21-05-2026, 09:33 PM
एपिसोड 4: चकाचौंध और द्वंद्व
शहर की रफ्तार बीरभूम की उन धूल भरी पगडंडियों से बिल्कुल अलग थी, जहाँ दोपहर की धूप में पीपल के पत्तों की सरसराहट भी सुनी जा सकती थी और वक्त जैसे ठहरकर लंबी सांस लेता था। यहाँ कोलकाता में तो वक्त किसी भूखे शिकारी की तरह पीछे भागता था, और उसके साथ भागते थे हम जैसे हजारों लोग जो अपनी जड़ों से उखड़कर आए थे। धीरे-धीरे मैं इस शहरी जीवन के कंक्रीट के सांचे में ढलने लगा था। ऊँची, बेजान इमारतें, रात के दो-तीन बजे तक जलती पीली स्ट्रीट लाइट्स और दफ्तर की भारी-भरकम फाइलों के बीच मेरी जिंदगी का एक नया, मशीनी ढर्रा बन गया था। लेकिन इस कांच और इस्पात की चमक के पीछे एक ऐसा संसार था, जिसे देख मेरा देहाती मन अक्सर उलझ जाता था।
बीरभूम की सादगी वाला वह 'देव' आज भी मेरे भीतर कहीं गहरी सांस ले रहा था, जो मुझे हर रात आंखें बंद करने से पहले यह यकीन दिलाता था कि मैं भले ही इस समंदर जैसी भीड़ में तैर रहा हूँ, पर मैं इस खारे पानी का हिस्सा कभी नहीं बनूँगा….
To be Continued….
शहर की रफ्तार बीरभूम की उन धूल भरी पगडंडियों से बिल्कुल अलग थी, जहाँ दोपहर की धूप में पीपल के पत्तों की सरसराहट भी सुनी जा सकती थी और वक्त जैसे ठहरकर लंबी सांस लेता था। यहाँ कोलकाता में तो वक्त किसी भूखे शिकारी की तरह पीछे भागता था, और उसके साथ भागते थे हम जैसे हजारों लोग जो अपनी जड़ों से उखड़कर आए थे। धीरे-धीरे मैं इस शहरी जीवन के कंक्रीट के सांचे में ढलने लगा था। ऊँची, बेजान इमारतें, रात के दो-तीन बजे तक जलती पीली स्ट्रीट लाइट्स और दफ्तर की भारी-भरकम फाइलों के बीच मेरी जिंदगी का एक नया, मशीनी ढर्रा बन गया था। लेकिन इस कांच और इस्पात की चमक के पीछे एक ऐसा संसार था, जिसे देख मेरा देहाती मन अक्सर उलझ जाता था।
यहाँ का जीवन बेफिक्री की एक महीन चादर ओढ़े हुए था, जो मुझे अक्सर डराती थी। ऑफिस के मेरे साथ के लड़कों को देखकर मुझे गहरा ताज्जुब होता—उन्हें भविष्य की उस तरह की कोई चिंता नहीं थी जैसा हमारे यहाँ बेटों को होती है। उनका पूरा दिन बस इस जोड़-तोड़ में बीतता कि कैसे भी करके महीने का पॉकेट खर्च और वीकेंड की किसी महँगी पार्टी का जुगाड़ हो जाए। क्रेडिट कार्ड के बढ़ते कर्ज के बीच भी देर रात तक क्लबों में जागना, कान फोड़ देने वाले ऊँचे सुरों में संगीत सुनना और बस 'आज' के नशे में जीना ही उनका फलसफा था। उनके पास कल के लिए कोई योजना नहीं थी, बस आज का एक धुंधला सा उत्साह था।
और इस बेलगाम आजादी के मामले में यहाँ की लड़कियां भी पीछे नहीं थीं। करियर और काम में तो वे लड़कों को कड़ी टक्कर देती ही थीं, लेकिन धुएँ से भरे पबों में नशा करने और तड़के सुबह तक पार्टियों में मशगूल रहने के मामले में वे अक्सर लड़कों से दो कदम आगे ही नजर आतीं। बीरभूम की रातों में जहाँ आठ बजे सन्नाटा पसर जाता था, वहाँ शहर की उन सर्द रातों में, छोटे-छोटे पश्चिमी कपड़ों में लड़कियों को बेखौफ और नशे की हालत में घूमते देखना मेरे लिए एक जबर्दस्त 'सांस्कृतिक झटका' (Cultural Shock) था। मुझे समझ नहीं आता था कि क्या यह वही देश है जहाँ से मैं आया हूँ?
सच कहूँ तो, जब मैं नया-नया यहाँ आया था, तो पार्क स्ट्रीट की रातों को लड़कियों को इस हाल में देख मेरी रूह कांप जाती थी। मैं भी आखिर हाड़-मांस का बना एक साधारण इंसान ही था, कोई पत्थर नहीं। कभी-कभी उन चकाचौंध भरे दृश्यों और महकते इत्रों के बीच मेरी भी नियत डगमगाने लगती थी। मन के किसी अंधेरे, सुप्त कोने में दबी हुई कामनाएं अक्सर फन उठाकर डसने को तैयार रहती थीं। वह खुलापन, वह बिना किसी रोक-टोक वाली बेबाकी और वह शारीरिक आकर्षण मुझे अपनी ओर खींचता था। मेरे भीतर एक भीषण कशमकश चलती थी—एक तरफ शहर की यह मायावी स्वच्छंदता थी और दूसरी तरफ मेरे संस्कारों की वह पुरानी, जर्जर मगर मजबूत ढाल।
लेकिन जब भी कदम भटकने को होते, आँखों के सामने मम्मी का वह थका हुआ चेहरा उभर आता, जो बीरभूम की उस ढलती दोपहर में बस के पीछे धूल उड़ते वक्त आंसुओं से भीगा हुआ था। मुझे उनकी वह आखिरी हिदायत गूंजती हुई सुनाई देती—
"बाबू, अपनी पहचान बनाना, बड़ा आदमी बनना, पर खुद को मत भूलना।"
मम्मी का मुझ पर जो वो अंधा और अटूट विश्वास था, वह मेरे लिए एक अदृश्य लक्ष्मण रेखा बन गया। मैंने खुद से बार-बार सवाल किया कि अगर मैं भी इसी भटकती भीड़ का हिस्सा बनकर अपनी मर्यादा खो बैठा, तो फिर उन शहरियों में और मुझ गाँव के लड़के में क्या फर्क रह जाएगा? मेरी कामयाबी का आखिर क्या मोल होगा अगर मैं अपने चरित्र की नींव को ही दीमक लगा दूँ?
इसी मानसिक संघर्ष का परिणाम था कि मैंने समाज और खुद के इर्द-गिर्द एक अभेद्य दीवार खड़ी कर ली थी। मैंने कभी किसी लड़की की तरफ बात बढ़ाने की पहल नहीं की, न ही कभी किसी के साथ फालतू हंसी-मजाक में अपनी रुचि दिखाई। मेरा जीवन एक तयशुदा लोहे की पटरी पर था—सुबह का नाश्ता, ऑफिस, लंच और फिर शाम को सीधे अपने कमरे की तन्हाई। सहकर्मियों के बीच जल्द ही मेरी पहचान एक 'रिजर्व्ड', घमंडी और जरूरत से ज्यादा 'सीरियस' लड़के के रूप में होने लगी थी, पर मुझे इससे फर्क नहीं पड़ता था।
कभी-कभी जब ऑफिस में किसी का जन्मदिन होता या कोई अनिवार्य टीम फंक्शन, तो मैं वहां एक रस्म की तरह जाता जरूर था, लेकिन हमेशा अपनी मर्यादाओं की चौखट के भीतर खड़ा रहता। जब बाकी लोग शराब के नशे में ऊटपटांग झूम रहे होते या एक-दूसरे के कान में अनर्गल बातें कर वक्त जाया करते, मैं हाथ में संतरे के जूस का गिलास थामे किसी अंधेरे कोने में खड़ा होकर बस मूक दर्शक बना उन्हें देखता रहता…
मेरी आँखों में अक्सर एक गहरा सवाल होता—क्या सच में यही वह 'तरक्की' और 'मॉडर्निटी' है जिसे हम छोटे शहरों के लोग अपनी जड़ें छोड़कर यहाँ इन पत्थरों के जंगलों में ढूंढने आते हैं?
देर रात को जब मैं अपने सूने फ्लैट पर लौटता, तो खिड़की के पर्दे हटाकर बाहर उस शोर-शराबे वाले, कभी न सोने वाले शहर को टकटकी लगाकर देखता। मन में एक तरफ गर्व की लहर उठती कि मैंने आज भी अपनी मिट्टी की खुशबू और जड़ों को सीने से लगाकर रखा है, तो दूसरी तरफ एक टीस भरा अकेलापन भी बुरी तरह महसूस होता…
पर फिर टेबल पर रखे फोन की काली स्क्रीन पर मम्मी का 'मिस्ड कॉल' या छोटा सा मैसेज देखते ही वह सारा शहरी अकेलापन एक ठंडी, ममतामयी छांव में बदल जाता और मुझे शांति की नींद आ जाती।
मैं धीरे-धीरे यह कड़वा सच समझ गया था कि यह शहर मुझे बहुत कुछ दे सकता है—अथाह पैसा, नामी शोहरत, और वह अंधी आजादी भी जिसका लोग ख्वाब देखते हैं। लेकिन उस आजादी के समंदर में डूबने के बजाय उसका सही दिशा में इस्तेमाल करना ही जीवन की सबसे बड़ी चुनौती थी।
बीरभूम की सादगी वाला वह 'देव' आज भी मेरे भीतर कहीं गहरी सांस ले रहा था, जो मुझे हर रात आंखें बंद करने से पहले यह यकीन दिलाता था कि मैं भले ही इस समंदर जैसी भीड़ में तैर रहा हूँ, पर मैं इस खारे पानी का हिस्सा कभी नहीं बनूँगा….
To be Continued….


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