19-05-2026, 01:17 PM
(This post was last modified: 19-05-2026, 01:18 PM by The_Writer. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
एपिसोड 2: नए रास्ते
सुबह की चाय के बाद का समय घर में एक अजीब सी, बोझिल हलचल लेकर आता था। मम्मी रसोई का काम समेट चुकी थीं और अब फर्श पर बैठकर पुराने अखबारों की तह लगा रही थीं। खिड़की से छनकर आती सुनहरी धूप उनके चेहरे पर पड़ रही थी, जिससे उनकी साफ रंगत और भी निखर रही थी। उन्हें देखकर अक्सर लोग धोखा खा जाते थे; 40 की होने के बावजूद उनके चेहरे की ताजगी और सलीका उन्हें आज भी किसी युवा महिला जैसा दिखाता था। पापा के जाने के बाद उन्होंने खुद को बहुत पत्थर करके संभाल लिया था, पर उनकी आँखों की गहराई में एक डर हमेशा जड़ें जमाए रहता था—मेरे अनिश्चित भविष्य का डर।
"तूने आज के लिए कुछ खास सोचा है, देव? या फिर सारा दिन उन कागजों पर लकीरें ही खींचता रहेगा?" उन्होंने अलमारी झाड़ते हुए पूछा। ऊपर से स्वर सख्त था, पर अंदर एक दबी हुई उम्मीद की थरथराहट थी।
मैंने मेज पर बिखरे अपने चारकोल स्केच और अधूरे पोर्टफोलियो को सहेजते हुए एक लंबी सांस ली। उनकी नजरें मेरे हाथों की कलाकारी पर नहीं, बल्कि उन बिलों पर होती थीं जो हर महीने दरवाजे पर दस्तक देते थे।
"मम्मी, आज एक कॉल आने वाला है। कल जो मैंने अप्लाई किया था, वहां से आज रिस्पॉन्स की उम्मीद है। बस प्रार्थना करो कि इस बार बात बन जाए।"
मम्मी के चेहरे पर एक पल के लिए राहत आई, फिर वही संशय के बादल छा गए। "कोशिश करना अच्छी बात है बेटा। मैं तेरे इस हुनर के खिलाफ नहीं हूँ। तू बहुत अच्छी पेंटिंग बनाता है, कॉलेज में बच्चे आज भी तेरी मिसाल देते हैं। लेकिन..." वह रुकीं, जैसे सच बोलने के लिए साहस जुटा रही हों। "लेकिन इसमें स्थायित्व कहाँ है? आज काम है, कल नहीं। मैं चाहती हूँ कि तू अपने उन दोस्तों की तरह बने जो महीने की पहली तारीख को कम से कम चैन की नींद तो सोते हैं। यह अनिश्चितता हमें मार देगी।"
उनकी चिंता मेरी रीढ़ में एक ठंडी लहर की तरह दौड़ जाती थी। वह अक्सर उन लड़कों का जिक्र करती थीं जो महानगरों की कांच वाली इमारतों में बैठकर फिक्स्ड सैलरी कमाते थे। उनके लिए 'प्रगति' का पैमाना सिर्फ सृजन नहीं था, बल्कि एक सुरक्षित घेरा था। उन्हें डर था कि मेरी कला मुझे दुनिया की इस बेरहम रेस में अकेला छोड़ देगी।
"मम्मी, मैं मेहनत करने को तैयार हूँ। पर अगर मैं 9 से 5 की चक्की में पिस गया, तो आप इस खाली घर में बिल्कुल अकेली रह जाएंगी," मैंने अपनी झिझक को ढाल बनाकर कहा,
"पापा के बिना आप पहले ही सन्नाटों से लड़ती हैं। अभी तो मैं पास रहता हूँ, कॉलेज की ट्यूशन के बाद घर आ जाता हूँ। पर कॉर्पोरेट जॉब का मतलब है कि मैं सूरज डूबने के बहुत बाद घर लौटूंगा। क्या आप झेल पाएंगी?"
मम्मी उठीं और मेरे पास आकर मेरे कंधे पर हाथ रखा। उनकी आँखों में ममता और संकल्प का मिश्रण था…
"बोरियत? देव, एक माँ के लिए सबसे बड़ा दुख यह देखना है कि उसका बच्चा पंख होने के बावजूद उड़ने से डर रहा है। तू जब बाहर जाएगा, दुनिया देखेगा, तो मुझे लगेगा कि हमारा वजूद फिर से विस्तार पा रहा है। तू घर में मेरे पास बंधा रहेगा, तो मुझे लगेगा कि मेरी ममता ही तेरी बेड़ियाँ बन गई है। मेरी फिक्र तू मत कर, मैं अपना रास्ता निकाल लूंगी। तू बस अपना आसमान ढूंढ।"
उसी वक्त मेरे फोन की तीखी घंटी ने कमरे के सन्नाटे को चीर दिया। स्क्रीन पर एक अनजाना, प्रोफेशनल सा दिखने वाला नंबर चमक रहा था। मम्मी की सांसें जैसे थम सी गईं, उनकी आँखें फोन की स्क्रीन पर गड़ गई थीं। मैंने कांपते हाथों से कॉल रिसीव किया।
"हेलो, क्या देव बोल रहे हैं?" दूसरी तरफ से एक भारी, अधिकारपूर्ण और बेहद ठंडी आवाज आई।
"जी, मैं देव ही बोल रहा हूँ। आप कौन?"
"मैं 'आर्चर मीडिया' से बात कर रहा हूँ। हमने आपका पोर्टफोलियो और पिछली कुछ कहानियां देखी हैं। आपके काम में विजुअल्स का एक अजीब सा 'डार्क' पुट है, एक रहस्यमयी उदासी है, जो हमें अपनी अगली बड़ी वेब सीरीज के लिए चाहिए। हम कुछ ऐसा ढूंढ रहे हैं जो साधारण न हो। क्या आप कल सुबह 10 बजे इंटरव्यू के लिए हमारे ऑफिस आ सकते हैं?"
मेरा गला सूख गया। मम्मी ने उत्सुकता और घबराहट के बीच झूलते हुए मेरी तरफ देखा। मैंने जैसे-तैसे 'जी बिल्कुल' कहा और फोन काट दिया। मेरे हाथ अब भी थरथरा रहे थे।
"क्या हुआ? किसका फोन था?" मम्मी ने लगभग फुसफुसाते हुए पूछा, जैसे जोर से पूछने पर यह सपना टूट जाएगा।
"मम्मी, 'आर्चर मीडिया' है। बहुत बड़ी कंपनी है। उन्हें मेरा काम पसंद आया है। कह रहे हैं कि मेरे स्केच और कहानियों का जो 'डार्क' अंदाज है, वो उनकी सीरीज के लिए परफेक्ट है। सैलरी भी उम्मीद से ज्यादा है और... यह वही 'सॉलिड फ्यूचर' हो सकता है जिसका आप सपना देख रही थीं।"
मम्मी की आँखों के कोर गीले हो गए। उन्होंने तुरंत भगवान की तस्वीर की ओर मुड़कर हाथ जोड़ लिए।
"देखा? मैंने कहा था न, जब नीयत साफ हो और कोशिश सच्ची, तो रास्ते खुद खुलते हैं। तू बस घबराना मत।"
शाम के वक्त जब मैं बालकनी में खड़ा होकर ठंडी हो रही चाय की चुस्कियां ले रहा था, मम्मी भी पास आ खड़ी हुईं। हवा में एक नई उमंग थी।
"कल के लिए कपड़े निकाल लिए? तेरी वह नीली शर्ट प्रेस कर दूँ? इंटरव्यू में सलीका बहुत जरूरी होता है।"
मैंने मुस्कुराकर उन्हें देखा। उनकी झुर्रियां जैसे आज गर्व के पीछे छिप गई थीं। लेकिन मेरे भीतर एक अनजाना सा खौफ कुलबुला रहा था। यह 'डार्क' कंटेंट की तलाश कहीं मुझे उन गलियों में तो नहीं ले जाएगी जहाँ से लौटना मुश्किल हो?
"मम्मी," मैंने उनका हाथ पकड़ते हुए धीमे से कहा, "अगर कल सब अच्छा रहा, तो हम रात को बाहर चलेंगे। एक छोटा सा जश्न तो बनता है।"
"नहीं रे, बाहर के खाने में वो स्वाद कहाँ। मैं घर पर ही तेरी पसंद की खीर और पुलाव बनाऊंगी," उन्होंने चहकते हुए कहा, और उनके चेहरे पर वो पुरानी चमक लौट आई जो पापा के रहने के वक्त हुआ करती थी।
रात को जब मैं बिस्तर पर लेटा, तो खिड़की से आती चांदनी फर्श पर टेढ़ी-मेढ़ी परछाइयां बना रही थी, जो मेरे स्केच के पात्रों जैसी लग रही थीं। मुझे महसूस हुआ कि मेरी जिंदगी का एक साधारण अध्याय अब समाप्त हो चुका है। कल का सूरज सिर्फ नौकरी का बुलावा नहीं लाएगा, बल्कि एक ऐसे रहस्यमयी सफर की पहली दस्तक होगा, जहाँ हकीकत और कहानियों की सीमाएं धुंधली होने वाली थीं।
To be Continued….
सुबह की चाय के बाद का समय घर में एक अजीब सी, बोझिल हलचल लेकर आता था। मम्मी रसोई का काम समेट चुकी थीं और अब फर्श पर बैठकर पुराने अखबारों की तह लगा रही थीं। खिड़की से छनकर आती सुनहरी धूप उनके चेहरे पर पड़ रही थी, जिससे उनकी साफ रंगत और भी निखर रही थी। उन्हें देखकर अक्सर लोग धोखा खा जाते थे; 40 की होने के बावजूद उनके चेहरे की ताजगी और सलीका उन्हें आज भी किसी युवा महिला जैसा दिखाता था। पापा के जाने के बाद उन्होंने खुद को बहुत पत्थर करके संभाल लिया था, पर उनकी आँखों की गहराई में एक डर हमेशा जड़ें जमाए रहता था—मेरे अनिश्चित भविष्य का डर।
"तूने आज के लिए कुछ खास सोचा है, देव? या फिर सारा दिन उन कागजों पर लकीरें ही खींचता रहेगा?" उन्होंने अलमारी झाड़ते हुए पूछा। ऊपर से स्वर सख्त था, पर अंदर एक दबी हुई उम्मीद की थरथराहट थी।
मैंने मेज पर बिखरे अपने चारकोल स्केच और अधूरे पोर्टफोलियो को सहेजते हुए एक लंबी सांस ली। उनकी नजरें मेरे हाथों की कलाकारी पर नहीं, बल्कि उन बिलों पर होती थीं जो हर महीने दरवाजे पर दस्तक देते थे।
"मम्मी, आज एक कॉल आने वाला है। कल जो मैंने अप्लाई किया था, वहां से आज रिस्पॉन्स की उम्मीद है। बस प्रार्थना करो कि इस बार बात बन जाए।"
मम्मी के चेहरे पर एक पल के लिए राहत आई, फिर वही संशय के बादल छा गए। "कोशिश करना अच्छी बात है बेटा। मैं तेरे इस हुनर के खिलाफ नहीं हूँ। तू बहुत अच्छी पेंटिंग बनाता है, कॉलेज में बच्चे आज भी तेरी मिसाल देते हैं। लेकिन..." वह रुकीं, जैसे सच बोलने के लिए साहस जुटा रही हों। "लेकिन इसमें स्थायित्व कहाँ है? आज काम है, कल नहीं। मैं चाहती हूँ कि तू अपने उन दोस्तों की तरह बने जो महीने की पहली तारीख को कम से कम चैन की नींद तो सोते हैं। यह अनिश्चितता हमें मार देगी।"
उनकी चिंता मेरी रीढ़ में एक ठंडी लहर की तरह दौड़ जाती थी। वह अक्सर उन लड़कों का जिक्र करती थीं जो महानगरों की कांच वाली इमारतों में बैठकर फिक्स्ड सैलरी कमाते थे। उनके लिए 'प्रगति' का पैमाना सिर्फ सृजन नहीं था, बल्कि एक सुरक्षित घेरा था। उन्हें डर था कि मेरी कला मुझे दुनिया की इस बेरहम रेस में अकेला छोड़ देगी।
"मम्मी, मैं मेहनत करने को तैयार हूँ। पर अगर मैं 9 से 5 की चक्की में पिस गया, तो आप इस खाली घर में बिल्कुल अकेली रह जाएंगी," मैंने अपनी झिझक को ढाल बनाकर कहा,
"पापा के बिना आप पहले ही सन्नाटों से लड़ती हैं। अभी तो मैं पास रहता हूँ, कॉलेज की ट्यूशन के बाद घर आ जाता हूँ। पर कॉर्पोरेट जॉब का मतलब है कि मैं सूरज डूबने के बहुत बाद घर लौटूंगा। क्या आप झेल पाएंगी?"
मम्मी उठीं और मेरे पास आकर मेरे कंधे पर हाथ रखा। उनकी आँखों में ममता और संकल्प का मिश्रण था…
"बोरियत? देव, एक माँ के लिए सबसे बड़ा दुख यह देखना है कि उसका बच्चा पंख होने के बावजूद उड़ने से डर रहा है। तू जब बाहर जाएगा, दुनिया देखेगा, तो मुझे लगेगा कि हमारा वजूद फिर से विस्तार पा रहा है। तू घर में मेरे पास बंधा रहेगा, तो मुझे लगेगा कि मेरी ममता ही तेरी बेड़ियाँ बन गई है। मेरी फिक्र तू मत कर, मैं अपना रास्ता निकाल लूंगी। तू बस अपना आसमान ढूंढ।"
उसी वक्त मेरे फोन की तीखी घंटी ने कमरे के सन्नाटे को चीर दिया। स्क्रीन पर एक अनजाना, प्रोफेशनल सा दिखने वाला नंबर चमक रहा था। मम्मी की सांसें जैसे थम सी गईं, उनकी आँखें फोन की स्क्रीन पर गड़ गई थीं। मैंने कांपते हाथों से कॉल रिसीव किया।
"हेलो, क्या देव बोल रहे हैं?" दूसरी तरफ से एक भारी, अधिकारपूर्ण और बेहद ठंडी आवाज आई।
"जी, मैं देव ही बोल रहा हूँ। आप कौन?"
"मैं 'आर्चर मीडिया' से बात कर रहा हूँ। हमने आपका पोर्टफोलियो और पिछली कुछ कहानियां देखी हैं। आपके काम में विजुअल्स का एक अजीब सा 'डार्क' पुट है, एक रहस्यमयी उदासी है, जो हमें अपनी अगली बड़ी वेब सीरीज के लिए चाहिए। हम कुछ ऐसा ढूंढ रहे हैं जो साधारण न हो। क्या आप कल सुबह 10 बजे इंटरव्यू के लिए हमारे ऑफिस आ सकते हैं?"
मेरा गला सूख गया। मम्मी ने उत्सुकता और घबराहट के बीच झूलते हुए मेरी तरफ देखा। मैंने जैसे-तैसे 'जी बिल्कुल' कहा और फोन काट दिया। मेरे हाथ अब भी थरथरा रहे थे।
"क्या हुआ? किसका फोन था?" मम्मी ने लगभग फुसफुसाते हुए पूछा, जैसे जोर से पूछने पर यह सपना टूट जाएगा।
"मम्मी, 'आर्चर मीडिया' है। बहुत बड़ी कंपनी है। उन्हें मेरा काम पसंद आया है। कह रहे हैं कि मेरे स्केच और कहानियों का जो 'डार्क' अंदाज है, वो उनकी सीरीज के लिए परफेक्ट है। सैलरी भी उम्मीद से ज्यादा है और... यह वही 'सॉलिड फ्यूचर' हो सकता है जिसका आप सपना देख रही थीं।"
मम्मी की आँखों के कोर गीले हो गए। उन्होंने तुरंत भगवान की तस्वीर की ओर मुड़कर हाथ जोड़ लिए।
"देखा? मैंने कहा था न, जब नीयत साफ हो और कोशिश सच्ची, तो रास्ते खुद खुलते हैं। तू बस घबराना मत।"
शाम के वक्त जब मैं बालकनी में खड़ा होकर ठंडी हो रही चाय की चुस्कियां ले रहा था, मम्मी भी पास आ खड़ी हुईं। हवा में एक नई उमंग थी।
"कल के लिए कपड़े निकाल लिए? तेरी वह नीली शर्ट प्रेस कर दूँ? इंटरव्यू में सलीका बहुत जरूरी होता है।"
मैंने मुस्कुराकर उन्हें देखा। उनकी झुर्रियां जैसे आज गर्व के पीछे छिप गई थीं। लेकिन मेरे भीतर एक अनजाना सा खौफ कुलबुला रहा था। यह 'डार्क' कंटेंट की तलाश कहीं मुझे उन गलियों में तो नहीं ले जाएगी जहाँ से लौटना मुश्किल हो?
"मम्मी," मैंने उनका हाथ पकड़ते हुए धीमे से कहा, "अगर कल सब अच्छा रहा, तो हम रात को बाहर चलेंगे। एक छोटा सा जश्न तो बनता है।"
"नहीं रे, बाहर के खाने में वो स्वाद कहाँ। मैं घर पर ही तेरी पसंद की खीर और पुलाव बनाऊंगी," उन्होंने चहकते हुए कहा, और उनके चेहरे पर वो पुरानी चमक लौट आई जो पापा के रहने के वक्त हुआ करती थी।
रात को जब मैं बिस्तर पर लेटा, तो खिड़की से आती चांदनी फर्श पर टेढ़ी-मेढ़ी परछाइयां बना रही थी, जो मेरे स्केच के पात्रों जैसी लग रही थीं। मुझे महसूस हुआ कि मेरी जिंदगी का एक साधारण अध्याय अब समाप्त हो चुका है। कल का सूरज सिर्फ नौकरी का बुलावा नहीं लाएगा, बल्कि एक ऐसे रहस्यमयी सफर की पहली दस्तक होगा, जहाँ हकीकत और कहानियों की सीमाएं धुंधली होने वाली थीं।
To be Continued….


![[+]](https://xossipy.com/themes/sharepoint/collapse_collapsed.png)