31-05-2026, 11:07 AM
एपिसोड 8: पारलौकिक किस्से और अनकही भावनाएँ
शहर की रातें अब मेरे लिए उतनी अजनबी नहीं रही थीं। इमरान के साथ रहते हुए मुझे उसकी दुनिया, उसके जीने के तरीके और उसकी मान्यताओं की परतों का पता चलने लगा था। इमरान अक्सर बातों-बातों में अपनी संस्कृति और परंपराओं का जिक्र छेड़ देता। कभी वह नशे की खुमारी में होता, तो कभी बिल्कुल होश में, लेकिन जब वह बोलने पर आता, तो ऐसा समां बांधता कि मैं चाहकर भी उससे नजरें नहीं हटा पाता।
बीरभूम के मेरे शांत माहौल में मैंने भूतों की कहानियाँ सुनी थीं, लेकिन इमरान के पास जो किस्से थे, वे रोंगटे खड़े कर देने वाले थे। वह इन्हें 'पारलौकिक' नहीं, बल्कि 'हकीकत' कहता था।
किस्से
एक रात, जब बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी और फ्लैट की खिड़कियां हवा के थपेड़ों से चरमरा रही थीं, इमरान ने अपनी आँखों में एक अजीब सी चमक लिए मेरी ओर देखा। "देव, तूने कभी अपनी परछाई को खुद से अलग होते देखा है?"
मैंने हंसकर टालना चाहा, "क्या बातें कर रहा है इमरान? यह मुमकिन नहीं है।"
इमरान गंभीर हो गया... "मेरे बड़े अब्बू (ताऊ जी) के साथ यह हुआ था। वह हमारे पुश्तैनी मकान के उस कमरे में सो रहे थे जो बरसों से बंद था। आधी रात को उनकी आँख खुली, तो उन्होंने देखा कि कमरे के कोने में कोई खड़ा है। जब उन्होंने टार्च जलाई, तो वहां कोई नहीं था, लेकिन दीवार पर उनकी अपनी परछाई... वह उनकी हलचल के साथ नहीं हिल रही थी। वह परछाई बस खड़ी उन्हें घूर रही थी। अगले दिन अब्बू की आवाज़ चली गई और वह कमरा हमेशा के लिए सील कर दिया गया। हमारे यहाँ कहते हैं कि जब जिन्न किसी की परछाई पर कब्ज़ा कर लेता है, तो इंसान सिर्फ एक खाली जिस्म बनकर रह जाता है।"
उसकी आवाज़ का लहजा इतना सपाट और यकीन से भरा था कि कमरे की ठंडी हवा और भी बर्फीली महसूस होने लगी।
"और मेरी अम्मी..." इमरान अचानक रुक गया, जैसे पुरानी यादें उसे जकड़ रही हों। "उन्होंने खुद एक बार 'साये' को देखा था। हमारे घर के पीछे एक बहुत पुराना कुआं था। अम्मी कहती थीं कि दोपहर के वक्त वहां से एक औरत की रोने की आवाज़ आती थी। एक दिन वह हिम्मत करके वहां गईं, तो उन्होंने देखा कि कुएं की मुंडेर पर एक छोटा सा बच्चा बैठा है। जैसे ही अम्मी उसके पास गईं, उस बच्चे का चेहरा अचानक किसी बूढ़े आदमी की तरह बदल गया और वह कुएं में कूद गया। अम्मी बीमार पड़ गईं, और हफ्तों तक उन्हें ऐसा लगता रहा कि कोई उनके कान में आकर फुसफुसाता है—'तुमने मुझे पहचान लिया, अब तुम्हें भी आना होगा।' अम्मी ने बहुत मुश्किल से खुद को संभाला, लेकिन उस दिन के बाद वह कभी अकेले अंधेरे में नहीं बैठीं।"
मैं इन सब बातों पर यकीन तो नहीं करता था, मेरा तार्किक मन इन्हें दिमाग की उपज मानता था, लेकिन जिस तरह इमरान इन्हें सुनाता था, वह अनुभव बहुत जादुई और भयावह होता था। वह रोंगटे खड़े करने वाला 'थ्रिल' मुझे पसंद आने लगा था।
भावनाएँ
कुछ दिनों बाद, एक रात मैं अपनी मम्मी से बहुत देर तक फोन पर बात कर रहा था। उनकी आवाज़ में वही चिर-परिचित चिंता थी—"खाना खाया? तबीयत ठीक है? पैसे बचा रहे हो न?" जब मैंने फोन रखा, तो मेरी आँखें थोड़ी नम थीं।
इमरान बालकनी में सिगरेट पी रहा था। उसने मुझे देखा और शरारत भरी मुस्कान के साथ कहा, "क्या बात है देव भाई? इतनी लंबी बात? पक्का कोई खास 'गर्लफ्रेंड' है जिसका जिक्र तूने अभी तक मुझसे नहीं किया।"
मैंने फीकी हंसी हंसते हुए कहा, "नहीं यार, मम्मी थी।"
इमरान को पहले यकीन नहीं हुआ, "इतनी देर तक मम्मी से कौन बात करता है?" पर जब उसने मेरा चेहरा देखा, तो उसका लहजा बदल गया। मैंने उसे अपने घर के बारे में बताया, मम्मी की उन तन्हा दोपहरों के बारे में बताया और यह भी कि कैसे वह छोटी-छोटी बातों पर परेशान हो जाती हैं।
"पता है इमरान," मैंने गला साफ करते हुए कहा, "जब पापा गए थे, तो मम्मी ने खुद को पत्थर बना लिया था ताकि मैं टूट न जाऊं। पर अब, जब मैं यहाँ हूँ, मुझे डर लगता है कि उनकी वह मजबूती कहीं खो न जाए। वह अकेले घर में बिना किसी बात के टेंशन लेने लगती हैं। कभी-कभी लगता है कि मैं उनके साथ होता तो शायद वह इतना नहीं डरतीं।"
बातें करते-करते मैं भावुक हो गया। शहर की भीड़ में जो अकेलापन मैं दबाए बैठा था, वह आज बाहर निकल आया। मैंने जेब से अपना मोबाइल निकाला और गैलरी में रखी मम्मी की एक तस्वीर उसे दिखाने लगा। यह तस्वीर तब की थी जब वह बीरभूम के आंगन में खड़ी थीं, उनके चेहरे पर एक सादगी भरी मुस्कान थी और आँखों में वही ममता।
इमरान मेरे बगल में ही बैठा था। जैसे ही उसने तस्वीर देखी, वह पत्थर सा हो गया। उसके चेहरे के हाव-भाव पल भर में बदल गए। उसकी वह 'स्मार्ट' और 'बेपरवाह' वाली छवि गायब थी। वह अपलक, बिना पलक झपकाए उस तस्वीर को देखता रहा। उसकी आँखों में एक अजीब सी गहराई थी—जैसे वह उस तस्वीर में अपनी खुद की कोई खोई हुई याद ढूंढ रहा हो, या शायद वह मम्मी की उस सादगी और शांति को महसूस कर रहा था जो उसकी इस शोर-शराबे वाली दुनिया से कोसों दूर थी।
कुछ मिनटों का भारी सन्नाटा पसर गया...
इमरान ने अपनी नज़रें तस्वीर से नहीं हटाईं.... उसने बहुत धीरे से अपना हाथ मेरे कंधे पर रखा। उसकी पकड़ में एक अलग तरह की संवेदना थी।
उसने बहुत धीमे, लगभग फुसफुसाते हुए कहा, "अच्छी है।"
उस एक शब्द में न जाने कितनी भावनाएं छिपी थीं—प्रशंसा, सम्मान या शायद एक टीस। इमरान ने मोबाइल मुझे वापस दिया, उसकी आँखों में अब एक अलग तरह की नमी या चमक थी जिसे मैं पहचान नहीं पाया। उसने आगे कोई बात नहीं की, कोई मज़ाक नहीं किया।
"गुड नाईट, देव," उसने छोटे से शब्दों में कहा और उठकर अपने कमरे की ओर चला गया।
उस रात इमरान का वह शांत और गंभीर रूप मेरे दिमाग से नहीं निकल रहा था। वह लड़का जो दुनिया की हर चीज़ को मज़ाक में उड़ा देता था या हल्के में लेता था... मम्मी की एक तस्वीर देख कर इतना चुप क्यों हो गया? क्या उस तस्वीर ने उसके भीतर के किसी ऐसे जख्म को छू दिया था जिसके बारे में मैं अब तक अनजान था?
शहर की रात हमेशा की तरह धीरे-धीरे शांत हो रही थी, पर मेरे जहन और फ्लैट के उस कमरे में आज एक ऐसी खामोशी थी जो बहुत कुछ कह रही थी—आने वाले दिनों के बारे में!
To be Continued….
शहर की रातें अब मेरे लिए उतनी अजनबी नहीं रही थीं। इमरान के साथ रहते हुए मुझे उसकी दुनिया, उसके जीने के तरीके और उसकी मान्यताओं की परतों का पता चलने लगा था। इमरान अक्सर बातों-बातों में अपनी संस्कृति और परंपराओं का जिक्र छेड़ देता। कभी वह नशे की खुमारी में होता, तो कभी बिल्कुल होश में, लेकिन जब वह बोलने पर आता, तो ऐसा समां बांधता कि मैं चाहकर भी उससे नजरें नहीं हटा पाता।
बीरभूम के मेरे शांत माहौल में मैंने भूतों की कहानियाँ सुनी थीं, लेकिन इमरान के पास जो किस्से थे, वे रोंगटे खड़े कर देने वाले थे। वह इन्हें 'पारलौकिक' नहीं, बल्कि 'हकीकत' कहता था।
किस्से
एक रात, जब बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी और फ्लैट की खिड़कियां हवा के थपेड़ों से चरमरा रही थीं, इमरान ने अपनी आँखों में एक अजीब सी चमक लिए मेरी ओर देखा। "देव, तूने कभी अपनी परछाई को खुद से अलग होते देखा है?"
मैंने हंसकर टालना चाहा, "क्या बातें कर रहा है इमरान? यह मुमकिन नहीं है।"
इमरान गंभीर हो गया... "मेरे बड़े अब्बू (ताऊ जी) के साथ यह हुआ था। वह हमारे पुश्तैनी मकान के उस कमरे में सो रहे थे जो बरसों से बंद था। आधी रात को उनकी आँख खुली, तो उन्होंने देखा कि कमरे के कोने में कोई खड़ा है। जब उन्होंने टार्च जलाई, तो वहां कोई नहीं था, लेकिन दीवार पर उनकी अपनी परछाई... वह उनकी हलचल के साथ नहीं हिल रही थी। वह परछाई बस खड़ी उन्हें घूर रही थी। अगले दिन अब्बू की आवाज़ चली गई और वह कमरा हमेशा के लिए सील कर दिया गया। हमारे यहाँ कहते हैं कि जब जिन्न किसी की परछाई पर कब्ज़ा कर लेता है, तो इंसान सिर्फ एक खाली जिस्म बनकर रह जाता है।"
उसकी आवाज़ का लहजा इतना सपाट और यकीन से भरा था कि कमरे की ठंडी हवा और भी बर्फीली महसूस होने लगी।
"और मेरी अम्मी..." इमरान अचानक रुक गया, जैसे पुरानी यादें उसे जकड़ रही हों। "उन्होंने खुद एक बार 'साये' को देखा था। हमारे घर के पीछे एक बहुत पुराना कुआं था। अम्मी कहती थीं कि दोपहर के वक्त वहां से एक औरत की रोने की आवाज़ आती थी। एक दिन वह हिम्मत करके वहां गईं, तो उन्होंने देखा कि कुएं की मुंडेर पर एक छोटा सा बच्चा बैठा है। जैसे ही अम्मी उसके पास गईं, उस बच्चे का चेहरा अचानक किसी बूढ़े आदमी की तरह बदल गया और वह कुएं में कूद गया। अम्मी बीमार पड़ गईं, और हफ्तों तक उन्हें ऐसा लगता रहा कि कोई उनके कान में आकर फुसफुसाता है—'तुमने मुझे पहचान लिया, अब तुम्हें भी आना होगा।' अम्मी ने बहुत मुश्किल से खुद को संभाला, लेकिन उस दिन के बाद वह कभी अकेले अंधेरे में नहीं बैठीं।"
मैं इन सब बातों पर यकीन तो नहीं करता था, मेरा तार्किक मन इन्हें दिमाग की उपज मानता था, लेकिन जिस तरह इमरान इन्हें सुनाता था, वह अनुभव बहुत जादुई और भयावह होता था। वह रोंगटे खड़े करने वाला 'थ्रिल' मुझे पसंद आने लगा था।
भावनाएँ
कुछ दिनों बाद, एक रात मैं अपनी मम्मी से बहुत देर तक फोन पर बात कर रहा था। उनकी आवाज़ में वही चिर-परिचित चिंता थी—"खाना खाया? तबीयत ठीक है? पैसे बचा रहे हो न?" जब मैंने फोन रखा, तो मेरी आँखें थोड़ी नम थीं।
इमरान बालकनी में सिगरेट पी रहा था। उसने मुझे देखा और शरारत भरी मुस्कान के साथ कहा, "क्या बात है देव भाई? इतनी लंबी बात? पक्का कोई खास 'गर्लफ्रेंड' है जिसका जिक्र तूने अभी तक मुझसे नहीं किया।"
मैंने फीकी हंसी हंसते हुए कहा, "नहीं यार, मम्मी थी।"
इमरान को पहले यकीन नहीं हुआ, "इतनी देर तक मम्मी से कौन बात करता है?" पर जब उसने मेरा चेहरा देखा, तो उसका लहजा बदल गया। मैंने उसे अपने घर के बारे में बताया, मम्मी की उन तन्हा दोपहरों के बारे में बताया और यह भी कि कैसे वह छोटी-छोटी बातों पर परेशान हो जाती हैं।
"पता है इमरान," मैंने गला साफ करते हुए कहा, "जब पापा गए थे, तो मम्मी ने खुद को पत्थर बना लिया था ताकि मैं टूट न जाऊं। पर अब, जब मैं यहाँ हूँ, मुझे डर लगता है कि उनकी वह मजबूती कहीं खो न जाए। वह अकेले घर में बिना किसी बात के टेंशन लेने लगती हैं। कभी-कभी लगता है कि मैं उनके साथ होता तो शायद वह इतना नहीं डरतीं।"
बातें करते-करते मैं भावुक हो गया। शहर की भीड़ में जो अकेलापन मैं दबाए बैठा था, वह आज बाहर निकल आया। मैंने जेब से अपना मोबाइल निकाला और गैलरी में रखी मम्मी की एक तस्वीर उसे दिखाने लगा। यह तस्वीर तब की थी जब वह बीरभूम के आंगन में खड़ी थीं, उनके चेहरे पर एक सादगी भरी मुस्कान थी और आँखों में वही ममता।
इमरान मेरे बगल में ही बैठा था। जैसे ही उसने तस्वीर देखी, वह पत्थर सा हो गया। उसके चेहरे के हाव-भाव पल भर में बदल गए। उसकी वह 'स्मार्ट' और 'बेपरवाह' वाली छवि गायब थी। वह अपलक, बिना पलक झपकाए उस तस्वीर को देखता रहा। उसकी आँखों में एक अजीब सी गहराई थी—जैसे वह उस तस्वीर में अपनी खुद की कोई खोई हुई याद ढूंढ रहा हो, या शायद वह मम्मी की उस सादगी और शांति को महसूस कर रहा था जो उसकी इस शोर-शराबे वाली दुनिया से कोसों दूर थी।
कुछ मिनटों का भारी सन्नाटा पसर गया...
इमरान ने अपनी नज़रें तस्वीर से नहीं हटाईं.... उसने बहुत धीरे से अपना हाथ मेरे कंधे पर रखा। उसकी पकड़ में एक अलग तरह की संवेदना थी।
उसने बहुत धीमे, लगभग फुसफुसाते हुए कहा, "अच्छी है।"
उस एक शब्द में न जाने कितनी भावनाएं छिपी थीं—प्रशंसा, सम्मान या शायद एक टीस। इमरान ने मोबाइल मुझे वापस दिया, उसकी आँखों में अब एक अलग तरह की नमी या चमक थी जिसे मैं पहचान नहीं पाया। उसने आगे कोई बात नहीं की, कोई मज़ाक नहीं किया।
"गुड नाईट, देव," उसने छोटे से शब्दों में कहा और उठकर अपने कमरे की ओर चला गया।
उस रात इमरान का वह शांत और गंभीर रूप मेरे दिमाग से नहीं निकल रहा था। वह लड़का जो दुनिया की हर चीज़ को मज़ाक में उड़ा देता था या हल्के में लेता था... मम्मी की एक तस्वीर देख कर इतना चुप क्यों हो गया? क्या उस तस्वीर ने उसके भीतर के किसी ऐसे जख्म को छू दिया था जिसके बारे में मैं अब तक अनजान था?
शहर की रात हमेशा की तरह धीरे-धीरे शांत हो रही थी, पर मेरे जहन और फ्लैट के उस कमरे में आज एक ऐसी खामोशी थी जो बहुत कुछ कह रही थी—आने वाले दिनों के बारे में!
To be Continued….


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