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एपिसोड 28: सिंडिकेट, शराब और अजनबी
शहर की शामें अक्सर अपने सीने में कई तरह के काले-सफेद राज़ समेटे हुए ढलती हैं। बाहर की सड़कों पर दौड़ती चमकदार गाड़ियाँ, ऊँची इमारतों की काँच की खिड़कियों पर चमकती नीली-पीली लाइट्स और फुटपाथों पर अपनी रोज़ी-रोटी के लिए हाँफते हुए आम इंसान—इस सब के नीचे एक ऐसा अंधियारा गटर भी बहता है जिसकी भनक तब तक नहीं लगती जब तक कि उसमें कोई बड़ा धमाका न हो जाए।
मेरे अपने घर का दायरा पहले ही किसी खामोश मनोवैज्ञानिक अखाड़े में बदल चुका था, जहाँ हर इंसान दूसरे के सामने अपने चेहरे पर एक झूठा मुखौटा ओढ़े घूम रहा था। लेकिन उस दिन टीवी स्क्रीन पर चमकती लाल पट्टियाँ और लाउड बैकग्राउंड म्यूज़िक ने उस व्यक्तिगत घुटन के बीच एक अजीब सा सनसनीखेज़ मोड़ ला खड़ा किया।
उस शाम मैं दफ्तर से थोड़ा जल्दी आ गया था। सर में वही पुराना भारीपन था, जो अब मेरी ज़िंदगी का एक नियमित हिस्सा बन चुका था। सोफ़े पर पसरकर मैंने रिमोट उठाया और टीवी ऑन किया। हर न्यूज़ चैनल पर एक ही सुर्ख़ी चीख-चीख कर दोहराई जा रही थी—
"महानगर सिक्युरिटी की सबसे बड़ी कामयाबी: शहर के सबसे बड़े इंटरनेशनल सिंडिकेट का भंडाफोड़! करोड़ों का अवैध सोना और नशीले पदार्थों की खेप बरामद!"
स्क्रीन पर खाकी वर्दी में खड़े सिक्युरिटी कमिश्नर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे थे। उनके सामने टेबल पर दर्जनों सोने के बिस्कुट, विदेशी सील लगे पैकेट्स और ब्राउन शुगर व सिंथेटिक ड्रग्स के पारदर्शी पाउच करीने से सजाए गए थे। नीचे टिकर पर तेज़ी से आँकड़े दौड़ रहे थे—अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में ज़ब्त सामान की कीमत पचास करोड़ से भी ऊपर... शहर के कई पॉश इलाकों और पुराने गोदामों में एक साथ छापेमारी... गिरोह के कई गुर्गे हिरासत में, सरगना अभी भी फरार।
न्यूज़ एंकर अपनी आवाज़ को जितना हो सके उतना नाटकीय बनाते हुए बता रहा था कि किस तरह यह सिंडिकेट शहर के पुराने वीरान ठिकानों, डाक-बंगलों और गोदामों का इस्तेमाल करके एक सुरक्षित नेटवर्क चला रहा था।
'पुराने डाक-बंगले...'
यह शब्द कानों में पड़ते ही मेरे बदन में एक सिहरन दौड़ गई। मेरी आँखों के सामने अनायास ही उस रात का मंज़र कौंध गया—कैब की खिड़की, मम्मी का वह लहराता गहरा नीला पल्लू, उस वीरान डाक-बंगले का भारी लोहे का गेट और वहाँ खड़ा वह लंबा मर्दाना साया।
क्या यह सिर्फ एक वहम था? क्या मेरा दिमाग हर बिखरी हुई कड़ी को जबरदस्ती अपनी माँ और इमरान के उस दलदल से जोड़ने की कोशिश कर रहा था?
तभी फ्लैट का मुख्य दरवाज़ा खुला। मैंने गर्दन घुमाकर देखा। इमरान अंदर दाखिल हो रहा था।
आमतौर पर इमरान जब भी घर में कदम रखता था, उसके चेहरे पर एक अजीब सी बेफिक्री, आँखों में एक शातिर चमक और होठों पर वही जानी-पहचानी मुस्कान होती थी। वह ऐसे चलता था मानो पूरी दुनिया उसकी जेब में हो। लेकिन आज... आज उसका हुलिया कुछ अलग ही कहानी बयां कर रहा था।
उसके बाल बिखरे हुए थे, शर्ट की कॉलर बेतरतीब ढंग से मुड़ी हुई थी और माथे पर पसीने की बारीक बूंदें चमक रही थीं। जैसे ही उसकी नज़र टीवी स्क्रीन पर चल रही ब्रेकिंग न्यूज़ पर पड़ी, उसके कदम हॉल के ठीक बीच में फ्रीज़ हो गए। कुछ सेकंड्स के लिए उसके चेहरे का रंग ऐसे उड़ा जैसे किसी ने उसकी रगों से सारा खून निचोड़ लिया हो। उसकी आँखें टीवी स्क्रीन पर टिकी उन सोने की ईंटों और सिक्युरिटी अफसरों के चेहरों को घूर रही थीं।
"भाई... देख रहा है? क्या बवाल कटा है शहर में," मैंने बहुत सामान्य बनने का नाटक करते हुए कहा।
इमरान ने अचानक चौंककर मेरी तरफ देखा। उसने तुरंत अपने चेहरे के हाव-भाव को समेटने की एक नाकाम कोशिश की, अपने सूखे होठों पर जीभ फेरी और एक अजीब सी, खिंची हुई आवाज़ में बोला, "हाँ... हाँ भाई, देख रहा हूँ। सिक्युरिटी वाले भी ना... टीआरपी के लिए कुछ भी बढ़ा-चढ़ा कर बताते हैं।"
उसकी बात खत्म होते ही मैं तुरंत बोल पड़ा,
"इसमें कोई शक नहीं कि काफी ड्रामे के साथ बोल रहा है, पर लगता नहीं कि 'न्यूज़' भी गलत हो। सबूत के साथ दिखाया जा रहा है!"
इमरान एक बार मेरी तरफ देखा, फिर टीवी की तरफ... फिर कंधे उचकाकर बेफिक्री का ढोंग करते हुए बोला,
"हाँ, सो तो है.. पर अपने को क्या करना.. कर भी क्या सकते हैं...?"
उसकी आखिरी लाइन मुझे थोड़ी 'पर्सनल' लगी…
इतनी बड़ी न्यूज़ पर उसका यह रिएक्शन... और 'कर भी क्या सकते हैं' कहीं न कहीं एक तरह से मानसिक हार और निराशा की ओर इशारा करने जैसा था।
"हाँ... कुछ कर तो नहीं सकते... बस, थोड़ा चौकन्ना रहना पड़ेगा।" मैंने बेफिक्री और सजगता का एक संतुलन बनाकर कहा। और सच कहूँ तो अपने इस हुनर पर गर्व भी करने लगा था...
पर मैंने यह भी नोटिस किया कि मेरे ऐसा कहते ही इमरान कुछ सेकंड्स के लिए ठिठका... कुछ सोचा... और फिर अपना सिर झटक दिया।
वैसे भी आज उसकी आवाज़ में वह पुरानी खनक गायब थी। उसने अपने कमरे की तरफ कदम बढ़ा दिए, लेकिन उसके चलने के अंदाज़ में एक अजीब सी लापरवाही थी। वह बिना जूते खोले ही कमरे में चला गया और दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया।
उस दिन के बाद से, अगले तीन-चार दिनों तक इमरान का व्यवहार पूरी तरह बदल गया। वह घर में बहुत कम टिकता था। सुबह जब मेरी आँख खुलती, तो उसका कमरा खाली मिलता। रात को जब मैं और मम्मी सोफ़े पर बैठकर साथ में डिनर के लिए उसके लौटने का इंतज़ार करते, तो वह देर रात दो या तीन बजे के बाद ही लौटता। उसका फोन लगातार साइलेंट या वाइब्रेट मोड पर रहने लगा था। जब भी कोई कॉल आती, वह बालकनी के कोने में जाकर धीमी आवाज़ में बात करता।
उसके चेहरे पर एक गहरा तनाव, एक अनसुलझी बेचैनी साफ़ पढ़ी जा सकती थी। वह लैपटॉप पर भी कुछ काम नहीं कर रहा था, न ही उसने मम्मी से कोई खास बातचीत की। उसके घर से भी उसे फोन कॉल्स नहीं आते थे। जब भी वह हॉल में आता, उसकी आँखें किसी खोए हुए मुसाफिर की तरह शून्य में घूरती रहतीं। कोई तो ऐसी बात थी जो उसे अंदर ही अंदर खाए जा रही थी।
मम्मी भी उन दिनों काफी शांत और सहमी हुई सी लग रही थीं। उनका वह सज-संवरकर बाहर निकलने का सिलसिला उन तीन-चार दिनों के लिए पूरी तरह थम गया था। वह अधिकांश समय रसोई में बर्तनों को बेवजह साफ़ करने, साड़ी में फॉल लगाने में, अपने मोबाइल में या अपने कमरे में लेटे-लेटे कोई मैगज़ीन वगैरह पढ़ने में बिताती थीं।
इतने दिनों से जिन चीज़ों की आदत सी पड़ गई थी, अचानक इस परिवर्तन से एक बार फिर से घर के भीतर घुटन सी महसूस होने लगी थी।
लेकिन फिर...
करीब दस दिन बाद, हवा का रुख धीरे-धीरे बदलने लगा!
एक दिन जब इमरान शाम को लौटा, तो उसके चेहरे पर वह पुराना तनाव नहीं था। उसकी चाल में वही पुरानी ठसक वापस आ चुकी थी। उसने आते ही सोफ़े पर अपना बैग फेंका, मुझसे मेरा और ऑफिस का हाल-चाल लिया और उसके बाद बालकनी में जाकर बेफिक्री से सिगरेट का धुआँ उड़ाने लगा। ऐसा लगा जैसे जिस तूफान का उसे डर था, वह उसके ऊपर से होकर गुज़र चुका था और उसने बचने के तमाम उपाय छोड़ दिए थे या फिर उसने उस तूफान से बचने का कोई सुरक्षित रास्ता निकाल लिया था!
पर एक बात तो साफ़ दिखी... वह पूरी तरह नॉर्मल हो चुका था।
उसकी यह वापसी मेरे भीतर के संदेह को और गहरा कर गई। मुझे लगा कि अगर मैंने अब भी कुछ नहीं पूछा, तो यह घुटन मुझे अंदर से खोखला कर देगी।
मैंने मन-ही-मन पूछने का दिन और समय निश्चित कर लिया।
शनिवार की शाम थी...
ऑफिस से छुट्टी थी और मौसम भी सही था।
शाम के करीब आठ बजे इमरान मेरे कमरे के दरवाज़े पर आकर खड़ा हो गया।
"क्या कर रहा है भाई? कब तक इस कमरे में बंद सड़ता रहेगा?" उसने दरवाज़े की चौखट पर टेक लगाते हुए पूछा।
उसके हाथ में एक काले रंग की पॉलीथिन का बैग था जिसके भीतर काँच की बोतलों के टकराने की हल्की सी आवाज़ आई।
मैंने मोबाइल से नज़रें उठाईं,
"कुछ नहीं, बस ऐसे ही लेटा था।"
"चल उठ ना भाई… बहुत दिन हो गए हम दोनों ने साथ बैठकर दो घूँट नहीं लगाए… मौसम भी ठीक-ठाक है, चल बाहर नुक्कड़ वाले पार्क के उस कोने में चलते हैं। थोड़ी ताज़ा हवा भी मिलेगी और दिमाग का कचरा भी साफ़ होगा," उसने एक दोस्ताना अंदाज़ में कहा।
मेरा पहला खयाल तो यह आया कि मैं साफ़ मना कर दूँ। मुझे उसकी उस नकली हमदर्दी और उस दोस्ताना चेहरे से नफरत होने लगी थी। लेकिन फिर मेरे भीतर के जासूस ने मुझे टोका—नशे की हालत में अक्सर इंसान अपनी जुबान पर से पहरा हटा देता है। शायद आज की रात मुझे उसके उस मुखौटे के पीछे झांकने का कोई मौका मिल जाए?!
"ठीक है, चल," मैंने कहा और अपनी चप्पलें पहनकर उसके साथ बाहर निकल आया।
हमारी सोसाइटी के ठीक पीछे एक पुराना, नगर निगम का पार्क था। रात के अंधेरे में उस पार्क के पिछले हिस्से में, जहाँ पुरानी झाड़ियों और बड़े बरगद के पेड़ों का झुरमुट था, आमतौर पर कोई नहीं आता था। सिर्फ दूर सड़क की पीली सोडियम लाइटों की एक धुंधली सी रोशनी पत्तों के बीच से छनकर ज़मीन पर गिर रही थी।
हम दोनों पार्क की एक टूटी हुई सीमेंट की बेंच पर बैठ गए। इमरान ने बैग से व्हिस्की की एक महंगी बोतल निकाली, दो प्लास्टिक के डिस्पोज़ेबल ग्लास रखे और साथ में भुने हुए काजू और नमकीन का एक पैकेट खोल दिया... साला पूरी तैयारी के साथ आया था!
"यह ब्रांड कब से पीने लगा तू?" मैंने बोतल पर लगे विदेशी लेबल को देखते हुए पूछा। यह कोई साधारण शराब नहीं थी, इसकी कीमत किसी आम दफ्तर के किसी अच्छे पद पर काम करने वाले की महीने भर की सैलरी के बराबर थी।
इमरान ने बोतल की सील तोड़ते हुए एक मुस्कान दी,
"अरे भाई, ज़िंदगी में कभी-कभी कुछ अच्छे प्रोजेक्ट हाथ लग जाते हैं… जब जेब गर्म हो, तो हलक में भी अच्छी चीज़ ही उतरनी चाहिए… तू बस ग्लास पकड़।"
उसने दोनों गिलासों में एक-एक बड़ा पैग उड़ेला और थोड़ा सा पानी मिला दिया। हमने गिलासों को टकराया... डिस्पोज़ेबल ग्लास में घंटा कोई आवाज़ आनी थी!
पहला घूँट गले से नीचे उतरते ही सीने में एक तीखी जलन हुई, लेकिन कुछ ही पलों में दिमाग की नसें थोड़ी ढीली पड़ने लगीं। हवा के ठंडे झोंके चेहरे पर लग रहे थे, लेकिन मेरे सीने के भीतर जो लावा हफ़्तों से पक रहा था, वह इस शराब की गर्माहट पाकर धीरे-धीरे उबलने लगा।
शुरुआत में इमरान इधर-उधर की बातें करता रहा—कॉर्पोरेट की राजनीति, सुस्त पड़ता बाज़ार, महँगी होती चीज़ें, और कैसे वह जल्द ही कोई बड़ा काम शुरू करने की सोच रहा था, इत्यादि…. वह बिल्कुल नॉर्मल दिखने की कोशिश कर रहा था।
जब पाँचवाँ पैग खत्म हुआ और अगले पैग का नशा मेरी रगों में तैरने लगा, तो मेरा आत्म-नियंत्रण जवाब देने लगा। मेरे दिमाग में उस दिन की टीवी न्यूज़, वह वीरान डाक-बँगला, मम्मी का लगभग रोज़ तैयार होकर कुछ देर के लिए घर से बाहर जाना, और कुछ दिन पहले तक इस लड़के की अजीबोगरीब हरकतें किसी मूवी सीन की तरह मेरे दिमाग में घूमने लगीं।
मैंने ग्लास को सीमेंट की बेंच पर रखा।
"इमरान..." मेरी आवाज़ थोड़ी भारी और लड़खड़ाती हुई निकली।
"बोल भाई, क्या हुआ?" उसने अपनी सिगरेट सुलगाते हुए हल्के मूड में पूछा।
मुझसे तुरंत बोला नहीं गया... क्या बोलूँ और कहाँ से शुरू करूँ, यह तय करने में समय लगने लगा... और इस हालत में तो यह और भी मुश्किल लग रहा था।
"पैग ज़्यादा कड़ा बन गया क्या?" इमरान ने धुआँ उड़ाते हुए मेरी ओर देखा।
"मुझे एक बात बता..."
"पूछ..." कहकर वह अपने लिए पैग बनाने लगा।
मैंने दो-तीन काजू उठाकर मुँह के एक कोने में रखते हुए खुद को शांत दिखाते हुए कहा,
"सच-सच बताना… आज कोई ड्रामा नहीं चाहिए मुझे…"
मैंने भी अपनी क्लासिक डबल बर्स्ट सुलगाई… खुद को क्लासी दिखाने के लिए यह ज़रूरी लगा। नशे के बावजूद मेरी आँखों में एक सुलगता हुआ गुस्सा नज़र आने लगा था…
इमरान ने सिगरेट का एक लंबा कश खींचा, धुएँ का एक छल्ला हवा में छोड़ा और मुस्कुराया,
"अरे पूछ ना यार, तू तो ऐसे सीरियस हो रहा है जैसे सीबीआई का अफसर हो.. क्या बात है?"
"तेरे और मेरी मम्मी के बीच... यह सब क्या चल रहा है?"
सन्नाटे में मेरे यह शब्द किसी हथौड़े की तरह गूँजे… पार्क की झाड़ियों में हवा की सरसराहट भी जैसे एक पल के लिए थम गई।
इमरान के चेहरे पर जो मुस्कान थी, वह एक सेकंड के दसवें हिस्से के लिए ठिठकी, लेकिन उसने तुरंत खुद को सँभाला। उसने कोई घबराहट नहीं दिखाई, न ही कोई आक्रामकता… उसने बहुत ही शांत, लगभग दार्शनिक अंदाज़ में अपना ग्लास उठाया, एक घूँट भरा और फिर मेरी तरफ देखा.. उसकी आँखों में एक ऐसी सहजता थी जो किसी शातिर अपराधी की सबसे बड़ी ढाल होती है।
"देव... मुझे पता था कि तेरे दिमाग में यह कचरा चल रहा होगा," उसने बेहद धीमी, वज़नदार आवाज़ में कहा।
"तू पिछले कुछ हफ़्तों से जिस तरह मुझे और आंटी जी को देख रहा है, मुझे सब समझ आता है भाई। लेकिन तू गलत दिशा में सोच रहा है।"
"गलत दिशा में सोच रहा हूँ मैं?" मेरी आवाज़ में और कड़वाहट घुल गई,
"इमरान, मैं अंधा नहीं हूँ! जिस तरह से तू उनसे बातें करता है, जिस तरह से वह तेरे सामने पेश आती हैं... उनके वो कपड़े, वो नया अंदाज़, उनका बिना बताए घंटों गायब रहना... क्या यह सब भी मेरा वहम है?"
नशे में जो भी ज़ुबान पर आया, मैं बोलता गया... मेरे दिमाग में एक बार के लिए यह बात कौंधी कि कहीं मैं ऐसा कुछ ज़रूरत से ज़्यादा उजागर न कर दूँ जो बाद में मेरे खिलाफ हो जाए...
इमरान ने सिगरेट की राख झाड़ी और थोड़ा आगे झुककर मेरी आँखों में देखा। उसके स्वर में इतनी बनावटी मासूमियत और हमदर्दी थी कि कोई भी तीसरा इंसान उस पर भरोसा कर जाता।
"देव, मेरी बात ठंडे दिमाग से सुन। आंटी जी तेरे लिए क्या हैं? तेरी माँ हैं ना? एक ऐसी औरत जिसने अपनी पूरी जवानी बीरभूम के उस छोटे से, दकियानूसी कस्बे में गुज़ार दी। तेरे पिता के जाने के बाद उन्होंने क्या देखा अपनी ज़िंदगी में? सिर्फ चूल्हा-चौका, समाज के ताने, और वह मटमैली सूती साड़ियों तक सिमटी घुटन भरा दायरा। कभी तूने एक बेटे के चश्मे को उतारकर एक औरत के नज़रिए से उन्हें देखा है?"
उसकी इस दलील ने मेरे सीने पर एक अलग सा वार किया। मैं चुपचाप उसे देखता रहा।
इमरान अपनी रौ में बोलता चला गया,
"वह इस शहर में नई आई हैं देव। यह एक नया और पूरी तरह से जुदा शहर है, नया और एकदम अलग माहौल है। उनके पुराने घर से कहीं दूर एक ऐसे शहर में... चालीस-पैंतालीस साल की उम्र में अगर कोई औरत खुद को थोड़ा संवारना चाहती है, अपनी ज़िंदगी को थोड़ा खुलकर जीना चाहती है, नए कपड़े पहनना चाहती है, तो इसमें क्या गुनाह है? क्या विधवा हो जाने के बाद एक औरत को अपनी देह, अपनी इच्छाओं और अपनी खुशियों को ज़िंदा दफन कर देना चाहिए?"
"लेकिन वह सिर्फ कपड़े नहीं हैं इमरान!" मैंने चिढ़कर कहा,
"और तू... तू उनके इतने करीब क्यों जा रहा है?"
"क्योंकि वह मुझे अपने बेटे के दोस्त की तरह नहीं, बल्कि एक ऐसे इंसान की तरह देखती हैं जिसके सामने उन्हें अपने उस पुराने, बोझिल अतीत का मुखौटा नहीं पहनना पड़ता," इमरान ने बहुत ही सधे हुए शब्दों में जवाब दिया,
"तू उनका बेटा है देव। तू उनसे उम्मीद करता है कि वह हमेशा वही पुराने ज़माने की, सर और कंधों को पल्लू से ढकने वाली, त्यागमयी माँ बनकर रहें। वह तेरे सामने खुलकर सांस भी नहीं ले पातीं क्योंकि उन्हें डर लगता है कि उनका बेटा उन्हें जज करेगा! लेकिन मेरे साथ... मेरे साथ वह कंफर्टेबल फील करती हैं। मैं उनकी तारीफ करता हूँ तो उनके चेहरे पर मुस्कान आती है। क्या किसी मुरझाए हुए फूल को थोड़ा पानी देना कोई पाप है?"
उसने अपना हाथ आगे बढ़ाकर मेरे कंधे पर रख दिया। उसका स्पर्श इतना भारी और बनावटी था कि मेरा जी चाहा कि मैं उसका हाथ झटक दूँ।
पर मैंने ऐसा किया नहीं।
मैं देखना चाहता था कि वह और क्या-क्या बोलेगा अभी...?
"देव, सच कह रहा हूँ भाई... मैं उनकी इज़्ज़त करता हूँ। ठीक वैसे ही जैसे किसी को अपने किसी करीबी दोस्त की मम्मी की करनी चाहिए। उनके मन में मेरे लिए एक अपनापन है, क्योंकि मैंने उन्हें इस शहर में यह अहसास कराया कि उनकी अपनी भी कोई पहचान है। बाकी जो तू सोच रहा है ना... वह सिर्फ तेरे दिमाग का फितूर है। शक कम किया कर, और दफ्तर का तनाव घर पर मत लाया कर।"
उसकी बातें इतनी चिकनी, इतनी तार्किक और इतनी खूबसूरती से गढ़ी गई थीं कि कोई भी अदालत उसे बा-इज़्ज़त बरी कर देती। लेकिन मेरी अंतरात्मा चीख-चीख कर कह रही थी कि यह सब एक सफेद झूठ है। यह उस दलदल पर बिछाई गई हरी घास थी जिसके नीचे सिर्फ सड़न और धोखा था।
अगर यह सब सिर्फ एक औरत की आज़ादी की बात थी, तो उस डायरी में लिखा वह सब क्या था? उस दिन जो वह शख्स आया था हमारे फ्लैट में, वह क्या था? और सबसे बढ़कर... वह पार्सल क्या था?
मेरी ज़ुबान पर वह सवाल आने ही वाला था। मैं उससे पूछने ही वाला था—'अगर सब कुछ इतना ही पाक-साफ है, तो उस दिन तूने आंटी जी के नाम से जो पार्सल मँगवाया था, और जिसे तूने घुटनों का आयुर्वेदिक तेल बताया था... वह असल में क्या था? और तू पिछले चार दिनों से इस शहर के सिंडिकेट वाली खबर के बाद किन चूहों के बिलों में छुपा घूम रहा था?'
लेकिन मैंने खुद को रोक लिया।
मुझे डर लगने लगा था कि सब कुछ पूरी तरह से साफ होने से पहले ही कहीं मैं आज ज़रूरत से कहीं ज़्यादा न बोल दूँ... क्योंकि इतना तो मेरे लिए साफ था कि इमरान अभी नब्बे प्रतिशत सिर्फ झूठ ही बोल रहा है... सच से वह कोसों दूर रहेगा।
इसलिए मैंने चुपचाप पीने पर फोकस किया और एक के बाद एक तीन बार अपना ग्लास खाली कर दिया। शराब की कड़वाहट मेरी जीभ पर फैल गई। मुझे समझ आ गया था कि अगर मैंने आज वह सवाल पूछ लिया, तो इमरान और अलर्ट हो जाएगा। वह कोई नया बहाना बना देगा, कोई नई मनगढ़ंत कहानी सुना देगा। शातिर मुजरिमों से सच उनके मुँह से नहीं उगलवाया जाता; उन्हें उनके अपने ही जाल में फंसने के लिए खुला छोड़ना पड़ता है।
"चल, बहुत देर हो गई है। घर चलते हैं," मैंने अपनी आवाज़ को पूरी तरह भावहीन बनाते हुए कहा और बेंच से उठ खड़ा हुआ।
इमरान ने मेरी तरफ देखा। उसकी आँखों में एक पल के लिए यह जानने की उत्सुकता उभरी कि क्या मैंने उसकी बातों पर यकीन कर लिया है। मेरे चेहरे के सपाट भावों को देखकर शायद उसने मान लिया कि उसने मुझे चुप करा दिया है। उसके होठों पर वही पुरानी, जीत वाली मुस्कान तैर गई।
उस रात घर लौटकर मैं अपने कमरे में सोने का नाटक करता रहा, लेकिन मेरी आँखों में नींद का एक कतरा भी नहीं था। मुझे पता था कि यह शांति सिर्फ एक छलावा है। शहर के सिंडिकेट का भंडाफोड़, इमरान का वह गायब होना, और फिर यह चिकनी-चुपड़ी सफाई... यह सब किसी खास दिशा की ओर इशारा कर रहे थे।
Continued....
शहर की शामें अक्सर अपने सीने में कई तरह के काले-सफेद राज़ समेटे हुए ढलती हैं। बाहर की सड़कों पर दौड़ती चमकदार गाड़ियाँ, ऊँची इमारतों की काँच की खिड़कियों पर चमकती नीली-पीली लाइट्स और फुटपाथों पर अपनी रोज़ी-रोटी के लिए हाँफते हुए आम इंसान—इस सब के नीचे एक ऐसा अंधियारा गटर भी बहता है जिसकी भनक तब तक नहीं लगती जब तक कि उसमें कोई बड़ा धमाका न हो जाए।
मेरे अपने घर का दायरा पहले ही किसी खामोश मनोवैज्ञानिक अखाड़े में बदल चुका था, जहाँ हर इंसान दूसरे के सामने अपने चेहरे पर एक झूठा मुखौटा ओढ़े घूम रहा था। लेकिन उस दिन टीवी स्क्रीन पर चमकती लाल पट्टियाँ और लाउड बैकग्राउंड म्यूज़िक ने उस व्यक्तिगत घुटन के बीच एक अजीब सा सनसनीखेज़ मोड़ ला खड़ा किया।
उस शाम मैं दफ्तर से थोड़ा जल्दी आ गया था। सर में वही पुराना भारीपन था, जो अब मेरी ज़िंदगी का एक नियमित हिस्सा बन चुका था। सोफ़े पर पसरकर मैंने रिमोट उठाया और टीवी ऑन किया। हर न्यूज़ चैनल पर एक ही सुर्ख़ी चीख-चीख कर दोहराई जा रही थी—
"महानगर सिक्युरिटी की सबसे बड़ी कामयाबी: शहर के सबसे बड़े इंटरनेशनल सिंडिकेट का भंडाफोड़! करोड़ों का अवैध सोना और नशीले पदार्थों की खेप बरामद!"
स्क्रीन पर खाकी वर्दी में खड़े सिक्युरिटी कमिश्नर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे थे। उनके सामने टेबल पर दर्जनों सोने के बिस्कुट, विदेशी सील लगे पैकेट्स और ब्राउन शुगर व सिंथेटिक ड्रग्स के पारदर्शी पाउच करीने से सजाए गए थे। नीचे टिकर पर तेज़ी से आँकड़े दौड़ रहे थे—अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में ज़ब्त सामान की कीमत पचास करोड़ से भी ऊपर... शहर के कई पॉश इलाकों और पुराने गोदामों में एक साथ छापेमारी... गिरोह के कई गुर्गे हिरासत में, सरगना अभी भी फरार।
न्यूज़ एंकर अपनी आवाज़ को जितना हो सके उतना नाटकीय बनाते हुए बता रहा था कि किस तरह यह सिंडिकेट शहर के पुराने वीरान ठिकानों, डाक-बंगलों और गोदामों का इस्तेमाल करके एक सुरक्षित नेटवर्क चला रहा था।
'पुराने डाक-बंगले...'
यह शब्द कानों में पड़ते ही मेरे बदन में एक सिहरन दौड़ गई। मेरी आँखों के सामने अनायास ही उस रात का मंज़र कौंध गया—कैब की खिड़की, मम्मी का वह लहराता गहरा नीला पल्लू, उस वीरान डाक-बंगले का भारी लोहे का गेट और वहाँ खड़ा वह लंबा मर्दाना साया।
क्या यह सिर्फ एक वहम था? क्या मेरा दिमाग हर बिखरी हुई कड़ी को जबरदस्ती अपनी माँ और इमरान के उस दलदल से जोड़ने की कोशिश कर रहा था?
तभी फ्लैट का मुख्य दरवाज़ा खुला। मैंने गर्दन घुमाकर देखा। इमरान अंदर दाखिल हो रहा था।
आमतौर पर इमरान जब भी घर में कदम रखता था, उसके चेहरे पर एक अजीब सी बेफिक्री, आँखों में एक शातिर चमक और होठों पर वही जानी-पहचानी मुस्कान होती थी। वह ऐसे चलता था मानो पूरी दुनिया उसकी जेब में हो। लेकिन आज... आज उसका हुलिया कुछ अलग ही कहानी बयां कर रहा था।
उसके बाल बिखरे हुए थे, शर्ट की कॉलर बेतरतीब ढंग से मुड़ी हुई थी और माथे पर पसीने की बारीक बूंदें चमक रही थीं। जैसे ही उसकी नज़र टीवी स्क्रीन पर चल रही ब्रेकिंग न्यूज़ पर पड़ी, उसके कदम हॉल के ठीक बीच में फ्रीज़ हो गए। कुछ सेकंड्स के लिए उसके चेहरे का रंग ऐसे उड़ा जैसे किसी ने उसकी रगों से सारा खून निचोड़ लिया हो। उसकी आँखें टीवी स्क्रीन पर टिकी उन सोने की ईंटों और सिक्युरिटी अफसरों के चेहरों को घूर रही थीं।
"भाई... देख रहा है? क्या बवाल कटा है शहर में," मैंने बहुत सामान्य बनने का नाटक करते हुए कहा।
इमरान ने अचानक चौंककर मेरी तरफ देखा। उसने तुरंत अपने चेहरे के हाव-भाव को समेटने की एक नाकाम कोशिश की, अपने सूखे होठों पर जीभ फेरी और एक अजीब सी, खिंची हुई आवाज़ में बोला, "हाँ... हाँ भाई, देख रहा हूँ। सिक्युरिटी वाले भी ना... टीआरपी के लिए कुछ भी बढ़ा-चढ़ा कर बताते हैं।"
उसकी बात खत्म होते ही मैं तुरंत बोल पड़ा,
"इसमें कोई शक नहीं कि काफी ड्रामे के साथ बोल रहा है, पर लगता नहीं कि 'न्यूज़' भी गलत हो। सबूत के साथ दिखाया जा रहा है!"
इमरान एक बार मेरी तरफ देखा, फिर टीवी की तरफ... फिर कंधे उचकाकर बेफिक्री का ढोंग करते हुए बोला,
"हाँ, सो तो है.. पर अपने को क्या करना.. कर भी क्या सकते हैं...?"
उसकी आखिरी लाइन मुझे थोड़ी 'पर्सनल' लगी…
इतनी बड़ी न्यूज़ पर उसका यह रिएक्शन... और 'कर भी क्या सकते हैं' कहीं न कहीं एक तरह से मानसिक हार और निराशा की ओर इशारा करने जैसा था।
"हाँ... कुछ कर तो नहीं सकते... बस, थोड़ा चौकन्ना रहना पड़ेगा।" मैंने बेफिक्री और सजगता का एक संतुलन बनाकर कहा। और सच कहूँ तो अपने इस हुनर पर गर्व भी करने लगा था...
पर मैंने यह भी नोटिस किया कि मेरे ऐसा कहते ही इमरान कुछ सेकंड्स के लिए ठिठका... कुछ सोचा... और फिर अपना सिर झटक दिया।
वैसे भी आज उसकी आवाज़ में वह पुरानी खनक गायब थी। उसने अपने कमरे की तरफ कदम बढ़ा दिए, लेकिन उसके चलने के अंदाज़ में एक अजीब सी लापरवाही थी। वह बिना जूते खोले ही कमरे में चला गया और दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया।
उस दिन के बाद से, अगले तीन-चार दिनों तक इमरान का व्यवहार पूरी तरह बदल गया। वह घर में बहुत कम टिकता था। सुबह जब मेरी आँख खुलती, तो उसका कमरा खाली मिलता। रात को जब मैं और मम्मी सोफ़े पर बैठकर साथ में डिनर के लिए उसके लौटने का इंतज़ार करते, तो वह देर रात दो या तीन बजे के बाद ही लौटता। उसका फोन लगातार साइलेंट या वाइब्रेट मोड पर रहने लगा था। जब भी कोई कॉल आती, वह बालकनी के कोने में जाकर धीमी आवाज़ में बात करता।
उसके चेहरे पर एक गहरा तनाव, एक अनसुलझी बेचैनी साफ़ पढ़ी जा सकती थी। वह लैपटॉप पर भी कुछ काम नहीं कर रहा था, न ही उसने मम्मी से कोई खास बातचीत की। उसके घर से भी उसे फोन कॉल्स नहीं आते थे। जब भी वह हॉल में आता, उसकी आँखें किसी खोए हुए मुसाफिर की तरह शून्य में घूरती रहतीं। कोई तो ऐसी बात थी जो उसे अंदर ही अंदर खाए जा रही थी।
मम्मी भी उन दिनों काफी शांत और सहमी हुई सी लग रही थीं। उनका वह सज-संवरकर बाहर निकलने का सिलसिला उन तीन-चार दिनों के लिए पूरी तरह थम गया था। वह अधिकांश समय रसोई में बर्तनों को बेवजह साफ़ करने, साड़ी में फॉल लगाने में, अपने मोबाइल में या अपने कमरे में लेटे-लेटे कोई मैगज़ीन वगैरह पढ़ने में बिताती थीं।
इतने दिनों से जिन चीज़ों की आदत सी पड़ गई थी, अचानक इस परिवर्तन से एक बार फिर से घर के भीतर घुटन सी महसूस होने लगी थी।
लेकिन फिर...
करीब दस दिन बाद, हवा का रुख धीरे-धीरे बदलने लगा!
एक दिन जब इमरान शाम को लौटा, तो उसके चेहरे पर वह पुराना तनाव नहीं था। उसकी चाल में वही पुरानी ठसक वापस आ चुकी थी। उसने आते ही सोफ़े पर अपना बैग फेंका, मुझसे मेरा और ऑफिस का हाल-चाल लिया और उसके बाद बालकनी में जाकर बेफिक्री से सिगरेट का धुआँ उड़ाने लगा। ऐसा लगा जैसे जिस तूफान का उसे डर था, वह उसके ऊपर से होकर गुज़र चुका था और उसने बचने के तमाम उपाय छोड़ दिए थे या फिर उसने उस तूफान से बचने का कोई सुरक्षित रास्ता निकाल लिया था!
पर एक बात तो साफ़ दिखी... वह पूरी तरह नॉर्मल हो चुका था।
उसकी यह वापसी मेरे भीतर के संदेह को और गहरा कर गई। मुझे लगा कि अगर मैंने अब भी कुछ नहीं पूछा, तो यह घुटन मुझे अंदर से खोखला कर देगी।
मैंने मन-ही-मन पूछने का दिन और समय निश्चित कर लिया।
शनिवार की शाम थी...
ऑफिस से छुट्टी थी और मौसम भी सही था।
शाम के करीब आठ बजे इमरान मेरे कमरे के दरवाज़े पर आकर खड़ा हो गया।
"क्या कर रहा है भाई? कब तक इस कमरे में बंद सड़ता रहेगा?" उसने दरवाज़े की चौखट पर टेक लगाते हुए पूछा।
उसके हाथ में एक काले रंग की पॉलीथिन का बैग था जिसके भीतर काँच की बोतलों के टकराने की हल्की सी आवाज़ आई।
मैंने मोबाइल से नज़रें उठाईं,
"कुछ नहीं, बस ऐसे ही लेटा था।"
"चल उठ ना भाई… बहुत दिन हो गए हम दोनों ने साथ बैठकर दो घूँट नहीं लगाए… मौसम भी ठीक-ठाक है, चल बाहर नुक्कड़ वाले पार्क के उस कोने में चलते हैं। थोड़ी ताज़ा हवा भी मिलेगी और दिमाग का कचरा भी साफ़ होगा," उसने एक दोस्ताना अंदाज़ में कहा।
मेरा पहला खयाल तो यह आया कि मैं साफ़ मना कर दूँ। मुझे उसकी उस नकली हमदर्दी और उस दोस्ताना चेहरे से नफरत होने लगी थी। लेकिन फिर मेरे भीतर के जासूस ने मुझे टोका—नशे की हालत में अक्सर इंसान अपनी जुबान पर से पहरा हटा देता है। शायद आज की रात मुझे उसके उस मुखौटे के पीछे झांकने का कोई मौका मिल जाए?!
"ठीक है, चल," मैंने कहा और अपनी चप्पलें पहनकर उसके साथ बाहर निकल आया।
हमारी सोसाइटी के ठीक पीछे एक पुराना, नगर निगम का पार्क था। रात के अंधेरे में उस पार्क के पिछले हिस्से में, जहाँ पुरानी झाड़ियों और बड़े बरगद के पेड़ों का झुरमुट था, आमतौर पर कोई नहीं आता था। सिर्फ दूर सड़क की पीली सोडियम लाइटों की एक धुंधली सी रोशनी पत्तों के बीच से छनकर ज़मीन पर गिर रही थी।
हम दोनों पार्क की एक टूटी हुई सीमेंट की बेंच पर बैठ गए। इमरान ने बैग से व्हिस्की की एक महंगी बोतल निकाली, दो प्लास्टिक के डिस्पोज़ेबल ग्लास रखे और साथ में भुने हुए काजू और नमकीन का एक पैकेट खोल दिया... साला पूरी तैयारी के साथ आया था!
"यह ब्रांड कब से पीने लगा तू?" मैंने बोतल पर लगे विदेशी लेबल को देखते हुए पूछा। यह कोई साधारण शराब नहीं थी, इसकी कीमत किसी आम दफ्तर के किसी अच्छे पद पर काम करने वाले की महीने भर की सैलरी के बराबर थी।
इमरान ने बोतल की सील तोड़ते हुए एक मुस्कान दी,
"अरे भाई, ज़िंदगी में कभी-कभी कुछ अच्छे प्रोजेक्ट हाथ लग जाते हैं… जब जेब गर्म हो, तो हलक में भी अच्छी चीज़ ही उतरनी चाहिए… तू बस ग्लास पकड़।"
उसने दोनों गिलासों में एक-एक बड़ा पैग उड़ेला और थोड़ा सा पानी मिला दिया। हमने गिलासों को टकराया... डिस्पोज़ेबल ग्लास में घंटा कोई आवाज़ आनी थी!
पहला घूँट गले से नीचे उतरते ही सीने में एक तीखी जलन हुई, लेकिन कुछ ही पलों में दिमाग की नसें थोड़ी ढीली पड़ने लगीं। हवा के ठंडे झोंके चेहरे पर लग रहे थे, लेकिन मेरे सीने के भीतर जो लावा हफ़्तों से पक रहा था, वह इस शराब की गर्माहट पाकर धीरे-धीरे उबलने लगा।
शुरुआत में इमरान इधर-उधर की बातें करता रहा—कॉर्पोरेट की राजनीति, सुस्त पड़ता बाज़ार, महँगी होती चीज़ें, और कैसे वह जल्द ही कोई बड़ा काम शुरू करने की सोच रहा था, इत्यादि…. वह बिल्कुल नॉर्मल दिखने की कोशिश कर रहा था।
जब पाँचवाँ पैग खत्म हुआ और अगले पैग का नशा मेरी रगों में तैरने लगा, तो मेरा आत्म-नियंत्रण जवाब देने लगा। मेरे दिमाग में उस दिन की टीवी न्यूज़, वह वीरान डाक-बँगला, मम्मी का लगभग रोज़ तैयार होकर कुछ देर के लिए घर से बाहर जाना, और कुछ दिन पहले तक इस लड़के की अजीबोगरीब हरकतें किसी मूवी सीन की तरह मेरे दिमाग में घूमने लगीं।
मैंने ग्लास को सीमेंट की बेंच पर रखा।
"इमरान..." मेरी आवाज़ थोड़ी भारी और लड़खड़ाती हुई निकली।
"बोल भाई, क्या हुआ?" उसने अपनी सिगरेट सुलगाते हुए हल्के मूड में पूछा।
मुझसे तुरंत बोला नहीं गया... क्या बोलूँ और कहाँ से शुरू करूँ, यह तय करने में समय लगने लगा... और इस हालत में तो यह और भी मुश्किल लग रहा था।
"पैग ज़्यादा कड़ा बन गया क्या?" इमरान ने धुआँ उड़ाते हुए मेरी ओर देखा।
"मुझे एक बात बता..."
"पूछ..." कहकर वह अपने लिए पैग बनाने लगा।
मैंने दो-तीन काजू उठाकर मुँह के एक कोने में रखते हुए खुद को शांत दिखाते हुए कहा,
"सच-सच बताना… आज कोई ड्रामा नहीं चाहिए मुझे…"
मैंने भी अपनी क्लासिक डबल बर्स्ट सुलगाई… खुद को क्लासी दिखाने के लिए यह ज़रूरी लगा। नशे के बावजूद मेरी आँखों में एक सुलगता हुआ गुस्सा नज़र आने लगा था…
इमरान ने सिगरेट का एक लंबा कश खींचा, धुएँ का एक छल्ला हवा में छोड़ा और मुस्कुराया,
"अरे पूछ ना यार, तू तो ऐसे सीरियस हो रहा है जैसे सीबीआई का अफसर हो.. क्या बात है?"
"तेरे और मेरी मम्मी के बीच... यह सब क्या चल रहा है?"
सन्नाटे में मेरे यह शब्द किसी हथौड़े की तरह गूँजे… पार्क की झाड़ियों में हवा की सरसराहट भी जैसे एक पल के लिए थम गई।
इमरान के चेहरे पर जो मुस्कान थी, वह एक सेकंड के दसवें हिस्से के लिए ठिठकी, लेकिन उसने तुरंत खुद को सँभाला। उसने कोई घबराहट नहीं दिखाई, न ही कोई आक्रामकता… उसने बहुत ही शांत, लगभग दार्शनिक अंदाज़ में अपना ग्लास उठाया, एक घूँट भरा और फिर मेरी तरफ देखा.. उसकी आँखों में एक ऐसी सहजता थी जो किसी शातिर अपराधी की सबसे बड़ी ढाल होती है।
"देव... मुझे पता था कि तेरे दिमाग में यह कचरा चल रहा होगा," उसने बेहद धीमी, वज़नदार आवाज़ में कहा।
"तू पिछले कुछ हफ़्तों से जिस तरह मुझे और आंटी जी को देख रहा है, मुझे सब समझ आता है भाई। लेकिन तू गलत दिशा में सोच रहा है।"
"गलत दिशा में सोच रहा हूँ मैं?" मेरी आवाज़ में और कड़वाहट घुल गई,
"इमरान, मैं अंधा नहीं हूँ! जिस तरह से तू उनसे बातें करता है, जिस तरह से वह तेरे सामने पेश आती हैं... उनके वो कपड़े, वो नया अंदाज़, उनका बिना बताए घंटों गायब रहना... क्या यह सब भी मेरा वहम है?"
नशे में जो भी ज़ुबान पर आया, मैं बोलता गया... मेरे दिमाग में एक बार के लिए यह बात कौंधी कि कहीं मैं ऐसा कुछ ज़रूरत से ज़्यादा उजागर न कर दूँ जो बाद में मेरे खिलाफ हो जाए...
इमरान ने सिगरेट की राख झाड़ी और थोड़ा आगे झुककर मेरी आँखों में देखा। उसके स्वर में इतनी बनावटी मासूमियत और हमदर्दी थी कि कोई भी तीसरा इंसान उस पर भरोसा कर जाता।
"देव, मेरी बात ठंडे दिमाग से सुन। आंटी जी तेरे लिए क्या हैं? तेरी माँ हैं ना? एक ऐसी औरत जिसने अपनी पूरी जवानी बीरभूम के उस छोटे से, दकियानूसी कस्बे में गुज़ार दी। तेरे पिता के जाने के बाद उन्होंने क्या देखा अपनी ज़िंदगी में? सिर्फ चूल्हा-चौका, समाज के ताने, और वह मटमैली सूती साड़ियों तक सिमटी घुटन भरा दायरा। कभी तूने एक बेटे के चश्मे को उतारकर एक औरत के नज़रिए से उन्हें देखा है?"
उसकी इस दलील ने मेरे सीने पर एक अलग सा वार किया। मैं चुपचाप उसे देखता रहा।
इमरान अपनी रौ में बोलता चला गया,
"वह इस शहर में नई आई हैं देव। यह एक नया और पूरी तरह से जुदा शहर है, नया और एकदम अलग माहौल है। उनके पुराने घर से कहीं दूर एक ऐसे शहर में... चालीस-पैंतालीस साल की उम्र में अगर कोई औरत खुद को थोड़ा संवारना चाहती है, अपनी ज़िंदगी को थोड़ा खुलकर जीना चाहती है, नए कपड़े पहनना चाहती है, तो इसमें क्या गुनाह है? क्या विधवा हो जाने के बाद एक औरत को अपनी देह, अपनी इच्छाओं और अपनी खुशियों को ज़िंदा दफन कर देना चाहिए?"
"लेकिन वह सिर्फ कपड़े नहीं हैं इमरान!" मैंने चिढ़कर कहा,
"और तू... तू उनके इतने करीब क्यों जा रहा है?"
"क्योंकि वह मुझे अपने बेटे के दोस्त की तरह नहीं, बल्कि एक ऐसे इंसान की तरह देखती हैं जिसके सामने उन्हें अपने उस पुराने, बोझिल अतीत का मुखौटा नहीं पहनना पड़ता," इमरान ने बहुत ही सधे हुए शब्दों में जवाब दिया,
"तू उनका बेटा है देव। तू उनसे उम्मीद करता है कि वह हमेशा वही पुराने ज़माने की, सर और कंधों को पल्लू से ढकने वाली, त्यागमयी माँ बनकर रहें। वह तेरे सामने खुलकर सांस भी नहीं ले पातीं क्योंकि उन्हें डर लगता है कि उनका बेटा उन्हें जज करेगा! लेकिन मेरे साथ... मेरे साथ वह कंफर्टेबल फील करती हैं। मैं उनकी तारीफ करता हूँ तो उनके चेहरे पर मुस्कान आती है। क्या किसी मुरझाए हुए फूल को थोड़ा पानी देना कोई पाप है?"
उसने अपना हाथ आगे बढ़ाकर मेरे कंधे पर रख दिया। उसका स्पर्श इतना भारी और बनावटी था कि मेरा जी चाहा कि मैं उसका हाथ झटक दूँ।
पर मैंने ऐसा किया नहीं।
मैं देखना चाहता था कि वह और क्या-क्या बोलेगा अभी...?
"देव, सच कह रहा हूँ भाई... मैं उनकी इज़्ज़त करता हूँ। ठीक वैसे ही जैसे किसी को अपने किसी करीबी दोस्त की मम्मी की करनी चाहिए। उनके मन में मेरे लिए एक अपनापन है, क्योंकि मैंने उन्हें इस शहर में यह अहसास कराया कि उनकी अपनी भी कोई पहचान है। बाकी जो तू सोच रहा है ना... वह सिर्फ तेरे दिमाग का फितूर है। शक कम किया कर, और दफ्तर का तनाव घर पर मत लाया कर।"
उसकी बातें इतनी चिकनी, इतनी तार्किक और इतनी खूबसूरती से गढ़ी गई थीं कि कोई भी अदालत उसे बा-इज़्ज़त बरी कर देती। लेकिन मेरी अंतरात्मा चीख-चीख कर कह रही थी कि यह सब एक सफेद झूठ है। यह उस दलदल पर बिछाई गई हरी घास थी जिसके नीचे सिर्फ सड़न और धोखा था।
अगर यह सब सिर्फ एक औरत की आज़ादी की बात थी, तो उस डायरी में लिखा वह सब क्या था? उस दिन जो वह शख्स आया था हमारे फ्लैट में, वह क्या था? और सबसे बढ़कर... वह पार्सल क्या था?
मेरी ज़ुबान पर वह सवाल आने ही वाला था। मैं उससे पूछने ही वाला था—'अगर सब कुछ इतना ही पाक-साफ है, तो उस दिन तूने आंटी जी के नाम से जो पार्सल मँगवाया था, और जिसे तूने घुटनों का आयुर्वेदिक तेल बताया था... वह असल में क्या था? और तू पिछले चार दिनों से इस शहर के सिंडिकेट वाली खबर के बाद किन चूहों के बिलों में छुपा घूम रहा था?'
लेकिन मैंने खुद को रोक लिया।
मुझे डर लगने लगा था कि सब कुछ पूरी तरह से साफ होने से पहले ही कहीं मैं आज ज़रूरत से कहीं ज़्यादा न बोल दूँ... क्योंकि इतना तो मेरे लिए साफ था कि इमरान अभी नब्बे प्रतिशत सिर्फ झूठ ही बोल रहा है... सच से वह कोसों दूर रहेगा।
इसलिए मैंने चुपचाप पीने पर फोकस किया और एक के बाद एक तीन बार अपना ग्लास खाली कर दिया। शराब की कड़वाहट मेरी जीभ पर फैल गई। मुझे समझ आ गया था कि अगर मैंने आज वह सवाल पूछ लिया, तो इमरान और अलर्ट हो जाएगा। वह कोई नया बहाना बना देगा, कोई नई मनगढ़ंत कहानी सुना देगा। शातिर मुजरिमों से सच उनके मुँह से नहीं उगलवाया जाता; उन्हें उनके अपने ही जाल में फंसने के लिए खुला छोड़ना पड़ता है।
"चल, बहुत देर हो गई है। घर चलते हैं," मैंने अपनी आवाज़ को पूरी तरह भावहीन बनाते हुए कहा और बेंच से उठ खड़ा हुआ।
इमरान ने मेरी तरफ देखा। उसकी आँखों में एक पल के लिए यह जानने की उत्सुकता उभरी कि क्या मैंने उसकी बातों पर यकीन कर लिया है। मेरे चेहरे के सपाट भावों को देखकर शायद उसने मान लिया कि उसने मुझे चुप करा दिया है। उसके होठों पर वही पुरानी, जीत वाली मुस्कान तैर गई।
उस रात घर लौटकर मैं अपने कमरे में सोने का नाटक करता रहा, लेकिन मेरी आँखों में नींद का एक कतरा भी नहीं था। मुझे पता था कि यह शांति सिर्फ एक छलावा है। शहर के सिंडिकेट का भंडाफोड़, इमरान का वह गायब होना, और फिर यह चिकनी-चुपड़ी सफाई... यह सब किसी खास दिशा की ओर इशारा कर रहे थे।
Continued....


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