कंधे चौड़े हो गए थे, आवाज़ में भारीपन आ गया था। लेकिन आँखें… आँखें अभी भी उसी लड़के जैसी लगतीं जब वह होमवर्क दिखाता था।
“सुबह हो गई,” उसने बिना मुड़े कहा। “नहा लो। नाश्ता ठंडा पड़ जाएगा।”
वह रगड़ते हुए बाथरूम की तरफ़ गया। पानी की आवाज़ आने लगी। वह टिफ़िन पैक करने लगी—पराठे, दही, अचार। हर दिन का काम। लेकिन आज मन थोड़ा बेचैन था। पिछले तीन महीनों से उसके नंबर गिर रहे थे। पहले अस्सी-नब्बे आते थे, अब साठ के आसपास ठहर गए थे। टीचर ने फोन किया था। “ध्यान नहीं दे रहा। क्लास में किसी और दुनिया में रहता है।”
वह जानती थी। लेकिन वजह का अंदाज़ा नहीं था… अभी तक।
नाश्ते की मेज़ पर दोनों बैठे। उसने उसके सामने प्लेट रखी। वह खा रहा था, लेकिन निगाहें बार-बार उसकी तरफ़ जा रही थीं। साड़ी का पल्लू थोड़ा सरक गया था। ब्लाउज़ के ऊपर से स्तनों का उभार साफ़ दिख रहा था। जब वह झुककर अचार का डिब्बा आगे बढ़ाती, तो गला और हल्का सा क्लीवेज नज़र आता। उसने नोटिस किया कि उसका चम्मच हवा में रुका हुआ है।
“खाओ,” उसने शांत लेकिन सख्त आवाज़ में कहा। “देर हो जाएगी।”
वह झट से निगाहें झुका लिया। लेकिन कान लाल हो गए थे।
कॉलेज छोड़ने के बाद घर फिर खामोश हो गया। उसने कपड़े धोए, फर्श पोछा, दोपहर का खाना बनाया। हर काम में वही सख्ती थी जो हमेशा रहती थी। लेकिन दिमाग में एक बात घूम रही थी—पिछली हफ़्ते की महिलाओं की बैठक।
शाम को चार बजे पड़ोस की मीना आई थी चाय पर। फिर सुनीता, फिर रमा। बातें घूम-फिरकर बच्चों पर आ गईं। मीना ने हँसते हुए कहा था, “तुम्हारा बेटा तो अब जवान हो गया है न? मेरी बेटी कहती है क्लास में लड़कियों को घूरता रहता है।” रमा ने जोड़ दिया, “बाजार में भी… कल देखा, शालिनी के ब्लाउज़ पर इतनी देर तक निगाहें गड़ाए खड़ा था जैसे कुछ और दिख ही न रहा हो।” सब हँसे। उसने भी होंठों पर मुस्कान लाई, लेकिन अंदर कुछ बैठ गया।
शाम को वह लौटा। बैग फेंका, पानी पिया, और कमरे में चला गया। उसने आवाज़ दी, “होमवर्क निकालो। टेबल पर बैठो।”
डाइनिंग टेबल पर ट्यूबलाइट जल रही थी। वह साड़ी में ही बैठी थी। पल्लू ठीक से ठूँसा हुआ। वह गणित के सवाल हल कर रहा था। वह पास खड़ी होकर देख रही थी। कभी-कभी झुककर पेन से काटती, सही तरीका बताती। जब झुकती तो साड़ी का पल्लू आगे सरक जाता। ब्लाउज़ का गहरा हिस्सा और स्तनों के बीच की नरम रेखा साफ़ दिख जाती। उसने देखा कि उसकी साँसें तेज़ हो गई हैं। पेन की नोक कागज़ पर रुकी हुई है।
“ध्यान कहाँ है?” उसने पूछा। आवाज़ में वही सख्ती थी।
“इधर ही है,” उसने जल्दी से कहा, लेकिन आँखें उसकी छाती से हटने में वक्त लगा रही थीं।
रात के खाने के बाद वह नहाने चली गई। बाथरूम से निकलकर नाइटी पहनी—हल्की गुलाबी कॉटन, घुटनों तक, आस्तीन छोटी, नेकलाइन गोल। कपड़ा पतला था। नहाए हुए शरीर की गर्मी से वह जगह-जगह शरीर से चिपक गया था। स्तनों के उभार साफ़ उभर आए थे, निपल्स की हल्की रूपरेखा दिख रही थी। वह उसके कमरे के पास से गुज़री। दरवाज़ा खुला था। वह किताब लिए लेटा था, लेकिन आँखें दरवाज़े पर थीं।
उसने एक पल के लिए रुककर पूछा, “पानी चाहिए?”
वह सिर हिला न पाया। सिर्फ़ देखा। नाइटी के नीचे शरीर की गोलाई, जाँघों की नरम रेखा, और जब वह मुड़ी तो पीठ के निचले हिस्से का हल्का उभार।
वह अपने कमरे में चली गई। बिस्तर पर लेटकर छत की तरफ़ देखा। पंखा घूम रहा था। मन में एक सवाल बार-बार उठ रहा था—क्या सच में…?
अगले कुछ दिनों में वही दिनचर्या दोहराई गई। सुबह साड़ी, नाश्ता, कॉलेज, शाम को होमवर्क, रात को नाइटी। लेकिन हर बार उसकी निगाहें थोड़ी देर और ठहरने लगीं। जब वह रसोई में खड़ी होकर आटा गूँधती, कमर पर साड़ी कसी हुई, ब्लाउज़ तना हुआ—वह दरवाज़े पर खड़ा होकर देखता। जब वह कपड़े सुखाती, हाथ ऊपर उठाती, तो ब्लाउज़ और ऊपर खिंच जाता। एक दिन पल्लू पूरी तरह सरक गया। उसने ठीक किया, लेकिन जानबूझकर धीरे। उसकी साँस रुक गई थी।
तीसरे दिन शाम को महिलाओं की छोटी सी मुलाकात फिर हुई। इस बार बात और साफ़ निकली। सुनीता ने धीमे से कहा, “तुम्हारा बेटा अब औरतों को देखकर… तुम समझ ही गई होगी। मेरा भतीजा भी ऐसा ही था। नंबर गिरने लगे थे।”
रात को खाना खाते समय उसने उसे ध्यान से देखा। वह खाना खा रहा था, लेकिन बार-बार उसकी ओर देख रहा था—साड़ी के पल्लू पर, ब्लाउज़ के उभार पर, जब वह हाथ बढ़ाती तो बाँहों की मुलायम त्वचा पर।
खाना खत्म होने के बाद उसने साफ़-साफ़ कहा, “आज से होमवर्क दो घंटे ज़्यादा करोगे। नंबर और गिरे तो फोन बंद।”
वह सिर झुकाए बैठा रहा। लेकिन जब वह नाइटी पहनकर वापस आई, तो उसकी आँखें फिर से उसी जगह ठहर गईं जहाँ नाइटी शरीर से चिपक रही थी।
उस रात वह देर तक जागती रही। खिड़की से हल्की हवा आ रही थी। मन में दो बातें उलझी हुई थीं—चिंता कि बेटा बिगड़ रहा है, और एक अजीब सा अहसास कि उसकी निगाहें अब सिर्फ़ बाहर की औरतों पर नहीं, घर के अंदर भी रुकने लगी हैं।
उसने धीरे से फुसफुसाया, अपने आप से, “अगर सच में… तो?”
लेकिन जवाब अभी नहीं मिला था। सिर्फ़ एक बात तय थी—वह और ध्यान से देखेगी। हर छोटी हरकत, हर निगाह, हर साँस।
सुबह फिर वही साड़ी। वही कॉफ़ी। वही सख्त आवाज़। लेकिन अब हर बार जब पल्लू सरकता, जब ब्लाउज़ तनता, जब नाइटी चिपकती—वह जानती थी कि कोई देख रहा है। और वह देखना… रोक नहीं रही थी।
अभी सिर्फ़ देखना था।
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**अध्याय 2: परीक्षा**
सुबह सात बजकर पाँच मिनट हुए थे। घर में फिर वही हल्की कॉफ़ी की खुशबू तैर रही थी, लेकिन आज हवा में कुछ और भी था—एक खामोश इरादा।
वह साड़ी चुन रही थी। अलमारी [के सामने खड़ी, उंगलियाँ कपड़ों पर फेरती हुई। आज की साड़ी हल्की गुलाबी थी, पतली कॉटन, गर्मी में चिपकने वाली। ब्लाउज़ गहरा गुलाबी, थोड़ा टाइट। उसने जानबूझकर ब्लाउज़ का हुक सबसे ऊपर वाला ढीला छोड़ दिया। पल्लू को कमर में ठूँसते समय उंगलियाँ अपनी ही कमर की नमी पर रुकीं। दर्पण में देखा—स्तनों का उभार साफ़, और जब थोड़ा सा झुकती तो ब्लाउज़ के गले से हल्की रेखा नज़र आती।
बेटा बाथरूम से निकला। बाल गीले, टी-शर्ट शरीर से चिपकी हुई। उसकी निगाहें तुरंत माँ पर गईं। साड़ी का पल्लू आज थोड़ा ज्यादा सरका हुआ था। ब्लाउज़ का ढीला हुक स्तनों के बीच की नरम गहराई को एक पल के लिए खोल रहा था।
“नाश्ता लगा दो,” उसने सामान्य आवाज़ में कहा, जैसे कुछ भी अलग न हो।
मेज़ पर बैठते समय वह जानबूझकर उसके सामने वाली कुर्सी पर बैठी। पराठा परोसा। जब आगे झुकी तो पल्लू और सरक गया। ब्लाउज़ तन गया। स्तनों का पूरा गोल आकार कपड़े के नीचे उभर आया। उसने देखा कि बेटे का हाथ रुक गया। चम्मच दही में डूबा रहा। आँखें उसकी छाती पर जमी हुई थीं—एक, दो, तीन सेकंड। फिर वह झट से निगाहें झुका लिया, लेकिन गला सूखा हुआ लग रहा था।
“खाते समय इधर-उधर मत देखो,” उसने शांत स्वर में कहा। “समय बर्बाद मत करो।”
वह जल्दी-जल्दी खाने लगा। लेकिन कान के लौ लाल हो चुके थे।
कॉलेज छोड़ने के बाद घर फिर खाली हो गया। अब परीक्षा का समय था। उसने तय किया था—आज पूरी तरह टेस्ट करेगी।
दोपहर दो बजे। धूप खिड़की से अंदर आ रही थी। वह लिविंग रूम में कपड़े मोड़ रही थी। साड़ी अभी भी गुलाबी वाली। पल्लू जानबूझकर कमर से थोड़ा बाहर निकाल लिया था। जब वह झुककर फर्श से कपड़ा उठाती, तो ब्लाउज़ के गले से स्तनों का ऊपरी नरम हिस्सा साफ़ दिख जाता। एक बार तो पल्लू पूरी तरह कंधे से सरक गया। उसने उसे वापस नहीं डाला तुरंत। बल्कि धीरे-धीरे, उंगलियों से स्तन के उभार को छूते हुए ठीक किया—जैसे संयोग से।
ठीक उसी समय दरवाज़े पर आहट हुई। बेटा कॉलेज से जल्दी लौट आया था। बैग हाथ में, पसीना माथे पर।
वह मुड़ी। पल्लू अभी भी आधा सरका हुआ। ब्लाउज़ का ढीला हुक खुला। स्तनों के बीच की गहरी रेखा धूप में चमक रही थी।
उसकी आँखें वहीं अटक गईं। बैग हाथ से छूटने वाला था। साँस एक पल के लिए रुक गई। गला हिला। फिर जल्दी से निगाहें घुमा लीं, लेकिन चेहरा लाल हो चुका था।
“इतनी जल्दी?” उसने सामान्य स्वर में पूछा। आवाज़ में कोई बदलाव नहीं।
“टीचर… छुट्टी दे दी,” उसने कहा, आवाज़ थोड़ी कटी-कटी।
“अच्छा। पानी पी लो। फिर होमवर्क निकालो।”
वह रसोई की तरफ़ गया। उसने देखा कि उसकी चाल में अजीब सा अकड़ाव है। जैसे शरीर में कोई तनाव हो।
तीन बजे। अब असली टेस्ट।
वह नहाने चली गई। बाथरूम का दरवाज़ा जानबूझकर पूरा बंद नहीं किया—एक इंच का गैप छोड़ दिया। पानी की आवाज़ आने लगी। उसने साड़ी उतारी, ब्लाउज़ के हुक खोले। गीले शरीर पर साबुन लगाते समय जानबूझकर धीरे-धीरे हाथ फेरती रही। स्तनों को दोनों हाथों से उठाया, साबुन लगाया, निपल्स पर उंगलियाँ घुमाईं। कमर, जाँघें, फिर पीठ। पानी की धार शरीर पर बह रही थी।
बाहर बेटा होमवर्क के बहाने डाइनिंग टेबल पर बैठा था, लेकिन किताब खुली हुई थी और आँखें बार-बार बाथरूम के गैप पर जा रही थीं। धुंधली सी आकृति दिख रही थी—गोल कंधे, स्तनों का हिलना, कमर का मुड़ना।
नहाकर निकली तो नाइटी पहनी हुई थी। आज की नाइटी सफ़ेद थी, बहुत पतली। नहाए हुए शरीर की नमी से कपड़ा पूरी तरह चिपक गया था। स्तनों के उभार साफ़, निपल्स की काली नोकें कपड़े से उभर आई थीं। जाँघों के बीच की नरम रेखा एक पल के लिए दिखी जब उसने कदम बढ़ाया।
वह सीधे उसके पास गई। टेबल पर खड़ी होकर उसके नोटबुक पर झुकी।
“यह वाला सवाल गलत है,” उसने कहा। आवाज़ बहुत पास से आ रही थी। जब झुकी तो सफ़ेद नाइटी का ऊपरी हिस्सा उसके कंधे से छू गया। एक स्तन का नरम, गर्म भार उसकी बाँह पर पड़ा।
बेटे का पूरा शरीर अकड़ गया। पेन गिरने वाला था। साँसें तेज़ हो गईं। आँखें झुकी हुई थीं, लेकिन वह देख सकता था—नाइटी के नीचे त्वचा की रंगत, निपल की नोक जो कपड़े को नोंच रही थी।
उसने जानबूझकर और दो सेकंड वैसे ही रही। फिर धीरे से सीधी हुई।
“सुधारो,” उसने कहा। “मैं रसोई में हूँ।”
रसोई में जाकर उसने चाय बनाई। दिल तेज़ धड़क रहा था। टेस्ट काम कर रहा था। उसने साफ़ देख लिया था—उसकी आँखों में वही भूख थी जो महिलाओं की गपशप में सुनाई थी। निगाहें सिर्फ़ चेहरे पर नहीं रुकती थीं। शरीर पर ठहरती थीं। स्तनों पर, कमर पर, जाँघों पर।
शाम को खाना बनाते समय उसने और टेस्ट किया। साड़ी फिर से पहन ली थी—गुलाबी वाली ही। पल्लू बार-बार सरकाया। जब गैस पर खड़ी होकर मसाला भून रही थी, तो जानबूझकर कमर थोड़ी और ऐंठी। ब्लाउज़ तन गया। पीछे से बेटा पानी लेने आया।
उसने मुड़े बिना कहा, “गिलास ऊपर की शेल्फ़ पर है।”
वह पहुँचने के लिए पास आया। उसकी छाती माँ की पीठ से कुछ ही इंच दूर थी। साड़ी की गंध, उसके शरीर की हल्की पसीने की खुशबू। जब उसने हाथ बढ़ाया तो ब्लाउज़ का किनारा और तन गया। स्तनों का साइड उभार साफ़ दिख रहा था।
बेटे का हाथ थोड़ा काँपा। गिलास लेते समय उंगलियाँ शेल्फ़ पर फिसलीं।
“सावधान,” उसने धीमी आवाज़ में कहा। “तोड़ मत देना।”
रात के खाने के समय मेज़ पर फिर वही नज़दीकी। उसने जानबूझकर उसके बिल्कुल बगल वाली कुर्सी पर बैठकर खाना परोसा। जब रोटी देती तो उंगलियाँ उसकी उंगलियों से छू जातीं। एक बार तो रोटी देते समय पल्लू पूरी तरह कंधे से उतर गया। स्तनों का ऊपरी गोल हिस्सा ब्लाउज़ के ऊपर से झलक गया।
बेटा निगल न पाया। गला सूखा। आँखें वहीं अटकी रहीं—दो sequent सेकंड, फिर तीन।
उसने धीरे से पल्लू ठीक किया। उंगलियाँ अपने ही स्तन के उभार पर फिर गईं।
“खाना ठंडा हो जाएगा,” उसने सामान्य स्वर में कहा।
रात को दस बजे। होमवर्क खत्म होने के बाद वह नाइटी में वापस आई। इस बार नाइटी का एक बटन जानबूझकर खुला छोड़ दिया था। गले से लेकर स्तनों की शुरुआत तक की त्वचा दिख रही थी।
वह उसके कमरे के दरवाज़े पर खड़ी हुई।
“कल मैथ्स का टेस्ट है न? दोबारा दोहरा लो।”
वह बिस्तर पर बैठा था। आँखें तुरंत खुले बटन पर चली गईं। नाइटी के अंदर स्तनों की नरम गोलाई, और जब वह थोड़ा सा झुकी तो और गहराई दिखी।
“माँ…” उसकी आवाज़ भारी थी।
“Hmm?” उसने पूछा, जैसे कुछ पता ही न हो।
वह कुछ कह न पाया। सिर्फ़ देखा। साँसें तेज़।
उसने एक पल और वहाँ खड़ी रही। फिर धीरे से मुड़ी और अपने कमरे में चली गई। दरवाज़ा बंद करते समय पीछे मुड़कर एक बार देखा—बेटा अभी भी उसी पोज़ में बैठा था, आँखें उस जगह पर जहाँ वह खड़ी थी।
कमरे में आकर उसने दर्पण के सामने खड़े होकर खुद को देखा। नाइटी चिपक रही थी। शरीर गर्म था। दिल तेज़ धड़क रहा था—डर से नहीं, किसी और चीज़ से।
टेस्ट पूरा हो चुका था।
सच था।
उसकी निगाहें अब सिर्फ़ बाहर की औरतों पर नहीं थीं। घर के अंदर, उसकी माँ के शरीर पर ठहरने लगी थीं। स्तन, कमर, जाँघें—हर वो जगह जो साड़ी या नाइटी छुपा न पाए।
वह बिस्तर पर लेट गई। पंखा घूम रहा था। मन में उथल-पुथल मची थी। चिंता थी—बेटा बिगड़ रहा है, पढ़ाई छूट रही है। गुस्सा था—ऐसी निगाहों का। लेकिन उसके नीचे एक और भावना थी… एक अजीब सा, दबा हुआ अहसास कि उसकी चाहत अब उसी पर टिक गई है। और वह चाहत… कंट्रोल की जा सकती है।
उसने धीरे से आँखें बंद कीं।
कल से और ध्यान से देखेगी। और धीरे-धीरे… परीक्षा को और आगे बढ़ाएगी।
लेकिन अभी नहीं। अभी सिर्फ़ इतना काफी था कि सच सामने आ चुका था।
रात गहरी होती गई। घर खामोश था। लेकिन दोनों कमरों में नींद आसानी से नहीं आ रही थी।
एक कमरे में बेटा लेटा था, आँखें बंद करके भी वही दृश्य देख रहा था—सरकती साड़ी, चिपकती नाइटी, खुला बटन, और वह नरम, गोल शरीर जो अब उसकी नींद में भी घूम रहा था।
दूसरे कमरे में माँ लेटी थी, हाथ सीने पर रखे, दिल की धड़कन गिनती हुई… और यह सोचती हुई कि अब आगे क्या करना है।
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अध्याय 2 यहाँ समाप्त होता है।
क्या मैं अध्याय 3 पर आगे बढ़ूँ?
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Very interesting story,... please continue
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(27-07-2026, 01:48 AM)arushpala Wrote: **अध्याय 2: परीक्षा**
सुबह सात बजकर पाँच मिनट हुए थे। घर में फिर वही हल्की कॉफ़ी की खुशबू तैर रही थी, लेकिन आज हवा में कुछ और भी था—एक खामोश इरादा।
वह साड़ी चुन रही थी। अलमारी [के सामने खड़ी, उंगलियाँ कपड़ों पर फेरती हुई। आज की साड़ी हल्की गुलाबी थी, पतली कॉटन, गर्मी में चिपकने वाली। ब्लाउज़ गहरा गुलाबी, थोड़ा टाइट। उसने जानबूझकर ब्लाउज़ का हुक सबसे ऊपर वाला ढीला छोड़ दिया। पल्लू को कमर में ठूँसते समय उंगलियाँ अपनी ही कमर की नमी पर रुकीं। दर्पण में देखा—स्तनों का उभार साफ़, और जब थोड़ा सा झुकती तो ब्लाउज़ के गले से हल्की रेखा नज़र आती।
बेटा बाथरूम से निकला। बाल गीले, टी-शर्ट शरीर से चिपकी हुई। उसकी निगाहें तुरंत माँ पर गईं। साड़ी का पल्लू आज थोड़ा ज्यादा सरका हुआ था। ब्लाउज़ का ढीला हुक स्तनों के बीच की नरम गहराई को एक पल के लिए खोल रहा था।
“नाश्ता लगा दो,” उसने सामान्य आवाज़ में कहा, जैसे कुछ भी अलग न हो।
मेज़ पर बैठते समय वह जानबूझकर उसके सामने वाली कुर्सी पर बैठी। पराठा परोसा। जब आगे झुकी तो पल्लू और सरक गया। ब्लाउज़ तन गया। स्तनों का पूरा गोल आकार कपड़े के नीचे उभर आया। उसने देखा कि बेटे का हाथ रुक गया। चम्मच दही में डूबा रहा। आँखें उसकी छाती पर जमी हुई थीं—एक, दो, तीन सेकंड। फिर वह झट से निगाहें झुका लिया, लेकिन गला सूखा हुआ लग रहा था।
“खाते समय इधर-उधर मत देखो,” उसने शांत स्वर में कहा। “समय बर्बाद मत करो।”
वह जल्दी-जल्दी खाने लगा। लेकिन कान के लौ लाल हो चुके थे।
कॉलेज छोड़ने के बाद घर फिर खाली हो गया। अब परीक्षा का समय था। उसने तय किया था—आज पूरी तरह टेस्ट करेगी।
दोपहर दो बजे। धूप खिड़की से अंदर आ रही थी। वह लिविंग रूम में कपड़े मोड़ रही थी। साड़ी अभी भी गुलाबी वाली। पल्लू जानबूझकर कमर से थोड़ा बाहर निकाल लिया था। जब वह झुककर फर्श से कपड़ा उठाती, तो ब्लाउज़ के गले से स्तनों का ऊपरी नरम हिस्सा साफ़ दिख जाता। एक बार तो पल्लू पूरी तरह कंधे से सरक गया। उसने उसे वापस नहीं डाला तुरंत। बल्कि धीरे-धीरे, उंगलियों से स्तन के उभार को छूते हुए ठीक किया—जैसे संयोग से।
ठीक उसी समय दरवाज़े पर आहट हुई। बेटा कॉलेज से जल्दी लौट आया था। बैग हाथ में, पसीना माथे पर।
वह मुड़ी। पल्लू अभी भी आधा सरका हुआ। ब्लाउज़ का ढीला हुक खुला। स्तनों के बीच की गहरी रेखा धूप में चमक रही थी।
उसकी आँखें वहीं अटक गईं। बैग हाथ से छूटने वाला था। साँस एक पल के लिए रुक गई। गला हिला। फिर जल्दी से निगाहें घुमा लीं, लेकिन चेहरा लाल हो चुका था।
“इतनी जल्दी?” उसने सामान्य स्वर में पूछा। आवाज़ में कोई बदलाव नहीं।
“टीचर… छुट्टी दे दी,” उसने कहा, आवाज़ थोड़ी कटी-कटी।
“अच्छा। पानी पी लो। फिर होमवर्क निकालो।”
वह रसोई की तरफ़ गया। उसने देखा कि उसकी चाल में अजीब सा अकड़ाव है। जैसे शरीर में कोई तनाव हो।
तीन बजे। अब असली टेस्ट।
वह नहाने चली गई। बाथरूम का दरवाज़ा जानबूझकर पूरा बंद नहीं किया—एक इंच का गैप छोड़ दिया। पानी की आवाज़ आने लगी। उसने साड़ी उतारी, ब्लाउज़ के हुक खोले। गीले शरीर पर साबुन लगाते समय जानबूझकर धीरे-धीरे हाथ फेरती रही। स्तनों को दोनों हाथों से उठाया, साबुन लगाया, निपल्स पर उंगलियाँ घुमाईं। कमर, जाँघें, फिर पीठ। पानी की धार शरीर पर बह रही थी।
बाहर बेटा होमवर्क के बहाने डाइनिंग टेबल पर बैठा था, लेकिन किताब खुली हुई थी और आँखें बार-बार बाथरूम के गैप पर जा रही थीं। धुंधली सी आकृति दिख रही थी—गोल कंधे, स्तनों का हिलना, कमर का मुड़ना।
नहाकर निकली तो नाइटी पहनी हुई थी। आज की नाइटी सफ़ेद थी, बहुत पतली। नहाए हुए शरीर की नमी से कपड़ा पूरी तरह चिपक गया था। स्तनों के उभार साफ़, निपल्स की काली नोकें कपड़े से उभर आई थीं। जाँघों के बीच की नरम रेखा एक पल के लिए दिखी जब उसने कदम बढ़ाया।
वह सीधे उसके पास गई। टेबल पर खड़ी होकर उसके नोटबुक पर झुकी।
“यह वाला सवाल गलत है,” उसने कहा। आवाज़ बहुत पास से आ रही थी। जब झुकी तो सफ़ेद नाइटी का ऊपरी हिस्सा उसके कंधे से छू गया। एक स्तन का नरम, गर्म भार उसकी बाँह पर पड़ा।
बेटे का पूरा शरीर अकड़ गया। पेन गिरने वाला था। साँसें तेज़ हो गईं। आँखें झुकी हुई थीं, लेकिन वह देख सकता था—नाइटी के नीचे त्वचा की रंगत, निपल की नोक जो कपड़े को नोंच रही थी।
उसने जानबूझकर और दो सेकंड वैसे ही रही। फिर धीरे से सीधी हुई।
“सुधारो,” उसने कहा। “मैं रसोई में हूँ।”
रसोई में जाकर उसने चाय बनाई। दिल तेज़ धड़क रहा था। टेस्ट काम कर रहा था। उसने साफ़ देख लिया था—उसकी आँखों में वही भूख थी जो महिलाओं की गपशप में सुनाई थी। निगाहें सिर्फ़ चेहरे पर नहीं रुकती थीं। शरीर पर ठहरती थीं। स्तनों पर, कमर पर, जाँघों पर।
शाम को खाना बनाते समय उसने और टेस्ट किया। साड़ी फिर से पहन ली थी—गुलाबी वाली ही। पल्लू बार-बार सरकाया। जब गैस पर खड़ी होकर मसाला भून रही थी, तो जानबूझकर कमर थोड़ी और ऐंठी। ब्लाउज़ तन गया। पीछे से बेटा पानी लेने आया।
उसने मुड़े बिना कहा, “गिलास ऊपर की शेल्फ़ पर है।”
वह पहुँचने के लिए पास आया। उसकी छाती माँ की पीठ से कुछ ही इंच दूर थी। साड़ी की गंध, उसके शरीर की हल्की पसीने की खुशबू। जब उसने हाथ बढ़ाया तो ब्लाउज़ का किनारा और तन गया। स्तनों का साइड उभार साफ़ दिख रहा था।
बेटे का हाथ थोड़ा काँपा। गिलास लेते समय उंगलियाँ शेल्फ़ पर फिसलीं।
“सावधान,” उसने धीमी आवाज़ में कहा। “तोड़ मत देना।”
रात के खाने के समय मेज़ पर फिर वही नज़दीकी। उसने जानबूझकर उसके बिल्कुल बगल वाली कुर्सी पर बैठकर खाना परोसा। जब रोटी देती तो उंगलियाँ उसकी उंगलियों से छू जातीं। एक बार तो रोटी देते समय पल्लू पूरी तरह कंधे से उतर गया। स्तनों का ऊपरी गोल हिस्सा ब्लाउज़ के ऊपर से झलक गया।
बेटा निगल न पाया। गला सूखा। आँखें वहीं अटकी रहीं—दो sequent सेकंड, फिर तीन।
उसने धीरे से पल्लू ठीक किया। उंगलियाँ अपने ही स्तन के उभार पर फिर गईं।
“खाना ठंडा हो जाएगा,” उसने सामान्य स्वर में कहा।
रात को दस बजे। होमवर्क खत्म होने के बाद वह नाइटी में वापस आई। इस बार नाइटी का एक बटन जानबूझकर खुला छोड़ दिया था। गले से लेकर स्तनों की शुरुआत तक की त्वचा दिख रही थी।
वह उसके कमरे के दरवाज़े पर खड़ी हुई।
“कल मैथ्स का टेस्ट है न? दोबारा दोहरा लो।”
वह बिस्तर पर बैठा था। आँखें तुरंत खुले बटन पर चली गईं। नाइटी के अंदर स्तनों की नरम गोलाई, और जब वह थोड़ा सा झुकी तो और गहराई दिखी।
“माँ…” उसकी आवाज़ भारी थी।
“Hmm?” उसने पूछा, जैसे कुछ पता ही न हो।
वह कुछ कह न पाया। सिर्फ़ देखा। साँसें तेज़।
उसने एक पल और वहाँ खड़ी रही। फिर धीरे से मुड़ी और अपने कमरे में चली गई। दरवाज़ा बंद करते समय पीछे मुड़कर एक बार देखा—बेटा अभी भी उसी पोज़ में बैठा था, आँखें उस जगह पर जहाँ वह खड़ी थी।
कमरे में आकर उसने दर्पण के सामने खड़े होकर खुद को देखा। नाइटी चिपक रही थी। शरीर गर्म था। दिल तेज़ धड़क रहा था—डर से नहीं, किसी और चीज़ से।
टेस्ट पूरा हो चुका था।
सच था।
उसकी निगाहें अब सिर्फ़ बाहर की औरतों पर नहीं थीं। घर के अंदर, उसकी माँ के शरीर पर ठहरने लगी थीं। स्तन, कमर, जाँघें—हर वो जगह जो साड़ी या नाइटी छुपा न पाए।
वह बिस्तर पर लेट गई। पंखा घूम रहा था। मन में उथल-पुथल मची थी। चिंता थी—बेटा बिगड़ रहा है, पढ़ाई छूट रही है। गुस्सा था—ऐसी निगाहों का। लेकिन उसके नीचे एक और भावना थी… एक अजीब सा, दबा हुआ अहसास कि उसकी चाहत अब उसी पर टिक गई है। और वह चाहत… कंट्रोल की जा सकती है।
उसने धीरे से आँखें बंद कीं।
कल से और ध्यान से देखेगी। और धीरे-धीरे… परीक्षा को और आगे बढ़ाएगी।
लेकिन अभी नहीं। अभी सिर्फ़ इतना काफी था कि सच सामने आ चुका था।
रात गहरी होती गई। घर खामोश था। लेकिन दोनों कमरों में नींद आसानी से नहीं आ रही थी।
एक कमरे में बेटा लेटा था, आँखें बंद करके भी वही दृश्य देख रहा था—सरकती साड़ी, चिपकती नाइटी, खुला बटन, और वह नरम, गोल शरीर जो अब उसकी नींद में भी घूम रहा था।
दूसरे कमरे में माँ लेटी थी, हाथ सीने पर रखे, दिल की धड़कन गिनती हुई… और यह सोचती हुई कि अब आगे क्या करना है।
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अध्याय 2 यहाँ समाप्त होता है।
क्या मैं अध्याय 3 पर आगे बढ़ूँ?
Kahani to acchi lag rahi hai but kahne ka tareeka majedar nahi hai. Sentences poore nahi hai. Aisa lagta hai jaise kahani fast forward me chal rahi hai ya fir aise jaise kisi AI app se likhwayi gayi hai. Sex story me reader ko time chahiye hota hai imagination ka but yaha cheeje itni teji se ho rahi hai ki samajh hi nahi aa raha
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**पार्ट 3**
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**सीन 1**
शाम के लगभग साढ़े छह बज रहे थे।
रसोई में गैस की आँच हल्की जल रही थी। मसाले की खुशबू पूरे घर में फैल चुकी थी। वह गुलाबी साड़ी में ही थी। पल्लू इस बार थोड़ा संभाला हुआ था, लेकिन ब्लाउज़ का ऊपर वाला हुक फिर से जानबूझकर ढीला छोड़ दिया गया था। जब भी वह हाथ ऊपर उठाकर मसाला डिब्बे को हिलाती, ब्लाउज़ तन जाता और स्तनों का भारी उभार साफ़ उभर आता।
बेटा डाइनिंग टेबल पर बैठा होमवर्क कर रहा था। लेकिन उसकी निगाहें बार-बार रसोई के दरवाज़े की तरफ़ उठ जातीं।
माँ ने एक पल के लिए आँच मंद की। फिर धीरे से आवाज़ दी,
“इधर आना एक मिनट।”
बेटा उठकर आया। रसोई के दरवाज़े पर खड़ा हो गया। उसकी साँसें पहले से ही थोड़ी तेज़ थीं।
माँ ने बिना मुड़े कहा,
“ऊपर वाली शेल्फ़ पर हल्दी का डिब्बा है। मुझे दे दो।”
शेल्फ़ ऊँची थी। उसे पूरा हाथ ऊपर उठाना पड़ा। जब वह पहुँचा तो उसकी छाती माँ की पीठ से बस दो-तीन इंच दूर रह गई। साड़ी की हल्की खुशबू और उसके शरीर की गरमाहट साफ़ महसूस हो रही थी।
माँ जानबूझकर थोड़ी सी और पीछे सरक गई। अब उसकी पीठ बेटे की छाती से लगभग छू रही थी।
बेटे का हाथ शेल्फ़ पर पहुँचा, लेकिन उंगलियाँ काँप रही थीं। डिब्बा पकड़ते समय उसकी साँस रुक गई। माँ ने धीरे से सिर घुमाया। बस आधा चेहरा दिखा। उसकी आँखें बेटे की आँखों से मिलीं।
बेटे के गाल तुरंत लाल हो गए। आँखें चौड़ी हुईं, फिर झुक गईं। गला जोर से हिला। उसके होठ थोड़े खुले रह गए जैसे कोई बात कहना चाहता हो लेकिन आवाज़ न निकले। माथे पर हल्की नसें उभर आईं।
माँ ने डिब्बा लिया। उंगलियाँ बेटे की उंगलियों से एक पल के लिए छू गईं।
उसने महसूस किया कि बेटे की उंगलियाँ ठंडी और काँप रही हैं।
“रख दो वहीं,” उसने शांत आवाज़ में कहा।
फिर सामान्य स्वर में आगे बोली, “जाओ, होमवर्क करो। खाना तैयार हो रहा है।”
बेटा पीछे हटा। लेकिन हटते समय उसकी निगाहें एक बार फिर माँ के ब्लाउज़ के खुले हिस्से पर चली गईं। स्तनों के बीच की नरम रेखा साफ़ दिख रही थी। उसने जल्दी से निगाहें फेर लीं और बाहर चला गया। चलते समय उसके कंधे थोड़े अकड़े हुए थे।
माँ अकेली रह गई। गैस के सामने खड़ी रही। दिल तेज़ धड़क रहा था।
एक पल के लिए उसने पल्लू ठीक करने का सोचा… लेकिन नहीं किया।
“देखना है… अभी और देखना है कि वो कितना संभाल पाता है।”
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**सीन 2**
रात के लगभग साढ़े नौ बज चुके थे।
खाना खा लिया गया था। बर्तन धुल चुके थे। घर में अब सिर्फ़ ट्यूबलाइट की हल्की रोशनी थी और पंखे की आवाज़।
वह नहाकर आ चुकी थी। इस बार नाइटी हल्की नीली थी, फिर से पतली कॉटन की। नहाए हुए शरीर की नमी से कपड़ा जगह-जगह चिपक गया था। स्तनों का उभार साफ़ था। निपल्स की नोकें कपड़े के नीचे हल्की-हल्की उभर रही थीं। जाँघों के ऊपरी हिस्से पर कपड़ा थोड़ा ऊपर सरक आया था।
वह डाइनिंग टेबल के पास गई जहाँ बेटा होमवर्क कर रहा था।
एक पल के लिए वह थोड़ी दूर खड़ी रही। दिल जोर से धड़क रहा था। मन में आवाज़ आई –
“बहुत पास मत जा… कल काफी हो गया था…”
लेकिन अगले ही पल उसने खुद को धक्का दिया।
“टेस्ट पूरा नहीं हुआ है अभी।”
वह धीरे से उसके बिल्कुल बगल वाली कुर्सी पर बैठ गई। इतनी पास कि उनके कंधे लगभग छू रहे थे। नाइटी का कपड़ा बेटे की बाँह से हल्का सा रगड़ गया।
बेटे का पेन रुक गया।
उसकी साँस एकदम बदल गई। आँखें किताब पर जमी रहीं, लेकिन पुतलियाँ काँप रही थीं। गला एक बार, फिर दूसरी बार हिला। गालों पर लाल रंग तेज़ी से फैल गया। माथे की नसें फिर से उभर आईं। उसके बाएँ हाथ की उंगलियाँ किताब के किनारे को कसकर पकड़ने लगीं।
माँ ने जानबूझकर थोड़ा और पास सरककर उसके नोटबुक की तरफ़ झुकी।
“यह वाला स्टेप गलत है,” उसने धीमी आवाज़ में कहा।
झुकते समय उसका बायाँ स्तन बेटे की बाँह से पूरा छू गया। नरम, गर्म भार एक पल के लिए टिका रहा। नाइटी का पतला कपड़ा बीच में था, लेकिन गर्माहट साफ़ महसूस हो रही थी।
बेटे का पूरा शरीर अकड़ गया।
पेन उसकी उंगलियों से लगभग छूटने वाला था।
साँसें इतनी तेज़ हो गईं कि सीना साफ़ ऊपर-नीचे हो रहा था।
आँखें किताब पर थीं, लेकिन वो किताब देख नहीं रहा था।
जबड़े कस गए थे। गालों की नसें तन गई थीं। एक बूँद पसीना उसके कान के पास से धीरे-धीरे नीचे की तरफ़ सरक रहा था।
माँ ने उसकी हर प्रतिक्रिया को चुपचाप देखा।
आँखों के कोने से देख रही थी कि वो कितना खुद को रोक रहा है।
एक पल के लिए उसके मन में फिर हिचकिचाहट आई।
“अब हट जाऊँ… ये काफी है…”
लेकिन उसने खुद को रोका।
दो sequent और वैसे ही झुकी रही।
फिर धीरे से सीधी हुई।
“सुधार लो,” उसने सामान्य स्वर में कहा।
“मैं पानी लेकर आती हूँ।”
वह उठकर रसोई की तरफ़ चली गई।
पीछे मुड़कर एक बार देखा।
बेटा अभी भी उसी पोज़ में बैठा था।
पेन हाथ में था, लेकिन हिल नहीं रहा था।
आँखें आधी बंद।
साँसें तेज़।
और चेहरे पर वो भाव जो छुपाने की पूरी कोशिश के बावजूद साफ़ दिख रहा था – एक गहरी, बेचैन सी भूख।
माँ ने रसोई में जाकर गिलास में पानी भरा।
हाथ थोड़े काँप रहे थे।
अब वो जान चुकी थी।
टेस्ट काम कर रहा था।
और बेटा… खुद को रोकने की कोशिश कर रहा था, लेकिन पूरी तरह रोक नहीं पा रहा था।
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पार्ट 4
सुबह का समय था।
सात बजकर बारह मिनट हुए थे। घर के अंदर हल्की कॉफ़ी की खुशबू फैल रही थी। पंखे की धीमी आवाज़ और रसोई से आने वाली हल्की सी चम्मच की खनक के अलावा और कोई आवाज़ नहीं थी।
माँ अपने कमरे में खड़ी थी।
आज की साड़ी हल्के क्रीम रंग की पतली कॉटन की थी। ब्लाउज़ गहरा क्रीम, बिल्कुल फिट। उसने ब्लाउज़ के हुक लगाते समय सबसे ऊपर वाले हुक को जानबूझकर ढीला छोड़ दिया था। पल्लू को कमर में ठूँसते हुए उसकी उंगलियाँ एक पल के लिए रुकीं। दिल थोड़ा तेज़ धड़कने लगा।
“आज फिर से करूँ…?”
मन में आवाज़ आई।
“कल रात काफी हो गया था… आज सुबह मत…”
लेकिन अगले ही पल उसने आँखें बंद कीं और गहरी साँस ली।
“अभी टेस्ट अधूरा है। देखना है कि सुबह की रोशनी में भी वही भूख बाकी है या नहीं।”
उसने पल्लू को कंधे से धीरे-धीरे सरका दिया। कपड़े की हल्की खसखसाहट सुनाई दी। स्तनों के ऊपरी नरम हिस्से की चिकनी त्वचा सुबह की रोशनी में खुल गई। गले से लेकर स्तनों की शुरुआत तक की गहराई साफ़ दिखने लगी।
बेटा बाथरूम से निकला।
बालों से पानी की बूँदें अभी भी गर्दन पर गिर रही थीं। वह डाइनिंग टेबल की तरफ़ जा रहा था कि उसकी निगाहें अचानक माँ के कमरे के आधे खुले दरवाज़े पर ठहर गईं।
माँ दर्पण के सामने खड़ी थी।
पल्लू सरका हुआ।
ब्लाउज़ का हुक खुला।
स्तनों के बीच की नरम, गहरी रेखा रोशनी में चमक रही थी। एक स्तन का ऊपरी गोल हिस्सा कपड़े से बाहर झलक रहा था।
बेटे के कदम एकदम रुक गए।
बैग उसके हाथ में भारी हो गया।
उसकी आँखें पहले चौड़ी हुईं, फिर धीरे-धीरे सिकुड़ गईं जैसे वो नज़ारा आँखों में कैद कर लेना चाहता हो। माथा हल्का सिकुड़ा। होठों को उसने अंदर की तरफ़ दबा लिया। गला एक बार जोर से हिला, फिर दूसरी बार। गालों पर लाल रंग तेज़ी से फैलने लगा। साँस नाक से तेज़ चलने लगी। सीना साफ़ ऊपर-नीचे हो रहा था। एक पल के लिए उसने आँखें फेरने की कोशिश की, लेकिन नहीं कर पाया। निगाहें बार-बार उसी खुली जगह पर लौट आ रही थीं।
माँ ने दर्पण में उसकी मौजूदगी देख ली।
दिल जोर से धड़का। एक पल के लिए पल्लू ठीक करने का मन हुआ…
“बहुत हो गया… अब ढक लूँ…”
लेकिन उसने नहीं किया।
बस धीरे से मुड़ी और सामान्य आवाज़ में बोली,
“नाश्ता लगा दो। देर हो जाएगी।”
बेटा कुछ नहीं बोला।
बस सिर हिलाया और जल्दी से टेबल की तरफ़ चला गया। चलते समय उसके कंधे थोड़े अकड़े हुए थे। कानों के लौ पूरी तरह लाल हो चुके थे। साँसें अभी भी सामान्य नहीं हुई थीं।
माँ एक पल और खड़ी रही।
फिर धीरे से पल्लू ठीक किया… लेकिन हुक अभी भी ढीला ही छोड़ दिया।
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शाम का समय था।
सात बजकर पाँच मिनट हुए थे।
खाना बन चुका था। घर में मसालों की हल्की खुशबू फैली हुई थी। माँ फिर से उसी क्रीम साड़ी में थी। पल्लू इस बार थोड़ा संभाला हुआ था, लेकिन ब्लाउज़ का ऊपर वाला हुक अभी भी ढीला था। जब भी वह हाथ ऊपर उठाती, ब्लाउज़ तन जाता और स्तनों का भारी उभार साफ़ उभर आता।
बेटा डाइनिंग टेबल पर होमवर्क कर रहा था।
लेकिन उसकी निगाहें बार-बार माँ की तरफ़ उठ जातीं।
माँ उसके पास गई।
टेबल के बिल्कुल पास खड़ी हो गई। इतनी पास कि साड़ी का किनारा बेटे के घुटने से छू रहा था।
एक पल के लिए वह हिचकिचाई।
“आज बहुत हो गया… अब मत…”
लेकिन फिर उसने खुद को धक्का दिया।
“मेरा पल्लू का पिन गिर गया है,” उसने शांत आवाज़ में कहा। “लगाना थोड़ा।”
बेटा उठा।
उसकी उंगलियाँ पहले से ही थोड़ी काँप रही थीं।
माँ ने जानबूझकर पल्लू को कंधे से सरका दिया। कपड़े की हल्की खसखसाहट सुनाई दी। स्तनों के बीच की गहरी रेखा पूरी तरह खुल गई। ब्लाउज़ का खुला हिस्सा और साफ़ दिखने लगा। स्तनों का नरम ऊपरी हिस्सा रोशनी में चमक रहा था।
बेटे की आँखें वहीं अटक गईं।
उसकी साँस एकदम रुक गई।
आँखें चौड़ी हुईं, फिर सिकुड़ गईं।
गला जोर से हिला।
गालों का रंग गहरा लाल हो गया।
माथे पर नसें उभर आईं।
हाथ काँप रहे थे।
वह पिन लेने के लिए आगे बढ़ा।
उंगलियाँ माँ के कंधे के पास पहुँचीं। पल्लू पकड़ते समय उसकी उंगलियाँ माँ की गर्दन के नीचे की नरम त्वचा से एक पल के लिए छू गईं। गर्माहट साफ़ महसूस हुई। बेटे की उंगलियाँ काँप उठीं।
माँ ने उसकी हर छोटी प्रतिक्रिया को ध्यान से देखा।
आँखों में वही भूख थी। और इस बार थोड़ी और बेचैनी। साँसें तेज़। गला बार-बार हिल रहा था।
बेटे ने पिन लगाया।
लेकिन उसके हाथ इतने काँप रहे थे कि पिन दो बार छूट गया। तीसरी बार जाकर लगा। लगाने के दौरान उसकी उंगलियाँ माँ की त्वचा पर दो-तीन बार और फिसलीं। हर बार एक हल्का कंपन उसके शरीर में दौड़ गया।
“हो गया,” उसने भारी आवाज़ में कहा। आवाज़ थोड़ी टूटी हुई थी।
माँ ने धीरे से पल्लू ठीक किया।
उंगलियाँ अपने ही स्तन के उभार पर एक पल के लिए फिर गईं।
“जाओ, होमवर्क करो,” उसने सामान्य स्वर में कहा।
बेटा वापस बैठ गया।
लेकिन उसकी साँसें अभी भी तेज़ थीं। पेन हाथ में था, लेकिन हिल नहीं रहा था। आँखें किताब पर थीं, लेकिन वो कुछ देख नहीं रहा था। गाल लाल थे। माथे पर हल्का पसीना चमक रहा था।
माँ रसोई की तरफ़ चली गई।
हाथ थोड़े काँप रहे थे।
दिल जोर से धड़क रहा था।
अब उसे और साफ़ समझ आ रहा था।
बेटा खुद को रोकने की पूरी कोशिश कर रहा था…
लेकिन हर बार उसकी निगाहें, उसकी साँसें, उसके काँपते हाथ… सब कुछ बता रहे थे कि वो कितना संघर्ष कर रहा है।
और माँ…
धीरे-धीरे उस संघर्ष को और गहरा करने वाली थी।
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