10-02-2026, 12:42 AM
घर की छिपी आग – एक परिवार की अनकही कहानी
हमारा परिवार दिल्ली के एक मध्यमवर्गीय मोहल्ले में रहता था। पिताजी रमेश चंद्र, 52 साल के, सरकारी नौकरी से रिटायर हो चुके थे। माँ सरिता देवी, 48 साल की, अभी भी गोरी-चिट्टी, भारी भरकम शरीर वाली, लेकिन साड़ी में बहुत आकर्षक लगती थीं। मैं राहुल, 24 साल का, इंजीनियरिंग की नौकरी करता था। मेरी छोटी बहन नेहा, 21 साल की, कॉलेज में पढ़ती थी – स्लिम, गोरी, लंबे बाल, और कॉलेज में सबसे हॉट लड़की मानी जाती थी। फिर मेरी भाभी प्रिया, 26 साल की, मेरे बड़े भाई अजय की पत्नी। अजय 29 का था, प्राइवेट कंपनी में काम करता था और अक्सर टूर पर रहता था।
घर में सब कुछ सामान्य चल रहा था, लेकिन पिछले कुछ महीनों से कुछ बदलाव आ रहा था। नेहा की उम्र बढ़ने के साथ उसकी बॉडी में वो जवानी आ गई थी जो किसी को भी ललचा दे। प्रिया भाभी तो पहले से ही घर की जान थीं – उनकी कमर पतली, छाती भरी-भरी, और चलते वक्त पीछे का नजारा देखकर कोई भी फिदा हो जाए। माँ अभी भी अपनी जवानी की याद दिलाती थीं – साड़ी का पल्लू सरकने पर उनकी गहरी क्लिवेज दिख जाती थी।
एक दिन की बात है। गर्मियों की छुट्टियाँ थीं। अजय भैया लंबे टूर पर गए हुए थे। पिताजी सुबह-सुबह पार्क चले जाते थे। मैं ऑफिस से जल्दी आ गया था। घर में सिर्फ माँ, नेहा और प्रिया भाभी थीं। मैंने देखा नेहा और प्रिया भाभी दोनों हँस रही थीं। कमरे में टीवी पर कोई बॉलीवुड मूवी चल रही थी जिसमें हीरो-हीरोइन के बीच हॉट सीन था।
नेहा बोली, “भाभी, आपकी शादी के बाद भी आप इतनी हॉट कैसे लगती हैं? भैया कितने लकी हैं!”
प्रिया भाभी हँसीं, “अरे पागल, शादी के बाद तो असली मजा शुरू होता है। लेकिन तुम्हें अभी क्या पता!”
मैं चुपके से सुन रहा था। मेरा मन कुछ अजीब हो रहा था। शाम को माँ ने कहा कि आज सब साथ में डिनर करेंगे। खाना खाते वक्त पिताजी ने कहा, “राहुल, तू अब शादी कर ले। उम्र हो गई है।”
मैंने हँसकर टाल दिया। लेकिन नेहा ने मेरी तरफ देखकर आँख मारी। रात को सब सोने गए। मेरे कमरे में एसी नहीं था, गर्मी से नींद नहीं आ रही थी। मैं छत पर गया। वहाँ नेहा पहले से खड़ी थी, सिर्फ नाइटि में। चाँदनी रात थी। उसकी नाइटि हल्की थी, बॉडी की आउटलाइन साफ दिख रही थी।
“भैया, आप भी नहीं सो पा रहे?” उसने पूछा।
“हाँ, गर्मी बहुत है।”
वो मेरे पास आई। “भैया, मुझे कुछ बताना है।”
“बोल ना।”
“मुझे… लड़के बहुत अच्छे लगते हैं। लेकिन मैं डरती हूँ।”
मैं चौंक गया। “क्या मतलब?”
उसने मेरे हाथ पकड़े। “भैया, आप तो मेरे सबसे करीब हो। मुझे समझाओ ना… ये सब क्या होता है?”
मेरा दिल धड़कने लगा। मैंने धीरे से कहा, “नेहा, ये गलत है। हम भाई-बहन हैं।”
“तो क्या हुआ? घर में ही तो सुरक्षित है। बाहर वाला तो धोखा दे सकता है।”
उसकी बातों में कुछ जादू था। मैंने उसे गले लगा लिया। उसकी साँसें तेज हो गईं। मैंने उसकी गर्दन पर किस किया। वो सिहर उठी। धीरे-धीरे मैंने उसकी नाइटि ऊपर की। उसकी ब्रा नहीं थी। छोटी-छोटी चुचियाँ, गुलाबी निप्पल्स। मैंने उन्हें चूसा। वो सिसकारी मारने लगी।
“भैया… आह… और करो…”
मैंने उसकी पैंटी उतारी। उसकी चूत पर हल्के बाल थे, गीली हो चुकी थी। मैंने उंगली डाली। वो चीख पड़ी, “आह… भैया… दर्द हो रहा है…”
मैंने उसे चुप कराया और जीभ से चाटना शुरू किया। वो तड़प उठी। फिर मैंने अपना लंड निकाला। 7 इंच का, सख्त। उसने देखा और आँखें फैल गईं।
“भैया… ये इतना बड़ा…”
मैंने धीरे से उसकी चूत पर रगड़ा। फिर अंदर डाला। वो दर्द से रो पड़ी, लेकिन फिर मजा आने लगा। हम दोनों ने आधे घंटे तक चुदाई की। आखिर में मैंने उसके अंदर ही झड़ दिया।
अगले दिन सब सामान्य था। लेकिन अब नेहा मेरे साथ ज्यादा चिपकने लगी। प्रिया भाभी को शक हो गया। एक दिन वो मेरे कमरे में आईं।
“राहुल, कुछ बात है क्या?”
“क्या हुआ भाभी?”
“नेहा के साथ… तुम…”
मैं घबरा गया। लेकिन भाभी मुस्कुराईं। “मुझे पता है। मैंने रात को देख लिया था।”
मैं स्तब्ध।
“डरो मत। मैं भी अकेली हूँ। अजय तो महीनों नहीं आता।”
उन्होंने मेरे होंठों पर किस कर दिया। मैंने विरोध नहीं किया। भाभी ने साड़ी उतारी। ब्लाउज में उनकी बड़ी-बड़ी चुचियाँ। मैंने उन्हें दबाया। वो गरम हो गईं।
“राहुल… मुझे चोदो… जोर से…”
मैंने उन्हें बिस्तर पर लिटाया। उनकी चूत पहले से गीली थी। मैंने जोर-जोर से पेलना शुरू किया। वो चिल्लाईं, “हाँ… और जोर से… फाड़ दो मेरी चूत…”
हम घंटों चुदाई करते रहे। भाभी बहुत एक्सपीरियंस्ड थीं। उन्होंने मुझे पीछे से भी लिया – डॉगी स्टाइल में। उनकी गांड मारते वक्त मैंने उनकी गांड में भी उंगली डाली। वो और उत्तेजित हो गईं।
अब घर में खेल बदल गया था। माँ को भी शक हो गया। एक रात पिताजी सो रहे थे। माँ मेरे कमरे में आईं।
“राहुल… क्या हो रहा है घर में?”
मैं चुप।
माँ रो पड़ीं। “मुझे भी अकेलापन लगता है। तेरे पिताजी तो बूढ़े हो गए।”
मैंने उन्हें गले लगाया। माँ की साड़ी सरक गई। उनकी भारी चुचियाँ मेरे सीने से दब गईं। मैंने उन्हें चूमा। माँ ने विरोध नहीं किया।
“बेटा… ये गलत है…”
“माँ… प्यार में कुछ गलत नहीं।”
मैंने उनकी साड़ी उतारी। उनकी चूत पर सफेद बाल थे, लेकिन अभी भी टाइट। मैंने उन्हें चाटा। माँ सिहर उठीं। फिर मैंने उन्हें चोदा। माँ बहुत जोर से चीखीं, लेकिन मजा ले रही थीं।
“हाँ बेटा… माँ की चूत फाड़ दो… सालों बाद मिला है…”
अब घर में चारों तरफ वासना की आग लगी हुई थी। नेहा और प्रिया भाभी एक-दूसरे के साथ भी खेलने लगीं। कभी-कभी हम सब मिलकर ग्रुप में मजे लेते। पिताजी को पता नहीं था, या शायद जानबूझकर अनजान रहते थे।
एक दिन अजय भैया वापस आए। लेकिन अब घर पहले जैसा नहीं था। वो भी जल्दी समझ गए। और फिर… पूरी फैमिली एक साथ खुश थी। रिश्ते बदल गए थे, लेकिन प्यार बढ़ गया था।
घर की ये आग कभी नहीं बुझी। हम सब मिलकर उसकी गर्मी में जी रहे थे।


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