31-05-2026, 01:50 PM
एपिसोड 9: निगाहें और सवाल
उस रात के वाकये के बाद, फ्लैट के माहौल में एक सूक्ष्म सा बदलाव आ गया था। इमरान, जो पहले अपनी ही सतरंगी दुनिया में मस्त रहता था, अब अक्सर मेरे आसपास मंडराने लगा था। विशेषकर उन रातों में, जब मैं दफ्तर की किसी उलझी हुई फाइल को सामने रखकर ख्यालों में खोया होता, या लैपटॉप की स्क्रीन पर उंगलियां चला थकावट से कशमकश कर रहा होता, इमरान अचानक कमरे में दाखिल हो जाता।
वह बिना किसी औपचारिकता के सोफे पर पसर जाता और बातचीत का सिरा थाम लेता। बातें शुरू तो बेहद आम विषयों से होतीं—मेरा काम, ऑफिस की राजनीति, शहर का तनाव, और करियर। लेकिन धीरे-धीरे, बड़ी चतुराई से वह बातचीत के रुख को मोड़ देता। घूम-फिरकर उसकी बातों का कारवां मेरी फैमिली और आखिरकार मम्मी पर आकर रुक जाता।
"यार देव," एक रात उसने सिगरेट का धुआं उड़ाते हुए पूछा, "तेरी अम्मी घर पर अकेली रहती हैं, तो दिनभर करती क्या हैं? मतलब, उनके शौक क्या हैं? समय कैसे कटता होगा उनका?"
मैंने अपनी फाइल से नजरें हटाए बिना कहा,
"कुछ खास नहीं यार। बस घर के काम, थोड़ी-बहुत पूजा-पाठ, और शाम को कभी-कभार अपनी पड़ोसियों - सहेलियों से मिलना, बात करना।"
"अच्छा... यानी वह स्वभाव से थोड़ी इंट्रोवर्ट हैं?" उसने बेहद सहज बनते हुए पूछा,
"वैसे, उन्हें पहनावे में क्या पसंद है? जैसे छोटे शहरों में अक्सर औरतें सिर्फ साड़ियां ही पहनती हैं, क्या वह भी वैसी ही हैं?"
मुझे उसकी इन बातों में कोई बुराई नज़र नहीं आई…. महानगर के इस अकेलेपन में, जहाँ लोग अपनों को भूल जाते हैं, कोई मेरे परिवार के बारे में इतनी दिलचस्पी से पूछ रहा था, तो मुझे लगा कि वह दिल का अच्छा है। मैंने सोचा कि बेचारा खुद अपने घर और परिवार से कोसों दूर रहता है, शायद इसीलिए उसे मेरी मम्मी की बातों में अपनी अम्मी की छवि दिखती होगी या फिर वह एक पारिवारिक माहौल को मिस करता होगा।
"हाँ," मैंने मुस्कुराकर जवाब दिया, "मम्मी ज्यादातर साड़ी ही पहनती हैं। सुती साड़ियां उनकी पसंदीदा हैं। पर कभी-कभार जब सफर करना हो या कोई छोटा-मोटा काम, तो वह सलवार-सूट भी पहन लेती हैं।"
"सही है यार..." इमरान ने अपनी आँखें थोड़ी सिकाड़ते हुए कहा…. फिर थोड़ा झिझकते हुए बोला,
"अच्छा, वो फोन वाली तस्वीर दिखाना एक बार फिर… बहुत सलीका है उनके चेहरे पर।"
मैंने बिना कुछ सोचे अपना मोबाइल निकाला और गैलरी खोलकर उसे थमा दिया….
लेकिन इस बार, और इसके बाद की कई रातों में, मैंने कुछ ऐसी चीजें नोटिस कीं जिन्होंने मेरे मन में हल्के से कौतूहल और अजीब से अहसास को जन्म दिया।
जैसे ही मोबाइल इमरान के हाथ में जाता, उसके चेहरे के हाव-भाव एकदम से बदल जाते। उसकी आँखों की वह बेपरवाही गायब हो जाती और उसकी जगह एक गहरी, लगभग सम्मोहित कर देने वाली एकाग्रता ले लेती। वह बिना पलक झपकाए, बेहद खामोशी से तस्वीर को देखता रहता। उसकी उंगलियां स्क्रीन को ज़ूम करके चेहरे की बारीकियों को देखतीं।
और उसपे भी मैंने गौर किया कि वह मम्मी के चेहरे को ज़ूम करके उनके होंठों देर तक देखता रहता है... चाहे लिपस्टिक लगे हों या न हों.... उसकी स्थिर, अपलक आँखें साफ़ बताती की फोटो को देखते हुए वह कहीं खो गया है!
एक दिन जब वह बहुत देर तक तस्वीर को एकटक निहारता रहा, तो मुझसे रहा नहीं गया…. मैंने पूछा,
"क्या हुआ इमरान? इतनी देर से क्या देख रहा है तस्वीर में? कोई गड़बड़ है क्या?"
इमरान ने अपनी नजरें स्क्रीन से हटाए बिना एक गहरी सांस ली और बोला,
"नहीं यार, गड़बड़ कुछ नहीं है। बस... मैं एक फोटोग्राफर के नजरिए से देख रहा हूँ। यह पिक्चर अच्छी तो ली गई है, पर लाइट और एंगल का इस्तेमाल करके इसे और भी कमाल का लिया जा सकता था। चेहरा थोड़ा और साफ आ सकता था।"
उसकी यह दलील मुझे तार्किक लगी, इसलिए मैंने बात को वहीं रफा-दफा कर दिया। लेकिन इसके बाद, मैंने जो दूसरी बात नोटिस की, वह थोड़ी ज्यादा अजीब थी।
मम्मी की कुछ तस्वीरें साड़ी में थीं, जो आम तौर पर सामने से, हंसते हुए खींची गई थीं। इमरान उन तस्वीरों को देखता, पर जल्दी ही आगे बढ़ा देता। लेकिन गैलरी में कुछ तस्वीरें ऐसी थीं जब मम्मी घर की छत पर कपड़े सुखा रही थीं या आंगन में लगे पौधों में पानी डाल रही थीं। उन तस्वीरों में उन्होंने सलवार-सूट पहन रखा था, और वे तस्वीरें या तो 'साइड पोज' में थीं या फिर पीछे से ली गई थीं, जिनमें उनका पूरा ध्यान अपने काम पर था।
इमरान उन सलवार-सूट वाली साइड और पीछे से ली गई तस्वीरों पर आकर अटक जाता। वह उन तस्वीरों को बहुत देर तक, बेहद अजीब सी खामोशी के साथ देखता रहता। उसकी आँखों में एक ऐसी टकटकी होती जो मुझे असहज करने लगी थी।
"इमरान," मैंने थोड़ा कड़े लहजे में कहा, "तुझे ये साइड वाली तस्वीरें ज्यादा पसंद आ रही हैं क्या? तू हर बार इन्हीं पर आकर रुक जाता है।"
इमरान ने तुरंत खुद को संभाला। उसके चेहरे पर एक पल के लिए घबराहट आई, जिसे उसने अपनी उसी 'स्मार्ट टॉकिंग' के पीछे छुपाने की कोशिश की। वह हंसते हुए बोला,
"अरे देव भाई, तू भी न... शक करने लगता है। दरअसल, साइड प्रोफाइल और कैंडिड शॉट्स में इंसान का असली व्यक्तित्व उभर कर आता है। सामने से तो हर कोई पोज देता है, लेकिन जब कोई अनजाने में खड़ा हो, तो कैमरे में उसकी असली सादगी कैद होती है। मुझे बस ऐसी तस्वीरें आर्टिस्टिक लगती हैं।"
उसने मोबाइल मेरी तरफ बढ़ा दिया और उठकर खड़ा हो गया;
"चल, मैं सोता हूँ। कल सुबह जल्दी निकलना है।"
वह तो अपने कमरे में चला गया, लेकिन उस रात मुझे बहुत देर तक नींद नहीं आई। हालांकि मैंने खुद को समझाया कि मैं जरूरत से ज्यादा सोच रहा हूँ, इमरान बस एक कलात्मक नजरिए से तस्वीरों को देख रहा होगा। आखिर वह खुद भी इतना फैशनेबल और अप-टू-डेट रहता है, तो हो सकता है उसकी कलात्मक समझ मुझसे अलग हो। लेकिन फिर भी, मन के किसी सुदूर कोने में एक अजीब सी खटास और बेचैनी बैठ गई थी।
और ये बेचैनी आगे भी बनी रही...
हर बार इमरान का वह तस्वीरों को देखने का ढंग, वह अपलक निगाहें... हर बार मुझे थोड़ा अजीब, थोड़ा 'weird' जरूर महसूस करा जाती थीं।
To be Continued….
उस रात के वाकये के बाद, फ्लैट के माहौल में एक सूक्ष्म सा बदलाव आ गया था। इमरान, जो पहले अपनी ही सतरंगी दुनिया में मस्त रहता था, अब अक्सर मेरे आसपास मंडराने लगा था। विशेषकर उन रातों में, जब मैं दफ्तर की किसी उलझी हुई फाइल को सामने रखकर ख्यालों में खोया होता, या लैपटॉप की स्क्रीन पर उंगलियां चला थकावट से कशमकश कर रहा होता, इमरान अचानक कमरे में दाखिल हो जाता।
वह बिना किसी औपचारिकता के सोफे पर पसर जाता और बातचीत का सिरा थाम लेता। बातें शुरू तो बेहद आम विषयों से होतीं—मेरा काम, ऑफिस की राजनीति, शहर का तनाव, और करियर। लेकिन धीरे-धीरे, बड़ी चतुराई से वह बातचीत के रुख को मोड़ देता। घूम-फिरकर उसकी बातों का कारवां मेरी फैमिली और आखिरकार मम्मी पर आकर रुक जाता।
"यार देव," एक रात उसने सिगरेट का धुआं उड़ाते हुए पूछा, "तेरी अम्मी घर पर अकेली रहती हैं, तो दिनभर करती क्या हैं? मतलब, उनके शौक क्या हैं? समय कैसे कटता होगा उनका?"
मैंने अपनी फाइल से नजरें हटाए बिना कहा,
"कुछ खास नहीं यार। बस घर के काम, थोड़ी-बहुत पूजा-पाठ, और शाम को कभी-कभार अपनी पड़ोसियों - सहेलियों से मिलना, बात करना।"
"अच्छा... यानी वह स्वभाव से थोड़ी इंट्रोवर्ट हैं?" उसने बेहद सहज बनते हुए पूछा,
"वैसे, उन्हें पहनावे में क्या पसंद है? जैसे छोटे शहरों में अक्सर औरतें सिर्फ साड़ियां ही पहनती हैं, क्या वह भी वैसी ही हैं?"
मुझे उसकी इन बातों में कोई बुराई नज़र नहीं आई…. महानगर के इस अकेलेपन में, जहाँ लोग अपनों को भूल जाते हैं, कोई मेरे परिवार के बारे में इतनी दिलचस्पी से पूछ रहा था, तो मुझे लगा कि वह दिल का अच्छा है। मैंने सोचा कि बेचारा खुद अपने घर और परिवार से कोसों दूर रहता है, शायद इसीलिए उसे मेरी मम्मी की बातों में अपनी अम्मी की छवि दिखती होगी या फिर वह एक पारिवारिक माहौल को मिस करता होगा।
"हाँ," मैंने मुस्कुराकर जवाब दिया, "मम्मी ज्यादातर साड़ी ही पहनती हैं। सुती साड़ियां उनकी पसंदीदा हैं। पर कभी-कभार जब सफर करना हो या कोई छोटा-मोटा काम, तो वह सलवार-सूट भी पहन लेती हैं।"
"सही है यार..." इमरान ने अपनी आँखें थोड़ी सिकाड़ते हुए कहा…. फिर थोड़ा झिझकते हुए बोला,
"अच्छा, वो फोन वाली तस्वीर दिखाना एक बार फिर… बहुत सलीका है उनके चेहरे पर।"
मैंने बिना कुछ सोचे अपना मोबाइल निकाला और गैलरी खोलकर उसे थमा दिया….
लेकिन इस बार, और इसके बाद की कई रातों में, मैंने कुछ ऐसी चीजें नोटिस कीं जिन्होंने मेरे मन में हल्के से कौतूहल और अजीब से अहसास को जन्म दिया।
जैसे ही मोबाइल इमरान के हाथ में जाता, उसके चेहरे के हाव-भाव एकदम से बदल जाते। उसकी आँखों की वह बेपरवाही गायब हो जाती और उसकी जगह एक गहरी, लगभग सम्मोहित कर देने वाली एकाग्रता ले लेती। वह बिना पलक झपकाए, बेहद खामोशी से तस्वीर को देखता रहता। उसकी उंगलियां स्क्रीन को ज़ूम करके चेहरे की बारीकियों को देखतीं।
और उसपे भी मैंने गौर किया कि वह मम्मी के चेहरे को ज़ूम करके उनके होंठों देर तक देखता रहता है... चाहे लिपस्टिक लगे हों या न हों.... उसकी स्थिर, अपलक आँखें साफ़ बताती की फोटो को देखते हुए वह कहीं खो गया है!
एक दिन जब वह बहुत देर तक तस्वीर को एकटक निहारता रहा, तो मुझसे रहा नहीं गया…. मैंने पूछा,
"क्या हुआ इमरान? इतनी देर से क्या देख रहा है तस्वीर में? कोई गड़बड़ है क्या?"
इमरान ने अपनी नजरें स्क्रीन से हटाए बिना एक गहरी सांस ली और बोला,
"नहीं यार, गड़बड़ कुछ नहीं है। बस... मैं एक फोटोग्राफर के नजरिए से देख रहा हूँ। यह पिक्चर अच्छी तो ली गई है, पर लाइट और एंगल का इस्तेमाल करके इसे और भी कमाल का लिया जा सकता था। चेहरा थोड़ा और साफ आ सकता था।"
उसकी यह दलील मुझे तार्किक लगी, इसलिए मैंने बात को वहीं रफा-दफा कर दिया। लेकिन इसके बाद, मैंने जो दूसरी बात नोटिस की, वह थोड़ी ज्यादा अजीब थी।
मम्मी की कुछ तस्वीरें साड़ी में थीं, जो आम तौर पर सामने से, हंसते हुए खींची गई थीं। इमरान उन तस्वीरों को देखता, पर जल्दी ही आगे बढ़ा देता। लेकिन गैलरी में कुछ तस्वीरें ऐसी थीं जब मम्मी घर की छत पर कपड़े सुखा रही थीं या आंगन में लगे पौधों में पानी डाल रही थीं। उन तस्वीरों में उन्होंने सलवार-सूट पहन रखा था, और वे तस्वीरें या तो 'साइड पोज' में थीं या फिर पीछे से ली गई थीं, जिनमें उनका पूरा ध्यान अपने काम पर था।
इमरान उन सलवार-सूट वाली साइड और पीछे से ली गई तस्वीरों पर आकर अटक जाता। वह उन तस्वीरों को बहुत देर तक, बेहद अजीब सी खामोशी के साथ देखता रहता। उसकी आँखों में एक ऐसी टकटकी होती जो मुझे असहज करने लगी थी।
"इमरान," मैंने थोड़ा कड़े लहजे में कहा, "तुझे ये साइड वाली तस्वीरें ज्यादा पसंद आ रही हैं क्या? तू हर बार इन्हीं पर आकर रुक जाता है।"
इमरान ने तुरंत खुद को संभाला। उसके चेहरे पर एक पल के लिए घबराहट आई, जिसे उसने अपनी उसी 'स्मार्ट टॉकिंग' के पीछे छुपाने की कोशिश की। वह हंसते हुए बोला,
"अरे देव भाई, तू भी न... शक करने लगता है। दरअसल, साइड प्रोफाइल और कैंडिड शॉट्स में इंसान का असली व्यक्तित्व उभर कर आता है। सामने से तो हर कोई पोज देता है, लेकिन जब कोई अनजाने में खड़ा हो, तो कैमरे में उसकी असली सादगी कैद होती है। मुझे बस ऐसी तस्वीरें आर्टिस्टिक लगती हैं।"
उसने मोबाइल मेरी तरफ बढ़ा दिया और उठकर खड़ा हो गया;
"चल, मैं सोता हूँ। कल सुबह जल्दी निकलना है।"
वह तो अपने कमरे में चला गया, लेकिन उस रात मुझे बहुत देर तक नींद नहीं आई। हालांकि मैंने खुद को समझाया कि मैं जरूरत से ज्यादा सोच रहा हूँ, इमरान बस एक कलात्मक नजरिए से तस्वीरों को देख रहा होगा। आखिर वह खुद भी इतना फैशनेबल और अप-टू-डेट रहता है, तो हो सकता है उसकी कलात्मक समझ मुझसे अलग हो। लेकिन फिर भी, मन के किसी सुदूर कोने में एक अजीब सी खटास और बेचैनी बैठ गई थी।
और ये बेचैनी आगे भी बनी रही...
हर बार इमरान का वह तस्वीरों को देखने का ढंग, वह अपलक निगाहें... हर बार मुझे थोड़ा अजीब, थोड़ा 'weird' जरूर महसूस करा जाती थीं।
To be Continued….


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