01-09-2026, 10:48 PM
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एपिसोड 24: रहस्यमय साया... और एक और नाकाम कोशिश!
ताले में चाबी घूमने की वह बारीक, धातुई 'क्लिक' मेरे कानों में किसी तोप के धमाके की तरह गूँजी।
एक सेकंड के हजारवें हिस्से में मेरी रीढ़ की हड्डी में बर्फ जैसी ठंडी सनसनी दौड़ गई। हाथों में पकड़ी वह नीली डायरी अचानक जलते हुए अंगारे की तरह भारी लगने लगी। दिमाग की नसें फटने की हद तक तन चुकी थीं। मैं फर्श से बिजली की फुर्ती से उठा। डायरी को उसी मटमैले कवर में लपेटा, सूटकेस के भीतर स्वेटरों के नीचे उसी तह में दबाया जहां से निकाला था, ज़िप खींची और सूटकेस को धकेल कर अलमारी के पल्ले बंद कर दिए।
पूरा जिस्म पसीने से भीगा हुआ था, साँसें गले में घुट रही थीं। मुख्य दरवाजा खुलने की चरमराती आवाज आई। मेरे पास सोचने का वक्त नहीं था। मम्मी के कमरे से बाहर निकलकर सामने अपने कमरे में छलांग लगाने के लिए मेरे पास सिर्फ तीन या चार सेकंड थे।
बिल्लियों जैसी दबे पाँव से मैं बाहर निकला, सीधे अपने कमरे में घुसा और दरवाजे को लगभग पूरा सटा दिया—बस आधा इंच की एक बारीक झिरी खुली छोड़ दी, जहां से गैलरी और हॉल का एक हिस्सा साफ दिखता था। सीने पर दोनों हाथ दबाकर मैंने अपनी साँसों को पूरी ताकत से रोक लिया। दिल की धड़कनें इतनी तेज थीं कि मुझे लगा बाहर खड़े शख्स को मेरी छाती के धड़कने की आवाज सुनाई दे जाएगी।
लेकिन तभी... मेरे कानों में जो आवाजें पड़ीं, उसने मेरे माथे की सिलवटों को और गहरा कर दिया।
कदमों की आहट भारी और तेज थी। मम्मी के कदमों में एक खास तरह की नज़ाकत और धीमापन होता था, उनकी पायल की हल्की झंकार हमेशा उनके आगे चलती थी। दूसरी तरफ, इमरान जब भी घर में दाखिल होता था, तो चाबियाँ मेज पर उछालने या जूतों को लापरवाही से उतारने की आवाज आती थी। पर यह शख्स... यह जूते पहने हुए ही अंदर आया था। भारी, सख्त तलों वाले जूतों की खुरदुरी आवाज।
यह न तो मम्मी थीं, और न ही इमरान।
तो फिर यह कौन था? और उसके पास हमारे फ्लैट की चाबी कहाँ से आई?
झिरी में से मुझे उसकी सिर्फ एक झलक दिखी। एक लंबा, चौड़े कंधों वाला साया, जिसने काले रंग की लेदर जैकेट और गहरे नीले रंग की जींस पहन रखी थी। उसके सिर पर गहरा हेलमेट नहीं था, लेकिन चेहरे पर एक काला रुमाल या मास्क बंधा हुआ था और आँखों पर टोपी का छज्जा झुका था।
वह शख्स बिना एक पल गँवाए सीधे इमरान के कमरे की तरफ बढ़ा। उसके चलने के अंदाज में कोई हिचकिचाहट नहीं थी, जैसे वह इस फ्लैट के चप्पे-चप्पे से पहले से वाकिफ हो।
इमरान के कमरे का दरवाजा खुला और वह अंदर दाखिल हो गया।
अगले पाँच मिनट तक उस कमरे से लगातार अजीबोगरीब आवाजें आती रहीं। कभी किसी दराज के तेजी से खिंचने की आवाज, कभी गद्दे के उलटने की सरसराहट, तो कभी प्लास्टिक और कागजात के फड़फड़ाने की तेज खड़खड़ाहट। वह किसी चीज की तलाश में पूरे कमरे को बेरहमी से खंगाल रहा था।
मेरे दिमाग में सवालों का एक भयंकर तूफान उठ खड़ा हुआ। अगर यह कोई साधारण चोर था, तो उसने हॉल में रखी महँगी टीवी या शोकेस में रखे गैजेट्स पर नजर क्यों नहीं डाली? वह सीधे इमरान के कमरे में क्यों गया? और सबसे बड़ा सवाल—क्या इमरान इस सब में शामिल था, या इमरान खुद किसी खौफनाक खेल का शिकार बन रहा था? डायरी के वे अधूरे शब्द—*वो ताबीज, मुझे बांध दिया है... या तो सब कुछ खत्म होगा, या मैं...*—मेरे जेहन में बार-बार हथौड़े की तरह बज रहे थे।
तभी इमरान के कमरे की आवाज़ें अचानक थम गईं।
भारी कदमों की आहट दोबारा गैलरी में गूंजी। वह शख्स बाहर निकला। इस बार उसका रुख सीधे मम्मी के कमरे की तरफ था।
मेरा खून जम गया। मेरी उंगलियां अपने कमरे के दरवाजे की चौखट पर कस गईं। वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा और मम्मी के कमरे के दरवाजे के ठीक सामने जाकर रुक गया। उसका दायां हाथ उठा, चमड़े के काले दस्ताने में लिपटी उसकी उंगलियां पीतल के गोल नॉब की तरफ बढ़ीं। उसने नॉब पर अपनी पकड़ बनाई ही थी कि सन्नाटे को चीरती हुई एक तीखी इलेक्ट्रॉनिक धुन बज उठी।
उसकी जैकेट की जेब में रखा सेलफोन थरथरा रहा था।
उस शख्स के हाथ वहीं रुक गए। उसने एक पल के लिए दरवाजे को घूरा, फिर अपनी जेब से मोबाइल निकाला और स्क्रीन पर नजर डाली। कॉल रिसीव करते ही उसने फोन कान से लगाया।
उस तरफ से कोई बहुत तेजी में कुछ बोल रहा था। आवाज इतनी धीमी थी कि मेरे कानों तक सिर्फ फुसफुसाहट पहुँच रही थी, लेकिन इस शख्स के चेहरे के हाव-भाव और उसकी प्रतिक्रिया साफ दिख रही थी।
"क्या?!" उस शख्स के मुँह से एक भारी, दबी हुई आवाज निकली। उसके लहजे में एक साथ हैरानी और गहरी निराशा का मिश्रण था।
"पर आपने तो कहा था... हाँ... नहीं, अभी तक तो कुछ नहीं मिला।" उसने चारों तरफ नजरें घुमाते हुए कहा। उसकी आवाज में एक अजीब सी हड़बड़ाहट घुलने लगी थी। "नहीं, मैं रिस्क नहीं ले सकता। अगर वो आ गए तो सब कुछ बिगड़ जाएगा... ठीक है, मैं जैसा आपने कहा वैसा कर देता हूं। बाकी बाद में देखेंगे।"
उसने कॉल काट दी…
फोन को वापस जेब में रखते हुए वह कुछ पलों तक मम्मी के कमरे के बंद दरवाजे को एकटक देखता रहा, जैसे उस लकड़ी के आर-पार किसी राज को टटोलने की कोशिश कर रहा हो। उसकी आंखों में एक अजीब सी बेचैनी और हिंसक चमक थी।
अचानक वह घूमा और दोबारा इमरान के कमरे में लपका।
एक-दो मिनट के भीतर वह वापस निकला। इस बार उसके हाथ में एक छोटी सी, गहरे भूरे रंग की कांच की शीशी थी। उसने शीशी का ढक्कन खोला।
हवा में एक अजीब, तीखी और सड़ांध भरी गंध फैलने लगी—जैसे कपूर, सूखी जड़ी-बूटियों और किसी बासी तेल का एक घिनौना मिश्रण हो। उस शख्स ने उस शीशी में से कोई तरल पदार्थ अपनी उंगलियों पर लिया और मम्मी के कमरे के दरवाजे की चौखट, नीचे की दहलीज और अगल-बगल की दीवारों पर तेजी से छिड़क दिया।
उसके होंठ कुछ बुदबुदा रहे थे....!
यह सब देखकर मेरी रीढ़ में एक सिहरन दौड़ गई। यह कोई सामान्य चोरी या तलाशी नहीं थी; यह तंत्र-मंत्र, टोटके और किसी गहरे षड्यंत्र का सीधा-सादा सबूत था। क्या मम्मी की डायरी में उसी ताबीज और इसी काले साए का जिक्र था?
काम खत्म करते ही वह शख्स फिर से इमरान के कमरे में घुसा। करीब तीन मिनट बाद जब वह बाहर निकला, तो उसके हाथ खाली थे। उसने इमरान के कमरे का दरवाजा खींचा, नॉब को बाहर से लॉक किया और बिना पीछे मुड़े, तेज कदमों से फ्लैट का मुख्य दरवाजा खोलकर बाहर निकल गया।
दरवाजा बंद होने की 'धम्म' आवाज के बाद भी मैं करीब दस सेकंड तक अपनी जगह पर पत्थर की तरह जमा रहा।
जब मुझे यकीन हो गया कि वह सीढ़ियां उतर चुका है, तो मेरे भीतर की सुन्नता टूटी। मैं अपने कमरे से निकला, दबे पाँव बालकनी की तरफ दौड़ा और दीवार की ओट लेकर नीचे झाँका।
सोसायटी के मेन गेट के ठीक बाहर एक बिना नंबर प्लेट वाली काली पल्सर बाइक खड़ी थी। जब मैं आधे घंटे पहले दफ्तर से आया था, तब वहाँ कोई बाइक नहीं थी।
तभी वह शख्स नीचे मेन गेट से बाहर निकला। उसने चारों तरफ एक सरसरी नजर दौड़ाई, बाइक के पास पहुंचा और उसमें चाबी लगाई। जैसे ही उसने बाइक को सड़क की तरफ घुमाया और किक मारने के लिए पैर उठाया, उसके सिर में एक अजीब सी हरकत हुई।
उसने अचानक अपना चेहरा ऊपर उठाया और सीधे हमारे फ्लैट की बालकनी की तरफ देखा!
मेरी छठी इंद्री ने ठीक उसी पल मुझे चेतावनी दी थी। उसके नजरें उठाने से एक सेकंड पहले ही मैं बिजली की फुर्ती से पीछे हटकर दीवार के पीछे चिपक गया था। मेरी पीठ दीवार से लगी थी, दिल पसलियों को तोड़कर बाहर आने को बेताब था।
कुछ सेकंड्स की भयानक चुप्पी के बाद, मैंने बहुत सावधानी से, दीवार के कोने से अपनी एक आंख बाहर निकालकर नीचे देखा।
वह शख्स बाइक स्टार्ट कर चुका था और तेजी से सड़क पर आगे बढ़ रहा था। लेकिन वह सामान्य रूप से नहीं चला रहा था; वह अपनी गर्दन घुमा-घुमा कर बार-बार पीछे, हमारे फ्लैट की बालकनी और रास्ते की तरफ देख रहा था।
उसकी उस मुड़ती हुई गर्दन और संदिग्ध चाल को देखकर मेरे दिल की गहराइयों से एक बेहद हताशा और घबराहट भरी आवाज निकली:
"शीट!! देख लिया साले ने..."
अब मेरे पास सोचने या डरने का वक्त नहीं बचा था। अगर वह भाग निकला, तो मेरे हाथ से वह इकलौता सिरा भी छूट जाता जो मुझे इस दलदल के सच तक पहुँचा सकता था।
मैं तुरंत अंदर भागा…
मम्मी के कमरे की तरफ देखा—दहलीज पर वह अजीब सा रंग वाला धूल और एक चिपचिपा तरल जैसा कुछ सूख रहा था और हवा में भारी दुर्गंध थी। मैंने बिना कुछ छुए, पंखों और बत्तियों को चेक किया, मुख्य दरवाजे को बाहर से लॉक किया और सीढ़ियों से नीचे की तरफ छलांगें लगाते हुए उतरा।
पार्किंग से अपनी बाइक निकाली, किक मारी और जिस दिशा में वह गया था, उसी रास्ते पर पूरी ताकत से एक्सीलेटर मार दिया।
सड़क पर दोपहर का हल्का ट्रैफिक था…
धूप तीखी थी लेकिन आसमान के एक कोने में मटमैले, गहरे बादलों का एक टुकड़ा धीरे-धीरे आकार ले रहा था। मैंने अपनी नजरें सड़क की हर काली बाइक पर टिका रखी थीं। करीब सात सौ मीटर आगे जाने के बाद, ट्रैफिक सिग्नल के पास मुझे वही लेदर जैकेट और चौड़े कंधों वाला साया नजर आ गया।
मैंने तुरंत अपनी बाइक की रफ्तार थोड़ी धीमी की और उसके बीच करीब चार-पांच गाड़ियों का एक सुरक्षित फासला बना लिया।
वह शख्स लगातार अपने साइड मिरर्स में देख रहा था। वह बेहद शातिर था। मेन रोड से कटकर उसने बाइक एक संकरी, टूटी-फूटी लिंक रोड पर डाल दी। मैं भी एक सुरक्षित दूरी बनाए रखकर उसके पीछे चलता रहा।
करीब डेढ़ किलोमीटर आगे जाने के बाद, उसने अचानक एक पुराने पेट्रोल पंप के पास अपनी बाइक सड़क किनारे लगा दी।
मैंने तुरंत अपनी बाइक को एक बड़े होर्डिंग के पीछे रोक लिया और इंजन बंद कर दिया।
उस शख्स ने अपनी जेब से मोबाइल निकाला और किसी से बात करने लगा। बात करते-करते उसका शरीर तना हुआ था। एक पल के लिए मुझे लगा कि वह पीछे मुड़कर मुझे देखेगा, उसकी गर्दन घूमी भी... लेकिन तभी वह रुक गया। शायद फोन पर दूसरी तरफ से कोई जरूरी हिदायत दी जा रही थी। उसने दो-तीन बार बहुत गंभीरता से 'हां' में अपना सिर हिलाया, मोबाइल को वापस जेब में ठूंसा और बिना किसी चेतावनी के बाइक स्टार्ट कर दी।
और फिर जो हुआ, उसने मेरे होश उड़ा दिए।
उसने बाइक का थ्रॉटल इतनी बेरहमी से घुमाया कि पिछले पहिए से धूल और बजरी का एक फव्वारा छूटा!
"होली शीट!!" मेरे मुँह से बेसाख्ता निकला।
उसने अपनी पल्सर को सीधे अस्सी-नब्बे की रफ्तार पर खींच दिया था। उस संकरी, गड्ढों भरी सड़क पर ऐसी अंधी रफ्तार कोई सिरफिरा या मौत से बेपरवाह इंसान ही पकड़ सकता था। जब तक मैंने अपनी बाइक स्टार्ट की और गियर बदला, तब तक वह दो तीखे मोड़ों को पार करके आँखों से ओझल हो चुका था। अगले कुछ सेकंड्स में वह कहां गायब हो गया, हवा में घुल गया या किसी अनजान गली में मुड़ गया, मुझे जरा भी भनक नहीं लगी।
मैंने आगे जाकर दो गलियों के मुहाने पर नजर दौड़ाई, पर वहां दूर-दूर तक सिर्फ खाली सड़क और उड़ती हुई धूल थी।
निराशा, थकान और गुस्से का एक भयानक ज्वार मेरे सीने में उठने लगा। मेरा जबड़ा भिंच गया।
पास ही एक पुरानी, टीन की छत वाली चाय की दुकान थी। मैंने अपनी बाइक वहीं किनारे लगाई, चाय का एक कड़क कुल्हड़ ऑर्डर किया और दुकान के बाहर पड़े एक पुराने, खुरदुरे लकड़ी के बेंच पर बैठ गया।
काँपती उंगलियों से मैंने अपनी जेब से सिगरेट की डिब्बी निकाली। एक क्लासिक डबल बर्स्ट सुलगाई, फिल्टर का कैप्सूल फोड़ा और धुएँ का एक लंबा, गहरा कश अपने फेफड़ों में खींच लिया।
पुदीने और तंबाकू के उस तीखे ठंडे धुएँ ने मेरे सुन्न पड़ते दिमाग को थोड़ी हरकत दी।
मैंने अपना फोन निकाला और गूगल मैप्स खोला। अपनी मौजूदा लोकेशन को केंद्र में रखकर मैंने आसपास के इलाके को ज़ूम करना शुरू किया।
मानचित्र की नीली-हरी रेखाओं के बीच जो भूगोल उभर कर सामने आया, उसने मेरी बेचैनी को और बढ़ा दिया:
* यहां से ठीक आधा किलोमीटर आगे एक पुराना, अर्ध-सरकारी चैरिटेबल **अस्पताल** था।
* उस अस्पताल से करीब डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर एक पुराना **मदरसा** स्थित था।
* मदरसे से कुछ ही दूरी पर शहर का सबसे पुराना और विशाल **कब्रिस्तान** फैला हुआ था।
* और उस पूरे इलाके के ठीक पीछे, लगभग एक किलोमीटर के दायरे में एक बेहद घनी, भूलभुलैया जैसी पुरानी बस्ती बसी हुई थी, जहां की तंग गलियों में किसी का भी खो जाना बेहद आसान था।
मैं वहीं बेंच पर बैठा रहा। एक के बाद एक सिगरेट सुलगती रही, चाय के कुल्हड़ खाली होते रहे।
मेरा दिमाग सुन्न था, पर विचारों की आंधी रुकने का नाम नहीं ले रही थी।
वह शख्स कौन था? अगर वह कोई तांत्रिक या टोटके करने वाला था, तो उसके पास हमारे फ्लैट की चाबी किसने दी? क्या इमरान ने? पर इमरान का इस सब से क्या ताल्लुक था? और मम्मी... मेरी सीधी-सादी, धार्मिक माँ उस डायरी में किन गुनाहों और किस आग की बात कर रही थीं? क्या वह वाइन रंग का सूट और दूसरे सभी कपड़े, वो नजरें, वो दहलीज पर छिड़का गया बदबूदार पानी... सब किसी एक ही व्यक्ति से जुड़ी कड़ियां थीं?
एक-दो बार मेरे भीतर यह पागलपन भरा विचार कौंधा कि मुझे उठना चाहिए। मुझे उस अस्पताल और मदरसे की तरफ जाकर देखना चाहिए…
शायद वह काली बाइक वहां किसी कोने में खड़ी मिल जाए…?
…. लेकिन फिर मेरी व्यावहारिक बुद्धि ने मुझे रोक दिया।
मैं वहां जाकर क्या करता? उस बड़े से अस्पताल के वार्डों में किसे ढूंढता? मदरसे के बंद दरवाजों पर जाकर किससे पूछता कि 'क्या यहां कोई काली लेदर जैकेट वाला लड़का आया है?' मेरे पास न तो उसका कोई पुख्ता नाम था, न चेहरा, और न ही कोई ठोस वजह। किसी अंजान इलाके में इस तरह बिना सिर-पैर की पूछताछ करना खुद अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा था।
तभी आसमान में एक भारी, गड़गड़ाती हुई आवाज गूँजी…
मैंने सिर उठाकर ऊपर देखा…
दोपहर की मद्धिम धूप पूरी तरह गायब हो चुकी थी। आसमान पर स्याह, भारी बादलों का पहरा बैठ चुका था। हवा का रुख अचानक ठंडा और तेज हो गया था। धूल के बवंडर सड़क पर नाचने लगे थे।
मौसम का मिजाज बता रहा था कि अगर मैं अगले दस मिनट में यहाँ से नहीं निकला, तो इस टूटी-फूटी टीन की छत वाली दुकान पर घंटों तक तूफानी बारिश में फंसे रहना पड़ेगा।
…. और मुझे घर पहुँचना था। मुझे मम्मी और इमरान के आने से पहले वहां सामान्य बनकर बैठना था, ताकि किसी को यह शक न हो सके कि उनके रचे इस चक्रव्यूह की एक दीवार मैंने आज अपनी आंखों से देख ली है।
मैंने चाय वाले को पैसे चुकाए, सिगरेट का आखिरी टुकड़ा जूते से कुचला और बाइक की तरफ बढ़ गया।
इंजन की गड़गड़ाहट के साथ मैंने बाइक घर के रास्ते पर मोड़ दी। माथे पर बारिश की पहली ठंडी बूंद गिरी, पर मेरे सीने के भीतर सवालों, नफरत और अनसुलझे रहस्यों की जो आग जल रही थी... उसे बुझाने की ताकत आसमान के किसी तूफान में नहीं थी।
To be Continued…
ताले में चाबी घूमने की वह बारीक, धातुई 'क्लिक' मेरे कानों में किसी तोप के धमाके की तरह गूँजी।
एक सेकंड के हजारवें हिस्से में मेरी रीढ़ की हड्डी में बर्फ जैसी ठंडी सनसनी दौड़ गई। हाथों में पकड़ी वह नीली डायरी अचानक जलते हुए अंगारे की तरह भारी लगने लगी। दिमाग की नसें फटने की हद तक तन चुकी थीं। मैं फर्श से बिजली की फुर्ती से उठा। डायरी को उसी मटमैले कवर में लपेटा, सूटकेस के भीतर स्वेटरों के नीचे उसी तह में दबाया जहां से निकाला था, ज़िप खींची और सूटकेस को धकेल कर अलमारी के पल्ले बंद कर दिए।
पूरा जिस्म पसीने से भीगा हुआ था, साँसें गले में घुट रही थीं। मुख्य दरवाजा खुलने की चरमराती आवाज आई। मेरे पास सोचने का वक्त नहीं था। मम्मी के कमरे से बाहर निकलकर सामने अपने कमरे में छलांग लगाने के लिए मेरे पास सिर्फ तीन या चार सेकंड थे।
बिल्लियों जैसी दबे पाँव से मैं बाहर निकला, सीधे अपने कमरे में घुसा और दरवाजे को लगभग पूरा सटा दिया—बस आधा इंच की एक बारीक झिरी खुली छोड़ दी, जहां से गैलरी और हॉल का एक हिस्सा साफ दिखता था। सीने पर दोनों हाथ दबाकर मैंने अपनी साँसों को पूरी ताकत से रोक लिया। दिल की धड़कनें इतनी तेज थीं कि मुझे लगा बाहर खड़े शख्स को मेरी छाती के धड़कने की आवाज सुनाई दे जाएगी।
लेकिन तभी... मेरे कानों में जो आवाजें पड़ीं, उसने मेरे माथे की सिलवटों को और गहरा कर दिया।
कदमों की आहट भारी और तेज थी। मम्मी के कदमों में एक खास तरह की नज़ाकत और धीमापन होता था, उनकी पायल की हल्की झंकार हमेशा उनके आगे चलती थी। दूसरी तरफ, इमरान जब भी घर में दाखिल होता था, तो चाबियाँ मेज पर उछालने या जूतों को लापरवाही से उतारने की आवाज आती थी। पर यह शख्स... यह जूते पहने हुए ही अंदर आया था। भारी, सख्त तलों वाले जूतों की खुरदुरी आवाज।
यह न तो मम्मी थीं, और न ही इमरान।
तो फिर यह कौन था? और उसके पास हमारे फ्लैट की चाबी कहाँ से आई?
झिरी में से मुझे उसकी सिर्फ एक झलक दिखी। एक लंबा, चौड़े कंधों वाला साया, जिसने काले रंग की लेदर जैकेट और गहरे नीले रंग की जींस पहन रखी थी। उसके सिर पर गहरा हेलमेट नहीं था, लेकिन चेहरे पर एक काला रुमाल या मास्क बंधा हुआ था और आँखों पर टोपी का छज्जा झुका था।
![[Image: Someone-Entering.png]](https://i.ibb.co/8n06fShs/Someone-Entering.png)
वह शख्स बिना एक पल गँवाए सीधे इमरान के कमरे की तरफ बढ़ा। उसके चलने के अंदाज में कोई हिचकिचाहट नहीं थी, जैसे वह इस फ्लैट के चप्पे-चप्पे से पहले से वाकिफ हो।
इमरान के कमरे का दरवाजा खुला और वह अंदर दाखिल हो गया।
अगले पाँच मिनट तक उस कमरे से लगातार अजीबोगरीब आवाजें आती रहीं। कभी किसी दराज के तेजी से खिंचने की आवाज, कभी गद्दे के उलटने की सरसराहट, तो कभी प्लास्टिक और कागजात के फड़फड़ाने की तेज खड़खड़ाहट। वह किसी चीज की तलाश में पूरे कमरे को बेरहमी से खंगाल रहा था।
मेरे दिमाग में सवालों का एक भयंकर तूफान उठ खड़ा हुआ। अगर यह कोई साधारण चोर था, तो उसने हॉल में रखी महँगी टीवी या शोकेस में रखे गैजेट्स पर नजर क्यों नहीं डाली? वह सीधे इमरान के कमरे में क्यों गया? और सबसे बड़ा सवाल—क्या इमरान इस सब में शामिल था, या इमरान खुद किसी खौफनाक खेल का शिकार बन रहा था? डायरी के वे अधूरे शब्द—*वो ताबीज, मुझे बांध दिया है... या तो सब कुछ खत्म होगा, या मैं...*—मेरे जेहन में बार-बार हथौड़े की तरह बज रहे थे।
तभी इमरान के कमरे की आवाज़ें अचानक थम गईं।
भारी कदमों की आहट दोबारा गैलरी में गूंजी। वह शख्स बाहर निकला। इस बार उसका रुख सीधे मम्मी के कमरे की तरफ था।
मेरा खून जम गया। मेरी उंगलियां अपने कमरे के दरवाजे की चौखट पर कस गईं। वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा और मम्मी के कमरे के दरवाजे के ठीक सामने जाकर रुक गया। उसका दायां हाथ उठा, चमड़े के काले दस्ताने में लिपटी उसकी उंगलियां पीतल के गोल नॉब की तरफ बढ़ीं। उसने नॉब पर अपनी पकड़ बनाई ही थी कि सन्नाटे को चीरती हुई एक तीखी इलेक्ट्रॉनिक धुन बज उठी।
उसकी जैकेट की जेब में रखा सेलफोन थरथरा रहा था।
उस शख्स के हाथ वहीं रुक गए। उसने एक पल के लिए दरवाजे को घूरा, फिर अपनी जेब से मोबाइल निकाला और स्क्रीन पर नजर डाली। कॉल रिसीव करते ही उसने फोन कान से लगाया।
उस तरफ से कोई बहुत तेजी में कुछ बोल रहा था। आवाज इतनी धीमी थी कि मेरे कानों तक सिर्फ फुसफुसाहट पहुँच रही थी, लेकिन इस शख्स के चेहरे के हाव-भाव और उसकी प्रतिक्रिया साफ दिख रही थी।
"क्या?!" उस शख्स के मुँह से एक भारी, दबी हुई आवाज निकली। उसके लहजे में एक साथ हैरानी और गहरी निराशा का मिश्रण था।
"पर आपने तो कहा था... हाँ... नहीं, अभी तक तो कुछ नहीं मिला।" उसने चारों तरफ नजरें घुमाते हुए कहा। उसकी आवाज में एक अजीब सी हड़बड़ाहट घुलने लगी थी। "नहीं, मैं रिस्क नहीं ले सकता। अगर वो आ गए तो सब कुछ बिगड़ जाएगा... ठीक है, मैं जैसा आपने कहा वैसा कर देता हूं। बाकी बाद में देखेंगे।"
उसने कॉल काट दी…
फोन को वापस जेब में रखते हुए वह कुछ पलों तक मम्मी के कमरे के बंद दरवाजे को एकटक देखता रहा, जैसे उस लकड़ी के आर-पार किसी राज को टटोलने की कोशिश कर रहा हो। उसकी आंखों में एक अजीब सी बेचैनी और हिंसक चमक थी।
अचानक वह घूमा और दोबारा इमरान के कमरे में लपका।
एक-दो मिनट के भीतर वह वापस निकला। इस बार उसके हाथ में एक छोटी सी, गहरे भूरे रंग की कांच की शीशी थी। उसने शीशी का ढक्कन खोला।
हवा में एक अजीब, तीखी और सड़ांध भरी गंध फैलने लगी—जैसे कपूर, सूखी जड़ी-बूटियों और किसी बासी तेल का एक घिनौना मिश्रण हो। उस शख्स ने उस शीशी में से कोई तरल पदार्थ अपनी उंगलियों पर लिया और मम्मी के कमरे के दरवाजे की चौखट, नीचे की दहलीज और अगल-बगल की दीवारों पर तेजी से छिड़क दिया।
उसके होंठ कुछ बुदबुदा रहे थे....!
यह सब देखकर मेरी रीढ़ में एक सिहरन दौड़ गई। यह कोई सामान्य चोरी या तलाशी नहीं थी; यह तंत्र-मंत्र, टोटके और किसी गहरे षड्यंत्र का सीधा-सादा सबूत था। क्या मम्मी की डायरी में उसी ताबीज और इसी काले साए का जिक्र था?
काम खत्म करते ही वह शख्स फिर से इमरान के कमरे में घुसा। करीब तीन मिनट बाद जब वह बाहर निकला, तो उसके हाथ खाली थे। उसने इमरान के कमरे का दरवाजा खींचा, नॉब को बाहर से लॉक किया और बिना पीछे मुड़े, तेज कदमों से फ्लैट का मुख्य दरवाजा खोलकर बाहर निकल गया।
दरवाजा बंद होने की 'धम्म' आवाज के बाद भी मैं करीब दस सेकंड तक अपनी जगह पर पत्थर की तरह जमा रहा।
जब मुझे यकीन हो गया कि वह सीढ़ियां उतर चुका है, तो मेरे भीतर की सुन्नता टूटी। मैं अपने कमरे से निकला, दबे पाँव बालकनी की तरफ दौड़ा और दीवार की ओट लेकर नीचे झाँका।
सोसायटी के मेन गेट के ठीक बाहर एक बिना नंबर प्लेट वाली काली पल्सर बाइक खड़ी थी। जब मैं आधे घंटे पहले दफ्तर से आया था, तब वहाँ कोई बाइक नहीं थी।
तभी वह शख्स नीचे मेन गेट से बाहर निकला। उसने चारों तरफ एक सरसरी नजर दौड़ाई, बाइक के पास पहुंचा और उसमें चाबी लगाई। जैसे ही उसने बाइक को सड़क की तरफ घुमाया और किक मारने के लिए पैर उठाया, उसके सिर में एक अजीब सी हरकत हुई।
उसने अचानक अपना चेहरा ऊपर उठाया और सीधे हमारे फ्लैट की बालकनी की तरफ देखा!
मेरी छठी इंद्री ने ठीक उसी पल मुझे चेतावनी दी थी। उसके नजरें उठाने से एक सेकंड पहले ही मैं बिजली की फुर्ती से पीछे हटकर दीवार के पीछे चिपक गया था। मेरी पीठ दीवार से लगी थी, दिल पसलियों को तोड़कर बाहर आने को बेताब था।
कुछ सेकंड्स की भयानक चुप्पी के बाद, मैंने बहुत सावधानी से, दीवार के कोने से अपनी एक आंख बाहर निकालकर नीचे देखा।
वह शख्स बाइक स्टार्ट कर चुका था और तेजी से सड़क पर आगे बढ़ रहा था। लेकिन वह सामान्य रूप से नहीं चला रहा था; वह अपनी गर्दन घुमा-घुमा कर बार-बार पीछे, हमारे फ्लैट की बालकनी और रास्ते की तरफ देख रहा था।
उसकी उस मुड़ती हुई गर्दन और संदिग्ध चाल को देखकर मेरे दिल की गहराइयों से एक बेहद हताशा और घबराहट भरी आवाज निकली:
"शीट!! देख लिया साले ने..."
अब मेरे पास सोचने या डरने का वक्त नहीं बचा था। अगर वह भाग निकला, तो मेरे हाथ से वह इकलौता सिरा भी छूट जाता जो मुझे इस दलदल के सच तक पहुँचा सकता था।
मैं तुरंत अंदर भागा…
मम्मी के कमरे की तरफ देखा—दहलीज पर वह अजीब सा रंग वाला धूल और एक चिपचिपा तरल जैसा कुछ सूख रहा था और हवा में भारी दुर्गंध थी। मैंने बिना कुछ छुए, पंखों और बत्तियों को चेक किया, मुख्य दरवाजे को बाहर से लॉक किया और सीढ़ियों से नीचे की तरफ छलांगें लगाते हुए उतरा।
पार्किंग से अपनी बाइक निकाली, किक मारी और जिस दिशा में वह गया था, उसी रास्ते पर पूरी ताकत से एक्सीलेटर मार दिया।
सड़क पर दोपहर का हल्का ट्रैफिक था…
धूप तीखी थी लेकिन आसमान के एक कोने में मटमैले, गहरे बादलों का एक टुकड़ा धीरे-धीरे आकार ले रहा था। मैंने अपनी नजरें सड़क की हर काली बाइक पर टिका रखी थीं। करीब सात सौ मीटर आगे जाने के बाद, ट्रैफिक सिग्नल के पास मुझे वही लेदर जैकेट और चौड़े कंधों वाला साया नजर आ गया।
मैंने तुरंत अपनी बाइक की रफ्तार थोड़ी धीमी की और उसके बीच करीब चार-पांच गाड़ियों का एक सुरक्षित फासला बना लिया।
वह शख्स लगातार अपने साइड मिरर्स में देख रहा था। वह बेहद शातिर था। मेन रोड से कटकर उसने बाइक एक संकरी, टूटी-फूटी लिंक रोड पर डाल दी। मैं भी एक सुरक्षित दूरी बनाए रखकर उसके पीछे चलता रहा।
करीब डेढ़ किलोमीटर आगे जाने के बाद, उसने अचानक एक पुराने पेट्रोल पंप के पास अपनी बाइक सड़क किनारे लगा दी।
मैंने तुरंत अपनी बाइक को एक बड़े होर्डिंग के पीछे रोक लिया और इंजन बंद कर दिया।
उस शख्स ने अपनी जेब से मोबाइल निकाला और किसी से बात करने लगा। बात करते-करते उसका शरीर तना हुआ था। एक पल के लिए मुझे लगा कि वह पीछे मुड़कर मुझे देखेगा, उसकी गर्दन घूमी भी... लेकिन तभी वह रुक गया। शायद फोन पर दूसरी तरफ से कोई जरूरी हिदायत दी जा रही थी। उसने दो-तीन बार बहुत गंभीरता से 'हां' में अपना सिर हिलाया, मोबाइल को वापस जेब में ठूंसा और बिना किसी चेतावनी के बाइक स्टार्ट कर दी।
और फिर जो हुआ, उसने मेरे होश उड़ा दिए।
उसने बाइक का थ्रॉटल इतनी बेरहमी से घुमाया कि पिछले पहिए से धूल और बजरी का एक फव्वारा छूटा!
"होली शीट!!" मेरे मुँह से बेसाख्ता निकला।
उसने अपनी पल्सर को सीधे अस्सी-नब्बे की रफ्तार पर खींच दिया था। उस संकरी, गड्ढों भरी सड़क पर ऐसी अंधी रफ्तार कोई सिरफिरा या मौत से बेपरवाह इंसान ही पकड़ सकता था। जब तक मैंने अपनी बाइक स्टार्ट की और गियर बदला, तब तक वह दो तीखे मोड़ों को पार करके आँखों से ओझल हो चुका था। अगले कुछ सेकंड्स में वह कहां गायब हो गया, हवा में घुल गया या किसी अनजान गली में मुड़ गया, मुझे जरा भी भनक नहीं लगी।
मैंने आगे जाकर दो गलियों के मुहाने पर नजर दौड़ाई, पर वहां दूर-दूर तक सिर्फ खाली सड़क और उड़ती हुई धूल थी।
निराशा, थकान और गुस्से का एक भयानक ज्वार मेरे सीने में उठने लगा। मेरा जबड़ा भिंच गया।
पास ही एक पुरानी, टीन की छत वाली चाय की दुकान थी। मैंने अपनी बाइक वहीं किनारे लगाई, चाय का एक कड़क कुल्हड़ ऑर्डर किया और दुकान के बाहर पड़े एक पुराने, खुरदुरे लकड़ी के बेंच पर बैठ गया।
काँपती उंगलियों से मैंने अपनी जेब से सिगरेट की डिब्बी निकाली। एक क्लासिक डबल बर्स्ट सुलगाई, फिल्टर का कैप्सूल फोड़ा और धुएँ का एक लंबा, गहरा कश अपने फेफड़ों में खींच लिया।
पुदीने और तंबाकू के उस तीखे ठंडे धुएँ ने मेरे सुन्न पड़ते दिमाग को थोड़ी हरकत दी।
मैंने अपना फोन निकाला और गूगल मैप्स खोला। अपनी मौजूदा लोकेशन को केंद्र में रखकर मैंने आसपास के इलाके को ज़ूम करना शुरू किया।
मानचित्र की नीली-हरी रेखाओं के बीच जो भूगोल उभर कर सामने आया, उसने मेरी बेचैनी को और बढ़ा दिया:
* यहां से ठीक आधा किलोमीटर आगे एक पुराना, अर्ध-सरकारी चैरिटेबल **अस्पताल** था।
* उस अस्पताल से करीब डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर एक पुराना **मदरसा** स्थित था।
* मदरसे से कुछ ही दूरी पर शहर का सबसे पुराना और विशाल **कब्रिस्तान** फैला हुआ था।
* और उस पूरे इलाके के ठीक पीछे, लगभग एक किलोमीटर के दायरे में एक बेहद घनी, भूलभुलैया जैसी पुरानी बस्ती बसी हुई थी, जहां की तंग गलियों में किसी का भी खो जाना बेहद आसान था।
मैं वहीं बेंच पर बैठा रहा। एक के बाद एक सिगरेट सुलगती रही, चाय के कुल्हड़ खाली होते रहे।
मेरा दिमाग सुन्न था, पर विचारों की आंधी रुकने का नाम नहीं ले रही थी।
वह शख्स कौन था? अगर वह कोई तांत्रिक या टोटके करने वाला था, तो उसके पास हमारे फ्लैट की चाबी किसने दी? क्या इमरान ने? पर इमरान का इस सब से क्या ताल्लुक था? और मम्मी... मेरी सीधी-सादी, धार्मिक माँ उस डायरी में किन गुनाहों और किस आग की बात कर रही थीं? क्या वह वाइन रंग का सूट और दूसरे सभी कपड़े, वो नजरें, वो दहलीज पर छिड़का गया बदबूदार पानी... सब किसी एक ही व्यक्ति से जुड़ी कड़ियां थीं?
एक-दो बार मेरे भीतर यह पागलपन भरा विचार कौंधा कि मुझे उठना चाहिए। मुझे उस अस्पताल और मदरसे की तरफ जाकर देखना चाहिए…
शायद वह काली बाइक वहां किसी कोने में खड़ी मिल जाए…?
…. लेकिन फिर मेरी व्यावहारिक बुद्धि ने मुझे रोक दिया।
मैं वहां जाकर क्या करता? उस बड़े से अस्पताल के वार्डों में किसे ढूंढता? मदरसे के बंद दरवाजों पर जाकर किससे पूछता कि 'क्या यहां कोई काली लेदर जैकेट वाला लड़का आया है?' मेरे पास न तो उसका कोई पुख्ता नाम था, न चेहरा, और न ही कोई ठोस वजह। किसी अंजान इलाके में इस तरह बिना सिर-पैर की पूछताछ करना खुद अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा था।
तभी आसमान में एक भारी, गड़गड़ाती हुई आवाज गूँजी…
मैंने सिर उठाकर ऊपर देखा…
दोपहर की मद्धिम धूप पूरी तरह गायब हो चुकी थी। आसमान पर स्याह, भारी बादलों का पहरा बैठ चुका था। हवा का रुख अचानक ठंडा और तेज हो गया था। धूल के बवंडर सड़क पर नाचने लगे थे।
मौसम का मिजाज बता रहा था कि अगर मैं अगले दस मिनट में यहाँ से नहीं निकला, तो इस टूटी-फूटी टीन की छत वाली दुकान पर घंटों तक तूफानी बारिश में फंसे रहना पड़ेगा।
…. और मुझे घर पहुँचना था। मुझे मम्मी और इमरान के आने से पहले वहां सामान्य बनकर बैठना था, ताकि किसी को यह शक न हो सके कि उनके रचे इस चक्रव्यूह की एक दीवार मैंने आज अपनी आंखों से देख ली है।
मैंने चाय वाले को पैसे चुकाए, सिगरेट का आखिरी टुकड़ा जूते से कुचला और बाइक की तरफ बढ़ गया।
इंजन की गड़गड़ाहट के साथ मैंने बाइक घर के रास्ते पर मोड़ दी। माथे पर बारिश की पहली ठंडी बूंद गिरी, पर मेरे सीने के भीतर सवालों, नफरत और अनसुलझे रहस्यों की जो आग जल रही थी... उसे बुझाने की ताकत आसमान के किसी तूफान में नहीं थी।
To be Continued…


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