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Adultery FLAT MATE
एपिसोड 25: परछाइयों से परे एक नई दस्तक

घर में अभी भी वही सन्नाटा पसरा था।

मम्मी या इमरान, दोनों में से कोई वापस नहीं लौटा था

पर लौटने का वक़्त लगभग हो रहा था..

मैं सीधे मम्मी के कमरे की तरफ बढ़ा

दहलीज पर वह चिपचिपा, मैला सा निशान पंखे की हवा और उमस से सूखकर पपड़ी जैसा बन चुका था। मैंने जेब से रुमाल निकाला और बहुत हिफाजत से उस सूखे हुए पाउडर और तरल के कुछ अंश रुमाल के कोने में समेट लिए। फिर किचन से फिनाइल और पोंछा लाकर उस जगह को इस सफाई से रगड़ दिया कि पहली नजर में किसी को शक न हो कि वहां कोई टोटका किया गया था। पर हवा में घुली वो बासी गंध अभी भी पूरी तरह नहीं मिटी थीइसलिए मैंने रूम फ्रेशनर का एक तेज झोंका पूरे हॉल और गैलरी में उड़ा दिया।

इसके बाद मेरे कदम इमरान के कमरे की तरफ मुड़े

उस शख्स ने दरवाजा बाहर से खींचा था, लेकिन ताला चाबी से नहीं लगाया था।

मैंने हैंडल घुमाया और अंदर दाखिल हुआ

कमरा बाहर से देखने में शांत लग रहा था, लेकिन गौर से देखने पर तलाशी की गवाही साफ जाहिर थी। अलमारी का एक पल्ला आधा इंच खुला था, गद्दे का एक कोना थोड़ा मुड़ा हुआ था, और मेज पर रखे पेन-स्टैंड की दिशा बदली हुई थी।

वह शख्स यहाँ से एक शीशी लेकर निकला था... पर क्या वह कुछ छोड़ भी गया था?

मैंने दस्ताने नहीं पहने थे, इसलिए उंगलियों के पोरों की जगह अपनी कोहनी और आस्तीन का सहारा लेकर दराजों को सरकाना शुरू किया.. अचानक स्टडी टेबल के ठीक नीचे, कारपेट के किनारे मेरी नजर एक छोटी सी चमकदार चीज पर पड़ी।

झुककर देखा तो मेरे रोंगटे खड़े हो गए

वह पीतल का एक छोटा सा, तिकोना छल्ला थाशायद किसी चाबी के गुच्छे या लॉकेट का टूटा हुआ हिस्सा। उस पर अरबी या किसी पुरानी लिपि में कुछ बेहद बारीक अक्षर खुदे हुए थे, और उसके बीचों-बीच एक गहरा लाल, सूखा हुआ धब्बा था... जो दिखने में पूरी तरह सूखे हुए खून जैसा लग रहा था।

मैंने काँपते हाथों से उस छल्ले को उठाया और अपनी जींस की पीछे  के जेब में सरका लिया।

तभी नीचे पार्किंग में एक बाइक की इंजन और उसके ब्रेक लगने की जानी-पहचानी आवाज आई।

इमरान!

बिजली के झटके की तरह मैं इमरान के कमरे से बाहर निकला, दरवाजा ठीक वैसे ही सटाया जैसा वह पहले था, और सीधे बाथरूम में घुस गया। गीले कपड़े उतारकर बाल्टी में डाले, सूखे कपड़े पहने और तौलिये से बाल रगड़ते हुए ऐसे बाहर निकला मानो अभी-अभी बारिश में भीगकर नहाया हूँ।

जैसे ही मैं हॉल में आया, मुख्य दरवाजे के ताले में चाबी घूमी

दरवाजा खुला

सामने इमरान खड़ा था! उसके एक हाथ में एक लेदर बैग था और दूसरे हाथ में बारिश से तरबतर एक बैंगनी रेनकोट।

लेकिन उसके चेहरे पर हमेशा रहने वाली वह बेपरवाह, हल्की सी मुस्कान आज पूरी तरह नदारद थी। उसकी आँखें थकी हुई, लाल और बेहद तनावग्रस्त लग रही थीं।

जैसे ही उसकी नजर मुझ पर पड़ी, उसके कदम चौखट पर ही एक सेकंड के लिए ठिठक गए।

"अरे... तुम घर पर हो?" इमरान ने अपनी आवाज को सहज बनाने की पूरी कोशिश की, लेकिन उसके भारी लहजे में छिपा अविश्वास साफ झलक रहा था। उसकी नजरें हॉल के उस कोने पर टिक गईं जहाँ मैंने फ्रेशनर छिड़का था। उसकी नाक थोड़ी सिकुड़ी, जैसे वह हवा में तैरती उस अजीब गंध को पहचानने की जद्दोजहद कर रहा हो।

"हाँ, ऑफिस में कुछ खास काम नहीं था और मौसम बिगड़ रहा था, तो जल्दी निकल आया," मैंने बिल्कुल सपाट, सामान्य चेहरे के साथ जवाब दिया,

" देख रहा हूँ, तू भी भीग गया है?"

इमरान ने तुरंत जवाब नहीं दिया। उसने अपनी तीखी, संदेही नजरों से पहले मुझे सिर से पाँव तक नापा, फिर उसकी नजरें गैलरी की तरफ घूमींसीधे अपने कमरे के बंद दरवाजे पर।

"हाँ... बारिश अचानक तेज हो गई थी," उसने आहिस्ता से कहा और जूते उतार कर बाथरूम की ओर चला गया...

मैं भी वापस अपने कमरे में आ गया।

ज़्यादा तलाशी का समय न मिलने के कारण मैं मन मसोस कर रह गया। इतनी मेहनत, दिमागी घोड़े दौड़ाया, परेशान हुआ, रिस्क लिया और हासिल क्या हुआ? सिर्फ एक कच्ची हकीकत का खौफनाक अहसास और हाथ आई निराशा। एक के बाद एक नाकामी जैसे मेरी तकदीर बनते जा रही है. लेकिन मैंने तुरंत ही खुद को भीतर से पत्थर बना लिया। किसी भी कीमत पर मैंने अपने चेहरे पर ऐसा कोई भाव, कोई शिकन या गुस्सा नहीं आने दिया जिससे उन दोनों में से किसी को भी यह भनक लगे कि मुझे कुछ मालूम हो चुका है।

अगर मैं जरा भी डगमगाता, तो शायद वो सावधान हो जाते, और नहीं तो जो तूफान उठता, उसे संभालने की ताकत उस समय मुझमें नहीं थी।

दिन बीतते चले गए

कैलेंडर के पन्ने पलटे, हफ्ते बदले, लेकिन उस चारदीवारी के भीतर का माहौल कमोबेश वैसा ही चलता रहा जैसा चल रहा था। वही संदेहास्पद खामोशियां, वही नजरों का हेरफेर, वही मम्मी का बदलता हुआ सलीका और इमरान का वही अंदाज़। मैं घर पर सिर्फ एक अजनबी की तरह रहताखाना खाता, सोता और सुबह होते ही उस दमघोंटू माहौल से बाहर भागने की फिराक में रहता।

और फिर, कोई दो सप्ताह बाद... मेरी जिंदगी में एक ऐसा मोड़ आया जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी।

मेरे ही ऑफिस की एक लड़की से अचानक मेरी बातचीत और फिर दोस्ती शुरू हो गई। कैसे हुई? क्यों हुई? सच कहूँ तो मुझे ठीक-ठीक खुद भी याद नहीं। वह कब से हमारे फ्लोर पर काम कर रही थी, उसने अचानक मुझमें कोई दिलचस्पी क्यों ली, या सिर्फ वक्त का कोई खेल था... मुझे इसका कोई ठोस इल्म नहीं था।

शुरू-शुरू में तो बात सिर्फ ऑफिस के सामान्य कामकाज, फाइलों के आदान-प्रदान और प्रोजेक्ट की डेडलाइंस को लेकर होती थी। कैफेटेरिया में कभी कॉफी का मग उठाते हुए 'थैंक्स' कह देना, या प्रिंटर के पास खड़े होकर काम के बोझ पर एक हल्की सी मुस्कान साझा कर लेना।

लेकिन धीरे-धीरे, न जाने कब वह बातचीत काम की सीमाओं को लाँघकर रोजमर्रा की छोटी-मोटी बातों में बदलने लगी।

ऑफिस की छुट्टी के वक्त अक्सर ऐसा संयोग होने लगा कि जब मैं अपना बैग समेटकर लिफ्ट की ओर बढ़ रहा होता, तो वह भी अपने केबिन से बाहर निकल रही होती।

"अरे देव, निकल रहे हो?" वह पूछती।

"हाँ, बस आज का काम खत्म," मैं कहता।

फिर हम दोनों साथ ही कभी सीढ़ियों से तो कभी लिफ्ट से नीचे उतरते। ऑफिस के मुख्य गेट से निकलकर बस स्टॉप या मेट्रो स्टेशन की दिशा में कुछ सौ मीटर तक साथ-साथ चलना हमारी एक अनकही आदत बन गया। उस भीड़भाड़ वाली सड़क पर, गाड़ियों के भोंपू और धूल के बीच, वह चंद मिनटों की वॉक मेरे पूरे दिन की सबसे हल्की घड़ी बन जाती। वहाँ से हम एक-दूसरे को 'सी यू टुमारो' कहते और अपने-अपने घरों की ओर चल पड़ते।

उस लड़की में कुछ तो ऐसी बात थी, कोई ऐसा सम्मोहन या खिंचाव, जो मुझे अनायास ही उसकी ओर खींचता रहता था। वह दिखने में बेहद प्यारी तो थी हीउसकी आँखों में एक साफ, बिना मिलावट वाली चमक थीलेकिन उससे भी बढ़कर वह बेइंतहा 'केयरिंग' थी।

उसकी यह फिक्र सिर्फ बातों तक सीमित नहीं थी।

वह हर छोटी-बड़ी चीज़ का ख्याल रखती थी। सेंसिटिव थी... अगर दफ्तर में किसी की भी टेबल पर फाइलें अस्त-व्यस्त होतीं, तो वह सलीके से रख देती। अगर प्रोजेक्ट में कोई कलीग फंसा होता, तो बिना जताए उसकी मदद कर देती। और जहाँ तक मेरा सवाल था... वह मेरा कुछ ज्यादा ही ध्यान रखने लगी थी।

[Image: Ruya.jpg]


मेरी डेस्क पर अक्सर पानी की बोतल खाली देखकर भर देना, अगर मैं काम के तनाव में लंच करना भूल जाऊं तो धीरे से अपने टिफिन से एक सैंडविच मेरी तरफ बढ़ा देना, या सिर्फ इतना पूछ लेना

"देव, आज तुम्हारी आँखें बहुत थकी हुई लग रही हैं, रात को ठीक से सोए नहीं क्या?"—ये वो छोटी-छोटी बातें थीं जो मेरे उस बंजर और संशयी मन पर किसी ठंडी फुहार की तरह गिरती थीं।

वो पहले पहल मुझे "आप" कह कर संबोधित करती थी… मुझे अच्छा लगता था लेकिन पता नहीं क्यों, बड़ा फॉर्मल भी फील होता था… सेम टाइम। फिर धीरे-धीरे न जाने वो कब "आप" से "तुम" पर आ गई… मुझे इस बात का कोई होश भी न रहा-- पर उसके मुँह से "तुम" सुनने पर जो एक अद्भुत एहसास होता था; उसे शब्दों में बयाँ कर पाना मेरे लिए बहुत मुश्किल था।

और उस एहसास में एक अलग ही गुदगुदी छुपी होती थी, जिसका प्रभाव दिन भर मेरे चेहरे की चमक के रूप में दिखता था..

उसका असली नाम बड़ा अनोखा था—'अफ़सून'

यह लफ्ज़ सुनने में जितना खूबसूरत था, हमारे ऑफिस के कुछ देसी और मजाकिया सहकर्मियों के लिए उतना ही खुराक बन गया थाक्योंकि यह नाम हमारे रोजमर्रा के 'लहसुन' से काफी मिलता-जुलता था, इसलिए शुरुआत में कुछ लोग दबे मुंह या हंसी-मजाक में उसे चिढ़ाने की कोशिश करते थे। इस फालतू के मजाक से बचने के लिए, उसने दफ्तर में भी अपने घर वाला नाम का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया था।

वह नाम था—'रुया'

हालाँकि, हमारे यहाँ के कुछ अजब-गजब लोग शुरुआत में इस नाम को भी 'रोया' कहकर पुकारने की कोशिश करते थे, लेकिन उसने कभी इस पर गुस्सा नहीं दिखाया। वह सिर्फ एक हल्की-सी बेपरवाह मुस्कान बिखेर देती थी। और सच ही तो है... कोई किसी के नाम पर आखिर कब तक हंसेगा? धीरे-धीरे लोगों का वो बचकाना मजाक बंद हो गया, और सबके लिए वह सिर्फ 'रुया' बन गई।

पर मेरे लिए... मेरे लिए वह नाम सिर्फ एक पहचान नहीं रहा था।

जब से मुझे रुया का साथ मिला था, मैं अपने भीतर के कई पुराने घाव, अनकहे दर्द, शिकायतें और वो लगातार जलने वाली तकलीफें भूलने लगा था। उस अजनबी महानगर में, जहाँ मेरे अपने घर की छत के नीचे मुझे साजिशों और अविश्वास की बू आती थी, रुया की मौजूदगी हवा के एक ताजे झोंके जैसी थी। उसका साथ मुझे इतना अच्छा क्यों लगता था? मुझे खुद नहीं पता था। क्या यह सिर्फ अकेलापन था? या किसी अपने की तलाश? मुझे इन दार्शनिक सवालों के जवाब नहीं मालूम थे।

मुझे बस एक सीधी सी बात समझ में आती थीघर की उस चारदीवारी में, जहाँ मेरी माँ, मेरा दोस्त इमरान और उनके बीच का वह संदेहास्पद रहस्यमयी 'खेल' मुझे हर पल एक जिंदा लाश बनाए रखता था... उस घुटन भरे माहौल से दूर, अगर इस पूरी दुनिया में कोई एक इंसान था जो मुझे कुछ देर के लिए दिली सुकून, शांति और आराम पहुँचा सकता था, तो वह कोई और नहीं... सिर्फ और सिर्फ 'रुया' थी!

जब वह मेरे बगल में चलती, तो सड़क का शोर गायब हो जाता। जब वह हंसती, तो मेरे दिमाग में बसी बीते दिनों की यादें, तस्वीरें थोड़ी देर के लिए धुंधली पड़ जातीं। उसके साथ बिताए वे पंद्रह-बीस मिनट मेरे लिए किसी दवा की तरह काम करने लगे थे, जिसके सहारे मैं रात को वापस उस घर में कदम रखने का हौसला जुटा पाता था।

ऐसा नहीं की मैंने अपनी भोली मम्मी की परवाह करना छोड़ दिया था.... या उनका रवैया मुझे परेशान नहीं कर रहा थापर यार, जब से रुया मेरी ज़िंदगी में आई, मैंने ऐसी बातों का स्ट्रेस लेना लगभग छोड़ ही दिया। कई बार तो हाल ऐसा भी हुआ की रुया को अपने घर के हालात और मम्मी-इमरान के बारे में सब कुछ बता दूँ... लेकिन नहीं बता पाया।

ऐसी बातें भला बाहर कौन बताता है?
 

 
To be Continued…
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FLAT MATE - by The_Writer - 18-05-2026, 09:35 PM
RE: FLAT MATE - by The_Writer - 19-05-2026, 01:17 PM
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RE: FLAT MATE - by jamanuram - 18-06-2026, 12:06 PM
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RE: FLAT MATE - by Skb21 - 31-08-2026, 09:00 AM
RE: FLAT MATE - by KkkNad - 31-08-2026, 11:59 AM
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RE: FLAT MATE - by LENNY - 31-08-2026, 02:10 PM
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RE: FLAT MATE - by Vikrant pelu - 02-09-2026, 09:56 AM
RE: FLAT MATE - by The_Writer - 08-09-2026, 02:40 PM
RE: FLAT MATE - by PakeezaAmmi - 02-09-2026, 11:27 AM
RE: FLAT MATE - by Bentley - 02-09-2026, 12:23 PM
RE: FLAT MATE - by KkkNad - 02-09-2026, 09:42 PM
RE: FLAT MATE - by Minki - 02-09-2026, 11:05 PM
RE: FLAT MATE - by abhishek.kumar - 04-09-2026, 10:55 AM
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RE: FLAT MATE - by momass - 07-09-2026, 07:43 AM
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RE: FLAT MATE - by KkkNad - 07-09-2026, 04:05 PM
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RE: FLAT MATE - by Rexd_101 - 09-09-2026, 03:15 AM
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RE: FLAT MATE - by SANJUbaba@001 - 10-09-2026, 12:14 PM
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RE: FLAT MATE - by SANJUbaba@001 - 15-09-2026, 06:57 AM
RE: FLAT MATE - by The_Writer - 16-09-2026, 11:19 PM
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