18-06-2026, 02:41 PM
एपिसोड 15: एक अनहोनी
जिंदगी की रफ्तार जब अपनी चरम सीमा पर होती है, तो अक्सर वक्त हमें यह बताने के लिए एक ब्रेक लगा देता है कि हम इंसान हैं, मशीन नहीं। इमरान के जाने के बाद घर का माहौल शांत जरूर हुआ था, और मैं मम्मी की उस अजीब उलझन को भूलकर पूरी तरह से दफ्तर के काम में डूब चुका था। प्रोजेक्ट्स के डेडलाइंस और क्लाइंट्स के कॉल्स के बीच मैं इतनी तेजी से भाग रहा था कि मुझे आने वाले खतरे का जरा भी अंदाजा नहीं था। इमरान के जाने के ठीक दो दिन बाद ही मेरी जिंदगी ने एक ऐसा मोड़ लिया, जिसने सब कुछ रोक दिया।
वह मंगलवार की एक उमस भरी सुबह थी...
मैं हमेशा की तरह थोड़ा लेट हो रहा था, इसलिए अपनी बाइक की रफ्तार सामान्य से थोड़ी ज्यादा रख कर दफ्तर की ओर भाग रहा था। दिमाग में बस यही चल रहा था कि ठीक दस बजे की मीटिंग में प्रेजेंटेशन कैसे शुरू करना है। शहर का वो व्यस्त चौराहा पार करते ही मेरे दफ्तर की ऊंची इमारत साफ नजर आने लगी थी। मैंने राहत की सांस ली और बाइक को दफ्तर के मुख्य गेट की तरफ मोड़ने के लिए इंडिकेटर दिया।
तभी, न जाने कहाँ से एक तेज रफ्तार ऑटो गलत दिशा से अचानक सामने आ गया….
सब कुछ इतनी तेजी से हुआ कि मुझे ब्रेक मारने का भी मौका नहीं मिला…
एक जोरदार आवाज हुई,
टायर सड़क पर घिसटने की चीख गूंजी और अगले ही पल मैं हवा में था…!
मेरी बाइक सड़क के एक तरफ जा गिरी और मैं सीधे कंक्रीट की सड़क पर जा गिरा। मेरे सिर और दाहिने कंधे पर बहुत तेज झटका लगा। एक पल के लिए मेरी आँखों के सामने पूरी तरह से अंधेरा छा गया। कानों में गाड़ियों के हॉर्न और लोगों के चिल्लाने का शोर आ रहा था, पर मैं चाहकर भी हिल नहीं पा रहा था।
गनीमत बस यही रही कि यह भयानक दुर्घटना ठीक मेरे ऑफिस के गेट के बाहर ही हुई थी। दफ्तर के गार्ड्स और मेरे कुछ कलीग्स, जो ठीक उसी वक्त ऑफिस आ रहे थे, उन्होंने जैसे ही मेरी बाइक को पहचाना, वे सब तुरंत भागते हुए मेरी तरफ आए,
"अरे, ये तो देव है! जल्दी आओ, एम्बुलेंस को फोन करो!" मेरे सीनियर अमित जी की घबराई हुई आवाज मेरे कानों में पड़ी।
ऑफिस के स्टाफ ने बिना एक पल गंवाए मुस्तैदी दिखाई….
उन्होंने मुझे संभाला और पास के ही एक बड़े अस्पताल में तुरंत एडमिट कराया। समय पर अस्पताल पहुंचने और दफ्तर के लोगों की तुरंत मदद के कारण एक बहुत बड़ा अनर्थ होने से बच गया। डॉक्टरों ने तुरंत इमरजेंसी में ले जाकर एक्स-रे और बाकी जांचें शुरू कर दीं।
जब मुझे होश आया, तो मैंने खुद को अस्पताल के सफेद कमरे में पाया। मेरे दाहिने हाथ और पैर पर पट्टियां बंधी हुई थीं और ग्लूकोज की बोतल चढ़ रही थी।
डॉक्टर ने अंदर आकर मेरे कलीग्स और मुझसे बात की,
"घबराने की कोई बात नहीं है। समय पर एडमिट होने के कारण कोई इंटरनल ब्लीडिंग या गंभीर हेड इंजरी नहीं हुई है। चोटें ज्यादा सीरियस नहीं हैं," डॉक्टर के इन शब्दों ने मेरे सहकर्मियों के चेहरे पर राहत ला दी। लेकिन डॉक्टर ने अगली ही सांस में जो कहा, उसने मेरी चिंता बढ़ा दी….
"चोटें भले ही गहरी नहीं हैं, लेकिन दाहिने पैर की मांसपेशियों में गंभीर खिंचाव है। इसलिए, अस्पताल की तरफ से आपको अगले दो सप्ताह के लिए पूरी तरह से बेडरेस्ट की सलाह दी जाती है। आप अगले चौदह दिनों तक अपने पैर पर ज्यादा वजन नहीं डाल सकते और न ही ऑफिस जा सकते हैं।"
बेडरेस्ट की बात सुनते ही मेरे दिमाग में सबसे पहला ख्याल काम का नहीं, बल्कि मम्मी का आया। वह फ्लैट में अकेली थीं, शहर उनके लिए नया था। अब जब उन्हें मेरी इस दुर्घटना का पता चलेगा, तो उनकी क्या हालत होगी? जो माँ पहले से ही उस फ्लैट में एक अनजाने डर से सहमी हुई थी, वह मुझे इस हाल में देखकर कितनी टूट जाएगी, यह सोचकर ही मेरा दिल बैठने लगा….
To be Continued….
जिंदगी की रफ्तार जब अपनी चरम सीमा पर होती है, तो अक्सर वक्त हमें यह बताने के लिए एक ब्रेक लगा देता है कि हम इंसान हैं, मशीन नहीं। इमरान के जाने के बाद घर का माहौल शांत जरूर हुआ था, और मैं मम्मी की उस अजीब उलझन को भूलकर पूरी तरह से दफ्तर के काम में डूब चुका था। प्रोजेक्ट्स के डेडलाइंस और क्लाइंट्स के कॉल्स के बीच मैं इतनी तेजी से भाग रहा था कि मुझे आने वाले खतरे का जरा भी अंदाजा नहीं था। इमरान के जाने के ठीक दो दिन बाद ही मेरी जिंदगी ने एक ऐसा मोड़ लिया, जिसने सब कुछ रोक दिया।
वह मंगलवार की एक उमस भरी सुबह थी...
मैं हमेशा की तरह थोड़ा लेट हो रहा था, इसलिए अपनी बाइक की रफ्तार सामान्य से थोड़ी ज्यादा रख कर दफ्तर की ओर भाग रहा था। दिमाग में बस यही चल रहा था कि ठीक दस बजे की मीटिंग में प्रेजेंटेशन कैसे शुरू करना है। शहर का वो व्यस्त चौराहा पार करते ही मेरे दफ्तर की ऊंची इमारत साफ नजर आने लगी थी। मैंने राहत की सांस ली और बाइक को दफ्तर के मुख्य गेट की तरफ मोड़ने के लिए इंडिकेटर दिया।
तभी, न जाने कहाँ से एक तेज रफ्तार ऑटो गलत दिशा से अचानक सामने आ गया….
सब कुछ इतनी तेजी से हुआ कि मुझे ब्रेक मारने का भी मौका नहीं मिला…
एक जोरदार आवाज हुई,
टायर सड़क पर घिसटने की चीख गूंजी और अगले ही पल मैं हवा में था…!
मेरी बाइक सड़क के एक तरफ जा गिरी और मैं सीधे कंक्रीट की सड़क पर जा गिरा। मेरे सिर और दाहिने कंधे पर बहुत तेज झटका लगा। एक पल के लिए मेरी आँखों के सामने पूरी तरह से अंधेरा छा गया। कानों में गाड़ियों के हॉर्न और लोगों के चिल्लाने का शोर आ रहा था, पर मैं चाहकर भी हिल नहीं पा रहा था।
गनीमत बस यही रही कि यह भयानक दुर्घटना ठीक मेरे ऑफिस के गेट के बाहर ही हुई थी। दफ्तर के गार्ड्स और मेरे कुछ कलीग्स, जो ठीक उसी वक्त ऑफिस आ रहे थे, उन्होंने जैसे ही मेरी बाइक को पहचाना, वे सब तुरंत भागते हुए मेरी तरफ आए,
"अरे, ये तो देव है! जल्दी आओ, एम्बुलेंस को फोन करो!" मेरे सीनियर अमित जी की घबराई हुई आवाज मेरे कानों में पड़ी।
ऑफिस के स्टाफ ने बिना एक पल गंवाए मुस्तैदी दिखाई….
उन्होंने मुझे संभाला और पास के ही एक बड़े अस्पताल में तुरंत एडमिट कराया। समय पर अस्पताल पहुंचने और दफ्तर के लोगों की तुरंत मदद के कारण एक बहुत बड़ा अनर्थ होने से बच गया। डॉक्टरों ने तुरंत इमरजेंसी में ले जाकर एक्स-रे और बाकी जांचें शुरू कर दीं।
जब मुझे होश आया, तो मैंने खुद को अस्पताल के सफेद कमरे में पाया। मेरे दाहिने हाथ और पैर पर पट्टियां बंधी हुई थीं और ग्लूकोज की बोतल चढ़ रही थी।
डॉक्टर ने अंदर आकर मेरे कलीग्स और मुझसे बात की,
"घबराने की कोई बात नहीं है। समय पर एडमिट होने के कारण कोई इंटरनल ब्लीडिंग या गंभीर हेड इंजरी नहीं हुई है। चोटें ज्यादा सीरियस नहीं हैं," डॉक्टर के इन शब्दों ने मेरे सहकर्मियों के चेहरे पर राहत ला दी। लेकिन डॉक्टर ने अगली ही सांस में जो कहा, उसने मेरी चिंता बढ़ा दी….
"चोटें भले ही गहरी नहीं हैं, लेकिन दाहिने पैर की मांसपेशियों में गंभीर खिंचाव है। इसलिए, अस्पताल की तरफ से आपको अगले दो सप्ताह के लिए पूरी तरह से बेडरेस्ट की सलाह दी जाती है। आप अगले चौदह दिनों तक अपने पैर पर ज्यादा वजन नहीं डाल सकते और न ही ऑफिस जा सकते हैं।"
बेडरेस्ट की बात सुनते ही मेरे दिमाग में सबसे पहला ख्याल काम का नहीं, बल्कि मम्मी का आया। वह फ्लैट में अकेली थीं, शहर उनके लिए नया था। अब जब उन्हें मेरी इस दुर्घटना का पता चलेगा, तो उनकी क्या हालत होगी? जो माँ पहले से ही उस फ्लैट में एक अनजाने डर से सहमी हुई थी, वह मुझे इस हाल में देखकर कितनी टूट जाएगी, यह सोचकर ही मेरा दिल बैठने लगा….
To be Continued….


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