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1) तन्हाई और सुनहरे सपने
सुबह की पहली किरण जब खिड़की के झरोखे से छनकर रसोई में दाखिल हुई, तो चाय की पत्ती की खुशबू के साथ एक अजीब सी खामोशी भी साथ ले आई। यह खामोशी हमारे घर में तब से बस गई थी, जब से पापा गए थे। रसोई में बर्तन सहेजने की आवाज आ रही थी—मम्मी हमेशा की तरह अपने काम में मशगूल थीं।
मम्मी की उम्र वैसे तो 40 के पार हो चुकी है, लेकिन आज भी जब वह अपने बालों को सलीके से बांधकर हल्के गुलाबी रंग की सूती साड़ी में सामने आती हैं, तो कोई भी उन्हें उनकी सही उम्र का नहीं बता सकता। वह अब भी अपनी उम्र से कहीं कम, शायद 30 की ढलती हुई शाम जैसी लगती हैं। उनकी आंखों में एक ठहराव है, जिसे दुनिया समझदारी कहती है, पर मैं जानता हूँ कि वह केवल अपनी तनहाई को छुपाने का एक पर्दा है।
मैंने मेज पर हाथ टिकाए उन्हें चाय छानते हुए देखा….
"मम्मी," मैंने धीरे से पुकारा।
"हूँ?" उन्होंने बिना मुड़े जवाब दिया।
"पापा के बिना... अब सब कैसा लगता है? मतलब, सुबह से शाम तक आपकी जिंदगी कैसे कटती है?" मेरा सवाल सीधा था, पर शायद उनके लिए बहुत भारी।
मम्मी के हाथ एक पल के लिए ठिठके.. चाय की केतली से निकलता धुंआ उनकी आंखों के सामने एक धुंध सा बना रहा था। उन्होंने पलटकर मेरी ओर देखा, चेहरे पर वही चिर-परिचित मुस्कान तैर आई—वह मुस्कान जो अक्सर सवालों को दफनाने के काम आती है….
"अरे, मेरी छोड़," उन्होंने बात को बड़ी चतुराई से मोड़ दिया। "तू ये बता, कल जिन कंपनियों के बारे में बात कर रहा था, वहां अप्लाई किया या बस बातों के ही पुल बांध रहा है?"
मैं समझ गया कि वह अपनी खाली दोपहरों और सूने कमरों की बात नहीं करना चाहतीं…. मैंने कुर्सी खींचते हुए कहा,
"हाँ, तीन जगह रिज्यूमे भेजा है। एक तो काफी बड़ी टेक फर्म है।"
यह सुनते ही उनके चेहरे पर जो चमक आई, उसने मेरे दिल को एक साथ सुकून और दर्द दोनों दिया। वह मेरे पास आकर बैठ गईं, उनके हाथ मेज पर रखे मेरे हाथ पर थे।
"सच? चलो, भगवान करे कहीं बात बन जाए।"
दरअसल, मम्मी को मेरी ड्राइंग टीचर वाली नौकरी से कोई नफरत नहीं थी। जब मैं बच्चों को रंगों और रेखाओं के बीच खोया हुआ देखता, तो वह दूर से मुस्कुराती जरूर थीं। लेकिन उनके लिए वह एक 'हॉबी' थी, 'फ्यूचर' नहीं। उन्हें लगता था कि एक आर्टिस्ट की जिंदगी में उतार-चढ़ाव बहुत होते हैं, और वह नहीं चाहती थीं कि मैं कभी भी आर्थिक असुरक्षा के उस दौर से गुजरूँ, जिससे उन्होंने और पापा ने हमें बचाया था।
"देख बेटा," उन्होंने अपनी बात जारी रखी, "मैं नहीं चाहती कि कल को तू अपने दोस्तों को देखकर यह सोचे कि तू पीछे रह गया। तेरे साथ वाले अब बड़ी गाड़ियों और ऊंचे पदों की बातें करते हैं। कला अपनी जगह है, पर एक ठोस भविष्य भी तो जरूरी है न?"
उनकी चिंता जायज थी। वह अक्सर रात को देर तक जागती रहती थीं, शायद यही सोचकर कि मेरा कल कैसा होगा। उनकी नजरों में सफलता का मतलब एक दफ्तर, एक तयशुदा सैलरी और समाज में एक रुतबा था।
मैंने उनकी आंखों में झांका, जहाँ मेरे लिए बेपनाह फिक्र थी। "मम्मी, मुझे अपनी चिंता उतनी नहीं सताती, जितनी आपकी होती है," मैंने आखिरकार वह बात कह दी जो मेरे सीने में दबी थी।
मम्मी ने सवालिया नजरों से मुझे देखा।
"अगर मुझे वह कॉर्पोरेट जॉब मिल गई, तो मैं सुबह 9 बजे घर से निकलूँगा और रात को 8 बजे वापस आऊँगा। इस बड़े से घर में आप पूरे दिन क्या करेंगी? किसके साथ बातें करेंगी? मुझे डर लगता है कि आप इस अकेलेपन में और ज्यादा खो जाएँगी," मेरी आवाज में एक हल्की सी थरथराहट थी।
मम्मी एक पल के लिए चुप हो गईं। कमरे में सन्नाटा इतना गहरा था कि घड़ी की टिक-टिक भी हथौड़े की तरह सुनाई दे रही थी। फिर उन्होंने मेरा सिर सहलाया और बड़े धीरज से कहा,
"पागल है क्या? मेरा मन लगाने के लिए तू अपनी जिंदगी के सबसे जरूरी साल घर बैठ कर खराब करेगा? मेरी फिक्र छोड़। जब तू शाम को थका-हारा घर आएगा और अपनी तरक्की की कहानियां सुनाएगा, वही मेरे पूरे दिन की खुराक होगी। तू आगे बढ़ेगा, तो मुझे लगेगा कि मेरी और तेरे पापा की मेहनत सफल हो गई।"
उन्होंने चाय का कप मेरे आगे सरका दिया- "जा, तैयार हो जा। आज शायद किसी का कॉल आ जाए।"
मैंने चाय का घूंट भरा, लेकिन उसका स्वाद आज कुछ कड़वा लग रहा था। मम्मी की मुस्कान के पीछे का डर और मेरे सपनों के बीच की यह कशमकश—यही मेरे भविष्य की नई कहानी की शुरुआत थी। मैं जानता था कि मुझे वह जॉब लेनी होगी, उनके लिए... ताकि वह दुनिया को गर्व से बता सकें कि उनका बेटा 'पीछे' नहीं रहा। भले ही इसके बदले मुझे उन्हें उन खामोश दोपहरों के हवाले करना पड़े।
मैंने गौर किया कि उनके हाथों की नसें अब पहले से ज्यादा उभर आई हैं—वे हाथ जो सालों से घर की चहारदीवारी और रिश्तों को थामे हुए थे, अब शायद थोड़े थक चुके थे। उनकी 'चतुराई' और 'मुस्कान' दरअसल एक ढाल थी, जिसे उन्होंने बरसों की साधना से तैयार किया था ताकि उनकी तनहाई की आंच मुझ तक न पहुंचे।
मम्मी की आंखों के कोरों में जो हल्की सी नमी झलकी और तुरंत ओझल हो गई, उसने मुझे अंदर तक झकझोर दिया। वह अपने अस्तित्व को सिकोड़कर मेरे भविष्य के लिए जगह बना रही थीं। उनकी चुप्पी में एक अजीब सी चीख थी—यह डर नहीं था कि वह अकेली रह जाएंगी, बल्कि यह बेबसी थी कि उनके पास मुझे देने के लिए अब केवल अपनी तनहाई का बलिदान ही बचा था। मुझे अहसास हुआ कि कॉर्पोरेट जगत की उस ऊंची इमारत की सीढ़ियां दरअसल मम्मी के उन्हीं खामोश घंटों से बनी होंगी, जिन्हें मैं पीछे छोड़ जाऊंगा।
मैंने तय कर लिया था कि मैं वह मुखौटा पहनूंगा जो उन्हें पसंद है, भले ही उसके पीछे मेरा कलाकार हर रोज थोड़ा-थोड़ा दम तोड़े….
धूप अब तेज हो चली थी, और बाहर सड़क पर गाड़ियों का शोर बढ़ने लगा था। एक नई दौड़ शुरू होने वाली थी, जिसमें मैं शामिल तो हो रहा था, पर मेरा दिल अब भी उसी रसोई की खामोशी में अटका हुआ था।
To be Continued….
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19-05-2026, 01:17 PM
(This post was last modified: 19-05-2026, 01:18 PM by The_Writer. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
एपिसोड 2: नए रास्ते
सुबह की चाय के बाद का समय घर में एक अजीब सी, बोझिल हलचल लेकर आता था। मम्मी रसोई का काम समेट चुकी थीं और अब फर्श पर बैठकर पुराने अखबारों की तह लगा रही थीं। खिड़की से छनकर आती सुनहरी धूप उनके चेहरे पर पड़ रही थी, जिससे उनकी साफ रंगत और भी निखर रही थी। उन्हें देखकर अक्सर लोग धोखा खा जाते थे; 40 की होने के बावजूद उनके चेहरे की ताजगी और सलीका उन्हें आज भी किसी युवा महिला जैसा दिखाता था। पापा के जाने के बाद उन्होंने खुद को बहुत पत्थर करके संभाल लिया था, पर उनकी आँखों की गहराई में एक डर हमेशा जड़ें जमाए रहता था—मेरे अनिश्चित भविष्य का डर।
"तूने आज के लिए कुछ खास सोचा है, देव? या फिर सारा दिन उन कागजों पर लकीरें ही खींचता रहेगा?" उन्होंने अलमारी झाड़ते हुए पूछा। ऊपर से स्वर सख्त था, पर अंदर एक दबी हुई उम्मीद की थरथराहट थी।
मैंने मेज पर बिखरे अपने चारकोल स्केच और अधूरे पोर्टफोलियो को सहेजते हुए एक लंबी सांस ली। उनकी नजरें मेरे हाथों की कलाकारी पर नहीं, बल्कि उन बिलों पर होती थीं जो हर महीने दरवाजे पर दस्तक देते थे।
"मम्मी, आज एक कॉल आने वाला है। कल जो मैंने अप्लाई किया था, वहां से आज रिस्पॉन्स की उम्मीद है। बस प्रार्थना करो कि इस बार बात बन जाए।"
मम्मी के चेहरे पर एक पल के लिए राहत आई, फिर वही संशय के बादल छा गए। "कोशिश करना अच्छी बात है बेटा। मैं तेरे इस हुनर के खिलाफ नहीं हूँ। तू बहुत अच्छी पेंटिंग बनाता है, कॉलेज में बच्चे आज भी तेरी मिसाल देते हैं। लेकिन..." वह रुकीं, जैसे सच बोलने के लिए साहस जुटा रही हों। "लेकिन इसमें स्थायित्व कहाँ है? आज काम है, कल नहीं। मैं चाहती हूँ कि तू अपने उन दोस्तों की तरह बने जो महीने की पहली तारीख को कम से कम चैन की नींद तो सोते हैं। यह अनिश्चितता हमें मार देगी।"
उनकी चिंता मेरी रीढ़ में एक ठंडी लहर की तरह दौड़ जाती थी। वह अक्सर उन लड़कों का जिक्र करती थीं जो महानगरों की कांच वाली इमारतों में बैठकर फिक्स्ड सैलरी कमाते थे। उनके लिए 'प्रगति' का पैमाना सिर्फ सृजन नहीं था, बल्कि एक सुरक्षित घेरा था। उन्हें डर था कि मेरी कला मुझे दुनिया की इस बेरहम रेस में अकेला छोड़ देगी।
"मम्मी, मैं मेहनत करने को तैयार हूँ। पर अगर मैं 9 से 5 की चक्की में पिस गया, तो आप इस खाली घर में बिल्कुल अकेली रह जाएंगी," मैंने अपनी झिझक को ढाल बनाकर कहा,
"पापा के बिना आप पहले ही सन्नाटों से लड़ती हैं। अभी तो मैं पास रहता हूँ, कॉलेज की ट्यूशन के बाद घर आ जाता हूँ। पर कॉर्पोरेट जॉब का मतलब है कि मैं सूरज डूबने के बहुत बाद घर लौटूंगा। क्या आप झेल पाएंगी?"
मम्मी उठीं और मेरे पास आकर मेरे कंधे पर हाथ रखा। उनकी आँखों में ममता और संकल्प का मिश्रण था…
"बोरियत? देव, एक माँ के लिए सबसे बड़ा दुख यह देखना है कि उसका बच्चा पंख होने के बावजूद उड़ने से डर रहा है। तू जब बाहर जाएगा, दुनिया देखेगा, तो मुझे लगेगा कि हमारा वजूद फिर से विस्तार पा रहा है। तू घर में मेरे पास बंधा रहेगा, तो मुझे लगेगा कि मेरी ममता ही तेरी बेड़ियाँ बन गई है। मेरी फिक्र तू मत कर, मैं अपना रास्ता निकाल लूंगी। तू बस अपना आसमान ढूंढ।"
उसी वक्त मेरे फोन की तीखी घंटी ने कमरे के सन्नाटे को चीर दिया। स्क्रीन पर एक अनजाना, प्रोफेशनल सा दिखने वाला नंबर चमक रहा था। मम्मी की सांसें जैसे थम सी गईं, उनकी आँखें फोन की स्क्रीन पर गड़ गई थीं। मैंने कांपते हाथों से कॉल रिसीव किया।
"हेलो, क्या देव बोल रहे हैं?" दूसरी तरफ से एक भारी, अधिकारपूर्ण और बेहद ठंडी आवाज आई।
"जी, मैं देव ही बोल रहा हूँ। आप कौन?"
"मैं 'आर्चर मीडिया' से बात कर रहा हूँ। हमने आपका पोर्टफोलियो और पिछली कुछ कहानियां देखी हैं। आपके काम में विजुअल्स का एक अजीब सा 'डार्क' पुट है, एक रहस्यमयी उदासी है, जो हमें अपनी अगली बड़ी वेब सीरीज के लिए चाहिए। हम कुछ ऐसा ढूंढ रहे हैं जो साधारण न हो। क्या आप कल सुबह 10 बजे इंटरव्यू के लिए हमारे ऑफिस आ सकते हैं?"
मेरा गला सूख गया। मम्मी ने उत्सुकता और घबराहट के बीच झूलते हुए मेरी तरफ देखा। मैंने जैसे-तैसे 'जी बिल्कुल' कहा और फोन काट दिया। मेरे हाथ अब भी थरथरा रहे थे।
"क्या हुआ? किसका फोन था?" मम्मी ने लगभग फुसफुसाते हुए पूछा, जैसे जोर से पूछने पर यह सपना टूट जाएगा।
"मम्मी, 'आर्चर मीडिया' है। बहुत बड़ी कंपनी है। उन्हें मेरा काम पसंद आया है। कह रहे हैं कि मेरे स्केच और कहानियों का जो 'डार्क' अंदाज है, वो उनकी सीरीज के लिए परफेक्ट है। सैलरी भी उम्मीद से ज्यादा है और... यह वही 'सॉलिड फ्यूचर' हो सकता है जिसका आप सपना देख रही थीं।"
मम्मी की आँखों के कोर गीले हो गए। उन्होंने तुरंत भगवान की तस्वीर की ओर मुड़कर हाथ जोड़ लिए।
"देखा? मैंने कहा था न, जब नीयत साफ हो और कोशिश सच्ची, तो रास्ते खुद खुलते हैं। तू बस घबराना मत।"
शाम के वक्त जब मैं बालकनी में खड़ा होकर ठंडी हो रही चाय की चुस्कियां ले रहा था, मम्मी भी पास आ खड़ी हुईं। हवा में एक नई उमंग थी।
"कल के लिए कपड़े निकाल लिए? तेरी वह नीली शर्ट प्रेस कर दूँ? इंटरव्यू में सलीका बहुत जरूरी होता है।"
मैंने मुस्कुराकर उन्हें देखा। उनकी झुर्रियां जैसे आज गर्व के पीछे छिप गई थीं। लेकिन मेरे भीतर एक अनजाना सा खौफ कुलबुला रहा था। यह 'डार्क' कंटेंट की तलाश कहीं मुझे उन गलियों में तो नहीं ले जाएगी जहाँ से लौटना मुश्किल हो?
"मम्मी," मैंने उनका हाथ पकड़ते हुए धीमे से कहा, "अगर कल सब अच्छा रहा, तो हम रात को बाहर चलेंगे। एक छोटा सा जश्न तो बनता है।"
"नहीं रे, बाहर के खाने में वो स्वाद कहाँ। मैं घर पर ही तेरी पसंद की खीर और पुलाव बनाऊंगी," उन्होंने चहकते हुए कहा, और उनके चेहरे पर वो पुरानी चमक लौट आई जो पापा के रहने के वक्त हुआ करती थी।
रात को जब मैं बिस्तर पर लेटा, तो खिड़की से आती चांदनी फर्श पर टेढ़ी-मेढ़ी परछाइयां बना रही थी, जो मेरे स्केच के पात्रों जैसी लग रही थीं। मुझे महसूस हुआ कि मेरी जिंदगी का एक साधारण अध्याय अब समाप्त हो चुका है। कल का सूरज सिर्फ नौकरी का बुलावा नहीं लाएगा, बल्कि एक ऐसे रहस्यमयी सफर की पहली दस्तक होगा, जहाँ हकीकत और कहानियों की सीमाएं धुंधली होने वाली थीं।
To be Continued….
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Nice plot give a long update
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20-05-2026, 01:14 PM
(This post was last modified: 20-05-2026, 01:20 PM by The_Writer. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
एपिसोड 3: बिछड़न की मीठी धूप
घर के आंगन में आज वैसी खामोशी नहीं थी जैसी अक्सर पापा के जाने के बाद हुआ करती थी। आज वहां एक हलचल थी, सूटकेस के चेन बंद होने की आवाजें थीं और रसोई से उठती हुई पकवानों की वह खुशबू थी जो सिर्फ खास मौकों पर ही आती है। मेरा सिलेक्शन 'आर्चर मीडिया' में हो गया था, लेकिन उनकी मुख्य ब्रांच दूसरे शहर में थी। इसका मतलब था—घर छोड़ना, बीरभूम की गलियों को छोड़ना और सबसे बढ़कर, मम्मी को छोड़ना।
मम्मी की खुशी का ठिकाना नहीं था। पिछले दो दिनों से वह पूरे मोहल्ले में बता चुकी थीं कि उनका बेटा एक बड़ी कंपनी में 'क्रिएटिव हेड' (जैसा कि उन्हें समझ आया था) बनकर जा रहा है। उनके चेहरे पर वह चमक वापस आ गई थी जिसे वक्त की धूल ने कुछ धुंधला कर दिया था। वह अपनी उम्र से कहीं छोटी, किसी उत्साहित बड़ी बहन जैसी लग रही थीं, जो अपने भाई की कामयाबी पर फूली नहीं समाती।
लेकिन आज, जाने वाले दिन, वह चमक कहीं-कहीं आंसुओं की नमी में बदल रही थी।
"देव, इधर आ बैठ," उन्होंने सोफे की तरफ इशारा करते हुए कहा। उनके हाथ में एक छोटी सी डायरी और पेन था, जैसे वह कोई बहुत बड़ा लेक्चर देने वाली हों।
मैं उनके पास बैठ गया। उन्होंने मेरी आँखों में झांका, और फिर शुरू हुआ 'हिदायतों' का अंतहीन सिलसिला।
"देख बेटा, शहर नया है, लोग नए हैं। सबसे पहले—बाहर का खाना कम खाना। मैंने तेरे बैग के किनारे वाले पॉकेट में सूजी के लड्डू और मेथी की थेपली रख दी है, वो खराब नहीं होगी। और सुन, अनजान लोगों से ज्यादा घुुलना-मिलना मत। ऑफिस में काम से काम रखना, राजनीति में मत पड़ना।"
मैं मुस्कुरा दिया। "मम्मी, मैं बच्चा नहीं हूँ।"
"मेरे लिए तो रहेगा," उन्होंने डांटते हुए कहा, पर उनकी आवाज भारी हो गई थी। "वहां रात को देर तक बाहर मत घूमना। अपना फोन हमेशा चार्ज रखना। और सबसे जरूरी—पैसे सोच-समझकर खर्च करना। अभी शुरुआत है, भविष्य बनाना है तुझे।"
मम्मी मुझे 'डूज़ एंड डोंट्स' की पूरी लिस्ट समझा रही थीं—जैसे कि गीला तौलिया बिस्तर पर मत छोड़ना, संडे को खुद कपड़े धो लेना, और रोज रात को सोने से पहले उन्हें एक कॉल जरूर करना। वह मुझे एक जिम्मेदार इंसान बनाना चाहती थीं, लेकिन उनकी बातों के पीछे छुपा डर साफ था। उन्हें चिंता इस बात की नहीं थी कि मैं अपना ख्याल नहीं रख पाऊंगा, उन्हें चिंता इस बात की थी कि मेरे बिना उनका घर फिर से कितना बड़ा और खाली हो जाएगा।
अचानक वह चुप हो गईं। बोलते-बोलते उनका गला रुंध गया। उन्होंने मेरे सर पर हाथ रखा और धीमे से कहा, "तुझे बड़ा होते देखना ही मेरा सपना था देव। तेरे पापा आज होते तो सबसे ज्यादा खुश वही होते। पर... पर पता नहीं क्यों, आज लग रहा है कि तू सच में बहुत बड़ा हो गया है। इतना बड़ा कि अब यह घर तेरे लिए छोटा पड़ने लगा है।"
उनकी आँखों से एक आंसू ढलकर उनके गाल पर आ गिरा। उन्हें इस हाल में देखकर मेरा भी गला भर आया। जो इंसान पिछले कई सालों से मेरी ढाल बना रहा, जिसने अपनी पूरी दुनिया मुझ तक सीमित कर ली थी, उसे इस सूने घर में छोड़कर जाना किसी सजा जैसा लग रहा था।
"मम्मी, आप भी चलिए न मेरे साथ?" मैंने इमोशनल होकर उनका हाथ पकड़ लिया। "वहां छोटा सा फ्लैट ले लेंगे, साथ रहेंगे।"
उन्होंने अपनी साड़ी के पल्लू से आँखें पोंछीं और फिर वही सयानी मुस्कान चेहरे पर ले आईं। "नहीं रे पागल! अभी तेरा करियर शुरू हो रहा है। तू अपनी नई दुनिया बसा, नए दोस्त बना। मैं यहाँ अपनी यादों और अपनी सहेलियों के साथ ठीक हूँ। तू बस तरक्की करना, मेरी थकान उसी से मिट जाएगी।"
टैक्सी बाहर आ खड़ी हुई थी। हॉर्न की आवाज ने हमारे बीच के उस भावुक सन्नाटे को तोड़ दिया। मैंने अपना बैग उठाया। घर की दहलीज लांघते वक्त मुझे वह दिन याद आया जब मैं छोटा था और पहली बार कॉलेज जा रहा था—तब भी मम्मी दरवाजे पर खड़ी ऐसे ही मुस्कुरा रही थीं... उस मुस्कान के पीछे कई चिंताओं को दबाए रखी थीं।
मैंने उनके पैर छुए। उन्होंने मुझे कसकर गले लगा लिया। "जा बेटा, अपनी पहचान बना। पर भूलना मत, यहाँ कोई तेरा इंतजार कर रहा है।"
मैं टैक्सी में बैठ गया...
जैसे-जैसे गाड़ी आगे बढ़ रही थी, पीछे छूटता हुआ घर और दरवाजे पर खड़ी वह छोटी सी आकृति धुंधली होती जा रही थी। मैंने खिड़की से बाहर देखा; बीरभूम की मिट्टी की खुशबू अब भी मेरे साथ थी। मेरा सफर अब एक नए शहर की ओर था, जहाँ चुनौतियां थीं, ऑफिस की राजनीति थी और शायद...
लेकिन मेरे मन में बस एक ही बात गूँज रही थी—मम्मी की वह मुस्कान, जिसमें दुआएं ज्यादा और दर्द कम था।
साथ ही उनकी वह दूधिया क्लीवेज जो पल्लू ठीक करते वक़्त थोड़ा सा दिख गई थी...!
To be Continued….
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एपिसोड 4: चकाचौंध और द्वंद्व
शहर की रफ्तार बीरभूम की उन धूल भरी पगडंडियों से बिल्कुल अलग थी, जहाँ दोपहर की धूप में पीपल के पत्तों की सरसराहट भी सुनी जा सकती थी और वक्त जैसे ठहरकर लंबी सांस लेता था। यहाँ कोलकाता में तो वक्त किसी भूखे शिकारी की तरह पीछे भागता था, और उसके साथ भागते थे हम जैसे हजारों लोग जो अपनी जड़ों से उखड़कर आए थे। धीरे-धीरे मैं इस शहरी जीवन के कंक्रीट के सांचे में ढलने लगा था। ऊँची, बेजान इमारतें, रात के दो-तीन बजे तक जलती पीली स्ट्रीट लाइट्स और दफ्तर की भारी-भरकम फाइलों के बीच मेरी जिंदगी का एक नया, मशीनी ढर्रा बन गया था। लेकिन इस कांच और इस्पात की चमक के पीछे एक ऐसा संसार था, जिसे देख मेरा देहाती मन अक्सर उलझ जाता था।
यहाँ का जीवन बेफिक्री की एक महीन चादर ओढ़े हुए था, जो मुझे अक्सर डराती थी। ऑफिस के मेरे साथ के लड़कों को देखकर मुझे गहरा ताज्जुब होता—उन्हें भविष्य की उस तरह की कोई चिंता नहीं थी जैसा हमारे यहाँ बेटों को होती है। उनका पूरा दिन बस इस जोड़-तोड़ में बीतता कि कैसे भी करके महीने का पॉकेट खर्च और वीकेंड की किसी महँगी पार्टी का जुगाड़ हो जाए। क्रेडिट कार्ड के बढ़ते कर्ज के बीच भी देर रात तक क्लबों में जागना, कान फोड़ देने वाले ऊँचे सुरों में संगीत सुनना और बस 'आज' के नशे में जीना ही उनका फलसफा था। उनके पास कल के लिए कोई योजना नहीं थी, बस आज का एक धुंधला सा उत्साह था।
और इस बेलगाम आजादी के मामले में यहाँ की लड़कियां भी पीछे नहीं थीं। करियर और काम में तो वे लड़कों को कड़ी टक्कर देती ही थीं, लेकिन धुएँ से भरे पबों में नशा करने और तड़के सुबह तक पार्टियों में मशगूल रहने के मामले में वे अक्सर लड़कों से दो कदम आगे ही नजर आतीं। बीरभूम की रातों में जहाँ आठ बजे सन्नाटा पसर जाता था, वहाँ शहर की उन सर्द रातों में, छोटे-छोटे पश्चिमी कपड़ों में लड़कियों को बेखौफ और नशे की हालत में घूमते देखना मेरे लिए एक जबर्दस्त 'सांस्कृतिक झटका' (Cultural Shock) था। मुझे समझ नहीं आता था कि क्या यह वही देश है जहाँ से मैं आया हूँ?
सच कहूँ तो, जब मैं नया-नया यहाँ आया था, तो पार्क स्ट्रीट की रातों को लड़कियों को इस हाल में देख मेरी रूह कांप जाती थी। मैं भी आखिर हाड़-मांस का बना एक साधारण इंसान ही था, कोई पत्थर नहीं। कभी-कभी उन चकाचौंध भरे दृश्यों और महकते इत्रों के बीच मेरी भी नियत डगमगाने लगती थी। मन के किसी अंधेरे, सुप्त कोने में दबी हुई कामनाएं अक्सर फन उठाकर डसने को तैयार रहती थीं। वह खुलापन, वह बिना किसी रोक-टोक वाली बेबाकी और वह शारीरिक आकर्षण मुझे अपनी ओर खींचता था। मेरे भीतर एक भीषण कशमकश चलती थी—एक तरफ शहर की यह मायावी स्वच्छंदता थी और दूसरी तरफ मेरे संस्कारों की वह पुरानी, जर्जर मगर मजबूत ढाल।
लेकिन जब भी कदम भटकने को होते, आँखों के सामने मम्मी का वह थका हुआ चेहरा उभर आता, जो बीरभूम की उस ढलती दोपहर में बस के पीछे धूल उड़ते वक्त आंसुओं से भीगा हुआ था। मुझे उनकी वह आखिरी हिदायत गूंजती हुई सुनाई देती—
"बाबू, अपनी पहचान बनाना, बड़ा आदमी बनना, पर खुद को मत भूलना।"
मम्मी का मुझ पर जो वो अंधा और अटूट विश्वास था, वह मेरे लिए एक अदृश्य लक्ष्मण रेखा बन गया। मैंने खुद से बार-बार सवाल किया कि अगर मैं भी इसी भटकती भीड़ का हिस्सा बनकर अपनी मर्यादा खो बैठा, तो फिर उन शहरियों में और मुझ गाँव के लड़के में क्या फर्क रह जाएगा? मेरी कामयाबी का आखिर क्या मोल होगा अगर मैं अपने चरित्र की नींव को ही दीमक लगा दूँ?
इसी मानसिक संघर्ष का परिणाम था कि मैंने समाज और खुद के इर्द-गिर्द एक अभेद्य दीवार खड़ी कर ली थी। मैंने कभी किसी लड़की की तरफ बात बढ़ाने की पहल नहीं की, न ही कभी किसी के साथ फालतू हंसी-मजाक में अपनी रुचि दिखाई। मेरा जीवन एक तयशुदा लोहे की पटरी पर था—सुबह का नाश्ता, ऑफिस, लंच और फिर शाम को सीधे अपने कमरे की तन्हाई। सहकर्मियों के बीच जल्द ही मेरी पहचान एक 'रिजर्व्ड', घमंडी और जरूरत से ज्यादा 'सीरियस' लड़के के रूप में होने लगी थी, पर मुझे इससे फर्क नहीं पड़ता था।
कभी-कभी जब ऑफिस में किसी का जन्मदिन होता या कोई अनिवार्य टीम फंक्शन, तो मैं वहां एक रस्म की तरह जाता जरूर था, लेकिन हमेशा अपनी मर्यादाओं की चौखट के भीतर खड़ा रहता। जब बाकी लोग शराब के नशे में ऊटपटांग झूम रहे होते या एक-दूसरे के कान में अनर्गल बातें कर वक्त जाया करते, मैं हाथ में संतरे के जूस का गिलास थामे किसी अंधेरे कोने में खड़ा होकर बस मूक दर्शक बना उन्हें देखता रहता…
मेरी आँखों में अक्सर एक गहरा सवाल होता—क्या सच में यही वह 'तरक्की' और 'मॉडर्निटी' है जिसे हम छोटे शहरों के लोग अपनी जड़ें छोड़कर यहाँ इन पत्थरों के जंगलों में ढूंढने आते हैं?
देर रात को जब मैं अपने सूने फ्लैट पर लौटता, तो खिड़की के पर्दे हटाकर बाहर उस शोर-शराबे वाले, कभी न सोने वाले शहर को टकटकी लगाकर देखता। मन में एक तरफ गर्व की लहर उठती कि मैंने आज भी अपनी मिट्टी की खुशबू और जड़ों को सीने से लगाकर रखा है, तो दूसरी तरफ एक टीस भरा अकेलापन भी बुरी तरह महसूस होता…
पर फिर टेबल पर रखे फोन की काली स्क्रीन पर मम्मी का 'मिस्ड कॉल' या छोटा सा मैसेज देखते ही वह सारा शहरी अकेलापन एक ठंडी, ममतामयी छांव में बदल जाता और मुझे शांति की नींद आ जाती।
मैं धीरे-धीरे यह कड़वा सच समझ गया था कि यह शहर मुझे बहुत कुछ दे सकता है—अथाह पैसा, नामी शोहरत, और वह अंधी आजादी भी जिसका लोग ख्वाब देखते हैं। लेकिन उस आजादी के समंदर में डूबने के बजाय उसका सही दिशा में इस्तेमाल करना ही जीवन की सबसे बड़ी चुनौती थी।
बीरभूम की सादगी वाला वह 'देव' आज भी मेरे भीतर कहीं गहरी सांस ले रहा था, जो मुझे हर रात आंखें बंद करने से पहले यह यकीन दिलाता था कि मैं भले ही इस समंदर जैसी भीड़ में तैर रहा हूँ, पर मैं इस खारे पानी का हिस्सा कभी नहीं बनूँगा….
To be Continued….
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आपको फिरसे कार्यरत हुवा देख बेहद खुशी हुई| आपकी लेखणी बेहतरीन है, और आप जैसा की जानते हो, की आप जिस प्रकार की कथायें लिखे जा रहे हो उनमे मेरा उमदा लगाव है|
आपसे अनुरोध करता हू की ये कथा खंडित ना करे| मुझसे जितना बन पडे, मैं प्रतिक्रिया देता राहुंगा|
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(22-05-2026, 09:17 PM)garamrohan Wrote: आपको फिरसे कार्यरत हुवा देख बेहद खुशी हुई| आपकी लेखणी बेहतरीन है, और आप जैसा की जानते हो, की आप जिस प्रकार की कथायें लिखे जा रहे हो उनमे मेरा उमदा लगाव है|
आपसे अनुरोध करता हू की ये कथा खंडित ना करे| मुझसे जितना बन पडे, मैं प्रतिक्रिया देता राहुंगा|
तुमची कमेंट पाहून आनंद झाला.
मी ही गोष्ट पूर्ण करण्याचा प्रयत्न करेन. तुमच्या कमेंटसाठी तुमचे खूप खूप धन्यवाद.
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एपिसोड 5: फ्लैटमेट!
शहर की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में अकेलेपन से बचने और खर्चों को बांटने का सबसे आसान तरीका था—फ्लैट शेयर करना। अब तक मैं अपने छोटे से फ्लैट में अपनी यादों और दफ्तर के काम के साथ अकेला रहता था, लेकिन एक दिन मेरी इस एकांत दुनिया में एक नए शख्स की दस्तक हुई। उसका नाम था इमरान।
इमरान के आने से फ्लैट का सन्नाटा तो खत्म हुआ, पर मेरे मन में कई नए सवाल पैदा होने लगे। पहली नजर में इमरान में कुछ खास नहीं था, लेकिन उसकी एक आदत थी जो मुझे शुरू से ही खटकती थी—वह हमेशा 'स्मार्ट टॉकिंग' करने की नाकाम कोशिश करता रहता था। उसकी बातों में गहराई कम और दिखावा ज्यादा था। वह अक्सर ऐसी अंग्रेजी शब्दावली का इस्तेमाल करता जो शायद उसने किसी फिल्म या सीरीज से रटी थीं, लेकिन वे उसके व्यक्तित्व पर बिल्कुल नहीं जंचती थीं।
सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात उसका लापरवाह रवैया था। मैंने उसे कभी करियर या भविष्य को लेकर गंभीर नहीं देखा। दफ्तर से थककर जब मैं घर लौटता और अपनी फाइलों में डूबा रहता, इमरान तब या तो किसी से फोन पर लंबी और फिजूल बातें कर रहा होता या फिर शीशे के सामने खड़ा होकर खुद को निहार रहा होता। मुझे समझ नहीं आता था कि वह फ्लैट का किराया कैसे भरता था और अपने निजी खर्चों के लिए पैसे कहाँ से लाता था? क्योंकि उसे कभी किसी नियमित नौकरी पर जाते मैंने नहीं देखा।
पैसे कहाँ से आते थे, यह तो रहस्य था, लेकिन उसका रहन-सहन किसी रईस से कम नहीं था। उसके पास महंगे ब्रांड्स के कपड़ों का अंबार था। जब वह तैयार होकर निकलता, तो पूरा फ्लैट 'इंपोर्टेड परफ्यूम्स' की खुशबू से महक उठता था। उसके पास महंगे बॉडी लोशन, आफ्टर शेव और कॉस्मेटिक्स का ऐसा कलेक्शन था, जो शायद किसी बड़े मॉडल के पास हो। बीरभूम में मैंने कभी किसी लड़के को अपनी त्वचा और खुशबू को लेकर इतना सजग नहीं देखा था।
इमरान को देखकर मेरा एक और पुराना भ्रम भी टूट गया। अपने छोटे शहर में मैंने हमेशा सुना था कि कुछ खास मजहबी या धार्मिक पृष्ठभूमि के लोग शराब और सिगरेट से कोसों दूर रहते हैं। मैंने सोचा था कि इमरान भी शायद अपनी जड़ों से जुड़ा होगा, लेकिन उसकी हकीकत कुछ और ही निकली।
एक रात जब मैं देर से दफ्तर का काम खत्म करके हॉल में आया, तो देखा कि इमरान हाथ में गिलास लिए बालकनी में खड़ा था। धुएं के छल्ले हवा में तैर रहे थे। उसे इस हाल में देखकर मुझे एक झटका सा लगा। बीरभूम की उन गलियों में हमने नैतिकता के जो पैमाने पढ़े थे, वे इस महानगर की हवा में धुएं की तरह उड़ते हुए दिखाई दिए। इमरान के लिए यह सब बहुत सामान्य था—जैसे यह उसकी जीवनशैली का एक अनिवार्य हिस्सा हो।
"क्या हुआ देव भाई ? बड़े हैरान लग रहे हो," उसने अपनी उसी बनावटी स्मार्टनेस के साथ मुझसे पूछा और एक गहरी कश ली।
मेरे पास कोई जवाब नहीं था। मैं बस उसे देख रहा था। एक तरफ मैं था, जो अपनी सैलरी का एक-एक पैसा हिसाब से खर्च करता था ताकि मम्मी को पैसे भेज सकूँ, और दूसरी तरफ इमरान था—बिना किसी ठोस काम के, आलीशान जिंदगी जीने वाला और अपनी ही धुन में रहने वाला।
उस रात मुझे नींद देर से आई। इमरान की खुशबूदार दुनिया और उसके बेपरवाह शौक मेरे संस्कारों से टकरा रहे थे। मुझे एहसास हुआ कि शहर सिर्फ ऊँची इमारतों का नाम नहीं है, बल्कि यह अलग-अलग विरोधाभासों का एक जंगल है, जहाँ इमरान जैसे लोग भी अपनी एक अलग, रहस्यमयी पहचान बनाकर रहते हैं। वह मेरे लिए एक ऐसी पहेली बन गया था, जिसे सुलझाने की कोशिश में मैं अपनी सादगी को और मजबूती से थामने लगा था।
To be Continued…..
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25-05-2026, 08:47 AM
(This post was last modified: 25-05-2026, 08:50 AM by The_Writer. Edited 2 times in total. Edited 2 times in total.)
एपिसोड 6: ओटीटी और दोस्ती
शुरुआत में मुझे लगा था कि इमरान और मेरे बीच कोई मेल संभव ही नहीं है। हम दोनों के बीच संस्कारों और जीवनशैली की एक गहरी खाई थी। मेरी कोई विशेष इच्छा भी नहीं थी कि मैं किसी से बहुत घुलूँ-मिलूँ, लेकिन एक ही छत के नीचे रहते हुए खामोश रहना नामुमकिन था। कहते हैं न कि वक्त हर घाव भर देता है, वैसे ही वक्त हर दीवार को गिरा भी देता है। धीरे-धीरे ही सही, हमारे बीच बातों का सिलसिला शुरू हुआ।
नॉर्मल इंट्रोडक्शन के करीब 10-12 दिन बीतते-बीतते हमारे बीच की औपचारिकताएं कम होने लगीं। अब हम सिर्फ रूममेट्स नहीं थे, बल्कि शाम की चाय साथ पीने वाले और वीकेंड्स पर साथ बाहर घूमने जाने वाले दोस्त बनने लगे थे।
इस दोस्ती को गहरा बनाने में एक बहुत ही आधुनिक माध्यम ने बड़ी भूमिका निभाई—ओटीटी (OTT) प्लेटफॉर्म्स। शहर की थकान भरी शामों में जब हम दोनों अपने-अपने कमरों से बाहर निकलते, तो टीवी का रिमोट हमें एक जगह ले आता। कुछ शो ऐसे थे जो हम दोनों को ही बेहद पसंद थे। डार्क थ्रिलर और मिस्ट्री जॉनर ने हमारे बीच एक पुल का काम किया।
एक रात जब हम दोनों एक लोकप्रिय थ्रिलर सीरीज देख रहे थे, इमरान ने अचानक कहा,
"यार देव, तू इस कैरेक्टर को देख। तुझे नहीं लगता कि यह बिल्कुल तेरी तरह ही गंभीर है? बस इसके पास ड्राइंग की जगह गन है।"
मैंने हंसते हुए जवाब दिया,
"और तुझे नहीं लगता कि यह जो दूसरा वाला है, जो हर वक्त फालतू की बातें करता है और महंगे परफ्यूम लगाता है, वह बिल्कुल तेरे जैसा है?"
इमरान ठहाका मारकर हंसा,
"अरे भाई, स्टाइल और स्मेल ही तो इंसान की असली पहचान है! तू तो बस अपनी फाइलों और घर की यादों में खोया रहता है। कभी शहर की हवा को महसूस कर।"
दोस्ती बढ़ी तो आपसी तालमेल भी बढ़ा। कभी दफ्तर से सैलरी मिलने में देरी हो जाती या किसी महीने मेरा हाथ तंग होता, तो इमरान बिना कहे फ्लैट के छोटे-मोटे खर्चों की भरपाई कर देता। और जब उसके पास पैसे की कमी होती, तो मैं उसे संभाल लेता। हमारे बीच एक बिना लिखा समझौता हो गया था—एक की मुश्किल, दूसरे की मदद।
कभी-कभी जब मैं रात को अकेला बैठता, तो सोचता कि शायद अकेले रहना ही ठीक था। अपनी मर्जी का मालिक, कोई टोका-टोकी नहीं। लेकिन फिर ख्याल आता कि नहीं, एक फ्लैटमेट का साथ होना कोई बुरी बात नहीं है। घर लौटकर कोई तो होता है जिससे दिन भर की भड़ास निकाली जा सके। कभी बिजली का बिल भरना हो या घर के लिए राशन लाना, साथ होने से काम आधा हो जाता था।
"देव, सुन," इमरान ने एक दिन सोफे पर पसरते हुए कहा, "अगले संडे हम लोग शहर के उस पुराने किले की तरफ चलेंगे। सुना है वहां का सूर्यास्त बहुत फेमस है। तू वहां बैठकर प्रकृति और आसपास के नज़ारे का आनंद ले सकता है और मैं अपनी नई रील बना लूंगा।"
मैंने उसकी तरफ देखा। उसका 'रील' वाला शौक मुझे अब भी अजीब लगता था, पर उसकी नीयत साफ थी।
"ठीक है, लेकिन शर्त यह है कि तू वहां भी अपनी 'स्मार्ट टॉकिंग' से लोगों को परेशान नहीं करेगा।"
"अरे भाई, वो तो मेरा टैलेंट है! उसे कैसे छोड़ दूँ?" उसने मुस्कुराते हुए आंख मारी।
उस पल मुझे एहसास हुआ कि इंसान चाहे कितना भी अलग क्यों न हो, जब वह साथ रहता है, तो उसकी कमियां भी दोस्ती का हिस्सा बन जाती हैं। मम्मी को फोन पर जब मैंने इमरान के बारे में बताया, तो वह भी खुश हुईं। उन्हें तसल्ली थी कि उनके बेटे के पास इस अनजान शहर में कोई तो है जो मुसीबत में आवाज़ दे सकता है।
भले ही इमरान का रहन-सहन मेरे सिद्धांतों से मेल नहीं खाता था, लेकिन उसकी मौजूदगी ने मेरे शहरी जीवन के अकेलेपन को कम कर दिया था। अब वह फ्लैट सिर्फ सोने की जगह नहीं थी, बल्कि हंसी-मजाक और साझा यादों का एक छोटा सा बसेरा बन गया था।
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Very much interesting and exciting writing ✍️
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আপনার মুখে মারাঠি শব্দ শুনে কী দারুণ এক চমক পেলাম! গল্পটা সত্যিই অসাধারণ এগোচ্ছে। সাধারণত আমি ভিন্ন ধর্মের মানুষদের মধ্যকার প্রেমের গল্প (interfaith) খুব একটা পছন্দ করি না, কিন্তু আপনি যেভাবে গল্পটা সাজিয়েছেন—তা আমাকে এতটাই মগ্ন করে রেখেছে যেন আমি কোনো মূলধারার উপন্যাস পড়ছি। পরবর্তী আপডেটের জন্য অধীর আগ্রহে অপেক্ষা করছি।
আর ভাই, আপনার কাছে আমার আরেকটি অনুরোধ—আমাকে বাংলাটা শিখিয়ে দিন না! তাহলে আপনার লেখা এই চমৎকার সব গল্প পড়ার জন্য আমাকে আর কোনো অনুবাদকের (translator) সাহায্য নিতে হবে না।
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एपिसोड 7: संगति का असर और बेपरवाह राहें
इंसानी फितरत बड़ी अजीब होती है। हम जिस चीज़ से भागते हैं, वक्त आने पर अक्सर वही हमें सबसे ज्यादा आकर्षित करने लगती है। बीरभूम से आते वक्त जो संस्कार मेरी ढाल थे, इस बड़े शहर की चकाचौंध और इमरान की बेफिक्र ज़िंदगी के आगे वे अब थोड़े कमजोर पड़ने लगे थे। धीरे-धीरे ही सही, मुझ पर उसकी संगति का रंग चढ़ने लगा था।
मुझे इमरान का लाइफस्टाइल अब खटकता नहीं था, बल्कि उसमें एक अजीब सी कशमकश भरी आज़ादी दिखने लगी थी। उसका ज्यादातर समय नशे के खुमार में रहना, जीवन को लेकर वह 'जो होगा देखा जाएगा' वाली सोच और जब मन किया बाइक उठा कर अनजान रास्तों पर निकल जाना—यह सब मेरे उस अनुशासित जीवन से बिल्कुल अलग था जहाँ हर कदम भविष्य की चिंता में फूँक-फूँक कर रखा जाता था।
मैंने विद्वानों को कहते सुना था कि हमें सफल लोगों के साथ रहना चाहिए और उनसे सीखना चाहिए। विडंबना देखिए, मुझे अपनी और दुनिया की तुलना में इमरान कहीं अधिक 'सफल' दिखने लगा था, क्योंकि वह कम से कम अपनी शर्तों पर जी रहा था।
एक शाम, जब वह अपनी बाइक की चाबी घुमाते हुए बाहर निकलने की तैयारी कर रहा था, मैंने उसे रोक लिया।
"इमरान, एक बात बता यार। तू इतना रिलैक्स कैसे रहता है? न तुझे ऑफिस की डेडलाइन की टेंशन है, न अगले महीने के रेंट की।" मैंने पूछा।
इमरान ने अपनी आँखों पर महंगा चश्मा चढ़ाया और एक तिरछी मुस्कान के साथ कहा, "देव भाई, तूने अपनी ज़िंदगी को फाइलों और लैपटॉप में कैद कर लिया है। ये शहर तुझे वो नहीं देगा जो तू ढूँढ रहा है, जब तक तू इसे अपनी आँखों से देखना न शुरू करे।"
"पर यार, तेरा काम क्या है? मतलब, इनकम कहाँ से होती है?" मैंने आखिरकार वह सवाल पूछ ही लिया जो महीनों से मेरे मन में था।
उसने मेरी कंधे पर हाथ रखा और बड़े सलीके से बात टालते हुए कहा, "देख भाई, अगर नज़र और दिमाग दोनों खुला रखेगा न, तो कमाने के बहुत ऑप्शन मिल जाएँगे। और यकीन मान, पैसे भी अच्छे मिलेंगे। बस घिसना बंद कर और थोड़ा स्मार्ट बन।"
उसकी इस बात से मैं इतना तो समझ गया था कि वह कोई भी 'टिकाऊ' या नौ-से-पांच वाली नौकरी नहीं करता। वह उन कामों को पकड़ता था जो दो-तीन दिन या ज्यादा से ज्यादा एक हफ्ते में खत्म हो जाएं और जिनका मेहनताना मोटा हो। उसकी बातों में एक ऐसा आत्मविश्वास था कि मेरा मन भी अब उस 'बंधी-बंधाई' नौकरी से ऊबने लगा था।
उस रात घर लौटते वक्त मैं रास्तों को अलग नज़रिए से देख रहा था। क्या वाकई मैं व्यर्थ में इतनी मेहनत कर रहा हूँ? मम्मी को पैसे भेजने के बाद मेरे पास जो बचता था, उससे तो इमरान के एक परफ्यूम की बोतल भी नहीं आती थी। मन के किसी कोने में एक छोटा सा विद्रोह जन्म ले रहा था।
"आज चलना है कहीं?" इमरान ने कमरे में दाखिल होते ही पूछा।
मैंने लैपटॉप बंद करते हुए उसकी ओर देखा, "कहाँ?"
"कहीं भी, जहाँ हवा तेज़ हो और शोर कम।"
मैंने एक पल के लिए मम्मी के बारे में सोचा, फिर अपनी मर्यादाओं के बारे में, और अंत में इमरान की उस 'सफलता' के बारे में जो मुझे अपनी ओर खींच रही थी।
"चलो," मैंने संक्षिप्त में जवाब दिया।
उस रात बाइक पर बैठकर जब ठंडी हवा मेरे चेहरे से टकराई, तो मुझे लगा कि शायद मैं अब सच में इस शहर का हिस्सा बन रहा हूँ।
पर क्या यह बदलाव वाकई मेरी सफलता की ओर पहला कदम था, या फिर बीरभूम वाले 'देव' की हार की शुरुआत? यह सवाल अब भी हवा में तैर रहा था, लेकिन उस वक्त, उस रफ़्तार में, मुझे बस इमरान जैसा बेपरवाह महसूस करना अच्छा लग रहा था।
उस रात पहली बार मिंट सिगरेट्स की धुआं और बीयर की गिरफ्त में जिंदगी वाकई एक जेल, एक बोझ से निकलने जैसी फील हुई थी। मैंने इस तरह का नशा पहले कभी नहीं किया था--- स्मोकिंग और बीयर पीने की नहीं; वो तो पहले भी करता आ रहा था; पर इस बार कुछ अलग था... संयोग से मेरे दो कलीग भी मिल गए थे उस रात एक बार में... हम सबने बहुत मजे किए... अपने फ्लैट में कब आया और कितने बजे आ कर सोया; इसका जरा सा भी मुझे होश नहीं रहा था।
संगति अपना असर दिखाने लगी थी.... और जाने - पहचाने राहें अब बेपरवाह लगने लगे थे।
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(26-05-2026, 09:06 PM)garamrohan Wrote: আপনার মুখে মারাঠি শব্দ শুনে কী দারুণ এক চমক পেলাম! গল্পটা সত্যিই অসাধারণ এগোচ্ছে। সাধারণত আমি ভিন্ন ধর্মের মানুষদের মধ্যকার প্রেমের গল্প (interfaith) খুব একটা পছন্দ করি না, কিন্তু আপনি যেভাবে গল্পটা সাজিয়েছেন—তা আমাকে এতটাই মগ্ন করে রেখেছে যেন আমি কোনো মূলধারার উপন্যাস পড়ছি। পরবর্তী আপডেটের জন্য অধীর আগ্রহে অপেক্ষা করছি।
আর ভাই, আপনার কাছে আমার আরেকটি অনুরোধ—আমাকে বাংলাটা শিখিয়ে দিন না! তাহলে আপনার লেখা এই চমৎকার সব গল্প পড়ার জন্য আমাকে আর কোনো অনুবাদকের (translator) সাহায্য নিতে হবে না।
हा हा हा! मला तुमची मराठी आवडली याबद्दल धन्यवाद। माझी मराठी खूप चांगली नाहीये। 'शिकारी' आणि 'नाय वरनभात लोन्चा कोण नाय कोन्चा' हे मराठी चित्रपट पाहून थोडीफार शिकलो आहे। बाकी इंटरनेटची मदत घेतो। btw, तुम्ही बंगाली भाषेत उत्तर दिलेलं पाहून मला खूपच चांगलं वाटलं। मला माहीत आहे की आंतरधर्मीय कथा (interfaith stories) तुम्हाला आवडत नाहीत; पण माझा विश्वास करा, मी खूप विचार करून हे लिहीत आहे। आणि काहीतरी कारणास्तवच लिहीत आहे। निव्वळ कुठल्या चीप फँटसीसाठी नाही। तुमच्या लेखी कथेचे वाचनही मी लवकरच सुरू करेन, एक गॅप आल्यामुळे मी त्या कथेशी डिस्कनेक्ट झालो होतो।
स्वस्थ राहा, मस्त राहा, व्यस्त राहा।
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एपिसोड 8: पारलौकिक किस्से और अनकही भावनाएँ
शहर की रातें अब मेरे लिए उतनी अजनबी नहीं रही थीं। इमरान के साथ रहते हुए मुझे उसकी दुनिया, उसके जीने के तरीके और उसकी मान्यताओं की परतों का पता चलने लगा था। इमरान अक्सर बातों-बातों में अपनी संस्कृति और परंपराओं का जिक्र छेड़ देता। कभी वह नशे की खुमारी में होता, तो कभी बिल्कुल होश में, लेकिन जब वह बोलने पर आता, तो ऐसा समां बांधता कि मैं चाहकर भी उससे नजरें नहीं हटा पाता।
बीरभूम के मेरे शांत माहौल में मैंने भूतों की कहानियाँ सुनी थीं, लेकिन इमरान के पास जो किस्से थे, वे रोंगटे खड़े कर देने वाले थे। वह इन्हें 'पारलौकिक' नहीं, बल्कि 'हकीकत' कहता था।
किस्से
एक रात, जब बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी और फ्लैट की खिड़कियां हवा के थपेड़ों से चरमरा रही थीं, इमरान ने अपनी आँखों में एक अजीब सी चमक लिए मेरी ओर देखा। "देव, तूने कभी अपनी परछाई को खुद से अलग होते देखा है?"
मैंने हंसकर टालना चाहा, "क्या बातें कर रहा है इमरान? यह मुमकिन नहीं है।"
इमरान गंभीर हो गया... "मेरे बड़े अब्बू (ताऊ जी) के साथ यह हुआ था। वह हमारे पुश्तैनी मकान के उस कमरे में सो रहे थे जो बरसों से बंद था। आधी रात को उनकी आँख खुली, तो उन्होंने देखा कि कमरे के कोने में कोई खड़ा है। जब उन्होंने टार्च जलाई, तो वहां कोई नहीं था, लेकिन दीवार पर उनकी अपनी परछाई... वह उनकी हलचल के साथ नहीं हिल रही थी। वह परछाई बस खड़ी उन्हें घूर रही थी। अगले दिन अब्बू की आवाज़ चली गई और वह कमरा हमेशा के लिए सील कर दिया गया। हमारे यहाँ कहते हैं कि जब जिन्न किसी की परछाई पर कब्ज़ा कर लेता है, तो इंसान सिर्फ एक खाली जिस्म बनकर रह जाता है।"
उसकी आवाज़ का लहजा इतना सपाट और यकीन से भरा था कि कमरे की ठंडी हवा और भी बर्फीली महसूस होने लगी।
"और मेरी अम्मी..." इमरान अचानक रुक गया, जैसे पुरानी यादें उसे जकड़ रही हों। "उन्होंने खुद एक बार 'साये' को देखा था। हमारे घर के पीछे एक बहुत पुराना कुआं था। अम्मी कहती थीं कि दोपहर के वक्त वहां से एक औरत की रोने की आवाज़ आती थी। एक दिन वह हिम्मत करके वहां गईं, तो उन्होंने देखा कि कुएं की मुंडेर पर एक छोटा सा बच्चा बैठा है। जैसे ही अम्मी उसके पास गईं, उस बच्चे का चेहरा अचानक किसी बूढ़े आदमी की तरह बदल गया और वह कुएं में कूद गया। अम्मी बीमार पड़ गईं, और हफ्तों तक उन्हें ऐसा लगता रहा कि कोई उनके कान में आकर फुसफुसाता है—'तुमने मुझे पहचान लिया, अब तुम्हें भी आना होगा।' अम्मी ने बहुत मुश्किल से खुद को संभाला, लेकिन उस दिन के बाद वह कभी अकेले अंधेरे में नहीं बैठीं।"
मैं इन सब बातों पर यकीन तो नहीं करता था, मेरा तार्किक मन इन्हें दिमाग की उपज मानता था, लेकिन जिस तरह इमरान इन्हें सुनाता था, वह अनुभव बहुत जादुई और भयावह होता था। वह रोंगटे खड़े करने वाला 'थ्रिल' मुझे पसंद आने लगा था।
भावनाएँ
कुछ दिनों बाद, एक रात मैं अपनी मम्मी से बहुत देर तक फोन पर बात कर रहा था। उनकी आवाज़ में वही चिर-परिचित चिंता थी—"खाना खाया? तबीयत ठीक है? पैसे बचा रहे हो न?" जब मैंने फोन रखा, तो मेरी आँखें थोड़ी नम थीं।
इमरान बालकनी में सिगरेट पी रहा था। उसने मुझे देखा और शरारत भरी मुस्कान के साथ कहा, "क्या बात है देव भाई? इतनी लंबी बात? पक्का कोई खास 'गर्लफ्रेंड' है जिसका जिक्र तूने अभी तक मुझसे नहीं किया।"
मैंने फीकी हंसी हंसते हुए कहा, "नहीं यार, मम्मी थी।"
इमरान को पहले यकीन नहीं हुआ, "इतनी देर तक मम्मी से कौन बात करता है?" पर जब उसने मेरा चेहरा देखा, तो उसका लहजा बदल गया। मैंने उसे अपने घर के बारे में बताया, मम्मी की उन तन्हा दोपहरों के बारे में बताया और यह भी कि कैसे वह छोटी-छोटी बातों पर परेशान हो जाती हैं।
"पता है इमरान," मैंने गला साफ करते हुए कहा, "जब पापा गए थे, तो मम्मी ने खुद को पत्थर बना लिया था ताकि मैं टूट न जाऊं। पर अब, जब मैं यहाँ हूँ, मुझे डर लगता है कि उनकी वह मजबूती कहीं खो न जाए। वह अकेले घर में बिना किसी बात के टेंशन लेने लगती हैं। कभी-कभी लगता है कि मैं उनके साथ होता तो शायद वह इतना नहीं डरतीं।"
बातें करते-करते मैं भावुक हो गया। शहर की भीड़ में जो अकेलापन मैं दबाए बैठा था, वह आज बाहर निकल आया। मैंने जेब से अपना मोबाइल निकाला और गैलरी में रखी मम्मी की एक तस्वीर उसे दिखाने लगा। यह तस्वीर तब की थी जब वह बीरभूम के आंगन में खड़ी थीं, उनके चेहरे पर एक सादगी भरी मुस्कान थी और आँखों में वही ममता।
इमरान मेरे बगल में ही बैठा था। जैसे ही उसने तस्वीर देखी, वह पत्थर सा हो गया। उसके चेहरे के हाव-भाव पल भर में बदल गए। उसकी वह 'स्मार्ट' और 'बेपरवाह' वाली छवि गायब थी। वह अपलक, बिना पलक झपकाए उस तस्वीर को देखता रहा। उसकी आँखों में एक अजीब सी गहराई थी—जैसे वह उस तस्वीर में अपनी खुद की कोई खोई हुई याद ढूंढ रहा हो, या शायद वह मम्मी की उस सादगी और शांति को महसूस कर रहा था जो उसकी इस शोर-शराबे वाली दुनिया से कोसों दूर थी।
कुछ मिनटों का भारी सन्नाटा पसर गया...
इमरान ने अपनी नज़रें तस्वीर से नहीं हटाईं.... उसने बहुत धीरे से अपना हाथ मेरे कंधे पर रखा। उसकी पकड़ में एक अलग तरह की संवेदना थी।
उसने बहुत धीमे, लगभग फुसफुसाते हुए कहा, "अच्छी है।"
उस एक शब्द में न जाने कितनी भावनाएं छिपी थीं—प्रशंसा, सम्मान या शायद एक टीस। इमरान ने मोबाइल मुझे वापस दिया, उसकी आँखों में अब एक अलग तरह की नमी या चमक थी जिसे मैं पहचान नहीं पाया। उसने आगे कोई बात नहीं की, कोई मज़ाक नहीं किया।
"गुड नाईट, देव," उसने छोटे से शब्दों में कहा और उठकर अपने कमरे की ओर चला गया।
उस रात इमरान का वह शांत और गंभीर रूप मेरे दिमाग से नहीं निकल रहा था। वह लड़का जो दुनिया की हर चीज़ को मज़ाक में उड़ा देता था या हल्के में लेता था... मम्मी की एक तस्वीर देख कर इतना चुप क्यों हो गया? क्या उस तस्वीर ने उसके भीतर के किसी ऐसे जख्म को छू दिया था जिसके बारे में मैं अब तक अनजान था?
शहर की रात हमेशा की तरह धीरे-धीरे शांत हो रही थी, पर मेरे जहन और फ्लैट के उस कमरे में आज एक ऐसी खामोशी थी जो बहुत कुछ कह रही थी—आने वाले दिनों के बारे में!
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एपिसोड 9: निगाहें और सवाल
उस रात के वाकये के बाद, फ्लैट के माहौल में एक सूक्ष्म सा बदलाव आ गया था। इमरान, जो पहले अपनी ही सतरंगी दुनिया में मस्त रहता था, अब अक्सर मेरे आसपास मंडराने लगा था। विशेषकर उन रातों में, जब मैं दफ्तर की किसी उलझी हुई फाइल को सामने रखकर ख्यालों में खोया होता, या लैपटॉप की स्क्रीन पर उंगलियां चला थकावट से कशमकश कर रहा होता, इमरान अचानक कमरे में दाखिल हो जाता।
वह बिना किसी औपचारिकता के सोफे पर पसर जाता और बातचीत का सिरा थाम लेता। बातें शुरू तो बेहद आम विषयों से होतीं—मेरा काम, ऑफिस की राजनीति, शहर का तनाव, और करियर। लेकिन धीरे-धीरे, बड़ी चतुराई से वह बातचीत के रुख को मोड़ देता। घूम-फिरकर उसकी बातों का कारवां मेरी फैमिली और आखिरकार मम्मी पर आकर रुक जाता।
"यार देव," एक रात उसने सिगरेट का धुआं उड़ाते हुए पूछा, "तेरी अम्मी घर पर अकेली रहती हैं, तो दिनभर करती क्या हैं? मतलब, उनके शौक क्या हैं? समय कैसे कटता होगा उनका?"
मैंने अपनी फाइल से नजरें हटाए बिना कहा,
"कुछ खास नहीं यार। बस घर के काम, थोड़ी-बहुत पूजा-पाठ, और शाम को कभी-कभार अपनी पड़ोसियों - सहेलियों से मिलना, बात करना।"
"अच्छा... यानी वह स्वभाव से थोड़ी इंट्रोवर्ट हैं?" उसने बेहद सहज बनते हुए पूछा,
"वैसे, उन्हें पहनावे में क्या पसंद है? जैसे छोटे शहरों में अक्सर औरतें सिर्फ साड़ियां ही पहनती हैं, क्या वह भी वैसी ही हैं?"
मुझे उसकी इन बातों में कोई बुराई नज़र नहीं आई…. महानगर के इस अकेलेपन में, जहाँ लोग अपनों को भूल जाते हैं, कोई मेरे परिवार के बारे में इतनी दिलचस्पी से पूछ रहा था, तो मुझे लगा कि वह दिल का अच्छा है। मैंने सोचा कि बेचारा खुद अपने घर और परिवार से कोसों दूर रहता है, शायद इसीलिए उसे मेरी मम्मी की बातों में अपनी अम्मी की छवि दिखती होगी या फिर वह एक पारिवारिक माहौल को मिस करता होगा।
"हाँ," मैंने मुस्कुराकर जवाब दिया, "मम्मी ज्यादातर साड़ी ही पहनती हैं। सुती साड़ियां उनकी पसंदीदा हैं। पर कभी-कभार जब सफर करना हो या कोई छोटा-मोटा काम, तो वह सलवार-सूट भी पहन लेती हैं।"
"सही है यार..." इमरान ने अपनी आँखें थोड़ी सिकाड़ते हुए कहा…. फिर थोड़ा झिझकते हुए बोला,
"अच्छा, वो फोन वाली तस्वीर दिखाना एक बार फिर… बहुत सलीका है उनके चेहरे पर।"
मैंने बिना कुछ सोचे अपना मोबाइल निकाला और गैलरी खोलकर उसे थमा दिया….
लेकिन इस बार, और इसके बाद की कई रातों में, मैंने कुछ ऐसी चीजें नोटिस कीं जिन्होंने मेरे मन में हल्के से कौतूहल और अजीब से अहसास को जन्म दिया।
जैसे ही मोबाइल इमरान के हाथ में जाता, उसके चेहरे के हाव-भाव एकदम से बदल जाते। उसकी आँखों की वह बेपरवाही गायब हो जाती और उसकी जगह एक गहरी, लगभग सम्मोहित कर देने वाली एकाग्रता ले लेती। वह बिना पलक झपकाए, बेहद खामोशी से तस्वीर को देखता रहता। उसकी उंगलियां स्क्रीन को ज़ूम करके चेहरे की बारीकियों को देखतीं।
और उसपे भी मैंने गौर किया कि वह मम्मी के चेहरे को ज़ूम करके उनके होंठों देर तक देखता रहता है... चाहे लिपस्टिक लगे हों या न हों.... उसकी स्थिर, अपलक आँखें साफ़ बताती की फोटो को देखते हुए वह कहीं खो गया है!
एक दिन जब वह बहुत देर तक तस्वीर को एकटक निहारता रहा, तो मुझसे रहा नहीं गया…. मैंने पूछा,
"क्या हुआ इमरान? इतनी देर से क्या देख रहा है तस्वीर में? कोई गड़बड़ है क्या?"
इमरान ने अपनी नजरें स्क्रीन से हटाए बिना एक गहरी सांस ली और बोला,
"नहीं यार, गड़बड़ कुछ नहीं है। बस... मैं एक फोटोग्राफर के नजरिए से देख रहा हूँ। यह पिक्चर अच्छी तो ली गई है, पर लाइट और एंगल का इस्तेमाल करके इसे और भी कमाल का लिया जा सकता था। चेहरा थोड़ा और साफ आ सकता था।"
उसकी यह दलील मुझे तार्किक लगी, इसलिए मैंने बात को वहीं रफा-दफा कर दिया। लेकिन इसके बाद, मैंने जो दूसरी बात नोटिस की, वह थोड़ी ज्यादा अजीब थी।
मम्मी की कुछ तस्वीरें साड़ी में थीं, जो आम तौर पर सामने से, हंसते हुए खींची गई थीं। इमरान उन तस्वीरों को देखता, पर जल्दी ही आगे बढ़ा देता। लेकिन गैलरी में कुछ तस्वीरें ऐसी थीं जब मम्मी घर की छत पर कपड़े सुखा रही थीं या आंगन में लगे पौधों में पानी डाल रही थीं। उन तस्वीरों में उन्होंने सलवार-सूट पहन रखा था, और वे तस्वीरें या तो 'साइड पोज' में थीं या फिर पीछे से ली गई थीं, जिनमें उनका पूरा ध्यान अपने काम पर था।
इमरान उन सलवार-सूट वाली साइड और पीछे से ली गई तस्वीरों पर आकर अटक जाता। वह उन तस्वीरों को बहुत देर तक, बेहद अजीब सी खामोशी के साथ देखता रहता। उसकी आँखों में एक ऐसी टकटकी होती जो मुझे असहज करने लगी थी।
"इमरान," मैंने थोड़ा कड़े लहजे में कहा, "तुझे ये साइड वाली तस्वीरें ज्यादा पसंद आ रही हैं क्या? तू हर बार इन्हीं पर आकर रुक जाता है।"
इमरान ने तुरंत खुद को संभाला। उसके चेहरे पर एक पल के लिए घबराहट आई, जिसे उसने अपनी उसी 'स्मार्ट टॉकिंग' के पीछे छुपाने की कोशिश की। वह हंसते हुए बोला,
"अरे देव भाई, तू भी न... शक करने लगता है। दरअसल, साइड प्रोफाइल और कैंडिड शॉट्स में इंसान का असली व्यक्तित्व उभर कर आता है। सामने से तो हर कोई पोज देता है, लेकिन जब कोई अनजाने में खड़ा हो, तो कैमरे में उसकी असली सादगी कैद होती है। मुझे बस ऐसी तस्वीरें आर्टिस्टिक लगती हैं।"
उसने मोबाइल मेरी तरफ बढ़ा दिया और उठकर खड़ा हो गया;
"चल, मैं सोता हूँ। कल सुबह जल्दी निकलना है।"
वह तो अपने कमरे में चला गया, लेकिन उस रात मुझे बहुत देर तक नींद नहीं आई। हालांकि मैंने खुद को समझाया कि मैं जरूरत से ज्यादा सोच रहा हूँ, इमरान बस एक कलात्मक नजरिए से तस्वीरों को देख रहा होगा। आखिर वह खुद भी इतना फैशनेबल और अप-टू-डेट रहता है, तो हो सकता है उसकी कलात्मक समझ मुझसे अलग हो। लेकिन फिर भी, मन के किसी सुदूर कोने में एक अजीब सी खटास और बेचैनी बैठ गई थी।
और ये बेचैनी आगे भी बनी रही...
हर बार इमरान का वह तस्वीरों को देखने का ढंग, वह अपलक निगाहें... हर बार मुझे थोड़ा अजीब, थोड़ा 'weird' जरूर महसूस करा जाती थीं।
To be Continued….
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एपिसोड 10: गहराता शक
संदेह का एक छोटा सा बीज जब मन में बो दिया जाता है, तो वह बहुत खामोशी से अपनी जड़ें फैलाने लगता है….
इमरान का वह तस्वीरों को देखने का अजीब तरीका, विशेषकर सलवार-सूट वाली साइड और पीछे से ली गई तस्वीरों पर उसका रुक जाना, मिनटों तक अपलक देखते रहना,.... मेरे दिमाग में एक फांस की तरह चुभ गया था। मैं चाहकर भी उस असहजता को भुला नहीं पा रहा था। दफ्तर में काम करते हुए भी कई बार मेरा ध्यान भटक जाता और आँखों के सामने इमरान का वह सम्मोहित चेहरा आ जाता।
मैंने सोचा कि शायद मैं ही जरूरत से ज्यादा संवेदनशील हो रहा हूँ, लेकिन मन का वो कोना मानने को तैयार नहीं था जिसे हम 'गट फीलिंग' कहते हैं…. और अगले कुछ दिनों में, मेरा यह शक सिर्फ गहरा नहीं हुआ, बल्कि इसने एक डरावनी शक्ल अख्तियार कर ली।
अब इमरान की आदतें और ज्यादा अजीब हो चुकी थीं। वह केवल रात के वक्त ही नहीं, बल्कि जब भी मुझे घर में अकेला किसी काम में उलझा हुआ पाता, किसी न किसी बहाने से बातचीत को मम्मी की तरफ मोड़ देता।
एक संडे की दोपहर जब मैं अपनी स्केचबुक लेकर बैठा था, इमरान मेरे कमरे के दरवाजे पर आकर टेक लगाकर खड़ा हो गया। उसके हाथ में हमेशा की तरह उसका फोन था….
"यार, तेरी अम्मी की वो जो छत वाली पिक्चर थी... वो तूने कब खींची थी? मतलब, मौसम कैसा था उस वक्त?"
मैंने पेंसिल को पेपर पर घिसते हुए थोड़ा रुखाई से कहा, "यार, दो साल पुरानी बात है। सर्दियों के दिन थे, शायद धूप सेक रही थीं वो। क्यों?"
"नहीं, बस ऐसे ही। लाइटिंग बहुत मस्त थी!" उसने बेहद हल्के अंदाज में कहा, पर उसकी आँखों में वही पुरानी टकटकी थी….
"वैसे, अम्मी जब घर में अकेली होती हैं, तो क्या वो कभी कोई गहने या भारी साड़ियां पहनती हैं? जैसे हमारी तरफ औरतें त्योहारों पर बिल्कुल अलग लगती हैं।"
इस बार मुझे उसकी बात बहुत ज्यादा अजीब लगी— कोई किसी दोस्त की माँ के पहनावे, उनके अकेलेपन और उनके हाव-भाव में इतनी बारीक दिलचस्पी कैसे ले सकता है?
मैंने हल्की रुखाई से ही कहा,
"जब तक मैं था वहाँ, आम तौर पर तो वह साड़ी या सलवार-कमीज़ ही पहनती थी... अभी तो यहीं हूँ, बहुत टाइम से घर नहीं गया... इसलिए कह पाना मुश्किल है की वह अब क्या....."
मैंने अपना लाइन जानबूझकर अधूरा छोड़ा... अपनी मम्मी के पहनावे के बारे में बाहर के किसी लड़के के साथ बात करना सही नहीं लगा।
मेरी बात सुन कर इमरान कुछ सोचते हुए धीरे से बड़बड़ाया, "जब तक वहाँ था.... हम्म।"
मैंने टोका उसे,
"क्यों पूछ रहा है ये सब?"
"कुछ खास नहीं, बस अपनी अम्मी के साथ तेरी अम्मी की कोम्प्रोमाईज़ कर रहा था..!" जवाब उसने इतनी जल्दी दिया मानो पहले से सोचकर रखा था।
"क्या..?! क्या कर रहा था?!"
"कोम्प्रोमाईज़.."
मैं उसकी तरफ देखता रहा... वो असहज हो कर बोला,
"अबे, कोम्प्रोमाईज़ नहीं समझता? तुलना करना यार!"
मैं हँस पड़ा... मुझे हँसता देख वो थोड़ा हैरान हो कर बोला,
"इसमें हँसने वाली क्या बात है...? हँसना छोड़ कर अपनी अँग्रेज़ी सुधारने पर ज़ोर दो!"
"अबे चोदू, वो कोम्प्रोमाईज़ नहीं, कम्पेयर बोलते हैं... या कम्पेरिज़न।" मैं हँसते हुए बोला।
"हाँ, वही।" वह चिढ़ गया।
थोड़ी देर चुप्पी के बाद वह फिर बोला,
"एक और बात पूछूँ?"
"हाँ, पूछ।"
"बुरा तो नहीं मानेगा?"
"इसकी गारंटी नहीं दे सकता।"
"तेरी अम्मी घर में नाईटी नहीं पहनती? हो सकता है पहले नहीं पहनती थी, लेकिन क्या पता, शायद अब पहनती हो?"
मुझे जवाब देने का मन नहीं किया, इसलिए बेमन से बोला,
"अब क्यों पहनेगी?"
"हो सकता है अब तू नहीं है वहाँ तो इसलिए शायद खुद को अभी ज़्यादा फ्री फील करती होगी।"
मैंने कुछ नहीं कहा... ऐसे एक्सप्रेशन दिया मानो अपने काम में कितना डूबा हुआ हूँ... मुझे कुछ बोलता नहीं देख कर इमरान धीरे से बोला,
"लेडीज़ लोग में होता है, घर में जवान बेटा हो तो नाईटी पहनने से दूर ही रहती है।"
इस बात पे मेरी जीभ मानो मेरे तालु से चिपक गयी! एक तो वैसे भी पता नहीं क्यों मैं अपनी मम्मी को लेकर आज बात करने के मूड में कतई नहीं था... और ऊपर से इमरान ऐसे विषयों को छेड़ रहा था जिसपे मैं खुद असहज था।
"इमरान," मैंने अपनी स्केचबुक बंद करते हुए सीधे उसकी आँखों में देखा। "तुझसे एक बात पूछूं? तू हर वक्त मेरी मम्मी के बारे में ही क्यों पूछता रहता है? तेरे पास अपनी फैमिली या किसी और चीज की बातें नहीं हैं क्या?"
मेरे अचानक इस तरह सीधे पूछने से इमरान के चेहरे पर एक पल के लिए हवाइयां उड़ गईं। उसकी 'स्मार्ट टॉकिंग' का मुखौटा जैसे सरक गया… उसने नजरें चुराईं और थोड़ा हकलाते हुए बोला,
"अरे... अरे नहीं भाई! तू तो सीरियस हो गया। मैंने कहा था न, मैं चीजों को एक विजुअल आर्टिस्ट की तरह देखता हूँ। मुझे बस... उस सादगी में एक कहानी दिखती है। तू गलत समझ रहा है।"
वह हंसने की कोशिश कर रहा था, लेकिन उसकी हंसी खोखली थी। वह तुरंत वहां से हट गया और अपने कमरे में चला गया।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई…
असली झटका मुझे उस रात लगा जब मुझे देर रात प्यास लगी….
घड़ी में रात के करीब पौने तीन बजे थे। पूरा फ्लैट अंधेरे में डूबा था। मैं दबे पांव रसोई की तरफ बढ़ा और फ्रिज से पानी की बोतल निकाली। पानी पीकर जब मैं वापस अपने कमरे की तरफ लौट रहा था, तो मैंने देखा कि हॉल में इमरान के कमरे का दरवाजा थोड़ा खुला हुआ था और अंदर हल्की सी रोशनी जल रही थी।
आमतौर पर मैं किसी की प्राइवेसी में दखल नहीं देता, लेकिन एक अजीब सी उत्सुकता और अंदेशे ने मेरे कदम वहीं रोक दिए। मैंने दबे पांव जाकर दरार से अंदर झांका।
जो दृश्य मैंने देखा, उसने मेरे पैर तले की जमीन खिसका दी।
इमरान अपने बिस्तर पर बैठा था। कमरे की लाइट बंद थी, सिर्फ उसके लैपटॉप की स्क्रीन की तेज रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी। और उस स्क्रीन पर... मेरी मम्मी की वही छत वाली, पीछे से ली गई तस्वीर खुली हुई थी। लेकिन वह सिर्फ तस्वीर नहीं देख रहा था। उसने किसी फोटो-एडिटिंग सॉफ्टवेयर में उस तस्वीर को खोल रखा था।
वह तस्वीर को ज़ूम कर रहा था, कभी मम्मी के हाथों की चूड़ियों पर, कभी उनकी साड़ी के पल्लू के लहराने के एंगल पर, तो कभी उनके खड़े होने के पोज पर, कभी उनके उठे हुए नितम्बों पर.... तो कभी ब्लाउज से झाँकती उनकी पीठ पर..! वह स्क्रीन पर उंगली फिराते हुए कुछ बड़बड़ा रहा था, जैसे कोई गणितीय समीकरण सुलझा रहा हो…. उसके चेहरे पर जो भाव थे, वे किसी साधारण इंसान के नहीं थे। उसकी आँखों में एक अजीब सा पागलपन, एक गहरा जुनून और... एक खौफनाक सम्मोहन था।
"बिल्कुल वही... वही झुकाव है। समय भी सही है..." उसने बहुत धीमी आवाज में खुद से कहा।
तभी उसका हाथ लैपटॉप के बगल में रखे एक पुराने, फटेहाल रजिस्टर पर गया। उसने उसे खोला, जिसमें कुछ उर्दू या पुरानी लिपि में लिखा हुआ था, और साथ में कुछ अजीब से रेखाचित्र बने हुए थे जो देखने में किसी तरह का तंत्र जैसे लग रहे थे। उसने उस रजिस्टर के पन्ने पलटे और फिर स्क्रीन पर मम्मी की तस्वीर को देखा....
मेरी छाती में हथौड़े जैसी धड़कनें गूंजने लगीं…. यह कोई सामान्य बात नहीं थी। इमरान का मेरी मम्मी की तस्वीरों में यह रुझान क्या किसी वासना या साधारण आकर्षण का है, या... या शायद कहीं कुछ और है...?
क्या इमरान मेरी मम्मी की इस तस्वीर का इस्तेमाल किसी अजीब काम के लिए कर रहा था? क्या उसका मुझसे दोस्ती करना और इस फ्लैट में आना सिर्फ एक इत्तेफाक था, या कोई खौफनाक मंसूबा?
मैं बिना कोई आवाज किए, उल्टे पांव अपने कमरे में लौट आया। सुबह तक मेरी आँखों से नींद गायब थी।
कमरे की खिड़की से बाहर दिखती शहर की इमारतें अब मुझे और भी ज्यादा डराने लगीं थीं…. मैं समझ गया था कि इमरान कोई साधारण रूममेट नहीं है, और अब मुझे बेहद सतर्क रहना होगा।
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एपिसोड 11: दहलीज पर ममता
इस शहर में आए हुए मुझे बहुत दिन बीत गए थे... दिन क्या, महीने बीत गए थे... घर और मम्मी की याद बहुत अधिक सताने लगी थी। और बात बस यादों तक सीमित नहीं रही थी... ये अब चिंता का रूप लेने लगी थी... मम्मी अकेले वहाँ कैसे होगी? कैसे दिन बीता रही होगी? कहीं कभी बीमार पड़ गई तो? ध्यान कौन रखेगा इनका वहाँ?
इन सब चिंताओं के कारण ही मैंने उनको अपने यहाँ ले आने का निर्णय लिया।
बीरभूम के उस शांत, छोटे से घर से मम्मी को इस बड़े और रफ्तार से भागते शहर में लाने के लिए मुझे न जाने कितने पापड़ बेलने पड़े थे। फोन पर हर बार मेरी जिद के आगे वह अपनी कोई न कोई मजबूरी रख देती थीं—कभी घर की रखवाली, कभी पैसों की फिजूलखर्ची, तो कभी सफर की थकान। लेकिन आखिरकार, मेरी जिद और ममता की डोर जीत गई। वह कुछ दिनों के लिए मेरे फ्लैट पर रहने चली आईं।
जब वह सामान समेटकर मेरे फ्लैट में रहने आई, तो फ्लैट की दीवारों का सन्नाटा जैसे हमेशा के लिए गायब हो गया। वह दिन मेरी जिंदगी के सबसे खूबसूरत दिनों में से एक था। मैंने तय कर लिया था कि इन कुछ दिनों में मैं मम्मी को दुनिया की हर खुशी दूंगा। मैंने उन्हें शहर की बड़ी-बड़ी इमारतें दिखाईं, मखमली सीटों वाले थियेटर में फिल्म दिखाई और शाम को एक आलीशान रेस्टोरेंट में ले गया।
"बेटा, इतने बड़े होटल में आने की क्या जरूरत थी रे? घर पर ही दो रोटियां बना लेती मैं," उन्होंने रेस्टोरेंट के झूमरों और सजे-धजे बियरिंग टेबल को देखकर धीरे से मेरे कान में कहा।
"मम्मी, आज कोई बहस नहीं। आज आप सिर्फ आराम करेंगी और वीआईपी की तरह खाएंगी," मैंने मुस्कुराते हुए मेन्यू उनके सामने रख दिया।
मैंने उन्हें उनकी पसंद का खाना और बाद में एक मशहूर पार्लर से नए फ्लेवर की चोको-बादाम आइसक्रीम खिलाई। ठंडी और मलाईदार आइसक्रीम का पहला चम्मच मुंह में लेते ही उनके चेहरे पर जो बच्चों जैसी मासूम खुशी आई, उसने मेरा दिल जीत लिया। वह खुश थीं, बहुत खुश थीं। उनकी आँखों में मेरे लिए एक गहरा गर्व तैर रहा था।
"तू अब सच में बहुत बड़ा और जिम्मेदार हो गया है," उन्होंने पार्क की बेंच पर बैठते हुए मेरे सिर पर हाथ रखा। "ईश्वर तुझे और आगे बढ़ाए, बहुत तरक्की दे। लेकिन बेटा, एक माँ की बात मान, इतना खर्च मत किया कर। अभी शुरुआत है, भविष्य के लिए बचत करना बहुत जरूरी है।"
"मम्मी, आपका आशीर्वाद अगर साथ हैं तो बचत भी हो जाएगी। आज का दिन सिर्फ आपके लिए है," मैंने उनका हाथ थामते हुए कहा। उस दिन मैंने उन पर दिल खोलकर खर्च किया, उनकी पसंद की सूती साड़ियां खरीदीं और उन्हें महसूस कराया कि उनका बेटा अब वाकई अपने पैरों पर खड़ा हो चुका है।
उस पूरे दिन इमरान फ्लैट में नहीं था। वह अपने किसी 'शॉर्ट-कट' वाले काम के सिलसिले में शहर से बाहर गया हुआ था। मुझे भी एक तरह से अच्छा लगा कि मुझे और मम्मी को बिना किसी तीसरे की दखलअंदाजी के पूरा वक्त साथ बिताने को मिला….
अगली सुबह, रसोई से चाय और छौंक की खुशबू आ रही थी। मम्मी रसोई में नाश्ता तैयार कर रही थीं और मैं डाइनिंग टेबल पर बैठा अखबार देख रहा था। तभी अचानक फ्लैट का मुख्य दरवाजा खुला और इमरान अंदर दाखिल हुआ। उसके कंधे पर एक बैग था और चेहरे पर थकान, जो सफर से लौटने की गवाही दे रही थी।
लेकिन जैसे ही उसने हॉल को पार कर रसोई की तरफ कदम बढ़ाए, वह ठिठक गया…
सामने एक महिला को साड़ी पहने, सलीके से काम करते देख उसके पैरों के नीचे की जमीन जैसे जम गई। वह बुरी तरह चौंक गया था। शहर के इस फ्लैट में, जहाँ सिर्फ हम दो लड़के रहते थे, एक संभ्रांत महिला की मौजूदगी उसके लिए बिल्कुल अप्रत्याशित थी।
"अरे... देव? ये... कौन है?" इमरान ने हकबकाते हुए मेरी तरफ देखा।
बेचारा, फोटो में लाख घूर-घूर कर देखे, लेकिन सामने से पहचान ही नहीं पा रहा!
मैं अपनी कुर्सी से उठा और मुस्कुराते हुए बोला,
"इमरान, ये मेरी मम्मी हैं। कल ही आई हैं….।"
'मम्मी' शब्द सुनते ही इमरान के चेहरे का रंग जैसे उड़ गया। उसने एक बार मुझे देखा और फिर रसोई की चौखट पर खड़ी मम्मी को। उसके चेहरे पर आए अविश्वास के भाव इतने साफ थे कि कोई भी उन्हें पढ़ सकता था। उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि जिस महिला को उसने अब तक सिर्फ मोबाइल की स्क्रीन पर, तस्वीरों में देखा था, वह आज साक्षात उसके सामने खड़ी थी।
मम्मी ने अपनी आदत के अनुसार शालीनता से मुस्कुराते हुए बोली,
"कैसे हो, इमरान? देव, अक्सर तुम्हारे बारे में बताता रहता है।"
इमरान ने तुरंत खुद को संभाला, उसकी हमेशा की 'स्मार्ट टॉकिंग' आज कहीं गायब थी।
"म.. मेरे बारे में...?"
इमरान हकलाया... चेहरे पर आए भाव ने साफ़ बताया की बेचारा बुरी तरह डर और घबरा गया है।
पर, फिर मुझे और मम्मी को मुस्कराते देख कर वो समझ गया की जो समझ कर वो घबरा गया था, वैसी कोई बात नहीं है।
उसने चेहरे पर जल्दी से मुस्कान लाते हुए बोला,
"नमस्ते आंटी जी... देव भी बहुत अच्छा लड़का है। मुझे... मुझे बस अचानक यकीन नहीं हुआ कि आप यहाँ हैं। देव ने बताया नहीं था कि आप कल ही आ रही हैं।"
"हाँ, वो इसके पापा की तरह ही थोड़ा जिद्दी है। अचानक ही टिकट करा कर ले आया,"
मम्मी ने चाय का कप टेबल पर रखते हुए कहा… "बैठो बेटा, सफर से आए हो, चाय पियोगे?"
"जी, बिल्कुल," इमरान ने कहा और सोफे पर बैठ गया।
इसके बाद अगले दस-पंद्रह मिनट दोनों के बीच बेहद औपचारिक और इधर-उधर की बातें होती रहीं। मम्मी घर के मौसम और वहां के शांत जीवन के बारे में बता रही थीं और इमरान बहुत ध्यान से, एक संस्कारी लड़के की तरह उनकी बातें सुन रहा था।
बातचीत बहुत सामान्य थी, लेकिन मैं सोफे के कोने में बैठा इमरान के चेहरे को पढ़ रहा था….
उसकी आँखों में एक अजीब सी, गहरी चमक थी। वह अंदर ही अंदर इतना ज्यादा खुश नज़र आ रहा था कि उसकी वो खुशी उसके चेहरे पर साफ छलक रही थी। वह बात करते-करते बार-बार मम्मी के चेहरे, उनके बात करने के लहजे और उनकी सादगी को बहुत करीब से देख रहा था।
उसका खुश होना स्वाभाविक हो सकता था कि उसके दोस्त की माँ आई हैं, लेकिन उसकी खुशी में एक अजीब सा उत्साह था, एक ऐसा रोमांच था जो मुझे उस वक्त समझ नहीं आया। वह रह-रहकर मुस्कुरा उठता और मम्मी की हर छोटी बात पर इस तरह हामी भरता जैसे उसे उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी मुराद मिल गई हो।
"अच्छा आंटी जी, मैं थोड़ा फ्रेश हो जाता हूँ," कुछ देर बाद इमरान उठा और अपने कमरे की तरफ बढ़ गया।
जाते-जाते उसने एक बार फिर पलटकर मम्मी को देखा, और फिर मेरी तरफ देखकर एक मुस्कान दी। मैं वहीं खड़ा सोच रहा था—इमरान मेरी मम्मी के आने से इतना ज्यादा उत्साहित और खुश क्यों है? क्या यह सिर्फ एक अदब था, या फिर कुछ ऐसा जिसकी भनक मुझे अभी नहीं थी?
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एपिसोड 12: खामोशियाँ
मम्मी के आने से फ्लैट में जो रौनक आई थी, वह दो दिनों तक तो बड़े अच्छे से चली। बीरभूम की सादगी और महानगर की इस चकाचौंध के बीच एक खूबसूरत तालमेल बैठ गया था। मैं रोज सुबह उनके हाथ का बना नाश्ता खाकर दफ्तर जाता और शाम को लौटकर उनके साथ दिनभर की बातें साझा करता। लेकिन तीसरे दिन से अचानक न जाने क्या हुआ कि घर की हवा में एक अजीब सा तनाव घुलने लगा। मम्मी का व्यवहार अचानक बदलने लगा था, और वह कुछ ऐसी हरकतें करने लगी थीं जो सामान्य तो बिल्कुल नहीं थीं।
मैंने गौर किया कि उनका यह 'weird' व्यवहार किसी और समय नहीं, बल्कि खास तौर पर तब उभर कर आता था जब इमरान आसपास होता था!
जब भी इमरान कमरे में दाखिल होता या डाइनिंग टेबल पर हमारे साथ बैठता, मम्मी अचानक सहम जातीं। उनकी आँखों में अनजाना सा कुछ तैर जाता, जिसे वह अपनी साड़ी के पल्लू को उंगलियों में भींचकर छुपाने की कोशिश करती थीं। जहाँ पहले दिन उन्होंने बेहद अपनेपन से इमरान को चाय दी थी, अब वह इमरान की मौजूदगी में कुछ परेशान सी रहने लगी थीं। वह जानबूझकर रसोई से बाहर नहीं निकलती थीं या अगर हॉल में होतीं, तो इमरान के आते ही किसी न किसी बहाने से उठकर मेरे कमरे में चली जाती थीं। वह इमरान से एक सोची-समझी दूरी बनाए रखने की पूरी कोशिश कर रही थीं।
एक शाम जब इमरान बालकनी में फोन पर बात कर रहा था, मैं रसोई में पानी पीने गया। मम्मी वहां बर्तन समेट रही थीं, लेकिन उनका ध्यान काम में नहीं था। वह बार-बार मुड़कर हॉल की तरफ देख रही थीं, जैसे किसी की आहट का इंतजार कर रही हों…
मुझसे अब और रहा नहीं गया….
मैंने उनके पास जाकर उनके हाथ पर अपना हाथ रखा,
"मम्मी... क्या बात है? आप पिछले दो दिनों से बहुत परेशान लग रही हैं…. क्या आपको यहाँ कोई तकलीफ है? या मुझसे कोई गलती हुई है?"
मम्मी ने एक पल के लिए चौंककर मुझे देखा—
उनकी आँखों में वो बेबसी थी जिसे मैं बचपन से पहचानता था। लेकिन अगले ही पल, उन्होंने अपने चेहरे पर एक झूठी, फीकी सी मुस्कान ओढ़ ली और बात को टालने के लहजे में बोलीं,
"अरे, नहीं तो! मुझे क्या परेशानी होगी? मेरा बेटा इतने अच्छे शहर में रहता है, इतना बड़ा फ्लैट है। मैं तो बस... बीरभूम की याद आ रही थी। वहां घर पर ताला लगा है न, तो बस उसी की चिंता लगी रहती है।"
"मम्मी, आप मुझसे झूठ बोल रही हैं," मैंने थोड़ा ज़ोर देकर कहा, "बीरभूम की चिंता में कोई इस तरह परेशान नहीं रहता… मुझे साफ दिख रहा है कि आप असहज हैं! बात क्या है, आप मुझे क्यों नहीं बता रहीं?"
"कुछ नहीं है देव, तू बिना बात के बात का बतंगड़ बना रहा है… जा, जाकर अपना काम कर, दफ्तर की फाइलें देख," उन्होंने मुस्कुराकर मेरे गाल को सहलाया और मुझे रसोई से बाहर ढकेल दिया।
उन्होंने भले ही बात हंसकर टाल दी थी, लेकिन मैं कोई बच्चा नहीं था। मन के किसी गहरे कोने से मुझे यह साफ और मजबूत फीलिंग आ रही थी कि मम्मी का यह बदला हुआ, सहमा हुआ व्यवहार जरूर इमरान को लेकर ही था। उनका इमरान के सामने आते ही असहज हो जाना, उसकी नजरों से बचना, और उसकी अनुपस्थिति में एक गहरी सांस लेना—यह सब सीधे तौर पर इमरान की तरफ इशारा कर रहा था।
लेकिन सबसे बड़ी दुविधा यह थी कि मेरे पास कोई ठोस सबूत या ठोस वजह नहीं थी जिसके दम पर मैं मम्मी से दोबारा कड़ाई से पूछता या इमरान को सीधे कन्फ्रंट करता। मैं इमरान से क्या कहता? यही कि तुम जब सामने आते हो तो मेरी मम्मी चुप हो जाती हैं? वह इसे मेरा वहम कहकर उड़ा देता, जैसा कि वह अक्सर अपनी 'स्मार्ट टॉकिंग' से करता आया था… और फिर, मुझे इमरान के उस रहस्यमयी रजिस्टर और लैपटॉप पर मम्मी की तस्वीरों को ज़ूम करके देखने वाली रात भी याद थी।
एक तरफ इमरान का वह उस दिन वाला एक अर्थपूर्ण मुस्कान था, और दूसरी तरफ मम्मी का यह जीती-जागती घबराहट— इन दोनों कड़ियों के बीच कोई न कोई ऐसा खौफनाक रिश्ता जरूर था जिसे मैं देख नहीं पा रहा था।
रात के खाने की मेज पर सन्नाटा और भी गहरा हो गया… इमरान ने बेहद सामान्य बनने की कोशिश करते हुए कहा,
"आंटी जी, आज कोई कहानी नहीं सुनाई आपने? देव कह रहा था कि वहां बड़े पुराने किस्से हैं।"
मम्मी ने अपनी नजरें नीचे रखीं और केवल सिर हिलाकर रह गईं,
"नहीं बेटा, आज थोड़ा सिर भारी है।"
मैंने देखा कि इमरान की निगाहें मम्मी के झुके हुए चेहरे पर टिकी थीं, कुछ सेकंड चेहरे पर टिके रहने के बाद नज़रें अपने-आप सुराहीदार गले से होते हुए उनके भरे सीने पर आकर जम जातीं... वहाँ भी कुछ अच्छे सेकंड रहने के बाद ही उसकी नज़रें अपने खाने पर आ कर स्थिर होतीं।
और उसकी उन आँखों में वही रहस्यमयी, गहरी टकटकी थी जिसने मुझे पहले भी किसी अनहोनी से डराया था…. मैं अपनी उंगलियों को भींचे बस देखता रह गया।
मैं एक ऐसे मोड़ पर खड़ा था जहाँ अपने ही घर में, अपने सबसे अच्छे दोस्त और अपनी माँ के बीच एक अनकही, खौफनाक जंग चल रही थी, और मैं चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहा था।
To be Continued….
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13-06-2026, 12:48 PM
(This post was last modified: 13-06-2026, 12:55 PM by The_Writer. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
एपिसोड 13: राहत की धूप
अगले दो-तीन दिन का समय सतह पर तो बिल्कुल सामान्य बीता, लेकिन घर के भीतर एक अजीब सी खामोशी तैर रही थी। मम्मी का वह सहमा हुआ व्यवहार पूरी तरह खत्म नहीं हुआ था; उनके भीतर की वो 'weirdness' या हिचकिचाहट अब भी थोड़ी-बहुत बनी हुई थी। वह अब भी घर में चलते-फिरते वक्त सतर्क रहती थीं। दूसरी तरफ, इमरान ने जैसे खुद ही हमारे सामने आना कम कर दिया था। वह ज्यादातर अपने कमरे में रहता या किसी काम से बाहर चला जाता। लेकिन उन दिनों वह जब भी हमारे सामने आया, उसका रवैया बेहद शालीन था। खासकर मम्मी के साथ उसने बहुत अदब और सम्मान से व्यवहार किया, जैसे वह उनके डर को भांपकर खुद उन्हें सहज करने की कोशिश कर रहा हो।
चौथे दिन सुबह की शुरुआत हमेशा की तरह हुई। करीब नौ बजे के आसपास इमरान नहा-धोकर, साफ़-सुथरे कपड़ों में तैयार होकर कमरे से बाहर निकला। उसने डाइनिंग टेबल पर हमारे साथ बैठकर बेहद शांति से नाश्ता किया। बातचीत भी सामान्य रही। लेकिन नाश्ता खत्म होते ही वह अपने कमरे में गया और अचानक एक ट्रैवल बैग हाथ में लिए बाहर आया।
उसके हाथ में बैग देख मैं चौंक गया,
"अरे इमरान? ये अचानक बैग... कहीं जा रहा है क्या?" मैंने पूछा।
इमरान ने बैग को फर्श पर रखा और थोड़ा गंभीर होकर बोला,
"हाँ देव भाई, अचानक घर से कॉल आया था… अम्मी ने कहा है कि मुझे तुरंत निकलना होगा।"
"क्यों? सब खैरियत तो है न?" मैंने उत्सुकता और थोड़ी चिंता के साथ पूछा। रसोई की चौखट पर खड़ी मम्मी भी शांत रहकर हमारी बातें सुन रही थीं।
इमरान ने एक हल्की सांस ली,
"हाँ, फोन पर तो कहा कि घर पर सब ठीक ही है। लेकिन तुझे तो पता है, अम्मी अक्सर छोटी-छोटी बातों पर परेशान हो जाती है। अब असल बात क्या है जिसकी वजह से मुझे यूँ अचानक बुलाया जा रहा है, ये तो मुझे घर जाकर ही पता चलेगा। वैसे भी बहुत वक्त से घर गया नहीं हूँ।"
उसने आगे बढ़कर मम्मी के सामने हाथ जोड़े,
"अच्छा आंटी जी, मैं चलता हूँ। अपना ख्याल रखिएगा।"
मम्मी ने बस धीमे से सिर हिलाया और चेहरे पर एक औपचारिक मुस्कान ले आईं, लेकिन उनके चेहरे पर एक अजीब सा ठहराव था।
मम्मी ऊपर बालकनी में ही खड़ी रहीं और मैं इमरान को नीचे तक छोड़ने के लिए उसके साथ आया। नीचे आकर मैंने अपनी बाइक की तरफ इशारा करते हुए कहा,
"चल, मैं तुझे स्टेशन तक छोड़ देता हूँ। वैसे भी आज ऑफिस थोड़ा लेट जाऊंगा तो चलेगा।"
इमरान ने तुरंत मना करते हुए कहा,
"नहीं-नहीं देव भाई, बिल्कुल नहीं। तू ऑफिस के लिए लेट मत हो। मैंने ऑटो वाले को फोन कर दिया है, वो मोड़ पर ही खड़ा है। मैं अकेला ही चला जाऊंगा। तू बस आंटी का ख्याल रख।"
उसने मेरे कंधे को थपथपाया, अपनी वही मुस्कान दी और बैग उठाकर आगे बढ़ गया।
दिनभर दफ्तर में काम करते हुए भी मेरे दिमाग में यही चल रहा था कि इमरान का इस तरह अचानक जाना कहीं मम्मी के उस अजीब व्यवहार से तो नहीं जुड़ा था? क्या उसने जानबूझकर घर जाने का बहाना बनाया?
शाम को जब मैं ऑफिस की थकावट समेटकर फ्लैट पर लौटा, तो जैसे ही मैंने दरवाजा खोला, मुझे घर का माहौल बिल्कुल बदला हुआ लगा। रसोई से मम्मी के गुनगुनाने की धीमी आवाज़ आ रही थी। हॉल में आकर मैंने देखा—मम्मी बहुत खुश लग रही थीं। उनके चेहरे का वो दो दिनों का तनाव, वो डर और वो घबराहट जैसे कपूर की तरह उड़ चुकी थी।
वह पूरे फ्लैट में बहुत 'freely' चल-फिर रही थीं। पौधों में पानी डालते हुए, सोफे की चादर ठीक करते हुए उनके हाव-भाव में एक अजीब सा सुकून था, मानो वह किसी अदृश्य बंधन या बहुत बड़े मानसिक दबाव से आज़ाद हो गई हों। वह सचमुच एक अलग ही फ्रीडम में जी रही थीं।
"आ गया? हाथ-मुंह धो ले, मैंने तेरी पसंद के गरमा-गरम पनीर के पकौड़े बनाए हैं,"
उन्होंने रसोई से आवाज दी। उनकी आवाज़ में वही बीरभूम वाली खनक वापस आ गई थी।
मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि इमरान के जाते ही मम्मी के भीतर यह चमत्कारी बदलाव कैसे आ गया। उनके इस विरोधाभासी व्यवहार की पहेली मेरे लिए अब भी अनसुलझी थी। लेकिन उस वक्त, उस खूबसूरत शाम को, मैंने अपने दिमाग पर ज्यादा ज़ोर देना ठीक नहीं समझा… महीनों बाद मम्मी को इस तरह खुलकर हंसते और खुश देखकर मेरे मन का सारा बोझ हल्का हो गया। मैं भी बेहद खुश और पूरी तरह निश्चिंत हो गया, यह सोचकर कि चलो, कम से कम मेरी माँ अब सुरक्षित और सहज महसूस कर रही है।
और मम्मी की यह ख़ुशी अगले चार दिनों तक यथावत बनी रही..
लेकिन फिर....
To be Continued….
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