30-07-2026, 11:51 PM
एपिसोड 17: खामोश सन्नाटा
डॉक्टर द्वारा बताए गए दो हफ़्तों के बेडरेस्ट और फिर कुछ दिन ऊपर की एहतियात को मिलाकर, पूरे बाईस दिनों के लंबे इंतजार के बाद आखिरकार वह दिन आया जब मैंने दोबारा अपनी सामान्य जिंदगी की पटरी पर कदम रखा। इतने दिनों तक फ्लैट के एक ही कमरे में, बिस्तर पर पड़े-पड़े मैं भीतर तक ऊब चुका था। पैर की पट्टियां तो खुल चुकी थीं, लेकिन जब बाईस दिन बाद मैंने पहली बार अपनी बाइक को स्टैंड से उतारा, तो पैर में एक हल्की सी जकड़न महसूस हुई। शुरुआत में थोड़ा मुश्किल हुआ; पैर पर वजन देकर किक मारना और क्लच-गियर का तालमेल बिठाना थोड़ा दर्दनाक था। लेकिन मुझे दफ्तर जाना ही था, कॉर्पोरेट की दुनिया ज्यादा दिन किसी का इंतजार नहीं करती। सो, मैंने थोड़ा दर्द सहा और बाइक स्टार्ट करके निकल पड़ा।
इतने दिनों के लंबे और उबाऊ गैप के बाद वापस अपने दफ्तर की बिल्डिंग में कदम रखना सचमुच बहुत अच्छा लगा। जब आप एक दुर्घटना से उबरकर वापस आते हैं, तो काम का बोझ भी आपको बोझ नहीं, बल्कि जिंदगी की जीवंतता का अहसास कराता है। मेरे केबिन में कदम रखते ही दफ्तर के साथियों, गार्ड्स और स्टाफ के चेहरों पर जो मुस्कान थी, उसने मेरा दिल जीत लिया। कलीग्स ने मेरे ठीक होकर लौटने की खुशी में दफ्तर के ही कॉन्फ्रेंस रूम में शाम को एक छोटी सी वेलकम-बैक पार्टी भी रखी थी। समोसे, पेस्ट्री और चाय के दौर के बीच सबने मेरे एक्सीडेंट वाले दिन की बातें कीं और मेरा हौसला बढ़ाया।
इसी मेल-मुलाकात और पेंडिंग पड़े कामों को थोड़ा-बहुत निपटाने के चक्कर में दफ्तर में वक्त का पता ही नहीं चला। जब मैंने घड़ी देखी, तो रात के काफी बज चुके थे। इतने दिनों बाद काम करने के कारण शरीर जवाब दे रहा था, पर मन में एक तसल्ली थी।
जब मैं अपनी बाइक से अपने मोहल्ले में दाखिल हुआ और गली के आखिरी मोड़ से मैंने अपने फ्लैट की ऊंची इमारत की तरफ देखा, तो मेरी नजरें सीधे हमारी बालकनी पर गईं। वहां का दृश्य देखकर मेरी बाइक के एक्सीलेटर पर टिकी उंगलियां एक पल के लिए ढीली पड़ गईं।
हॉल की मद्धम रोशनी बालकनी तक आ रही थी। वहाँ दो कुर्सियाँ लगी थीं। एक कुर्सी पर मम्मी बैठी थीं और दूसरी पर इमरान। दोनों बेहद डूबे हुए अंदाज में, धीमी आवाज में कोई गंभीर बात कर रहे थे। बीच-बीच में इमरान कुछ कहता, तो मम्मी सहमति में सिर हिलातीं। दूरी इतनी थी कि मैं उनके शब्द नहीं सुन सकता था, पर उनकी शारीरिक भाषा साफ बता रही थी कि दोनों के बीच अब शायद कोई अजनबीपन या संकोच नहीं बचा था...
उनके पास ही एक स्टूल रखा था जिस पर शायद कप या गिलास रखे हुए थे....
मम्मी आराम से कुर्सी से टेक लगा कर बैठी थी और इमरान अपनी जगह पे बैठा, तनिक आगे की ओर झुका हुआ था.. उसके हाथों की गति और एक्शन से लगा की किसी बात को लेकर वह बहुत उत्तेजित है.
ऐसी क्या बात हो सकती है...?
यह सोच कर मैं जैसे ही आगे बढ़ा, मुझे इमरान के कमरे की जलती नीली लाइट दिखाई दी. दरअसल उसने दो नाईट बल्ब लगा रखे थे... नीली बल्ब वह तब जलाता था खास कर, जिस रात को उसे पोर्न देखना होता था... उस दिन देर शाम से ही नीली लाइट ऑन कर के रखता था... उसके इस आदत के बारे में पूछने पर कहा था की उसे फेटिश है... और जब हरे बल्ब के बारे में पूछा था तब कुछ कहने के बजाए बस हँस दिया था..
पता नहीं इसमें क्या फेटिश है!
तो आज भी इसी नीली लाइट को जलते देख कर मुझे आश्चर्य तो नहीं होना चाहिए था लेकिन अचानक मेरे दिल में एक अंजाना डर घर कर गया... डर आखिर था किस बात का पता नहीं, लेकिन एक गज़ब सी बेचैनी से जी भर गया... जब दोबारा उसके कमरे की ओर नज़रें गयीं तो इस बार कुछ भी कहने के लिए शब्द ही नहीं रहे...
कारण था, उस कमरे की नीली रौशनी में फैली एक अजीब सी धुआँ--- बड़ी हल्की सी--- पूरे कमरे को अपने आगोश में लिए!
और यहाँ… मम्मी में आ रहा यह अप्रत्याशित और गहरा बदलाव मुझे बहुत ज्यादा अजीब लगा। मेरा दिमाग सुन्न होने लगा। आखिर इतना बड़ा बदलाव क्यों और कैसे आ रहा है उनमें? जो माँ कुछ दिन पहले तक इस लड़के के साये से खौफ खाती थी, उसकी अनुपस्थिति में सांस लेती थी, वह आज आधी रात को उसके साथ बालकनी में इतनी सहजता से बैठकर बतिया रही है? बात क्या है? क्या बीरभूम की वो संभ्रांत महिला इस अजनबी शहर के तौर-तरीकों में ढल रही थी, या फिर इमरान ने उनके इस सीधेपन का कोई गलत फायदा उठा लिया था?
तमाम सवाल मेरे दिमाग के दरवाजों पर दस्तक दे रहे थे, पर उस समय मेरे भीतर ज्यादा सोचने या विश्लेषण करने का दम नहीं बचा था। इतने दिनों के बेडरेस्ट के बाद अचानक दिनभर भागदौड़ करना और दफ्तर का तनाव झेलना—शारीरिक रूप से मैं अंदर तक बुरी तरह थक चुका था। हड्डियों में एक मीठा सा दर्द था और आँखें नींद के बोझ से झुकी जा रही थीं। मैंने बाइक पार्क की, ऊपर आया।
मम्मी ने दरवाजा खोला, उनके चेहरे पर एक शांत भाव था।
मैंने दोनों को 'गुड नाइट' कहा, कपड़े बदले और सीधे अपने बिस्तर पर ढह गया।
सिर्फ एक बार ही मुझसे खाने के बारे में पूछी मम्मी... मैंने मना कर दिया।
इमरान भी आया था पूछने, उसे भी वही जवाब दिया मैंने।
और बड़ी हैरानी की बात की सिर्फ एक बार पूछ कर ही दोनों अपने में व्यस्त हो गए... मम्मी किचन में कुछ करने लगी थी और इमरान मुझे और मम्मी को गुड़ नाईट बोल कर अपने कमरे में जा कर अंदर से दरवाज़ा बंद कर दिया था.
कमरे में अंधेरा था….
पंखा अपनी धीमी रफ्तार में घूम रहा था..
मैं तकिए पर सिर रखकर गहरी नींद की आगोश में समाने ही वाला था कि तभी... अचानक एक ठंडी बिजली सी मेरे दिमाग में कौंधी। एक ऐसी बात, एक ऐसा विचार मेरे जेहन में आकर ठिठक गया, जिसे इस बार चाहकर भी, किसी भी सूरत में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता था।
नींद का वह गहरा खुमार पल भर में हवा हो गया और मेरी आँखें अंधेरे कमरे की सीलिंग को घूरने लगीं।
वह बात यह थी कि... बीरभूम से लेकर इस महानगर के सफर तक, मेरा एक नियम था। जब भी मैं रात को दफ्तर से लेट होता था, या किसी फंक्शन के कारण मुझे घर लौटने में जरा भी देरी होती थी, तो मम्मी का एक के बाद एक मैसेजेस और कॉल्स आने का अंतहीन सिलसिला शुरू हो जाता था...
"कहाँ पहुंचे?", "देर क्यों हुई?", "रास्ते में हो या ऑफिस में?"—ये वो सवाल थे जो उनके डर और ममता की गवाही देते थे। उनका फोन तब तक नहीं थमता था जब तक कि मेरे कमरे के दरवाजे की कुंडी नहीं खटक जाती थी।
लेकिन आज... आज मैं पूरे बाईस-तेईस दिनों के बाद पहली बार ऑफिस गया था। आज मुझे रात को लौटने में इतनी देर भी हो गई थी। पर आज पूरे दिन और पूरी शाम में, मम्मी की तरफ से एक बार भी, एक सिंगल कॉल या मैसेज नहीं आया था!!
उन्हें यह जानने की उत्सुकता भी नहीं हुई कि उनका बेटा, जो अभी-अभी एक बड़े एक्सीडेंट से उठा है, वह सही-सलामत ऑफिस पहुंचा या नहीं? वह रात को किस हाल में घर लौट रहा है? आखिर क्यों? क्या इसलिए कि उनका ध्यान अब पूरी तरह से इमरान की बातों में बंट चुका था? या फिर इमरान ने जानबूझकर उन्हें मुझसे दूर, उलझा रखा था ताकि उनका ध्यान मेरे फोन से हट जाए?
खामोश पड़े मेरे मोबाइल की स्क्रीन अंधेरे में चमक रही थी, जिसमें मम्मी का कोई मिस्ड कॉल नहीं था यह खामोश घंटी किसी बड़े और खौफनाक तूफान के आने की पहली आहट थी, जिसने मेरे बेडरेस्ट के सुकून को एक झटके में उड़ाकर रख दिया था।
To be Continued….
डॉक्टर द्वारा बताए गए दो हफ़्तों के बेडरेस्ट और फिर कुछ दिन ऊपर की एहतियात को मिलाकर, पूरे बाईस दिनों के लंबे इंतजार के बाद आखिरकार वह दिन आया जब मैंने दोबारा अपनी सामान्य जिंदगी की पटरी पर कदम रखा। इतने दिनों तक फ्लैट के एक ही कमरे में, बिस्तर पर पड़े-पड़े मैं भीतर तक ऊब चुका था। पैर की पट्टियां तो खुल चुकी थीं, लेकिन जब बाईस दिन बाद मैंने पहली बार अपनी बाइक को स्टैंड से उतारा, तो पैर में एक हल्की सी जकड़न महसूस हुई। शुरुआत में थोड़ा मुश्किल हुआ; पैर पर वजन देकर किक मारना और क्लच-गियर का तालमेल बिठाना थोड़ा दर्दनाक था। लेकिन मुझे दफ्तर जाना ही था, कॉर्पोरेट की दुनिया ज्यादा दिन किसी का इंतजार नहीं करती। सो, मैंने थोड़ा दर्द सहा और बाइक स्टार्ट करके निकल पड़ा।
इतने दिनों के लंबे और उबाऊ गैप के बाद वापस अपने दफ्तर की बिल्डिंग में कदम रखना सचमुच बहुत अच्छा लगा। जब आप एक दुर्घटना से उबरकर वापस आते हैं, तो काम का बोझ भी आपको बोझ नहीं, बल्कि जिंदगी की जीवंतता का अहसास कराता है। मेरे केबिन में कदम रखते ही दफ्तर के साथियों, गार्ड्स और स्टाफ के चेहरों पर जो मुस्कान थी, उसने मेरा दिल जीत लिया। कलीग्स ने मेरे ठीक होकर लौटने की खुशी में दफ्तर के ही कॉन्फ्रेंस रूम में शाम को एक छोटी सी वेलकम-बैक पार्टी भी रखी थी। समोसे, पेस्ट्री और चाय के दौर के बीच सबने मेरे एक्सीडेंट वाले दिन की बातें कीं और मेरा हौसला बढ़ाया।
इसी मेल-मुलाकात और पेंडिंग पड़े कामों को थोड़ा-बहुत निपटाने के चक्कर में दफ्तर में वक्त का पता ही नहीं चला। जब मैंने घड़ी देखी, तो रात के काफी बज चुके थे। इतने दिनों बाद काम करने के कारण शरीर जवाब दे रहा था, पर मन में एक तसल्ली थी।
जब मैं अपनी बाइक से अपने मोहल्ले में दाखिल हुआ और गली के आखिरी मोड़ से मैंने अपने फ्लैट की ऊंची इमारत की तरफ देखा, तो मेरी नजरें सीधे हमारी बालकनी पर गईं। वहां का दृश्य देखकर मेरी बाइक के एक्सीलेटर पर टिकी उंगलियां एक पल के लिए ढीली पड़ गईं।
हॉल की मद्धम रोशनी बालकनी तक आ रही थी। वहाँ दो कुर्सियाँ लगी थीं। एक कुर्सी पर मम्मी बैठी थीं और दूसरी पर इमरान। दोनों बेहद डूबे हुए अंदाज में, धीमी आवाज में कोई गंभीर बात कर रहे थे। बीच-बीच में इमरान कुछ कहता, तो मम्मी सहमति में सिर हिलातीं। दूरी इतनी थी कि मैं उनके शब्द नहीं सुन सकता था, पर उनकी शारीरिक भाषा साफ बता रही थी कि दोनों के बीच अब शायद कोई अजनबीपन या संकोच नहीं बचा था...
उनके पास ही एक स्टूल रखा था जिस पर शायद कप या गिलास रखे हुए थे....
मम्मी आराम से कुर्सी से टेक लगा कर बैठी थी और इमरान अपनी जगह पे बैठा, तनिक आगे की ओर झुका हुआ था.. उसके हाथों की गति और एक्शन से लगा की किसी बात को लेकर वह बहुत उत्तेजित है.
ऐसी क्या बात हो सकती है...?
यह सोच कर मैं जैसे ही आगे बढ़ा, मुझे इमरान के कमरे की जलती नीली लाइट दिखाई दी. दरअसल उसने दो नाईट बल्ब लगा रखे थे... नीली बल्ब वह तब जलाता था खास कर, जिस रात को उसे पोर्न देखना होता था... उस दिन देर शाम से ही नीली लाइट ऑन कर के रखता था... उसके इस आदत के बारे में पूछने पर कहा था की उसे फेटिश है... और जब हरे बल्ब के बारे में पूछा था तब कुछ कहने के बजाए बस हँस दिया था..
पता नहीं इसमें क्या फेटिश है!
तो आज भी इसी नीली लाइट को जलते देख कर मुझे आश्चर्य तो नहीं होना चाहिए था लेकिन अचानक मेरे दिल में एक अंजाना डर घर कर गया... डर आखिर था किस बात का पता नहीं, लेकिन एक गज़ब सी बेचैनी से जी भर गया... जब दोबारा उसके कमरे की ओर नज़रें गयीं तो इस बार कुछ भी कहने के लिए शब्द ही नहीं रहे...
कारण था, उस कमरे की नीली रौशनी में फैली एक अजीब सी धुआँ--- बड़ी हल्की सी--- पूरे कमरे को अपने आगोश में लिए!
और यहाँ… मम्मी में आ रहा यह अप्रत्याशित और गहरा बदलाव मुझे बहुत ज्यादा अजीब लगा। मेरा दिमाग सुन्न होने लगा। आखिर इतना बड़ा बदलाव क्यों और कैसे आ रहा है उनमें? जो माँ कुछ दिन पहले तक इस लड़के के साये से खौफ खाती थी, उसकी अनुपस्थिति में सांस लेती थी, वह आज आधी रात को उसके साथ बालकनी में इतनी सहजता से बैठकर बतिया रही है? बात क्या है? क्या बीरभूम की वो संभ्रांत महिला इस अजनबी शहर के तौर-तरीकों में ढल रही थी, या फिर इमरान ने उनके इस सीधेपन का कोई गलत फायदा उठा लिया था?
तमाम सवाल मेरे दिमाग के दरवाजों पर दस्तक दे रहे थे, पर उस समय मेरे भीतर ज्यादा सोचने या विश्लेषण करने का दम नहीं बचा था। इतने दिनों के बेडरेस्ट के बाद अचानक दिनभर भागदौड़ करना और दफ्तर का तनाव झेलना—शारीरिक रूप से मैं अंदर तक बुरी तरह थक चुका था। हड्डियों में एक मीठा सा दर्द था और आँखें नींद के बोझ से झुकी जा रही थीं। मैंने बाइक पार्क की, ऊपर आया।
मम्मी ने दरवाजा खोला, उनके चेहरे पर एक शांत भाव था।
मैंने दोनों को 'गुड नाइट' कहा, कपड़े बदले और सीधे अपने बिस्तर पर ढह गया।
सिर्फ एक बार ही मुझसे खाने के बारे में पूछी मम्मी... मैंने मना कर दिया।
इमरान भी आया था पूछने, उसे भी वही जवाब दिया मैंने।
और बड़ी हैरानी की बात की सिर्फ एक बार पूछ कर ही दोनों अपने में व्यस्त हो गए... मम्मी किचन में कुछ करने लगी थी और इमरान मुझे और मम्मी को गुड़ नाईट बोल कर अपने कमरे में जा कर अंदर से दरवाज़ा बंद कर दिया था.
कमरे में अंधेरा था….
पंखा अपनी धीमी रफ्तार में घूम रहा था..
मैं तकिए पर सिर रखकर गहरी नींद की आगोश में समाने ही वाला था कि तभी... अचानक एक ठंडी बिजली सी मेरे दिमाग में कौंधी। एक ऐसी बात, एक ऐसा विचार मेरे जेहन में आकर ठिठक गया, जिसे इस बार चाहकर भी, किसी भी सूरत में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता था।
नींद का वह गहरा खुमार पल भर में हवा हो गया और मेरी आँखें अंधेरे कमरे की सीलिंग को घूरने लगीं।
वह बात यह थी कि... बीरभूम से लेकर इस महानगर के सफर तक, मेरा एक नियम था। जब भी मैं रात को दफ्तर से लेट होता था, या किसी फंक्शन के कारण मुझे घर लौटने में जरा भी देरी होती थी, तो मम्मी का एक के बाद एक मैसेजेस और कॉल्स आने का अंतहीन सिलसिला शुरू हो जाता था...
"कहाँ पहुंचे?", "देर क्यों हुई?", "रास्ते में हो या ऑफिस में?"—ये वो सवाल थे जो उनके डर और ममता की गवाही देते थे। उनका फोन तब तक नहीं थमता था जब तक कि मेरे कमरे के दरवाजे की कुंडी नहीं खटक जाती थी।
लेकिन आज... आज मैं पूरे बाईस-तेईस दिनों के बाद पहली बार ऑफिस गया था। आज मुझे रात को लौटने में इतनी देर भी हो गई थी। पर आज पूरे दिन और पूरी शाम में, मम्मी की तरफ से एक बार भी, एक सिंगल कॉल या मैसेज नहीं आया था!!
उन्हें यह जानने की उत्सुकता भी नहीं हुई कि उनका बेटा, जो अभी-अभी एक बड़े एक्सीडेंट से उठा है, वह सही-सलामत ऑफिस पहुंचा या नहीं? वह रात को किस हाल में घर लौट रहा है? आखिर क्यों? क्या इसलिए कि उनका ध्यान अब पूरी तरह से इमरान की बातों में बंट चुका था? या फिर इमरान ने जानबूझकर उन्हें मुझसे दूर, उलझा रखा था ताकि उनका ध्यान मेरे फोन से हट जाए?
खामोश पड़े मेरे मोबाइल की स्क्रीन अंधेरे में चमक रही थी, जिसमें मम्मी का कोई मिस्ड कॉल नहीं था यह खामोश घंटी किसी बड़े और खौफनाक तूफान के आने की पहली आहट थी, जिसने मेरे बेडरेस्ट के सुकून को एक झटके में उड़ाकर रख दिया था।
To be Continued….


![[+]](https://xossipy.com/themes/sharepoint/collapse_collapsed.png)