30-08-2026, 10:35 PM
एपिसोड 22: नाकाम साज़िश
संदेह की आग जब मन में जल रही हो, तो नींद और चैन दोनों जलकर राख हो जाते हैं। उस रात जब मैं दफ्तर से घर लौटा था, तो मेरा दिमाग सिर्फ उस एक ख्याल पर अटका हुआ था—मम्मी की वह पुरानी डायरी। उस पन्ने पर लिखा हर शब्द मेरे लिए या तो इस मानसिक बीमारी का इलाज साबित होने वाला था, या फिर मेरी बची-कुची दुनिया को हमेशा के लिए तबाह करने वाला था….
अगली ही सुबह, मैंने अपने प्लान के पहले चरण को अंजाम दिया…
मैंने बिस्तर से उठते ही अपना सिर थाम लिया और एक झूठी कराह के साथ लेट गया।
"देव! क्या हुआ बेटा?" मम्मी तुरंत मेरे कमरे में भागती हुई आईं --- उनके चेहरे पर वही पुरानी, जानी-पहचानी फिक्र थी।
उन्होंने मेरे माथे पर हाथ रखा,
"बुखार तो नहीं लग रहा, पर चेहरा बहुत उतरा हुआ है।"
"मम्मी, रात से ही बहुत तेज सिरदर्द और बदन दर्द है। आज दफ्तर जाने की हिम्मत बिल्कुल नहीं है," मैंने अपनी आवाज में एक बनावटी कमजोरी लाते हुए कहा।
शुरुआत में मम्मी बहुत ज्यादा परेशान हो गईं…
वह कभी पानी का गिलास लातीं, तो कभी विक्स मलने की जिद करने लगतीं। उनका यह पुराना, ममता से भरा रूप देखकर एक पल के लिए मेरा दिल पसीज गया। मुझे खुद पर ग्लानि महसूस हुई कि मैं एक शरीफ, फिक्रमंद माँ के सामने बीमारी का नाटक कर रहा था। लेकिन जैसे ही मैंने उन्हें समझाया कि यह सिर्फ थकान और हल्के सिरदर्द का असर है और थोड़ा आराम करने से ठीक हो जाएगा, वह शांत हुईं --- और उनके शांत होते ही, उस शांत फ्लैट के भीतर का असली खेल शुरू हो गया।
पूरे दिन घर में जो कुछ भी हुआ, उसने मेरी उस झूठी बीमारी को एक असली, खौफनाक मानसिक तड़प में बदल दिया।
मैंने सोचा था कि,
‘मैं घर पर रुकूंगा, आराम करने का नाटक करूंगा, और दोपहर में जब हमेशा की तरह मम्मी बाज़ार के लिए निकलेंगी और इमरान अपने किसी काम से बाहर जाएगा, तब मुझे पूरे फ्लैट में अकेले रहने का मौका मिलेगा। मैं सीधे मम्मी के कमरे की अलमारी, उनके सूटकेस और तकियों के नीचे छान मारूंगा। उस डायरी को ढूंढकर या तो तुरंत पढ़ लूंगा, या फिर अपने फोन से हर पन्ने की तस्वीरें खींच लूंगा ताकि बाद में फुर्सत से उस कड़वे सच का विश्लेषण कर सकूँ…’
लेकिन मेरी किस्मत इतनी बदतर निकलेगी, इसका अंदाजा मुझे नहीं था।
सुबह के करीब ग्यारह बजे से मैंने एक अजीब सी बात नोटिस करना शुरू की…
मम्मी और इमरान के बीच बातचीत तो हो रही थी, लेकिन उसका पैटर्न बहुत संदेहास्पद था। जब भी वे दोनों हॉल में होते या मेरे कमरे के पास से गुजरते, तो उनकी आवाजें बहुत साफ और सामान्य होती थीं।
"चाय में चीनी और डालूँ?" मम्मी हॉल से पूछतीं।
"नहीं आंटी जी, बिल्कुल परफेक्ट है," इमरान डाइनिंग टेबल से जोर से जवाब देता।
वे जब जोर से बात करते, तो बातें बिल्कुल मामूली, घरेलू और बेमतलब होती थीं।
लेकिन जैसे ही वे दोनों रसोई में साथ होते, या इमरान के कमरे के आसपास होते, अचानक उनकी आवाजें एक रहस्यमयी फुसफुसाहट में तब्दील हो जाती थीं!
मेरे कमरे का दरवाजा आधा खुला था। मैं बिस्तर पर लेटा-लेटा अपने कान दीवारों से सटाए रहता। रसोई से बर्तनों के खटकने के बीच से उन दोनों की दबी-दबी फुसफुसाहटें मेरे कानों तक पहुँचती थीं। हालांकि मुझे एक भी शब्द साफ-साफ सुनाई नहीं दे रहा था, लेकिन कोई भी इंसान आसानी से समझ सकता था कि वे कोई बेहद गंभीर, और बहुत सेंसिटिव टॉपिक पर बात कर रहे थे।
वह फुसफुसाहट साधारण बातचीत नहीं थी; उसमें एक तरह की हड़बड़ी थी, एक अजीब सी कशिश थी। मम्मी कुछ धीमी आवाज में पूछतीं, और इमरान बहुत करीब झुककर उन्हें कोई हिदायत देता नजर आता। बीच-बीच में वे दोनों रुककर मेरे कमरे के दरवाजे की तरफ देखते, यह सुनिश्चित करने के लिए कि कहीं मैं उठ तो नहीं गया हूँ!
दोनों की हरकतें बहुत अजीब और वाकई में शक पैदा करने वाली थीं. खैर, शक तो बहुत पहले से ही हो रहा था... पर इमरान पर शक करने का मुझे घंटा कोई शौक था... मैं तो दरअसल इस टेंशन में जला जा रहा था कि कहीं सच में मम्मी भी तो दोषी नहीं निकल जाएगी?
लेटे-लेटे मैं ऊपरवाले से ही यही माँग रहा था की मेरे सारे शक गलत साबित हों....
लेकिन....
लेकिन सच कहूँ तो बीच-बीच में ऐसी फीलिंग आ रही थी की जब मैं डायरी देखूँगा और मुझे उसमें से कोई ऐसी बात पता चले जिसके न होने का मैं दुआ कर रहा हूँ, तब मेरा रिएक्शन क्या होगा? कहीं सच में तो कुछ हासिल नहीं हो जाएगा?
मम्मी और इमरान... एक व्यस्क महिला और एक कम आयु के लड़के के बीच में कहीं वही सब तो देखने को नहीं मिलेगा जिसे देखने, सुनने और पढ़ने के लिए इंटरनेट में हमेशा से भीड़ लगी रहती है?
"उफ्फ्फ!"
मुझसे आगे नहीं सोचा गया…
इसका एक कारण ये भी था की एक व्यस्क महिला और एक कम आयु के लड़के के बीच अफेयर की बात सोचते ही मेरे कमर के नीचे का हिस्सा धीरे-धीरे सख्त होने लगा था..!
मेरी खुद भी ऐसी ही एक फैंटेसी रही थी कि कभी मौका मिले तो मैं खुद किसी मालदार, रसभरी एक व्यस्क महिला के साथ रिलेशनशिप में आऊँ! साला, खुद का तो हो नहीं रहा; अब कहीं अपनी मम्मी और दोस्त के बीच के ही ऐसी किसी बात का गवाह न बन जाऊँ।
फ़िलहाल तो यूँ लगा रहा है की वे दोनों मिलकर मुझसे कुछ छुपाना चाहते थे! कोई ऐसी बात, कोई ऐसा राज, जिसे सिर्फ वे दोनों जानते थे और जिससे मुझे बिल्कुल बेखबर रखा जा रहा था।
‘आखिर क्यों...? क्या छुपा रहे हैं ये दोनों मुझसे?’
यह सवाल मेरे दिमाग में लोहे की गर्म सलाखों की तरह चुभने लगा। मैं बिस्तर पर पड़ा-पड़ा अंदर ही अंदर तड़प उठा। मेरी छाती में इतना गुस्सा भर गया कि मेरा मन किया कि मैं एक झटके में बिस्तर से उठूँ, भागकर रसोई में जाऊं और उन दोनों पर पागलों की तरह चीखना-चिल्लाना शुरू कर दूँ!
‘क्या चल रहा है तुम दोनों के बीच? बंद करो यह नाटक! क्या रिश्ता बन गया है तुम दोनों का कि अब अपने ही बेटे से बातें छुपानी पड़ रही हैं?’
लेकिन... मैं ऐसा कर न सका… क्योंकि मैं ऐसी कोई भी बकचोदी नहीं करना चाहता था.
अगर मैं चिल्लाता, अगर मैं उन पर झपट पड़ता, तो आखिर मैं उन्हें वजह क्या बताता? क्या मैं सीधे उनके मुंह पर यह स्वीकार कर लेता कि मैं अपनी सीधी-सादी माँ पर एक घिनौना शक कर रहा हूँ? क्या मैं अपने उस दोस्त को यह बताता कि मैं उसकी हर हरकत को, उसके कपड़ों की पसंद को और उसकी हर फुसफुसाहट को एक चरित्रहीन नजरिए से देख रहा हूँ?
अगर मेरा यह शक गलत निकलता, तो मेरी माँ उस दिन मेरे सामने ही दम तोड़ देतीं। उनका मुझ पर से, अपने ही बेटे पर से भरोसा हमेशा के लिए उठ जाता… और अगर मेरा शक सही निकल भी जाता, तो भी बिना किसी सबूत के उन पर आरोप लगाने से वे दोनों कोई नया झूठ गढ़ लेते और ज्यादा सतर्क हो जाते।
इसी लाचारी और गुस्से के बवंडर में मैं अपने कमरे की चादर को उंगलियों में भींचकर रोता रहा, अंदर ही अंदर घुटता रहा।
दोपहर के एक बज चुके थे, पर मेरी फूटी किस्मत ने मेरा साथ यहाँ भी छोड़ दिया।
मैंने जो प्लान बनाया था कि दोपहर में पूरा फ्लैट खाली होगा, वह पूरी तरह से फ्लॉप हो गया। काफी देर तक इंतजार करने के बाद भी, उन दोनों में से कोई बाहर नहीं गया। मम्मी जो पिछले एक हफ्ते से रोज दोपहर को बेखौफ होकर अकेले मार्केट निकल जाती थीं, आज वह पूरे समय घर पर ही टिकी रहीं।
कारण? कारण था 'मेरा ख्याल रखना'!
मम्मी हर आधे घंटे में मेरे सिर पर गीली पट्टी रखने आतीं, कभी सूप का कटोरा लेकर आतीं, तो कभी मेरे पैर दबाने लगतीं। उनकी इस अत्यधिक सेवा भावना ने मेरे उस गुप्त प्लान की धज्जियां उड़ा दी थीं। जिस माँ की ममता पर मैं अपनी पूरी जिंदगी कुर्बान कर सकता था, आज उसी माँ की मौजूदगी मुझे एक पहरेदार की तरह लग रही थी। वह पल भर के लिए भी अपने कमरे की तरफ नहीं जा रही थीं; उनका पूरा ध्यान मेरे कमरे पर और रसोई पर था।
करीब तीन बजे के आसपास, सिर्फ इमरान ही बाहर गया।
"भाई, मैं जरा कुछ जरूरी काम से बाहर जा रहा हूँ। शाम तक लौटूँगा। कोई दवाई लानी हो तो बता दे," उसने मेरे कमरे में झांककर कहा।
"नहीं, सब ठीक है," मैंने बेमन से कहा।
इमरान तो चला गया, लेकिन मम्मी घर में ही रहीं।
वह हॉल में बैठकर कोई टीवी सीरियल देखने लगीं, और बीच-बीच में उठकर मेरे पास आकर बैठ जाती।
मैं बिस्तर पर लेटा-लेटा अपने भाग्य को कोस रहा था। मम्मी का रूम महज दस कदम की दूरी पर था। उनकी वह अलमारी, वह सूटकेस, और शायद वह डायरी मेरे सामने थी, पर बीच में मम्मी की वह अटूट मौजूदगी एक लोहे की दीवार बनकर खड़ी थी।
पूरा दिन ढल गया। मेरी बीमारी का नाटक का असल उद्देश्य तो कारगर साबित नहीं हुआ, लेकिन उस ढलती दोपहर के सन्नाटे में, उन बंद कमरों की दबी फुसफुसाहटों ने मेरे दिल में एक ऐसा ज़हर घोल दिया था, जिसका असर किसी भी दुर्घटना से ज्यादा जानलेवा था। मैं चुपचाप लेटा रहा, यह जानते हुए कि इस घर की हवा में कोई बहुत बड़ा राज सांस ले रहा था ---जिसका मुझे हल्का अंदेशा भी था, लेकिन अपने ही बुने हुए जाल में बेबस होकर तड़प रहा था।
To be Continued…
संदेह की आग जब मन में जल रही हो, तो नींद और चैन दोनों जलकर राख हो जाते हैं। उस रात जब मैं दफ्तर से घर लौटा था, तो मेरा दिमाग सिर्फ उस एक ख्याल पर अटका हुआ था—मम्मी की वह पुरानी डायरी। उस पन्ने पर लिखा हर शब्द मेरे लिए या तो इस मानसिक बीमारी का इलाज साबित होने वाला था, या फिर मेरी बची-कुची दुनिया को हमेशा के लिए तबाह करने वाला था….
अगली ही सुबह, मैंने अपने प्लान के पहले चरण को अंजाम दिया…
मैंने बिस्तर से उठते ही अपना सिर थाम लिया और एक झूठी कराह के साथ लेट गया।
"देव! क्या हुआ बेटा?" मम्मी तुरंत मेरे कमरे में भागती हुई आईं --- उनके चेहरे पर वही पुरानी, जानी-पहचानी फिक्र थी।
उन्होंने मेरे माथे पर हाथ रखा,
"बुखार तो नहीं लग रहा, पर चेहरा बहुत उतरा हुआ है।"
"मम्मी, रात से ही बहुत तेज सिरदर्द और बदन दर्द है। आज दफ्तर जाने की हिम्मत बिल्कुल नहीं है," मैंने अपनी आवाज में एक बनावटी कमजोरी लाते हुए कहा।
शुरुआत में मम्मी बहुत ज्यादा परेशान हो गईं…
वह कभी पानी का गिलास लातीं, तो कभी विक्स मलने की जिद करने लगतीं। उनका यह पुराना, ममता से भरा रूप देखकर एक पल के लिए मेरा दिल पसीज गया। मुझे खुद पर ग्लानि महसूस हुई कि मैं एक शरीफ, फिक्रमंद माँ के सामने बीमारी का नाटक कर रहा था। लेकिन जैसे ही मैंने उन्हें समझाया कि यह सिर्फ थकान और हल्के सिरदर्द का असर है और थोड़ा आराम करने से ठीक हो जाएगा, वह शांत हुईं --- और उनके शांत होते ही, उस शांत फ्लैट के भीतर का असली खेल शुरू हो गया।
पूरे दिन घर में जो कुछ भी हुआ, उसने मेरी उस झूठी बीमारी को एक असली, खौफनाक मानसिक तड़प में बदल दिया।
मैंने सोचा था कि,
‘मैं घर पर रुकूंगा, आराम करने का नाटक करूंगा, और दोपहर में जब हमेशा की तरह मम्मी बाज़ार के लिए निकलेंगी और इमरान अपने किसी काम से बाहर जाएगा, तब मुझे पूरे फ्लैट में अकेले रहने का मौका मिलेगा। मैं सीधे मम्मी के कमरे की अलमारी, उनके सूटकेस और तकियों के नीचे छान मारूंगा। उस डायरी को ढूंढकर या तो तुरंत पढ़ लूंगा, या फिर अपने फोन से हर पन्ने की तस्वीरें खींच लूंगा ताकि बाद में फुर्सत से उस कड़वे सच का विश्लेषण कर सकूँ…’
लेकिन मेरी किस्मत इतनी बदतर निकलेगी, इसका अंदाजा मुझे नहीं था।
सुबह के करीब ग्यारह बजे से मैंने एक अजीब सी बात नोटिस करना शुरू की…
मम्मी और इमरान के बीच बातचीत तो हो रही थी, लेकिन उसका पैटर्न बहुत संदेहास्पद था। जब भी वे दोनों हॉल में होते या मेरे कमरे के पास से गुजरते, तो उनकी आवाजें बहुत साफ और सामान्य होती थीं।
"चाय में चीनी और डालूँ?" मम्मी हॉल से पूछतीं।
"नहीं आंटी जी, बिल्कुल परफेक्ट है," इमरान डाइनिंग टेबल से जोर से जवाब देता।
वे जब जोर से बात करते, तो बातें बिल्कुल मामूली, घरेलू और बेमतलब होती थीं।
लेकिन जैसे ही वे दोनों रसोई में साथ होते, या इमरान के कमरे के आसपास होते, अचानक उनकी आवाजें एक रहस्यमयी फुसफुसाहट में तब्दील हो जाती थीं!
मेरे कमरे का दरवाजा आधा खुला था। मैं बिस्तर पर लेटा-लेटा अपने कान दीवारों से सटाए रहता। रसोई से बर्तनों के खटकने के बीच से उन दोनों की दबी-दबी फुसफुसाहटें मेरे कानों तक पहुँचती थीं। हालांकि मुझे एक भी शब्द साफ-साफ सुनाई नहीं दे रहा था, लेकिन कोई भी इंसान आसानी से समझ सकता था कि वे कोई बेहद गंभीर, और बहुत सेंसिटिव टॉपिक पर बात कर रहे थे।
वह फुसफुसाहट साधारण बातचीत नहीं थी; उसमें एक तरह की हड़बड़ी थी, एक अजीब सी कशिश थी। मम्मी कुछ धीमी आवाज में पूछतीं, और इमरान बहुत करीब झुककर उन्हें कोई हिदायत देता नजर आता। बीच-बीच में वे दोनों रुककर मेरे कमरे के दरवाजे की तरफ देखते, यह सुनिश्चित करने के लिए कि कहीं मैं उठ तो नहीं गया हूँ!
दोनों की हरकतें बहुत अजीब और वाकई में शक पैदा करने वाली थीं. खैर, शक तो बहुत पहले से ही हो रहा था... पर इमरान पर शक करने का मुझे घंटा कोई शौक था... मैं तो दरअसल इस टेंशन में जला जा रहा था कि कहीं सच में मम्मी भी तो दोषी नहीं निकल जाएगी?
लेटे-लेटे मैं ऊपरवाले से ही यही माँग रहा था की मेरे सारे शक गलत साबित हों....
लेकिन....
लेकिन सच कहूँ तो बीच-बीच में ऐसी फीलिंग आ रही थी की जब मैं डायरी देखूँगा और मुझे उसमें से कोई ऐसी बात पता चले जिसके न होने का मैं दुआ कर रहा हूँ, तब मेरा रिएक्शन क्या होगा? कहीं सच में तो कुछ हासिल नहीं हो जाएगा?
मम्मी और इमरान... एक व्यस्क महिला और एक कम आयु के लड़के के बीच में कहीं वही सब तो देखने को नहीं मिलेगा जिसे देखने, सुनने और पढ़ने के लिए इंटरनेट में हमेशा से भीड़ लगी रहती है?
"उफ्फ्फ!"
मुझसे आगे नहीं सोचा गया…
इसका एक कारण ये भी था की एक व्यस्क महिला और एक कम आयु के लड़के के बीच अफेयर की बात सोचते ही मेरे कमर के नीचे का हिस्सा धीरे-धीरे सख्त होने लगा था..!
मेरी खुद भी ऐसी ही एक फैंटेसी रही थी कि कभी मौका मिले तो मैं खुद किसी मालदार, रसभरी एक व्यस्क महिला के साथ रिलेशनशिप में आऊँ! साला, खुद का तो हो नहीं रहा; अब कहीं अपनी मम्मी और दोस्त के बीच के ही ऐसी किसी बात का गवाह न बन जाऊँ।
फ़िलहाल तो यूँ लगा रहा है की वे दोनों मिलकर मुझसे कुछ छुपाना चाहते थे! कोई ऐसी बात, कोई ऐसा राज, जिसे सिर्फ वे दोनों जानते थे और जिससे मुझे बिल्कुल बेखबर रखा जा रहा था।
‘आखिर क्यों...? क्या छुपा रहे हैं ये दोनों मुझसे?’
यह सवाल मेरे दिमाग में लोहे की गर्म सलाखों की तरह चुभने लगा। मैं बिस्तर पर पड़ा-पड़ा अंदर ही अंदर तड़प उठा। मेरी छाती में इतना गुस्सा भर गया कि मेरा मन किया कि मैं एक झटके में बिस्तर से उठूँ, भागकर रसोई में जाऊं और उन दोनों पर पागलों की तरह चीखना-चिल्लाना शुरू कर दूँ!
‘क्या चल रहा है तुम दोनों के बीच? बंद करो यह नाटक! क्या रिश्ता बन गया है तुम दोनों का कि अब अपने ही बेटे से बातें छुपानी पड़ रही हैं?’
लेकिन... मैं ऐसा कर न सका… क्योंकि मैं ऐसी कोई भी बकचोदी नहीं करना चाहता था.
अगर मैं चिल्लाता, अगर मैं उन पर झपट पड़ता, तो आखिर मैं उन्हें वजह क्या बताता? क्या मैं सीधे उनके मुंह पर यह स्वीकार कर लेता कि मैं अपनी सीधी-सादी माँ पर एक घिनौना शक कर रहा हूँ? क्या मैं अपने उस दोस्त को यह बताता कि मैं उसकी हर हरकत को, उसके कपड़ों की पसंद को और उसकी हर फुसफुसाहट को एक चरित्रहीन नजरिए से देख रहा हूँ?
अगर मेरा यह शक गलत निकलता, तो मेरी माँ उस दिन मेरे सामने ही दम तोड़ देतीं। उनका मुझ पर से, अपने ही बेटे पर से भरोसा हमेशा के लिए उठ जाता… और अगर मेरा शक सही निकल भी जाता, तो भी बिना किसी सबूत के उन पर आरोप लगाने से वे दोनों कोई नया झूठ गढ़ लेते और ज्यादा सतर्क हो जाते।
इसी लाचारी और गुस्से के बवंडर में मैं अपने कमरे की चादर को उंगलियों में भींचकर रोता रहा, अंदर ही अंदर घुटता रहा।
दोपहर के एक बज चुके थे, पर मेरी फूटी किस्मत ने मेरा साथ यहाँ भी छोड़ दिया।
मैंने जो प्लान बनाया था कि दोपहर में पूरा फ्लैट खाली होगा, वह पूरी तरह से फ्लॉप हो गया। काफी देर तक इंतजार करने के बाद भी, उन दोनों में से कोई बाहर नहीं गया। मम्मी जो पिछले एक हफ्ते से रोज दोपहर को बेखौफ होकर अकेले मार्केट निकल जाती थीं, आज वह पूरे समय घर पर ही टिकी रहीं।
कारण? कारण था 'मेरा ख्याल रखना'!
मम्मी हर आधे घंटे में मेरे सिर पर गीली पट्टी रखने आतीं, कभी सूप का कटोरा लेकर आतीं, तो कभी मेरे पैर दबाने लगतीं। उनकी इस अत्यधिक सेवा भावना ने मेरे उस गुप्त प्लान की धज्जियां उड़ा दी थीं। जिस माँ की ममता पर मैं अपनी पूरी जिंदगी कुर्बान कर सकता था, आज उसी माँ की मौजूदगी मुझे एक पहरेदार की तरह लग रही थी। वह पल भर के लिए भी अपने कमरे की तरफ नहीं जा रही थीं; उनका पूरा ध्यान मेरे कमरे पर और रसोई पर था।
करीब तीन बजे के आसपास, सिर्फ इमरान ही बाहर गया।
"भाई, मैं जरा कुछ जरूरी काम से बाहर जा रहा हूँ। शाम तक लौटूँगा। कोई दवाई लानी हो तो बता दे," उसने मेरे कमरे में झांककर कहा।
"नहीं, सब ठीक है," मैंने बेमन से कहा।
इमरान तो चला गया, लेकिन मम्मी घर में ही रहीं।
वह हॉल में बैठकर कोई टीवी सीरियल देखने लगीं, और बीच-बीच में उठकर मेरे पास आकर बैठ जाती।
मैं बिस्तर पर लेटा-लेटा अपने भाग्य को कोस रहा था। मम्मी का रूम महज दस कदम की दूरी पर था। उनकी वह अलमारी, वह सूटकेस, और शायद वह डायरी मेरे सामने थी, पर बीच में मम्मी की वह अटूट मौजूदगी एक लोहे की दीवार बनकर खड़ी थी।
पूरा दिन ढल गया। मेरी बीमारी का नाटक का असल उद्देश्य तो कारगर साबित नहीं हुआ, लेकिन उस ढलती दोपहर के सन्नाटे में, उन बंद कमरों की दबी फुसफुसाहटों ने मेरे दिल में एक ऐसा ज़हर घोल दिया था, जिसका असर किसी भी दुर्घटना से ज्यादा जानलेवा था। मैं चुपचाप लेटा रहा, यह जानते हुए कि इस घर की हवा में कोई बहुत बड़ा राज सांस ले रहा था ---जिसका मुझे हल्का अंदेशा भी था, लेकिन अपने ही बुने हुए जाल में बेबस होकर तड़प रहा था।
To be Continued…


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