06-08-2026, 10:27 PM
एपिसोड 19: वाज़िब.... लेकिन... बेबुनियाद
शंका एक ऐसा धीमा ज़हर है जो इंसान के सोचने-समझने की पूरी तासीर बदल देता है। जब आपके मन में एक बार अविश्वास का बीजारोपण हो जाए, तो सामान्य से सामान्य घटना भी किसी बहुत बड़ी साज़िश का हिस्सा लगने लगती है। मैं अपनी ही माँ और अपने दोस्त के बीच की इन अदृश्य कड़ियों को जोड़ने में लगा हुआ था, पर हर नया दिन मेरे लिए एक नया मोड़, एक नई उलझन लेकर आ रहा था।
पिछले कुछ दिनों से मैंने मम्मी में एक बहुत ही छोटा, लेकिन बेहद चौंकाने वाला बदलाव नोटिस करना शुरू किया था। एक ऐसा बदलाव जिसे कोई भी गैर-इंसान या दूर का व्यक्ति शायद नज़रअंदाज़ कर देता, लेकिन मैं... मैं तो जैसे अपनी माँ के हर एक कदम, उनकी हर एक सांस पर किसी जासूस की तरह निगाह गड़ाए बैठा था।
बदलाव यह था कि मम्मी आजकल अक्सर अकेली ही बाज़ार या लोकल मार्केट के लिए निकल जाया करती थीं।
यह वही महिला थीं, जो बीरभूम से इस महानगर में आते वक्त ट्रेन के डिब्बे से बाहर झांकने में भी कतराती थीं। जिन्हें शुरुआत में इस बड़े शहर का नाम सुनकर ही घबराहट होने लगती थी, जो फ्लैट की बालकनी से नीचे गाड़ियों के शोर और भागते-दौड़ते लोगों को देखकर सिर पकड़ लिया करती थीं और मुझसे कहती थीं,
"देव, मुझे अकेले बाहर मत छोड़ना, मैं तो रास्ता ही भूल जाऊंगी।"
लेकिन पिछले करीब एक सप्ताह से, मैं देख रहा था कि मम्मी बिना किसी हिचकिचाहट के, बेखौफ होकर अकेले ही मार्केट के लिए निकल जाती थीं। वह घर से निकलतीं, और दो-तीन घंटे बाहर एक अच्छा-खासा समय बिताकर वापस लौटती थीं। जब वह लौटतीं, तो उनके चेहरे पर वह पुराना डर या अजनबीपन नहीं होता था, बल्कि एक अजीब सी आत्मसंतुष्टि और सुकून होता था।
इतना ही नहीं, पिछले सात दिनों में दो बार तो मैंने खुद देखा कि वह इमरान के साथ भी बाहर गई थीं। जब मैंने पहली बार इमरान को उसकी बाइक पर मम्मी को पीछे बैठाकर ले जाते देखा, तो मेरे पैरों तले की जमीन खिसक गई थी,
"मम्मी, आप इमरान के साथ कहाँ जा रही हैं?" मैंने उस दिन फ्लैट के दरवाजे पर ही उन्हें रोककर पूछा था।
मम्मी ने अपनी साड़ी का पल्लू संभाला और बेहद सहजता से मुस्कुराकर कहा,
"अरे, कुछ घर का जरूरी सामान लेना था… तू तो दफ्तर के काम में व्यस्त रहता है, तो इमरान ने ही कहा कि वह मुझे पास वाले सुपरमार्केट ले जाएगा। तू बेकार में चिंता करता है।"
उनका लहजा इतना स्वाभाविक था कि मेरे पास कोई सवाल ही नहीं बचा था…
लेकिन मेरा अंतर्मन जल रहा था… जो माँ किसी गैर के साथ बात करने में भी संकोच करती थीं, वह आज मेरे दोस्त की बाइक पर बैठकर शहर के चक्कर काट रही थीं? और इमरान... वह इमरान जो कभी दोपहर 12:00 – 12:30 बजे से पहले बिस्तर से नहीं उठता था, वह सुबह-सुबह तैयार होकर मम्मी को शॉपिंग पर ले जा रहा था!
लेकिन बात सिर्फ अकेले बाहर जाने या इमरान के साथ वक्त बिताने तक सीमित नहीं थी…
….. बदलाव उससे भी ज्यादा गहरा और व्यक्तिगत था।
मैंने गौर किया कि अब मम्मी के पहनावे में, उनके सजने-संवरने के ढर्रे में भी एक स्पष्ट परिवर्तन आ गया था। बीरभूम में मम्मी हमेशा ढीले-ढाले, सादे सूती ब्लाउज और पारंपरिक तरीके से पहनी गई साड़ियों में नजर आती थीं। उनके सलवार-कमीज भी बहुत साधारण और ढीले-ढाले हुआ करते थे, जिन्हें वह सिर्फ घर की साफ-सफाई या यात्रा के वक्त ही पहनती थीं।
पर अब?
अब उनके साड़ी-ब्लाउज और सलवार-कमीज पहनने के अंदाज में एक अजीब सी आधुनिकता और कसाव आ गया था।
उनके ब्लाउज के कट और उनके सलवार-सूट की फिटिंग में एक नया सलीका दिखने लगा था। आगे और पीछे,... दोनों ही जगहों से गहराई थोड़ी डीप होने लगी थी....! साथ ही, वह कपड़े पहनते वक्त आइने के सामने थोड़ा ज्यादा वक्त बिताने लगी थीं। उनके बालों का जूड़ा, जो पहले थोड़ा बेतरतीब होता था, अब सलीके से बंधा होता था। यहाँ तक कि उनकी साड़ियों की प्लेट्स और पल्लू को ढालने का तरीका भी काफी हद तक इस शहर की मध्यमवयस्क महिलाओं जैसा स्टाइलिश होने लगा था।
एक दिन जब वह बाज़ार जाने के लिए तैयार होकर अपने कमरे से निकलीं, तो मैंने उन्हें गौर से देखा। उन्होंने एक हल्के गहरे नीले रंग का सलवार-सूट पहन रखा था जो उन पर बहुत जंच रहा था। उनका साइड प्रोफाइल... बिल्कुल वैसा ही दिख रहा था जैसी तस्वीरें इमरान उस रात अपने लैपटॉप पर ज़ूम करके देख रहा था और उन पर शोध कर रहा था!
मेरा दिल दहल गया…
क्या यह सब महज एक इत्तेफाक था? क्या एक महिला का बड़े शहर में आकर अपने पहनावे को थोड़ा बदलना और आत्मनिर्भर बनना कोई अपराध था?
इसी सवाल ने मेरे भीतर अंतर्द्वंद्व का एक भयानक बवंडर खड़ा कर दिया था।
मैं अपने कमरे में अकेला बैठा सोचता रहता। मेरे पास शक करने का समुचित कारण था। एक के बाद एक कई कड़ियां जुड़ रही थीं—इमरान का उस रजिस्टर को पढ़ना, लैपटॉप पर मम्मी की तस्वीरों की बारीकियों को घंटों निहारना, फिर अचानक मेरे एक्सीडेंट के बाद उसका वापस आना और मम्मी का उसके प्रति पूरी तरह बदल जाना। और अब, मम्मी का यह अचानक बेखौफ होकर बाहर जाना, अपने लुक्स और पहनावे में बदलाव लाना, और इमरान के साथ इतनी घनिष्ठता...
ये सारे कारण एक शक्की इंसान के लिए किसी भी खौफनाक नतीजे तक पहुंचने के लिए काफी थे। मेरे भीतर का 'जासूस' चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा था कि इमरान अपनी किसी गुप्त मनोरथ के तहत मम्मी को प्रभावित कर रहा है, और मम्मी जाने-अनजाने उसके जाल में फंसती जा रही हैं।
लेकिन... जैसे ही मेरा तार्किक मन इन कारणों का विश्लेषण करता, मुझे यह सारे कारण बेहद खोखले और अपर्याप्त लगने लगते।
"देव, तू पागल हो गया है क्या?" मैं आइने में अपने खुद के चेहरे को देखकर खुद से ही बहस करने लगता..
"तू किस पर शक कर रहा है? अपनी माँ पर? जिन्होंने पूरी जिंदगी तेरे और पापा के अलावा किसी तीसरे इंसान के बारे में सोचा तक नहीं? क्या एक 40 साल की महिला, जो अब भी दिखने में ढलती उम्र की खूबसूरत औरत लगती है, अगर इस नए शहर में आकर थोड़ा खुलकर जीना चाहती है, तो क्या वह गलत हो गई?"
मेरा मन दूसरा तर्क देता कि अगर कोई औरत सालों के अकेलेपन के बाद, अपने पति के जाने के बाद, पहली बार किसी नए शहर में आकर थोड़ा आत्मविश्वास महसूस कर रही है, अकेली बाज़ार जाना सीख रही है, और अपने पहनावे को थोड़ा बेहतर बना रही है, तो इसमें बुराई क्या है? क्या अपनी बीती ज़िंदगी की तन्हाई से निकलकर अगर वह यहाँ थोड़ा सा जीवन महसूस कर रही हैं, तो एक बेटे के तौर पर मुझे खुश होना चाहिए…?
या, उन पर घिनौना शक करना चाहिए?
और इमरान...
….. क्या इमरान वाकई कोई साज़िश रच रहा था?
हो सकता है कि वह सचमुच एक अच्छा दोस्त हो… उसने मेरे एक्सीडेंट के वक्त अस्पताल से लेकर घर तक हर वो काम किया जो एक सगा भाई करता। हो सकता है कि मेरी सीधी-साधी माँ में उसे अपनी माँ की छवि दिखती हो, और वह बस उन्हें इस शहर से रूबरू करा रहा हो। जहाँ तक उस रहस्यमयी रजिस्टर या तस्वीरों को देखने का सवाल था—हो सकता है कि वह सचमुच जैसा कहता था, एक आर्टिस्टिक या फोटोग्राफिक नज़रिए से ही उन्हें देखता हो??!
"नहीं... नहीं! यह सब इतना सीधा नहीं हो सकता," ये सब कुछ सोचते - सोचते मैं अपना सिर पकड़कर बैठ जाता था।
शक का यह दायरा मुझे निगल रहा था… मेरे पास पर्याप्त सबूत थे, पर एक भी सबूत ऐसा नहीं था जो ठोस अदालत में या खुद मेरे संस्कारों की अदालत में टिक सके…. सब कुछ 'संभावनाओं' और 'आभासों' पर टिका था…. अगर मैं आज जाकर मम्मी से कहूँ कि,
"आप आजकल अच्छे कपड़े पहनकर अकेले बाज़ार क्यों जाती हैं?"
तो वह मुझ पर हँसेंगी या फिर इस घिनौने संशय को महसूस करके अंदर तक टूट जाएँगी… और अगर मैं इमरान का कॉलर पकड़कर पूछूँ कि,
"तू मेरी माँ को अपनी बाइक पर क्यों घुमाता है?" तो वह मुझे नासमझ, एहसानफ़रामोश कहेगा और हँस कर बात टाल देगा।
मैं एक ऐसी दहलीज पर खड़ा था जहाँ से आगे बढ़ने पर सिर्फ अपनों के विश्वास का कत्ल होता, और पीछे हटने पर उस अनजाने खौफनाक सच का ख़तरा था जो शायद इस घर की दीवारों में खामोशी से अपना जाल बुन रहा था।
उस शाम, जब मम्मी बाज़ार से लौटीं, तो उनके हाथ में बेला के फूलों की एक छोटी सी लड़ी थी..! उन्होंने उसे बड़ी सादगी से अपने जुड़े में सजाया… रसोई में काम करते वक्त उनकी पीठ मेरी तरफ थी, और वह कोई पुराना लोकगीत बहुत धीमी आवाज़ में गुनगुना रही थीं।
मैंने दरवाजे के पीछे छिपे रहकर उन्हें देखा…
उनकी वह बदली हुई वेशभूषा, वह बेफिक्री, और उनका वह गुनगुनाना... मेरे दिल को एक साथ सुकून भी दे रहा था और शक की एक नई फ़ांस बनकर कलेजे में चुभ भी रहा था। मैं समझ नहीं पा रहा था कि यह मेरी माँ का एक नया, आत्मनिर्भर रूप था... या फिर किसी बहुत बड़े तूफ़ान से पहले की एक भयावह, सुंदर शांति..??!
To be continued…
शंका एक ऐसा धीमा ज़हर है जो इंसान के सोचने-समझने की पूरी तासीर बदल देता है। जब आपके मन में एक बार अविश्वास का बीजारोपण हो जाए, तो सामान्य से सामान्य घटना भी किसी बहुत बड़ी साज़िश का हिस्सा लगने लगती है। मैं अपनी ही माँ और अपने दोस्त के बीच की इन अदृश्य कड़ियों को जोड़ने में लगा हुआ था, पर हर नया दिन मेरे लिए एक नया मोड़, एक नई उलझन लेकर आ रहा था।
पिछले कुछ दिनों से मैंने मम्मी में एक बहुत ही छोटा, लेकिन बेहद चौंकाने वाला बदलाव नोटिस करना शुरू किया था। एक ऐसा बदलाव जिसे कोई भी गैर-इंसान या दूर का व्यक्ति शायद नज़रअंदाज़ कर देता, लेकिन मैं... मैं तो जैसे अपनी माँ के हर एक कदम, उनकी हर एक सांस पर किसी जासूस की तरह निगाह गड़ाए बैठा था।
बदलाव यह था कि मम्मी आजकल अक्सर अकेली ही बाज़ार या लोकल मार्केट के लिए निकल जाया करती थीं।
यह वही महिला थीं, जो बीरभूम से इस महानगर में आते वक्त ट्रेन के डिब्बे से बाहर झांकने में भी कतराती थीं। जिन्हें शुरुआत में इस बड़े शहर का नाम सुनकर ही घबराहट होने लगती थी, जो फ्लैट की बालकनी से नीचे गाड़ियों के शोर और भागते-दौड़ते लोगों को देखकर सिर पकड़ लिया करती थीं और मुझसे कहती थीं,
"देव, मुझे अकेले बाहर मत छोड़ना, मैं तो रास्ता ही भूल जाऊंगी।"
लेकिन पिछले करीब एक सप्ताह से, मैं देख रहा था कि मम्मी बिना किसी हिचकिचाहट के, बेखौफ होकर अकेले ही मार्केट के लिए निकल जाती थीं। वह घर से निकलतीं, और दो-तीन घंटे बाहर एक अच्छा-खासा समय बिताकर वापस लौटती थीं। जब वह लौटतीं, तो उनके चेहरे पर वह पुराना डर या अजनबीपन नहीं होता था, बल्कि एक अजीब सी आत्मसंतुष्टि और सुकून होता था।
इतना ही नहीं, पिछले सात दिनों में दो बार तो मैंने खुद देखा कि वह इमरान के साथ भी बाहर गई थीं। जब मैंने पहली बार इमरान को उसकी बाइक पर मम्मी को पीछे बैठाकर ले जाते देखा, तो मेरे पैरों तले की जमीन खिसक गई थी,
"मम्मी, आप इमरान के साथ कहाँ जा रही हैं?" मैंने उस दिन फ्लैट के दरवाजे पर ही उन्हें रोककर पूछा था।
मम्मी ने अपनी साड़ी का पल्लू संभाला और बेहद सहजता से मुस्कुराकर कहा,
"अरे, कुछ घर का जरूरी सामान लेना था… तू तो दफ्तर के काम में व्यस्त रहता है, तो इमरान ने ही कहा कि वह मुझे पास वाले सुपरमार्केट ले जाएगा। तू बेकार में चिंता करता है।"
उनका लहजा इतना स्वाभाविक था कि मेरे पास कोई सवाल ही नहीं बचा था…
लेकिन मेरा अंतर्मन जल रहा था… जो माँ किसी गैर के साथ बात करने में भी संकोच करती थीं, वह आज मेरे दोस्त की बाइक पर बैठकर शहर के चक्कर काट रही थीं? और इमरान... वह इमरान जो कभी दोपहर 12:00 – 12:30 बजे से पहले बिस्तर से नहीं उठता था, वह सुबह-सुबह तैयार होकर मम्मी को शॉपिंग पर ले जा रहा था!
लेकिन बात सिर्फ अकेले बाहर जाने या इमरान के साथ वक्त बिताने तक सीमित नहीं थी…
….. बदलाव उससे भी ज्यादा गहरा और व्यक्तिगत था।
मैंने गौर किया कि अब मम्मी के पहनावे में, उनके सजने-संवरने के ढर्रे में भी एक स्पष्ट परिवर्तन आ गया था। बीरभूम में मम्मी हमेशा ढीले-ढाले, सादे सूती ब्लाउज और पारंपरिक तरीके से पहनी गई साड़ियों में नजर आती थीं। उनके सलवार-कमीज भी बहुत साधारण और ढीले-ढाले हुआ करते थे, जिन्हें वह सिर्फ घर की साफ-सफाई या यात्रा के वक्त ही पहनती थीं।
पर अब?
अब उनके साड़ी-ब्लाउज और सलवार-कमीज पहनने के अंदाज में एक अजीब सी आधुनिकता और कसाव आ गया था।
उनके ब्लाउज के कट और उनके सलवार-सूट की फिटिंग में एक नया सलीका दिखने लगा था। आगे और पीछे,... दोनों ही जगहों से गहराई थोड़ी डीप होने लगी थी....! साथ ही, वह कपड़े पहनते वक्त आइने के सामने थोड़ा ज्यादा वक्त बिताने लगी थीं। उनके बालों का जूड़ा, जो पहले थोड़ा बेतरतीब होता था, अब सलीके से बंधा होता था। यहाँ तक कि उनकी साड़ियों की प्लेट्स और पल्लू को ढालने का तरीका भी काफी हद तक इस शहर की मध्यमवयस्क महिलाओं जैसा स्टाइलिश होने लगा था।
एक दिन जब वह बाज़ार जाने के लिए तैयार होकर अपने कमरे से निकलीं, तो मैंने उन्हें गौर से देखा। उन्होंने एक हल्के गहरे नीले रंग का सलवार-सूट पहन रखा था जो उन पर बहुत जंच रहा था। उनका साइड प्रोफाइल... बिल्कुल वैसा ही दिख रहा था जैसी तस्वीरें इमरान उस रात अपने लैपटॉप पर ज़ूम करके देख रहा था और उन पर शोध कर रहा था!
मेरा दिल दहल गया…
क्या यह सब महज एक इत्तेफाक था? क्या एक महिला का बड़े शहर में आकर अपने पहनावे को थोड़ा बदलना और आत्मनिर्भर बनना कोई अपराध था?
इसी सवाल ने मेरे भीतर अंतर्द्वंद्व का एक भयानक बवंडर खड़ा कर दिया था।
मैं अपने कमरे में अकेला बैठा सोचता रहता। मेरे पास शक करने का समुचित कारण था। एक के बाद एक कई कड़ियां जुड़ रही थीं—इमरान का उस रजिस्टर को पढ़ना, लैपटॉप पर मम्मी की तस्वीरों की बारीकियों को घंटों निहारना, फिर अचानक मेरे एक्सीडेंट के बाद उसका वापस आना और मम्मी का उसके प्रति पूरी तरह बदल जाना। और अब, मम्मी का यह अचानक बेखौफ होकर बाहर जाना, अपने लुक्स और पहनावे में बदलाव लाना, और इमरान के साथ इतनी घनिष्ठता...
ये सारे कारण एक शक्की इंसान के लिए किसी भी खौफनाक नतीजे तक पहुंचने के लिए काफी थे। मेरे भीतर का 'जासूस' चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा था कि इमरान अपनी किसी गुप्त मनोरथ के तहत मम्मी को प्रभावित कर रहा है, और मम्मी जाने-अनजाने उसके जाल में फंसती जा रही हैं।
लेकिन... जैसे ही मेरा तार्किक मन इन कारणों का विश्लेषण करता, मुझे यह सारे कारण बेहद खोखले और अपर्याप्त लगने लगते।
"देव, तू पागल हो गया है क्या?" मैं आइने में अपने खुद के चेहरे को देखकर खुद से ही बहस करने लगता..
"तू किस पर शक कर रहा है? अपनी माँ पर? जिन्होंने पूरी जिंदगी तेरे और पापा के अलावा किसी तीसरे इंसान के बारे में सोचा तक नहीं? क्या एक 40 साल की महिला, जो अब भी दिखने में ढलती उम्र की खूबसूरत औरत लगती है, अगर इस नए शहर में आकर थोड़ा खुलकर जीना चाहती है, तो क्या वह गलत हो गई?"
मेरा मन दूसरा तर्क देता कि अगर कोई औरत सालों के अकेलेपन के बाद, अपने पति के जाने के बाद, पहली बार किसी नए शहर में आकर थोड़ा आत्मविश्वास महसूस कर रही है, अकेली बाज़ार जाना सीख रही है, और अपने पहनावे को थोड़ा बेहतर बना रही है, तो इसमें बुराई क्या है? क्या अपनी बीती ज़िंदगी की तन्हाई से निकलकर अगर वह यहाँ थोड़ा सा जीवन महसूस कर रही हैं, तो एक बेटे के तौर पर मुझे खुश होना चाहिए…?
या, उन पर घिनौना शक करना चाहिए?
और इमरान...
….. क्या इमरान वाकई कोई साज़िश रच रहा था?
हो सकता है कि वह सचमुच एक अच्छा दोस्त हो… उसने मेरे एक्सीडेंट के वक्त अस्पताल से लेकर घर तक हर वो काम किया जो एक सगा भाई करता। हो सकता है कि मेरी सीधी-साधी माँ में उसे अपनी माँ की छवि दिखती हो, और वह बस उन्हें इस शहर से रूबरू करा रहा हो। जहाँ तक उस रहस्यमयी रजिस्टर या तस्वीरों को देखने का सवाल था—हो सकता है कि वह सचमुच जैसा कहता था, एक आर्टिस्टिक या फोटोग्राफिक नज़रिए से ही उन्हें देखता हो??!
"नहीं... नहीं! यह सब इतना सीधा नहीं हो सकता," ये सब कुछ सोचते - सोचते मैं अपना सिर पकड़कर बैठ जाता था।
शक का यह दायरा मुझे निगल रहा था… मेरे पास पर्याप्त सबूत थे, पर एक भी सबूत ऐसा नहीं था जो ठोस अदालत में या खुद मेरे संस्कारों की अदालत में टिक सके…. सब कुछ 'संभावनाओं' और 'आभासों' पर टिका था…. अगर मैं आज जाकर मम्मी से कहूँ कि,
"आप आजकल अच्छे कपड़े पहनकर अकेले बाज़ार क्यों जाती हैं?"
तो वह मुझ पर हँसेंगी या फिर इस घिनौने संशय को महसूस करके अंदर तक टूट जाएँगी… और अगर मैं इमरान का कॉलर पकड़कर पूछूँ कि,
"तू मेरी माँ को अपनी बाइक पर क्यों घुमाता है?" तो वह मुझे नासमझ, एहसानफ़रामोश कहेगा और हँस कर बात टाल देगा।
मैं एक ऐसी दहलीज पर खड़ा था जहाँ से आगे बढ़ने पर सिर्फ अपनों के विश्वास का कत्ल होता, और पीछे हटने पर उस अनजाने खौफनाक सच का ख़तरा था जो शायद इस घर की दीवारों में खामोशी से अपना जाल बुन रहा था।
उस शाम, जब मम्मी बाज़ार से लौटीं, तो उनके हाथ में बेला के फूलों की एक छोटी सी लड़ी थी..! उन्होंने उसे बड़ी सादगी से अपने जुड़े में सजाया… रसोई में काम करते वक्त उनकी पीठ मेरी तरफ थी, और वह कोई पुराना लोकगीत बहुत धीमी आवाज़ में गुनगुना रही थीं।
मैंने दरवाजे के पीछे छिपे रहकर उन्हें देखा…
उनकी वह बदली हुई वेशभूषा, वह बेफिक्री, और उनका वह गुनगुनाना... मेरे दिल को एक साथ सुकून भी दे रहा था और शक की एक नई फ़ांस बनकर कलेजे में चुभ भी रहा था। मैं समझ नहीं पा रहा था कि यह मेरी माँ का एक नया, आत्मनिर्भर रूप था... या फिर किसी बहुत बड़े तूफ़ान से पहले की एक भयावह, सुंदर शांति..??!
To be continued…


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