05-06-2026, 07:33 AM
एपिसोड 10: गहराता शक
संदेह का एक छोटा सा बीज जब मन में बो दिया जाता है, तो वह बहुत खामोशी से अपनी जड़ें फैलाने लगता है….
इमरान का वह तस्वीरों को देखने का अजीब तरीका, विशेषकर सलवार-सूट वाली साइड और पीछे से ली गई तस्वीरों पर उसका रुक जाना, मिनटों तक अपलक देखते रहना,.... मेरे दिमाग में एक फांस की तरह चुभ गया था। मैं चाहकर भी उस असहजता को भुला नहीं पा रहा था। दफ्तर में काम करते हुए भी कई बार मेरा ध्यान भटक जाता और आँखों के सामने इमरान का वह सम्मोहित चेहरा आ जाता।
मैंने सोचा कि शायद मैं ही जरूरत से ज्यादा संवेदनशील हो रहा हूँ, लेकिन मन का वो कोना मानने को तैयार नहीं था जिसे हम 'गट फीलिंग' कहते हैं…. और अगले कुछ दिनों में, मेरा यह शक सिर्फ गहरा नहीं हुआ, बल्कि इसने एक डरावनी शक्ल अख्तियार कर ली।
अब इमरान की आदतें और ज्यादा अजीब हो चुकी थीं। वह केवल रात के वक्त ही नहीं, बल्कि जब भी मुझे घर में अकेला किसी काम में उलझा हुआ पाता, किसी न किसी बहाने से बातचीत को मम्मी की तरफ मोड़ देता।
एक संडे की दोपहर जब मैं अपनी स्केचबुक लेकर बैठा था, इमरान मेरे कमरे के दरवाजे पर आकर टेक लगाकर खड़ा हो गया। उसके हाथ में हमेशा की तरह उसका फोन था….
"यार, तेरी अम्मी की वो जो छत वाली पिक्चर थी... वो तूने कब खींची थी? मतलब, मौसम कैसा था उस वक्त?"
मैंने पेंसिल को पेपर पर घिसते हुए थोड़ा रुखाई से कहा, "यार, दो साल पुरानी बात है। सर्दियों के दिन थे, शायद धूप सेक रही थीं वो। क्यों?"
"नहीं, बस ऐसे ही। लाइटिंग बहुत मस्त थी!" उसने बेहद हल्के अंदाज में कहा, पर उसकी आँखों में वही पुरानी टकटकी थी….
"वैसे, अम्मी जब घर में अकेली होती हैं, तो क्या वो कभी कोई गहने या भारी साड़ियां पहनती हैं? जैसे हमारी तरफ औरतें त्योहारों पर बिल्कुल अलग लगती हैं।"
इस बार मुझे उसकी बात बहुत ज्यादा अजीब लगी— कोई किसी दोस्त की माँ के पहनावे, उनके अकेलेपन और उनके हाव-भाव में इतनी बारीक दिलचस्पी कैसे ले सकता है?
मैंने हल्की रुखाई से ही कहा,
"जब तक मैं था वहाँ, आम तौर पर तो वह साड़ी या सलवार-कमीज़ ही पहनती थी... अभी तो यहीं हूँ, बहुत टाइम से घर नहीं गया... इसलिए कह पाना मुश्किल है की वह अब क्या....."
मैंने अपना लाइन जानबूझकर अधूरा छोड़ा... अपनी मम्मी के पहनावे के बारे में बाहर के किसी लड़के के साथ बात करना सही नहीं लगा।
मेरी बात सुन कर इमरान कुछ सोचते हुए धीरे से बड़बड़ाया, "जब तक वहाँ था.... हम्म।"
मैंने टोका उसे,
"क्यों पूछ रहा है ये सब?"
"कुछ खास नहीं, बस अपनी अम्मी के साथ तेरी अम्मी की कोम्प्रोमाईज़ कर रहा था..!" जवाब उसने इतनी जल्दी दिया मानो पहले से सोचकर रखा था।
"क्या..?! क्या कर रहा था?!"
"कोम्प्रोमाईज़.."
मैं उसकी तरफ देखता रहा... वो असहज हो कर बोला,
"अबे, कोम्प्रोमाईज़ नहीं समझता? तुलना करना यार!"
मैं हँस पड़ा... मुझे हँसता देख वो थोड़ा हैरान हो कर बोला,
"इसमें हँसने वाली क्या बात है...? हँसना छोड़ कर अपनी अँग्रेज़ी सुधारने पर ज़ोर दो!"
"अबे चोदू, वो कोम्प्रोमाईज़ नहीं, कम्पेयर बोलते हैं... या कम्पेरिज़न।" मैं हँसते हुए बोला।
"हाँ, वही।" वह चिढ़ गया।
थोड़ी देर चुप्पी के बाद वह फिर बोला,
"एक और बात पूछूँ?"
"हाँ, पूछ।"
"बुरा तो नहीं मानेगा?"
"इसकी गारंटी नहीं दे सकता।"
"तेरी अम्मी घर में नाईटी नहीं पहनती? हो सकता है पहले नहीं पहनती थी, लेकिन क्या पता, शायद अब पहनती हो?"
मुझे जवाब देने का मन नहीं किया, इसलिए बेमन से बोला,
"अब क्यों पहनेगी?"
"हो सकता है अब तू नहीं है वहाँ तो इसलिए शायद खुद को अभी ज़्यादा फ्री फील करती होगी।"
मैंने कुछ नहीं कहा... ऐसे एक्सप्रेशन दिया मानो अपने काम में कितना डूबा हुआ हूँ... मुझे कुछ बोलता नहीं देख कर इमरान धीरे से बोला,
"लेडीज़ लोग में होता है, घर में जवान बेटा हो तो नाईटी पहनने से दूर ही रहती है।"
इस बात पे मेरी जीभ मानो मेरे तालु से चिपक गयी! एक तो वैसे भी पता नहीं क्यों मैं अपनी मम्मी को लेकर आज बात करने के मूड में कतई नहीं था... और ऊपर से इमरान ऐसे विषयों को छेड़ रहा था जिसपे मैं खुद असहज था।
"इमरान," मैंने अपनी स्केचबुक बंद करते हुए सीधे उसकी आँखों में देखा। "तुझसे एक बात पूछूं? तू हर वक्त मेरी मम्मी के बारे में ही क्यों पूछता रहता है? तेरे पास अपनी फैमिली या किसी और चीज की बातें नहीं हैं क्या?"
मेरे अचानक इस तरह सीधे पूछने से इमरान के चेहरे पर एक पल के लिए हवाइयां उड़ गईं। उसकी 'स्मार्ट टॉकिंग' का मुखौटा जैसे सरक गया… उसने नजरें चुराईं और थोड़ा हकलाते हुए बोला,
"अरे... अरे नहीं भाई! तू तो सीरियस हो गया। मैंने कहा था न, मैं चीजों को एक विजुअल आर्टिस्ट की तरह देखता हूँ। मुझे बस... उस सादगी में एक कहानी दिखती है। तू गलत समझ रहा है।"
वह हंसने की कोशिश कर रहा था, लेकिन उसकी हंसी खोखली थी। वह तुरंत वहां से हट गया और अपने कमरे में चला गया।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई…
असली झटका मुझे उस रात लगा जब मुझे देर रात प्यास लगी….
घड़ी में रात के करीब पौने तीन बजे थे। पूरा फ्लैट अंधेरे में डूबा था। मैं दबे पांव रसोई की तरफ बढ़ा और फ्रिज से पानी की बोतल निकाली। पानी पीकर जब मैं वापस अपने कमरे की तरफ लौट रहा था, तो मैंने देखा कि हॉल में इमरान के कमरे का दरवाजा थोड़ा खुला हुआ था और अंदर हल्की सी रोशनी जल रही थी।
आमतौर पर मैं किसी की प्राइवेसी में दखल नहीं देता, लेकिन एक अजीब सी उत्सुकता और अंदेशे ने मेरे कदम वहीं रोक दिए। मैंने दबे पांव जाकर दरार से अंदर झांका।
जो दृश्य मैंने देखा, उसने मेरे पैर तले की जमीन खिसका दी।
इमरान अपने बिस्तर पर बैठा था। कमरे की लाइट बंद थी, सिर्फ उसके लैपटॉप की स्क्रीन की तेज रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी। और उस स्क्रीन पर... मेरी मम्मी की वही छत वाली, पीछे से ली गई तस्वीर खुली हुई थी। लेकिन वह सिर्फ तस्वीर नहीं देख रहा था। उसने किसी फोटो-एडिटिंग सॉफ्टवेयर में उस तस्वीर को खोल रखा था।
वह तस्वीर को ज़ूम कर रहा था, कभी मम्मी के हाथों की चूड़ियों पर, कभी उनकी साड़ी के पल्लू के लहराने के एंगल पर, तो कभी उनके खड़े होने के पोज पर, कभी उनके उठे हुए नितम्बों पर.... तो कभी ब्लाउज से झाँकती उनकी पीठ पर..! वह स्क्रीन पर उंगली फिराते हुए कुछ बड़बड़ा रहा था, जैसे कोई गणितीय समीकरण सुलझा रहा हो…. उसके चेहरे पर जो भाव थे, वे किसी साधारण इंसान के नहीं थे। उसकी आँखों में एक अजीब सा पागलपन, एक गहरा जुनून और... एक खौफनाक सम्मोहन था।
"बिल्कुल वही... वही झुकाव है। समय भी सही है..." उसने बहुत धीमी आवाज में खुद से कहा।
तभी उसका हाथ लैपटॉप के बगल में रखे एक पुराने, फटेहाल रजिस्टर पर गया। उसने उसे खोला, जिसमें कुछ उर्दू या पुरानी लिपि में लिखा हुआ था, और साथ में कुछ अजीब से रेखाचित्र बने हुए थे जो देखने में किसी तरह का तंत्र जैसे लग रहे थे। उसने उस रजिस्टर के पन्ने पलटे और फिर स्क्रीन पर मम्मी की तस्वीर को देखा....
मेरी छाती में हथौड़े जैसी धड़कनें गूंजने लगीं…. यह कोई सामान्य बात नहीं थी। इमरान का मेरी मम्मी की तस्वीरों में यह रुझान क्या किसी वासना या साधारण आकर्षण का है, या... या शायद कहीं कुछ और है...?
क्या इमरान मेरी मम्मी की इस तस्वीर का इस्तेमाल किसी अजीब काम के लिए कर रहा था? क्या उसका मुझसे दोस्ती करना और इस फ्लैट में आना सिर्फ एक इत्तेफाक था, या कोई खौफनाक मंसूबा?
मैं बिना कोई आवाज किए, उल्टे पांव अपने कमरे में लौट आया। सुबह तक मेरी आँखों से नींद गायब थी।
कमरे की खिड़की से बाहर दिखती शहर की इमारतें अब मुझे और भी ज्यादा डराने लगीं थीं…. मैं समझ गया था कि इमरान कोई साधारण रूममेट नहीं है, और अब मुझे बेहद सतर्क रहना होगा।
To be Continued….
संदेह का एक छोटा सा बीज जब मन में बो दिया जाता है, तो वह बहुत खामोशी से अपनी जड़ें फैलाने लगता है….
इमरान का वह तस्वीरों को देखने का अजीब तरीका, विशेषकर सलवार-सूट वाली साइड और पीछे से ली गई तस्वीरों पर उसका रुक जाना, मिनटों तक अपलक देखते रहना,.... मेरे दिमाग में एक फांस की तरह चुभ गया था। मैं चाहकर भी उस असहजता को भुला नहीं पा रहा था। दफ्तर में काम करते हुए भी कई बार मेरा ध्यान भटक जाता और आँखों के सामने इमरान का वह सम्मोहित चेहरा आ जाता।
मैंने सोचा कि शायद मैं ही जरूरत से ज्यादा संवेदनशील हो रहा हूँ, लेकिन मन का वो कोना मानने को तैयार नहीं था जिसे हम 'गट फीलिंग' कहते हैं…. और अगले कुछ दिनों में, मेरा यह शक सिर्फ गहरा नहीं हुआ, बल्कि इसने एक डरावनी शक्ल अख्तियार कर ली।
अब इमरान की आदतें और ज्यादा अजीब हो चुकी थीं। वह केवल रात के वक्त ही नहीं, बल्कि जब भी मुझे घर में अकेला किसी काम में उलझा हुआ पाता, किसी न किसी बहाने से बातचीत को मम्मी की तरफ मोड़ देता।
एक संडे की दोपहर जब मैं अपनी स्केचबुक लेकर बैठा था, इमरान मेरे कमरे के दरवाजे पर आकर टेक लगाकर खड़ा हो गया। उसके हाथ में हमेशा की तरह उसका फोन था….
"यार, तेरी अम्मी की वो जो छत वाली पिक्चर थी... वो तूने कब खींची थी? मतलब, मौसम कैसा था उस वक्त?"
मैंने पेंसिल को पेपर पर घिसते हुए थोड़ा रुखाई से कहा, "यार, दो साल पुरानी बात है। सर्दियों के दिन थे, शायद धूप सेक रही थीं वो। क्यों?"
"नहीं, बस ऐसे ही। लाइटिंग बहुत मस्त थी!" उसने बेहद हल्के अंदाज में कहा, पर उसकी आँखों में वही पुरानी टकटकी थी….
"वैसे, अम्मी जब घर में अकेली होती हैं, तो क्या वो कभी कोई गहने या भारी साड़ियां पहनती हैं? जैसे हमारी तरफ औरतें त्योहारों पर बिल्कुल अलग लगती हैं।"
इस बार मुझे उसकी बात बहुत ज्यादा अजीब लगी— कोई किसी दोस्त की माँ के पहनावे, उनके अकेलेपन और उनके हाव-भाव में इतनी बारीक दिलचस्पी कैसे ले सकता है?
मैंने हल्की रुखाई से ही कहा,
"जब तक मैं था वहाँ, आम तौर पर तो वह साड़ी या सलवार-कमीज़ ही पहनती थी... अभी तो यहीं हूँ, बहुत टाइम से घर नहीं गया... इसलिए कह पाना मुश्किल है की वह अब क्या....."
मैंने अपना लाइन जानबूझकर अधूरा छोड़ा... अपनी मम्मी के पहनावे के बारे में बाहर के किसी लड़के के साथ बात करना सही नहीं लगा।
मेरी बात सुन कर इमरान कुछ सोचते हुए धीरे से बड़बड़ाया, "जब तक वहाँ था.... हम्म।"
मैंने टोका उसे,
"क्यों पूछ रहा है ये सब?"
"कुछ खास नहीं, बस अपनी अम्मी के साथ तेरी अम्मी की कोम्प्रोमाईज़ कर रहा था..!" जवाब उसने इतनी जल्दी दिया मानो पहले से सोचकर रखा था।
"क्या..?! क्या कर रहा था?!"
"कोम्प्रोमाईज़.."
मैं उसकी तरफ देखता रहा... वो असहज हो कर बोला,
"अबे, कोम्प्रोमाईज़ नहीं समझता? तुलना करना यार!"
मैं हँस पड़ा... मुझे हँसता देख वो थोड़ा हैरान हो कर बोला,
"इसमें हँसने वाली क्या बात है...? हँसना छोड़ कर अपनी अँग्रेज़ी सुधारने पर ज़ोर दो!"
"अबे चोदू, वो कोम्प्रोमाईज़ नहीं, कम्पेयर बोलते हैं... या कम्पेरिज़न।" मैं हँसते हुए बोला।
"हाँ, वही।" वह चिढ़ गया।
थोड़ी देर चुप्पी के बाद वह फिर बोला,
"एक और बात पूछूँ?"
"हाँ, पूछ।"
"बुरा तो नहीं मानेगा?"
"इसकी गारंटी नहीं दे सकता।"
"तेरी अम्मी घर में नाईटी नहीं पहनती? हो सकता है पहले नहीं पहनती थी, लेकिन क्या पता, शायद अब पहनती हो?"
मुझे जवाब देने का मन नहीं किया, इसलिए बेमन से बोला,
"अब क्यों पहनेगी?"
"हो सकता है अब तू नहीं है वहाँ तो इसलिए शायद खुद को अभी ज़्यादा फ्री फील करती होगी।"
मैंने कुछ नहीं कहा... ऐसे एक्सप्रेशन दिया मानो अपने काम में कितना डूबा हुआ हूँ... मुझे कुछ बोलता नहीं देख कर इमरान धीरे से बोला,
"लेडीज़ लोग में होता है, घर में जवान बेटा हो तो नाईटी पहनने से दूर ही रहती है।"
इस बात पे मेरी जीभ मानो मेरे तालु से चिपक गयी! एक तो वैसे भी पता नहीं क्यों मैं अपनी मम्मी को लेकर आज बात करने के मूड में कतई नहीं था... और ऊपर से इमरान ऐसे विषयों को छेड़ रहा था जिसपे मैं खुद असहज था।
"इमरान," मैंने अपनी स्केचबुक बंद करते हुए सीधे उसकी आँखों में देखा। "तुझसे एक बात पूछूं? तू हर वक्त मेरी मम्मी के बारे में ही क्यों पूछता रहता है? तेरे पास अपनी फैमिली या किसी और चीज की बातें नहीं हैं क्या?"
मेरे अचानक इस तरह सीधे पूछने से इमरान के चेहरे पर एक पल के लिए हवाइयां उड़ गईं। उसकी 'स्मार्ट टॉकिंग' का मुखौटा जैसे सरक गया… उसने नजरें चुराईं और थोड़ा हकलाते हुए बोला,
"अरे... अरे नहीं भाई! तू तो सीरियस हो गया। मैंने कहा था न, मैं चीजों को एक विजुअल आर्टिस्ट की तरह देखता हूँ। मुझे बस... उस सादगी में एक कहानी दिखती है। तू गलत समझ रहा है।"
वह हंसने की कोशिश कर रहा था, लेकिन उसकी हंसी खोखली थी। वह तुरंत वहां से हट गया और अपने कमरे में चला गया।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई…
असली झटका मुझे उस रात लगा जब मुझे देर रात प्यास लगी….
घड़ी में रात के करीब पौने तीन बजे थे। पूरा फ्लैट अंधेरे में डूबा था। मैं दबे पांव रसोई की तरफ बढ़ा और फ्रिज से पानी की बोतल निकाली। पानी पीकर जब मैं वापस अपने कमरे की तरफ लौट रहा था, तो मैंने देखा कि हॉल में इमरान के कमरे का दरवाजा थोड़ा खुला हुआ था और अंदर हल्की सी रोशनी जल रही थी।
आमतौर पर मैं किसी की प्राइवेसी में दखल नहीं देता, लेकिन एक अजीब सी उत्सुकता और अंदेशे ने मेरे कदम वहीं रोक दिए। मैंने दबे पांव जाकर दरार से अंदर झांका।
जो दृश्य मैंने देखा, उसने मेरे पैर तले की जमीन खिसका दी।
इमरान अपने बिस्तर पर बैठा था। कमरे की लाइट बंद थी, सिर्फ उसके लैपटॉप की स्क्रीन की तेज रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी। और उस स्क्रीन पर... मेरी मम्मी की वही छत वाली, पीछे से ली गई तस्वीर खुली हुई थी। लेकिन वह सिर्फ तस्वीर नहीं देख रहा था। उसने किसी फोटो-एडिटिंग सॉफ्टवेयर में उस तस्वीर को खोल रखा था।
वह तस्वीर को ज़ूम कर रहा था, कभी मम्मी के हाथों की चूड़ियों पर, कभी उनकी साड़ी के पल्लू के लहराने के एंगल पर, तो कभी उनके खड़े होने के पोज पर, कभी उनके उठे हुए नितम्बों पर.... तो कभी ब्लाउज से झाँकती उनकी पीठ पर..! वह स्क्रीन पर उंगली फिराते हुए कुछ बड़बड़ा रहा था, जैसे कोई गणितीय समीकरण सुलझा रहा हो…. उसके चेहरे पर जो भाव थे, वे किसी साधारण इंसान के नहीं थे। उसकी आँखों में एक अजीब सा पागलपन, एक गहरा जुनून और... एक खौफनाक सम्मोहन था।
"बिल्कुल वही... वही झुकाव है। समय भी सही है..." उसने बहुत धीमी आवाज में खुद से कहा।
तभी उसका हाथ लैपटॉप के बगल में रखे एक पुराने, फटेहाल रजिस्टर पर गया। उसने उसे खोला, जिसमें कुछ उर्दू या पुरानी लिपि में लिखा हुआ था, और साथ में कुछ अजीब से रेखाचित्र बने हुए थे जो देखने में किसी तरह का तंत्र जैसे लग रहे थे। उसने उस रजिस्टर के पन्ने पलटे और फिर स्क्रीन पर मम्मी की तस्वीर को देखा....
मेरी छाती में हथौड़े जैसी धड़कनें गूंजने लगीं…. यह कोई सामान्य बात नहीं थी। इमरान का मेरी मम्मी की तस्वीरों में यह रुझान क्या किसी वासना या साधारण आकर्षण का है, या... या शायद कहीं कुछ और है...?
क्या इमरान मेरी मम्मी की इस तस्वीर का इस्तेमाल किसी अजीब काम के लिए कर रहा था? क्या उसका मुझसे दोस्ती करना और इस फ्लैट में आना सिर्फ एक इत्तेफाक था, या कोई खौफनाक मंसूबा?
मैं बिना कोई आवाज किए, उल्टे पांव अपने कमरे में लौट आया। सुबह तक मेरी आँखों से नींद गायब थी।
कमरे की खिड़की से बाहर दिखती शहर की इमारतें अब मुझे और भी ज्यादा डराने लगीं थीं…. मैं समझ गया था कि इमरान कोई साधारण रूममेट नहीं है, और अब मुझे बेहद सतर्क रहना होगा।
To be Continued….


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