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Adultery FLAT MATE
Episode 27: Continued....

पहला प्रयास:

मंगलवार की दोपहर थी। मुझे पता था कि मंगलवार को मम्मी 'हनुमान मंदिर' जाने का बहाना बनाकर निकलती थीं। मैंने दफ्तर से जल्दी निकलने की अर्जी दी और करीब साढ़े तीन बजे अपनी बाइक लेकर अपनी ही सोसाइटी के बाहर वाले नुक्कड़ पर एक चाय की गुमटी के पीछे छिपकर खड़ा हो गया।

ठीक तीन बजकर पैंतालीस मिनट पर मम्मी बाहर निकलीं। उन्होंने हल्के जामुनी रंग की एक जॉर्जेट की साड़ी पहन रखी थी, धूप से बचने के लिए उन्होंने अपनी आँखों पर एक बड़ा सा काला चश्मा चढ़ा रखा था और हाथ में एक छोटा सा फैंसी क्लच था। वे किसी भी कोण से पूजा करने जा रही श्रद्धालु नहीं लग रही थीं; उनकी चाल में एक अजीब सी मदमस्त ठसक थी।

सोसाइटी के गेट से निकलते ही उन्होंने एक ऑटो को हाथ दिया। ऑटो रुका, वे अंदर बैठीं और ऑटो मुख्य सड़क की तरफ बढ़ गया।

मैंने तुरंत अपनी बाइक स्टार्ट की और सेफ डिस्टेंस बनाए रखते हुए ऑटो के पीछे लग गया। मेरा दिल सीने में धड़क रहा था। पहली बार मैं अपनी ही मम्मी की जासूसी कर रहा था। सड़क पर गाड़ियों का भारी ट्रैफिक था। ऑटो कभी किसी बस के पीछे छिप जाता, तो कभी किसी चौराहे पर धीमा पड़ जाता।

करीब दो किलोमीटर चलने के बाद ऑटो एक बेहद व्यस्त और पुराने बाज़ार के इलाके में मुड़ा। वहां सड़कों पर दोनों तरफ दुकानें थीं, ठेलों की भरमार थी और पैदल चलने वालों का ऐसा रेला था कि बाइक चलाना दूभर हो रहा था।

अचानक, उस संकरी गली के मोड़ पर एक लोडिंग टेम्पो ने बीच सड़क पर ब्रेक मार दिया। रास्ता पूरी तरह ब्लॉक हो गया।

"अरे भाई, हटाओ इसे!" मैंने अपनी बाइक का हॉर्न जोर-जोर से बजाते हुए चिल्लाया।

"दिखता नहीं है क्या, माल उतर रहा है! दो मिनट रुको!" टेम्पो वाले ने बदतमीजी से जवाब दिया।

उन दो मिनटों ने मेरी किस्मत का फैसला कर दिया। जब तक रास्ता खुला और मैंने अपनी बाइक को आगे निकाला, तब तक वह ऑटो न जाने किस मोड़ पर मुड़ चुका था। मैंने पागलों की तरह उस पूरे बाज़ार के तीन चक्कर लगाए, हर ऑटो के अंदर झांककर देखा, लेकिन मम्मी का कहीं कोई नाम-ओ-निशान नहीं था। वे उस भीड़-भरे बाज़ार के किसी अज्ञात कोने में ऐसे गायब हो गई थीं जैसे हवा का कोई झोंका। मैं बड़ा हैरान-परेशान और पसीने से तर-बतर, खाली हाथ लौट आया।


दूसरा प्रयास:
दो दिन बाद, गुरुवार को मुझे फिर मौका मिला। इस बार मैंने कोई गलती न करने की कसम खाई थी।

मम्मी दोपहर करीब दो बजे निकलीं। इस बार उनके लिबास में मॉडर्ननेस और भी ज्यादा तीखी थीएक बेहद फिटिंग वाला सफेद और लाल सलवार-सूट, जिसके दोनों तरफ के कट काफी नीचे तक थे और दुपट्टा केवल एक कंधे पर पिन से अटका हुआ था।

इस बार वे ऑटो में नहीं बैठीं, बल्कि पैदल ही मुख्य सड़क की ओर चलने लगीं। मैं अपनी बाइक को बंद करके, पैदल ही उनके पीछे-पीछे करीब पचास मीटर की दूरी पर चलने लगा। धूप बहुत तेज थी, पर मेरी आँखें सिर्फ उनके उस हिलते, सधे हुए बदन पर टिकी थीं।

वे एक बड़े शॉपिंग मॉल के सामने रुकीं। तभी वहाँ एक काली सेडान कार आकर रुकी। कार के शीशे पूरी तरह काले थे। कार का पिछला दरवाजा खुला, मम्मी ने एक बार मुड़कर अपने पीछे देखामैंने खुद को तुरंत एक बड़े होर्डिंग के पीछे छिपा लियाऔर फिर वे तेजी से उस कार के अंदर बैठ गईं। दरवाजा बंद हुआ और कार फर्राटा भरते हुए निकल गई।

"कार? किसकी कार थी वो?" मेरे होश उड़ गए।

मैं वापस भागकर अपनी बाइक की तरफ गया, जो मैंने कुछ दूरी पर पार्क की थी। बाइक स्टार्ट करने में मुझे सिर्फ तीस सेकंड लगे, लेकिन जब तक मैं मुख्य सड़क पर पहुंचा, वह काली कार उस चौड़ी सड़क के भारी ट्रैफिक में कहीं गायब हो चुकी थी!

न मैं उसका नंबर देख पाया, न ही ड्राइवर का चेहरा।

दो बार... लगातार दो बार वे मेरी आंखों के सामने से ऐसे ओझल हुई थीं जैसे किसी ने बहुत ही सधे हुए तरीके से इस पूरे खेल की स्क्रिप्ट लिखी हो।

और दोनों बार इतनी खूबसूरती से आँखों के सामने से ओझल कैसे हो गईं?

संदेह का यह जाल अब मुझे पागल करने लगा था।


तीसरी कोशिश: कॉर्पोरेट की बेड़ियां
शनिवार का दिन।

आज भी मम्मी कहीं जाने वाली हैं

यह दिन मेरे लिए बेहद महत्वपूर्ण था क्योंकि मुझे किसी भी कीमत पर यह जानना था कि आखिर मम्मी ससुरी जाती कहाँ हैं?!

दोपहर के करीब एक बजे, मम्मी फिर से उसी तरह तैयार हुईं। इस बार उन्होंने हल्के गुलाबी रंग की शिफॉन की साड़ी पहनी थी, जिसका पल्लू इतना झीना था कि उसके आर-पार उनके सीने और पीठ की त्वचा साफ झलक रही थी।

वे फ्लैट से निकलीं और मैंने तुरंत अपनी बाइक उनके पीछे लगा दी।

इस बार मैंने फैसला किया था कि मैं उनके ऑटो से अपनी नजरें एक सेकंड के लिए भी नहीं हटाऊंगा, चाहे सड़क पर कोई भी आ जाए। ऑटो आगे-आगे चल रहा था और मैं ठीक दो गाड़ियाँ पीछे अपनी बाइक दौड़ा रहा था। हम शहर के एक बेहद शांत, पॉश रिहायशी इलाके की तरफ बढ़ रहे थे।

मेरी धड़कनें तेज थीं; मुझे लग रहा था कि आज... आज इस रहस्य की अंतिम परत उतरने वाली है।

तभी, मेरी जेब में पड़ा फोन किसी अलार्म की तरह जोर-जोर से घनघनाने लगा।

मैंने एक हाथ से हैंडल संभालते हुए जेब से फोन निकाला और स्क्रीन पर देखा।

'गांडू कॉलिंग...'

ये नाम मैंने अपने ऑफिस के बॉस को दिया थाऔर इसी नाम से फोन में उनका कॉन्टैक्ट सेव करके रखा था।

मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मेरा बॉस, सुधीर सिंघानिया, पूरे दफ्तर में अपने सनकी मिजाज और क्रूरता के लिए बदनाम था। अगर उसका फोन शनिवार को आ रहा था, तो इसका मतलब था कि दफ्तर में कोई बहुत बड़ा बवाल खड़ा हो चुका था।

मैंने पहले सोचा कि कॉल काट दूँ। सामने ऑटो जा रहा था, मम्मी का वह गुलाबी पल्लू खिड़की से बाहर हवा में लहरा रहा था। सच्चाई सिर्फ कुछ सौ मीटर दूर थी।

लेकिन फिर मेरे दिमाग में अपने करियर, अपनी नौकरी और उस एक्सीडेंट के बाद के मेडिकल बिलों का ख्याल कौंध गया। अगर यह नौकरी गई, तो मैं इस शहर में एक दिन भी टिक नहीं पाऊंगा। मेरी रीढ़ में एक ठंडा डर उतर गया।

मैंने मजबूरन बाइक को सड़क के किनारे एक पेड़ के नीचे रोका, हेलमेट का शीशा ऊपर किया और कांपती उंगलियों से कॉल रिसीव किया।

"यस, सर?" मैंने अपनी हांफती हुई आवाज को काबू में करते हुए कहा।

"देव! व्हेयर द हेल आर यू?!" फोन के उस पार से सुधीर की दहाड़ती हुई आवाज आई। उसकी आवाज इतनी तेज थी कि मुझे फोन कान से थोड़ा दूर करना पड़ा।

"सर, मैं... मैं फील्ड में हूँ, एक काम से..."

"शट अप! मुझे कोई बहाने नहीं सुनने!" सुधीर मादरचोद ने मुझे बीच में ही काट दिया… "जो जर्मन क्लाइंट की प्रेजेंटेशन मंडे को जानी थी, उसके सारे फाइनेंशियल प्रोजेक्शंस में इतनी बड़ी गलतियां कैसे हैं? तुमने वो डेटा री-चेक क्यों नहीं किया था?"

"सर, वो डेटा अमित जी की टीम ने दिया था, मैंने सिर्फ उसे कंपाइल..."

"डोंट पास द बक ऑन अदर्स, देव!" सुधीर चीखा... "तुम प्रोजेक्ट लीड कर रहे हो या अमित? उस क्लाइंट का अकाउंट हमारे लिए बीस करोड़ का है। अगर मंडे मॉर्निंग को उस प्रेजेंटेशन में एक भी कॉमा गलत निकला, तो याद रखना, तुम्हारी वो एक्सीडेंट वाली लीव मैं अनपेड कर दूंगा और तुम्हें इसी महीने टर्मिनेशन लेटर थमा दूंगा! आर यू गेटिंग माय पॉइंट?"

मेरी आँखों के सामने अंधेरा छा गयाक्योंकि ये गांडू साला सच में दिमाग से पूरा ही गोल थाइसकी धमकी सिर्फ धमकी नहीं होती है.. ये मैंने साक्षात कई बार देखा है ऑफिस में। कॉर्पोरेट की यह बेरहम दुनिया इंसान को कैसे अपनी उंगलियों पर नचाती है, इसका सबसे घिनौना रूप मेरे सामने था।

"स... सर, मैं समझ रहा हूँ। मैं अभी..."

"अभी नहीं, राइट नाउ!" सुधीर ने चिल्लाकर कहा। "मुझे अगले आधे घंटे में तुम्हारी तरफ से पूरी एक्सेल शीट का ऑडिटेड वर्जन मेरी ईमेल पर चाहिए। अगर तीन बजे तक मेल नहीं आया, तो मंडे को ऑफिस आने की जहमत मत उठाना!"

इसके बाद फोन पर एक लंबी 'बीप' सुनाई दी। सुधीर ने कॉल काट दी थी।

मैं सड़क किनारे खड़ा हांफ रहा था। मेरे हाथ गुस्से और लाचारी से कांप रहे थे। मैंने नजर उठाकर देखा... वह सड़क पूरी तरह खाली थी। वह ऑटो, वह गुलाबी पल्लू, वह सारा सुराग... सब कुछ हवा हो चुका था।

मैं वहीं फुटपाथ पर बैठकर अपना सिर दोनों हाथों में थामकर रह गया। एक तरफ मेरा करियर था जो एक धागे से लटक रहा था, और दूसरी तरफ मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा, सबसे काला सच था जो एक बार फिर मेरी उंगलियों के बीच से फिसल गया था। मुझे तुरंत घर लौटकर अपना लैपटॉप खोलना पड़ा और रोते-रोते उस एक्सेल शीट की गलतियों को सुधारना पड़ा। उस दिन मैं काम की बेड़ियों में ऐसा जकड़ा कि रात तक कमरे से बाहर नहीं निकल सका।

इसके अलावा अपनी किस्मत को बस कुछ बहुत तगड़ी गाली ही दे सका


चौथा प्रयास: बैक टू हॉस्पिटल
रविवार का दिन तनाव और थकावट के बीच बीता था, और सोमवार को जब मैं दफ्तर से निकला, तो मेरे भीतर का वह इन्वेस्टिगेटर एक बार फिर सिर उठा चुका था। मुझे पता चला था कि मम्मी आज शाम को फिर किसी काम से बाहर जाने वाली हैं।

शाम के करीब छह बजे थे।

सूरज ढल रहा था और शहर की सड़कों पर स्ट्रीट लाइट्स एक-एक करके जलने लगी थीं।

मम्मी इस बार एक बेहद खूबसूरत, गहरे नेवी-ब्लू रंग की सिल्क साड़ी में निकली थीं। उस साड़ी की बॉर्डर पर सुनहरी ज़री का भारी काम था, लेकिन ब्लाउज का कट वैसा ही गहरा और बोल्ड था जैसा अब उनकी आदत बन चुका था। उनके चलने के अंदाज में एक अजीब सी लचक आने लगी थीलेकिन आज थोड़ी जल्दबाजी में थीं... वे बार-बार अपनी कलाई पर बंधी घड़ी देख रही थीं।

वे सोसाइटी से बाहर निकलीं और एक कैब में बैठ गईं।

मैंने तुरंत अपनी बाइक स्टार्ट की। इस बार मैंने अपने फोन को वाइब्रेट मोड पर डाल दिया था। आज न कोई बॉस, न कोई ऑफिस, न कोई दुनिया की ताकत मुझे रोक सकती थी।

मैंने कैब का पीछा करना शुरू किया

कैब शहर के उस पुराने, ऐतिहासिक इलाके की तरफ बढ़ रही थी जहाँ पुरानी हवेलियां और बंद पड़े गोदाम थे। सड़कें संकरी होती जा रही थीं और ट्रैफिक कम हो रहा था। दूरी बनाए रखना आसान था। मेरा दिल सीने में बेतहाशा धड़क रहा था।

"आज... आज सब कुछ सामने आ जाएगा," मैं मन ही मन बुदबुदा रहा था… "आज मैं देखूंगा कि कौन है वो शख्स जिसके लिए यह औरत अपनी पूरी जिंदगी, अपनी मर्यादा को दांव पर लगा रही है।"

कैब एक पुराने, वीरान पड़े डाक-बंगले के मोड़ की तरफ मुड़ी। वहां सन्नाटा था। सिर्फ कुछ पुरानी स्ट्रीट लाइट्स टिमटिमा रही थीं। कैब की रफ्तार धीमी हुई, जैसे वह रुकने ही वाली हो।

तभी, मेरा फोन वाइब्रेट हुआ।

पॉकेट से निकाल कर देखा

स्क्रीन पर 'रुया' का नाम चमक रहा था।

मैंने उसे नजरअंदाज करने की कोशिश की। मैंने अपना ध्यान सामने रुकती हुई कैब पर केंद्रित किया। कैब का दरवाजा खुलने ही वाला था।

लेकिन फोन लगातार बजता रहा

एक बार।

दो बार..

तीन बार...

रुया कभी इस तरह लगातार कॉल नहीं करती थी। वह जानती थी कि मैं शाम को रिलैक्स मूड में होता हूँ। मेरे मन में एक अजीब सा खटका हुआ। क्या कोई अनहोनी हो गई?

मैंने कैब को देखते हुए एक हाथ से कॉल का बटन स्वाइप किया और ब्लूटूथ इयरफोन में उसकी आवाज सुनी।

"द... देव..."

फोन के उस पार से रुया की जो आवाज आई, उसने मेरे खून को जमा दिया। वह बोल नहीं रही थी, बल्कि बेतहाशा रो रही थी। उसकी सांसें बुरी तरह उखड़ी हुई थीं और पीछे से किसी के कराहने की आवाजें आ रही थीं।

"रुया?! क्या हुआ? तुम रो क्यों रही हो?" मैंने बाइक की रफ्तार धीमी करते हुए घबराकर पूछा।

"देव... प्लीज... मेरी मदद करो..." रुया हिचकियों के बीच चीखी। "मम्मी... मम्मी को अचानक सीने में दर्द हुआ और वे फर्श पर गिर पड़ीं... वे बेहोश हैं, उनकी आँखें पलट रही हैं... घर पर कोई नहीं है देव! मैं एम्बुलेंस को फोन कर रही हूँ पर कोई उठा नहीं रहा... मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा... प्लीज आ जाओ देव... आई नीड यू!"

उसकी आवाज में जो बेबसी, जो सच्चा और भयानक खौफ था, उसने मेरे दिमाग के सारे तारों को झकझोर कर रख दिया।

सामने कैब रुक चुकी थी। उसका पिछला दरवाजा खुला था और मम्मी का वह नीला पल्लू बाहर निकल रहा था। वे उस पुराने डाक-बंगले के गेट की तरफ बढ़ रही थीं। वहां गेट के थोड़े पीछे एक साया खड़ा था... एक लंबा, मर्दाना साया

सच्चाई सिर्फ पचास मीटर दूर थी। मुझे सिर्फ बाइक को आगे बढ़ाना था, और उस साये का चेहरा बेनकाब हो जाता। मेरी हफ्तों की तड़प, मेरी रातों की नींद का हिसाब आज उस सड़क पर चुकता हो सकता था।

"देव... प्लीज... मम्मी का हाथ ठंडा पड़ रहा है..." फोन में रुया की दर्दनाक चीख गूंजी।

मैं एक भयानक दोराहे पर खड़ा था।

एक तरफ मेरी माँ का वह संदेहास्पद, घिनौना रहस्य था जिसे जानने के लिए मैं हफ्तों से जल रहा था। और दूसरी तरफ वह बेकसूर, मासूम लड़की थी जिसने मेरी जिंदगी के सबसे काले दिनों में मुझे सहारा दिया था, जिसकी माँ इस वक्त जिंदगी और मौत के बीच झूल रही थी।

अगर मैं आज उस डाक-बंगले की तरफ गया, तो शायद मुझे वो सच मिल जाता... लेकिन हमेशा के लिए रुया की माँ की जान जा सकती थी, और मैं खुद को कभी माफ नहीं कर पाता।

"रुया! शांत हो जाओ! मैं आ रहा हूँ... मैं बस पांच मिनट में पहुंच रहा हूँ!" मैंने जोर से चीखते हुए कहा, और अपनी पूरी ताकत से बाइक का हैंडल घुमा दिया।

टायरों की तेज चीख के साथ मेरी बाइक सड़क पर घूमी। मैंने एक अंतिम बार मुड़कर उस डाक-बंगले की तरफ देखा।
मम्मी उस साये के साथ उस पुराने अहाते के भीतर दाखिल हो चुकी थीं, और लोहे का भारी गेट उनके पीछे बंद हो रहा था।

मेरी आँखों से गुस्से और बेबसी के दो बूंद आंसू टपक कर गालों पर बह गए। मैंने बाइक का एक्सीलेटर पूरी ताकत से खींच दिया और शहर की दूसरी दिशा में, रुया के घर की ओर हवा से बातें करने लगा।

जब मैं रुया के घर पहुंचा, तो दृश्य बेहद डरावना था। रुया की माँ लिविंग रूम के फर्श पर बेबस पड़ी थीं, उनका चेहरा पीला पड़ चुका था और सांसें बहुत धीमी चल रही थीं। रुया उनके पास बैठी अपने आंसुओं से उनका चेहरा भिगो रही थी।

"देव!" मुझे देखते ही वह भागकर मेरे सीने से लिपट गई। उसका पूरा बदन थर-थर कांप रहा था।

"घबराओ मत रुया, मैं आ गया हूँ," मैंने उसे सहारा देते हुए कहा और तुरंत उसकी माँ को अपनी बाहों में उठाया।

वे बहुत भारी नहीं थीं, पर बीमारी ने उन्हें बेजान बना दिया था। मैंने उन्हें नीचे मोहल्ले के एक ऑटो वाले को हाथ देकर उसमें लिटाया। रुया उनका सिर अपनी गोद में रखे लगातार रोती जा रही थी, और मैं ऑटो वाले को तेज चलाने के लिए चिल्ला रहा था।

अगले दो घंटे किसी भयानक दुःस्वप्न की तरह बीते।

अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड के लाल बल्ब के नीचे हम दोनों खड़े थे। डॉक्टर्स की एक टीम अंदर गई थी। रुया का रो-रोकर बुरा हाल था। वह बार-बार अपनी हथेलियों को रगड़ती और भगवान से प्रार्थना करती। मैंने उसके काँपते हुए कंधों को अपनी बाहों में समेट रखा था।

"उन्हें कुछ नहीं होगा रुया, तुम देखना... वे बिल्कुल ठीक हो जाएंगी," मैं उसे सांत्वना दे रहा था, पर मेरे अपने भीतर एक अजीब सा खालीपन पसरा हुआ था।

रात के करीब नौ बजे डॉक्टर बाहर आए... उनके चेहरे पर एक हल्की सी राहत थी।

"शी इज आउट ऑफ डेंजर नाउ," डॉक्टर ने कहा... "माइल्ड हार्ट अटैक था। अगर आप लोग पंद्रह-बीस मिनट और देर कर देते, तो स्थिति बहुत गंभीर हो सकती थी। समय पर ले आए, यह बहुत अच्छा हुआ। अब वे खतरे से बाहर हैं, हमने आईसीयू में शिफ्ट कर दिया है।"

यह सुनते ही रुया की आँखों से राहत के आँसू छलक पड़े। उसने मुड़कर मुझे इतनी जोर से गले लगाया कि मेरी साँसें रुक गईं।

"थैंक यू देव... अगर आज तुम नहीं होते, तो मैं... मैं अनाथ हो जाती," वह मेरे सीने में अपना चेहरा छुपाकर सिसक रही थी।

मैंने उसके सिर को सहलाया... उस वक्त मुझे लगा कि मैंने सही फैसला किया था.. एक इंसान की जान बचाना किसी भी गंदे सच को जानने से कहीं ज्यादा बड़ा काम था।

 


To be Continued…
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FLAT MATE - by The_Writer - 18-05-2026, 09:35 PM
RE: FLAT MATE - by The_Writer - 19-05-2026, 01:17 PM
RE: FLAT MATE - by Uvaaaa - 19-05-2026, 11:20 PM
RE: FLAT MATE - by The_Writer - 20-05-2026, 01:14 PM
RE: FLAT MATE - by The_Writer - 21-05-2026, 09:33 PM
RE: FLAT MATE - by garamrohan - 22-05-2026, 09:17 PM
RE: FLAT MATE - by The_Writer - 25-05-2026, 08:32 AM
RE: FLAT MATE - by The_Writer - 25-05-2026, 08:40 AM
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RE: FLAT MATE - by Kerry Watson - 25-05-2026, 07:23 PM
RE: FLAT MATE - by Armando - 25-05-2026, 07:43 PM
RE: FLAT MATE - by garamrohan - 26-05-2026, 09:06 PM
RE: FLAT MATE - by The_Writer - 29-05-2026, 11:56 PM
RE: FLAT MATE - by The_Writer - 29-05-2026, 11:32 PM
RE: FLAT MATE - by The_Writer - 31-05-2026, 11:07 AM
RE: FLAT MATE - by The_Writer - 31-05-2026, 01:50 PM
RE: FLAT MATE - by The_Writer - 05-06-2026, 07:33 AM
RE: FLAT MATE - by The_Writer - 05-06-2026, 08:37 AM
RE: FLAT MATE - by The_Writer - 13-06-2026, 10:39 AM
RE: FLAT MATE - by The_Writer - 13-06-2026, 12:48 PM
RE: FLAT MATE - by Marishka - 14-06-2026, 05:11 AM
RE: FLAT MATE - by The_Writer - 15-06-2026, 12:16 PM
RE: FLAT MATE - by Jannat. - 14-06-2026, 06:41 AM
RE: FLAT MATE - by Kamya Sharma - 14-06-2026, 06:55 AM
RE: FLAT MATE - by momass - 15-06-2026, 08:12 AM
RE: FLAT MATE - by The_Writer - 15-06-2026, 10:59 AM
RE: FLAT MATE - by wetpussy - 15-06-2026, 03:10 PM
RE: FLAT MATE - by The_Writer - 18-06-2026, 02:43 PM
RE: FLAT MATE - by Sicario - 15-06-2026, 03:26 PM
RE: FLAT MATE - by Rajun - 15-06-2026, 03:49 PM
RE: FLAT MATE - by Kamdevi. - 15-06-2026, 08:30 PM
RE: FLAT MATE - by momass - 16-06-2026, 07:18 AM
RE: FLAT MATE - by jamanuram - 18-06-2026, 12:06 PM
RE: FLAT MATE - by The_Writer - 18-06-2026, 02:41 PM
RE: FLAT MATE - by deepfake - 18-06-2026, 09:13 PM
RE: FLAT MATE - by The_Writer - 18-06-2026, 10:32 PM
RE: FLAT MATE - by Tanisha. - 19-06-2026, 03:22 PM
RE: FLAT MATE - by The_Writer - 14-07-2026, 10:53 AM
RE: FLAT MATE - by Usha Devi - 19-06-2026, 03:48 PM
RE: FLAT MATE - by The Mask of Zorro - 19-06-2026, 06:20 PM
RE: FLAT MATE - by garamrohan - 20-06-2026, 12:19 PM
RE: FLAT MATE - by momass - 30-06-2026, 06:51 AM
RE: FLAT MATE - by The_Writer - 14-07-2026, 10:54 AM
RE: FLAT MATE - by royarnab26 - 05-07-2026, 12:54 AM
RE: FLAT MATE - by Asli lund - 05-07-2026, 07:39 AM
RE: FLAT MATE - by momass - 07-07-2026, 11:18 AM
RE: FLAT MATE - by momass - 10-07-2026, 09:35 AM
RE: FLAT MATE - by Sexone - 14-07-2026, 03:49 PM
RE: FLAT MATE - by KkkNad - 28-07-2026, 12:00 PM
RE: FLAT MATE - by The_Writer - 30-07-2026, 11:51 PM
RE: FLAT MATE - by KkkNad - 31-07-2026, 12:53 AM
RE: FLAT MATE - by Vikrant pelu - 31-07-2026, 06:40 AM
RE: FLAT MATE - by prabudmt - 01-08-2026, 10:08 AM
RE: FLAT MATE - by Marishka - 01-08-2026, 12:43 PM
RE: FLAT MATE - by KkkNad - 02-08-2026, 04:32 PM
RE: FLAT MATE - by Rexd_101 - 02-08-2026, 04:39 PM
RE: FLAT MATE - by jamanuram - 04-08-2026, 11:50 PM
RE: FLAT MATE - by The_Writer - 06-08-2026, 10:30 AM
RE: FLAT MATE - by jamanuram - 06-08-2026, 01:56 PM
RE: FLAT MATE - by The_Writer - 06-08-2026, 10:16 PM
RE: FLAT MATE - by KkkNad - 06-08-2026, 05:42 PM
RE: FLAT MATE - by The_Writer - 06-08-2026, 10:27 PM
RE: FLAT MATE - by KkkNad - 07-08-2026, 12:55 AM
RE: FLAT MATE - by jamanuram - 09-08-2026, 12:22 AM
RE: FLAT MATE - by momass - 12-08-2026, 09:01 AM
RE: FLAT MATE - by The_Writer - 12-08-2026, 12:19 PM
RE: FLAT MATE - by Sumaiya Shimu - 12-08-2026, 12:53 PM
RE: FLAT MATE - by Blueman - 12-08-2026, 01:45 PM
RE: FLAT MATE - by Ella - 12-08-2026, 02:22 PM
RE: FLAT MATE - by Renuka Shahane - 12-08-2026, 02:35 PM
RE: FLAT MATE - by Suhana. - 12-08-2026, 07:17 PM
RE: FLAT MATE - by shalini - 12-08-2026, 07:30 PM
RE: FLAT MATE - by The_Writer - 13-08-2026, 12:27 PM
RE: FLAT MATE - by Sara Khan - 13-08-2026, 02:03 PM
RE: FLAT MATE - by The_Writer - 26-08-2026, 11:29 AM
RE: FLAT MATE - by KkkNad - 27-08-2026, 12:01 AM
RE: FLAT MATE - by Fanfunda - 13-08-2026, 02:10 PM
RE: FLAT MATE - by रसगुल्ला - 14-08-2026, 05:26 PM
RE: FLAT MATE - by jamanuram - 20-08-2026, 01:42 PM
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