20-05-2026, 01:14 PM
(This post was last modified: 20-05-2026, 01:20 PM by The_Writer. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
एपिसोड 3: बिछड़न की मीठी धूप
घर के आंगन में आज वैसी खामोशी नहीं थी जैसी अक्सर पापा के जाने के बाद हुआ करती थी। आज वहां एक हलचल थी, सूटकेस के चेन बंद होने की आवाजें थीं और रसोई से उठती हुई पकवानों की वह खुशबू थी जो सिर्फ खास मौकों पर ही आती है। मेरा सिलेक्शन 'आर्चर मीडिया' में हो गया था, लेकिन उनकी मुख्य ब्रांच दूसरे शहर में थी। इसका मतलब था—घर छोड़ना, बीरभूम की गलियों को छोड़ना और सबसे बढ़कर, मम्मी को छोड़ना।
मम्मी की खुशी का ठिकाना नहीं था। पिछले दो दिनों से वह पूरे मोहल्ले में बता चुकी थीं कि उनका बेटा एक बड़ी कंपनी में 'क्रिएटिव हेड' (जैसा कि उन्हें समझ आया था) बनकर जा रहा है। उनके चेहरे पर वह चमक वापस आ गई थी जिसे वक्त की धूल ने कुछ धुंधला कर दिया था। वह अपनी उम्र से कहीं छोटी, किसी उत्साहित बड़ी बहन जैसी लग रही थीं, जो अपने भाई की कामयाबी पर फूली नहीं समाती।
लेकिन आज, जाने वाले दिन, वह चमक कहीं-कहीं आंसुओं की नमी में बदल रही थी।
"देव, इधर आ बैठ," उन्होंने सोफे की तरफ इशारा करते हुए कहा। उनके हाथ में एक छोटी सी डायरी और पेन था, जैसे वह कोई बहुत बड़ा लेक्चर देने वाली हों।
मैं उनके पास बैठ गया। उन्होंने मेरी आँखों में झांका, और फिर शुरू हुआ 'हिदायतों' का अंतहीन सिलसिला।
"देख बेटा, शहर नया है, लोग नए हैं। सबसे पहले—बाहर का खाना कम खाना। मैंने तेरे बैग के किनारे वाले पॉकेट में सूजी के लड्डू और मेथी की थेपली रख दी है, वो खराब नहीं होगी। और सुन, अनजान लोगों से ज्यादा घुुलना-मिलना मत। ऑफिस में काम से काम रखना, राजनीति में मत पड़ना।"
मैं मुस्कुरा दिया। "मम्मी, मैं बच्चा नहीं हूँ।"
"मेरे लिए तो रहेगा," उन्होंने डांटते हुए कहा, पर उनकी आवाज भारी हो गई थी। "वहां रात को देर तक बाहर मत घूमना। अपना फोन हमेशा चार्ज रखना। और सबसे जरूरी—पैसे सोच-समझकर खर्च करना। अभी शुरुआत है, भविष्य बनाना है तुझे।"
मम्मी मुझे 'डूज़ एंड डोंट्स' की पूरी लिस्ट समझा रही थीं—जैसे कि गीला तौलिया बिस्तर पर मत छोड़ना, संडे को खुद कपड़े धो लेना, और रोज रात को सोने से पहले उन्हें एक कॉल जरूर करना। वह मुझे एक जिम्मेदार इंसान बनाना चाहती थीं, लेकिन उनकी बातों के पीछे छुपा डर साफ था। उन्हें चिंता इस बात की नहीं थी कि मैं अपना ख्याल नहीं रख पाऊंगा, उन्हें चिंता इस बात की थी कि मेरे बिना उनका घर फिर से कितना बड़ा और खाली हो जाएगा।
अचानक वह चुप हो गईं। बोलते-बोलते उनका गला रुंध गया। उन्होंने मेरे सर पर हाथ रखा और धीमे से कहा, "तुझे बड़ा होते देखना ही मेरा सपना था देव। तेरे पापा आज होते तो सबसे ज्यादा खुश वही होते। पर... पर पता नहीं क्यों, आज लग रहा है कि तू सच में बहुत बड़ा हो गया है। इतना बड़ा कि अब यह घर तेरे लिए छोटा पड़ने लगा है।"
उनकी आँखों से एक आंसू ढलकर उनके गाल पर आ गिरा। उन्हें इस हाल में देखकर मेरा भी गला भर आया। जो इंसान पिछले कई सालों से मेरी ढाल बना रहा, जिसने अपनी पूरी दुनिया मुझ तक सीमित कर ली थी, उसे इस सूने घर में छोड़कर जाना किसी सजा जैसा लग रहा था।
"मम्मी, आप भी चलिए न मेरे साथ?" मैंने इमोशनल होकर उनका हाथ पकड़ लिया। "वहां छोटा सा फ्लैट ले लेंगे, साथ रहेंगे।"
उन्होंने अपनी साड़ी के पल्लू से आँखें पोंछीं और फिर वही सयानी मुस्कान चेहरे पर ले आईं। "नहीं रे पागल! अभी तेरा करियर शुरू हो रहा है। तू अपनी नई दुनिया बसा, नए दोस्त बना। मैं यहाँ अपनी यादों और अपनी सहेलियों के साथ ठीक हूँ। तू बस तरक्की करना, मेरी थकान उसी से मिट जाएगी।"
टैक्सी बाहर आ खड़ी हुई थी। हॉर्न की आवाज ने हमारे बीच के उस भावुक सन्नाटे को तोड़ दिया। मैंने अपना बैग उठाया। घर की दहलीज लांघते वक्त मुझे वह दिन याद आया जब मैं छोटा था और पहली बार कॉलेज जा रहा था—तब भी मम्मी दरवाजे पर खड़ी ऐसे ही मुस्कुरा रही थीं... उस मुस्कान के पीछे कई चिंताओं को दबाए रखी थीं।
मैंने उनके पैर छुए। उन्होंने मुझे कसकर गले लगा लिया। "जा बेटा, अपनी पहचान बना। पर भूलना मत, यहाँ कोई तेरा इंतजार कर रहा है।"
मैं टैक्सी में बैठ गया...
जैसे-जैसे गाड़ी आगे बढ़ रही थी, पीछे छूटता हुआ घर और दरवाजे पर खड़ी वह छोटी सी आकृति धुंधली होती जा रही थी। मैंने खिड़की से बाहर देखा; बीरभूम की मिट्टी की खुशबू अब भी मेरे साथ थी। मेरा सफर अब एक नए शहर की ओर था, जहाँ चुनौतियां थीं, ऑफिस की राजनीति थी और शायद...
लेकिन मेरे मन में बस एक ही बात गूँज रही थी—मम्मी की वह मुस्कान, जिसमें दुआएं ज्यादा और दर्द कम था।
साथ ही उनकी वह दूधिया क्लीवेज जो पल्लू ठीक करते वक़्त थोड़ा सा दिख गई थी...!
To be Continued….
घर के आंगन में आज वैसी खामोशी नहीं थी जैसी अक्सर पापा के जाने के बाद हुआ करती थी। आज वहां एक हलचल थी, सूटकेस के चेन बंद होने की आवाजें थीं और रसोई से उठती हुई पकवानों की वह खुशबू थी जो सिर्फ खास मौकों पर ही आती है। मेरा सिलेक्शन 'आर्चर मीडिया' में हो गया था, लेकिन उनकी मुख्य ब्रांच दूसरे शहर में थी। इसका मतलब था—घर छोड़ना, बीरभूम की गलियों को छोड़ना और सबसे बढ़कर, मम्मी को छोड़ना।
मम्मी की खुशी का ठिकाना नहीं था। पिछले दो दिनों से वह पूरे मोहल्ले में बता चुकी थीं कि उनका बेटा एक बड़ी कंपनी में 'क्रिएटिव हेड' (जैसा कि उन्हें समझ आया था) बनकर जा रहा है। उनके चेहरे पर वह चमक वापस आ गई थी जिसे वक्त की धूल ने कुछ धुंधला कर दिया था। वह अपनी उम्र से कहीं छोटी, किसी उत्साहित बड़ी बहन जैसी लग रही थीं, जो अपने भाई की कामयाबी पर फूली नहीं समाती।
लेकिन आज, जाने वाले दिन, वह चमक कहीं-कहीं आंसुओं की नमी में बदल रही थी।
"देव, इधर आ बैठ," उन्होंने सोफे की तरफ इशारा करते हुए कहा। उनके हाथ में एक छोटी सी डायरी और पेन था, जैसे वह कोई बहुत बड़ा लेक्चर देने वाली हों।
मैं उनके पास बैठ गया। उन्होंने मेरी आँखों में झांका, और फिर शुरू हुआ 'हिदायतों' का अंतहीन सिलसिला।
"देख बेटा, शहर नया है, लोग नए हैं। सबसे पहले—बाहर का खाना कम खाना। मैंने तेरे बैग के किनारे वाले पॉकेट में सूजी के लड्डू और मेथी की थेपली रख दी है, वो खराब नहीं होगी। और सुन, अनजान लोगों से ज्यादा घुुलना-मिलना मत। ऑफिस में काम से काम रखना, राजनीति में मत पड़ना।"
मैं मुस्कुरा दिया। "मम्मी, मैं बच्चा नहीं हूँ।"
"मेरे लिए तो रहेगा," उन्होंने डांटते हुए कहा, पर उनकी आवाज भारी हो गई थी। "वहां रात को देर तक बाहर मत घूमना। अपना फोन हमेशा चार्ज रखना। और सबसे जरूरी—पैसे सोच-समझकर खर्च करना। अभी शुरुआत है, भविष्य बनाना है तुझे।"
मम्मी मुझे 'डूज़ एंड डोंट्स' की पूरी लिस्ट समझा रही थीं—जैसे कि गीला तौलिया बिस्तर पर मत छोड़ना, संडे को खुद कपड़े धो लेना, और रोज रात को सोने से पहले उन्हें एक कॉल जरूर करना। वह मुझे एक जिम्मेदार इंसान बनाना चाहती थीं, लेकिन उनकी बातों के पीछे छुपा डर साफ था। उन्हें चिंता इस बात की नहीं थी कि मैं अपना ख्याल नहीं रख पाऊंगा, उन्हें चिंता इस बात की थी कि मेरे बिना उनका घर फिर से कितना बड़ा और खाली हो जाएगा।
अचानक वह चुप हो गईं। बोलते-बोलते उनका गला रुंध गया। उन्होंने मेरे सर पर हाथ रखा और धीमे से कहा, "तुझे बड़ा होते देखना ही मेरा सपना था देव। तेरे पापा आज होते तो सबसे ज्यादा खुश वही होते। पर... पर पता नहीं क्यों, आज लग रहा है कि तू सच में बहुत बड़ा हो गया है। इतना बड़ा कि अब यह घर तेरे लिए छोटा पड़ने लगा है।"
उनकी आँखों से एक आंसू ढलकर उनके गाल पर आ गिरा। उन्हें इस हाल में देखकर मेरा भी गला भर आया। जो इंसान पिछले कई सालों से मेरी ढाल बना रहा, जिसने अपनी पूरी दुनिया मुझ तक सीमित कर ली थी, उसे इस सूने घर में छोड़कर जाना किसी सजा जैसा लग रहा था।
"मम्मी, आप भी चलिए न मेरे साथ?" मैंने इमोशनल होकर उनका हाथ पकड़ लिया। "वहां छोटा सा फ्लैट ले लेंगे, साथ रहेंगे।"
उन्होंने अपनी साड़ी के पल्लू से आँखें पोंछीं और फिर वही सयानी मुस्कान चेहरे पर ले आईं। "नहीं रे पागल! अभी तेरा करियर शुरू हो रहा है। तू अपनी नई दुनिया बसा, नए दोस्त बना। मैं यहाँ अपनी यादों और अपनी सहेलियों के साथ ठीक हूँ। तू बस तरक्की करना, मेरी थकान उसी से मिट जाएगी।"
टैक्सी बाहर आ खड़ी हुई थी। हॉर्न की आवाज ने हमारे बीच के उस भावुक सन्नाटे को तोड़ दिया। मैंने अपना बैग उठाया। घर की दहलीज लांघते वक्त मुझे वह दिन याद आया जब मैं छोटा था और पहली बार कॉलेज जा रहा था—तब भी मम्मी दरवाजे पर खड़ी ऐसे ही मुस्कुरा रही थीं... उस मुस्कान के पीछे कई चिंताओं को दबाए रखी थीं।
मैंने उनके पैर छुए। उन्होंने मुझे कसकर गले लगा लिया। "जा बेटा, अपनी पहचान बना। पर भूलना मत, यहाँ कोई तेरा इंतजार कर रहा है।"
मैं टैक्सी में बैठ गया...
जैसे-जैसे गाड़ी आगे बढ़ रही थी, पीछे छूटता हुआ घर और दरवाजे पर खड़ी वह छोटी सी आकृति धुंधली होती जा रही थी। मैंने खिड़की से बाहर देखा; बीरभूम की मिट्टी की खुशबू अब भी मेरे साथ थी। मेरा सफर अब एक नए शहर की ओर था, जहाँ चुनौतियां थीं, ऑफिस की राजनीति थी और शायद...
लेकिन मेरे मन में बस एक ही बात गूँज रही थी—मम्मी की वह मुस्कान, जिसमें दुआएं ज्यादा और दर्द कम था।
साथ ही उनकी वह दूधिया क्लीवेज जो पल्लू ठीक करते वक़्त थोड़ा सा दिख गई थी...!
To be Continued….


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