29-05-2026, 11:32 PM
एपिसोड 7: संगति का असर और बेपरवाह राहें
इंसानी फितरत बड़ी अजीब होती है। हम जिस चीज़ से भागते हैं, वक्त आने पर अक्सर वही हमें सबसे ज्यादा आकर्षित करने लगती है। बीरभूम से आते वक्त जो संस्कार मेरी ढाल थे, इस बड़े शहर की चकाचौंध और इमरान की बेफिक्र ज़िंदगी के आगे वे अब थोड़े कमजोर पड़ने लगे थे। धीरे-धीरे ही सही, मुझ पर उसकी संगति का रंग चढ़ने लगा था।
मुझे इमरान का लाइफस्टाइल अब खटकता नहीं था, बल्कि उसमें एक अजीब सी कशमकश भरी आज़ादी दिखने लगी थी। उसका ज्यादातर समय नशे के खुमार में रहना, जीवन को लेकर वह 'जो होगा देखा जाएगा' वाली सोच और जब मन किया बाइक उठा कर अनजान रास्तों पर निकल जाना—यह सब मेरे उस अनुशासित जीवन से बिल्कुल अलग था जहाँ हर कदम भविष्य की चिंता में फूँक-फूँक कर रखा जाता था।
मैंने विद्वानों को कहते सुना था कि हमें सफल लोगों के साथ रहना चाहिए और उनसे सीखना चाहिए। विडंबना देखिए, मुझे अपनी और दुनिया की तुलना में इमरान कहीं अधिक 'सफल' दिखने लगा था, क्योंकि वह कम से कम अपनी शर्तों पर जी रहा था।
एक शाम, जब वह अपनी बाइक की चाबी घुमाते हुए बाहर निकलने की तैयारी कर रहा था, मैंने उसे रोक लिया।
"इमरान, एक बात बता यार। तू इतना रिलैक्स कैसे रहता है? न तुझे ऑफिस की डेडलाइन की टेंशन है, न अगले महीने के रेंट की।" मैंने पूछा।
इमरान ने अपनी आँखों पर महंगा चश्मा चढ़ाया और एक तिरछी मुस्कान के साथ कहा, "देव भाई, तूने अपनी ज़िंदगी को फाइलों और लैपटॉप में कैद कर लिया है। ये शहर तुझे वो नहीं देगा जो तू ढूँढ रहा है, जब तक तू इसे अपनी आँखों से देखना न शुरू करे।"
"पर यार, तेरा काम क्या है? मतलब, इनकम कहाँ से होती है?" मैंने आखिरकार वह सवाल पूछ ही लिया जो महीनों से मेरे मन में था।
उसने मेरी कंधे पर हाथ रखा और बड़े सलीके से बात टालते हुए कहा, "देख भाई, अगर नज़र और दिमाग दोनों खुला रखेगा न, तो कमाने के बहुत ऑप्शन मिल जाएँगे। और यकीन मान, पैसे भी अच्छे मिलेंगे। बस घिसना बंद कर और थोड़ा स्मार्ट बन।"
उसकी इस बात से मैं इतना तो समझ गया था कि वह कोई भी 'टिकाऊ' या नौ-से-पांच वाली नौकरी नहीं करता। वह उन कामों को पकड़ता था जो दो-तीन दिन या ज्यादा से ज्यादा एक हफ्ते में खत्म हो जाएं और जिनका मेहनताना मोटा हो। उसकी बातों में एक ऐसा आत्मविश्वास था कि मेरा मन भी अब उस 'बंधी-बंधाई' नौकरी से ऊबने लगा था।
उस रात घर लौटते वक्त मैं रास्तों को अलग नज़रिए से देख रहा था। क्या वाकई मैं व्यर्थ में इतनी मेहनत कर रहा हूँ? मम्मी को पैसे भेजने के बाद मेरे पास जो बचता था, उससे तो इमरान के एक परफ्यूम की बोतल भी नहीं आती थी। मन के किसी कोने में एक छोटा सा विद्रोह जन्म ले रहा था।
"आज चलना है कहीं?" इमरान ने कमरे में दाखिल होते ही पूछा।
मैंने लैपटॉप बंद करते हुए उसकी ओर देखा, "कहाँ?"
"कहीं भी, जहाँ हवा तेज़ हो और शोर कम।"
मैंने एक पल के लिए मम्मी के बारे में सोचा, फिर अपनी मर्यादाओं के बारे में, और अंत में इमरान की उस 'सफलता' के बारे में जो मुझे अपनी ओर खींच रही थी।
"चलो," मैंने संक्षिप्त में जवाब दिया।
उस रात बाइक पर बैठकर जब ठंडी हवा मेरे चेहरे से टकराई, तो मुझे लगा कि शायद मैं अब सच में इस शहर का हिस्सा बन रहा हूँ।
पर क्या यह बदलाव वाकई मेरी सफलता की ओर पहला कदम था, या फिर बीरभूम वाले 'देव' की हार की शुरुआत? यह सवाल अब भी हवा में तैर रहा था, लेकिन उस वक्त, उस रफ़्तार में, मुझे बस इमरान जैसा बेपरवाह महसूस करना अच्छा लग रहा था।
उस रात पहली बार मिंट सिगरेट्स की धुआं और बीयर की गिरफ्त में जिंदगी वाकई एक जेल, एक बोझ से निकलने जैसी फील हुई थी। मैंने इस तरह का नशा पहले कभी नहीं किया था--- स्मोकिंग और बीयर पीने की नहीं; वो तो पहले भी करता आ रहा था; पर इस बार कुछ अलग था... संयोग से मेरे दो कलीग भी मिल गए थे उस रात एक बार में... हम सबने बहुत मजे किए... अपने फ्लैट में कब आया और कितने बजे आ कर सोया; इसका जरा सा भी मुझे होश नहीं रहा था।
संगति अपना असर दिखाने लगी थी.... और जाने - पहचाने राहें अब बेपरवाह लगने लगे थे।
To be Continued….
इंसानी फितरत बड़ी अजीब होती है। हम जिस चीज़ से भागते हैं, वक्त आने पर अक्सर वही हमें सबसे ज्यादा आकर्षित करने लगती है। बीरभूम से आते वक्त जो संस्कार मेरी ढाल थे, इस बड़े शहर की चकाचौंध और इमरान की बेफिक्र ज़िंदगी के आगे वे अब थोड़े कमजोर पड़ने लगे थे। धीरे-धीरे ही सही, मुझ पर उसकी संगति का रंग चढ़ने लगा था।
मुझे इमरान का लाइफस्टाइल अब खटकता नहीं था, बल्कि उसमें एक अजीब सी कशमकश भरी आज़ादी दिखने लगी थी। उसका ज्यादातर समय नशे के खुमार में रहना, जीवन को लेकर वह 'जो होगा देखा जाएगा' वाली सोच और जब मन किया बाइक उठा कर अनजान रास्तों पर निकल जाना—यह सब मेरे उस अनुशासित जीवन से बिल्कुल अलग था जहाँ हर कदम भविष्य की चिंता में फूँक-फूँक कर रखा जाता था।
मैंने विद्वानों को कहते सुना था कि हमें सफल लोगों के साथ रहना चाहिए और उनसे सीखना चाहिए। विडंबना देखिए, मुझे अपनी और दुनिया की तुलना में इमरान कहीं अधिक 'सफल' दिखने लगा था, क्योंकि वह कम से कम अपनी शर्तों पर जी रहा था।
एक शाम, जब वह अपनी बाइक की चाबी घुमाते हुए बाहर निकलने की तैयारी कर रहा था, मैंने उसे रोक लिया।
"इमरान, एक बात बता यार। तू इतना रिलैक्स कैसे रहता है? न तुझे ऑफिस की डेडलाइन की टेंशन है, न अगले महीने के रेंट की।" मैंने पूछा।
इमरान ने अपनी आँखों पर महंगा चश्मा चढ़ाया और एक तिरछी मुस्कान के साथ कहा, "देव भाई, तूने अपनी ज़िंदगी को फाइलों और लैपटॉप में कैद कर लिया है। ये शहर तुझे वो नहीं देगा जो तू ढूँढ रहा है, जब तक तू इसे अपनी आँखों से देखना न शुरू करे।"
"पर यार, तेरा काम क्या है? मतलब, इनकम कहाँ से होती है?" मैंने आखिरकार वह सवाल पूछ ही लिया जो महीनों से मेरे मन में था।
उसने मेरी कंधे पर हाथ रखा और बड़े सलीके से बात टालते हुए कहा, "देख भाई, अगर नज़र और दिमाग दोनों खुला रखेगा न, तो कमाने के बहुत ऑप्शन मिल जाएँगे। और यकीन मान, पैसे भी अच्छे मिलेंगे। बस घिसना बंद कर और थोड़ा स्मार्ट बन।"
उसकी इस बात से मैं इतना तो समझ गया था कि वह कोई भी 'टिकाऊ' या नौ-से-पांच वाली नौकरी नहीं करता। वह उन कामों को पकड़ता था जो दो-तीन दिन या ज्यादा से ज्यादा एक हफ्ते में खत्म हो जाएं और जिनका मेहनताना मोटा हो। उसकी बातों में एक ऐसा आत्मविश्वास था कि मेरा मन भी अब उस 'बंधी-बंधाई' नौकरी से ऊबने लगा था।
उस रात घर लौटते वक्त मैं रास्तों को अलग नज़रिए से देख रहा था। क्या वाकई मैं व्यर्थ में इतनी मेहनत कर रहा हूँ? मम्मी को पैसे भेजने के बाद मेरे पास जो बचता था, उससे तो इमरान के एक परफ्यूम की बोतल भी नहीं आती थी। मन के किसी कोने में एक छोटा सा विद्रोह जन्म ले रहा था।
"आज चलना है कहीं?" इमरान ने कमरे में दाखिल होते ही पूछा।
मैंने लैपटॉप बंद करते हुए उसकी ओर देखा, "कहाँ?"
"कहीं भी, जहाँ हवा तेज़ हो और शोर कम।"
मैंने एक पल के लिए मम्मी के बारे में सोचा, फिर अपनी मर्यादाओं के बारे में, और अंत में इमरान की उस 'सफलता' के बारे में जो मुझे अपनी ओर खींच रही थी।
"चलो," मैंने संक्षिप्त में जवाब दिया।
उस रात बाइक पर बैठकर जब ठंडी हवा मेरे चेहरे से टकराई, तो मुझे लगा कि शायद मैं अब सच में इस शहर का हिस्सा बन रहा हूँ।
पर क्या यह बदलाव वाकई मेरी सफलता की ओर पहला कदम था, या फिर बीरभूम वाले 'देव' की हार की शुरुआत? यह सवाल अब भी हवा में तैर रहा था, लेकिन उस वक्त, उस रफ़्तार में, मुझे बस इमरान जैसा बेपरवाह महसूस करना अच्छा लग रहा था।
उस रात पहली बार मिंट सिगरेट्स की धुआं और बीयर की गिरफ्त में जिंदगी वाकई एक जेल, एक बोझ से निकलने जैसी फील हुई थी। मैंने इस तरह का नशा पहले कभी नहीं किया था--- स्मोकिंग और बीयर पीने की नहीं; वो तो पहले भी करता आ रहा था; पर इस बार कुछ अलग था... संयोग से मेरे दो कलीग भी मिल गए थे उस रात एक बार में... हम सबने बहुत मजे किए... अपने फ्लैट में कब आया और कितने बजे आ कर सोया; इसका जरा सा भी मुझे होश नहीं रहा था।
संगति अपना असर दिखाने लगी थी.... और जाने - पहचाने राहें अब बेपरवाह लगने लगे थे।
To be Continued….


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