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Adultery FLAT MATE
#1
1) तन्हाई और सुनहरे सपने

सुबह की पहली किरण जब खिड़की के झरोखे से छनकर रसोई में दाखिल हुई, तो चाय की पत्ती की खुशबू के साथ एक अजीब सी खामोशी भी साथ ले आई। यह खामोशी हमारे घर में तब से बस गई थी, जब से पापा गए थे। रसोई में बर्तन सहेजने की आवाज आ रही थी—मम्मी हमेशा की तरह अपने काम में मशगूल थीं।

मम्मी की उम्र वैसे तो 40 के पार हो चुकी है, लेकिन आज भी जब वह अपने बालों को सलीके से बांधकर हल्के गुलाबी रंग की सूती साड़ी में सामने आती हैं, तो कोई भी उन्हें उनकी सही उम्र का नहीं बता सकता। वह अब भी अपनी उम्र से कहीं कम, शायद 30 की ढलती हुई शाम जैसी लगती हैं। उनकी आंखों में एक ठहराव है, जिसे दुनिया समझदारी कहती है, पर मैं जानता हूँ कि वह केवल अपनी तनहाई को छुपाने का एक पर्दा है।

मैंने मेज पर हाथ टिकाए उन्हें चाय छानते हुए देखा….

"मम्मी," मैंने धीरे से पुकारा।

"हूँ?" उन्होंने बिना मुड़े जवाब दिया।

"पापा के बिना... अब सब कैसा लगता है? मतलब, सुबह से शाम तक आपकी जिंदगी कैसे कटती है?" मेरा सवाल सीधा था, पर शायद उनके लिए बहुत भारी।

मम्मी के हाथ एक पल के लिए ठिठके.. चाय की केतली से निकलता धुंआ उनकी आंखों के सामने एक धुंध सा बना रहा था। उन्होंने पलटकर मेरी ओर देखा, चेहरे पर वही चिर-परिचित मुस्कान तैर आई—वह मुस्कान जो अक्सर सवालों को दफनाने के काम आती है….

"अरे, मेरी छोड़," उन्होंने बात को बड़ी चतुराई से मोड़ दिया। "तू ये बता, कल जिन कंपनियों के बारे में बात कर रहा था, वहां अप्लाई किया या बस बातों के ही पुल बांध रहा है?"

मैं समझ गया कि वह अपनी खाली दोपहरों और सूने कमरों की बात नहीं करना चाहतीं…. मैंने कुर्सी खींचते हुए कहा, 

"हाँ, तीन जगह रिज्यूमे भेजा है। एक तो काफी बड़ी टेक फर्म है।"

यह सुनते ही उनके चेहरे पर जो चमक आई, उसने मेरे दिल को एक साथ सुकून और दर्द दोनों दिया। वह मेरे पास आकर बैठ गईं, उनके हाथ मेज पर रखे मेरे हाथ पर थे। 

"सच? चलो, भगवान करे कहीं बात बन जाए।"

दरअसल, मम्मी को मेरी ड्राइंग टीचर वाली नौकरी से कोई नफरत नहीं थी। जब मैं बच्चों को रंगों और रेखाओं के बीच खोया हुआ देखता, तो वह दूर से मुस्कुराती जरूर थीं। लेकिन उनके लिए वह एक 'हॉबी' थी, 'फ्यूचर' नहीं। उन्हें लगता था कि एक आर्टिस्ट की जिंदगी में उतार-चढ़ाव बहुत होते हैं, और वह नहीं चाहती थीं कि मैं कभी भी आर्थिक असुरक्षा के उस दौर से गुजरूँ, जिससे उन्होंने और पापा ने हमें बचाया था।

"देख बेटा," उन्होंने अपनी बात जारी रखी, "मैं नहीं चाहती कि कल को तू अपने दोस्तों को देखकर यह सोचे कि तू पीछे रह गया। तेरे साथ वाले अब बड़ी गाड़ियों और ऊंचे पदों की बातें करते हैं। कला अपनी जगह है, पर एक ठोस भविष्य भी तो जरूरी है न?"

उनकी चिंता जायज थी। वह अक्सर रात को देर तक जागती रहती थीं, शायद यही सोचकर कि मेरा कल कैसा होगा। उनकी नजरों में सफलता का मतलब एक दफ्तर, एक तयशुदा सैलरी और समाज में एक रुतबा था।

मैंने उनकी आंखों में झांका, जहाँ मेरे लिए बेपनाह फिक्र थी। "मम्मी, मुझे अपनी चिंता उतनी नहीं सताती, जितनी आपकी होती है," मैंने आखिरकार वह बात कह दी जो मेरे सीने में दबी थी।

मम्मी ने सवालिया नजरों से मुझे देखा।

"अगर मुझे वह कॉर्पोरेट जॉब मिल गई, तो मैं सुबह 9 बजे घर से निकलूँगा और रात को 8 बजे वापस आऊँगा। इस बड़े से घर में आप पूरे दिन क्या करेंगी? किसके साथ बातें करेंगी? मुझे डर लगता है कि आप इस अकेलेपन में और ज्यादा खो जाएँगी," मेरी आवाज में एक हल्की सी थरथराहट थी।

मम्मी एक पल के लिए चुप हो गईं। कमरे में सन्नाटा इतना गहरा था कि घड़ी की टिक-टिक भी हथौड़े की तरह सुनाई दे रही थी। फिर उन्होंने मेरा सिर सहलाया और बड़े धीरज से कहा, 

"पागल है क्या? मेरा मन लगाने के लिए तू अपनी जिंदगी के सबसे जरूरी साल घर बैठ कर खराब करेगा? मेरी फिक्र छोड़। जब तू शाम को थका-हारा घर आएगा और अपनी तरक्की की कहानियां सुनाएगा, वही मेरे पूरे दिन की खुराक होगी। तू आगे बढ़ेगा, तो मुझे लगेगा कि मेरी और तेरे पापा की मेहनत सफल हो गई।"

उन्होंने चाय का कप मेरे आगे सरका दिया- "जा, तैयार हो जा। आज शायद किसी का कॉल आ जाए।"

मैंने चाय का घूंट भरा, लेकिन उसका स्वाद आज कुछ कड़वा लग रहा था। मम्मी की मुस्कान के पीछे का डर और मेरे सपनों के बीच की यह कशमकश—यही मेरे भविष्य की नई कहानी की शुरुआत थी। मैं जानता था कि मुझे वह जॉब लेनी होगी, उनके लिए... ताकि वह दुनिया को गर्व से बता सकें कि उनका बेटा 'पीछे' नहीं रहा। भले ही इसके बदले मुझे उन्हें उन खामोश दोपहरों के हवाले करना पड़े।

मैंने गौर किया कि उनके हाथों की नसें अब पहले से ज्यादा उभर आई हैं—वे हाथ जो सालों से घर की चहारदीवारी और रिश्तों को थामे हुए थे, अब शायद थोड़े थक चुके थे। उनकी 'चतुराई' और 'मुस्कान' दरअसल एक ढाल थी, जिसे उन्होंने बरसों की साधना से तैयार किया था ताकि उनकी तनहाई की आंच मुझ तक न पहुंचे।

मम्मी की आंखों के कोरों में जो हल्की सी नमी झलकी और तुरंत ओझल हो गई, उसने मुझे अंदर तक झकझोर दिया। वह अपने अस्तित्व को सिकोड़कर मेरे भविष्य के लिए जगह बना रही थीं। उनकी चुप्पी में एक अजीब सी चीख थी—यह डर नहीं था कि वह अकेली रह जाएंगी, बल्कि यह बेबसी थी कि उनके पास मुझे देने के लिए अब केवल अपनी तनहाई का बलिदान ही बचा था। मुझे अहसास हुआ कि कॉर्पोरेट जगत की उस ऊंची इमारत की सीढ़ियां दरअसल मम्मी के उन्हीं खामोश घंटों से बनी होंगी, जिन्हें मैं पीछे छोड़ जाऊंगा।


मैंने तय कर लिया था कि मैं वह मुखौटा पहनूंगा जो उन्हें पसंद है, भले ही उसके पीछे मेरा कलाकार हर रोज थोड़ा-थोड़ा दम तोड़े….



धूप अब तेज हो चली थी, और बाहर सड़क पर गाड़ियों का शोर बढ़ने लगा था। एक नई दौड़ शुरू होने वाली थी, जिसमें मैं शामिल तो हो रहा था, पर मेरा दिल अब भी उसी रसोई की खामोशी में अटका हुआ था।





To be Continued….
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#2
एपिसोड 2: नए रास्ते

सुबह की चाय के बाद का समय घर में एक अजीब सी, बोझिल हलचल लेकर आता था। मम्मी रसोई का काम समेट चुकी थीं और अब फर्श पर बैठकर पुराने अखबारों की तह लगा रही थीं। खिड़की से छनकर आती सुनहरी धूप उनके चेहरे पर पड़ रही थी, जिससे उनकी साफ रंगत और भी निखर रही थी। उन्हें देखकर अक्सर लोग धोखा खा जाते थे; 40 की होने के बावजूद उनके चेहरे की ताजगी और सलीका उन्हें आज भी किसी युवा महिला जैसा दिखाता था। पापा के जाने के बाद उन्होंने खुद को बहुत पत्थर करके संभाल लिया था, पर उनकी आँखों की गहराई में एक डर हमेशा जड़ें जमाए रहता था—मेरे अनिश्चित भविष्य का डर।

"तूने आज के लिए कुछ खास सोचा है, देव? या फिर सारा दिन उन कागजों पर लकीरें ही खींचता रहेगा?" उन्होंने अलमारी झाड़ते हुए पूछा। ऊपर से स्वर सख्त था, पर अंदर एक दबी हुई उम्मीद की थरथराहट थी।

मैंने मेज पर बिखरे अपने चारकोल स्केच और अधूरे पोर्टफोलियो को सहेजते हुए एक लंबी सांस ली। उनकी नजरें मेरे हाथों की कलाकारी पर नहीं, बल्कि उन बिलों पर होती थीं जो हर महीने दरवाजे पर दस्तक देते थे।

"मम्मी, आज एक कॉल आने वाला है। कल जो मैंने अप्लाई किया था, वहां से आज रिस्पॉन्स की उम्मीद है। बस प्रार्थना करो कि इस बार बात बन जाए।"

मम्मी के चेहरे पर एक पल के लिए राहत आई, फिर वही संशय के बादल छा गए। "कोशिश करना अच्छी बात है बेटा। मैं तेरे इस हुनर के खिलाफ नहीं हूँ। तू बहुत अच्छी पेंटिंग बनाता है, कॉलेज में बच्चे आज भी तेरी मिसाल देते हैं। लेकिन..." वह रुकीं, जैसे सच बोलने के लिए साहस जुटा रही हों। "लेकिन इसमें स्थायित्व कहाँ है? आज काम है, कल नहीं। मैं चाहती हूँ कि तू अपने उन दोस्तों की तरह बने जो महीने की पहली तारीख को कम से कम चैन की नींद तो सोते हैं। यह अनिश्चितता हमें मार देगी।"

उनकी चिंता मेरी रीढ़ में एक ठंडी लहर की तरह दौड़ जाती थी। वह अक्सर उन लड़कों का जिक्र करती थीं जो महानगरों की कांच वाली इमारतों में बैठकर फिक्स्ड सैलरी कमाते थे। उनके लिए 'प्रगति' का पैमाना सिर्फ सृजन नहीं था, बल्कि एक सुरक्षित घेरा था। उन्हें डर था कि मेरी कला मुझे दुनिया की इस बेरहम रेस में अकेला छोड़ देगी।

"मम्मी, मैं मेहनत करने को तैयार हूँ। पर अगर मैं 9 से 5 की चक्की में पिस गया, तो आप इस खाली घर में बिल्कुल अकेली रह जाएंगी," मैंने अपनी झिझक को ढाल बनाकर कहा, 

"पापा के बिना आप पहले ही सन्नाटों से लड़ती हैं। अभी तो मैं पास रहता हूँ, कॉलेज की ट्यूशन के बाद घर आ जाता हूँ। पर कॉर्पोरेट जॉब का मतलब है कि मैं सूरज डूबने के बहुत बाद घर लौटूंगा। क्या आप झेल पाएंगी?"

मम्मी उठीं और मेरे पास आकर मेरे कंधे पर हाथ रखा। उनकी आँखों में ममता और संकल्प का मिश्रण था…

"बोरियत? देव, एक माँ के लिए सबसे बड़ा दुख यह देखना है कि उसका बच्चा पंख होने के बावजूद उड़ने से डर रहा है। तू जब बाहर जाएगा, दुनिया देखेगा, तो मुझे लगेगा कि हमारा वजूद फिर से विस्तार पा रहा है। तू घर में मेरे पास बंधा रहेगा, तो मुझे लगेगा कि मेरी ममता ही तेरी बेड़ियाँ बन गई है। मेरी फिक्र तू मत कर, मैं अपना रास्ता निकाल लूंगी। तू बस अपना आसमान ढूंढ।"

उसी वक्त मेरे फोन की तीखी घंटी ने कमरे के सन्नाटे को चीर दिया। स्क्रीन पर एक अनजाना, प्रोफेशनल सा दिखने वाला नंबर चमक रहा था। मम्मी की सांसें जैसे थम सी गईं, उनकी आँखें फोन की स्क्रीन पर गड़ गई थीं। मैंने कांपते हाथों से कॉल रिसीव किया।

"हेलो, क्या देव बोल रहे हैं?" दूसरी तरफ से एक भारी, अधिकारपूर्ण और बेहद ठंडी आवाज आई।

"जी, मैं देव ही बोल रहा हूँ। आप कौन?"

"मैं 'आर्चर मीडिया' से बात कर रहा हूँ। हमने आपका पोर्टफोलियो और पिछली कुछ कहानियां देखी हैं। आपके काम में विजुअल्स का एक अजीब सा 'डार्क' पुट है, एक रहस्यमयी उदासी है, जो हमें अपनी अगली बड़ी वेब सीरीज के लिए चाहिए। हम कुछ ऐसा ढूंढ रहे हैं जो साधारण न हो। क्या आप कल सुबह 10 बजे इंटरव्यू के लिए हमारे ऑफिस आ सकते हैं?"

मेरा गला सूख गया। मम्मी ने उत्सुकता और घबराहट के बीच झूलते हुए मेरी तरफ देखा। मैंने जैसे-तैसे 'जी बिल्कुल' कहा और फोन काट दिया। मेरे हाथ अब भी थरथरा रहे थे।

"क्या हुआ? किसका फोन था?" मम्मी ने लगभग फुसफुसाते हुए पूछा, जैसे जोर से पूछने पर यह सपना टूट जाएगा।

"मम्मी, 'आर्चर मीडिया' है। बहुत बड़ी कंपनी है। उन्हें मेरा काम पसंद आया है। कह रहे हैं कि मेरे स्केच और कहानियों का जो 'डार्क' अंदाज है, वो उनकी सीरीज के लिए परफेक्ट है। सैलरी भी उम्मीद से ज्यादा है और... यह वही 'सॉलिड फ्यूचर' हो सकता है जिसका आप सपना देख रही थीं।"

मम्मी की आँखों के कोर गीले हो गए। उन्होंने तुरंत भगवान की तस्वीर की ओर मुड़कर हाथ जोड़ लिए। 

"देखा? मैंने कहा था न, जब नीयत साफ हो और कोशिश सच्ची, तो रास्ते खुद खुलते हैं। तू बस घबराना मत।"

शाम के वक्त जब मैं बालकनी में खड़ा होकर ठंडी हो रही चाय की चुस्कियां ले रहा था, मम्मी भी पास आ खड़ी हुईं। हवा में एक नई उमंग थी। 

"कल के लिए कपड़े निकाल लिए? तेरी वह नीली शर्ट प्रेस कर दूँ? इंटरव्यू में सलीका बहुत जरूरी होता है।"

मैंने मुस्कुराकर उन्हें देखा। उनकी झुर्रियां जैसे आज गर्व के पीछे छिप गई थीं। लेकिन मेरे भीतर एक अनजाना सा खौफ कुलबुला रहा था। यह 'डार्क' कंटेंट की तलाश कहीं मुझे उन गलियों में तो नहीं ले जाएगी जहाँ से लौटना मुश्किल हो? 

"मम्मी," मैंने उनका हाथ पकड़ते हुए धीमे से कहा, "अगर कल सब अच्छा रहा, तो हम रात को बाहर चलेंगे। एक छोटा सा जश्न तो बनता है।"

"नहीं रे, बाहर के खाने में वो स्वाद कहाँ। मैं घर पर ही तेरी पसंद की खीर और पुलाव बनाऊंगी," उन्होंने चहकते हुए कहा, और उनके चेहरे पर वो पुरानी चमक लौट आई जो पापा के रहने के वक्त हुआ करती थी।

रात को जब मैं बिस्तर पर लेटा, तो खिड़की से आती चांदनी फर्श पर टेढ़ी-मेढ़ी परछाइयां बना रही थी, जो मेरे स्केच के पात्रों जैसी लग रही थीं। मुझे महसूस हुआ कि मेरी जिंदगी का एक साधारण अध्याय अब समाप्त हो चुका है। कल का सूरज सिर्फ नौकरी का बुलावा नहीं लाएगा, बल्कि एक ऐसे रहस्यमयी सफर की पहली दस्तक होगा, जहाँ हकीकत और कहानियों की सीमाएं धुंधली होने वाली थीं।



To be Continued….
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