09-09-2026, 06:45 AM
Great going buddy! Absolutely wonderful and extremely exciting writing ✍️.
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Adultery FLAT MATE
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09-09-2026, 06:45 AM
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10-09-2026, 08:21 AM
दोस्त अगला अपडेट कब या रहा है ,अब रहा नहीं जाता
10-09-2026, 12:14 PM
Awesome ? writing brother ur story writing skills are top notch in same theme I wrote a story yesterday it’s not posted yet it’s is awesome plot and details ur pouring is inspiring keep it up ? please give updates soon ?
16-09-2026, 11:19 PM
एपिसोड 26: दोहरी दुनिया...
दफ्तर की काँच की खिड़कियों से जब ढलते सूरज की नारंगी किरणें अंदर आती थीं, तो वह समय मेरे लिए दिन का सबसे कठिन हिस्सा बन जाता था। वह घड़ी होती थी जब मुझे वापस उस फ्लैट में लौटना पड़ता था, जहाँ हर कोने में अविश्वास का सन्नाटा पसरा हुआ था। लेकिन अब उस वापसी के रास्ते पर एक ठहराव आ गया था—एक ऐसा पड़ाव, जिसने मुझे बिखरने से बचा रखा था… और वो ठहराव मेरे ऑफिस की ही थी… "देव, आज भी इतने गंभीर? कभी तो मुस्कुरा दिया करो," रुया की हल्की, खनकती हुई आवाज मेरे कानों में पड़ी। मैंने अपने डेस्क से सिर उठाया… वह अपना हैंडबैग कंधे पर लटकाए, चेहरे पर वही सहज, मासूम मुस्कान लिए मेरे केबिन के दरवाजे पर खड़ी थी। उसने हल्के पिस्ता रंग का कुर्ता पहन रखा था, और उसके बाल हमेशा की तरह सादगी से बंधे हुए थे। उसके चेहरे पर कोई बनावट नहीं थी, न ही कोई ऐसा दिखावा जो आँखों को चुभे। "बस, निकल ही रहा था," मैंने अपने लैपटॉप का ढक्कन बंद करते हुए कहा। "तो चलो, आज कैब का इंतजार नहीं करते। मौसम अच्छा है, थोड़ा पैदल चलते हैं," उसने कहा और आगे बढ़ गई। "पैदल?" "हाँ, क्यों? कोई प्रॉब्लम है?" "अम्म्म..." कुछ सेकंड के लिए मुझे समझ में नहीं आया कि मैं आगे क्या बोलूँ? आज ऑफिस में बिल्कुल मन नहीं लग रहा था... इसलिए सोच रहा था कि सामने के मोड़ के पास वाली चाय दुकान में कुछ देर रुक कर चाय-सुट्टा मार कर, दिमाग को हर तरह के ख्यालों से आज़ाद कर के घर के लिए निकलता। आजकल घर में कुछ खास मन नहीं लगता है। हालाँकि इमरान और मम्मी के बीच वैसा तो कुछ देखने को मिला नहीं जिससे आगे का कुछ सोच या कर पाता... बस, यही एक चिंता मन में रेंट-फ्री रहने लगी है कि साला उस दिन वो लड़का कौन था जो हमारे फ्लैट में आया था, जिसका मैंने पीछा किया लेकिन आगे जा कर मिस कर दिया था! "हेलो! कहाँ खो गए?" "अंह..! ओह सॉरी-- दरअसल, सुबह से ही सिर थोड़ा भारी लग रहा था... अभी तो और दुखने लगा है....." "सेरिडॉन चाहिए?" रुया मेरी बात काटते हुए बोली। "हाँ, लिया मैंने दो मिनट पहले।" "ज़रूरी नहीं कि हम पैदल चलें, मैं कैब कर लेती..." वो वाकई चिंतित हो गई। "अरे ये ऐसा भी कुछ नहीं है जो मैं बर्दाश्त न कर सकूँ। और सेरिडॉन ले लिया हूँ, ये जल्दी काम करता है... टेंशन न लो... चलो चलते हैं।" मैं मुस्कुरा कर बोला। दोनों साथ ही निकले... दफ्तर की लिफ्ट से नीचे उतरकर जब हम सड़क पर आए, तो शाम की ठंडी हवा ने चेहरे को छुआ… गाड़ियों की कतारें, हॉर्न का शोर और स्ट्रीट वेंडर्स की आवाज़ें—यह वही शहर था जो कुछ दिन पहले तक मुझे काटने को दौड़ता था, लेकिन अब रुया के बगल में चलते हुए यह सब पृष्ठभूमि का एक बेअसर हिस्सा बनकर रह जाता है… "तुम्हारी चोट अब पूरी तरह ठीक है न? चलते वक्त लँगड़ा तो नहीं रहे?" उसने मेरी चाल पर नजर डालते हुए पूछा। अभी कुछ दिन पहले ही उसने बताया था कि ऑफिस के ही किसी कलीग से उसे पता चला कि मेरा हाल ही के एक दिन बहुत ज़बरदस्त एक्सीडेंट हुआ था… "हाँ, अब बिल्कुल दर्द नहीं है। बस कभी-कभी सीढ़ियाँ चढ़ते वक्त थोड़ा खिंचाव महसूस होता है," मैंने कहा। "फिर भी ध्यान रखा करो… तुम लड़के ना, जब तक दर्द बर्दाश्त से बाहर न हो जाए, तब तक खुद को तसल्ली देते रहते हो," उसने एक हल्की सी डाँट के अंदाज में कहा, और फिर अचानक रुक गई। "रुको, आज उस नुक्कड़ वाली टपरी से कुल्हड़ वाली इलायची चाय पिएँगे। तुम्हारी यह उतरी हुई सूरत चाय के बिना ठीक नहीं होने वाली।" हम सड़क किनारे उस छोटी सी चाय की दुकान पर खड़े हो गए। कुल्हड़ में खौलती हुई चाय की महक के बीच रुया ने दफ्तर की छोटी-मोटी बातें शुरू कीं—कैसे हमारे मैनेजर ने आज फिर किसी प्रोजेक्ट पर बेतुका कमेंट किया था, और कैसे कैंटीन वाले ने आज पनीर वाले समोसे में पनीर कम, आलू ज़्यादा डाला था। उसकी बातें बहुत साधारण थीं, लेकिन उन साधारण बातों में एक ऐसी ताजगी थी जो मुझे अपनी जटिलताओं से खींचकर एक सामान्य इंसान की दुनिया में ले आती थी। कुल्हड़ हाथ में थामे मैंने उसे बोलते हुए देखा… उसके चेहरे पर कोई राज, कोई रहस्य, कोई बनावटी इमोशन नहीं था… उसके शब्द वही थे जो वह सोच रही थी… जो अंदर थी, वही बाहर भी.... "तुम मुझे ऐसे क्या देख रहे हो?" रुया ने चाय की चुस्की लेते हुए मुस्कुराकर पूछा… "कुछ अजीब लग रहा है क्या?" "नहीं," मैंने नजरें झुका लीं… "बस... सोच रहा था कि तुम इतनी बेफिक्र कैसे रह लेती हो? मतलब, दुनिया में इतनी उलझनें हैं, लोग इतने चेहरे बदलते हैं, पर तुम हमेशा एक जैसी रहती हो।" रुया थोड़ी देर खामोश रही… उसने कुल्हड़ को दोनों हाथों से पकड़ा और सड़क पर भागती गाड़ियों को देखते हुए बोली, "क्योंकि मैं चीजों को उतना ही देखती हूँ जितनी वे हैं। जब हम किसी बात के पीछे बहुत ज्यादा गहराई ढूँढने लगते हैं, तो अक्सर वो मतलब निकाल लेते हैं जो असल में होता ही नहीं। कभी-कभी सादगी ही सबसे बड़ा सच होती है, देव।" उसके इन शब्दों ने मेरे सीने के भीतर एक पुरानी चोट को छू दिया। सादगी ही सबसे बड़ा सच होती है... क्या मेरी मम्मी की वह बदली हुई वेशभूषा, वो टाइट फिटिंग सूट, फैंसी साड़ी, उड़ता पल्लू, रिवीलिंग ब्लाउज, वाइन-रेड सलवार-सूट और वह नया अंदाज वाकई सिर्फ सादगी का विस्तार था? या फिर वह सच था जिसे मैंने उस छुपे हुए फोन की स्क्रीन पर अपनी आँखों से देखा था? "क्या हुआ? फिर कहीं खो गए?" रुया ने मेरी आँखों में झाँकते हुए पूछा। उसकी आवाज में एक गहरी, सच्ची चिंता थी… "देव, मैं पिछले कई दिनों से देख रही हूँ--- तुम दफ्तर में होते हो, पर तुम्हारा दिमाग कहीं और होता है… कहते कुछ हो, मतलब कुछ और होता है... और जो कह रहे होते हो, उसका तुम्हें ध्यान नहीं रहता?! कोई ऐसी बात है जो तुम्हें अंदर ही अंदर परेशान कर रही है? तुम्हारी मम्मी ठीक हैं? बीरभूम से आई हैं न वो?" मम्मी का नाम सुनते ही मेरे गले में एक घूँट सा अटक गया। मेरा मन किया कि मैं सब कुछ रुया को बता दूँ। मैं उससे कहूँ कि मेरे घर में क्या चल रहा है, कैसे मेरा दोस्त और मेरी मम्मी एक ऐसी पहेली बन गए हैं जिसे सुलझाते-सुलझाते मेरा मानसिक संतुलन बिगड़ रहा है… क्या वाकई कुछ है जो मुझे नहीं जानना चाहिए? या फिर ऐसा कुछ जिसे जानना तो चाहता हूँ, पर शायद जान लेने के बाद मैं, मैं न रहूँ? लेकिन मैं चाहकर भी अपने होंठ नहीं खोल सका… मैं किसी तीसरे इंसान के सामने अपनी ही मम्मी के उन अंतरंग और विचलित करने वाले दृश्यों का जिक्र कैसे कर सकता था? मर्यादा की वह जंजीर आज भी मेरे संस्कारों से बँधी हुई थी। "हाँ, मम्मी बिल्कुल ठीक हैं," मैंने खुद को संभालते हुए एक झूठी मुस्कान के साथ कहा.. "बस... थोड़ा घर का काम और जिम्मेदारियों का बोझ है.. और कुछ नहीं।" रुया ने मेरी बात पर पूरी तरह यकीन नहीं किया, उसकी आँखों में एक सवालिया भाव तैर गया, लेकिन उसने मुझे कुरेदना भी ठीक नहीं समझा। उसने बस इतना कहा, "अगर कभी मन भारी लगे, तो बता देना। मैं एक अच्छी श्रोता हूँ, सलाह भले ही अच्छी न दूँ।" उसकी इस बात ने मेरे चेहरे पर एक असली मुस्कान ला दी। हमने चाय खत्म की, और फिर मोड़ पर आकर उसने मेरे कंधे पर हाथ रख कर कहा, "कल मिलते हैं, देव। और हाँ, घर जाकर आराम करना, ज्यादा सोचना बंद करो।" रुया के जाते ही शाम की उस ठंडी हवा में फिर से वही शहर की घुटन घुलने लगी। जैसे ही मैं अपनी सोसाइटी के गेट के करीब पहुँचा, मेरे कदम अपने आप भारी होने लगे… मेरे अंदर का वह तनाव, जो रुया के साथ रहते हुए कुछ देर के लिए सो गया था, दोबारा जाग उठा। मैंने सीढ़ियाँ चढ़ीं और अपने फ्लैट के दरवाजे पर पहुँचा… ताला नहीं लगा था… अंदर कदम रखते ही रसोई से बर्तनों के खटकने और तेल में जीरे के चटकने की आवाज आई.. और एक स्मेल भी आई जो शायद रूम फ्रेशनर का रहा होगा। हॉल में इमरान सोफे पर बैठा था। उसने कानों में हेडफोन लगा रखे थे और लैपटॉप पर कुछ एडिट कर रहा था। मुझे देखते ही उसने हेडफोन गले में लटकाया और अपनी वही चोदू सी मुस्कान दी, "आ गया भाई? आज थोड़ा जल्दी आ गया?" पूछने को तो वो ये बात आराम से, थोड़ा धीरे से पूछ सकता था... लेकिन भोसड़ी वाले ने कुछ ऐसे आवाज़ में बोला, जैसे मानो मेरे आने की घोषणा कर रहा है! 'गांडू साला!' मैंने मन ही मन कहा... "हाँ, काम जल्दी निबट गया था," मैंने बिना उसकी आँखों में देखे जवाब दिया। मेरी नजरें सीधे रसोई की तरफ गईं… मम्मी वहाँ खड़ी थीं… इमरान की आवाज शायद उन तक पहुँच गई थी… मुझे एक स्माइल दी… वही, बरसों परिचित… "मम्मी वाली" स्माइल… "देव, हाथ-मुँह धो ले… मैं तेरे लिए पराठे सेंक रही हूँ…" मम्मी ने जाते-जाते, पलटकर कहा। उनकी आवाज में वही ममता थी, पर अब उस ममता के नीचे मुझे वह खामोश, अनकहा अपराधबोध साफ सुनाई दे रहा था। उन्होंने आज पीले रंग की सूती साड़ी पहन रखी थी, लेकिन उस साड़ी को पहनने का तरीका वही नया और मॉडर्न था—पल्लू बहुत करीने से कंधे पर था, और ब्लाउज की सिलाई वैसी ही कसी हुई थी जो शहर के बुटीक की पहचान थी। उनके चेहरे पर वही थकी हुई, लेकिन अलग चमक थी। मैं बाथरूम में गया.. नल चालू करके मैंने अपने चेहरे पर ठंडे पानी के कई छींटे मारे… आईने में जब मैंने खुद को देखा, तो मेरी अपनी आँखें लाल और सूजी हुई लग रही थीं। मैंने तुरंत छींटे मारना छोड़ कर, सीधे नहाने का ही निर्णय ले लिया। शॉवर खोल कर उसके नीचे खड़े हुए मुझे अभी दो मिनट भी नहीं हुए थे कि मेरे दिमाग में एक साथ दो बातें कौंधीं! हालाँकि पहली बात अब भी बहुत अस्पष्ट थी... और वो ये कि आज ऑफिस से निकलने से लेकर अपने-अपने घरों की ओर जाने से पहले तक, मेरे और रुया के बीच जो कुछ भी बातें हुईं, उसके बाद से ही मुझे थोड़ा अजीब सा लगने लगा था... क्या अजीब था, ये न तब समझ में आया और न अब आ रहा है... और दूसरी बात मम्मी को लेकर... पिछले एक सप्ताह से गौर नहीं किया था... पर आज किया। सच कहूँ तो गौर किया नहीं, हो गया.... वो यह कि मम्मी पीली साड़ी के साथ पीला ब्लाउज पहनी हैं आज, जो पीछे से तो टाइट लगी मुझे--- लेकिन, उस पीले ब्लाउज के ऊपर से उनकी ब्रा की रूप-रेखा साफ़ समझ में आ रही थी... हालाँकि ये नॉर्मल है, मैंने पहले भी कई बार ऐसा देखा है... जो नॉर्मल नहीं लगी वो यह थी कि उनके ब्रा के स्ट्रैप और हुक वाला हिस्सा पहले से कहीं अधिक पतले लगे! जैसा कि आजकल के आधुनिक डिज़ाइन में होता है... और जहाँ तक मैं अपनी मम्मी को जानता आया हूँ, वो और आधुनिकता एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत रहे हैं... एक तरफ वह दुनिया थी जो मुझे बाहर मिली थी—रुया की मासूमियत, उसकी सीधी-सादी बातें, और वह शाम की चाय जो जिंदगी को हल्का बना देती थी… और दूसरी तरफ यह घर, जहाँ हर इंसान एक मुखौटा पहने घूम रहा है। इमरान सोफे पर बैठकर ऐसे बर्ताव कर रहा था जैसे वह मेरा सबसे वफादार दोस्त हो, मम्मी ऐसे खाना बना रही थीं जैसे वे दुनिया की सबसे बेकसूर इंसान हों, और मैं... मैं ऐसे सामान्य बनने का ढोंग कर रहा था जैसे कि मुझे कुछ मालूम ही न हो... खाना खाते वक्त डाइनिंग टेबल पर गहरा सन्नाटा था… शुरुआत के कुछ सेकंड हम तीनों ने अपने-अपने काम को लेकर थोड़ी-बहुत बातें कीं। उसके बाद कमरे में हम सबके खाना चबाने की ही सिर्फ आवाज़ सुनाई दे रही थी। इमरान कुछ बोल नहीं रहा था, मम्मी बोलने के मूड में लग नहीं रही थीं; और मैं जिस टॉपिक पर बात करना चाहता था, वो यूँ ही नहीं कर सकता था… करीब बीस मिनट ऐसे ही बीत गए… हम सबका खाना ऑलमोस्ट खत्म हो ही रहा था कि तभी इमरान ने मुँह खोला, "आँटी जी, कल सुबह आपको वो पार्सल लेने नीचे जाना होगा। मैंने आपके नाम से ही मंगाया है," मम्मी ने एक पल के लिए चौंककर मेरी तरफ देखा, फिर इमरान की तरफ एक क्षण के लिए देख कर मुँह फेरते हुए धीमे से सिर हिलाया, "हाँ... ठीक है। मैं ले लूंगी।" "किस चीज का पार्सल?" मैंने अचानक पूछ लिया। मेरी आवाज में थोड़ा तीखापन अपने आप आ गया। इमरान ने बहुत सहजता से मेरी तरफ देखा और बोला, "अरे कुछ नहीं यार, आँटी जी के घुटनों के दर्द के लिए एक आयुर्वेदिक तेल मंगवाया था। ऑनलाइन अच्छा डिस्काउंट मिल रहा था तो मैंने ऑर्डर कर दिया।" उसका जवाब इतना सटीक और स्वाभाविक था कि पलट कर कुछ कहा या पूछा नहीं गया मेरे से। लेकिन मेरा सिक्स्थ सेंस चीख-चीख कर कहने लगा कि यह सिर्फ एक और बहाना है—एक और ऐसा पर्दा जिसके पीछे कोई नई बातचीत या कोई नया खेल चल रहा है। To be Continued…
17-09-2026, 01:28 AM
एपिसोड 27: कोशिशें और किस्मत
मस्तिष्क की बनावट भी बड़ी विचित्र होती है। जब कोई गहरा आघात आपकी अंतरात्मा पर लगता है, तो इंसान या तो पूरी तरह टूटकर बिखर जाता है, या फिर उसके भीतर का कोई हिस्सा खुद को अलग करके एक तटस्थ, कठोर दर्शक की कुर्सी पर जा बैठता है। मेरे साथ भी यही हो रहा था। अपने ही घर की दहलीज पर, अपनी ही माँ और अपने दोस्त के बीच की इस अदृश्य दीवार को गिरते देखकर, मैं भीतर से दो-फाड़ हो चुका था। मैं अक्सर रात के सन्नाटे में, जब कमरे की बत्ती बुझा दी जाती और पंखे की घरघराहट के सिवा कोई आवाज न होती, खुद से ही जिरह करने लगता। मैं अपने ही विचारों से ऐसे पेश आता जैसे कोई मंझा हुआ वकील अदालत में किसी संदिग्ध गवाह से सवाल पूछ रहा हो, या कोई संजीदा मनोवैज्ञानिक किसी विक्षिप्त मरीज के अवचेतन की परतें उधेड़ रहा हो। "देव, तुम जो देख रहे हो, क्या वह वाकई सच है? या फिर तुम्हारे अपने भीतर का कोई गहरा पूर्वाग्रह उन दोनों के सामान्य मेलजोल को इस बदसूरत शक्ल में ढाल रहा है?" मैं खुद से सवाल करता। फिर भीतर से ही एक सर्द, तीखा जवाब उभरता, "पूर्वाग्रह? भला इस तरह की कोई पूर्वाग्रह क्यों होगी? आखिर ऐसी कौन सी बात है जो दोनों आपस में छुप-छुपा करते हैं? बिल्कुल दो लवर्स की तरह! नहीं। तुम जो देख रहे हो, वह सिर्फ धुंध नहीं है; उसके पीछे कोई ऐसी आग सुलग रही है जो पूरे घर को राख करने पर तुली है।" "लेकिन अगर यह सब सिर्फ एक विधवा का इस नए, आधुनिक शहर में खुद को सहज करने का प्रयास हुआ तो? क्या उम्र के चालीसवें पड़ाव को पार कर चुकी एक औरत को खुलकर सांस लेने, अपनी देह को सुंदर महसूस कराने का कोई अधिकार नहीं है?" "अधिकार है... सौ बार है... लेकिन उस अधिकार की कीमत क्या एक बेटे के विश्वास की बलि है? क्या उस नए जीवन का माध्यम सिर्फ और सिर्फ इमरान जैसा कोई तीसरा शख्स ही हो सकता था?" इन सवालों का कोई अंत नहीं था... दिनभर दफ्तर में बैठकर फाइलों के पन्नों को पलटते हुए भी मेरे भीतर यह अदालती बहस चलती रहती। इस अंतहीन जिरह ने मुझे मानसिक रूप से निचोड़ कर रख दिया था। और इस सब के केंद्र में थीं—मेरी मम्मी, और उनके तन पर चढ़ते वो नए, अजीबोगरीब लिबास। मम्मी के पहनावे में आया बदलाव कोई अचानक आया तूफान नहीं था, बल्कि यह एक बेहद सधी हुई, धीमी आंच की तरह था जो रोज थोड़ा-थोड़ा सुलग रहा था। बीरभूम की उस पुरानी, मटमैली सूती साड़ियों की तहों में खुद को छिपाकर रखने वाली मेरी माँ अब धीरे-धीरे एक ऐसे रूप में ढल रही थीं जिसे देखकर कोई भी सामान्य आंख एक पल के लिए ठहर जाने को विवश हो जाए। उनके कपड़ों में पहली नजर में कोई फूहड़पन या अश्लीलता नहीं दिखती थी। दूर से देखने पर वे पूरी तरह शालीन, संभ्रांत और किसी भी भरे-पूरे परिवार की घरेलू स्त्री जैसी ही लगती थीं। लेकिन उस शालीनता के रेशों में एक बेहद बारीक, महीन और उद्दाम खुलापन गूंथा हुआ था। वे जब सिल्क या जॉर्जेट की साड़ियां पहनतीं, तो उनकी प्लेट्स इतनी करीने से नाभि के ठीक नीचे तक सिमटी होती थीं कि उनके चलने के साथ देह का हर उतार-चढ़ाव एक सधी हुई लय में हरकत करता था। साड़ी का पल्लू अब उनके सीने को पूरी तरह ढकने की बजाय केवल एक बारीक पट्टी की तरह सिमटकर बाएँ कंधे पर एक खूबसूरत ब्रोच से बंधा रहता था। उस पल्लू के ढलकाव से उनका दाहिना हिस्सा, पेट की चिकनी ढलान और कमर की वो गहरी, सुडौल रेखाएं एकदम साफ उजागर होती थीं। और उनके ब्लाउज... वे बीरभूम के किसी साधारण टेलर के सिले हुए ढीले-ढाले ब्लाउज नहीं थे। वे शहर के किसी महँगे बुटीक के तराशे हुए सांचे थे। पीछे से उनका गला इतना गहरा कटवा होता था कि उनकी पूरी रीढ़ की हड्डी और पीठ की चिकनी त्वचा धूप में चमक उठती थी। नीचे ब्लाउज की पतली स्ट्रैप के साथ सिर्फ दो बेहद पतली, रेशमी डोरियाँ बँधी होती थीं, जिनके सिरों पर लटके छोटे-छोटे लटकन जब उनके चलने पर हिलते, तो ऐसा लगता मानो कोई मूक पुकार गूँज रही हो। आगे से भी गले की बनावट ऐसी थी जो उनके उन्नत वक्षस्थल के उभार को ढकने की बजाय उन्हें एक सधा, कसा और ऊपर की ओर उठा हुआ आकार देती थी। जब वे सलवार-कमीज पहनतीं, तो वह दृश्य और भी विचलित करने वाला होता। कमीज का कपड़ा इतना महीन और शरीर से इस कदर चिपका हुआ होता था कि उनकी कमर का मोड़ और कूल्हों की बनावट हर कदम के साथ स्पष्ट रेखाएं खींचती थी। साइड की चाक (स्लिट्स) कमर के काफी ऊपर तक खुली होती थीं, जिससे उनके चलने पर पतली पायजामी या चूड़ीदार के ऊपर से त्वचा की एक हल्की सी झलक अनायास ही कौंध जाती थी। वे जब भी हॉल से गुजरतीं, तो हवा में किसी महँगे बॉडी मिस्ट या चंदन, या जैस्मिन के परफ्यूम की खुशबू तैर जाती। उनके बँधे हुए बालों से कुछ लटें हमेशा गर्दन पर छूटी रहती थीं, जो उनके पसीने की नमी से चिपककर और भी गहरी लग रही थीं। एक दिन सुबह नाश्ते की मेज पर जब वे चाय की केतली लेकर आईं, तो इमरान वहीं बैठकर अपने मोबाइल पर उँगलियाँ चला रहा था। मम्मी ने झुककर उसकी प्याली में चाय डाली। झुकते ही उनके कंधे का पल्लू थोड़ा और नीचे सरक गया, जिससे उनकी चूचियों का ऊपरी हिस्सा और गले की उन नाजुक नसों के साथ वो लंबी घाटी पूरी तरह बेपर्द हो गईं। इमरान ने मोबाइल से नजरें उठाईं... उसकी आँखों में कोई हड़कंप नहीं था, न ही कोई संकोच… उसने बेहद धीमे, लगभग सम्मोहित भाव से मम्मी के चेहरे को देखा, और फिर उसकी निगाहें उस ढलके हुए पल्लू से होती हुई उनकी अधखुली चूचियों पर जाकर ठहर गईं। "आँटी जी, आज की चाय में दूध थोड़ा ज्यादा लग रहा है," इमरान ने एक गहरी, सधी हुई आवाज में कहा। उसके चेहरे पर वही पुरानी धूर्तता साफ दिख रही थी। मम्मी ने एक पल के लिए अपनी नजरें नीची कीं। उनके गालों पर एक बहुत हल्की, बादामी सी लाली छा गई... उन्होंने तुरंत अपने पल्लू को सँवारने की कोई हड़बड़ी नहीं दिखाई; बल्कि बेहद इत्मीनान से, अपनी उंगलियों से उस कपड़े को बस छूकर ठीक किया, जैसे वे चाहती हों कि इमरान की नजरें वहां कुछ पल और टिकी रहें। "तुम्हें दूध पसंद है ना, इसलिए डाल दी," मम्मी ने धीमी आवाज में कहा। उनके स्वर में वो पुरानी कठोरता नहीं थी, बल्कि एक ऐसी तरलता थी जो सिर्फ किसी बेहद करीबी के सामने ही निकल सकती है। मैं अपने कमरे से दरवाजे की आड़ से सब कुछ देख-सुन रहा था… मेरा जबड़ा इतनी जोर से भिंच गया था कि कानों के पास की नसें फड़कने लगी थीं। वे दोनों मेरे सामने थे, मेरे अस्तित्व के चंद फीट की दूरी पर, फिर भी उन्होंने मुझे उस पूरे दृश्य से ऐसे बाहर कर दिया था मानो मैं वहां था ही नहीं। उनके बीच कोई शारीरिक स्पर्श नहीं हुआ था, कोई मर्यादा खुलेआम नहीं तोड़ी गई थी, लेकिन उस झुके हुए बदन, उस ढलके हुए पल्लू और इमरान की उन भूखी, स्थिर आँखों के बीच एक ऐसा मौन संभोग घटित हो चुका था जिसने मेरे रोंगटे खड़े कर दिए थे। घर के इस दमघोंटू, जहरीले माहौल से बाहर अगर कोई एक जगह थी जहाँ मेरी आत्मा को कुछ पल के लिए सांस लेने की जगह मिलती थी, तो वह थी रुया की मौजूदगी। ऑफिस में काम करते हुए जब मेरा दिमाग मम्मी के कपड़ों या इमरान की उस शातिर मुस्कान की यादों से फटने लगता, तब रुया का मेरे केबिन में आना किसी वरदान जैसा लगता था। पिछले दो हफ्तों में हमारे बीच की औपचारिकताएं जैसे पिघलकर बह गई थीं। हम अब सिर्फ 'सहकर्मी' नहीं थे; हमारे बीच एक ऐसा कोमल, अनकहा रिश्ता पनप रहा था जो बिना किसी वादे के भी बेहद मजबूत महसूस होता था। "देव, तुम फिर से लंच करना भूल गए?" एक दिन दोपहर को वह मेरे केबिन का कांच का दरवाजा थोड़ा सा धकेलकर अंदर दाखिल हुई। उसने हल्के आसमानी रंग का एक ढीला-ढाला कुर्ता पहन रखा था, उसके बाल पीछे एक साधारण क्लिप में बंधे थे और चेहरे पर किसी भी किस्म के आर्टिफिशियल मेकअप का कोई नाम-ओ-निशान नहीं था। उसकी आँखों में एक ऐसी सहज, पारदर्शी मासूमियत थी जो मेरी मम्मी के चेहरे से अब पूरी तरह गायब हो चुकी थी। "अरे नहीं रुया, बस यह क्लाइंट की शीट खत्म कर रहा था। भूख नहीं है आज," मैंने स्क्रीन से बिना नजर हटाए कहा, हालांकि मेरा सिर भूख और तनाव से चकरा रहा था। रुया ने बिना कुछ कहे मेरे सामने रखी फाइलों को एक तरफ खिसकाया और अपना स्टील का टिफिन बॉक्स खोलकर मेरी मेज पर रख दिया। उसमें मेथी के पराठे और घर का बना सूखा आलू रखा था। "जब तक तुम यह दो पराठे खत्म नहीं करोगे, मैं यह शीट आगे फॉरवर्ड नहीं होने दूंगी," उसने नकली सख्ती दिखाते हुए अपनी बाहें मोड़ लीं। मैंने उसकी तरफ देखा। उसके उस मासूम चेहरे में कोई छल नहीं था, कोई छिपा हुआ एजेंडा नहीं था। थी तो बस एक मादक मुस्कान… और उसके एक खास कोण में खास तरीके से झुके होने के कारण हल्की सी क्लीवेज दिख रही थी… ![]() मैंने उधर ज्यादा नहीं देखा… एक हल्की स्माइल देकर चुपचाप पराठे का एक निवाला तोड़ा। "तुम इतनी अच्छी क्यों हो, रुया?" मेरे मुंह से अनायास ही निकल गया, "मतलब... इस मतलबी शहर में, इस ऑफिस में, जहाँ हर कोई अपने मतलब की चादर ओढ़े बैठा है, तुम दूसरों की इतनी परवाह क्यों करती हो?" रुया की आँखों में एक पल के लिए गंभीरता की एक हल्की सी छाया तैरी.. उसने कुर्सी खींचकर मेरे सामने बैठते हुए कहा, "क्योंकि मुझे लगता है कि जो लोग अंदर से सबसे ज्यादा टूटे होते हैं, वे बाहर से सबसे ज्यादा मजबूत दिखने का नाटक करते हैं। और तुम... देव, तुम बहुत अच्छे एक्टर हो, पर मैं तुम्हारी आँखों के पीछे की उस खाली जगह को देख सकती हूँ। कोई बात है जो तुम्हें अंदर ही अंदर खाए जा रही है।" उसकी बात सुनकर मेरा हाथ वहीं रुक गया। मेरा जी चाहा कि मैं अपना सिर उसकी गोदी में या कंधे पर रख दूँ और फूट-फूट कर रो पड़ूँ। मैं उससे कहूँ कि रुया, मेरी मम्मी बदल गई हैं, मेरा दोस्त आस्तीन का सांप निकला है, और मैं अपने ही घर में एक अजनबी बनकर रह गया हूँ। लेकिन मेरी ज़बान पर ताले लगे रहे। मैं अपनी मम्मी की इज्जत को किसी तीसरे के सामने कैसे नीलाम कर सकता था? भले ही वह रुया जैसी निष्कपट लड़की ही क्यों न हो। "कुछ नहीं है रुया... बस काम का थोड़ा तनाव है, और घर की जिम्मेदारियां," मैंने नजरें चुराते हुए झूठ बोल दिया। रुया ने मुझे कुछ पल चुपचाप देखा, फिर अपनी हथेली को आगे बढ़ाकर मेरी हथेली पर रख दी। उसका स्पर्श इतना शीतल, इतना आश्वस्त करने वाला था कि मेरे भीतर की सारी तल्खी एक पल के लिए शांत हो गई। "जब भी तुम्हारा मन हल्का करने का दिल करे, मैं यहीं हूँ देव। याद रखना, तुम अकेले नहीं हो," उसने बेहद कोमलता से कहा। उसके इस स्पर्श ने मेरे भीतर जीने की एक नई उम्मीद जगाई थी। जहाँ घर में मुझे हर पल एक खौफनाक साज़िश की बू आती थी, वहीं रुया का साथ मुझे यह यकीन दिलाता था कि दुनिया अभी पूरी तरह सड़ी नहीं है। लेकिन विडंबना यह थी कि रुया के जितना करीब मैं जा रहा था, घर का वह अंधेरा मुझे उतनी ही जोर से अपनी ओर खींच रहा था। मम्मी की वह बदलती सूरत एक पल के लिए भी मेरे ज़हन से उतरती नहीं थी। घर में चल रहे इस 'खेल' का अंत मुझे हर हाल में देखना था। मम्मी का हर दूसरे दिन सज-संवरकर बाहर निकलना अब कोई सामान्य बात नहीं रह गई थी। उनका कहना होता था कि वे मंदिर जा रही हैं, या कीर्तन में जा रही हैं, या राशन लाने जा रही हैं। लेकिन कोई औरत मंदिर जाने के लिए या राशन लाने जाने के लिए इतना गहरा बैकलेस ब्लाउज और इतनी कसी हुई पारदर्शी साड़ियां क्यों पहनेगी? मैंने फैसला कर लिया कि अब सिर्फ घर में बैठकर कड़ियां जोड़ने से कुछ नहीं होगा; मुझे यह देखना ही होगा कि वे बाहर आखिर जाती कहाँ हैं, और किससे मिलती हैं। Continued.....
17-09-2026, 01:36 AM
Episode 27: Continued....
पहला प्रयास: मंगलवार की दोपहर थी। मुझे पता था कि मंगलवार को मम्मी 'हनुमान मंदिर' जाने का बहाना बनाकर निकलती थीं। मैंने दफ्तर से जल्दी निकलने की अर्जी दी और करीब साढ़े तीन बजे अपनी बाइक लेकर अपनी ही सोसाइटी के बाहर वाले नुक्कड़ पर एक चाय की गुमटी के पीछे छिपकर खड़ा हो गया। ठीक तीन बजकर पैंतालीस मिनट पर मम्मी बाहर निकलीं। उन्होंने हल्के जामुनी रंग की एक जॉर्जेट की साड़ी पहन रखी थी, धूप से बचने के लिए उन्होंने अपनी आँखों पर एक बड़ा सा काला चश्मा चढ़ा रखा था और हाथ में एक छोटा सा फैंसी क्लच था। वे किसी भी कोण से पूजा करने जा रही श्रद्धालु नहीं लग रही थीं; उनकी चाल में एक अजीब सी मदमस्त ठसक थी। सोसाइटी के गेट से निकलते ही उन्होंने एक ऑटो को हाथ दिया। ऑटो रुका, वे अंदर बैठीं और ऑटो मुख्य सड़क की तरफ बढ़ गया। मैंने तुरंत अपनी बाइक स्टार्ट की और सेफ डिस्टेंस बनाए रखते हुए ऑटो के पीछे लग गया। मेरा दिल सीने में धड़क रहा था। पहली बार मैं अपनी ही मम्मी की जासूसी कर रहा था। सड़क पर गाड़ियों का भारी ट्रैफिक था। ऑटो कभी किसी बस के पीछे छिप जाता, तो कभी किसी चौराहे पर धीमा पड़ जाता। करीब दो किलोमीटर चलने के बाद ऑटो एक बेहद व्यस्त और पुराने बाज़ार के इलाके में मुड़ा। वहां सड़कों पर दोनों तरफ दुकानें थीं, ठेलों की भरमार थी और पैदल चलने वालों का ऐसा रेला था कि बाइक चलाना दूभर हो रहा था। अचानक, उस संकरी गली के मोड़ पर एक लोडिंग टेम्पो ने बीच सड़क पर ब्रेक मार दिया। रास्ता पूरी तरह ब्लॉक हो गया। "अरे भाई, हटाओ इसे!" मैंने अपनी बाइक का हॉर्न जोर-जोर से बजाते हुए चिल्लाया। "दिखता नहीं है क्या, माल उतर रहा है! दो मिनट रुको!" टेम्पो वाले ने बदतमीजी से जवाब दिया। उन दो मिनटों ने मेरी किस्मत का फैसला कर दिया। जब तक रास्ता खुला और मैंने अपनी बाइक को आगे निकाला, तब तक वह ऑटो न जाने किस मोड़ पर मुड़ चुका था। मैंने पागलों की तरह उस पूरे बाज़ार के तीन चक्कर लगाए, हर ऑटो के अंदर झांककर देखा, लेकिन मम्मी का कहीं कोई नाम-ओ-निशान नहीं था। वे उस भीड़-भरे बाज़ार के किसी अज्ञात कोने में ऐसे गायब हो गई थीं जैसे हवा का कोई झोंका। मैं बड़ा हैरान-परेशान और पसीने से तर-बतर, खाली हाथ लौट आया। दूसरा प्रयास: दो दिन बाद, गुरुवार को मुझे फिर मौका मिला। इस बार मैंने कोई गलती न करने की कसम खाई थी। मम्मी दोपहर करीब दो बजे निकलीं। इस बार उनके लिबास में मॉडर्ननेस और भी ज्यादा तीखी थी—एक बेहद फिटिंग वाला सफेद और लाल सलवार-सूट, जिसके दोनों तरफ के कट काफी नीचे तक थे और दुपट्टा केवल एक कंधे पर पिन से अटका हुआ था। इस बार वे ऑटो में नहीं बैठीं, बल्कि पैदल ही मुख्य सड़क की ओर चलने लगीं। मैं अपनी बाइक को बंद करके, पैदल ही उनके पीछे-पीछे करीब पचास मीटर की दूरी पर चलने लगा। धूप बहुत तेज थी, पर मेरी आँखें सिर्फ उनके उस हिलते, सधे हुए बदन पर टिकी थीं। वे एक बड़े शॉपिंग मॉल के सामने रुकीं। तभी वहाँ एक काली सेडान कार आकर रुकी। कार के शीशे पूरी तरह काले थे। कार का पिछला दरवाजा खुला, मम्मी ने एक बार मुड़कर अपने पीछे देखा—मैंने खुद को तुरंत एक बड़े होर्डिंग के पीछे छिपा लिया—और फिर वे तेजी से उस कार के अंदर बैठ गईं। दरवाजा बंद हुआ और कार फर्राटा भरते हुए निकल गई। "कार? किसकी कार थी वो?" मेरे होश उड़ गए। मैं वापस भागकर अपनी बाइक की तरफ गया, जो मैंने कुछ दूरी पर पार्क की थी। बाइक स्टार्ट करने में मुझे सिर्फ तीस सेकंड लगे, लेकिन जब तक मैं मुख्य सड़क पर पहुंचा, वह काली कार उस चौड़ी सड़क के भारी ट्रैफिक में कहीं गायब हो चुकी थी! न मैं उसका नंबर देख पाया, न ही ड्राइवर का चेहरा। दो बार... लगातार दो बार वे मेरी आंखों के सामने से ऐसे ओझल हुई थीं जैसे किसी ने बहुत ही सधे हुए तरीके से इस पूरे खेल की स्क्रिप्ट लिखी हो। और दोनों बार इतनी खूबसूरती से आँखों के सामने से ओझल कैसे हो गईं? संदेह का यह जाल अब मुझे पागल करने लगा था। तीसरी कोशिश: कॉर्पोरेट की बेड़ियां शनिवार का दिन। आज भी मम्मी कहीं जाने वाली हैं… यह दिन मेरे लिए बेहद महत्वपूर्ण था क्योंकि मुझे किसी भी कीमत पर यह जानना था कि आखिर मम्मी ससुरी जाती कहाँ हैं?! दोपहर के करीब एक बजे, मम्मी फिर से उसी तरह तैयार हुईं। इस बार उन्होंने हल्के गुलाबी रंग की शिफॉन की साड़ी पहनी थी, जिसका पल्लू इतना झीना था कि उसके आर-पार उनके सीने और पीठ की त्वचा साफ झलक रही थी। वे फ्लैट से निकलीं और मैंने तुरंत अपनी बाइक उनके पीछे लगा दी। इस बार मैंने फैसला किया था कि मैं उनके ऑटो से अपनी नजरें एक सेकंड के लिए भी नहीं हटाऊंगा, चाहे सड़क पर कोई भी आ जाए। ऑटो आगे-आगे चल रहा था और मैं ठीक दो गाड़ियाँ पीछे अपनी बाइक दौड़ा रहा था। हम शहर के एक बेहद शांत, पॉश रिहायशी इलाके की तरफ बढ़ रहे थे। मेरी धड़कनें तेज थीं; मुझे लग रहा था कि आज... आज इस रहस्य की अंतिम परत उतरने वाली है। तभी, मेरी जेब में पड़ा फोन किसी अलार्म की तरह जोर-जोर से घनघनाने लगा। मैंने एक हाथ से हैंडल संभालते हुए जेब से फोन निकाला और स्क्रीन पर देखा। 'गांडू कॉलिंग...' ये नाम मैंने अपने ऑफिस के बॉस को दिया था… और इसी नाम से फोन में उनका कॉन्टैक्ट सेव करके रखा था। मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मेरा बॉस, सुधीर सिंघानिया, पूरे दफ्तर में अपने सनकी मिजाज और क्रूरता के लिए बदनाम था। अगर उसका फोन शनिवार को आ रहा था, तो इसका मतलब था कि दफ्तर में कोई बहुत बड़ा बवाल खड़ा हो चुका था। मैंने पहले सोचा कि कॉल काट दूँ। सामने ऑटो जा रहा था, मम्मी का वह गुलाबी पल्लू खिड़की से बाहर हवा में लहरा रहा था। सच्चाई सिर्फ कुछ सौ मीटर दूर थी। लेकिन फिर मेरे दिमाग में अपने करियर, अपनी नौकरी और उस एक्सीडेंट के बाद के मेडिकल बिलों का ख्याल कौंध गया। अगर यह नौकरी गई, तो मैं इस शहर में एक दिन भी टिक नहीं पाऊंगा। मेरी रीढ़ में एक ठंडा डर उतर गया। मैंने मजबूरन बाइक को सड़क के किनारे एक पेड़ के नीचे रोका, हेलमेट का शीशा ऊपर किया और कांपती उंगलियों से कॉल रिसीव किया। "यस, सर?" मैंने अपनी हांफती हुई आवाज को काबू में करते हुए कहा। "देव! व्हेयर द हेल आर यू?!" फोन के उस पार से सुधीर की दहाड़ती हुई आवाज आई। उसकी आवाज इतनी तेज थी कि मुझे फोन कान से थोड़ा दूर करना पड़ा। "सर, मैं... मैं फील्ड में हूँ, एक काम से..." "शट अप! मुझे कोई बहाने नहीं सुनने!" सुधीर मादरचोद ने मुझे बीच में ही काट दिया… "जो जर्मन क्लाइंट की प्रेजेंटेशन मंडे को जानी थी, उसके सारे फाइनेंशियल प्रोजेक्शंस में इतनी बड़ी गलतियां कैसे हैं? तुमने वो डेटा री-चेक क्यों नहीं किया था?" "सर, वो डेटा अमित जी की टीम ने दिया था, मैंने सिर्फ उसे कंपाइल..." "डोंट पास द बक ऑन अदर्स, देव!" सुधीर चीखा... "तुम प्रोजेक्ट लीड कर रहे हो या अमित? उस क्लाइंट का अकाउंट हमारे लिए बीस करोड़ का है। अगर मंडे मॉर्निंग को उस प्रेजेंटेशन में एक भी कॉमा गलत निकला, तो याद रखना, तुम्हारी वो एक्सीडेंट वाली लीव मैं अनपेड कर दूंगा और तुम्हें इसी महीने टर्मिनेशन लेटर थमा दूंगा! आर यू गेटिंग माय पॉइंट?" मेरी आँखों के सामने अंधेरा छा गया… क्योंकि ये गांडू साला सच में दिमाग से पूरा ही गोल था… इसकी धमकी सिर्फ धमकी नहीं होती है.. ये मैंने साक्षात कई बार देखा है ऑफिस में। कॉर्पोरेट की यह बेरहम दुनिया इंसान को कैसे अपनी उंगलियों पर नचाती है, इसका सबसे घिनौना रूप मेरे सामने था। "स... सर, मैं समझ रहा हूँ। मैं अभी..." "अभी नहीं, राइट नाउ!" सुधीर ने चिल्लाकर कहा। "मुझे अगले आधे घंटे में तुम्हारी तरफ से पूरी एक्सेल शीट का ऑडिटेड वर्जन मेरी ईमेल पर चाहिए। अगर तीन बजे तक मेल नहीं आया, तो मंडे को ऑफिस आने की जहमत मत उठाना!" इसके बाद फोन पर एक लंबी 'बीप' सुनाई दी। सुधीर ने कॉल काट दी थी। मैं सड़क किनारे खड़ा हांफ रहा था। मेरे हाथ गुस्से और लाचारी से कांप रहे थे। मैंने नजर उठाकर देखा... वह सड़क पूरी तरह खाली थी। वह ऑटो, वह गुलाबी पल्लू, वह सारा सुराग... सब कुछ हवा हो चुका था। मैं वहीं फुटपाथ पर बैठकर अपना सिर दोनों हाथों में थामकर रह गया। एक तरफ मेरा करियर था जो एक धागे से लटक रहा था, और दूसरी तरफ मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा, सबसे काला सच था जो एक बार फिर मेरी उंगलियों के बीच से फिसल गया था। मुझे तुरंत घर लौटकर अपना लैपटॉप खोलना पड़ा और रोते-रोते उस एक्सेल शीट की गलतियों को सुधारना पड़ा। उस दिन मैं काम की बेड़ियों में ऐसा जकड़ा कि रात तक कमरे से बाहर नहीं निकल सका। इसके अलावा अपनी किस्मत को बस कुछ बहुत तगड़ी गाली ही दे सका… चौथा प्रयास: बैक टू हॉस्पिटल रविवार का दिन तनाव और थकावट के बीच बीता था, और सोमवार को जब मैं दफ्तर से निकला, तो मेरे भीतर का वह इन्वेस्टिगेटर एक बार फिर सिर उठा चुका था। मुझे पता चला था कि मम्मी आज शाम को फिर किसी काम से बाहर जाने वाली हैं। शाम के करीब छह बजे थे। सूरज ढल रहा था और शहर की सड़कों पर स्ट्रीट लाइट्स एक-एक करके जलने लगी थीं। मम्मी इस बार एक बेहद खूबसूरत, गहरे नेवी-ब्लू रंग की सिल्क साड़ी में निकली थीं। उस साड़ी की बॉर्डर पर सुनहरी ज़री का भारी काम था, लेकिन ब्लाउज का कट वैसा ही गहरा और बोल्ड था जैसा अब उनकी आदत बन चुका था। उनके चलने के अंदाज में एक अजीब सी लचक आने लगी थी… लेकिन आज थोड़ी जल्दबाजी में थीं... वे बार-बार अपनी कलाई पर बंधी घड़ी देख रही थीं। वे सोसाइटी से बाहर निकलीं और एक कैब में बैठ गईं। मैंने तुरंत अपनी बाइक स्टार्ट की। इस बार मैंने अपने फोन को वाइब्रेट मोड पर डाल दिया था। आज न कोई बॉस, न कोई ऑफिस, न कोई दुनिया की ताकत मुझे रोक सकती थी। मैंने कैब का पीछा करना शुरू किया… कैब शहर के उस पुराने, ऐतिहासिक इलाके की तरफ बढ़ रही थी जहाँ पुरानी हवेलियां और बंद पड़े गोदाम थे। सड़कें संकरी होती जा रही थीं और ट्रैफिक कम हो रहा था। दूरी बनाए रखना आसान था। मेरा दिल सीने में बेतहाशा धड़क रहा था। "आज... आज सब कुछ सामने आ जाएगा," मैं मन ही मन बुदबुदा रहा था… "आज मैं देखूंगा कि कौन है वो शख्स जिसके लिए यह औरत अपनी पूरी जिंदगी, अपनी मर्यादा को दांव पर लगा रही है।" कैब एक पुराने, वीरान पड़े डाक-बंगले के मोड़ की तरफ मुड़ी। वहां सन्नाटा था। सिर्फ कुछ पुरानी स्ट्रीट लाइट्स टिमटिमा रही थीं। कैब की रफ्तार धीमी हुई, जैसे वह रुकने ही वाली हो। तभी, मेरा फोन वाइब्रेट हुआ। पॉकेट से निकाल कर देखा… स्क्रीन पर 'रुया' का नाम चमक रहा था। मैंने उसे नजरअंदाज करने की कोशिश की। मैंने अपना ध्यान सामने रुकती हुई कैब पर केंद्रित किया। कैब का दरवाजा खुलने ही वाला था। लेकिन फोन लगातार बजता रहा… एक बार। दो बार.. तीन बार... रुया कभी इस तरह लगातार कॉल नहीं करती थी। वह जानती थी कि मैं शाम को रिलैक्स मूड में होता हूँ। मेरे मन में एक अजीब सा खटका हुआ। क्या कोई अनहोनी हो गई? मैंने कैब को देखते हुए एक हाथ से कॉल का बटन स्वाइप किया और ब्लूटूथ इयरफोन में उसकी आवाज सुनी। "द... देव..." फोन के उस पार से रुया की जो आवाज आई, उसने मेरे खून को जमा दिया। वह बोल नहीं रही थी, बल्कि बेतहाशा रो रही थी। उसकी सांसें बुरी तरह उखड़ी हुई थीं और पीछे से किसी के कराहने की आवाजें आ रही थीं। "रुया?! क्या हुआ? तुम रो क्यों रही हो?" मैंने बाइक की रफ्तार धीमी करते हुए घबराकर पूछा। "देव... प्लीज... मेरी मदद करो..." रुया हिचकियों के बीच चीखी। "मम्मी... मम्मी को अचानक सीने में दर्द हुआ और वे फर्श पर गिर पड़ीं... वे बेहोश हैं, उनकी आँखें पलट रही हैं... घर पर कोई नहीं है देव! मैं एम्बुलेंस को फोन कर रही हूँ पर कोई उठा नहीं रहा... मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा... प्लीज आ जाओ देव... आई नीड यू!" उसकी आवाज में जो बेबसी, जो सच्चा और भयानक खौफ था, उसने मेरे दिमाग के सारे तारों को झकझोर कर रख दिया। सामने कैब रुक चुकी थी। उसका पिछला दरवाजा खुला था और मम्मी का वह नीला पल्लू बाहर निकल रहा था। वे उस पुराने डाक-बंगले के गेट की तरफ बढ़ रही थीं। वहां गेट के थोड़े पीछे एक साया खड़ा था... एक लंबा, मर्दाना साया… सच्चाई सिर्फ पचास मीटर दूर थी। मुझे सिर्फ बाइक को आगे बढ़ाना था, और उस साये का चेहरा बेनकाब हो जाता। मेरी हफ्तों की तड़प, मेरी रातों की नींद का हिसाब आज उस सड़क पर चुकता हो सकता था। "देव... प्लीज... मम्मी का हाथ ठंडा पड़ रहा है..." फोन में रुया की दर्दनाक चीख गूंजी। मैं एक भयानक दोराहे पर खड़ा था। एक तरफ मेरी माँ का वह संदेहास्पद, घिनौना रहस्य था जिसे जानने के लिए मैं हफ्तों से जल रहा था। और दूसरी तरफ वह बेकसूर, मासूम लड़की थी जिसने मेरी जिंदगी के सबसे काले दिनों में मुझे सहारा दिया था, जिसकी माँ इस वक्त जिंदगी और मौत के बीच झूल रही थी। अगर मैं आज उस डाक-बंगले की तरफ गया, तो शायद मुझे वो सच मिल जाता... लेकिन हमेशा के लिए रुया की माँ की जान जा सकती थी, और मैं खुद को कभी माफ नहीं कर पाता। "रुया! शांत हो जाओ! मैं आ रहा हूँ... मैं बस पांच मिनट में पहुंच रहा हूँ!" मैंने जोर से चीखते हुए कहा, और अपनी पूरी ताकत से बाइक का हैंडल घुमा दिया। टायरों की तेज चीख के साथ मेरी बाइक सड़क पर घूमी। मैंने एक अंतिम बार मुड़कर उस डाक-बंगले की तरफ देखा। मम्मी उस साये के साथ उस पुराने अहाते के भीतर दाखिल हो चुकी थीं, और लोहे का भारी गेट उनके पीछे बंद हो रहा था। मेरी आँखों से गुस्से और बेबसी के दो बूंद आंसू टपक कर गालों पर बह गए। मैंने बाइक का एक्सीलेटर पूरी ताकत से खींच दिया और शहर की दूसरी दिशा में, रुया के घर की ओर हवा से बातें करने लगा। जब मैं रुया के घर पहुंचा, तो दृश्य बेहद डरावना था। रुया की माँ लिविंग रूम के फर्श पर बेबस पड़ी थीं, उनका चेहरा पीला पड़ चुका था और सांसें बहुत धीमी चल रही थीं। रुया उनके पास बैठी अपने आंसुओं से उनका चेहरा भिगो रही थी। "देव!" मुझे देखते ही वह भागकर मेरे सीने से लिपट गई। उसका पूरा बदन थर-थर कांप रहा था। "घबराओ मत रुया, मैं आ गया हूँ," मैंने उसे सहारा देते हुए कहा और तुरंत उसकी माँ को अपनी बाहों में उठाया। वे बहुत भारी नहीं थीं, पर बीमारी ने उन्हें बेजान बना दिया था। मैंने उन्हें नीचे मोहल्ले के एक ऑटो वाले को हाथ देकर उसमें लिटाया। रुया उनका सिर अपनी गोद में रखे लगातार रोती जा रही थी, और मैं ऑटो वाले को तेज चलाने के लिए चिल्ला रहा था। अगले दो घंटे किसी भयानक दुःस्वप्न की तरह बीते। अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड के लाल बल्ब के नीचे हम दोनों खड़े थे। डॉक्टर्स की एक टीम अंदर गई थी। रुया का रो-रोकर बुरा हाल था। वह बार-बार अपनी हथेलियों को रगड़ती और भगवान से प्रार्थना करती। मैंने उसके काँपते हुए कंधों को अपनी बाहों में समेट रखा था। "उन्हें कुछ नहीं होगा रुया, तुम देखना... वे बिल्कुल ठीक हो जाएंगी," मैं उसे सांत्वना दे रहा था, पर मेरे अपने भीतर एक अजीब सा खालीपन पसरा हुआ था। रात के करीब नौ बजे डॉक्टर बाहर आए... उनके चेहरे पर एक हल्की सी राहत थी। "शी इज आउट ऑफ डेंजर नाउ," डॉक्टर ने कहा... "माइल्ड हार्ट अटैक था। अगर आप लोग पंद्रह-बीस मिनट और देर कर देते, तो स्थिति बहुत गंभीर हो सकती थी। समय पर ले आए, यह बहुत अच्छा हुआ। अब वे खतरे से बाहर हैं, हमने आईसीयू में शिफ्ट कर दिया है।" यह सुनते ही रुया की आँखों से राहत के आँसू छलक पड़े। उसने मुड़कर मुझे इतनी जोर से गले लगाया कि मेरी साँसें रुक गईं। "थैंक यू देव... अगर आज तुम नहीं होते, तो मैं... मैं अनाथ हो जाती," वह मेरे सीने में अपना चेहरा छुपाकर सिसक रही थी। मैंने उसके सिर को सहलाया... उस वक्त मुझे लगा कि मैंने सही फैसला किया था.. एक इंसान की जान बचाना किसी भी गंदे सच को जानने से कहीं ज्यादा बड़ा काम था। To be Continued…
17-09-2026, 09:28 AM
Good updates I've rated them but it's time to start opening the secrets layer by layer
21-09-2026, 09:20 PM
Good plot and twist but seems like story is not going anywhere it’s rounding in very much same place go further add conversation between mom n friend play peeping Tom situation add twist n turns please go further
Yesterday, 11:54 AM
एपिसोड 28: सिंडिकेट, शराब और अजनबी
शहर की शामें अक्सर अपने सीने में कई तरह के काले-सफेद राज़ समेटे हुए ढलती हैं। बाहर की सड़कों पर दौड़ती चमकदार गाड़ियाँ, ऊँची इमारतों की काँच की खिड़कियों पर चमकती नीली-पीली लाइट्स और फुटपाथों पर अपनी रोज़ी-रोटी के लिए हाँफते हुए आम इंसान—इस सब के नीचे एक ऐसा अंधियारा गटर भी बहता है जिसकी भनक तब तक नहीं लगती जब तक कि उसमें कोई बड़ा धमाका न हो जाए। मेरे अपने घर का दायरा पहले ही किसी खामोश मनोवैज्ञानिक अखाड़े में बदल चुका था, जहाँ हर इंसान दूसरे के सामने अपने चेहरे पर एक झूठा मुखौटा ओढ़े घूम रहा था। लेकिन उस दिन टीवी स्क्रीन पर चमकती लाल पट्टियाँ और लाउड बैकग्राउंड म्यूज़िक ने उस व्यक्तिगत घुटन के बीच एक अजीब सा सनसनीखेज़ मोड़ ला खड़ा किया। उस शाम मैं दफ्तर से थोड़ा जल्दी आ गया था। सर में वही पुराना भारीपन था, जो अब मेरी ज़िंदगी का एक नियमित हिस्सा बन चुका था। सोफ़े पर पसरकर मैंने रिमोट उठाया और टीवी ऑन किया। हर न्यूज़ चैनल पर एक ही सुर्ख़ी चीख-चीख कर दोहराई जा रही थी— "महानगर सिक्युरिटी की सबसे बड़ी कामयाबी: शहर के सबसे बड़े इंटरनेशनल सिंडिकेट का भंडाफोड़! करोड़ों का अवैध सोना और नशीले पदार्थों की खेप बरामद!" स्क्रीन पर खाकी वर्दी में खड़े सिक्युरिटी कमिश्नर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे थे। उनके सामने टेबल पर दर्जनों सोने के बिस्कुट, विदेशी सील लगे पैकेट्स और ब्राउन शुगर व सिंथेटिक ड्रग्स के पारदर्शी पाउच करीने से सजाए गए थे। नीचे टिकर पर तेज़ी से आँकड़े दौड़ रहे थे—अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में ज़ब्त सामान की कीमत पचास करोड़ से भी ऊपर... शहर के कई पॉश इलाकों और पुराने गोदामों में एक साथ छापेमारी... गिरोह के कई गुर्गे हिरासत में, सरगना अभी भी फरार। न्यूज़ एंकर अपनी आवाज़ को जितना हो सके उतना नाटकीय बनाते हुए बता रहा था कि किस तरह यह सिंडिकेट शहर के पुराने वीरान ठिकानों, डाक-बंगलों और गोदामों का इस्तेमाल करके एक सुरक्षित नेटवर्क चला रहा था। 'पुराने डाक-बंगले...' यह शब्द कानों में पड़ते ही मेरे बदन में एक सिहरन दौड़ गई। मेरी आँखों के सामने अनायास ही उस रात का मंज़र कौंध गया—कैब की खिड़की, मम्मी का वह लहराता गहरा नीला पल्लू, उस वीरान डाक-बंगले का भारी लोहे का गेट और वहाँ खड़ा वह लंबा मर्दाना साया। क्या यह सिर्फ एक वहम था? क्या मेरा दिमाग हर बिखरी हुई कड़ी को जबरदस्ती अपनी माँ और इमरान के उस दलदल से जोड़ने की कोशिश कर रहा था? तभी फ्लैट का मुख्य दरवाज़ा खुला। मैंने गर्दन घुमाकर देखा। इमरान अंदर दाखिल हो रहा था। आमतौर पर इमरान जब भी घर में कदम रखता था, उसके चेहरे पर एक अजीब सी बेफिक्री, आँखों में एक शातिर चमक और होठों पर वही जानी-पहचानी मुस्कान होती थी। वह ऐसे चलता था मानो पूरी दुनिया उसकी जेब में हो। लेकिन आज... आज उसका हुलिया कुछ अलग ही कहानी बयां कर रहा था। उसके बाल बिखरे हुए थे, शर्ट की कॉलर बेतरतीब ढंग से मुड़ी हुई थी और माथे पर पसीने की बारीक बूंदें चमक रही थीं। जैसे ही उसकी नज़र टीवी स्क्रीन पर चल रही ब्रेकिंग न्यूज़ पर पड़ी, उसके कदम हॉल के ठीक बीच में फ्रीज़ हो गए। कुछ सेकंड्स के लिए उसके चेहरे का रंग ऐसे उड़ा जैसे किसी ने उसकी रगों से सारा खून निचोड़ लिया हो। उसकी आँखें टीवी स्क्रीन पर टिकी उन सोने की ईंटों और सिक्युरिटी अफसरों के चेहरों को घूर रही थीं। "भाई... देख रहा है? क्या बवाल कटा है शहर में," मैंने बहुत सामान्य बनने का नाटक करते हुए कहा। इमरान ने अचानक चौंककर मेरी तरफ देखा। उसने तुरंत अपने चेहरे के हाव-भाव को समेटने की एक नाकाम कोशिश की, अपने सूखे होठों पर जीभ फेरी और एक अजीब सी, खिंची हुई आवाज़ में बोला, "हाँ... हाँ भाई, देख रहा हूँ। सिक्युरिटी वाले भी ना... टीआरपी के लिए कुछ भी बढ़ा-चढ़ा कर बताते हैं।" उसकी बात खत्म होते ही मैं तुरंत बोल पड़ा, "इसमें कोई शक नहीं कि काफी ड्रामे के साथ बोल रहा है, पर लगता नहीं कि 'न्यूज़' भी गलत हो। सबूत के साथ दिखाया जा रहा है!" इमरान एक बार मेरी तरफ देखा, फिर टीवी की तरफ... फिर कंधे उचकाकर बेफिक्री का ढोंग करते हुए बोला, "हाँ, सो तो है.. पर अपने को क्या करना.. कर भी क्या सकते हैं...?" उसकी आखिरी लाइन मुझे थोड़ी 'पर्सनल' लगी… इतनी बड़ी न्यूज़ पर उसका यह रिएक्शन... और 'कर भी क्या सकते हैं' कहीं न कहीं एक तरह से मानसिक हार और निराशा की ओर इशारा करने जैसा था। "हाँ... कुछ कर तो नहीं सकते... बस, थोड़ा चौकन्ना रहना पड़ेगा।" मैंने बेफिक्री और सजगता का एक संतुलन बनाकर कहा। और सच कहूँ तो अपने इस हुनर पर गर्व भी करने लगा था... पर मैंने यह भी नोटिस किया कि मेरे ऐसा कहते ही इमरान कुछ सेकंड्स के लिए ठिठका... कुछ सोचा... और फिर अपना सिर झटक दिया। वैसे भी आज उसकी आवाज़ में वह पुरानी खनक गायब थी। उसने अपने कमरे की तरफ कदम बढ़ा दिए, लेकिन उसके चलने के अंदाज़ में एक अजीब सी लापरवाही थी। वह बिना जूते खोले ही कमरे में चला गया और दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया। उस दिन के बाद से, अगले तीन-चार दिनों तक इमरान का व्यवहार पूरी तरह बदल गया। वह घर में बहुत कम टिकता था। सुबह जब मेरी आँख खुलती, तो उसका कमरा खाली मिलता। रात को जब मैं और मम्मी सोफ़े पर बैठकर साथ में डिनर के लिए उसके लौटने का इंतज़ार करते, तो वह देर रात दो या तीन बजे के बाद ही लौटता। उसका फोन लगातार साइलेंट या वाइब्रेट मोड पर रहने लगा था। जब भी कोई कॉल आती, वह बालकनी के कोने में जाकर धीमी आवाज़ में बात करता। उसके चेहरे पर एक गहरा तनाव, एक अनसुलझी बेचैनी साफ़ पढ़ी जा सकती थी। वह लैपटॉप पर भी कुछ काम नहीं कर रहा था, न ही उसने मम्मी से कोई खास बातचीत की। उसके घर से भी उसे फोन कॉल्स नहीं आते थे। जब भी वह हॉल में आता, उसकी आँखें किसी खोए हुए मुसाफिर की तरह शून्य में घूरती रहतीं। कोई तो ऐसी बात थी जो उसे अंदर ही अंदर खाए जा रही थी। मम्मी भी उन दिनों काफी शांत और सहमी हुई सी लग रही थीं। उनका वह सज-संवरकर बाहर निकलने का सिलसिला उन तीन-चार दिनों के लिए पूरी तरह थम गया था। वह अधिकांश समय रसोई में बर्तनों को बेवजह साफ़ करने, साड़ी में फॉल लगाने में, अपने मोबाइल में या अपने कमरे में लेटे-लेटे कोई मैगज़ीन वगैरह पढ़ने में बिताती थीं। इतने दिनों से जिन चीज़ों की आदत सी पड़ गई थी, अचानक इस परिवर्तन से एक बार फिर से घर के भीतर घुटन सी महसूस होने लगी थी। लेकिन फिर... करीब दस दिन बाद, हवा का रुख धीरे-धीरे बदलने लगा! एक दिन जब इमरान शाम को लौटा, तो उसके चेहरे पर वह पुराना तनाव नहीं था। उसकी चाल में वही पुरानी ठसक वापस आ चुकी थी। उसने आते ही सोफ़े पर अपना बैग फेंका, मुझसे मेरा और ऑफिस का हाल-चाल लिया और उसके बाद बालकनी में जाकर बेफिक्री से सिगरेट का धुआँ उड़ाने लगा। ऐसा लगा जैसे जिस तूफान का उसे डर था, वह उसके ऊपर से होकर गुज़र चुका था और उसने बचने के तमाम उपाय छोड़ दिए थे या फिर उसने उस तूफान से बचने का कोई सुरक्षित रास्ता निकाल लिया था! पर एक बात तो साफ़ दिखी... वह पूरी तरह नॉर्मल हो चुका था। उसकी यह वापसी मेरे भीतर के संदेह को और गहरा कर गई। मुझे लगा कि अगर मैंने अब भी कुछ नहीं पूछा, तो यह घुटन मुझे अंदर से खोखला कर देगी। मैंने मन-ही-मन पूछने का दिन और समय निश्चित कर लिया। शनिवार की शाम थी... ऑफिस से छुट्टी थी और मौसम भी सही था। शाम के करीब आठ बजे इमरान मेरे कमरे के दरवाज़े पर आकर खड़ा हो गया। "क्या कर रहा है भाई? कब तक इस कमरे में बंद सड़ता रहेगा?" उसने दरवाज़े की चौखट पर टेक लगाते हुए पूछा। उसके हाथ में एक काले रंग की पॉलीथिन का बैग था जिसके भीतर काँच की बोतलों के टकराने की हल्की सी आवाज़ आई। मैंने मोबाइल से नज़रें उठाईं, "कुछ नहीं, बस ऐसे ही लेटा था।" "चल उठ ना भाई… बहुत दिन हो गए हम दोनों ने साथ बैठकर दो घूँट नहीं लगाए… मौसम भी ठीक-ठाक है, चल बाहर नुक्कड़ वाले पार्क के उस कोने में चलते हैं। थोड़ी ताज़ा हवा भी मिलेगी और दिमाग का कचरा भी साफ़ होगा," उसने एक दोस्ताना अंदाज़ में कहा। मेरा पहला खयाल तो यह आया कि मैं साफ़ मना कर दूँ। मुझे उसकी उस नकली हमदर्दी और उस दोस्ताना चेहरे से नफरत होने लगी थी। लेकिन फिर मेरे भीतर के जासूस ने मुझे टोका—नशे की हालत में अक्सर इंसान अपनी जुबान पर से पहरा हटा देता है। शायद आज की रात मुझे उसके उस मुखौटे के पीछे झांकने का कोई मौका मिल जाए?! "ठीक है, चल," मैंने कहा और अपनी चप्पलें पहनकर उसके साथ बाहर निकल आया। हमारी सोसाइटी के ठीक पीछे एक पुराना, नगर निगम का पार्क था। रात के अंधेरे में उस पार्क के पिछले हिस्से में, जहाँ पुरानी झाड़ियों और बड़े बरगद के पेड़ों का झुरमुट था, आमतौर पर कोई नहीं आता था। सिर्फ दूर सड़क की पीली सोडियम लाइटों की एक धुंधली सी रोशनी पत्तों के बीच से छनकर ज़मीन पर गिर रही थी। हम दोनों पार्क की एक टूटी हुई सीमेंट की बेंच पर बैठ गए। इमरान ने बैग से व्हिस्की की एक महंगी बोतल निकाली, दो प्लास्टिक के डिस्पोज़ेबल ग्लास रखे और साथ में भुने हुए काजू और नमकीन का एक पैकेट खोल दिया... साला पूरी तैयारी के साथ आया था! "यह ब्रांड कब से पीने लगा तू?" मैंने बोतल पर लगे विदेशी लेबल को देखते हुए पूछा। यह कोई साधारण शराब नहीं थी, इसकी कीमत किसी आम दफ्तर के किसी अच्छे पद पर काम करने वाले की महीने भर की सैलरी के बराबर थी। इमरान ने बोतल की सील तोड़ते हुए एक मुस्कान दी, "अरे भाई, ज़िंदगी में कभी-कभी कुछ अच्छे प्रोजेक्ट हाथ लग जाते हैं… जब जेब गर्म हो, तो हलक में भी अच्छी चीज़ ही उतरनी चाहिए… तू बस ग्लास पकड़।" उसने दोनों गिलासों में एक-एक बड़ा पैग उड़ेला और थोड़ा सा पानी मिला दिया। हमने गिलासों को टकराया... डिस्पोज़ेबल ग्लास में घंटा कोई आवाज़ आनी थी! पहला घूँट गले से नीचे उतरते ही सीने में एक तीखी जलन हुई, लेकिन कुछ ही पलों में दिमाग की नसें थोड़ी ढीली पड़ने लगीं। हवा के ठंडे झोंके चेहरे पर लग रहे थे, लेकिन मेरे सीने के भीतर जो लावा हफ़्तों से पक रहा था, वह इस शराब की गर्माहट पाकर धीरे-धीरे उबलने लगा। शुरुआत में इमरान इधर-उधर की बातें करता रहा—कॉर्पोरेट की राजनीति, सुस्त पड़ता बाज़ार, महँगी होती चीज़ें, और कैसे वह जल्द ही कोई बड़ा काम शुरू करने की सोच रहा था, इत्यादि…. वह बिल्कुल नॉर्मल दिखने की कोशिश कर रहा था। जब पाँचवाँ पैग खत्म हुआ और अगले पैग का नशा मेरी रगों में तैरने लगा, तो मेरा आत्म-नियंत्रण जवाब देने लगा। मेरे दिमाग में उस दिन की टीवी न्यूज़, वह वीरान डाक-बँगला, मम्मी का लगभग रोज़ तैयार होकर कुछ देर के लिए घर से बाहर जाना, और कुछ दिन पहले तक इस लड़के की अजीबोगरीब हरकतें किसी मूवी सीन की तरह मेरे दिमाग में घूमने लगीं। मैंने ग्लास को सीमेंट की बेंच पर रखा। "इमरान..." मेरी आवाज़ थोड़ी भारी और लड़खड़ाती हुई निकली। "बोल भाई, क्या हुआ?" उसने अपनी सिगरेट सुलगाते हुए हल्के मूड में पूछा। मुझसे तुरंत बोला नहीं गया... क्या बोलूँ और कहाँ से शुरू करूँ, यह तय करने में समय लगने लगा... और इस हालत में तो यह और भी मुश्किल लग रहा था। "पैग ज़्यादा कड़ा बन गया क्या?" इमरान ने धुआँ उड़ाते हुए मेरी ओर देखा। "मुझे एक बात बता..." "पूछ..." कहकर वह अपने लिए पैग बनाने लगा। मैंने दो-तीन काजू उठाकर मुँह के एक कोने में रखते हुए खुद को शांत दिखाते हुए कहा, "सच-सच बताना… आज कोई ड्रामा नहीं चाहिए मुझे…" मैंने भी अपनी क्लासिक डबल बर्स्ट सुलगाई… खुद को क्लासी दिखाने के लिए यह ज़रूरी लगा। नशे के बावजूद मेरी आँखों में एक सुलगता हुआ गुस्सा नज़र आने लगा था… इमरान ने सिगरेट का एक लंबा कश खींचा, धुएँ का एक छल्ला हवा में छोड़ा और मुस्कुराया, "अरे पूछ ना यार, तू तो ऐसे सीरियस हो रहा है जैसे सीबीआई का अफसर हो.. क्या बात है?" "तेरे और मेरी मम्मी के बीच... यह सब क्या चल रहा है?" सन्नाटे में मेरे यह शब्द किसी हथौड़े की तरह गूँजे… पार्क की झाड़ियों में हवा की सरसराहट भी जैसे एक पल के लिए थम गई। इमरान के चेहरे पर जो मुस्कान थी, वह एक सेकंड के दसवें हिस्से के लिए ठिठकी, लेकिन उसने तुरंत खुद को सँभाला। उसने कोई घबराहट नहीं दिखाई, न ही कोई आक्रामकता… उसने बहुत ही शांत, लगभग दार्शनिक अंदाज़ में अपना ग्लास उठाया, एक घूँट भरा और फिर मेरी तरफ देखा.. उसकी आँखों में एक ऐसी सहजता थी जो किसी शातिर अपराधी की सबसे बड़ी ढाल होती है। "देव... मुझे पता था कि तेरे दिमाग में यह कचरा चल रहा होगा," उसने बेहद धीमी, वज़नदार आवाज़ में कहा। "तू पिछले कुछ हफ़्तों से जिस तरह मुझे और आंटी जी को देख रहा है, मुझे सब समझ आता है भाई। लेकिन तू गलत दिशा में सोच रहा है।" "गलत दिशा में सोच रहा हूँ मैं?" मेरी आवाज़ में और कड़वाहट घुल गई, "इमरान, मैं अंधा नहीं हूँ! जिस तरह से तू उनसे बातें करता है, जिस तरह से वह तेरे सामने पेश आती हैं... उनके वो कपड़े, वो नया अंदाज़, उनका बिना बताए घंटों गायब रहना... क्या यह सब भी मेरा वहम है?" नशे में जो भी ज़ुबान पर आया, मैं बोलता गया... मेरे दिमाग में एक बार के लिए यह बात कौंधी कि कहीं मैं ऐसा कुछ ज़रूरत से ज़्यादा उजागर न कर दूँ जो बाद में मेरे खिलाफ हो जाए... इमरान ने सिगरेट की राख झाड़ी और थोड़ा आगे झुककर मेरी आँखों में देखा। उसके स्वर में इतनी बनावटी मासूमियत और हमदर्दी थी कि कोई भी तीसरा इंसान उस पर भरोसा कर जाता। "देव, मेरी बात ठंडे दिमाग से सुन। आंटी जी तेरे लिए क्या हैं? तेरी माँ हैं ना? एक ऐसी औरत जिसने अपनी पूरी जवानी बीरभूम के उस छोटे से, दकियानूसी कस्बे में गुज़ार दी। तेरे पिता के जाने के बाद उन्होंने क्या देखा अपनी ज़िंदगी में? सिर्फ चूल्हा-चौका, समाज के ताने, और वह मटमैली सूती साड़ियों तक सिमटी घुटन भरा दायरा। कभी तूने एक बेटे के चश्मे को उतारकर एक औरत के नज़रिए से उन्हें देखा है?" उसकी इस दलील ने मेरे सीने पर एक अलग सा वार किया। मैं चुपचाप उसे देखता रहा। इमरान अपनी रौ में बोलता चला गया, "वह इस शहर में नई आई हैं देव। यह एक नया और पूरी तरह से जुदा शहर है, नया और एकदम अलग माहौल है। उनके पुराने घर से कहीं दूर एक ऐसे शहर में... चालीस-पैंतालीस साल की उम्र में अगर कोई औरत खुद को थोड़ा संवारना चाहती है, अपनी ज़िंदगी को थोड़ा खुलकर जीना चाहती है, नए कपड़े पहनना चाहती है, तो इसमें क्या गुनाह है? क्या विधवा हो जाने के बाद एक औरत को अपनी देह, अपनी इच्छाओं और अपनी खुशियों को ज़िंदा दफन कर देना चाहिए?" "लेकिन वह सिर्फ कपड़े नहीं हैं इमरान!" मैंने चिढ़कर कहा, "और तू... तू उनके इतने करीब क्यों जा रहा है?" "क्योंकि वह मुझे अपने बेटे के दोस्त की तरह नहीं, बल्कि एक ऐसे इंसान की तरह देखती हैं जिसके सामने उन्हें अपने उस पुराने, बोझिल अतीत का मुखौटा नहीं पहनना पड़ता," इमरान ने बहुत ही सधे हुए शब्दों में जवाब दिया, "तू उनका बेटा है देव। तू उनसे उम्मीद करता है कि वह हमेशा वही पुराने ज़माने की, सर और कंधों को पल्लू से ढकने वाली, त्यागमयी माँ बनकर रहें। वह तेरे सामने खुलकर सांस भी नहीं ले पातीं क्योंकि उन्हें डर लगता है कि उनका बेटा उन्हें जज करेगा! लेकिन मेरे साथ... मेरे साथ वह कंफर्टेबल फील करती हैं। मैं उनकी तारीफ करता हूँ तो उनके चेहरे पर मुस्कान आती है। क्या किसी मुरझाए हुए फूल को थोड़ा पानी देना कोई पाप है?" उसने अपना हाथ आगे बढ़ाकर मेरे कंधे पर रख दिया। उसका स्पर्श इतना भारी और बनावटी था कि मेरा जी चाहा कि मैं उसका हाथ झटक दूँ। पर मैंने ऐसा किया नहीं। मैं देखना चाहता था कि वह और क्या-क्या बोलेगा अभी...? "देव, सच कह रहा हूँ भाई... मैं उनकी इज़्ज़त करता हूँ। ठीक वैसे ही जैसे किसी को अपने किसी करीबी दोस्त की मम्मी की करनी चाहिए। उनके मन में मेरे लिए एक अपनापन है, क्योंकि मैंने उन्हें इस शहर में यह अहसास कराया कि उनकी अपनी भी कोई पहचान है। बाकी जो तू सोच रहा है ना... वह सिर्फ तेरे दिमाग का फितूर है। शक कम किया कर, और दफ्तर का तनाव घर पर मत लाया कर।" उसकी बातें इतनी चिकनी, इतनी तार्किक और इतनी खूबसूरती से गढ़ी गई थीं कि कोई भी अदालत उसे बा-इज़्ज़त बरी कर देती। लेकिन मेरी अंतरात्मा चीख-चीख कर कह रही थी कि यह सब एक सफेद झूठ है। यह उस दलदल पर बिछाई गई हरी घास थी जिसके नीचे सिर्फ सड़न और धोखा था। अगर यह सब सिर्फ एक औरत की आज़ादी की बात थी, तो उस डायरी में लिखा वह सब क्या था? उस दिन जो वह शख्स आया था हमारे फ्लैट में, वह क्या था? और सबसे बढ़कर... वह पार्सल क्या था? मेरी ज़ुबान पर वह सवाल आने ही वाला था। मैं उससे पूछने ही वाला था—'अगर सब कुछ इतना ही पाक-साफ है, तो उस दिन तूने आंटी जी के नाम से जो पार्सल मँगवाया था, और जिसे तूने घुटनों का आयुर्वेदिक तेल बताया था... वह असल में क्या था? और तू पिछले चार दिनों से इस शहर के सिंडिकेट वाली खबर के बाद किन चूहों के बिलों में छुपा घूम रहा था?' लेकिन मैंने खुद को रोक लिया। मुझे डर लगने लगा था कि सब कुछ पूरी तरह से साफ होने से पहले ही कहीं मैं आज ज़रूरत से कहीं ज़्यादा न बोल दूँ... क्योंकि इतना तो मेरे लिए साफ था कि इमरान अभी नब्बे प्रतिशत सिर्फ झूठ ही बोल रहा है... सच से वह कोसों दूर रहेगा। इसलिए मैंने चुपचाप पीने पर फोकस किया और एक के बाद एक तीन बार अपना ग्लास खाली कर दिया। शराब की कड़वाहट मेरी जीभ पर फैल गई। मुझे समझ आ गया था कि अगर मैंने आज वह सवाल पूछ लिया, तो इमरान और अलर्ट हो जाएगा। वह कोई नया बहाना बना देगा, कोई नई मनगढ़ंत कहानी सुना देगा। शातिर मुजरिमों से सच उनके मुँह से नहीं उगलवाया जाता; उन्हें उनके अपने ही जाल में फंसने के लिए खुला छोड़ना पड़ता है। "चल, बहुत देर हो गई है। घर चलते हैं," मैंने अपनी आवाज़ को पूरी तरह भावहीन बनाते हुए कहा और बेंच से उठ खड़ा हुआ। इमरान ने मेरी तरफ देखा। उसकी आँखों में एक पल के लिए यह जानने की उत्सुकता उभरी कि क्या मैंने उसकी बातों पर यकीन कर लिया है। मेरे चेहरे के सपाट भावों को देखकर शायद उसने मान लिया कि उसने मुझे चुप करा दिया है। उसके होठों पर वही पुरानी, जीत वाली मुस्कान तैर गई। उस रात घर लौटकर मैं अपने कमरे में सोने का नाटक करता रहा, लेकिन मेरी आँखों में नींद का एक कतरा भी नहीं था। मुझे पता था कि यह शांति सिर्फ एक छलावा है। शहर के सिंडिकेट का भंडाफोड़, इमरान का वह गायब होना, और फिर यह चिकनी-चुपड़ी सफाई... यह सब किसी खास दिशा की ओर इशारा कर रहे थे। Continued....
Yesterday, 11:57 AM
उस रात की बातचीत के बाद एक पूरा हफ्ता बीत गया....
घर का माहौल ऊपर से बिल्कुल शांत दिख रहा था, लेकिन यह वह शांति थी जो किसी भयानक चक्रवात के आने से पहले समंदर पर छा जाती है। इमरान अब फिर से अपनी सामान्य दिनचर्या में लौट आया था। वह दफ्तर जाता, शाम को आकर लैपटॉप पर काम करता या फिर मोबाइल में समय बिताता और मम्मी के साथ उसी सहज, अपनेपन वाले अंदाज़ में पेश आता। मम्मी भी अब पहले की तरह फिर से तैयार होने लगी थीं; पर अब ज़्यादा कहीं आना-जाना नहीं करती थीं। हालांकि उनके पहनावे में अब भी वही बारीक खुलापन, वही खिंचाव बरकरार था। मैं भी अपने दफ्तर के काम में खुद को झोंकने की कोशिश कर रहा था। रुया के साथ लंच करना, शाम को कभी-कभार चाय पीना ही मेरे जीवन का एकमात्र सहारा बचा था। रुया की माँ अब अस्पताल से डिस्चार्ज होकर घर आ चुकी थीं और धीरे-धीरे ठीक हो रही थीं। रुया जब भी मुझसे मिलती, उसकी आँखों में मेरे लिए एक ऐसा असीम आभार और अपनेपन का भाव होता जो मुझे अंदर तक छू जाता था। लेकिन मैं चाहकर भी उस पवित्र रिश्ते में पूरी तरह डूब नहीं पा रहा था; मेरे अपने घर की कालिख मेरे हाथों, पैरों और होठों में ज़ंजीर बनकर बंधी हुई थी। फिर आया वह दिन—गुरुवार। उस दिन ऑफिस के सारे काम जल्दी खत्म हो गए थे। शाम के वक्त मेरा सर फिर से दर्द करने लगा था, इसलिए मैंने रुया को अपनी तकलीफ बताकर, थोड़ी देर इधर-उधर की बातें करने के बाद घर के लिए निकल गया। ऑफिस से बाहर निकला तो हल्की-हल्की ठंडी हवा चल रही थी। मैंने अपनी बाइक उठाई और बिना कहीं रुके सीधे अपने फ्लैट की तरफ चल दिया। घड़ी में उस वक्त ठीक साढ़े सात बज रहे थे। आमतौर पर मैं रात को नौ या साढ़े नौ बजे से पहले घर नहीं लौटता था। मेरे इस अप्रत्याशित समय पर लौटने की उम्मीद शायद घर में किसी को भी नहीं थी। सोसाइटी की पार्किंग में बाइक खड़ी करके जब मैं ऊपर अपनी मंज़िल की तरफ सीढ़ियाँ चढ़ रहा था, तो मेरे दिल में एक अजीब सी, अनजानी बेचैनी करवटें ले रही थी। फ्लैट के दरवाज़े पर पहुँचकर मैंने देखा कि दरवाज़ा अंदर से पूरी तरह बंद नहीं था; वह बस सटा हुआ था, जैसे किसी ने अभी-अभी उसे बाहर से खींचा हो। अंदर से किसी धीमी, गंभीर बातचीत की आवाज़ें आ रही थीं। मैंने बिना कोई आहट किए, बेहद आहिस्ता से दरवाज़े को थोड़ा सा धकेला और अंदर कदम रखा। हॉल में जो दृश्य मेरी आँखों के सामने था, उसने मेरे पैरों को वहीं फर्श पर कील की तरह गाड़ दिया। मेरे फेफड़ों से जैसे सारी हवा एक झटके में बाहर निकल गई। ड्राइंग रूम में, सामने रखे बड़े सोफ़े की मुख्य कुर्सी पर एक अनजान शख्स बैठा हुआ था। उसकी उम्र पचास के उत्तरार्ध में, करीब अट्ठावन या साठ साल के आस-पास रही होगी। उसका जिस्म भारी और गठीला था, बाल लगभग पूरी तरह सफेद थे जिन्हें बहुत सलीके से पीछे की तरफ संवारा गया था। उसके चेहरे पर एक अजीब सी, रौबदार और कठोर शांति थी। आँखों में एक ऐसी ठंडी, मंझी हुई चमक थी जो अक्सर उन लोगों की होती है जिन्होंने दुनिया के सबसे काले कोनों को बहुत करीब से देखा हो। उसने हल्के आसमानी रंग का एक बेहद बारीक और महंगा सूती कुर्ता-पायजामा पहन रखा था। कुर्ते के बटन शायद चाँदी के थे जो हॉल की ट्यूबलाइट की रोशनी में धीमे से चमक रहे थे। उसकी कलाई पर सोने की एक भारी, विंटेज घड़ी बंधी थी और दाहिने हाथ की उंगलियों में पन्ना और नीलम की दो भारी अंगूठियाँ जड़ी हुई थीं। वह उस सोफ़े पर ऐसे बैठा था मानो वह कोई मेहमान न हो, बल्कि उस पूरे घर का असली मालिक हो। उसके ठीक सामने, काँच की टी-टेबल पर चाय की दो प्यालियाँ रखी थीं, जिनमें से हल्की सी भाप अभी भी उठ रही थी। और उस शख्स के ठीक बगल में, एक तरफ थोड़ा फैलकर, इमरान बैठा हुआ था—आराम के मूड में। और मेरी मम्मी... वह अपने कमरे में थीं। क्या कर रही थीं, पता नहीं... लेकिन मुझे एक अनकही शांति मिली। दरवाज़े के हल्के से चरमराने की आवाज़ पर, उस अजनबी शख्स ने अपनी गर्दन बहुत आहिस्ता से घुमाई। उसकी ठंडी, पथरीली नज़रें सीधे मेरे चेहरे पर आकर टिक गईं। हॉल में माहौल ऐसा था कि मुझे अपने ही सीने के भीतर बजता हुआ अपना दिल साफ़ सुनाई देने लगा। वह अजनबी मुझे देखता रहा... उसके चेहरे की किसी भी माँसपेशी में कोई हरकत नहीं हुई… फिर, उसके पतले, सूखे होठों पर एक बहुत बारीक, लगभग न दिखने वाली ठंडी मुस्कान उभरी। "तो..." उस शख्स की भारी, गूँजती हुई आवाज़ ने उस सन्नाटे के सीने को चीर दिया, "...यही है क्या वो?" To be Continued… |
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