18-06-2026, 10:32 PM
एपिसोड 16: संकट में सहारा...?
अस्पताल के उस सफेद, ठंडे कमरे में लेटे हुए मेरे दिमाग में सिर्फ एक ही चिंता चौबीसों घंटे घूम रही थी—मम्मी की। शहर उनके लिए बिल्कुल नया था, और मेरे इस एक्सीडेंट ने उन्हें भीतर से हिलाकर रख दिया था। वह अस्पताल और फ्लैट के चक्कर काटते-काटते खुद ढहने की कगार पर पहुंच गई थीं। लेकिन तभी, हमारी इस बेबस और बिखरी हुई दुनिया में एक अप्रत्याशित मोड़ आया।
इमरान को, जो काफी अच्छे दिनों की छुट्टी ले कर अपने घर गया था अचानक परिवार के साथ समय बिताने के लिए, न जाने कहाँ से मेरे इस भयानक एक्सीडेंट की खबर मिल गई..!
वह अपने सारे काम बीच में ही छोड़कर तुरंत शहर लौट आया....
उसका इस तरह संकट के समय वापस आना हमारे लिए एक बहुत बड़ा सहारा साबित हुआ…
फ्लैट पर कदम रखते ही उसने बिना वक्त गंवाए सब कुछ अपने हाथों में ले लिया। वह सुबह-सुबह अस्पताल पहुंच जाता, डॉक्टरों से मेरी मेडिकल रिपोर्ट्स को लेकर बात करता, दवाइयों के लंबे-चौड़े पर्चे खुद जाकर मेडिकल स्टोर से लाता और मम्मी को अपनी बाइक पर बैठाकर अस्पताल से घर और घर से अस्पताल ले जाता।
इतना ही नहीं, उसने घर के कामकाज की जिम्मेदारी भी संभाल ली थी…. राशन लाना हो, दूध का हिसाब रखना हो या रसोई के भारी काम, वह हर जगह ढाल बनकर खड़ा हो गया।
"देव भाई, तू बस आराम कर और जल्दी ठीक होने पर ध्यान दे। जब तक तेरा ये भाई यहाँ है, आंटी को एक भी परेशानी नहीं होने देगा," अस्पताल के बेड के पास खड़े होकर इमरान ने जब यह कहा, तो उसकी आवाज़ में एक अजीब सा अपनापन था।
धीरे-धीरे, इमरान का यह निस्वार्थ सेवा भाव रंग लाने लगा…
वह मम्मी का भरोसा जीतने में पूरी तरह सफल होने लगा था!
जो माँ कुछ दिन पहले तक उसके साये से भी कतराती थीं, उसके आने पर सहम जाती थीं, अब उनके व्यवहार की बर्फ पिघलने लगी थी।
अब जब मैं फ्लैट पर बेडरेस्ट के लिए शिफ्ट हो चुका था, तो मैंने खुद अपनी आँखों से देखा कि मम्मी कई बार इमरान के साथ बहुत कंफर्टेबल होकर बातें कर रही थीं। कभी रसोई में चाय बनते वक्त दोनों खान-पान पर चर्चा करते, तो कभी इमरान अपनी किसी बात से मम्मी के चेहरे पर मुस्कान ले आता। मम्मी अब उसके सामने सहमती नहीं थीं, बल्कि एक अभिभावक की तरह उसे डांटकर ज्यादा खाना खाने के लिए भी कहती थीं।
सतह पर शायद सब कुछ बिल्कुल ठीक हो चुका था…. । ऐसा लग रहा था कि संकट ने हमारे बीच के सारे अजनबेपन और दूरियों को मिटा दिया है।
लेकिन, इन सब बदलते समीकरणों के बीच... मेरे मन का अंतर्द्वंद्व शांत नहीं हुआ था।
सब कुछ सामान्य दिखने के बावजूद, कहीं न कहीं मेरे दिल और दिमाग के किसी गहरे कोने में एक बहुत ही अजीब और तीखी फीलिंग रह गई थी…. मैं जब भी मम्मी को इमरान के साथ मुस्कुराकर बात करते देखता, मेरी आँखों के सामने मम्मी द्वारा पहले किया गया वह 'weird' व्यवहार घूम जाता। मैं भूल नहीं पा रहा था कि कैसे इमरान के सामने आते ही मम्मी का चेहरा सफेद पड़ जाता था…. मैं भूल नहीं पा रहा था कि कैसे वह इमरान के बंद कमरे के दरवाजे को एक अनजाने खौफ से घूरती थीं— और सबसे बढ़कर, मेरे दिमाग में वह रात आज भी जिंदा थी, जब वह लैपटॉप पर मम्मी की तस्वीर को ज़ूम करके उस रहस्यमयी पुराने रजिस्टर से कुछ मिला रहा था।
इमरान की यह अत्यधिक भलमनसाहत, उसका यह अचानक आ जाना, और मम्मी का इतनी जल्दी उस पर भरोसा कर लेना—यह सब मुझे सुकून देने के बजाय एक नए अंदेशे से भर रहा था….
…… ‘क्या इमरान वाकई दिल का साफ था और संकट में दोस्त की मदद कर रहा था...? कहीं सहारा बनने के नाम पर कोई और ही खेल तो नहीं चल रहा था...?!
To be Continued….
अस्पताल के उस सफेद, ठंडे कमरे में लेटे हुए मेरे दिमाग में सिर्फ एक ही चिंता चौबीसों घंटे घूम रही थी—मम्मी की। शहर उनके लिए बिल्कुल नया था, और मेरे इस एक्सीडेंट ने उन्हें भीतर से हिलाकर रख दिया था। वह अस्पताल और फ्लैट के चक्कर काटते-काटते खुद ढहने की कगार पर पहुंच गई थीं। लेकिन तभी, हमारी इस बेबस और बिखरी हुई दुनिया में एक अप्रत्याशित मोड़ आया।
इमरान को, जो काफी अच्छे दिनों की छुट्टी ले कर अपने घर गया था अचानक परिवार के साथ समय बिताने के लिए, न जाने कहाँ से मेरे इस भयानक एक्सीडेंट की खबर मिल गई..!
वह अपने सारे काम बीच में ही छोड़कर तुरंत शहर लौट आया....
उसका इस तरह संकट के समय वापस आना हमारे लिए एक बहुत बड़ा सहारा साबित हुआ…
फ्लैट पर कदम रखते ही उसने बिना वक्त गंवाए सब कुछ अपने हाथों में ले लिया। वह सुबह-सुबह अस्पताल पहुंच जाता, डॉक्टरों से मेरी मेडिकल रिपोर्ट्स को लेकर बात करता, दवाइयों के लंबे-चौड़े पर्चे खुद जाकर मेडिकल स्टोर से लाता और मम्मी को अपनी बाइक पर बैठाकर अस्पताल से घर और घर से अस्पताल ले जाता।
इतना ही नहीं, उसने घर के कामकाज की जिम्मेदारी भी संभाल ली थी…. राशन लाना हो, दूध का हिसाब रखना हो या रसोई के भारी काम, वह हर जगह ढाल बनकर खड़ा हो गया।
"देव भाई, तू बस आराम कर और जल्दी ठीक होने पर ध्यान दे। जब तक तेरा ये भाई यहाँ है, आंटी को एक भी परेशानी नहीं होने देगा," अस्पताल के बेड के पास खड़े होकर इमरान ने जब यह कहा, तो उसकी आवाज़ में एक अजीब सा अपनापन था।
धीरे-धीरे, इमरान का यह निस्वार्थ सेवा भाव रंग लाने लगा…
वह मम्मी का भरोसा जीतने में पूरी तरह सफल होने लगा था!
जो माँ कुछ दिन पहले तक उसके साये से भी कतराती थीं, उसके आने पर सहम जाती थीं, अब उनके व्यवहार की बर्फ पिघलने लगी थी।
अब जब मैं फ्लैट पर बेडरेस्ट के लिए शिफ्ट हो चुका था, तो मैंने खुद अपनी आँखों से देखा कि मम्मी कई बार इमरान के साथ बहुत कंफर्टेबल होकर बातें कर रही थीं। कभी रसोई में चाय बनते वक्त दोनों खान-पान पर चर्चा करते, तो कभी इमरान अपनी किसी बात से मम्मी के चेहरे पर मुस्कान ले आता। मम्मी अब उसके सामने सहमती नहीं थीं, बल्कि एक अभिभावक की तरह उसे डांटकर ज्यादा खाना खाने के लिए भी कहती थीं।
सतह पर शायद सब कुछ बिल्कुल ठीक हो चुका था…. । ऐसा लग रहा था कि संकट ने हमारे बीच के सारे अजनबेपन और दूरियों को मिटा दिया है।
लेकिन, इन सब बदलते समीकरणों के बीच... मेरे मन का अंतर्द्वंद्व शांत नहीं हुआ था।
सब कुछ सामान्य दिखने के बावजूद, कहीं न कहीं मेरे दिल और दिमाग के किसी गहरे कोने में एक बहुत ही अजीब और तीखी फीलिंग रह गई थी…. मैं जब भी मम्मी को इमरान के साथ मुस्कुराकर बात करते देखता, मेरी आँखों के सामने मम्मी द्वारा पहले किया गया वह 'weird' व्यवहार घूम जाता। मैं भूल नहीं पा रहा था कि कैसे इमरान के सामने आते ही मम्मी का चेहरा सफेद पड़ जाता था…. मैं भूल नहीं पा रहा था कि कैसे वह इमरान के बंद कमरे के दरवाजे को एक अनजाने खौफ से घूरती थीं— और सबसे बढ़कर, मेरे दिमाग में वह रात आज भी जिंदा थी, जब वह लैपटॉप पर मम्मी की तस्वीर को ज़ूम करके उस रहस्यमयी पुराने रजिस्टर से कुछ मिला रहा था।
इमरान की यह अत्यधिक भलमनसाहत, उसका यह अचानक आ जाना, और मम्मी का इतनी जल्दी उस पर भरोसा कर लेना—यह सब मुझे सुकून देने के बजाय एक नए अंदेशे से भर रहा था….
…… ‘क्या इमरान वाकई दिल का साफ था और संकट में दोस्त की मदद कर रहा था...? कहीं सहारा बनने के नाम पर कोई और ही खेल तो नहीं चल रहा था...?!
To be Continued….


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