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Incest परिवार के गंदे राज़
#49
अमन घर पहुँचा तो रात काफी बीत चुकी थी।
आँगन में हल्की रोशनी जल रही थी। ज्यादातर लोग सो चुके थे। उसने चुपके से अंदर प्रवेश किया। हाथ-पैर अभी भी हल्के काँप रहे थे। खरोंचें साफ दिख रही थीं। उसने जल्दी से मुँह-हाथ धोए और अपने कमरे में जाकर बिस्तर पर गिर गया।
आँखें बंद कीं तो दो दृश्य एक साथ घूमने लगे—मूवी वाले अँधेरे कोने में राधा का काँपता शरीर, उसकी सिसकारियाँ, उसका “मैं तुमसे बहुत प्यार करने लगी हूँ”… और फिर वह पागल रफ्तार, राजिया के भाई का गुस्से से भरा चेहरा, और खाई में गिरने की वह जोरदार आवाज।
नींद बहुत देर से आई। जब आई तो टूटी-फूटी थी।
सुबह गाँव में खबर आग की तरह फैल चुकी थी।
“राजिया के भाई की मोटरसाइकिल खाई में गिर गई… मर गया बेचारा।”
“कल रात शहर के पास हुआ है।”
“पता नहीं कैसे नियंत्रण खो बैठा।”
अमन चाय पीते हुए चुपचाप सुन रहा था। माँ किचन में बात कर रही थीं। बाबा आँगन में बैठे थे। सरला चाची भी चर्चा में शामिल थीं। किसी के चेहरे पर शक की कोई लकीर नहीं थी। सब इसे साधारण एक्सीडेंट मान रहे थे।
अमन ने सामान्य स्वर में पूछा, “कब हुआ बाबा?”
बाबा ने जवाब दिया, “कल रात। शहर की तरफ। गरीब का बेटा था… अब राजिया अकेली रह गई बेचारी।”
अमन ने सिर हिलाया और चुपचाप चाय खत्म करके कॉलेज के लिए निकल पड़ा।
कॉलेज में माहौल भारी था। राजिया नहीं आई थी। लड़के समूह में बातें कर रहे थे। अमन ने जानबूझकर उस चर्चा से दूर रखा। ब्रेक में राधा मिली। दोनों की निगाहें मिलीं तो एक पल के लिए समय थम सा गया। राधा के चेहरे पर थकान और डर दोनों थे।
अमन ने बहुत धीमे स्वर में पूछा, “ठीक हो?”
राधा ने सिर हिलाया। “तुम…?”
“हाँ। कुछ मत कहना किसी से।”
राधा ने हल्के से सिर हिलाया। दोनों अलग हो गए। लेकिन दोनों के दिल अभी भी जोर से धड़क रहे थे।
शाम को घर लौटा तो फिर वही चर्चा चल रही थी। अमन ने सामान्य व्यवहार बनाए रखा। खाना खाया। सरला चाची ने उसके बाल सहलाए। कमला चाची ने दूर से एक निगाह डाली, लेकिन कुछ नहीं बोलीं।
रात के बारह बजे रेणु आईं। लालटेन लेकर। दरवाजा बंद करके सिटकिनी लगाई और बिस्तर के किनारे बैठ गईं।
अमन ने इस बार सीधे आँखों में देखा।
“दीदी… कल रात… राजिया के भाई ने मुझे मारने की कोशिश की।”
रेणु की आँखें तेज हो गईं।
अमन ने पूरा बताया—मूवी, वापसी, मोटरसाइकिल, कैसे उसने राधा को बचाया, कैसे खुद बचा, और कैसे राजिया का भाई खाई में गिर गया। आखिर में बोला, “मैंने कुछ नहीं किया दीदी। वह खुद नियंत्रण खोकर गिरा। लेकिन… वह जानबूझकर मुझे कुचलने आया था।”
रेणु बहुत देर तक चुप रही। चेहरा गंभीर था। फिर उसने अमन का हाथ पकड़ा।
“तुमने सही किया जो वहाँ से तुरंत हट गए। और राधा को भी संभाला। अब सुनो—इस बात को दफना दो। किसी से एक शब्द भी नहीं। राजिया अभी सदमे में होगी। अगर किसी को थोड़ा भी शक हुआ तो तुम दोनों फँस सकते हो।”
अमन ने सिर हिलाया।
रेणु ने उसकी आँखों में देखा। “तुम डरे हुए हो?”
“थोड़ा… हाँ।”
रेणु ने उसके माथे पर हाथ रखा। “डरना स्वाभाविक है। लेकिन अब तुम्हें और मजबूत बनना होगा। यह घर, यह गाँव… यहाँ हर घटना के लंबे साये होते हैं। सावधान रहो। राधा के साथ भी अभी दूरी बनाए रखो कुछ दिनों तक।”
अमन चुप रहा। रेणु ने उसके बालों में हाथ फेरा।
“सो जाओ। कल फिर बात करेंगे।”
वह चली गईं।
अमन अकेला रह गया। कमरे में अँधेरा था। आँखें खुली थीं। दिमाग में एक सवाल घूम रहा था—
राजिया अब क्या करेगी…?
और क्या यह घटना सच में यहीं खत्म हो गई थी?
नींद बहुत देर से आई।

शुक्रवार की सुबह गाँव में अभी भी वही चर्चा चल रही थी।
राजिया के भाई की मौत की खबर अब पुरानी पड़ने लगी थी, लेकिन लोग अभी भी छोटे-छोटे समूहों में बातें कर रहे थे। कोई कह रहा था कि बाइक में ब्रेक फेल हो गए होंगे, कोई कह रहा था कि शायद नशे में था। किसी को शक नहीं था कि वह जानबूझकर किसी को कुचलने आया था।
अमन ने सामान्य दिनचर्या अपनाई। चाय पी, बाबा के पैर छुए, माँ से हल्की बात की और कॉलेज निकल पड़ा। चेहरे पर कोई खास भाव नहीं दिखने दिया। अंदर ही अंदर सावधानी का एक कवच सा बाँध लिया था।
कॉलेज में माहौल भारी था। राजिया आज भी नहीं आई थी। लड़के पहले जैसे जोर-जोर से बातें नहीं कर रहे थे। अमन ने अपनी जगह पर बैठकर किताब खोली। जानबूझकर किसी चर्चा में शामिल नहीं हुआ।
ब्रेक में राधा मिली। दोनों की निगाहें दूर से ही मिलीं। राधा के चेहरे पर थकान साफ थी। आँखों के नीचे हल्की कालिमा थी। अमन ने बहुत धीमे स्वर में सिर्फ इतना पूछा,
“ठीक हो?”
राधा ने हल्के से सिर हिलाया। “तुम?”
“हाँ।”
दोनों और कुछ नहीं बोले। बस एक पल के लिए आँखों में आँखें डालीं और फिर अलग हो गए। दोनों समझ रहे थे कि अभी कोई नजदीकी खतरनाक हो सकती है। रेणु की सलाह अमन के दिमाग में ताजा थी—“राधा के साथ भी अभी दूरी बनाए रखो कुछ दिनों तक।”
शाम को घर लौटा तो आँगन में सरला चाची बैठी थीं। उन्होंने अमन को देखते ही बुलाया।
“इधर आ बेटा। चेहरा थका लग रहा है।”
अमन उनके पास बैठ गया। सरला चाची ने उसके बालों में हाथ फेरा। “कुछ परेशानी है क्या? इन दिनों तुम थोड़े चुप से लग रहे हो।”
अमन ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “नहीं चाची। बस पढ़ाई का दबाव है।”
सरला चाची ने उसकी आँखों में देखा। कुछ और पूछना चाहती थीं, लेकिन उन्होंने नहीं पूछा। सिर्फ इतना कहा, “अगर कभी कुछ लगे तो मुझे बता देना। मैं हूँ न।”
अमन ने उनका हाथ दबाया। “हाँ चाची।”
रात के खाने के बाद रेणु आईं। लालटेन लेकर। दरवाजा बंद करके बिस्तर के किनारे बैठ गईं।
“आज कैसा रहा?” उन्होंने पूछा।
अमन ने बताया, “सब सामान्य रखने की कोशिश की। राधा से सिर्फ दो शब्द हुए। राजिया नहीं आई। गाँव वाले अभी भी एक्सीडेंट ही मान रहे हैं।”
रेणु ने सिर हिलाया। “अच्छा किया। अब और कुछ दिन ऐसे ही रहो। कोई जल्दबाजी मत करना। राजिया जब कॉलेज आएगी तो उसकी निगाहें तुम पर होंगी। संभल के।”
अमन चुप रहा। रेणु ने उसका हाथ पकड़ा।
“डर अभी भी है?”
“थोड़ा कम हुआ है… लेकिन पूरी तरह नहीं गया।”
रेणु ने उसके माथे पर हल्का हाथ फेरा। “समय के साथ जाएगा। तुमने उस रात सही फैसला लिया। अब बस चुप रहो और सामान्य जीवन जियो।”
उसने इस बार ज्यादा देर नहीं रुकी। बस अमन के बालों में हाथ फेरकर बोली, “सो जाओ। कल फिर मिलेंगे।”
रेणु चली गईं।
अमन अकेला रह गया। खिड़की से बाहर अँधेरे में देखा। गाँव सोया हुआ लग रहा था। लेकिन उसके मन में एक सवाल अभी भी बाकी था—
राजिया कब लौटेगी… और लौटकर क्या करेगी?
नींद धीरे-धीरे आई।


शनिवार की सुबह अमन ने महसूस किया कि गाँव की हवा थोड़ी हल्की पड़ने लगी है।
राजिया के भाई की मौत की चर्चा अब धीमी पड़ चुकी थी। लोग फिर से अपने कामों में लग गए थे। खेतों में हल चलने लगे थे। महिलाओं की बातें फिर से सामान्य हो गई थीं। लेकिन अमन के अंदर वह सावधानी अभी भी बाकी थी। वह जानता था कि कुछ घाव सतह से गायब हो जाते हैं, लेकिन उनके निशान लंबे समय तक रह जाते हैं।
कॉलेज पहुँचते ही उसकी नजर राजिया पर पड़ी।
आज वह आई थी।
काली साड़ी जैसी कोई गहरी रंग की सलवार-सूट पहने हुए थी। चेहरा सूजा हुआ था। आँखें लाल थीं। बाल बिखरे-बिखरे से लग रहे थे। वह अपनी जगह पर चुपचाप बैठी थी। किसी से बात नहीं कर रही थी। अमन ने जानबूझकर उसकी तरफ ज्यादा नहीं देखा। लेकिन एक बार जब उसकी निगाह राजिया से मिली तो राजिया ने उसे घूरा। लंबी, ठंडी, और कुछ कहने वाली निगाह। अमन ने नजरें घुमा लीं।
ब्रेक में राधा मिली। दोनों ने फिर से सिर्फ दो-एक शब्द किए।
“तुम ठीक हो न?” राधा ने बहुत धीमे स्वर में पूछा।
“हाँ। तुम?”
“अब थोड़ा बेहतर।”
दोनों अलग हो गए। दोनों समझ रहे थे कि अभी कोई लंबी बातचीत या नजदीकी ठीक नहीं।
शाम को घर लौटा तो आँगन में सरला चाची और कमला चाची दोनों बैठी थीं। सरला चाची ने अमन को देखते ही मुस्कुरा दिया।
“आ जाओ बेटा। आज चेहरा थोड़ा हल्का लग रहा है।”
अमन उनके पास बैठ गया। सरला चाची ने उसके बाल ठीक किए। कमला चाची ने दूर से ही एक निगाह डाली। आँखों में वह पुरानी चमक थी, लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस हल्की मुस्कान दी और उठकर किचन की तरफ चली गईं।
अमन ने सरला चाची से पूछा, “चाची, राजिया के घर का क्या हाल है?”
सरला चाची ने गहरी साँस ली। “बेचारी अकेली रह गई है। माँ भी बहुत टूट गई है। घर में सन्नाटा सा छा गया है।”
अमन चुप रहा। मन में एक अजीब सा भाव उठा—दया और सावधानी दोनों।
रात के खाने के बाद रेणु आईं। लालटेन लेकर। दरवाजा बंद करके बिस्तर के किनारे बैठ गईं।
“राजिया आज कॉलेज आई थी,” अमन ने बताया। “मुझे घूरा। लंबी निगाह से।”
रेणु ने गंभीर होकर सुना। “अब शुरू होगा। वह संदेह करेगी। शायद सीधे कुछ न बोले, लेकिन निगाहें रखेगी। तुम बिल्कुल सामान्य व्यवहार करना। न ज्यादा बचो, न ज्यादा पास जाओ। बस सामान्य।”
अमन ने सिर हिलाया।
रेणु ने उसका हाथ पकड़ा। “तुमने उस रात जो किया, वह सही था। अब बस चुप रहो। समय सब कुछ शांत कर देगा।”
उसने अमन के बालों में हाथ फेरा। इस बार ज्यादा देर नहीं रुकीं। बस इतना कहकर चली गईं, “सो जाओ। और ज्यादा मत सोचो।”
अमन अकेला रह गया। खिड़की से बाहर अँधेरे में देखा। मन में राजिया की वह लाल आँखें और लंबी निगाह घूम रही थी।
क्या वह सिर्फ शोक में थी… या कुछ और भी सोच रही थी?
नींद देर से आई।


(राजिया के अंदर की दुनिया)
रात का सन्नाटा राजिया के कमरे में भारी पड़ रहा था।
भाई की चारपाई खाली पड़ी थी। उसके कपड़े अभी भी खूँटी पर टंगे थे। तकिया वैसा ही रखा था जैसे वह छोड़कर गया हो। राजिया उस चारपाई के किनारे बैठी हुई थी। आँखों में आँसू खत्म हो चुके थे। अब सिर्फ एक सूखा, ठंडा गुस्सा बाकी था।
“तुम चले गए…” उसने बहुत धीमे स्वर में कहा। आवाज कमरे की दीवारों से टकराकर लौट आई। “इतनी आसानी से…?”
दिमाग में बार-बार वही रात घूम रही थी जब अजनबी मंकी कैप पहने आदमी ने उसे रात भर चोदा था। वह आदमी कौन था? क्यों आया था? और अब भाई भी नहीं रहा। दोनों घटनाएँ उसके दिमाग में एक-दूसरे से जुड़ने लगी थीं।
“कहीं… कहीं कोई रिश्ता तो नहीं?”
उसने आँखें बंद कीं। अमन का चेहरा आँखों के सामने आ गया। कॉलेज में उसकी सामान्य मुस्कान, राधा के साथ उसकी नजदीकी, और उस दिन की वह निगाह जब उसने अमन को घूरा था। अमन की आँखों में कुछ था… डर? या सिर्फ संयोग?
राजिया ने मुट्ठी भींच ली।
“अगर तूने मेरे भाई को कुछ किया हो अमन… तो मैं तुझे छोड़ूँगी नहीं।”
लेकिन सबूत कहाँ था? कुछ भी नहीं था। सिर्फ एक अजीब सा अहसास और भाई की मौत। वह जानती थी कि अगर उसने अभी कुछ कहा तो लोग उसे पागल कहेंगे। माँ पहले से टूटी हुई थी। घर में अब सिर्फ वे दोनों बची थीं।
उसने भाई के तकिये को कसकर पकड़ लिया। महक अभी भी बाकी थी। आँसू फिर निकल आए, लेकिन इस बार गुस्से के साथ।
“मैं पता लगाऊँगी… धीरे-धीरे। तू छुप नहीं सकता।”
कमरे में दीया की लौ काँप रही थी। राजिया ने आँखें बंद कीं। नींद नहीं आ रही थी। सिर्फ एक सवाल बार-बार घूम रहा था—
अमन… क्या सच में तू निर्दोष है?

(गाँव का सामाजिक माहौल)
राजिया के भाई की मौत के एक हफ्ते बाद गाँव की सतही जिंदगी सामान्य होने लगी थी।
लेकिन सतह के नीचे छोटी-छोटी लहरें अभी भी चल रही थीं।
चाय की दुकान पर पुरुष शाम को जमा होते तो बातें निकल आतीं। कोई कहता, “बेचारा जवान था… अचानक चला गया।” कोई कहता, “मोटरसाइकिलें इन दिनों खतरनाक हो गई हैं।” कुछ बुजुर्ग सिर हिलाते, “भाग्य का खेल है।” लेकिन कोई गहराई से पूछताछ नहीं कर रहा था। शहर की सिक्युरिटी ने इसे साधारण एक्सीडेंट मान लिया था। कोई गवाह नहीं मिला। कोई शक का प्रमाण नहीं था।
औरतों के समूह में बातें थोड़ी अलग थीं।
कोई कहता, “राजिया बेचारी अब अकेली रह गई। माँ भी बीमार रहने लगी है।”
कोई कहता, “घर का दीया बुझ गया। अब कौन संभालेगा खेत?”
कुछ औरतें धीमे स्वर में कहतीं, “शादी की उम्र की है राजिया… अब जल्दी रिश्ता देखना पड़ेगा।”
सरला चाची और कमला चाची भी इन चर्चाओं में शामिल होतीं। लेकिन दोनों ही सतर्क रहतीं। अमन के घर में इस विषय पर ज्यादा बात नहीं होती थी। बाबा रामप्रसाद सिर्फ इतना कहते, “भगवान की मर्जी।” पिता सुरेश चुप रहते। माँ सुशीला भी ज्यादा नहीं बोलतीं।
कॉलेज में माहौल थोड़ा बदल चुका था।
राजिया अब नियमित आने लगी थी। लेकिन वह पहले जैसी नहीं रही थी। बातें कम करती। हँसती नहीं थी। लड़के उससे दूरी बनाकर रखते। कोई चुटकुला नहीं मारता। राधा भी उससे सामान्य से ज्यादा बात नहीं करती थी। अमन जानबूझकर उसकी नजरों से बचता। दोनों के बीच एक अदृश्य दीवार खड़ी हो गई थी।
गाँव वाले अमन को सामान्य लड़के की तरह ही देखते थे। किसी को शक नहीं था। कोई यह नहीं सोचता था कि राजिया के भाई की मौत के पीछे कोई और कहानी हो सकती है। सबके लिए वह एक दुखद, लेकिन साधारण हादसा था।
लेकिन राजिया के मन में जो आग जल रही थी, वह गाँव की किसी चर्चा में नहीं आती थी।
वह चुपचाप सब देख रही थी।
चुपचाप सब याद रख रही थी।
और गाँव अपनी सामान्य लय में लौटता जा रहा था—जैसे कुछ हुआ ही न हो।


रात का खाना दोनों के लिए भारी पड़ रहा था।
थाली में रोटी ठंडी हो चुकी थी। सब्जी में तेल अलग हो गया था। राजिया और रुक्साना चूल्हे के पास फर्श पर बैठी थीं। घर में इतना सन्नाटा था कि दीये की लौ की हल्की सी आवाज भी साफ सुनाई दे रही थी। भाई की खाली चारपाई कोने में खड़ी थी। उसका तकिया अभी भी वैसा ही पड़ा था जैसे वह कल रात ही सोकर उठा हो।
रुक्साना ने बहुत धीमी आवाज में कहा, “थोड़ा खा ले बेटी… तू कितने दिन से कुछ ठीक से नहीं खा रही।”
राजिया ने थाली में देखने के बजाय सामने की दीवार की तरफ देखा। आवाज सूखी थी, “भूख नहीं लगती माँ। खाने से क्या होगा?”
रुक्साना की उंगलियाँ थाली के किनारे पर कस गईं। “मैं जानती हूँ… मुझे भी नहीं लगती। लेकिन हमें जीना है राजिया। तेरे भाई के बिना भी जीना है।”
राजिया ने अचानक सिर घुमाया। आँखें लाल थीं, लेकिन आँसू नहीं थे। सिर्फ एक ठंडा, तेज गुस्सा था।
“कैसे जीएँगे माँ?” उसकी आवाज काँप रही थी। “बताओ कैसे? घर में अब कौन बचा है? खेत कौन देखेगा? लोग क्या-क्या बोलेंगे हमारे बारे में? ‘देखो, बेटा मर गया, अब माँ-बेटी अकेली रह गईं’… सुन-सुनकर मैं पागल हो जाऊँगी।”
रुक्साना की आँखें भर आईं। उसने गला साफ किया। “लोग तो बातें करेंगे ही। करते आए हैं, करते रहेंगे। हम उनकी बातों से नहीं जीते। तू पढ़ाई जारी रख। मैं मजदूर रख लूँगी। खेत संभाल लूँगी। हम हार नहीं मानेंगे।”
राजिया ने थाली एक तरफ धकेल दी। आवाज अचानक तेज हो गई,
“माँ… भाई की मौत साधारण एक्सीडेंट नहीं थी।”
रुक्साना जैसे बिजली से सिहर उठीं। “क्या… क्या बकवास कर रही है तू? सिक्युरिटी ने साफ कहा है एक्सीडेंट है। कोई गवाह नहीं, कोई शक नहीं।”
“मुझे विश्वास नहीं होता!” राजिया अब खड़ी हो गई थी। आवाज में गुस्सा और दर्द दोनों थे। “भाई कितनी सावधानी से बाइक चलाता था, आप जानती हैं। वह नशे में कभी नहीं रहता था। फिर अचानक शहर के बाहर खाई में कैसे गिर गया? कैसे माँ? कोई तो वजह होगी!”
रुक्साना भी उठ खड़ी हुईं। आँखों से आँसू बह निकले। उन्होंने राजिया के दोनों कंधे पकड़ लिए।
“राजिया… मेरी बात सुन! अगर तूने ऐसे शक करना शुरू कर दिया तो लोग तुझे पागल कहेंगे। घर की जो इज्जत बची है वह भी चली जाएगी। मैं और कितना झेलूँ? बेटा चला गया… अब तू भी मुझे पागल बना रही है क्या?”
राजिया की आँखों में भी आँसू आ गए, लेकिन वह रुकी नहीं।
“मैं पागल नहीं हूँ माँ! मुझे लगता है कोई है पीछे। कोई है जिसने भाई को… ”
“चुप!” रुक्साना ने जोर से झकझोर दिया। आवाज टूट रही थी। “मैं नहीं सुनना चाहती। भगवान की मर्जी थी। हमें सिर झुकाकर मानना होगा। तू चुप रह। अपने दुख को अपने तक रख। दुनिया के सामने कुछ मत बोल… वरना हम दोनों सड़क पर आ जाएँगे।”
राजिया माँ की पकड़ से खुद को छुड़ाते हुए पीछे हट गई। साँसें तेज चल रही थीं। दोनों माँ-बेटी एक-दूसरे के सामने खड़ी थीं—एक टूटी हुई, दूसरी गुस्से और शक से जलती हुई।
बहुत देर तक कोई नहीं बोला। सिर्फ दोनों की साँसें चल रही थीं।
फिर राजिया ने बहुत धीमी, ठंडी आवाज में कहा,
“ठीक है माँ। मैं चुप रहूँगी। लोगों के सामने कुछ नहीं बोलूँगी। लेकिन अंदर से… मैं चुप नहीं रहूँगी।”
रुक्साना की टाँगें जैसे जवाब दे गईं। वह वापस फर्श पर बैठ गईं। हाथों से चेहरा ढक लिया।
“सो जा राजिया… कृपया सो जा। और मत बोल। मेरा दिल नहीं सह पा रहा।”
राजिया कुछ पल और खड़ी रही। फिर धीरे से बोली,
“मैं सो जाती हूँ माँ। लेकिन सवाल मेरे साथ सोएँगे।”
वह अंदर चली गई।
रुक्साना अकेली रह गईं। थाली के सामने। दीये की लौ काँप रही थी। उन्होंने भाई की खाली चारपाई की तरफ देखा और बहुत धीमे स्वर में कहा,
“बेटा… तू कहाँ छोड़ गया हमें…”
कमरे में सिर्फ सन्नाटा बचा था—और दो टूटे हुए दिल।


राजिया का बचपन साधारण नहीं रहा था।
गाँव के किनारे वाले छोटे से मकान में वह अपने भाई और माँ रुक्साना के साथ पलती बड़ी हुई। बाप की मौत हो चुकी थी जब वह सिर्फ सात साल की थी। ट्रैक्टर दुर्घटना में। उसके बाद से घर का सारा बोझ भाई के कंधों पर आ गया था। भाई उम्र में उससे सिर्फ चार साल बड़ा था, लेकिन जिम्मेदारी ने उसे जल्दी ही मर्द बना दिया था।
रुक्साना ने उस समय खेतों में मजदूरी की। कभी-कभी अमीर घरों में बर्तन भी माँजे। लोगों की निगाहें हमेशा उनके परिवार पर रहती थीं—“देखो, मर्द नहीं है घर में… कैसे चलेगा।” राजिया ने बचपन से ही ये बातें सुनीं। उसने सीखा कि औरत को चुप रहना चाहिए, सिर झुकाकर जीना चाहिए, और घर की इज्जत किसी भी कीमत पर बचानी चाहिए।
भाई उसके लिए सिर्फ भाई नहीं था। वह उसका संरक्षक था, उसका सहारा था। जब कॉलेज में लड़के छेड़ते तो भाई सामने आ जाता। जब घर में अनाज कम होता तो भाई रातभर जागकर मजदूरी करता। राजिया ने उसके लिए खाना बनाया, उसके कपड़े धोए, उसकी हर बात मानी। दोनों में एक गहरी निर्भरता थी।
लेकिन भाई के अंदर भी एक कमजोरी थी—राधा के प्रति उसका आकर्षण। वह राधा को दूर से देखा करता था। कभी हिम्मत नहीं जुटा पाया कुछ कहने की। और जब उसने अमन को राधा के करीब देखा तो जलन ने उसे अंदर ही अंदर खत्म कर दिया।
राजिया यह सब जानती थी। वह भाई की खामोश चाहत को समझती थी। इसलिए जब भाई की मौत हुई तो सिर्फ एक भाई नहीं मरा था। उसका पूरा सहारा, उसकी सुरक्षा की दीवार, और उसकी कुछ अधूरी ख्वाहिशें भी मर गई थीं।
अब वह अकेली थी।
माँ टूटी हुई थी।
और मन में एक सवाल गहराता जा रहा था—क्या भाई की मौत सच में हादसा थी… या किसी ने उसे हटाया?



गाँव में मौत सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं होती। वह पूरे परिवार की सामाजिक स्थिति को बदल देती है।
राजिया के भाई की मौत के बाद गाँव वाले सहानुभूति तो दिखा रहे थे, लेकिन उनके शब्दों के पीछे सामाजिक हिसाब-किताब भी चल रहा था। “अब घर में मर्द नहीं बचा… खेत कैसे चलेंगे?” “राजिया की उम्र हो गई है… जल्दी ब्याह देना चाहिए वरना लोग बातें बनाएँगे।” “माँ-बेटी अकेली रहेंगी तो इज्जत का क्या होगा?”
ग्रामीण समाज में औरत की इज्जत घर के मर्द से जुड़ी होती है। जब मर्द चला जाता है तो औरत की स्थिति अचानक कमजोर हो जाती है। लोग दया तो करते हैं, लेकिन साथ में निगाहें भी तेज कर देते हैं। हर कदम पर सवाल खड़े होते हैं—कहाँ गई, किससे बात की, क्यों अकेली निकली।
राजिया अब “अकेली लड़की” की श्रेणी में आ गई थी। कॉलेज में लड़के उससे दूरी बना रहे थे—कुछ इज्जत में, कुछ डर से। औरतें उसके घर के बारे में फुसफुसा रही थीं। रिश्ते की बातें शुरू हो गई थीं। कोई कह रहा था कि दूर गाँव में एक विधुर है, कोई कह रहा था कि उम्र में बड़ा लेकिन अच्छी जगह है।
रुक्साना यह सब जानती थी। इसलिए वह राजिया को बार-बार चुप रहने को कह रही थी। क्योंकि ग्रामीण समाज में शक करना, सवाल उठाना, या जोर से बोलना—तीनों ही औरत के लिए खतरनाक माने जाते हैं। चुप रहना सुरक्षा है। सिर झुकाना मजबूरी नहीं, रणनीति है।
अमन का परिवार इस सामाजिक ढाँचे का हिस्सा होते हुए भी थोड़ा अलग था। उनके पास जमीन थी, रुतबा था, बाबा जैसे स्तंभ थे। इसलिए उनकी गलतियाँ भी दब जाती थीं। लेकिन राजिया जैसे परिवार के पास वह सुरक्षा कवच नहीं था। उनके पास सिर्फ चुप्पी और मजबूरी थी।
गाँव की ये अनकही कायदे ही असल में सबसे बड़े राज़ थे।
और राजिया अब इन्हीं कायदों के खिलाफ अकेले खड़ी थी।


गाँव की ये अनकही कायदे ही असल में सबसे बड़े राज़ थे।
और राजिया अब इन्हीं कायदों के खिलाफ अकेले खड़ी थी।
रात गहराती जा रही थी।
कमरे में दीये की छोटी सी लौ बमुश्किल रोशनी दे रही थी। लौ हवा में काँप-काँपकर दीवार पर काली छायाएँ बना रही थी। मिट्टी के तेल की हल्की, तीखी गंध पूरे कमरे में फैली हुई थी। बाहर से ठंडी हवा खिड़की की दरारों से रिसकर अंदर आ रही थी, जिससे राजिया के बाजुओं पर रोंगटे खड़े हो गए थे।
वह भाई की खाली चारपाई के किनारे बैठी थी। चारपाई की रस्सियाँ पुरानी हो चुकी थीं। जब उसने हाथ रखा तो रस्सी की खुरदरी अनुभूति हथेली पर साफ महसूस हुई। तकिये पर अभी भी भाई के बालों की हल्की महक बाकी थी—सस्ते साबुन और पसीने की मिली-जुली गंध। राजिया ने तकिया उठाकर अपने चेहरे से लगा लिया। आँखें बंद कर लीं।
फिर उसने एक पुरानी कॉपी निकाली। कॉपी के पन्ने पीले पड़ चुके थे। कुछ पन्ने नमी से चिपक गए थे। जैसे ही उसने पन्ने पलटे, हल्की सी सरसराहट की आवाज कमरे के सन्नाटे में गूँज उठी। अचानक उसकी उंगलियाँ एक छोटे, फटे हुए कागज से टकराईं जो कॉपी के बीच में दबा था।
कागज निकालते ही उसके हाथ काँपने लगे।
कागज पुराना और मुलायम हो चुका था। किनारे फटे हुए थे। भाई की अजीब, मोटी हैण्डराइटिंग में कुछ नाम लिखे थे। कुछ तारीखें। और सबसे नीचे एक वाक्य—
“अगर मेरे साथ कुछ हुआ… तो अमन से पूछना।”
राजिया की साँसें अटक गईं। छाती के अंदर दिल इतने जोर से धड़क रहा था कि उसे खुद अपनी धड़कन सुनाई दे रही थी। कानों में एक अजीब सी सनसनाहट भर गई।
तभी दीये की लौ अचानक तेज काँपी। जैसे किसी ने जोर से फूँक मारी हो। कमरे में हवा का एक ठंडा झोंका आया। दीवार पर बन रही छायाएँ अचानक लंबी और टेढ़ी हो गईं। राजिया के शरीर में एक ठंडी धारा दौड़ गई। उसने तेजी से पीछे मुड़ा।
खिड़की बंद थी।
दरवाजा बंद था।
कमरा खाली था।
लेकिन हवा में एक अजीब सी भारीपन था। जैसे कोई साँस ले रहा हो। बहुत हल्की… बहुत करीब। राजिया के गर्दन के बाल काँप उठे। उसे साफ महसूस हुआ जैसे कोई उसकी पीठ के पीछे खड़ा हो।
उसने कागज को मुट्ठी में इतने जोर से भींच लिया कि कागज की धार उसके हथेली में चुभने लगी। आँखें तेज हो गईं। आवाज बिल्कुल धीमी लेकिन ठंडी निकली—
“अब मैं छोड़ूँगी नहीं…”
बाहर आँगन में सन्नाटा था। बस दूर से किसी कुत्ते की एक लंबी आवाज आई और फिर सब शांत हो गया। अँधेरा इतना गाढ़ा था कि हाथ को हाथ नहीं सुझाई दे रहा था।
लेकिन उस अँधेरे में…
किसी के कदम बहुत हल्के-हल्के, मिट्टी पर लगभग बिना आवाज किए, राजिया के घर की दीवार के बाहर रुककर खड़े थे।
कुछ पल तक वहाँ रहे।
फिर धीरे से… अँधेरे में घुल गए।
Fuckuguy
albertprince547;
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RE: परिवार के गंदे राज़ - by Fuckuguy - 16-09-2026, 04:12 AM



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