13-06-2026, 10:39 AM
एपिसोड 12: खामोशियाँ
To be Continued….
मम्मी के आने से फ्लैट में जो रौनक आई थी, वह दो दिनों तक तो बड़े अच्छे से चली। बीरभूम की सादगी और महानगर की इस चकाचौंध के बीच एक खूबसूरत तालमेल बैठ गया था। मैं रोज सुबह उनके हाथ का बना नाश्ता खाकर दफ्तर जाता और शाम को लौटकर उनके साथ दिनभर की बातें साझा करता। लेकिन तीसरे दिन से अचानक न जाने क्या हुआ कि घर की हवा में एक अजीब सा तनाव घुलने लगा। मम्मी का व्यवहार अचानक बदलने लगा था, और वह कुछ ऐसी हरकतें करने लगी थीं जो सामान्य तो बिल्कुल नहीं थीं।
मैंने गौर किया कि उनका यह 'weird' व्यवहार किसी और समय नहीं, बल्कि खास तौर पर तब उभर कर आता था जब इमरान आसपास होता था!
जब भी इमरान कमरे में दाखिल होता या डाइनिंग टेबल पर हमारे साथ बैठता, मम्मी अचानक सहम जातीं। उनकी आँखों में अनजाना सा कुछ तैर जाता, जिसे वह अपनी साड़ी के पल्लू को उंगलियों में भींचकर छुपाने की कोशिश करती थीं। जहाँ पहले दिन उन्होंने बेहद अपनेपन से इमरान को चाय दी थी, अब वह इमरान की मौजूदगी में कुछ परेशान सी रहने लगी थीं। वह जानबूझकर रसोई से बाहर नहीं निकलती थीं या अगर हॉल में होतीं, तो इमरान के आते ही किसी न किसी बहाने से उठकर मेरे कमरे में चली जाती थीं। वह इमरान से एक सोची-समझी दूरी बनाए रखने की पूरी कोशिश कर रही थीं।
एक शाम जब इमरान बालकनी में फोन पर बात कर रहा था, मैं रसोई में पानी पीने गया। मम्मी वहां बर्तन समेट रही थीं, लेकिन उनका ध्यान काम में नहीं था। वह बार-बार मुड़कर हॉल की तरफ देख रही थीं, जैसे किसी की आहट का इंतजार कर रही हों…
मुझसे अब और रहा नहीं गया….
मैंने उनके पास जाकर उनके हाथ पर अपना हाथ रखा,
"मम्मी... क्या बात है? आप पिछले दो दिनों से बहुत परेशान लग रही हैं…. क्या आपको यहाँ कोई तकलीफ है? या मुझसे कोई गलती हुई है?"
मम्मी ने एक पल के लिए चौंककर मुझे देखा—
उनकी आँखों में वो बेबसी थी जिसे मैं बचपन से पहचानता था। लेकिन अगले ही पल, उन्होंने अपने चेहरे पर एक झूठी, फीकी सी मुस्कान ओढ़ ली और बात को टालने के लहजे में बोलीं,
"अरे, नहीं तो! मुझे क्या परेशानी होगी? मेरा बेटा इतने अच्छे शहर में रहता है, इतना बड़ा फ्लैट है। मैं तो बस... बीरभूम की याद आ रही थी। वहां घर पर ताला लगा है न, तो बस उसी की चिंता लगी रहती है।"
"मम्मी, आप मुझसे झूठ बोल रही हैं," मैंने थोड़ा ज़ोर देकर कहा, "बीरभूम की चिंता में कोई इस तरह परेशान नहीं रहता… मुझे साफ दिख रहा है कि आप असहज हैं! बात क्या है, आप मुझे क्यों नहीं बता रहीं?"
"कुछ नहीं है देव, तू बिना बात के बात का बतंगड़ बना रहा है… जा, जाकर अपना काम कर, दफ्तर की फाइलें देख," उन्होंने मुस्कुराकर मेरे गाल को सहलाया और मुझे रसोई से बाहर ढकेल दिया।
उन्होंने भले ही बात हंसकर टाल दी थी, लेकिन मैं कोई बच्चा नहीं था। मन के किसी गहरे कोने से मुझे यह साफ और मजबूत फीलिंग आ रही थी कि मम्मी का यह बदला हुआ, सहमा हुआ व्यवहार जरूर इमरान को लेकर ही था। उनका इमरान के सामने आते ही असहज हो जाना, उसकी नजरों से बचना, और उसकी अनुपस्थिति में एक गहरी सांस लेना—यह सब सीधे तौर पर इमरान की तरफ इशारा कर रहा था।
लेकिन सबसे बड़ी दुविधा यह थी कि मेरे पास कोई ठोस सबूत या ठोस वजह नहीं थी जिसके दम पर मैं मम्मी से दोबारा कड़ाई से पूछता या इमरान को सीधे कन्फ्रंट करता। मैं इमरान से क्या कहता? यही कि तुम जब सामने आते हो तो मेरी मम्मी चुप हो जाती हैं? वह इसे मेरा वहम कहकर उड़ा देता, जैसा कि वह अक्सर अपनी 'स्मार्ट टॉकिंग' से करता आया था… और फिर, मुझे इमरान के उस रहस्यमयी रजिस्टर और लैपटॉप पर मम्मी की तस्वीरों को ज़ूम करके देखने वाली रात भी याद थी।
एक तरफ इमरान का वह उस दिन वाला एक अर्थपूर्ण मुस्कान था, और दूसरी तरफ मम्मी का यह जीती-जागती घबराहट— इन दोनों कड़ियों के बीच कोई न कोई ऐसा खौफनाक रिश्ता जरूर था जिसे मैं देख नहीं पा रहा था।
रात के खाने की मेज पर सन्नाटा और भी गहरा हो गया… इमरान ने बेहद सामान्य बनने की कोशिश करते हुए कहा,
"आंटी जी, आज कोई कहानी नहीं सुनाई आपने? देव कह रहा था कि वहां बड़े पुराने किस्से हैं।"
मम्मी ने अपनी नजरें नीचे रखीं और केवल सिर हिलाकर रह गईं,
"नहीं बेटा, आज थोड़ा सिर भारी है।"
मैंने देखा कि इमरान की निगाहें मम्मी के झुके हुए चेहरे पर टिकी थीं, कुछ सेकंड चेहरे पर टिके रहने के बाद नज़रें अपने-आप सुराहीदार गले से होते हुए उनके भरे सीने पर आकर जम जातीं... वहाँ भी कुछ अच्छे सेकंड रहने के बाद ही उसकी नज़रें अपने खाने पर आ कर स्थिर होतीं।
और उसकी उन आँखों में वही रहस्यमयी, गहरी टकटकी थी जिसने मुझे पहले भी किसी अनहोनी से डराया था…. मैं अपनी उंगलियों को भींचे बस देखता रह गया।
मैं एक ऐसे मोड़ पर खड़ा था जहाँ अपने ही घर में, अपने सबसे अच्छे दोस्त और अपनी माँ के बीच एक अनकही, खौफनाक जंग चल रही थी, और मैं चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहा था।
To be Continued….


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