13-06-2026, 12:48 PM
(This post was last modified: 13-06-2026, 12:55 PM by The_Writer. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
एपिसोड 13: राहत की धूप
अगले दो-तीन दिन का समय सतह पर तो बिल्कुल सामान्य बीता, लेकिन घर के भीतर एक अजीब सी खामोशी तैर रही थी। मम्मी का वह सहमा हुआ व्यवहार पूरी तरह खत्म नहीं हुआ था; उनके भीतर की वो 'weirdness' या हिचकिचाहट अब भी थोड़ी-बहुत बनी हुई थी। वह अब भी घर में चलते-फिरते वक्त सतर्क रहती थीं। दूसरी तरफ, इमरान ने जैसे खुद ही हमारे सामने आना कम कर दिया था। वह ज्यादातर अपने कमरे में रहता या किसी काम से बाहर चला जाता। लेकिन उन दिनों वह जब भी हमारे सामने आया, उसका रवैया बेहद शालीन था। खासकर मम्मी के साथ उसने बहुत अदब और सम्मान से व्यवहार किया, जैसे वह उनके डर को भांपकर खुद उन्हें सहज करने की कोशिश कर रहा हो।
चौथे दिन सुबह की शुरुआत हमेशा की तरह हुई। करीब नौ बजे के आसपास इमरान नहा-धोकर, साफ़-सुथरे कपड़ों में तैयार होकर कमरे से बाहर निकला। उसने डाइनिंग टेबल पर हमारे साथ बैठकर बेहद शांति से नाश्ता किया। बातचीत भी सामान्य रही। लेकिन नाश्ता खत्म होते ही वह अपने कमरे में गया और अचानक एक ट्रैवल बैग हाथ में लिए बाहर आया।
उसके हाथ में बैग देख मैं चौंक गया,
"अरे इमरान? ये अचानक बैग... कहीं जा रहा है क्या?" मैंने पूछा।
इमरान ने बैग को फर्श पर रखा और थोड़ा गंभीर होकर बोला,
"हाँ देव भाई, अचानक घर से कॉल आया था… अम्मी ने कहा है कि मुझे तुरंत निकलना होगा।"
"क्यों? सब खैरियत तो है न?" मैंने उत्सुकता और थोड़ी चिंता के साथ पूछा। रसोई की चौखट पर खड़ी मम्मी भी शांत रहकर हमारी बातें सुन रही थीं।
इमरान ने एक हल्की सांस ली,
"हाँ, फोन पर तो कहा कि घर पर सब ठीक ही है। लेकिन तुझे तो पता है, अम्मी अक्सर छोटी-छोटी बातों पर परेशान हो जाती है। अब असल बात क्या है जिसकी वजह से मुझे यूँ अचानक बुलाया जा रहा है, ये तो मुझे घर जाकर ही पता चलेगा। वैसे भी बहुत वक्त से घर गया नहीं हूँ।"
उसने आगे बढ़कर मम्मी के सामने हाथ जोड़े,
"अच्छा आंटी जी, मैं चलता हूँ। अपना ख्याल रखिएगा।"
मम्मी ने बस धीमे से सिर हिलाया और चेहरे पर एक औपचारिक मुस्कान ले आईं, लेकिन उनके चेहरे पर एक अजीब सा ठहराव था।
मम्मी ऊपर बालकनी में ही खड़ी रहीं और मैं इमरान को नीचे तक छोड़ने के लिए उसके साथ आया। नीचे आकर मैंने अपनी बाइक की तरफ इशारा करते हुए कहा,
"चल, मैं तुझे स्टेशन तक छोड़ देता हूँ। वैसे भी आज ऑफिस थोड़ा लेट जाऊंगा तो चलेगा।"
इमरान ने तुरंत मना करते हुए कहा,
"नहीं-नहीं देव भाई, बिल्कुल नहीं। तू ऑफिस के लिए लेट मत हो। मैंने ऑटो वाले को फोन कर दिया है, वो मोड़ पर ही खड़ा है। मैं अकेला ही चला जाऊंगा। तू बस आंटी का ख्याल रख।"
उसने मेरे कंधे को थपथपाया, अपनी वही मुस्कान दी और बैग उठाकर आगे बढ़ गया।
दिनभर दफ्तर में काम करते हुए भी मेरे दिमाग में यही चल रहा था कि इमरान का इस तरह अचानक जाना कहीं मम्मी के उस अजीब व्यवहार से तो नहीं जुड़ा था? क्या उसने जानबूझकर घर जाने का बहाना बनाया?
शाम को जब मैं ऑफिस की थकावट समेटकर फ्लैट पर लौटा, तो जैसे ही मैंने दरवाजा खोला, मुझे घर का माहौल बिल्कुल बदला हुआ लगा। रसोई से मम्मी के गुनगुनाने की धीमी आवाज़ आ रही थी। हॉल में आकर मैंने देखा—मम्मी बहुत खुश लग रही थीं। उनके चेहरे का वो दो दिनों का तनाव, वो डर और वो घबराहट जैसे कपूर की तरह उड़ चुकी थी।
वह पूरे फ्लैट में बहुत 'freely' चल-फिर रही थीं। पौधों में पानी डालते हुए, सोफे की चादर ठीक करते हुए उनके हाव-भाव में एक अजीब सा सुकून था, मानो वह किसी अदृश्य बंधन या बहुत बड़े मानसिक दबाव से आज़ाद हो गई हों। वह सचमुच एक अलग ही फ्रीडम में जी रही थीं।
"आ गया? हाथ-मुंह धो ले, मैंने तेरी पसंद के गरमा-गरम पनीर के पकौड़े बनाए हैं,"
उन्होंने रसोई से आवाज दी। उनकी आवाज़ में वही बीरभूम वाली खनक वापस आ गई थी।
मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि इमरान के जाते ही मम्मी के भीतर यह चमत्कारी बदलाव कैसे आ गया। उनके इस विरोधाभासी व्यवहार की पहेली मेरे लिए अब भी अनसुलझी थी। लेकिन उस वक्त, उस खूबसूरत शाम को, मैंने अपने दिमाग पर ज्यादा ज़ोर देना ठीक नहीं समझा… महीनों बाद मम्मी को इस तरह खुलकर हंसते और खुश देखकर मेरे मन का सारा बोझ हल्का हो गया। मैं भी बेहद खुश और पूरी तरह निश्चिंत हो गया, यह सोचकर कि चलो, कम से कम मेरी माँ अब सुरक्षित और सहज महसूस कर रही है।
और मम्मी की यह ख़ुशी अगले चार दिनों तक यथावत बनी रही..
लेकिन फिर....
To be Continued….
अगले दो-तीन दिन का समय सतह पर तो बिल्कुल सामान्य बीता, लेकिन घर के भीतर एक अजीब सी खामोशी तैर रही थी। मम्मी का वह सहमा हुआ व्यवहार पूरी तरह खत्म नहीं हुआ था; उनके भीतर की वो 'weirdness' या हिचकिचाहट अब भी थोड़ी-बहुत बनी हुई थी। वह अब भी घर में चलते-फिरते वक्त सतर्क रहती थीं। दूसरी तरफ, इमरान ने जैसे खुद ही हमारे सामने आना कम कर दिया था। वह ज्यादातर अपने कमरे में रहता या किसी काम से बाहर चला जाता। लेकिन उन दिनों वह जब भी हमारे सामने आया, उसका रवैया बेहद शालीन था। खासकर मम्मी के साथ उसने बहुत अदब और सम्मान से व्यवहार किया, जैसे वह उनके डर को भांपकर खुद उन्हें सहज करने की कोशिश कर रहा हो।
चौथे दिन सुबह की शुरुआत हमेशा की तरह हुई। करीब नौ बजे के आसपास इमरान नहा-धोकर, साफ़-सुथरे कपड़ों में तैयार होकर कमरे से बाहर निकला। उसने डाइनिंग टेबल पर हमारे साथ बैठकर बेहद शांति से नाश्ता किया। बातचीत भी सामान्य रही। लेकिन नाश्ता खत्म होते ही वह अपने कमरे में गया और अचानक एक ट्रैवल बैग हाथ में लिए बाहर आया।
उसके हाथ में बैग देख मैं चौंक गया,
"अरे इमरान? ये अचानक बैग... कहीं जा रहा है क्या?" मैंने पूछा।
इमरान ने बैग को फर्श पर रखा और थोड़ा गंभीर होकर बोला,
"हाँ देव भाई, अचानक घर से कॉल आया था… अम्मी ने कहा है कि मुझे तुरंत निकलना होगा।"
"क्यों? सब खैरियत तो है न?" मैंने उत्सुकता और थोड़ी चिंता के साथ पूछा। रसोई की चौखट पर खड़ी मम्मी भी शांत रहकर हमारी बातें सुन रही थीं।
इमरान ने एक हल्की सांस ली,
"हाँ, फोन पर तो कहा कि घर पर सब ठीक ही है। लेकिन तुझे तो पता है, अम्मी अक्सर छोटी-छोटी बातों पर परेशान हो जाती है। अब असल बात क्या है जिसकी वजह से मुझे यूँ अचानक बुलाया जा रहा है, ये तो मुझे घर जाकर ही पता चलेगा। वैसे भी बहुत वक्त से घर गया नहीं हूँ।"
उसने आगे बढ़कर मम्मी के सामने हाथ जोड़े,
"अच्छा आंटी जी, मैं चलता हूँ। अपना ख्याल रखिएगा।"
मम्मी ने बस धीमे से सिर हिलाया और चेहरे पर एक औपचारिक मुस्कान ले आईं, लेकिन उनके चेहरे पर एक अजीब सा ठहराव था।
मम्मी ऊपर बालकनी में ही खड़ी रहीं और मैं इमरान को नीचे तक छोड़ने के लिए उसके साथ आया। नीचे आकर मैंने अपनी बाइक की तरफ इशारा करते हुए कहा,
"चल, मैं तुझे स्टेशन तक छोड़ देता हूँ। वैसे भी आज ऑफिस थोड़ा लेट जाऊंगा तो चलेगा।"
इमरान ने तुरंत मना करते हुए कहा,
"नहीं-नहीं देव भाई, बिल्कुल नहीं। तू ऑफिस के लिए लेट मत हो। मैंने ऑटो वाले को फोन कर दिया है, वो मोड़ पर ही खड़ा है। मैं अकेला ही चला जाऊंगा। तू बस आंटी का ख्याल रख।"
उसने मेरे कंधे को थपथपाया, अपनी वही मुस्कान दी और बैग उठाकर आगे बढ़ गया।
दिनभर दफ्तर में काम करते हुए भी मेरे दिमाग में यही चल रहा था कि इमरान का इस तरह अचानक जाना कहीं मम्मी के उस अजीब व्यवहार से तो नहीं जुड़ा था? क्या उसने जानबूझकर घर जाने का बहाना बनाया?
शाम को जब मैं ऑफिस की थकावट समेटकर फ्लैट पर लौटा, तो जैसे ही मैंने दरवाजा खोला, मुझे घर का माहौल बिल्कुल बदला हुआ लगा। रसोई से मम्मी के गुनगुनाने की धीमी आवाज़ आ रही थी। हॉल में आकर मैंने देखा—मम्मी बहुत खुश लग रही थीं। उनके चेहरे का वो दो दिनों का तनाव, वो डर और वो घबराहट जैसे कपूर की तरह उड़ चुकी थी।
वह पूरे फ्लैट में बहुत 'freely' चल-फिर रही थीं। पौधों में पानी डालते हुए, सोफे की चादर ठीक करते हुए उनके हाव-भाव में एक अजीब सा सुकून था, मानो वह किसी अदृश्य बंधन या बहुत बड़े मानसिक दबाव से आज़ाद हो गई हों। वह सचमुच एक अलग ही फ्रीडम में जी रही थीं।
"आ गया? हाथ-मुंह धो ले, मैंने तेरी पसंद के गरमा-गरम पनीर के पकौड़े बनाए हैं,"
उन्होंने रसोई से आवाज दी। उनकी आवाज़ में वही बीरभूम वाली खनक वापस आ गई थी।
मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि इमरान के जाते ही मम्मी के भीतर यह चमत्कारी बदलाव कैसे आ गया। उनके इस विरोधाभासी व्यवहार की पहेली मेरे लिए अब भी अनसुलझी थी। लेकिन उस वक्त, उस खूबसूरत शाम को, मैंने अपने दिमाग पर ज्यादा ज़ोर देना ठीक नहीं समझा… महीनों बाद मम्मी को इस तरह खुलकर हंसते और खुश देखकर मेरे मन का सारा बोझ हल्का हो गया। मैं भी बेहद खुश और पूरी तरह निश्चिंत हो गया, यह सोचकर कि चलो, कम से कम मेरी माँ अब सुरक्षित और सहज महसूस कर रही है।
और मम्मी की यह ख़ुशी अगले चार दिनों तक यथावत बनी रही..
लेकिन फिर....
To be Continued….


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