30-08-2026, 10:51 PM
एपिसोड 23: गहराता दलदल
इंसान जब किसी भयानक सच की तलाश में निकलता है, तो कुदरत कभी न कभी उसे वह मौका जरूर दे देती है जिसका वह बेसब्री से इंतजार कर रहा होता है। लेकिन विडंबना यह है कि जब वह मौका हाथ आता है, तो दिल की धड़कनें सच के उस बोझ को उठाने से पहले ही कांपने लगती हैं।
मेरी उस झूठी बीमारी के करीब चार दिन बाद, भाग्यवश एक ऐसा अवसर बन ही गया जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी।
उस दिन सुबह इमरान किसी काम के सिलसिले में शहर के दूसरे कोने के लिए निकला था। उसने नाश्ते की मेज पर ही बता दिया था कि उसे लौटने में शाम हो जाएगी। और रही बात मम्मी की—तो सुबह करीब ग्यारह बजे उन्हें पास के मंदिर और वहां से बीरभूम की एक पुरानी परिचित महिला से मिलने जाना था, जो हाल ही में इस शहर में शिफ्ट हुई थीं। मम्मी ने मुझसे सुबह ही कह दिया था कि वह दोपहर बाद ही लौटेंगी।
इधर दफ्तर में, एक जरूरी सर्वर मेंटेनेंस के चलते दोपहर एक बजे ही 'हाफ-डे' घोषित हो गया।
जैसे ही बॉस ने घोषणा की, मेरे भीतर बिजली की एक तेज लहर दौड़ गई। चार दिनों से जिस मौके के लिए मेरी आँखें तरस रही थीं, वह मौका खुद चलकर मेरे सामने आ खड़ा हुआ था। मैंने बिना एक पल गंवाए अपनी बाइक उठाई और हवा से बातें करते हुए फ्लैट की तरफ दौड़ पड़ा।
रास्ते भर मेरे सीने में हथौड़े बज रहे थे। बाइक का हैंडल थामे मेरे हाथ पसीने से भीग चुके थे। दिमाग में बस एक ही धुन सवार थी—आज पर्दा उठकर रहेगा। आज मुझे वह डायरी हर हाल में ढूंढनी है।
जब मैं बिल्डिंग के नीचे पहुंचा, तो मैंने सबसे पहले पार्किंग एरिया में नजर दौड़ाई... इमरान की बाइक नदारद थी!
फ्लैट की सीढ़ियां चढ़ते वक्त मेरे कदम बेहद हल्के थे, जैसे कोई चोर अपने ही घर में सेंध लगाने जा रहा हो...!
ऊपर जाकर जब मैंने अपने फ्लैट के दरवाजे पर कान लगाया, तो भीतर गहरा, सन्नाटेदार सन्नाटा पसरा हुआ था।
मैंने चाबी लगाई और बड़ी नज़ाकत से दरवाजा खोला...
अंदर एक दम घोंटू सन्नाटा पसरा हुआ था... पूरा फ्लैट खाली था... रसोई की सिंक सूखी थी, और हॉल के पंखे बंद थे।
मैंने तुरंत मुख्य दरवाजा अंदर से लॉक किया... मेरे पास ज्यादा वक्त नहीं था; मम्मी या इमरान में से कोई भी कभी भी लौट सकता था। मैं बिना जूते उतारे, सीधे मम्मी के कमरे की तरफ लपका।
मम्मी के कमरे में कदम रखते ही मुझे वही जानी-पहचानी खुशबू आई—अगरबत्ती की धीमी महक के साथ घुली हुई वही नई, मॉडर्न बॉडी लोशन की खुशबू। वह कमरा बीरभूम के उस सादे कमरे से बिल्कुल अलग था। बिस्तर की चादर करीने से बिछी थी और ड्रेसिंग टेबल पर नए-नए प्रसाधन सजे हुए थे।
मेरी निगाहें सीधे अलमारी पर गईं। लकड़ी की पुरानी अलमारी, जिसे मम्मी बीरभूम से अपने साथ लाए सामान को रखने के लिए इस्तेमाल करती थीं।
मैंने अलमारी का पल्ला खींचा। साड़ियों की तहें सलीके से लगी थीं। मैंने अपनी कांपती उंगलियों से साड़ियों के बीच टटोलना शुरू किया। पहले रैक में कुछ नहीं था, सिर्फ सूती साड़ियां और कुछ शॉल। दूसरे रैक में उनके कुछ पुराने कागजात और दवाइयां थीं।
मेरा दिल डूबने लगा...
"क्या वह डायरी नहीं लाईं? क्या वह बीरभूम वाले घर में ही छूट गई?"
तभी मेरी नजर अलमारी के सबसे निचले हिस्से में रखे उस गहरे भूरे रंग के पुराने लेदर सूटकेस पर पड़ी। यह वही सूटकेस था जिसमें पापा के पुराने कागजात और मम्मी की बेहद निजी चीजें रहा करती थीं।
मैंने सूटकेस को बाहर खींचा…
उसकी ज़िप खोली...
ऊपर पुराने स्वेटर रखे थे। मैंने उन स्वेटरों को हटाया, और नीचे... कपड़ों की तह के बिल्कुल बीचों-बीच, कपड़े के एक मटमैले कवर में लिपटी हुई वह मोटी, नीली जिल्द वाली डायरी रखी थी!
मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं। सांस गले में अटक गई। यह वही डायरी थी—मम्मी की 'ला-इलाज बीमारी', उनका सबसे गहरा राजदार।
मैंने कांपते हाथों से उस डायरी को बाहर निकाला। उसका कवर छूते ही मुझे ऐसा लगा जैसे मैंने कोई जलता हुआ अंगारा छू लिया हो। मैं कमरे के फर्श पर, दीवार से पीठ टिकाकर बैठ गया। हाथों की थरथराहट इतनी ज्यादा थी कि डायरी का पहला पन्ना खोलने में भी मुझे मशक्कत करनी पड़ी।
शुरुआती पन्ने बीरभूम की यादों से संबंधित थे....
नीली स्याही से बांग्ला और हिंदी के मिले-जुले शब्दों में पापा की यादें लिखी थीं...
अकेलेपन का वो पुराना, घिसा-पिटा रोना था—
"आज फिर शाम को आंगन में अंधेरा जल्दी उतर आया... देबू (मेरा निकनेम) बड़ा हो रहा है, पर उसकी आँखों में सन्नाटा देखता हूँ तो डर लगता है... काश वो होते तो घर इतना बड़ा न लगता..."
मैं पन्ने तेजी से पलटता गया... मुझे अतीत नहीं, वर्तमान चाहिए था। मुझे इस महानगर की तारीखें चाहिए थीं।
और फिर... करीब बीस पन्ने पलटने के बाद, लिखावट की स्याही बदल गई। नीली की जगह काली स्याही आ गई थी, और अक्षरों की बनावट में एक अजीब सी हड़बड़ी, एक बेचैनी साफ झलक रही थी।
यह इस शहर में आने के बाद के पन्ने थे।
मैंने पन्नों को पढ़ना शुरू किया। लेकिन जैसा मैंने सोचा था कि वहाँ साफ-साफ अक्षरों में कोई पूरी कहानी लिखी होगी, वैसा कुछ नहीं था। कोई स्पष्ट वाक्य या पैराग्राफ नहीं था। वहाँ सिर्फ टूटे-फूटे, अधूरे शब्द, बेतरतीब पंक्तियाँ और बिखरे हुए जज्बात दर्ज थे। ऐसा लग रहा था जैसे लिखने वाले के हाथ कांप रहे थे, या वह लिखते-लिखते खुद से ही कुछ छुपाने की कोशिश कर रहा था।
पर उन टूटे-फूटे शब्दों में जो कुछ भी था... उसने मेरे पैरों तले से जमीन, और सीने से सांस दोनों एक साथ खींच ली।
एक पन्ने पर, जहाँ तारीख करीब दस दिन पुरानी थी, लिखा था:
"....यह कैसा बंधन है? मैं चाहकर भी नजरें नहीं हटा पाती। जब वह पास आता है, तो बीरभूम की वो सूखी नदी जैसे अचानक भर जाती है। पाप है यह... बहुत बड़ा पाप है। पर वो निगाहें... वो मुझे उस तरह देखता है जैसे बरसों से किसी ने नहीं देखा..."
यह पढ़कर मेरे माथे पर पसीने की ठंडी बूंदें छलक आईं...
"वो मुझे उस तरह देखता है..."
यहाँ 'वो' कौन था? इमरान के अलावा इस घर में तीसरा मर्द कौन था?
मैंने कांपती उंगलियों से अगला पन्ना पलटा। वहाँ की लिखावट और भी ज्यादा बिखरी हुई थी, जैसे आंसुओं की बूंदों ने स्याही को कई जगह फैला दिया हो:
"....आज उसने फिर छुआ। मना करना चाहा, हाथ कांप गए। उसने कहा कि इस उम्र में भी रूप का ढलना जरूरी नहीं। वो वाइन रंग... ये रंग मुझे कभी पसंद नहीं थे, पर जब उसने वह कपड़ा मेरे कंधे पर रखा, तो लगा जैसे बरसों की धूल छंट गई हो… वो कहता है कि ये रंग मुझ पर खिलता है। देबू से नजरें चुराना अब भारी पड़ रहा है। अगर उसे पता चला तो? नहीं, वो नहीं समझेगा। एक औरत का जिस्म और उसका मन... सिर्फ माँ बनकर नहीं जी सकती। यह आग मुझे जला देगी... पर यह जलन अच्छी क्यों लग रही है?...."
"हे भगवान! हे मेरे भगवान!" मेरे मुंह से एक बेबस, रुंधी हुई चीख निकली…
मेरा पूरा शरीर थर-थर कांपने लगा… आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा।
'उसने फिर छुआ... वो वाइन रंग... सिर्फ माँ बनकर नहीं जी सकती...'
ये कोई टूटे-फूटे शब्द नहीं थे, यह मेरे संस्कारों, मेरी आस्था और मेरी पूरी दुनिया पर लिखा गया एक क्रूर सच था! वह वाइन रंग का सलवार-सूट, जिसकी फिटिंग पर मुझे शक था, उस ड्रेसिंग टेबल के आईने के सामने उनका संवरना... सब कुछ इसी डायरी के पन्नों से निकलकर सच साबित हो रहा था।
इमरान और मम्मी के बीच कोई सामान्य जान-पहचान या औपचारिक रिश्ता नहीं था। उन दोनों के बीच एक ऐसा संबंध बन चुका था, जिसकी कल्पना करना भी एक बेटे के लिए मौत से बदतर था। वह आकर्षण, वह शारीरिक और मानसिक खिंचाव, जिसकी तरफ मेरा शक बार-बार इशारा कर रहा था और जिसे मेरा मन 'baseless', बेबुनियाद कहकर खारिज कर रहा था—आज खुद मेरी माँ के हाथों से उस पन्ने पर कबूल किया जा चुका था।
मैंने पन्ने को और आगे पलटने की कोशिश की, जहाँ आखिरी कुछ तारीखों में सिर्फ कुछ अजीब से शब्द लिखे थे:
"....वक्त खत्म हो रहा है... वो ताबीज, मुझे बांध दिया है! अब पीछे हटने का रास्ता नहीं बचा। या तो सब कुछ खत्म होगा, या मैं..."
इसके आगे पन्ना खाली था…
डायरी मेरे हाथ से छूटकर फर्श पर गिर पड़ी…
कमरे की दीवारें मेरे ऊपर गिरती हुई महसूस हुईं।
मेरा शक अब सिर्फ बलवान नहीं हुआ था; वह एक खूंखार हकीकत बनकर मेरे सामने खड़ा था और मुझ पर ठहाके मार रहा था। वह इमरान... मेरा दोस्त, मेरा भाई जैसा रूममेट, जिसने मेरे एक्सीडेंट में खून पसीना बहाया था—वह मेरी माँ की उस तन्हाई का, उनके ढलते जिस्म की प्यास का सौदागर निकला!!
…. और मेरी माँ...?! जिन्होंने मुझे मर्यादा की घुट्टी पिलाई थी, वह उस 22-23 साल के लड़के के स्पर्श में अपनी ममता को, अपने पति की यादों को स्वाहा कर चुकी थीं?!
कमरे की खामोशी में मेरी तेज-तेज सांसों की आवाज गूंज रही थी। मेरे भीतर आँसूओं की जगह एक भयानक, खौफनाक लावा उबलने लगा था। दर्द की सीमा खत्म हो चुकी थी, अब सिर्फ नफरत और इंतकाम का अंधकार बाकी था।
पर.... पर इसमें और भी ऐसा बहुत कुछ लिखा था जोकि अभी - अभी मैंने अपनी मम्मी और इमरान के बीच जो कुछ भी सोच रहा था, उसके ठीक उल्टा भी साबित हो रहा था...!
उन लाइन्स को और उन पन्नों को पढ़ने के उद्देश्य से जैसे ही मैंने डायरी उठाया....
तभी...
…. फ्लैट के मुख्य दरवाजे के ताले में चाबी घूमने की हल्की सी 'क्लिक' आवाज हुई।
मम्मी या इमरान में से कोई एक लौट आया था!
To be Continued....
इंसान जब किसी भयानक सच की तलाश में निकलता है, तो कुदरत कभी न कभी उसे वह मौका जरूर दे देती है जिसका वह बेसब्री से इंतजार कर रहा होता है। लेकिन विडंबना यह है कि जब वह मौका हाथ आता है, तो दिल की धड़कनें सच के उस बोझ को उठाने से पहले ही कांपने लगती हैं।
मेरी उस झूठी बीमारी के करीब चार दिन बाद, भाग्यवश एक ऐसा अवसर बन ही गया जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी।
उस दिन सुबह इमरान किसी काम के सिलसिले में शहर के दूसरे कोने के लिए निकला था। उसने नाश्ते की मेज पर ही बता दिया था कि उसे लौटने में शाम हो जाएगी। और रही बात मम्मी की—तो सुबह करीब ग्यारह बजे उन्हें पास के मंदिर और वहां से बीरभूम की एक पुरानी परिचित महिला से मिलने जाना था, जो हाल ही में इस शहर में शिफ्ट हुई थीं। मम्मी ने मुझसे सुबह ही कह दिया था कि वह दोपहर बाद ही लौटेंगी।
इधर दफ्तर में, एक जरूरी सर्वर मेंटेनेंस के चलते दोपहर एक बजे ही 'हाफ-डे' घोषित हो गया।
जैसे ही बॉस ने घोषणा की, मेरे भीतर बिजली की एक तेज लहर दौड़ गई। चार दिनों से जिस मौके के लिए मेरी आँखें तरस रही थीं, वह मौका खुद चलकर मेरे सामने आ खड़ा हुआ था। मैंने बिना एक पल गंवाए अपनी बाइक उठाई और हवा से बातें करते हुए फ्लैट की तरफ दौड़ पड़ा।
रास्ते भर मेरे सीने में हथौड़े बज रहे थे। बाइक का हैंडल थामे मेरे हाथ पसीने से भीग चुके थे। दिमाग में बस एक ही धुन सवार थी—आज पर्दा उठकर रहेगा। आज मुझे वह डायरी हर हाल में ढूंढनी है।
जब मैं बिल्डिंग के नीचे पहुंचा, तो मैंने सबसे पहले पार्किंग एरिया में नजर दौड़ाई... इमरान की बाइक नदारद थी!
फ्लैट की सीढ़ियां चढ़ते वक्त मेरे कदम बेहद हल्के थे, जैसे कोई चोर अपने ही घर में सेंध लगाने जा रहा हो...!
ऊपर जाकर जब मैंने अपने फ्लैट के दरवाजे पर कान लगाया, तो भीतर गहरा, सन्नाटेदार सन्नाटा पसरा हुआ था।
मैंने चाबी लगाई और बड़ी नज़ाकत से दरवाजा खोला...
अंदर एक दम घोंटू सन्नाटा पसरा हुआ था... पूरा फ्लैट खाली था... रसोई की सिंक सूखी थी, और हॉल के पंखे बंद थे।
मैंने तुरंत मुख्य दरवाजा अंदर से लॉक किया... मेरे पास ज्यादा वक्त नहीं था; मम्मी या इमरान में से कोई भी कभी भी लौट सकता था। मैं बिना जूते उतारे, सीधे मम्मी के कमरे की तरफ लपका।
मम्मी के कमरे में कदम रखते ही मुझे वही जानी-पहचानी खुशबू आई—अगरबत्ती की धीमी महक के साथ घुली हुई वही नई, मॉडर्न बॉडी लोशन की खुशबू। वह कमरा बीरभूम के उस सादे कमरे से बिल्कुल अलग था। बिस्तर की चादर करीने से बिछी थी और ड्रेसिंग टेबल पर नए-नए प्रसाधन सजे हुए थे।
मेरी निगाहें सीधे अलमारी पर गईं। लकड़ी की पुरानी अलमारी, जिसे मम्मी बीरभूम से अपने साथ लाए सामान को रखने के लिए इस्तेमाल करती थीं।
मैंने अलमारी का पल्ला खींचा। साड़ियों की तहें सलीके से लगी थीं। मैंने अपनी कांपती उंगलियों से साड़ियों के बीच टटोलना शुरू किया। पहले रैक में कुछ नहीं था, सिर्फ सूती साड़ियां और कुछ शॉल। दूसरे रैक में उनके कुछ पुराने कागजात और दवाइयां थीं।
मेरा दिल डूबने लगा...
"क्या वह डायरी नहीं लाईं? क्या वह बीरभूम वाले घर में ही छूट गई?"
तभी मेरी नजर अलमारी के सबसे निचले हिस्से में रखे उस गहरे भूरे रंग के पुराने लेदर सूटकेस पर पड़ी। यह वही सूटकेस था जिसमें पापा के पुराने कागजात और मम्मी की बेहद निजी चीजें रहा करती थीं।
मैंने सूटकेस को बाहर खींचा…
उसकी ज़िप खोली...
ऊपर पुराने स्वेटर रखे थे। मैंने उन स्वेटरों को हटाया, और नीचे... कपड़ों की तह के बिल्कुल बीचों-बीच, कपड़े के एक मटमैले कवर में लिपटी हुई वह मोटी, नीली जिल्द वाली डायरी रखी थी!
मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं। सांस गले में अटक गई। यह वही डायरी थी—मम्मी की 'ला-इलाज बीमारी', उनका सबसे गहरा राजदार।
मैंने कांपते हाथों से उस डायरी को बाहर निकाला। उसका कवर छूते ही मुझे ऐसा लगा जैसे मैंने कोई जलता हुआ अंगारा छू लिया हो। मैं कमरे के फर्श पर, दीवार से पीठ टिकाकर बैठ गया। हाथों की थरथराहट इतनी ज्यादा थी कि डायरी का पहला पन्ना खोलने में भी मुझे मशक्कत करनी पड़ी।
शुरुआती पन्ने बीरभूम की यादों से संबंधित थे....
नीली स्याही से बांग्ला और हिंदी के मिले-जुले शब्दों में पापा की यादें लिखी थीं...
अकेलेपन का वो पुराना, घिसा-पिटा रोना था—
"आज फिर शाम को आंगन में अंधेरा जल्दी उतर आया... देबू (मेरा निकनेम) बड़ा हो रहा है, पर उसकी आँखों में सन्नाटा देखता हूँ तो डर लगता है... काश वो होते तो घर इतना बड़ा न लगता..."
मैं पन्ने तेजी से पलटता गया... मुझे अतीत नहीं, वर्तमान चाहिए था। मुझे इस महानगर की तारीखें चाहिए थीं।
और फिर... करीब बीस पन्ने पलटने के बाद, लिखावट की स्याही बदल गई। नीली की जगह काली स्याही आ गई थी, और अक्षरों की बनावट में एक अजीब सी हड़बड़ी, एक बेचैनी साफ झलक रही थी।
यह इस शहर में आने के बाद के पन्ने थे।
मैंने पन्नों को पढ़ना शुरू किया। लेकिन जैसा मैंने सोचा था कि वहाँ साफ-साफ अक्षरों में कोई पूरी कहानी लिखी होगी, वैसा कुछ नहीं था। कोई स्पष्ट वाक्य या पैराग्राफ नहीं था। वहाँ सिर्फ टूटे-फूटे, अधूरे शब्द, बेतरतीब पंक्तियाँ और बिखरे हुए जज्बात दर्ज थे। ऐसा लग रहा था जैसे लिखने वाले के हाथ कांप रहे थे, या वह लिखते-लिखते खुद से ही कुछ छुपाने की कोशिश कर रहा था।
पर उन टूटे-फूटे शब्दों में जो कुछ भी था... उसने मेरे पैरों तले से जमीन, और सीने से सांस दोनों एक साथ खींच ली।
एक पन्ने पर, जहाँ तारीख करीब दस दिन पुरानी थी, लिखा था:
"....यह कैसा बंधन है? मैं चाहकर भी नजरें नहीं हटा पाती। जब वह पास आता है, तो बीरभूम की वो सूखी नदी जैसे अचानक भर जाती है। पाप है यह... बहुत बड़ा पाप है। पर वो निगाहें... वो मुझे उस तरह देखता है जैसे बरसों से किसी ने नहीं देखा..."
यह पढ़कर मेरे माथे पर पसीने की ठंडी बूंदें छलक आईं...
"वो मुझे उस तरह देखता है..."
यहाँ 'वो' कौन था? इमरान के अलावा इस घर में तीसरा मर्द कौन था?
मैंने कांपती उंगलियों से अगला पन्ना पलटा। वहाँ की लिखावट और भी ज्यादा बिखरी हुई थी, जैसे आंसुओं की बूंदों ने स्याही को कई जगह फैला दिया हो:
"....आज उसने फिर छुआ। मना करना चाहा, हाथ कांप गए। उसने कहा कि इस उम्र में भी रूप का ढलना जरूरी नहीं। वो वाइन रंग... ये रंग मुझे कभी पसंद नहीं थे, पर जब उसने वह कपड़ा मेरे कंधे पर रखा, तो लगा जैसे बरसों की धूल छंट गई हो… वो कहता है कि ये रंग मुझ पर खिलता है। देबू से नजरें चुराना अब भारी पड़ रहा है। अगर उसे पता चला तो? नहीं, वो नहीं समझेगा। एक औरत का जिस्म और उसका मन... सिर्फ माँ बनकर नहीं जी सकती। यह आग मुझे जला देगी... पर यह जलन अच्छी क्यों लग रही है?...."
"हे भगवान! हे मेरे भगवान!" मेरे मुंह से एक बेबस, रुंधी हुई चीख निकली…
मेरा पूरा शरीर थर-थर कांपने लगा… आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा।
'उसने फिर छुआ... वो वाइन रंग... सिर्फ माँ बनकर नहीं जी सकती...'
ये कोई टूटे-फूटे शब्द नहीं थे, यह मेरे संस्कारों, मेरी आस्था और मेरी पूरी दुनिया पर लिखा गया एक क्रूर सच था! वह वाइन रंग का सलवार-सूट, जिसकी फिटिंग पर मुझे शक था, उस ड्रेसिंग टेबल के आईने के सामने उनका संवरना... सब कुछ इसी डायरी के पन्नों से निकलकर सच साबित हो रहा था।
इमरान और मम्मी के बीच कोई सामान्य जान-पहचान या औपचारिक रिश्ता नहीं था। उन दोनों के बीच एक ऐसा संबंध बन चुका था, जिसकी कल्पना करना भी एक बेटे के लिए मौत से बदतर था। वह आकर्षण, वह शारीरिक और मानसिक खिंचाव, जिसकी तरफ मेरा शक बार-बार इशारा कर रहा था और जिसे मेरा मन 'baseless', बेबुनियाद कहकर खारिज कर रहा था—आज खुद मेरी माँ के हाथों से उस पन्ने पर कबूल किया जा चुका था।
मैंने पन्ने को और आगे पलटने की कोशिश की, जहाँ आखिरी कुछ तारीखों में सिर्फ कुछ अजीब से शब्द लिखे थे:
"....वक्त खत्म हो रहा है... वो ताबीज, मुझे बांध दिया है! अब पीछे हटने का रास्ता नहीं बचा। या तो सब कुछ खत्म होगा, या मैं..."
इसके आगे पन्ना खाली था…
डायरी मेरे हाथ से छूटकर फर्श पर गिर पड़ी…
कमरे की दीवारें मेरे ऊपर गिरती हुई महसूस हुईं।
मेरा शक अब सिर्फ बलवान नहीं हुआ था; वह एक खूंखार हकीकत बनकर मेरे सामने खड़ा था और मुझ पर ठहाके मार रहा था। वह इमरान... मेरा दोस्त, मेरा भाई जैसा रूममेट, जिसने मेरे एक्सीडेंट में खून पसीना बहाया था—वह मेरी माँ की उस तन्हाई का, उनके ढलते जिस्म की प्यास का सौदागर निकला!!
…. और मेरी माँ...?! जिन्होंने मुझे मर्यादा की घुट्टी पिलाई थी, वह उस 22-23 साल के लड़के के स्पर्श में अपनी ममता को, अपने पति की यादों को स्वाहा कर चुकी थीं?!
कमरे की खामोशी में मेरी तेज-तेज सांसों की आवाज गूंज रही थी। मेरे भीतर आँसूओं की जगह एक भयानक, खौफनाक लावा उबलने लगा था। दर्द की सीमा खत्म हो चुकी थी, अब सिर्फ नफरत और इंतकाम का अंधकार बाकी था।
पर.... पर इसमें और भी ऐसा बहुत कुछ लिखा था जोकि अभी - अभी मैंने अपनी मम्मी और इमरान के बीच जो कुछ भी सोच रहा था, उसके ठीक उल्टा भी साबित हो रहा था...!
उन लाइन्स को और उन पन्नों को पढ़ने के उद्देश्य से जैसे ही मैंने डायरी उठाया....
तभी...
…. फ्लैट के मुख्य दरवाजे के ताले में चाबी घूमने की हल्की सी 'क्लिक' आवाज हुई।
मम्मी या इमरान में से कोई एक लौट आया था!
To be Continued....


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