16-09-2026, 11:19 PM
एपिसोड 26: दोहरी दुनिया...
दफ्तर की काँच की खिड़कियों से जब ढलते सूरज की नारंगी किरणें अंदर आती थीं, तो वह समय मेरे लिए दिन का सबसे कठिन हिस्सा बन जाता था। वह घड़ी होती थी जब मुझे वापस उस फ्लैट में लौटना पड़ता था, जहाँ हर कोने में अविश्वास का सन्नाटा पसरा हुआ था। लेकिन अब उस वापसी के रास्ते पर एक ठहराव आ गया था—एक ऐसा पड़ाव, जिसने मुझे बिखरने से बचा रखा था… और वो ठहराव मेरे ऑफिस की ही थी…
"देव, आज भी इतने गंभीर? कभी तो मुस्कुरा दिया करो," रुया की हल्की, खनकती हुई आवाज मेरे कानों में पड़ी।
मैंने अपने डेस्क से सिर उठाया…
वह अपना हैंडबैग कंधे पर लटकाए, चेहरे पर वही सहज, मासूम मुस्कान लिए मेरे केबिन के दरवाजे पर खड़ी थी। उसने हल्के पिस्ता रंग का कुर्ता पहन रखा था, और उसके बाल हमेशा की तरह सादगी से बंधे हुए थे। उसके चेहरे पर कोई बनावट नहीं थी, न ही कोई ऐसा दिखावा जो आँखों को चुभे।
"बस, निकल ही रहा था," मैंने अपने लैपटॉप का ढक्कन बंद करते हुए कहा।
"तो चलो, आज कैब का इंतजार नहीं करते। मौसम अच्छा है, थोड़ा पैदल चलते हैं," उसने कहा और आगे बढ़ गई।
"पैदल?"
"हाँ, क्यों? कोई प्रॉब्लम है?"
"अम्म्म..."
कुछ सेकंड के लिए मुझे समझ में नहीं आया कि मैं आगे क्या बोलूँ? आज ऑफिस में बिल्कुल मन नहीं लग रहा था... इसलिए सोच रहा था कि सामने के मोड़ के पास वाली चाय दुकान में कुछ देर रुक कर चाय-सुट्टा मार कर, दिमाग को हर तरह के ख्यालों से आज़ाद कर के घर के लिए निकलता। आजकल घर में कुछ खास मन नहीं लगता है। हालाँकि इमरान और मम्मी के बीच वैसा तो कुछ देखने को मिला नहीं जिससे आगे का कुछ सोच या कर पाता... बस, यही एक चिंता मन में रेंट-फ्री रहने लगी है कि साला उस दिन वो लड़का कौन था जो हमारे फ्लैट में आया था, जिसका मैंने पीछा किया लेकिन आगे जा कर मिस कर दिया था!
"हेलो! कहाँ खो गए?"
"अंह..! ओह सॉरी-- दरअसल, सुबह से ही सिर थोड़ा भारी लग रहा था... अभी तो और दुखने लगा है....."
"सेरिडॉन चाहिए?" रुया मेरी बात काटते हुए बोली।
"हाँ, लिया मैंने दो मिनट पहले।"
"ज़रूरी नहीं कि हम पैदल चलें, मैं कैब कर लेती..." वो वाकई चिंतित हो गई।
"अरे ये ऐसा भी कुछ नहीं है जो मैं बर्दाश्त न कर सकूँ। और सेरिडॉन ले लिया हूँ, ये जल्दी काम करता है... टेंशन न लो... चलो चलते हैं।" मैं मुस्कुरा कर बोला।
दोनों साथ ही निकले...
दफ्तर की लिफ्ट से नीचे उतरकर जब हम सड़क पर आए, तो शाम की ठंडी हवा ने चेहरे को छुआ… गाड़ियों की कतारें, हॉर्न का शोर और स्ट्रीट वेंडर्स की आवाज़ें—यह वही शहर था जो कुछ दिन पहले तक मुझे काटने को दौड़ता था, लेकिन अब रुया के बगल में चलते हुए यह सब पृष्ठभूमि का एक बेअसर हिस्सा बनकर रह जाता है…
"तुम्हारी चोट अब पूरी तरह ठीक है न? चलते वक्त लँगड़ा तो नहीं रहे?" उसने मेरी चाल पर नजर डालते हुए पूछा।
अभी कुछ दिन पहले ही उसने बताया था कि ऑफिस के ही किसी कलीग से उसे पता चला कि मेरा हाल ही के एक दिन बहुत ज़बरदस्त एक्सीडेंट हुआ था…
"हाँ, अब बिल्कुल दर्द नहीं है। बस कभी-कभी सीढ़ियाँ चढ़ते वक्त थोड़ा खिंचाव महसूस होता है," मैंने कहा।
"फिर भी ध्यान रखा करो… तुम लड़के ना, जब तक दर्द बर्दाश्त से बाहर न हो जाए, तब तक खुद को तसल्ली देते रहते हो," उसने एक हल्की सी डाँट के अंदाज में कहा, और फिर अचानक रुक गई। "रुको, आज उस नुक्कड़ वाली टपरी से कुल्हड़ वाली इलायची चाय पिएँगे। तुम्हारी यह उतरी हुई सूरत चाय के बिना ठीक नहीं होने वाली।"
हम सड़क किनारे उस छोटी सी चाय की दुकान पर खड़े हो गए। कुल्हड़ में खौलती हुई चाय की महक के बीच रुया ने दफ्तर की छोटी-मोटी बातें शुरू कीं—कैसे हमारे मैनेजर ने आज फिर किसी प्रोजेक्ट पर बेतुका कमेंट किया था, और कैसे कैंटीन वाले ने आज पनीर वाले समोसे में पनीर कम, आलू ज़्यादा डाला था। उसकी बातें बहुत साधारण थीं,
लेकिन उन साधारण बातों में एक ऐसी ताजगी थी जो मुझे अपनी जटिलताओं से खींचकर एक सामान्य इंसान की दुनिया में ले आती थी।
कुल्हड़ हाथ में थामे मैंने उसे बोलते हुए देखा…
उसके चेहरे पर कोई राज, कोई रहस्य, कोई बनावटी इमोशन नहीं था…
उसके शब्द वही थे जो वह सोच रही थी…
जो अंदर थी, वही बाहर भी....
"तुम मुझे ऐसे क्या देख रहे हो?" रुया ने चाय की चुस्की लेते हुए मुस्कुराकर पूछा… "कुछ अजीब लग रहा है क्या?"
"नहीं," मैंने नजरें झुका लीं… "बस... सोच रहा था कि तुम इतनी बेफिक्र कैसे रह लेती हो? मतलब, दुनिया में इतनी उलझनें हैं, लोग इतने चेहरे बदलते हैं, पर तुम हमेशा एक जैसी रहती हो।"
रुया थोड़ी देर खामोश रही…
उसने कुल्हड़ को दोनों हाथों से पकड़ा और सड़क पर भागती गाड़ियों को देखते हुए बोली,
"क्योंकि मैं चीजों को उतना ही देखती हूँ जितनी वे हैं। जब हम किसी बात के पीछे बहुत ज्यादा गहराई ढूँढने लगते हैं, तो अक्सर वो मतलब निकाल लेते हैं जो असल में होता ही नहीं। कभी-कभी सादगी ही सबसे बड़ा सच होती है, देव।"
उसके इन शब्दों ने मेरे सीने के भीतर एक पुरानी चोट को छू दिया।
सादगी ही सबसे बड़ा सच होती है... क्या मेरी मम्मी की वह बदली हुई वेशभूषा, वो टाइट फिटिंग सूट, फैंसी साड़ी, उड़ता पल्लू, रिवीलिंग ब्लाउज, वाइन-रेड सलवार-सूट और वह नया अंदाज वाकई सिर्फ सादगी का विस्तार था? या फिर वह सच था जिसे मैंने उस छुपे हुए फोन की स्क्रीन पर अपनी आँखों से देखा था?
"क्या हुआ? फिर कहीं खो गए?" रुया ने मेरी आँखों में झाँकते हुए पूछा। उसकी आवाज में एक गहरी, सच्ची चिंता थी…
"देव, मैं पिछले कई दिनों से देख रही हूँ--- तुम दफ्तर में होते हो, पर तुम्हारा दिमाग कहीं और होता है… कहते कुछ हो, मतलब कुछ और होता है... और जो कह रहे होते हो, उसका तुम्हें ध्यान नहीं रहता?! कोई ऐसी बात है जो तुम्हें अंदर ही अंदर परेशान कर रही है? तुम्हारी मम्मी ठीक हैं? बीरभूम से आई हैं न वो?"
मम्मी का नाम सुनते ही मेरे गले में एक घूँट सा अटक गया।
मेरा मन किया कि मैं सब कुछ रुया को बता दूँ। मैं उससे कहूँ कि मेरे घर में क्या चल रहा है, कैसे मेरा दोस्त और मेरी मम्मी एक ऐसी पहेली बन गए हैं जिसे सुलझाते-सुलझाते मेरा मानसिक संतुलन बिगड़ रहा है… क्या वाकई कुछ है जो मुझे नहीं जानना चाहिए? या फिर ऐसा कुछ जिसे जानना तो चाहता हूँ, पर शायद जान लेने के बाद मैं, मैं न रहूँ?
लेकिन मैं चाहकर भी अपने होंठ नहीं खोल सका… मैं किसी तीसरे इंसान के सामने अपनी ही मम्मी के उन अंतरंग और विचलित करने वाले दृश्यों का जिक्र कैसे कर सकता था? मर्यादा की वह जंजीर आज भी मेरे संस्कारों से बँधी हुई थी।
"हाँ, मम्मी बिल्कुल ठीक हैं," मैंने खुद को संभालते हुए एक झूठी मुस्कान के साथ कहा..
"बस... थोड़ा घर का काम और जिम्मेदारियों का बोझ है.. और कुछ नहीं।"
रुया ने मेरी बात पर पूरी तरह यकीन नहीं किया, उसकी आँखों में एक सवालिया भाव तैर गया, लेकिन उसने मुझे कुरेदना भी ठीक नहीं समझा।
उसने बस इतना कहा,
"अगर कभी मन भारी लगे, तो बता देना। मैं एक अच्छी श्रोता हूँ, सलाह भले ही अच्छी न दूँ।"
उसकी इस बात ने मेरे चेहरे पर एक असली मुस्कान ला दी। हमने चाय खत्म की, और फिर मोड़ पर आकर उसने मेरे कंधे पर हाथ रख कर कहा,
"कल मिलते हैं, देव। और हाँ, घर जाकर आराम करना, ज्यादा सोचना बंद करो।"
रुया के जाते ही शाम की उस ठंडी हवा में फिर से वही शहर की घुटन घुलने लगी। जैसे ही मैं अपनी सोसाइटी के गेट के करीब पहुँचा, मेरे कदम अपने आप भारी होने लगे… मेरे अंदर का वह तनाव, जो रुया के साथ रहते हुए कुछ देर के लिए सो गया था, दोबारा जाग उठा।
मैंने सीढ़ियाँ चढ़ीं और अपने फ्लैट के दरवाजे पर पहुँचा… ताला नहीं लगा था…
अंदर कदम रखते ही रसोई से बर्तनों के खटकने और तेल में जीरे के चटकने की आवाज आई.. और एक स्मेल भी आई जो शायद रूम फ्रेशनर का रहा होगा।
हॉल में इमरान सोफे पर बैठा था। उसने कानों में हेडफोन लगा रखे थे और लैपटॉप पर कुछ एडिट कर रहा था। मुझे देखते ही उसने हेडफोन गले में लटकाया और अपनी वही चोदू सी मुस्कान दी,
"आ गया भाई? आज थोड़ा जल्दी आ गया?"
पूछने को तो वो ये बात आराम से, थोड़ा धीरे से पूछ सकता था... लेकिन भोसड़ी वाले ने कुछ ऐसे आवाज़ में बोला, जैसे मानो मेरे आने की घोषणा कर रहा है!
'गांडू साला!' मैंने मन ही मन कहा...
"हाँ, काम जल्दी निबट गया था," मैंने बिना उसकी आँखों में देखे जवाब दिया।
मेरी नजरें सीधे रसोई की तरफ गईं…
मम्मी वहाँ खड़ी थीं… इमरान की आवाज शायद उन तक पहुँच गई थी… मुझे एक स्माइल दी… वही, बरसों परिचित… "मम्मी वाली" स्माइल…
"देव, हाथ-मुँह धो ले… मैं तेरे लिए पराठे सेंक रही हूँ…"
मम्मी ने जाते-जाते, पलटकर कहा।
उनकी आवाज में वही ममता थी, पर अब उस ममता के नीचे मुझे वह खामोश, अनकहा अपराधबोध साफ सुनाई दे रहा था।
उन्होंने आज पीले रंग की सूती साड़ी पहन रखी थी, लेकिन उस साड़ी को पहनने का तरीका वही नया और मॉडर्न था—पल्लू बहुत करीने से कंधे पर था, और ब्लाउज की सिलाई वैसी ही कसी हुई थी जो शहर के बुटीक की पहचान थी। उनके चेहरे पर वही थकी हुई, लेकिन अलग चमक थी।
मैं बाथरूम में गया.. नल चालू करके मैंने अपने चेहरे पर ठंडे पानी के कई छींटे मारे… आईने में जब मैंने खुद को देखा, तो मेरी अपनी आँखें लाल और सूजी हुई लग रही थीं।
मैंने तुरंत छींटे मारना छोड़ कर, सीधे नहाने का ही निर्णय ले लिया।
शॉवर खोल कर उसके नीचे खड़े हुए मुझे अभी दो मिनट भी नहीं हुए थे कि मेरे दिमाग में एक साथ दो बातें कौंधीं!
हालाँकि पहली बात अब भी बहुत अस्पष्ट थी... और वो ये कि आज ऑफिस से निकलने से लेकर अपने-अपने घरों की ओर जाने से पहले तक, मेरे और रुया के बीच जो कुछ भी बातें हुईं, उसके बाद से ही मुझे थोड़ा अजीब सा लगने लगा था... क्या अजीब था, ये न तब समझ में आया और न अब आ रहा है...
और दूसरी बात मम्मी को लेकर...
पिछले एक सप्ताह से गौर नहीं किया था... पर आज किया। सच कहूँ तो गौर किया नहीं, हो गया.... वो यह कि मम्मी पीली साड़ी के साथ पीला ब्लाउज पहनी हैं आज, जो पीछे से तो टाइट लगी मुझे--- लेकिन, उस पीले ब्लाउज के ऊपर से उनकी ब्रा की रूप-रेखा साफ़ समझ में आ रही थी... हालाँकि ये नॉर्मल है, मैंने पहले भी कई बार ऐसा देखा है... जो नॉर्मल नहीं लगी वो यह थी कि उनके ब्रा के स्ट्रैप और हुक वाला हिस्सा पहले से कहीं अधिक पतले लगे! जैसा कि आजकल के आधुनिक डिज़ाइन में होता है... और जहाँ तक मैं अपनी मम्मी को जानता आया हूँ, वो और आधुनिकता एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत रहे हैं...
एक तरफ वह दुनिया थी जो मुझे बाहर मिली थी—रुया की मासूमियत, उसकी सीधी-सादी बातें, और वह शाम की चाय जो जिंदगी को हल्का बना देती थी… और दूसरी तरफ यह घर, जहाँ हर इंसान एक मुखौटा पहने घूम रहा है।
इमरान सोफे पर बैठकर ऐसे बर्ताव कर रहा था जैसे वह मेरा सबसे वफादार दोस्त हो, मम्मी ऐसे खाना बना रही थीं जैसे वे दुनिया की सबसे बेकसूर इंसान हों, और मैं... मैं ऐसे सामान्य बनने का ढोंग कर रहा था जैसे कि मुझे कुछ मालूम ही न हो...
खाना खाते वक्त डाइनिंग टेबल पर गहरा सन्नाटा था…
शुरुआत के कुछ सेकंड हम तीनों ने अपने-अपने काम को लेकर थोड़ी-बहुत बातें कीं। उसके बाद कमरे में हम सबके खाना चबाने की ही सिर्फ आवाज़ सुनाई दे रही थी। इमरान कुछ बोल नहीं रहा था, मम्मी बोलने के मूड में लग नहीं रही थीं; और मैं जिस टॉपिक पर बात करना चाहता था, वो यूँ ही नहीं कर सकता था…
करीब बीस मिनट ऐसे ही बीत गए…
हम सबका खाना ऑलमोस्ट खत्म हो ही रहा था कि तभी इमरान ने मुँह खोला,
"आँटी जी, कल सुबह आपको वो पार्सल लेने नीचे जाना होगा। मैंने आपके नाम से ही मंगाया है,"
मम्मी ने एक पल के लिए चौंककर मेरी तरफ देखा, फिर इमरान की तरफ एक क्षण के लिए देख कर मुँह फेरते हुए धीमे से सिर हिलाया,
"हाँ... ठीक है। मैं ले लूंगी।"
"किस चीज का पार्सल?" मैंने अचानक पूछ लिया। मेरी आवाज में थोड़ा तीखापन अपने आप आ गया।
इमरान ने बहुत सहजता से मेरी तरफ देखा और बोला,
"अरे कुछ नहीं यार, आँटी जी के घुटनों के दर्द के लिए एक आयुर्वेदिक तेल मंगवाया था। ऑनलाइन अच्छा डिस्काउंट मिल रहा था तो मैंने ऑर्डर कर दिया।"
उसका जवाब इतना सटीक और स्वाभाविक था कि पलट कर कुछ कहा या पूछा नहीं गया मेरे से। लेकिन मेरा सिक्स्थ सेंस चीख-चीख कर कहने लगा कि यह सिर्फ एक और बहाना है—एक और ऐसा पर्दा जिसके पीछे कोई नई बातचीत या कोई नया खेल चल रहा है।
To be Continued…
दफ्तर की काँच की खिड़कियों से जब ढलते सूरज की नारंगी किरणें अंदर आती थीं, तो वह समय मेरे लिए दिन का सबसे कठिन हिस्सा बन जाता था। वह घड़ी होती थी जब मुझे वापस उस फ्लैट में लौटना पड़ता था, जहाँ हर कोने में अविश्वास का सन्नाटा पसरा हुआ था। लेकिन अब उस वापसी के रास्ते पर एक ठहराव आ गया था—एक ऐसा पड़ाव, जिसने मुझे बिखरने से बचा रखा था… और वो ठहराव मेरे ऑफिस की ही थी…
"देव, आज भी इतने गंभीर? कभी तो मुस्कुरा दिया करो," रुया की हल्की, खनकती हुई आवाज मेरे कानों में पड़ी।
मैंने अपने डेस्क से सिर उठाया…
वह अपना हैंडबैग कंधे पर लटकाए, चेहरे पर वही सहज, मासूम मुस्कान लिए मेरे केबिन के दरवाजे पर खड़ी थी। उसने हल्के पिस्ता रंग का कुर्ता पहन रखा था, और उसके बाल हमेशा की तरह सादगी से बंधे हुए थे। उसके चेहरे पर कोई बनावट नहीं थी, न ही कोई ऐसा दिखावा जो आँखों को चुभे।
"बस, निकल ही रहा था," मैंने अपने लैपटॉप का ढक्कन बंद करते हुए कहा।
"तो चलो, आज कैब का इंतजार नहीं करते। मौसम अच्छा है, थोड़ा पैदल चलते हैं," उसने कहा और आगे बढ़ गई।
"पैदल?"
"हाँ, क्यों? कोई प्रॉब्लम है?"
"अम्म्म..."
कुछ सेकंड के लिए मुझे समझ में नहीं आया कि मैं आगे क्या बोलूँ? आज ऑफिस में बिल्कुल मन नहीं लग रहा था... इसलिए सोच रहा था कि सामने के मोड़ के पास वाली चाय दुकान में कुछ देर रुक कर चाय-सुट्टा मार कर, दिमाग को हर तरह के ख्यालों से आज़ाद कर के घर के लिए निकलता। आजकल घर में कुछ खास मन नहीं लगता है। हालाँकि इमरान और मम्मी के बीच वैसा तो कुछ देखने को मिला नहीं जिससे आगे का कुछ सोच या कर पाता... बस, यही एक चिंता मन में रेंट-फ्री रहने लगी है कि साला उस दिन वो लड़का कौन था जो हमारे फ्लैट में आया था, जिसका मैंने पीछा किया लेकिन आगे जा कर मिस कर दिया था!
"हेलो! कहाँ खो गए?"
"अंह..! ओह सॉरी-- दरअसल, सुबह से ही सिर थोड़ा भारी लग रहा था... अभी तो और दुखने लगा है....."
"सेरिडॉन चाहिए?" रुया मेरी बात काटते हुए बोली।
"हाँ, लिया मैंने दो मिनट पहले।"
"ज़रूरी नहीं कि हम पैदल चलें, मैं कैब कर लेती..." वो वाकई चिंतित हो गई।
"अरे ये ऐसा भी कुछ नहीं है जो मैं बर्दाश्त न कर सकूँ। और सेरिडॉन ले लिया हूँ, ये जल्दी काम करता है... टेंशन न लो... चलो चलते हैं।" मैं मुस्कुरा कर बोला।
दोनों साथ ही निकले...
दफ्तर की लिफ्ट से नीचे उतरकर जब हम सड़क पर आए, तो शाम की ठंडी हवा ने चेहरे को छुआ… गाड़ियों की कतारें, हॉर्न का शोर और स्ट्रीट वेंडर्स की आवाज़ें—यह वही शहर था जो कुछ दिन पहले तक मुझे काटने को दौड़ता था, लेकिन अब रुया के बगल में चलते हुए यह सब पृष्ठभूमि का एक बेअसर हिस्सा बनकर रह जाता है…
"तुम्हारी चोट अब पूरी तरह ठीक है न? चलते वक्त लँगड़ा तो नहीं रहे?" उसने मेरी चाल पर नजर डालते हुए पूछा।
अभी कुछ दिन पहले ही उसने बताया था कि ऑफिस के ही किसी कलीग से उसे पता चला कि मेरा हाल ही के एक दिन बहुत ज़बरदस्त एक्सीडेंट हुआ था…
"हाँ, अब बिल्कुल दर्द नहीं है। बस कभी-कभी सीढ़ियाँ चढ़ते वक्त थोड़ा खिंचाव महसूस होता है," मैंने कहा।
"फिर भी ध्यान रखा करो… तुम लड़के ना, जब तक दर्द बर्दाश्त से बाहर न हो जाए, तब तक खुद को तसल्ली देते रहते हो," उसने एक हल्की सी डाँट के अंदाज में कहा, और फिर अचानक रुक गई। "रुको, आज उस नुक्कड़ वाली टपरी से कुल्हड़ वाली इलायची चाय पिएँगे। तुम्हारी यह उतरी हुई सूरत चाय के बिना ठीक नहीं होने वाली।"
हम सड़क किनारे उस छोटी सी चाय की दुकान पर खड़े हो गए। कुल्हड़ में खौलती हुई चाय की महक के बीच रुया ने दफ्तर की छोटी-मोटी बातें शुरू कीं—कैसे हमारे मैनेजर ने आज फिर किसी प्रोजेक्ट पर बेतुका कमेंट किया था, और कैसे कैंटीन वाले ने आज पनीर वाले समोसे में पनीर कम, आलू ज़्यादा डाला था। उसकी बातें बहुत साधारण थीं,
लेकिन उन साधारण बातों में एक ऐसी ताजगी थी जो मुझे अपनी जटिलताओं से खींचकर एक सामान्य इंसान की दुनिया में ले आती थी।
कुल्हड़ हाथ में थामे मैंने उसे बोलते हुए देखा…
उसके चेहरे पर कोई राज, कोई रहस्य, कोई बनावटी इमोशन नहीं था…
उसके शब्द वही थे जो वह सोच रही थी…
जो अंदर थी, वही बाहर भी....
"तुम मुझे ऐसे क्या देख रहे हो?" रुया ने चाय की चुस्की लेते हुए मुस्कुराकर पूछा… "कुछ अजीब लग रहा है क्या?"
"नहीं," मैंने नजरें झुका लीं… "बस... सोच रहा था कि तुम इतनी बेफिक्र कैसे रह लेती हो? मतलब, दुनिया में इतनी उलझनें हैं, लोग इतने चेहरे बदलते हैं, पर तुम हमेशा एक जैसी रहती हो।"
रुया थोड़ी देर खामोश रही…
उसने कुल्हड़ को दोनों हाथों से पकड़ा और सड़क पर भागती गाड़ियों को देखते हुए बोली,
"क्योंकि मैं चीजों को उतना ही देखती हूँ जितनी वे हैं। जब हम किसी बात के पीछे बहुत ज्यादा गहराई ढूँढने लगते हैं, तो अक्सर वो मतलब निकाल लेते हैं जो असल में होता ही नहीं। कभी-कभी सादगी ही सबसे बड़ा सच होती है, देव।"
उसके इन शब्दों ने मेरे सीने के भीतर एक पुरानी चोट को छू दिया।
सादगी ही सबसे बड़ा सच होती है... क्या मेरी मम्मी की वह बदली हुई वेशभूषा, वो टाइट फिटिंग सूट, फैंसी साड़ी, उड़ता पल्लू, रिवीलिंग ब्लाउज, वाइन-रेड सलवार-सूट और वह नया अंदाज वाकई सिर्फ सादगी का विस्तार था? या फिर वह सच था जिसे मैंने उस छुपे हुए फोन की स्क्रीन पर अपनी आँखों से देखा था?
"क्या हुआ? फिर कहीं खो गए?" रुया ने मेरी आँखों में झाँकते हुए पूछा। उसकी आवाज में एक गहरी, सच्ची चिंता थी…
"देव, मैं पिछले कई दिनों से देख रही हूँ--- तुम दफ्तर में होते हो, पर तुम्हारा दिमाग कहीं और होता है… कहते कुछ हो, मतलब कुछ और होता है... और जो कह रहे होते हो, उसका तुम्हें ध्यान नहीं रहता?! कोई ऐसी बात है जो तुम्हें अंदर ही अंदर परेशान कर रही है? तुम्हारी मम्मी ठीक हैं? बीरभूम से आई हैं न वो?"
मम्मी का नाम सुनते ही मेरे गले में एक घूँट सा अटक गया।
मेरा मन किया कि मैं सब कुछ रुया को बता दूँ। मैं उससे कहूँ कि मेरे घर में क्या चल रहा है, कैसे मेरा दोस्त और मेरी मम्मी एक ऐसी पहेली बन गए हैं जिसे सुलझाते-सुलझाते मेरा मानसिक संतुलन बिगड़ रहा है… क्या वाकई कुछ है जो मुझे नहीं जानना चाहिए? या फिर ऐसा कुछ जिसे जानना तो चाहता हूँ, पर शायद जान लेने के बाद मैं, मैं न रहूँ?
लेकिन मैं चाहकर भी अपने होंठ नहीं खोल सका… मैं किसी तीसरे इंसान के सामने अपनी ही मम्मी के उन अंतरंग और विचलित करने वाले दृश्यों का जिक्र कैसे कर सकता था? मर्यादा की वह जंजीर आज भी मेरे संस्कारों से बँधी हुई थी।
"हाँ, मम्मी बिल्कुल ठीक हैं," मैंने खुद को संभालते हुए एक झूठी मुस्कान के साथ कहा..
"बस... थोड़ा घर का काम और जिम्मेदारियों का बोझ है.. और कुछ नहीं।"
रुया ने मेरी बात पर पूरी तरह यकीन नहीं किया, उसकी आँखों में एक सवालिया भाव तैर गया, लेकिन उसने मुझे कुरेदना भी ठीक नहीं समझा।
उसने बस इतना कहा,
"अगर कभी मन भारी लगे, तो बता देना। मैं एक अच्छी श्रोता हूँ, सलाह भले ही अच्छी न दूँ।"
उसकी इस बात ने मेरे चेहरे पर एक असली मुस्कान ला दी। हमने चाय खत्म की, और फिर मोड़ पर आकर उसने मेरे कंधे पर हाथ रख कर कहा,
"कल मिलते हैं, देव। और हाँ, घर जाकर आराम करना, ज्यादा सोचना बंद करो।"
रुया के जाते ही शाम की उस ठंडी हवा में फिर से वही शहर की घुटन घुलने लगी। जैसे ही मैं अपनी सोसाइटी के गेट के करीब पहुँचा, मेरे कदम अपने आप भारी होने लगे… मेरे अंदर का वह तनाव, जो रुया के साथ रहते हुए कुछ देर के लिए सो गया था, दोबारा जाग उठा।
मैंने सीढ़ियाँ चढ़ीं और अपने फ्लैट के दरवाजे पर पहुँचा… ताला नहीं लगा था…
अंदर कदम रखते ही रसोई से बर्तनों के खटकने और तेल में जीरे के चटकने की आवाज आई.. और एक स्मेल भी आई जो शायद रूम फ्रेशनर का रहा होगा।
हॉल में इमरान सोफे पर बैठा था। उसने कानों में हेडफोन लगा रखे थे और लैपटॉप पर कुछ एडिट कर रहा था। मुझे देखते ही उसने हेडफोन गले में लटकाया और अपनी वही चोदू सी मुस्कान दी,
"आ गया भाई? आज थोड़ा जल्दी आ गया?"
पूछने को तो वो ये बात आराम से, थोड़ा धीरे से पूछ सकता था... लेकिन भोसड़ी वाले ने कुछ ऐसे आवाज़ में बोला, जैसे मानो मेरे आने की घोषणा कर रहा है!
'गांडू साला!' मैंने मन ही मन कहा...
"हाँ, काम जल्दी निबट गया था," मैंने बिना उसकी आँखों में देखे जवाब दिया।
मेरी नजरें सीधे रसोई की तरफ गईं…
मम्मी वहाँ खड़ी थीं… इमरान की आवाज शायद उन तक पहुँच गई थी… मुझे एक स्माइल दी… वही, बरसों परिचित… "मम्मी वाली" स्माइल…
"देव, हाथ-मुँह धो ले… मैं तेरे लिए पराठे सेंक रही हूँ…"
मम्मी ने जाते-जाते, पलटकर कहा।
उनकी आवाज में वही ममता थी, पर अब उस ममता के नीचे मुझे वह खामोश, अनकहा अपराधबोध साफ सुनाई दे रहा था।
उन्होंने आज पीले रंग की सूती साड़ी पहन रखी थी, लेकिन उस साड़ी को पहनने का तरीका वही नया और मॉडर्न था—पल्लू बहुत करीने से कंधे पर था, और ब्लाउज की सिलाई वैसी ही कसी हुई थी जो शहर के बुटीक की पहचान थी। उनके चेहरे पर वही थकी हुई, लेकिन अलग चमक थी।
मैं बाथरूम में गया.. नल चालू करके मैंने अपने चेहरे पर ठंडे पानी के कई छींटे मारे… आईने में जब मैंने खुद को देखा, तो मेरी अपनी आँखें लाल और सूजी हुई लग रही थीं।
मैंने तुरंत छींटे मारना छोड़ कर, सीधे नहाने का ही निर्णय ले लिया।
शॉवर खोल कर उसके नीचे खड़े हुए मुझे अभी दो मिनट भी नहीं हुए थे कि मेरे दिमाग में एक साथ दो बातें कौंधीं!
हालाँकि पहली बात अब भी बहुत अस्पष्ट थी... और वो ये कि आज ऑफिस से निकलने से लेकर अपने-अपने घरों की ओर जाने से पहले तक, मेरे और रुया के बीच जो कुछ भी बातें हुईं, उसके बाद से ही मुझे थोड़ा अजीब सा लगने लगा था... क्या अजीब था, ये न तब समझ में आया और न अब आ रहा है...
और दूसरी बात मम्मी को लेकर...
पिछले एक सप्ताह से गौर नहीं किया था... पर आज किया। सच कहूँ तो गौर किया नहीं, हो गया.... वो यह कि मम्मी पीली साड़ी के साथ पीला ब्लाउज पहनी हैं आज, जो पीछे से तो टाइट लगी मुझे--- लेकिन, उस पीले ब्लाउज के ऊपर से उनकी ब्रा की रूप-रेखा साफ़ समझ में आ रही थी... हालाँकि ये नॉर्मल है, मैंने पहले भी कई बार ऐसा देखा है... जो नॉर्मल नहीं लगी वो यह थी कि उनके ब्रा के स्ट्रैप और हुक वाला हिस्सा पहले से कहीं अधिक पतले लगे! जैसा कि आजकल के आधुनिक डिज़ाइन में होता है... और जहाँ तक मैं अपनी मम्मी को जानता आया हूँ, वो और आधुनिकता एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत रहे हैं...
एक तरफ वह दुनिया थी जो मुझे बाहर मिली थी—रुया की मासूमियत, उसकी सीधी-सादी बातें, और वह शाम की चाय जो जिंदगी को हल्का बना देती थी… और दूसरी तरफ यह घर, जहाँ हर इंसान एक मुखौटा पहने घूम रहा है।
इमरान सोफे पर बैठकर ऐसे बर्ताव कर रहा था जैसे वह मेरा सबसे वफादार दोस्त हो, मम्मी ऐसे खाना बना रही थीं जैसे वे दुनिया की सबसे बेकसूर इंसान हों, और मैं... मैं ऐसे सामान्य बनने का ढोंग कर रहा था जैसे कि मुझे कुछ मालूम ही न हो...
खाना खाते वक्त डाइनिंग टेबल पर गहरा सन्नाटा था…
शुरुआत के कुछ सेकंड हम तीनों ने अपने-अपने काम को लेकर थोड़ी-बहुत बातें कीं। उसके बाद कमरे में हम सबके खाना चबाने की ही सिर्फ आवाज़ सुनाई दे रही थी। इमरान कुछ बोल नहीं रहा था, मम्मी बोलने के मूड में लग नहीं रही थीं; और मैं जिस टॉपिक पर बात करना चाहता था, वो यूँ ही नहीं कर सकता था…
करीब बीस मिनट ऐसे ही बीत गए…
हम सबका खाना ऑलमोस्ट खत्म हो ही रहा था कि तभी इमरान ने मुँह खोला,
"आँटी जी, कल सुबह आपको वो पार्सल लेने नीचे जाना होगा। मैंने आपके नाम से ही मंगाया है,"
मम्मी ने एक पल के लिए चौंककर मेरी तरफ देखा, फिर इमरान की तरफ एक क्षण के लिए देख कर मुँह फेरते हुए धीमे से सिर हिलाया,
"हाँ... ठीक है। मैं ले लूंगी।"
"किस चीज का पार्सल?" मैंने अचानक पूछ लिया। मेरी आवाज में थोड़ा तीखापन अपने आप आ गया।
इमरान ने बहुत सहजता से मेरी तरफ देखा और बोला,
"अरे कुछ नहीं यार, आँटी जी के घुटनों के दर्द के लिए एक आयुर्वेदिक तेल मंगवाया था। ऑनलाइन अच्छा डिस्काउंट मिल रहा था तो मैंने ऑर्डर कर दिया।"
उसका जवाब इतना सटीक और स्वाभाविक था कि पलट कर कुछ कहा या पूछा नहीं गया मेरे से। लेकिन मेरा सिक्स्थ सेंस चीख-चीख कर कहने लगा कि यह सिर्फ एक और बहाना है—एक और ऐसा पर्दा जिसके पीछे कोई नई बातचीत या कोई नया खेल चल रहा है।
To be Continued…


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