Yesterday, 11:57 AM
उस रात की बातचीत के बाद एक पूरा हफ्ता बीत गया....
घर का माहौल ऊपर से बिल्कुल शांत दिख रहा था, लेकिन यह वह शांति थी जो किसी भयानक चक्रवात के आने से पहले समंदर पर छा जाती है। इमरान अब फिर से अपनी सामान्य दिनचर्या में लौट आया था। वह दफ्तर जाता, शाम को आकर लैपटॉप पर काम करता या फिर मोबाइल में समय बिताता और मम्मी के साथ उसी सहज, अपनेपन वाले अंदाज़ में पेश आता। मम्मी भी अब पहले की तरह फिर से तैयार होने लगी थीं; पर अब ज़्यादा कहीं आना-जाना नहीं करती थीं। हालांकि उनके पहनावे में अब भी वही बारीक खुलापन, वही खिंचाव बरकरार था।
मैं भी अपने दफ्तर के काम में खुद को झोंकने की कोशिश कर रहा था। रुया के साथ लंच करना, शाम को कभी-कभार चाय पीना ही मेरे जीवन का एकमात्र सहारा बचा था। रुया की माँ अब अस्पताल से डिस्चार्ज होकर घर आ चुकी थीं और धीरे-धीरे ठीक हो रही थीं। रुया जब भी मुझसे मिलती, उसकी आँखों में मेरे लिए एक ऐसा असीम आभार और अपनेपन का भाव होता जो मुझे अंदर तक छू जाता था। लेकिन मैं चाहकर भी उस पवित्र रिश्ते में पूरी तरह डूब नहीं पा रहा था; मेरे अपने घर की कालिख मेरे हाथों, पैरों और होठों में ज़ंजीर बनकर बंधी हुई थी।
फिर आया वह दिन—गुरुवार।
उस दिन ऑफिस के सारे काम जल्दी खत्म हो गए थे। शाम के वक्त मेरा सर फिर से दर्द करने लगा था, इसलिए मैंने रुया को अपनी तकलीफ बताकर, थोड़ी देर इधर-उधर की बातें करने के बाद घर के लिए निकल गया। ऑफिस से बाहर निकला तो हल्की-हल्की ठंडी हवा चल रही थी। मैंने अपनी बाइक उठाई और बिना कहीं रुके सीधे अपने फ्लैट की तरफ चल दिया। घड़ी में उस वक्त ठीक साढ़े सात बज रहे थे। आमतौर पर मैं रात को नौ या साढ़े नौ बजे से पहले घर नहीं लौटता था। मेरे इस अप्रत्याशित समय पर लौटने की उम्मीद शायद घर में किसी को भी नहीं थी।
सोसाइटी की पार्किंग में बाइक खड़ी करके जब मैं ऊपर अपनी मंज़िल की तरफ सीढ़ियाँ चढ़ रहा था, तो मेरे दिल में एक अजीब सी, अनजानी बेचैनी करवटें ले रही थी।
फ्लैट के दरवाज़े पर पहुँचकर मैंने देखा कि दरवाज़ा अंदर से पूरी तरह बंद नहीं था; वह बस सटा हुआ था, जैसे किसी ने अभी-अभी उसे बाहर से खींचा हो। अंदर से किसी धीमी, गंभीर बातचीत की आवाज़ें आ रही थीं।
मैंने बिना कोई आहट किए, बेहद आहिस्ता से दरवाज़े को थोड़ा सा धकेला और अंदर कदम रखा।
हॉल में जो दृश्य मेरी आँखों के सामने था, उसने मेरे पैरों को वहीं फर्श पर कील की तरह गाड़ दिया। मेरे फेफड़ों से जैसे सारी हवा एक झटके में बाहर निकल गई।
ड्राइंग रूम में, सामने रखे बड़े सोफ़े की मुख्य कुर्सी पर एक अनजान शख्स बैठा हुआ था।
उसकी उम्र पचास के उत्तरार्ध में, करीब अट्ठावन या साठ साल के आस-पास रही होगी। उसका जिस्म भारी और गठीला था, बाल लगभग पूरी तरह सफेद थे जिन्हें बहुत सलीके से पीछे की तरफ संवारा गया था। उसके चेहरे पर एक अजीब सी, रौबदार और कठोर शांति थी। आँखों में एक ऐसी ठंडी, मंझी हुई चमक थी जो अक्सर उन लोगों की होती है जिन्होंने दुनिया के सबसे काले कोनों को बहुत करीब से देखा हो।
उसने हल्के आसमानी रंग का एक बेहद बारीक और महंगा सूती कुर्ता-पायजामा पहन रखा था। कुर्ते के बटन शायद चाँदी के थे जो हॉल की ट्यूबलाइट की रोशनी में धीमे से चमक रहे थे। उसकी कलाई पर सोने की एक भारी, विंटेज घड़ी बंधी थी और दाहिने हाथ की उंगलियों में पन्ना और नीलम की दो भारी अंगूठियाँ जड़ी हुई थीं।
वह उस सोफ़े पर ऐसे बैठा था मानो वह कोई मेहमान न हो, बल्कि उस पूरे घर का असली मालिक हो।
उसके ठीक सामने, काँच की टी-टेबल पर चाय की दो प्यालियाँ रखी थीं, जिनमें से हल्की सी भाप अभी भी उठ रही थी। और उस शख्स के ठीक बगल में, एक तरफ थोड़ा फैलकर, इमरान बैठा हुआ था—आराम के मूड में।
और मेरी मम्मी...
वह अपने कमरे में थीं। क्या कर रही थीं, पता नहीं... लेकिन मुझे एक अनकही शांति मिली।
दरवाज़े के हल्के से चरमराने की आवाज़ पर, उस अजनबी शख्स ने अपनी गर्दन बहुत आहिस्ता से घुमाई।
उसकी ठंडी, पथरीली नज़रें सीधे मेरे चेहरे पर आकर टिक गईं।
हॉल में माहौल ऐसा था कि मुझे अपने ही सीने के भीतर बजता हुआ अपना दिल साफ़ सुनाई देने लगा।
वह अजनबी मुझे देखता रहा...
उसके चेहरे की किसी भी माँसपेशी में कोई हरकत नहीं हुई… फिर, उसके पतले, सूखे होठों पर एक बहुत बारीक, लगभग न दिखने वाली ठंडी मुस्कान उभरी।
"तो..." उस शख्स की भारी, गूँजती हुई आवाज़ ने उस सन्नाटे के सीने को चीर दिया,
"...यही है क्या वो?"
To be Continued…
घर का माहौल ऊपर से बिल्कुल शांत दिख रहा था, लेकिन यह वह शांति थी जो किसी भयानक चक्रवात के आने से पहले समंदर पर छा जाती है। इमरान अब फिर से अपनी सामान्य दिनचर्या में लौट आया था। वह दफ्तर जाता, शाम को आकर लैपटॉप पर काम करता या फिर मोबाइल में समय बिताता और मम्मी के साथ उसी सहज, अपनेपन वाले अंदाज़ में पेश आता। मम्मी भी अब पहले की तरह फिर से तैयार होने लगी थीं; पर अब ज़्यादा कहीं आना-जाना नहीं करती थीं। हालांकि उनके पहनावे में अब भी वही बारीक खुलापन, वही खिंचाव बरकरार था।
मैं भी अपने दफ्तर के काम में खुद को झोंकने की कोशिश कर रहा था। रुया के साथ लंच करना, शाम को कभी-कभार चाय पीना ही मेरे जीवन का एकमात्र सहारा बचा था। रुया की माँ अब अस्पताल से डिस्चार्ज होकर घर आ चुकी थीं और धीरे-धीरे ठीक हो रही थीं। रुया जब भी मुझसे मिलती, उसकी आँखों में मेरे लिए एक ऐसा असीम आभार और अपनेपन का भाव होता जो मुझे अंदर तक छू जाता था। लेकिन मैं चाहकर भी उस पवित्र रिश्ते में पूरी तरह डूब नहीं पा रहा था; मेरे अपने घर की कालिख मेरे हाथों, पैरों और होठों में ज़ंजीर बनकर बंधी हुई थी।
फिर आया वह दिन—गुरुवार।
उस दिन ऑफिस के सारे काम जल्दी खत्म हो गए थे। शाम के वक्त मेरा सर फिर से दर्द करने लगा था, इसलिए मैंने रुया को अपनी तकलीफ बताकर, थोड़ी देर इधर-उधर की बातें करने के बाद घर के लिए निकल गया। ऑफिस से बाहर निकला तो हल्की-हल्की ठंडी हवा चल रही थी। मैंने अपनी बाइक उठाई और बिना कहीं रुके सीधे अपने फ्लैट की तरफ चल दिया। घड़ी में उस वक्त ठीक साढ़े सात बज रहे थे। आमतौर पर मैं रात को नौ या साढ़े नौ बजे से पहले घर नहीं लौटता था। मेरे इस अप्रत्याशित समय पर लौटने की उम्मीद शायद घर में किसी को भी नहीं थी।
सोसाइटी की पार्किंग में बाइक खड़ी करके जब मैं ऊपर अपनी मंज़िल की तरफ सीढ़ियाँ चढ़ रहा था, तो मेरे दिल में एक अजीब सी, अनजानी बेचैनी करवटें ले रही थी।
फ्लैट के दरवाज़े पर पहुँचकर मैंने देखा कि दरवाज़ा अंदर से पूरी तरह बंद नहीं था; वह बस सटा हुआ था, जैसे किसी ने अभी-अभी उसे बाहर से खींचा हो। अंदर से किसी धीमी, गंभीर बातचीत की आवाज़ें आ रही थीं।
मैंने बिना कोई आहट किए, बेहद आहिस्ता से दरवाज़े को थोड़ा सा धकेला और अंदर कदम रखा।
हॉल में जो दृश्य मेरी आँखों के सामने था, उसने मेरे पैरों को वहीं फर्श पर कील की तरह गाड़ दिया। मेरे फेफड़ों से जैसे सारी हवा एक झटके में बाहर निकल गई।
ड्राइंग रूम में, सामने रखे बड़े सोफ़े की मुख्य कुर्सी पर एक अनजान शख्स बैठा हुआ था।
उसकी उम्र पचास के उत्तरार्ध में, करीब अट्ठावन या साठ साल के आस-पास रही होगी। उसका जिस्म भारी और गठीला था, बाल लगभग पूरी तरह सफेद थे जिन्हें बहुत सलीके से पीछे की तरफ संवारा गया था। उसके चेहरे पर एक अजीब सी, रौबदार और कठोर शांति थी। आँखों में एक ऐसी ठंडी, मंझी हुई चमक थी जो अक्सर उन लोगों की होती है जिन्होंने दुनिया के सबसे काले कोनों को बहुत करीब से देखा हो।
उसने हल्के आसमानी रंग का एक बेहद बारीक और महंगा सूती कुर्ता-पायजामा पहन रखा था। कुर्ते के बटन शायद चाँदी के थे जो हॉल की ट्यूबलाइट की रोशनी में धीमे से चमक रहे थे। उसकी कलाई पर सोने की एक भारी, विंटेज घड़ी बंधी थी और दाहिने हाथ की उंगलियों में पन्ना और नीलम की दो भारी अंगूठियाँ जड़ी हुई थीं।
वह उस सोफ़े पर ऐसे बैठा था मानो वह कोई मेहमान न हो, बल्कि उस पूरे घर का असली मालिक हो।
उसके ठीक सामने, काँच की टी-टेबल पर चाय की दो प्यालियाँ रखी थीं, जिनमें से हल्की सी भाप अभी भी उठ रही थी। और उस शख्स के ठीक बगल में, एक तरफ थोड़ा फैलकर, इमरान बैठा हुआ था—आराम के मूड में।
और मेरी मम्मी...
वह अपने कमरे में थीं। क्या कर रही थीं, पता नहीं... लेकिन मुझे एक अनकही शांति मिली।
दरवाज़े के हल्के से चरमराने की आवाज़ पर, उस अजनबी शख्स ने अपनी गर्दन बहुत आहिस्ता से घुमाई।
उसकी ठंडी, पथरीली नज़रें सीधे मेरे चेहरे पर आकर टिक गईं।
हॉल में माहौल ऐसा था कि मुझे अपने ही सीने के भीतर बजता हुआ अपना दिल साफ़ सुनाई देने लगा।
वह अजनबी मुझे देखता रहा...
उसके चेहरे की किसी भी माँसपेशी में कोई हरकत नहीं हुई… फिर, उसके पतले, सूखे होठों पर एक बहुत बारीक, लगभग न दिखने वाली ठंडी मुस्कान उभरी।
"तो..." उस शख्स की भारी, गूँजती हुई आवाज़ ने उस सन्नाटे के सीने को चीर दिया,
"...यही है क्या वो?"
To be Continued…


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