25-05-2026, 08:40 AM
एपिसोड 5: फ्लैटमेट!
शहर की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में अकेलेपन से बचने और खर्चों को बांटने का सबसे आसान तरीका था—फ्लैट शेयर करना। अब तक मैं अपने छोटे से फ्लैट में अपनी यादों और दफ्तर के काम के साथ अकेला रहता था, लेकिन एक दिन मेरी इस एकांत दुनिया में एक नए शख्स की दस्तक हुई। उसका नाम था इमरान।
इमरान के आने से फ्लैट का सन्नाटा तो खत्म हुआ, पर मेरे मन में कई नए सवाल पैदा होने लगे। पहली नजर में इमरान में कुछ खास नहीं था, लेकिन उसकी एक आदत थी जो मुझे शुरू से ही खटकती थी—वह हमेशा 'स्मार्ट टॉकिंग' करने की नाकाम कोशिश करता रहता था। उसकी बातों में गहराई कम और दिखावा ज्यादा था। वह अक्सर ऐसी अंग्रेजी शब्दावली का इस्तेमाल करता जो शायद उसने किसी फिल्म या सीरीज से रटी थीं, लेकिन वे उसके व्यक्तित्व पर बिल्कुल नहीं जंचती थीं।
सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात उसका लापरवाह रवैया था। मैंने उसे कभी करियर या भविष्य को लेकर गंभीर नहीं देखा। दफ्तर से थककर जब मैं घर लौटता और अपनी फाइलों में डूबा रहता, इमरान तब या तो किसी से फोन पर लंबी और फिजूल बातें कर रहा होता या फिर शीशे के सामने खड़ा होकर खुद को निहार रहा होता। मुझे समझ नहीं आता था कि वह फ्लैट का किराया कैसे भरता था और अपने निजी खर्चों के लिए पैसे कहाँ से लाता था? क्योंकि उसे कभी किसी नियमित नौकरी पर जाते मैंने नहीं देखा।
पैसे कहाँ से आते थे, यह तो रहस्य था, लेकिन उसका रहन-सहन किसी रईस से कम नहीं था। उसके पास महंगे ब्रांड्स के कपड़ों का अंबार था। जब वह तैयार होकर निकलता, तो पूरा फ्लैट 'इंपोर्टेड परफ्यूम्स' की खुशबू से महक उठता था। उसके पास महंगे बॉडी लोशन, आफ्टर शेव और कॉस्मेटिक्स का ऐसा कलेक्शन था, जो शायद किसी बड़े मॉडल के पास हो। बीरभूम में मैंने कभी किसी लड़के को अपनी त्वचा और खुशबू को लेकर इतना सजग नहीं देखा था।
इमरान को देखकर मेरा एक और पुराना भ्रम भी टूट गया। अपने छोटे शहर में मैंने हमेशा सुना था कि कुछ खास मजहबी या धार्मिक पृष्ठभूमि के लोग शराब और सिगरेट से कोसों दूर रहते हैं। मैंने सोचा था कि इमरान भी शायद अपनी जड़ों से जुड़ा होगा, लेकिन उसकी हकीकत कुछ और ही निकली।
एक रात जब मैं देर से दफ्तर का काम खत्म करके हॉल में आया, तो देखा कि इमरान हाथ में गिलास लिए बालकनी में खड़ा था। धुएं के छल्ले हवा में तैर रहे थे। उसे इस हाल में देखकर मुझे एक झटका सा लगा। बीरभूम की उन गलियों में हमने नैतिकता के जो पैमाने पढ़े थे, वे इस महानगर की हवा में धुएं की तरह उड़ते हुए दिखाई दिए। इमरान के लिए यह सब बहुत सामान्य था—जैसे यह उसकी जीवनशैली का एक अनिवार्य हिस्सा हो।
"क्या हुआ देव भाई ? बड़े हैरान लग रहे हो," उसने अपनी उसी बनावटी स्मार्टनेस के साथ मुझसे पूछा और एक गहरी कश ली।
मेरे पास कोई जवाब नहीं था। मैं बस उसे देख रहा था। एक तरफ मैं था, जो अपनी सैलरी का एक-एक पैसा हिसाब से खर्च करता था ताकि मम्मी को पैसे भेज सकूँ, और दूसरी तरफ इमरान था—बिना किसी ठोस काम के, आलीशान जिंदगी जीने वाला और अपनी ही धुन में रहने वाला।
उस रात मुझे नींद देर से आई। इमरान की खुशबूदार दुनिया और उसके बेपरवाह शौक मेरे संस्कारों से टकरा रहे थे। मुझे एहसास हुआ कि शहर सिर्फ ऊँची इमारतों का नाम नहीं है, बल्कि यह अलग-अलग विरोधाभासों का एक जंगल है, जहाँ इमरान जैसे लोग भी अपनी एक अलग, रहस्यमयी पहचान बनाकर रहते हैं। वह मेरे लिए एक ऐसी पहेली बन गया था, जिसे सुलझाने की कोशिश में मैं अपनी सादगी को और मजबूती से थामने लगा था।
To be Continued…..
शहर की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में अकेलेपन से बचने और खर्चों को बांटने का सबसे आसान तरीका था—फ्लैट शेयर करना। अब तक मैं अपने छोटे से फ्लैट में अपनी यादों और दफ्तर के काम के साथ अकेला रहता था, लेकिन एक दिन मेरी इस एकांत दुनिया में एक नए शख्स की दस्तक हुई। उसका नाम था इमरान।
इमरान के आने से फ्लैट का सन्नाटा तो खत्म हुआ, पर मेरे मन में कई नए सवाल पैदा होने लगे। पहली नजर में इमरान में कुछ खास नहीं था, लेकिन उसकी एक आदत थी जो मुझे शुरू से ही खटकती थी—वह हमेशा 'स्मार्ट टॉकिंग' करने की नाकाम कोशिश करता रहता था। उसकी बातों में गहराई कम और दिखावा ज्यादा था। वह अक्सर ऐसी अंग्रेजी शब्दावली का इस्तेमाल करता जो शायद उसने किसी फिल्म या सीरीज से रटी थीं, लेकिन वे उसके व्यक्तित्व पर बिल्कुल नहीं जंचती थीं।
सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात उसका लापरवाह रवैया था। मैंने उसे कभी करियर या भविष्य को लेकर गंभीर नहीं देखा। दफ्तर से थककर जब मैं घर लौटता और अपनी फाइलों में डूबा रहता, इमरान तब या तो किसी से फोन पर लंबी और फिजूल बातें कर रहा होता या फिर शीशे के सामने खड़ा होकर खुद को निहार रहा होता। मुझे समझ नहीं आता था कि वह फ्लैट का किराया कैसे भरता था और अपने निजी खर्चों के लिए पैसे कहाँ से लाता था? क्योंकि उसे कभी किसी नियमित नौकरी पर जाते मैंने नहीं देखा।
पैसे कहाँ से आते थे, यह तो रहस्य था, लेकिन उसका रहन-सहन किसी रईस से कम नहीं था। उसके पास महंगे ब्रांड्स के कपड़ों का अंबार था। जब वह तैयार होकर निकलता, तो पूरा फ्लैट 'इंपोर्टेड परफ्यूम्स' की खुशबू से महक उठता था। उसके पास महंगे बॉडी लोशन, आफ्टर शेव और कॉस्मेटिक्स का ऐसा कलेक्शन था, जो शायद किसी बड़े मॉडल के पास हो। बीरभूम में मैंने कभी किसी लड़के को अपनी त्वचा और खुशबू को लेकर इतना सजग नहीं देखा था।
इमरान को देखकर मेरा एक और पुराना भ्रम भी टूट गया। अपने छोटे शहर में मैंने हमेशा सुना था कि कुछ खास मजहबी या धार्मिक पृष्ठभूमि के लोग शराब और सिगरेट से कोसों दूर रहते हैं। मैंने सोचा था कि इमरान भी शायद अपनी जड़ों से जुड़ा होगा, लेकिन उसकी हकीकत कुछ और ही निकली।
एक रात जब मैं देर से दफ्तर का काम खत्म करके हॉल में आया, तो देखा कि इमरान हाथ में गिलास लिए बालकनी में खड़ा था। धुएं के छल्ले हवा में तैर रहे थे। उसे इस हाल में देखकर मुझे एक झटका सा लगा। बीरभूम की उन गलियों में हमने नैतिकता के जो पैमाने पढ़े थे, वे इस महानगर की हवा में धुएं की तरह उड़ते हुए दिखाई दिए। इमरान के लिए यह सब बहुत सामान्य था—जैसे यह उसकी जीवनशैली का एक अनिवार्य हिस्सा हो।
"क्या हुआ देव भाई ? बड़े हैरान लग रहे हो," उसने अपनी उसी बनावटी स्मार्टनेस के साथ मुझसे पूछा और एक गहरी कश ली।
मेरे पास कोई जवाब नहीं था। मैं बस उसे देख रहा था। एक तरफ मैं था, जो अपनी सैलरी का एक-एक पैसा हिसाब से खर्च करता था ताकि मम्मी को पैसे भेज सकूँ, और दूसरी तरफ इमरान था—बिना किसी ठोस काम के, आलीशान जिंदगी जीने वाला और अपनी ही धुन में रहने वाला।
उस रात मुझे नींद देर से आई। इमरान की खुशबूदार दुनिया और उसके बेपरवाह शौक मेरे संस्कारों से टकरा रहे थे। मुझे एहसास हुआ कि शहर सिर्फ ऊँची इमारतों का नाम नहीं है, बल्कि यह अलग-अलग विरोधाभासों का एक जंगल है, जहाँ इमरान जैसे लोग भी अपनी एक अलग, रहस्यमयी पहचान बनाकर रहते हैं। वह मेरे लिए एक ऐसी पहेली बन गया था, जिसे सुलझाने की कोशिश में मैं अपनी सादगी को और मजबूती से थामने लगा था।
To be Continued…..


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