05-06-2026, 08:37 AM
एपिसोड 11: दहलीज पर ममता
इस शहर में आए हुए मुझे बहुत दिन बीत गए थे... दिन क्या, महीने बीत गए थे... घर और मम्मी की याद बहुत अधिक सताने लगी थी। और बात बस यादों तक सीमित नहीं रही थी... ये अब चिंता का रूप लेने लगी थी... मम्मी अकेले वहाँ कैसे होगी? कैसे दिन बीता रही होगी? कहीं कभी बीमार पड़ गई तो? ध्यान कौन रखेगा इनका वहाँ?
To be Continued….
इस शहर में आए हुए मुझे बहुत दिन बीत गए थे... दिन क्या, महीने बीत गए थे... घर और मम्मी की याद बहुत अधिक सताने लगी थी। और बात बस यादों तक सीमित नहीं रही थी... ये अब चिंता का रूप लेने लगी थी... मम्मी अकेले वहाँ कैसे होगी? कैसे दिन बीता रही होगी? कहीं कभी बीमार पड़ गई तो? ध्यान कौन रखेगा इनका वहाँ?
इन सब चिंताओं के कारण ही मैंने उनको अपने यहाँ ले आने का निर्णय लिया।
बीरभूम के उस शांत, छोटे से घर से मम्मी को इस बड़े और रफ्तार से भागते शहर में लाने के लिए मुझे न जाने कितने पापड़ बेलने पड़े थे। फोन पर हर बार मेरी जिद के आगे वह अपनी कोई न कोई मजबूरी रख देती थीं—कभी घर की रखवाली, कभी पैसों की फिजूलखर्ची, तो कभी सफर की थकान। लेकिन आखिरकार, मेरी जिद और ममता की डोर जीत गई। वह कुछ दिनों के लिए मेरे फ्लैट पर रहने चली आईं।
जब वह सामान समेटकर मेरे फ्लैट में रहने आई, तो फ्लैट की दीवारों का सन्नाटा जैसे हमेशा के लिए गायब हो गया। वह दिन मेरी जिंदगी के सबसे खूबसूरत दिनों में से एक था। मैंने तय कर लिया था कि इन कुछ दिनों में मैं मम्मी को दुनिया की हर खुशी दूंगा। मैंने उन्हें शहर की बड़ी-बड़ी इमारतें दिखाईं, मखमली सीटों वाले थियेटर में फिल्म दिखाई और शाम को एक आलीशान रेस्टोरेंट में ले गया।
"बेटा, इतने बड़े होटल में आने की क्या जरूरत थी रे? घर पर ही दो रोटियां बना लेती मैं," उन्होंने रेस्टोरेंट के झूमरों और सजे-धजे बियरिंग टेबल को देखकर धीरे से मेरे कान में कहा।
"मम्मी, आज कोई बहस नहीं। आज आप सिर्फ आराम करेंगी और वीआईपी की तरह खाएंगी," मैंने मुस्कुराते हुए मेन्यू उनके सामने रख दिया।
मैंने उन्हें उनकी पसंद का खाना और बाद में एक मशहूर पार्लर से नए फ्लेवर की चोको-बादाम आइसक्रीम खिलाई। ठंडी और मलाईदार आइसक्रीम का पहला चम्मच मुंह में लेते ही उनके चेहरे पर जो बच्चों जैसी मासूम खुशी आई, उसने मेरा दिल जीत लिया। वह खुश थीं, बहुत खुश थीं। उनकी आँखों में मेरे लिए एक गहरा गर्व तैर रहा था।
"तू अब सच में बहुत बड़ा और जिम्मेदार हो गया है," उन्होंने पार्क की बेंच पर बैठते हुए मेरे सिर पर हाथ रखा। "ईश्वर तुझे और आगे बढ़ाए, बहुत तरक्की दे। लेकिन बेटा, एक माँ की बात मान, इतना खर्च मत किया कर। अभी शुरुआत है, भविष्य के लिए बचत करना बहुत जरूरी है।"
"मम्मी, आपका आशीर्वाद अगर साथ हैं तो बचत भी हो जाएगी। आज का दिन सिर्फ आपके लिए है," मैंने उनका हाथ थामते हुए कहा। उस दिन मैंने उन पर दिल खोलकर खर्च किया, उनकी पसंद की सूती साड़ियां खरीदीं और उन्हें महसूस कराया कि उनका बेटा अब वाकई अपने पैरों पर खड़ा हो चुका है।
उस पूरे दिन इमरान फ्लैट में नहीं था। वह अपने किसी 'शॉर्ट-कट' वाले काम के सिलसिले में शहर से बाहर गया हुआ था। मुझे भी एक तरह से अच्छा लगा कि मुझे और मम्मी को बिना किसी तीसरे की दखलअंदाजी के पूरा वक्त साथ बिताने को मिला….
अगली सुबह, रसोई से चाय और छौंक की खुशबू आ रही थी। मम्मी रसोई में नाश्ता तैयार कर रही थीं और मैं डाइनिंग टेबल पर बैठा अखबार देख रहा था। तभी अचानक फ्लैट का मुख्य दरवाजा खुला और इमरान अंदर दाखिल हुआ। उसके कंधे पर एक बैग था और चेहरे पर थकान, जो सफर से लौटने की गवाही दे रही थी।
लेकिन जैसे ही उसने हॉल को पार कर रसोई की तरफ कदम बढ़ाए, वह ठिठक गया…
सामने एक महिला को साड़ी पहने, सलीके से काम करते देख उसके पैरों के नीचे की जमीन जैसे जम गई। वह बुरी तरह चौंक गया था। शहर के इस फ्लैट में, जहाँ सिर्फ हम दो लड़के रहते थे, एक संभ्रांत महिला की मौजूदगी उसके लिए बिल्कुल अप्रत्याशित थी।
"अरे... देव? ये... कौन है?" इमरान ने हकबकाते हुए मेरी तरफ देखा।
बेचारा, फोटो में लाख घूर-घूर कर देखे, लेकिन सामने से पहचान ही नहीं पा रहा!
मैं अपनी कुर्सी से उठा और मुस्कुराते हुए बोला,
"इमरान, ये मेरी मम्मी हैं। कल ही आई हैं….।"
'मम्मी' शब्द सुनते ही इमरान के चेहरे का रंग जैसे उड़ गया। उसने एक बार मुझे देखा और फिर रसोई की चौखट पर खड़ी मम्मी को। उसके चेहरे पर आए अविश्वास के भाव इतने साफ थे कि कोई भी उन्हें पढ़ सकता था। उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि जिस महिला को उसने अब तक सिर्फ मोबाइल की स्क्रीन पर, तस्वीरों में देखा था, वह आज साक्षात उसके सामने खड़ी थी।
मम्मी ने अपनी आदत के अनुसार शालीनता से मुस्कुराते हुए बोली,
"कैसे हो, इमरान? देव, अक्सर तुम्हारे बारे में बताता रहता है।"
इमरान ने तुरंत खुद को संभाला, उसकी हमेशा की 'स्मार्ट टॉकिंग' आज कहीं गायब थी।
"म.. मेरे बारे में...?"
इमरान हकलाया... चेहरे पर आए भाव ने साफ़ बताया की बेचारा बुरी तरह डर और घबरा गया है।
पर, फिर मुझे और मम्मी को मुस्कराते देख कर वो समझ गया की जो समझ कर वो घबरा गया था, वैसी कोई बात नहीं है।
उसने चेहरे पर जल्दी से मुस्कान लाते हुए बोला,
"नमस्ते आंटी जी... देव भी बहुत अच्छा लड़का है। मुझे... मुझे बस अचानक यकीन नहीं हुआ कि आप यहाँ हैं। देव ने बताया नहीं था कि आप कल ही आ रही हैं।"
"हाँ, वो इसके पापा की तरह ही थोड़ा जिद्दी है। अचानक ही टिकट करा कर ले आया,"
मम्मी ने चाय का कप टेबल पर रखते हुए कहा… "बैठो बेटा, सफर से आए हो, चाय पियोगे?"
"जी, बिल्कुल," इमरान ने कहा और सोफे पर बैठ गया।
इसके बाद अगले दस-पंद्रह मिनट दोनों के बीच बेहद औपचारिक और इधर-उधर की बातें होती रहीं। मम्मी घर के मौसम और वहां के शांत जीवन के बारे में बता रही थीं और इमरान बहुत ध्यान से, एक संस्कारी लड़के की तरह उनकी बातें सुन रहा था।
बातचीत बहुत सामान्य थी, लेकिन मैं सोफे के कोने में बैठा इमरान के चेहरे को पढ़ रहा था….
उसकी आँखों में एक अजीब सी, गहरी चमक थी। वह अंदर ही अंदर इतना ज्यादा खुश नज़र आ रहा था कि उसकी वो खुशी उसके चेहरे पर साफ छलक रही थी। वह बात करते-करते बार-बार मम्मी के चेहरे, उनके बात करने के लहजे और उनकी सादगी को बहुत करीब से देख रहा था।
उसका खुश होना स्वाभाविक हो सकता था कि उसके दोस्त की माँ आई हैं, लेकिन उसकी खुशी में एक अजीब सा उत्साह था, एक ऐसा रोमांच था जो मुझे उस वक्त समझ नहीं आया। वह रह-रहकर मुस्कुरा उठता और मम्मी की हर छोटी बात पर इस तरह हामी भरता जैसे उसे उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी मुराद मिल गई हो।
"अच्छा आंटी जी, मैं थोड़ा फ्रेश हो जाता हूँ," कुछ देर बाद इमरान उठा और अपने कमरे की तरफ बढ़ गया।
जाते-जाते उसने एक बार फिर पलटकर मम्मी को देखा, और फिर मेरी तरफ देखकर एक मुस्कान दी। मैं वहीं खड़ा सोच रहा था—इमरान मेरी मम्मी के आने से इतना ज्यादा उत्साहित और खुश क्यों है? क्या यह सिर्फ एक अदब था, या फिर कुछ ऐसा जिसकी भनक मुझे अभी नहीं थी?
To be Continued….


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