15-06-2026, 10:59 AM
एपिसोड 14: सवाल
इमरान के जाने के बाद घर में जो सुकून लौटा था, वह बदकिस्मती से ज्यादा दिनों तक टिक नहीं पाया। राहत की वह धूप जो मम्मी के चेहरे पर खिली थी, पाँचवें दिन की शाम होते-होते फिर से धुंधली पड़ने लगी। उनके भीतर का वह अनजाना डर, जो कुछ समय के लिए सो गया था, एक बार फिर करवट लेने लगा था। मैं दफ्तर से लौटा तो देखा कि वह बालकनी में खड़ी थीं, पर उनकी निगाहें सामने की सड़क पर नहीं, बल्कि घर के ही किसी अंदरूनी हिस्से पर टिकी थीं।
To be Continued….
इमरान के जाने के बाद घर में जो सुकून लौटा था, वह बदकिस्मती से ज्यादा दिनों तक टिक नहीं पाया। राहत की वह धूप जो मम्मी के चेहरे पर खिली थी, पाँचवें दिन की शाम होते-होते फिर से धुंधली पड़ने लगी। उनके भीतर का वह अनजाना डर, जो कुछ समय के लिए सो गया था, एक बार फिर करवट लेने लगा था। मैं दफ्तर से लौटा तो देखा कि वह बालकनी में खड़ी थीं, पर उनकी निगाहें सामने की सड़क पर नहीं, बल्कि घर के ही किसी अंदरूनी हिस्से पर टिकी थीं।
उस रात जब हम दोनों डाइनिंग टेबल पर खाना खाने बैठे, तो माहौल में एक भारीपन था। मम्मी अपनी थाली में चम्मच घुमा रही थीं, जैसे उनका ध्यान खाने में बिल्कुल न हो…
अचानक उन्होंने अपनी नजरें उठाईं और सीधे मेरी आँखों में झांकते हुए पूछा,
"देव, एक बात बता... तुझे यह जगह कुछ अजीब नहीं लगती?"
मैंने अपना निवाला मुंह में डालते-डालते सिरा हिलाया,
"अजीब? ना मम्मी, मुझे तो कुछ अजीब नहीं लगता। पर आप किस हिसाब से कह रही हैं? क्या हुआ है?"
मम्मी मेरी बात सुनकर कुछ पल के लिए ठिठक गईं।
उनके चेहरे पर असमंजस के भाव साफ थे। उन्होंने अपनी नजरें नीचे कर लीं और धीमी आवाज में बोलीं,
"पता नहीं... मैं खुद भी पक्की तरह से नहीं कह सकती। पर ऐसा लगता है जैसे कोई चीज़... जो सही नहीं है।"
वह अपनी उस असहजता को शब्दों में ढाल नहीं पा रही थी… ऐसा लग रहा था कि उनका कोई छठा अहसास उन्हें लगातार टोक रहा था, पर उनके पास साबित करने के लिए कुछ नहीं था।
अगले दिन सुबह मेरी आँख खुली तो मैंने एक बात नोटिस किया….
मम्मी पूरे फ्लैट का चक्कर लगा रही थीं….!
वह घर के हरेक कोने को, हर एक दीवार को और खिड़कियों के पर्दों के पीछे तक को बहुत गौर से देख रही थीं। वह हॉल की सीलिंग से लेकर फर्श के कोनों तक अपनी नजरें दौड़ा रही थीं, जैसे वह यह समझने की कोशिश कर रही हों कि आखिर उन्हें इस घर में क्या खटक रहा है।
इसी जांच-पड़ताल के दौरान, मैंने देखा कि वह दो-तीन बार इमरान के बंद कमरे के दरवाजे के बाहर जाकर खड़ी हुईं। उस बंद दरवाजे की लकड़ी को वह ऐसे घूर रही थीं मानो उसके पार देखना चाहती हों। वह वहां खड़ी होकर कुछ गहरे ख्यालों में डूब जातीं, कुछ सोचतीं, और फिर एक ठंडी सांस लेकर वहां से बिना दरवाजा छुए चुपचाप हट जातीं।
रसोई में चाय उबल रही थी और मेरे दिमाग में सवालों का बवंडर चल रहा था। मैंने सोचा कि आज दफ्तर जाने से पहले मम्मी के पास बैठूंगा। उनका हाथ थामकर उनसे कहूँगा कि वे खुलकर कहें कि आखिर बात क्या है…?
मैं उनकी किसी भी उलझन को हर हाल में सुलझाना चाहता था....
लेकिन तभी मेरे फोन की घंटी बजी…
ऑफिस से मेरे बॉस का कॉल था… क्लाइंट मीटिंग और एक नए प्रोजेक्ट के सबमिशन का भारी प्रेशर था। दफ्तर से लगातार आ रहे मैसेजेस और काम के उस अचानक बढ़े बोझ के फेर में मैं ऐसा उलझा कि खुद को तैयार करने और बैग उठाने की आपाधापी में लग गया।
जब मैं घर से निकल रहा था, तो मम्मी दरवाजे पर खड़ी थीं, उनकी आँखें अब भी उसी उलझन में थीं…
उनके चेहरे के भाव ये बात साफ़ कह रहे थे की कुछ तो ऐसा है जो वो मुझसे शेयर करना चाहती है लेकिन कर नहीं पा रही... कुछ है ऐसा शायद जिसे पहले वो खुद क्लियर कर लेना चाहती है.
पर क्या...?
मैं उनसे वह जरूरी सवाल पूछना ही भूल गया।
कारपोरेट की इस भागदौड़ ने मुझे अपनी माँ की उस मूक पुकार से दूर कर दिया था।
मैं लिफ्ट की तरफ बढ़ तो रहा था, पर मेरे दिल में एक अजीब सी कसक थी। क्या मम्मी को वाकई उस फ्लैट में ऐसे किसी चीज़ या बात का अहसास हो रहा था जो मेरी आँखों के सामने होते हुए भी मेरी पकड़ में नहीं आ रहा था?
यह सवाल अब उस बंद फ्लैट के भीतर अभी के लिए मम्मी के साथ अकेला रह गया था…।
To be Continued….


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