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Adultery FLAT MATE
#73
एपिसोड 21: मन का बवंडर

संदेह जब फेफड़ों की सांसों में समा जाए, तो इंसान खुली हवा में भी घुटने लगता है। मम्मी के उस नए वाइन-रेड सलवार-सूट, उनकी बदली हुई मुस्कान और आईने के सामने उनके संवरने के उस दृश्य ने मेरे भीतर एक ऐसा भूचाल ला दिया था, जिसकी गूंज मेरे दफ्तर की दीवारों तक सुनाई दे रही थी। मेरा वजूद दो हिस्सों में बंट चुका थाएक हिस्सा वह बेटा था जो अपनी माँ को दुनिया का सबसे पवित्र रूप मानता था, और दूसरा हिस्सा वह शक्की इंसान था जिसके सामने सबूतों की एक पूरी किताब खुली पड़ी थी।

उस दिन दफ्तर में मेरा दिल बुरी तरह घबरा रहा था। सीने के भीतर जैसे कोई लोहे की हथौड़ी चल रही थी। सामने कंप्यूटर की स्क्रीन पर डेटा और फाइलों के अक्षर घूम रहे थे, पर मेरे दिमाग में सिर्फ और सिर्फ घर का वो नजारा घूम रहा था। काम में रत्ती भर भी मन नहीं लग रहा था।

हर दस-पंद्रह मिनट में मैं अपनी डेस्क से उठता, कॉरिडोर में जाता और बालकनी में खड़े होकर एक के बाद एक सिगरेट फूंकने लगता। निकोटिन का धुआं फेफड़ों में उतरता, पर अंदर की बेचैनी कम होने का नाम नहीं लेती। कॉफी मशीन के पास जाकर ब्लैक कॉफी के डिस्पोजेबल कप खाली करना मेरी मजबूरी बन गया था। कैफीन और सिगरेट के इस जानलेवा कॉकटेल ने मेरी धड़कनों को और तेज कर दिया था। दफ्तर के कलीग्स मुझे अजीब नजरों से देख रहे थेवह लड़का जो कभी अनुशासित था, चाय-सिगरेट से दूर रहता था, आज बेतरतीब तरीके से ब्रेक पर ब्रेक लिए जा रहा था।

सिगरेट का धुआं हवा में उड़ाते हुए मेरा दिमाग चक्रव्यूह में उलझा रहता।

कभी मेरा मन इमरान पर जाकर अटक जाता—"वह कमीना! उसने मेरी मम्मी की सादगी का फायदा उठाया है। उसने अपनी बातों के जाल में मम्मी को फंसा लिया है। वही उन्हें ये तंग गले के कपड़े पहनने पर मजबूर कर रहा है। वही उन्हें अपनी बाइक पर घुमाता है।"

लेकिन अगले ही पल, मन का दूसरा कोना पलट जाता और मम्मी पर शक करने लगता—"पर क्या मम्मी इतनी नादान हैं? क्या 40 साल पार की एक समझदार औरत, जिसने पूरी जिंदगी मर्यादा में बिताई, वह किसी 22-23 साल के लड़के की बातों में आकर इस तरह बदल जाएगी? क्या मम्मी खुद भी इस बदलाव को इन्जॉय कर रही हैं? क्या उन्हें भी अपनी इस ढलती उम्र में अपनी खोई हुई सुंदरता की तारीफ सुनना अच्छा लग रहा है?"

फिर अचानक, एक गहरा अपराधबोध मुझे कसकर जकड़ लेता—"नहीं-नहीं! मैं यह क्या सोच रहा हूँ? मैं अपनी ही माँ के बारे में इतना नीच ख्याल कैसे ला सकता हूँ? और इमरान... इमरान ने तो मेरे एक्सीडेंट में अपनी जान लगा दी थी। वह तो मेरा भाई जैसा दोस्त है। क्या मैं एक शक्की मनोरोगी बनता जा रहा हूँ? क्या वे दोनों पूरी तरह बेकसूर हैं और पाप सिर्फ मेरी सोच में है?"

तभी विचारों की एक ओर आंधी ने मुझे घेरा,

"एक मिनट, आखिर ये सब हो भी कैसे रहा है? क्या ये संभव है? अम्म,... हाँ, संभव तो है क्योंकि ठीक मेरी आँखों के सामने हो रहा हैपर... पर... उसने ये संभव किया कैसे? मम्मी जब पहले-पहल यहाँ आई थी, तब तो इससे दूर ही रहती थी.... ये साला, अचानक ऐसा क्या हुआ की... नहीं, नहींसब कुछ अचानक बिल्कुल नहीं हुआ है! तकरीबन महीने भर बाद से होना शुरू हुआ है.... धीरे-धीरे! अभी याद आ रहा है... मम्मी अक्सर ही पूरे घर में, कमरों में कहीं कुछ ढूँढती रहती थी... मुझे बहुत अजीब लगा करता था, लेकिन कभी पूछा नहीं था. वो कई बार इमरान के कमरे के बंद दरवाज़े के सामने भी खड़ी रह कर कुछ न कुछ करती थी... आई मीन, उसके बंद दरवाज़े को ही बड़े गौर से देखती थीबट व्हाई? मैंने इसके बारे में भी कभी नहीं पूछा। और एक दिन जब मैं नाश्ता कर रहा था, वो तब मुझसे कुछ कहने की कोशिश कर रही थी.... पर ऑफिस जल्दी जाने की भागदौड़ में मैंने न तो उनकी पूरी बात सुनी और न ही बाद में जानने की कोई कोशिश की.. शिट!"

मुझे अचानक से वो दिन याद आने लगा जब मैं अपनी ही धुन में खोया, नाश्ता कर रहा थामम्मी बगल की कुर्सी में बैठ कर मेरी ओर देख रही थी और बीच-बीच में इमरान के कमरे के बंद दरवाज़े की ओर भी देख रही थी... मुझसे कुछ कहने की कोशिश कर रही थीपर मैंने ध्यान देना ज़रूरी नहीं समझा था.. जब मैं ऑफिस के लिए निकल रहा था, उस समय वो दरवाज़े के पास खड़ी मुझे जाते हुए देख रही थीउनके चेहरे के भाव ही ऐसे बन रहे थे कि मानो आज नहीं बोली तो शायद बहुत देर हो जाएगी।

मैंने सोचा भी था की ऑफिस से लौट कर घर में आराम करते हुए मम्मी से पूरी बात जान लूँगा। फिर ये सोच कर नहीं पूछा था कि शायद बीरभूम में स्थित हमारे घर की याद सता रही होगी, उसी के बारे में बात करना चाहती होगी।

कुछ दिन उस घर की याद आएगी, फिर खुद ही यहाँ ढल जाएगी। यहाँ मन लग जाएगा इनका

पर ऐसा क्या हो सकता है जिसने इनका दिल और दिमाग, दोनों को ही....

मुझे आगे सोचने लायक और कोई शब्द, कोई घटना, कोई बात... कुछ नहीं सूझा।

वैसे भी, विचारों की आँधी मेरे मन में जब चाहे तब बवंडर बना ही रहे थे पिछले कुछ समय से...

यह विचारों का ऐसा झूला था जो मुझे हर सेकंड एक छोर से दूसरे छोर पर फेंक रहा था।

मैं कॉफी का कप थामे बालकनी की ग्रिल पर टेक लगाकर खड़ा हो जाता और अपनी याददाश्त की परतों को उधेड़ने लगता। मैं इमरान और मम्मी के बीच हुई बातचीत के दौरान उनके चेहरों के हाव-भाव को याद करने की कोशिश करता।

मुझे याद आता कि कैसे जब इमरान मम्मी से बात करता था, तो उसकी आँखों में एक अजीब सी टकटकी और सम्मोहन होता था, पर साथ ही एक अजीब सा खिंचाव भी। और मम्मी? मम्मी जब इमरान की तरफ देखती थीं, तो शुरुआत में उनके चेहरे पर डर और सहम जाने के भाव होते थे, लेकिन अब... अब उन आँखों में एक नया संकोच था, एक ऐसी हया या झिझक थी जो कोई औरत किसी खास इंसान के सामने महसूस करती है। जब इमरान उनकी तारीफ करता, तो मम्मी की नजरें नीचे झुक जाती थीं और उनके गालों पर एक हल्की सी लाली छा जाती थी।

क्या यह किसी सम्मोहन का असर था? या फिर यह दो इंसानों के बीच पनपते किसी नए, अनकहे रिश्ते की शुरुआत थी? ये यादें मेरे कलेजे को आरी की तरह काट रही थीं।

इसी मानसिक उथल-पुथल, सिगरेट के धुएं और कॉफी की कड़वाहट के बीच, दोपहर के करीब तीन बजे, जब मैं अपनी डेस्क पर सिर पकड़े बैठा था... तभी अचानक मेरे दिमाग में एक बात कौंधी!

एक ऐसी बात, जिसने पल भर के लिए मेरी सांसें रोक दीं।

मुझे अचानक याद आया कि बीरभूम में रहने के दौरान, मम्मी की एक बहुत ही खास आदत थी। आदत क्या... एक तरह से कहा जाए तो उनके लिए वह एक 'ला-इलाज बीमारी' थी--- वह अपनी दिनचर्या, अपने मन की उलझनों, अपनी खुशियों और अपने सबसे गहरे राज़ को एक डायरी में लिखा करती थीं।

पापा के जाने के बाद तो उनकी यह आदत और भी गहरी हो गई थी

हर रात सोने से पहले, वह अपनी उस बंद डायरी में बीरभूम के उस शांत घर की खामोशियों को शब्दों में ढालती थीं। आस-पड़ोस की बातें, पड़ोसियों से हुई अनेकानेक बातें, वहाँ का वातावरण, बच्चे, बूढ़े, जवान, धूप-गर्मी, बरसात, सर्दी, इत्यादि। सब कुछ लिखती थीं वो... वह किसी से अपना दर्द नहीं बांटती थीं, बस उस पन्ने पर लिख देती थीं। उनकी अलमारी का वह कोना हमेशा उस डायरी का गवाह रहता था।

जैसे ही यह याद मेरे जेहन में आई, मेरा पूरा शरीर ठंडा पड़ गया।

"क्या..." दफ्तर के उस वातानुकूलित केबिन में बैठ-बैठे मुझे पसीना आने लगा,

"….क्या मम्मी अब भी लिखती होंगी? क्या इस बड़े शहर में, इस नए फ्लैट में आने के बाद भी उनकी वह 'बीमारी', वह आदत जिंदा होगी?"

और अगर वह अब भी लिखती हैं... तो क्या?

विचारों का एक भयानक बवंडर मेरे सिर में घूमने लगा। अगर मम्मी आज भी डायरी लिख रही हैं, तो क्या वह अपने भीतर आए इन बदलावों के बारे में लिख रही होंगी? क्या वह उस वाइन-रेड सलवार-सूट और उस बुटीक के सच के बारे में भी लिख रही होंगी? क्या उस डायरी के पन्नों पर इमरान का नाम दर्ज होगा? क्या वह इमरान के साथ बिताए उन एकांत पलों, उस बालकनी की रातों का सच लिख रही होंगी? और सबसे बढ़कर... क्या वह मेरे बारे में, मेरे इस बदले हुए शक्की मिजाज और मेरी इस घुटन के बारे में भी लिख रही होंगी?

और... इमरान... क्या उसके बारे में भी?!

"हे भगवान..." यह ख्याल आते ही मेरा दिल धक्क से रह गया!

ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरी छाती पर भारी पत्थर रख दिया हो। मेरी हथेली से कॉफी का प्लास्टिक कप छूटते-छूटते बचा। अगर वह डायरी इस शहर में, इस फ्लैट में मौजूद है... तो इसका मतलब था कि सारे सवालों के जवाब, सारे रहस्य, सारे काले और सफेद सच उस डायरी के पन्नों में कैद होंगे!

वह डायरी सिर्फ एक पन्ना नहीं थी, वह मेरी माँ की आत्मा का आईना थी। उसमें कोई झूठ नहीं हो सकता था। उसमें न तो इमरान की 'स्मार्ट टॉकिंग' का पर्दा हो सकता था और न ही मम्मी की झूठी मुस्कान का ढोंग। उसमें जो भी लिखा होगा, वह नग्न और कड़वा सच होगा।

मेरी आँखों के सामने दफ्तर का कंप्यूटर, कलीग्स और फाइलें सब धुंधली हो गईं। अब मुझे सिर्फ एक ही चीज़ दिखाई दे रही थीअपने फ्लैट की वह अलमारी, या मम्मी का वह सूटकेस, जहाँ वह डायरी छिपी हो सकती थी।

मेरा मन किया कि मैं अभी इसी वक्त सब कुछ छोड़-छाड़कर घर भाग जाऊं। जब तक मम्मी बाज़ार में हों या इमरान अपने कमरे में न हो, मैं उस डायरी को ढूंढ निकालूं और एक ही सांस में पढ़ डालूं कि आखिर इस घर की आबो-हवा में कौन सा ज़हर घुला हुआ है। लेकिन साथ ही, एक खौफनाक डर भी मेरे मन में बैठ गयाअगर उस डायरी में कुछ ऐसा लिखा हुआ निकला, जिसे पढ़ने के बाद मेरी माँ की छवि मेरे दिल में हमेशा के लिए चकनाचूर हो जाए, तो क्या मैं उस सच का बोझ सह पाऊंगा?

दफ्तर की घड़ी की सुइयां टिक-टिक कर रही थीं, पर मेरी जिंदगी का वक्त उस एक सवाल पर आकर ठहर गया थाक्या वह डायरी सच में लिखी जा रही थी?
 



To be Continued…
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FLAT MATE - by The_Writer - 18-05-2026, 09:35 PM
RE: FLAT MATE - by The_Writer - 19-05-2026, 01:17 PM
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RE: FLAT MATE - by The_Writer - 01-09-2026, 10:25 AM
RE: FLAT MATE - by Smalldick - 31-08-2026, 06:45 AM
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RE: FLAT MATE - by dragonslair - 31-08-2026, 07:58 AM
RE: FLAT MATE - by Skb21 - 31-08-2026, 09:00 AM
RE: FLAT MATE - by KkkNad - 31-08-2026, 11:59 AM
RE: FLAT MATE - by Skb21 - 31-08-2026, 02:04 PM
RE: FLAT MATE - by LENNY - 31-08-2026, 02:10 PM
RE: FLAT MATE - by The_Writer - 01-09-2026, 10:24 AM
RE: FLAT MATE - by The_Writer - 01-09-2026, 10:28 AM
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RE: FLAT MATE - by Vikrant pelu - 02-09-2026, 09:56 AM
RE: FLAT MATE - by The_Writer - 08-09-2026, 02:40 PM
RE: FLAT MATE - by PakeezaAmmi - 02-09-2026, 11:27 AM
RE: FLAT MATE - by Bentley - 02-09-2026, 12:23 PM
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RE: FLAT MATE - by Minki - 02-09-2026, 11:05 PM
RE: FLAT MATE - by abhishek.kumar - 04-09-2026, 10:55 AM
RE: FLAT MATE - by Cxer - 06-09-2026, 07:10 PM
RE: FLAT MATE - by momass - 07-09-2026, 07:43 AM
RE: FLAT MATE - by The_Writer - 08-09-2026, 02:42 PM
RE: FLAT MATE - by KkkNad - 07-09-2026, 04:05 PM
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RE: FLAT MATE - by Rexd_101 - 09-09-2026, 03:15 AM
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RE: FLAT MATE - by momass - 10-09-2026, 08:21 AM
RE: FLAT MATE - by SANJUbaba@001 - 10-09-2026, 12:14 PM
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RE: FLAT MATE - by abhishek.kumar - 11-09-2026, 05:39 PM
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RE: FLAT MATE - by Cxer - 19-09-2026, 07:51 PM
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RE: FLAT MATE - by SANJUbaba@001 - 21-09-2026, 09:20 PM
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