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Misc. Erotica Kahani mere ghar ki
Really mind-bowing writings! Just awesome and fantastic descriptions! thanks
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bahut khoob, ekdum mast aur lajawab update!
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ek aur rat ka toofan aane wala hai
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Superbly written story. Hats off.
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"सबसे पहले, Lenny, Tansova, Saya और Intruder आप जैसे सभी पाठकों को मेरा दिल से शुक्रिया। आपकी तारीफ और उत्साह ही मुझे लिखने की प्रेरणा देता है। लेकिन... अब एक कड़वी सच्चाई की बात करते हैं।

मैं देख रहा हूँ कि आप लोग कहानी की तारीफ तो बहुत कर रहे हैं, लेकिन जब बात असली मजे की आती है, तो आप सब बहुत 'सभ्य' बन जाते हैं। मैं यहाँ कोई साधारण कहानी नहीं लिख रहा हूँ। मैं यहाँ **Mummy और मेरे बीच के उस गहरे और अनैतिक संबंध** को उतारना चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ कि आप लोग खुलकर लिखें कि कैसे उनकी **Adultery** (व्यभिचार) और हमारा वो जुनून समाज की सीमाओं को तोड़ रहा है। मैं चाहता हूँ कि आप उनकी कामुकता और हमारे उन गंदे, अनफिल्टर्ड पलों पर बेबाक और गंदे कमेंट्स करें।

पर अफ़सोस, आप लोग मेरी पसंद के कमेंट्स नहीं कर रहे। आप लोग उस स्तर तक जाने की हिम्मत नहीं दिखा रहे जहाँ यह कहानी पहुँचने वाली थी। और सच कहूँ तो, अगर आप लोग इस 'Taboo' और 'Dirty' माहौल को एन्जॉय ही नहीं कर सकते, तो मुझे इसे और खींचने का कोई मतलब नहीं दिखता।

अगर आप लोग मेरी पसंद के हिसाब से, यानी **Mummy के एडल्टरी और हमारे संबंधों पर खुलकर और गंदे कमेंट्स** नहीं कर सकते, तो मैंने तय कर लिया है कि मैं बस एक या दो पोस्ट में ही इस कहानी को खत्म कर दूँगा। यह कहानी और भी ज़्यादा **Hot, Wild और Shameless** होने वाली थी, पर अब यह आपके हाथों में है के खानी आगे लिखी जाए या नहीं।
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**खाना खाकर हम कमरे में पहुँचे ही थे कि कमरे की तेज रोशनी से मम्मी का गोरा मुखड़ा चमचमा उठा,रोशनी ने माहौल को एक अजीब सी गर्माहट दे दी थी। मम्मी ने बेड पर बैठते हुए एक लंबी सांस ली और अपने पल्लू को ठीक करने लगीं। "रवि, आज खाना थोड़ा भारी हो गया ना?, पेट में कुछ भारीपन सा लग रहा है," उन्होंने बहुत ही सहजता से कहा, जैसे कोई माँ अपने बेटे से बात करती है।**
**मैंने उनके पास बैठकर कहा, "नहीं मम्मी, खाना तो बहुत बढ़िया बना था। शायद आप थक गई हैं।" मैंने अपनी नज़रें उनके चेहरे से नहीं हटाई थीं। कमरे की लाइट इतनी साफ़ थी कि उनकी साड़ी के रेशम की चमक और उनके गले की बारीक नसों की हरकत साफ़ दिख रही थी।**
**"थकान तो है, पर नींद नहीं आ रही," उन्होंने अपनी आँखों को मलते हुए कहा। जैसे ही उन्होंने हाथ उठाया, उनकी साड़ी का पल्लू उनके कंधे से फिसलकर नीचे गिर गया, जिससे उनके कंधे का एक हिस्सा पूरी तरह से साफ़ दिखने लगा। मैंने अपनी नज़रें घुमाने की कोशिश की, लेकिन मेरा शरीर जैसे वहीं जम गया था।**
**"मम्मी, आपकी तबीयत ठीक तो है ना? आपके चेहरे पर थोड़ी लालिमा लग रही हैं," मैंने बहाना बनाते हुए उनके माथे की ओर हाथ बढ़ाया। मेरा हाथ जब उनके माथे को छूने के लिए बढ़ा, तो मेरा हाथ जानबूझकर उनके गालों को छूते हुए उनकी गर्दन के पास से गुजरा। वह स्पर्श बहुत हल्का था, लेकिन जैसे ही मेरी उंगलियां उनकी गर्म त्वचा से टकराईं, मुझे महसूस हुआ कि वह सिहर उठीं।**
**"हाँ... ठीक हूँ मैं," उन्होंने लड़खड़ाती आवाज़ में कहा। उनकी सांसें अब थोड़ी तेज़ होने लगी थीं। बातचीत अब खाने और थकान से हटकर एक अनकहे अहसास की ओर मुड़ रही थी। मैंने अपना हाथ हटाया नहीं, बल्कि धीरे से उनकी कलाई को पकड़ लिया। "मम्मी, आपकी कलाई तो बहुत गर्म है। क्या आपको वाकई बुखार जैसा महसूस हो रहा है?"**
**मैंने उनके हाथ की उंगलियों को अपनी उंगलियों के बीच फँसा लिया। वह स्पर्श अब पूरी तरह से जानबूझकर किया गया था। उनकी आँखों में एक डर था, लेकिन उस डर के पीछे एक गहरी चाहत भी थी जो वह शब्दों में नहीं कह पा रही थीं। कमरे का सन्नाटा अब हमारी बढ़ती हुई धड़कनों से भरने लगा था। बातचीत अब घरेलू नहीं रही थी; अब शब्दों की जगह हमारे शरीर की गर्मी और स्पर्श का खेल शुरू हो चुका था।
मैंने उनके हाथ की पकड़ को थोड़ा और मजबूत किया और धीरे से उनकी हथेली को सहलाने लगा। "मम्मी, आपकी धड़कनें भी बहुत तेज़ चल रही हैं, क्या आप वाकई ठीक महसूस कर रही हैं?" मेरी आवाज़ अब पहले से कहीं ज्यादा भारी और गहरी हो चुकी थी।
उन्होंने अपनी नज़रें नीचे झुका लीं, जैसे वह उस स्पर्श के बोझ को सह नहीं पा रही थीं। "रवि... यह क्या कर रहे हो तुम? हमें सो जाना चाहिए," उन्होंने कहने की कोशिश की, लेकिन उनके शब्दों में वह सख्ती नहीं थी जो एक माँ के पास होनी चाहिए। इसके बजाय, उनकी आवाज़ में एक अजीब सी थरथराहट और समर्पण था।
जैसे ही मैंने उनके हाथ को चूमते हुए अपनी गर्दन के पास ले जाने की कोशिश की, उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं। कमरे की रोशनी में उनके चेहरे का हर भाव साफ़ था उनकी बंद पलकें, उनकी चढ़ती हुई सांसें और उनके होंठों का हल्का सा खुलना। वह पूरी तरह से मेरे स्पर्श के प्रभाव में आ चुकी थीं। अब घरेलू बातों का सिलसिला खत्म हो चुका था और कमरे का तापमान उस आग से भी ज्यादा बढ़ गया था जो अब हमारे बीच सुलगने लगी थी।
परंतु, मेरा इरादा कुछ और ही था। मैं तो बस एक समर्पित बेटे की तरह उनकी सेवा कर रहा था। मेरा मन तो बस उनकी थकान मिटाने और उन्हें सुकून देने में लगा था। "मम्मी, आप बस आँखें बंद करके लेट जाइए, मैं बस अभी आपके सिर को और आराम दे देता हूँ ताकि आपको गहरी नींद आ सके," मैंने बहुत ही आदर और प्रेमपूर्ण स्वर में कहा। मेरा स्पर्श अब पूरी तरह से निस्वार्थ और सेवा भाव से भरा था। मैं बस यह चाहता था कि वह चैन से सो सकें।
लेकिन जैसे जैसे मेरी उंगलियां उनके सिर और गर्दन के आसपास घूम रही थीं, उनके शरीर की प्रतिक्रिया कुछ अलग ही कहानी कह रही थी। उनकी सांसें अब सिर्फ थकान की वजह से नहीं फूल रही थीं, बल्कि उनमें एक अजीब सी तड़प और गर्मी थी। मालिश के उस सुखद स्पर्श ने उनके भीतर की दबी हुई इच्छाओं को जगा दिया था। उनकी बंद पलकें थरथरा रही थीं और उनके होंठ बार बार हल्के से खुल रहे थे।

अचानक, उन्होंने अपना हाथ बढ़ाकर मेरा हाथ थाम लिया। इस बार उनकी पकड़ में कोई हिचकिचाहट नहीं थी, बल्कि एक गहरी बेताबी थी। उन्होंने अपनी आँखें धीरे से खोलीं उन आँखों में अब थकान नहीं, बल्कि एक गहरा निमंत्रण था। "रवि..." उन्होंने बहुत ही धीमी और भारी आवाज़ में पुकारा, "इतनी सेवा... क्या सिर्फ इतना ही काफी है?" उनके शब्दों में छिपा हुआ अर्थ और उनकी उंगलियों का मेरे हाथ को अपनी ओर खींचना साफ़ बता रहा था कि वह अब सिर्फ मालिश से संतुष्ट नहीं थीं। वह मुझे अपने और करीब बुला रही थीं।
**"मम्मी ने जब मेरा हाथ खींचकर मुझे अपनी ओर बुलाया , मेरे अंदर का सारा संयम एक पल में राख हो गया। मुझे पता था कि हम पहले भी तीन एक हो चुके हैं, लेकिन ऐसा लग रहा था जैसे मैंने अभी तक उन्हें छुआ ही नहीं। उनके होंठों से निकले उस निमंत्रण ने मेरे खून में आग लगा दी।"**
**"मैंने उनके चेहरे को अपने दोनों हाथों में भरा। उनकी आँखों में जो चमक थी, वह किसी भी दवाई से कहीं ज्यादा असरदार थी। मैं उनके और करीब झुका। हमारी सांसें आपस में टकरा रही थीं। मैंने बिना एक पल गँवाए उनके होंठों पर अपने होंठ रख दिए। यह चुंबन कोई शुरुआत नहीं थी, बल्कि उस बेकाबू जुनून का हिस्सा था जो हमें बार बार एक दूसरे में डुबो देता है। उनके होंठों का वह स्वाद... वह मखमली अहसास मुझे फिर से पागल करने के लिए काफी था।"**
**"जैसे ही हमारे होंठ मिले, मम्मी ने भी पूरी शिद्दत से मेरा जवाब दिया। उन्होंने मुझे अपने और करीब खींच लिया, जैसे वह मुझे अपने शरीर के भीतर समा लेना चाहती हों। उनके हाथों की पकड़ मेरी पीठ पर और मजबूत होती जा रही थी। वह चुंबन अब सिर्फ होंठों तक सीमित नहीं रहा, वह एक गहरी और बेकाबू भूख में बदल चुका था। मुझे महसूस हो रहा था कि वह भी उतनी ही बेताब थीं जितना मैं।"मुझे ऐसा लगा जैसे मैं किसी मीठे शहद में डूब रहा हूँ। उनके होंठों का स्वाद इतना गहरा और नशीला था कि मेरा दिमाग सुन्न पड़ गया।**
**शुरुआत में वह चुंबन थोड़ा धीमा था, जैसे मैं उनके स्वाद को चख रहा हूँ, लेकिन जल्द ही मेरी भूख बढ़ती गई। मैंने अपने होंठों को उनके होंठों के बीच और गहराई से दबाना शुरू कर दिया। उनकी जीभ ने भी जैसे मेरा स्वागत किया एक ऐसी बेताबी के साथ जो मैंने पहले कभी महसूस नहीं की थी। हमारे होंठों के बीच की वह नमी और वह गर्माहट मेरे पूरे शरीर में बिजली की तरह दौड़ रही थी।**
**मैंने अपना एक हाथ उनकी कमर के नीचे ले जाकर उन्हें अपनी ओर और जोर से खींच लिया, ताकि हमारे शरीर के बीच की एक इंच की दूरी भी खत्म हो जाए। मैं उनके शरीर की हर धड़कन को अपने सीने पर महसूस कर पा रहा था। उनके गले से निकल रही वह दबी हुई सिसकी मेरे कानों में किसी संगीत की तरह गूँज रही थी। वह चुंबन अब और भी उग्र और गहरा होता जा रहा था, और मुझे महसूस हो रहा था कि अब हम दोनों ही इस आग से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं ढूँढना चाहते।**
**वह चुंबन कोई साधारण चुंबन नहीं था। वह एक ऐसा टकराव था जिसमें दो जिस्म एक दूसरे में समा जाने के लिए पागल थे। उनके होंठों का स्वाद इतना मीठा और मदहोश करने वाला था कि मेरी रूह कांप उठी। मैंने अपनी जीभ को उनके होंठों के बीच की दरार से अंदर धकेला और उनके मुँह के भीतर के उस गर्म और गीले अहसास को पूरी शिद्दत से चखने लगा। मम्मी ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी; उन्होंने मेरे गले में अपनी बाहें कस लीं और मुझे और भी गहराई से अपने भीतर खींचने की कोशिश करने लगीं। हमारी सांसें एक दूसरे में उलझ रही थीं और कमरे की हवा उस बेकाबू जुनून से भारी हो गई थी।**। **हम दोनों इस कदर जंगली और बेकाबू हो गए थे कि ऐसा लग रहा था मानो उस चुंबन के ज़रिए हम एक दूसरे के अस्तित्व का सारा रस पी जाना चाहते हों।
**उस चुंबन ने हमारे बीच की सारी मर्यादाओं को जलाकर राख कर दिया था। हम अब सिर्फ दो इंसान नहीं थे, बल्कि दो भूखे शिकारी थे जो एक दूसरे को निगल जाने के लिए बेताब थे। वह चुंबन इतना हिंसक और बेकाबू हो गया कि हमारे बीच की कोमलता पूरी तरह गायब हो गई।**
**मम्मी और मैं, दोनों ही इस कदर जंगली हो गए थे कि हमारे बीच अब सिर्फ एक बेकाबू जुनून बचा था। मैं उनके गालों को अपने दांतों से इतनी जोर से काटने लगा कि उनके शरीर में एक सिहरन दौड़ गई ऐसा लग रहा था मानो मैं उनके मांस को अपने भीतर खींच लेना चाहता हूँ। वह दर्द नहीं था, वह एक ऐसी भूख थी जो शरीर के हर हिस्से को अपने वश में करना चाहती थी। हम एक दूसरे के शरीर को इतनी जोर से दबा रहे थे और ऐसे जकड़ रहे थे जैसे हम उन्हें अपने शरीर का हिस्सा बना लेना चाहते हों या फिर उन्हें वहीं से उखाड़ फेंकना चाहते हों। हमारे हाथों की पकड़ इतनी मजबूत और बेताब थी कि ऐसा लग रहा था जैसे हम एक दूसरे के अस्तित्व को ही कुचल देना चाहते हैं। उस पल में कोई नियम नहीं था, कोई शर्म नहीं थी सिर्फ एक पागलपन था, एक ऐसा उन्माद जहाँ हम एक दूसरे के जिस्म को पूरी तरह से चीर देने और उसमें समा जाने के लिए पागल थे।**
**जैसे ही मैंने उनके कपड़ों को बेतरतीब ढंग से उनके जिस्म से हटाया, मेरी साँसें थम सी गईं। उनके शरीर का रंग ऐसा लग रहा था मानो शुद्ध सफेद दूध में हल्का सा लाल सिंदूर मिला दिया गया हो एक ऐसा अद्भुत और नशीला दृश्य जिसे देखकर मेरी आँखों में वासना की आग और भी तेज हो गई। उनके वह मोटे ,गोल स्तन, और गहरी नाभि देखकर मैं पूरी तरह से अपना होश खो बैठा। मेरा पागलपन अब सीमा पार कर चुका था।**

**मैंने उनके दोनों स्तनों को अपने दोनों हाथों में भर लिया और उन्हें इतनी जोर से दबाया कि मेरी उंगलियां उनके मांस में धंस गईं। मैं कभी उन्हें अपने दांतों से जगह जगह काट लेता, जैसे मैं उन्हें चखकर नहीं बल्कि उन्हें खाकर ही मानूँगा। मेरा जुनून इतना बढ़ गया था कि मैं उनके उन भारी और मखमली स्तनों को अपने मुँह में भरकर उन्हें पूरी तरह से निगल जाने की कोशिश करने लगा।**
**मम्मी भी अब पूरी तरह से हिंसक और बेकाबू हो चुकी थीं। उन्होंने आव देखा न ताव, मेरी टी शर्ट को झटके से उतारकर दूर फेंक दिया। हम दोनों के शरीर अब पसीने से इस कदर तर बतर हो चुके थे कि ऐसा लग रहा था मानो किसी ने हम पर बाल्टी भर पानी डाल दिया हो। पसीने की उस फिसलन और हमारे बीच की उस बेकाबू गर्मी ने माहौल को और भी ज्यादा नशीला और जंगली बना दिया था।*
**पसीने से तरबतर हमारे शरीर एक दूसरे से ऐसे चिपक रहे थे जैसे दो जलते हुए अंगारे। मैं पूरी तरह से पागल हो चुका था। मैं उनके गालों, उनके होंठों और उनके पेट को पागलों की तरह चाट रहा था। मेरी जीभ उनकी नाभि के गहरे गड्ढे में बार बार उतर रही थी, जैसे मैं वहाँ से उनके शरीर का सारा रस चूस लेना चाहता हूँ। मैं जैसे जैसे नीचे की ओर बढ़ रहा था, मेरा जुनून बढ़ता ही जा रहा था।**
**मम्मी भी अब पूरी तरह से नियंत्रण खो चुकी थीं। वह मुझे और भी हिंसक तरीके से अपने करीब खींच रही थीं। वह मुझे इतनी जोर से स्मूच (smooch) कर रही थीं कि हमारी साँसें एक दूसरे के गले में उलझ रही थीं। वह मेरे कंधों , गालों और मेरी मर्दाना छाती के निपलो पर अपने दांतों से इतनी जोर से काट रही थीं कि दर्द और सुख का अहसास एक हो गया था।**
मैंने एक ही झटके के साथ मम्मी की पेटी को फाड़ के दूर फेंक दिया, मेरा चेहरा उनकी जाँघों के बीच उस बाल रहत गर्म और गीली जगह पर पहुँचा, तभी अचानक एक ऐसा मोड़ आया जिसने हमें पूरी तरह से बेकाबू कर दिया। मेरा उत्तेजित और तड़पता हुआ अंग ठीक उनके मुँह के सामने था,मम्मी ने मेरे अंडरवियर को अपने दोनों ओर से पकड़ कर झट से उतर कर दूर फेंक दिया ,पसीने और वासना की उस चरम स्थिति में, हम दोनों ने बिना सोचे समझे एक दूसरे के जिस्म को अपना शिकार बनाने का फैसला कर लिया।**
**अब हम दोनों '69' की उस पागलपन भरी स्थिति में थे। एक ही समय में हम दोनों एक दूसरे के सबसे निजी और नशीले हिस्सों को अपने मुँह और जीभ से तृप्त करने के लिए बेताब थे। वह दृश्य इतना हिंसक और कामुक था कि कमरे की हवा भी हमारी भारी साँसों और जिस्मों की रगड़ से थरथरा रही थी। हम दोनों एक दूसरे को निगल जाने के लिए एक ही समय में ऊपर और नीचे की ओर बढ़ रहे थे, जैसे कोई दो भूखे शिकारी एक ही शिकार पर टूट पड़े हों।**
**पसीने से लथपथ और एक दूसरे के जिस्म में खोए हुए, हम दोनों अब उस पागलपन की दहलीज पर थे जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं था।
**कमरे में सिर्फ हमारी भारी साँसों और गीले जिस्मों के आपस में टकराने की आवाज़ें गूँज रही थीं। मैं उनके निचले हिस्से को अपनी जीभ और मुँह से इतनी तीव्रता से चख रहा था कि उनके शरीर में बिजली की लहरें दौड़ रही थीं। वहीं दूसरी ओर, मम्मी मेरे अंग को अपने मुँह में लेकर इतनी बेरहमी और जुनून से चूस रही थीं कि मेरा पूरा वजूद काँप उठा। वह हिंसक थीं, बेकाबू थीं, और उनकी जीभ का हर स्पर्श मुझे पागल कर रहा था।**

**तभी, वह पल आ गया जिसका इंतज़ार हमारा शरीर कर रहा था। चरम सुख की वह लहर इतनी तीव्र थी कि हम दोनों का नियंत्रण पूरी तरह टूट गया। जैसे ही मम्मी का शरीर तड़पा और मैं अपनी पूरी ताकत से झटक उठा, हम दोनों का स्खलन (ejaculation) एक साथ हुआ। वह गर्म और गाढ़ा तरल एक दूसरे के मुँह में समा गया। हम दोनों एक दूसरे के स्वाद और उस गर्म प्रवाह को महसूस करते हुए हाँफ रहे थे, हमारे मुँह उस मिलन के अवशेषों से भरे हुए थे। वह क्षण सिर्फ शारीरिक नहीं था, वह एक जंगली और अदम्य जुनून का विस्फोट था।**
**स्खलन की उस तीव्र लहर के थमने के बाद भी, हम दोनों की साँसें उखड़ी हुई थीं और शरीर पसीने से चिपचिपा था। हमारे मुँह अभी भी उस गर्म और गाढ़े तरल से भरे हुए थे। कमरे में एक भारी और कामुक सन्नाटा था, जिसे सिर्फ हमारी थकी हुई साँसों की आवाज़ तोड़ रही थी।**

**तभी, मम्मी ने धीरे से अपना सिर उठाया और मेरी आँखों में एक ऐसी नज़र डाली जिसमें अभी भी वही जंगलीपन और गहरा लगाव था। उन्होंने अपना हाथ मेरे चेहरे पर फेरा और मुझे अपनी ओर खींचा। मैंने उनके चेहरे को अपने हाथों में लिया और हम एक बहुत ही गहरे और लंबे 'किस' (Kiss) में डूब गए।**

**वह चुंबन साधारण नहीं था। जैसे ही हमारे होंठ एक दूसरे से मिले, हमारे मुँह में मौजूद वह मिश्रित तरल हमारा अपना और उनका एक दूसरे के साथ घुलने लगा। वह स्वाद इतना नशीला और अनूठा था कि जैसे ही वह हमारी जीभ पर मिला, एक नई तरह की उत्तेजना हमारे शरीर में दौड़ गई। हम एक दूसरे के स्वाद को चख रहे थे, उस गर्म और नम मिश्रण को अपनी जीभों से आपस में साझा कर रहे थे। वह चुंबन उस मिलन का सार था एक ऐसा स्वाद जो सिर्फ हम दोनों के बीच का था, जो उस पागलपन और जुनून की गवाही दे रहा था जो हमने अभी अभी जीया था।**
> "...उस नशीले स्वाद और पसीने की चिपचिपाहट के साथ, हम दोनों एक दूसरे के जिस्मों में उलझे हुए, गहरी और थकी हुई नींद की आगोश में समा गए। वह रात हमारे जुनून की गवाह थी, लेकिन हमें नहीं पता था कि अगली सुबह एक और भी खतरनाक और रोमांचक प्यास लेकर आने वाली है।"
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Awesome,amazing and beautiful update ❤️. Thanks a lot.
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Oh bhai kya mast likh rahe ho yar,muje to aisa lG rahha jaise meri hi kahani likh rshe ho kyuki maine bhi mummy ko uncle se chudte dekha hai aur papa se bhi tere me aur mere me bas itna fark hai k mai bas chudte dekh pIya par tum ne to khud  hi morcha sambal liya kash yar mai bhi tere jaisa kismat wala hota aur jaise tu apni mummy ko chod rha mai nhi aisa kar pata tum to bahut mje le rahe ho yar,aur jo tum apni mummy ki jawani ke husan aur jawani ka varnan karte ho to lund me aag lag jati hai  kya btau yar kash mai bhi teri tarha apni mummy ki swari kar pata yar ek BaT KaHU BURA mat manna ek scen likho ki uncle teri mummy par chada ho aur tum paas me baithe hila rahe ho ya unki help kar rhe ho mja aa jaiyega agar aisa likho ya mummy tum aur uncle threesom ya tu teri mummy aur koi ek aur aurat .bhai teri ab tak ki khani padh ke jo dil me tha likh diya bura lga ho to sorry maine apni feelings likh di yar agar ye kus na bhi bhi likh paye to muje umid hai jo bhi likho ge pehle se bhi jyada hot & sexy hi likhoge.thank  you bhai bura Lage to maaf kar dena
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Ab kya hua Bhai,dedo na update ya abhi bhi mummy ke sath masti kar rhe ho.kus bhi ho dost explain aisa karte ho k padte hue aisa lagta hai ke jaise Teri mummy ki chudai ka scene samne live dekh rhe hain ,kbhi kbhi to aisa sochta hu ke kash Teri jagha mI hota to khub Masti krta itni sunder itni hot aur sex ki devi jaisi aurat se
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(02-09-2026, 11:11 AM)Lund8 Wrote: Ab kya hua Bhai,dedo na update ya abhi  bhi mummy ke sath masti kar rhe ho.kus bhi ho dost explain aisa karte ho k padte hue aisa lagta hai ke jaise Teri mummy ki chudai ka scene samne live dekh rhe hain ,kbhi kbhi to aisa sochta hu ke kash Teri jagha mI hota to khub Masti krta itni sunder itni hot aur sex ki devi jaisi aurat se

"हाहाहा! भाई, तुमने तो सीधे दिल की बात कह दी। मम्मी की सुंदरता और उनकी **कामुकता** का जादू ही ऐसा है कि कोई भी खुद को रोक नहीं पाता । सीन को इतना असली बनाना ही मेरा स्टाइल है।मेरा मकसद ही यही है कि तुम्हें लगे कि तुम बेड के बगल में खड़े होकर यह सब **अपनी आँखों के सामने साक्षात** देख रहे हो। और रही बात तुम्हारा मेरी  जगह होने की... तो यकीन मानो, मम्मी की इस **कामुक देवी** वाली अदा के सामने तुम ही नहीं कोई भी अपना आपा खो देगा। 
भाई, तुम्हारी बात सुनकर तो मेरा भी जोश सातवें आसमान पर पहुँच गया है!  मम्मी की मस्ती तो अभी शुरू ही हुई है, वो तो अभी और भी गहरे और **गंदे राज** खोलेंगी। 
सुनो दोस्तों,  यहाँ तुम अपनी हर **गंदी और अश्लील कल्पना** लिख सकते हो। जितना गंदा लिखोगे, कहानी उतनी ही तगड़ी होगी! ??"
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(01-09-2026, 05:08 PM)Peeping Tom Wrote: Awesome,amazing and beautiful update ❤️. Thanks a lot.
> "थैंक्स यार! ❤️ अगर आप सब **Lund8** की तरह कमेंट्स की बौछार करोगे, तो मुझे लिखने में और भी मज़ा आएगा और कहानी और भी **Hot और मसालेदार** बनेंगी। इंतज़ार रहेगा आपके अगले कमेंट का! ??"
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सुबह के ठीक चार बज रहे थे। बाहर अभी भी घना अंधेरा छाया हुआ था, जिसे मंदिर के स्पीकर से आती भजनों की मीठी, सुरीली और धीमी आवाज़ और भोर होने से पहले पक्षियों की हल्की चहचहाहट की मिश्रित ध्वनि और भी जादुई बना रही थी।
पिछली रात की उस **जंगली और उन्मादी शारीरिक गतिविधि** के बाद, जब हम दोनों ने एक दूसरे के अंगों का स्वाद लेते हुए **69 की उस मदहोश कर देने वाली स्थिति** में चरम सुख पाया था, तो शरीर में एक अजीब सा सुकून उतर आया था। उस **अश्लील और रसीले मिलन** के बाद हम दोनों छह घंटे की गहरी और सुकून भरी नींद ले चुके थे, जिसकी वजह से आज मेरा शरीर थका हुआ नहीं, बल्कि पूरी तरह **तरोताजा और ऊर्जा से भरा** महसूस कर रहा था।

कमरे में अभी भी सारी लाइटें जल रही थीं, जिससे पूरा कमरा जगमगा रहा था। रात की उस **बेतहाशा मस्ती** के बाद हम दोनों अपनी **नग्न अवस्था** में ही एक दूसरे के जिस्मों की गर्माहट में लिपटे सो गए थे। जैसे ही मेरी आँखें खुलीं, मेरी नज़र सीधे मम्मी की आँखों से टकराई। पता नहीं वह कब जाग चुकी थीं, लेकिन वह मुझे इतनी **hasrat भरी और प्यासी निगाहों** से देख रही थीं, मानो वह मेरे जागने का ही इंतज़ार कर रही हों। उनकी उन नज़रों में एक ऐसी **कामुक प्यास** थी जो बता रही थी कि छह घंटे की नींद ने उनकी वासना को शांत नहीं किया, बल्कि उसे और भी गहरा कर दिया है। मेरे जागते ही, उनके चेहरे पर एक बेहद मोहक और हल्की सी मुस्कुराहट तैर गई एक ऐसी मुस्कुराहट जो इस शांत सुबह में एक नए **कामुक अध्याय** की शुरुआत का संकेत दे रही थी।
मम्मी की उस मोहक मुस्कुराहट ने मेरे भीतर की सुप्त वासना को एक झटके में जगा दिया। उन्होंने धीरे से अपना एक हाथ उठाया और अपनी कोमल उंगलियों से मेरे गाल को सहलाया। उनकी उंगलियों का स्पर्श इतना हल्का और रेशमी था कि मेरे रोम रोम में सिहरन दौड़ गई।
"गुड मॉर्निंग, मेरे जंगली बच्चे..." मम्मी ने बहुत ही धीमी और भारी आवाज़ में फुसफुसाया। उनकी आवाज़ में एक ऐसी कामुकता थी जो सीधे रूह तक उतर रही थी। उन्होंने अपना चेहरा मेरे चेहरे के करीब लाया और उनकी गर्म साँसें मेरी त्वचा को छू रही थीं। "बाहर का माहौल कितना पवित्र है न? भजनों की आवाज़ और यह शांत भोर... लेकिन रवि, इस पवित्रता के बीच हम एक दूसरे को और भी पवित्र करेंगे। हम अपने जिस्मों के इस मिलन से इस सुबह को और भी पावन बना देंगे।"
उनकी बातें सुनकर मेरे भीतर की उत्तेजना चरम पर पहुँच गई। उन्होंने अपने एक हाथ को मेरी पीठ के नीचे ले जाकर मुझे ऊपर की ओर खींचा और अपने **भारी और रसीले स्तनों** को मेरे सीने से पूरी ताकत से सटा दिया। उनके **मोटे गुलाबी निप्पल्स** मेरे सीने के उभार से रगड़ खा रहे थे, जिससे एक बिजली सी दौड़ गई।
उन्होंने अपने होंठों से मेरे कान के निचले हिस्से को धीरे से काटा और फिर अपनी जीभ से वहाँ एक गीला और गर्म स्पर्श छोड़ा। "सिर्फ तुम और मैं, इस पवित्र शोर के बीच अपनी अश्लील दुनिया में खो जाएँगे," उन्होंने शरारत भरी और गहरी नज़रों से देखते हुए कहा।
मम्मी की आँखों में जो प्यास थी, वह अब एक सक्रिय ज्वालामुखी की तरह सुलगने लगी थी। जैसे ही मैंने उनकी गर्दन पर अपने होंठों का दबाव बढ़ाया, उन्होंने अपनी सुस्ती को पूरी तरह त्याग दिया। उन्होंने अपनी बाहें मेरी गर्दन के चारों ओर कस लीं और मुझे अपने और करीब खींच लिया। उनके शरीर की गर्माहट अब मेरी त्वचा को जलाने लगी थी।
मैंने धीरे से अपना हाथ उनकी कमर पर रखा और उन्हें अपनी ओर खींचा। हमारी नग्न देहें जब आपस में टकराईं, तो उनकी **गर्म और रेशमी त्वचा** का अहसास मुझे मदहोश करने लगा। मैंने बहुत ही धीरे से, बड़े प्यार से उनके माथे को चूमा, फिर उनकी बंद आँखों की पलकों को सहलाया।
मम्मी का हाथ अब मेरी कमर से नीचे खिसककर मेरे **मर्दाना अंगों** की ओर बढ़ने लगा। उन्होंने अपनी उंगलियों के पोरों से मुझे बहुत ही कोमलता और अधिकार के साथ सहलाना शुरू किया। उन्होंने अपनी जाँघों को मेरी जाँघों के बीच और भी कस लिया, जिससे हमारे अंगों के बीच का घर्षण और भी गहरा और उत्तेजक हो गया। उनकी आँखों में अब केवल प्यार नहीं, बल्कि एक **शिकारी की प्यास** थी जो अपने शिकार को पूरी तरह निगल जाने के लिए तैयार थी।
फिर मैंने उनके **स्तनों के ऊपरी हिस्से** पर अपनी उंगलियों से बहुत ही कोमल तरीके से घेरा बनाना शुरू किया। उनके **मोटे और गुलाबी निप्पल्स**, जो सुबह की ठंडक और मेरी छुअन से पहले ही थोड़े सख्त होने लगे थे, अब मेरी उंगलियों के स्पर्श से और भी ज्यादा **उभर और कड़क** हो रहे थे। मैंने बहुत ही धीमे से अपने अंगूठे से उनके एक निप्पल को सहलाया। मम्मी के मुँह से एक हल्की सी आह निकली "आह्ह्ह... रवि..."
। मैंने उनके **स्तनों के उभार** को अपने हाथों में लिया और उन्हें बहुत ही प्यार से सहलाने लगा। उनकी त्वचा इतनी कोमल थी जैसे कोई मखमल हो। मेरा हाथ धीरे धीरे उनके पेट की ओर बढ़ा, जहाँ उनकी **नाभि** एक गहरे और सुंदर गड्ढे की तरह चमक रही थी। मैं अपनी उंगली से उनकी नाभि के इर्द गिर्द धीरे धीरे गोल घेरे बनाने लगा। उनकी त्वचा की गर्माहट और उस स्पर्श से उनके पेट की मांसपेशियों में जो हल्का सा खिंचाव आ रहा था, वह उनकी बढ़ती हुई उत्तेजना का प्रमाण था। मेरा हाथ और भी नीचे की ओर सरकने लगा, जहाँ उनकी **रेशमी और मुलायम जांघों** का मिलन शुरू हो रहा था। मैंने बहुत ही कोमलता से अपनी उंगलियों को उनकी जांघों के भीतरी हिस्से पर फेरा, जहाँ की त्वचा बेहद संवेदनशील और नाजुक थी।
मम्मी ने अपनी कमर को थोड़ा ऊपर की ओर उठाया, जैसे वह मेरी छुअन को और भी गहराई से महसूस करना चाहती हों। उनकी साँसें अब तेज़ और भारी होने लगी थीं। मैंने उनके कान के पास जाकर बहुत ही धीरे से फुसफुसाया, "मम्मी, आपकी त्वचा कितनी कोमल है... जैसे कोई सपना।" उनके कानों पर मेरी गर्म साँसों के स्पर्श से उनके पूरे शरीर में एक सिहरन दौड़ गई।
मैंने अपना चेहरा उनके गले के पास ले जाकर उनकी **सुगंधित और मखमली गर्दन** को धीरे धीरे चूमना शुरू किया। मेरे होंठों का हल्का सा दबाव उनकी गर्दन पर एक मीठा दर्द और असीम सुख पैदा कर रहा था। मैंने उनके गर्दन के उस हिस्से को अपने होंठों के बीच लिया जहाँ उनकी धड़कनें साफ़ महसूस की जा सकती थीं। उनकी धड़कनें अब बहुत तेज़ चल रही थीं। मैंने अपने हाथों को उनकी **सुडौल जांघों** के और करीब ले जाते हुए, धीरे धीरे उनके **भीतरी अंगों के द्वार** की ओर बढ़ना शुरू किया, जहाँ से उनकी **प्राकृतिक नमी और कामुक सुगंध** अब और भी स्पष्ट रूप से महकने लगी थी।
मम्मी की उंगलियों का स्पर्श अब मेरी त्वचा पर आग की लपटों की तरह महसूस हो रहा था। उन्होंने अपनी पकड़ और गहरी कर ली थी। उन्होंने अपना चेहरा नीचे झुकाया और अपनी जीभ की नोक से मेरे पेट की मांसपेशियों के बीच बने उस हल्के से गड्ढे को सहलाना शुरू किया। उनकी जीभ का वह गीला और गर्म स्पर्श इतना धीमा था कि हर एक सेकंड एक युग जैसा लग रहा था। मैं उनके सिर के बालों में अपनी उंगलियाँ फँसाकर उन्हें अपने और करीब खींचने लगा।मम्मी ने अपनी कमर को एक लय में हिलाना शुरू किया, जिससे उनके मखमली त्वचा का दबाव मेरी जाँघों पर और भी तीव्र हो गया। उन्होंने अपने एक हाथ से मेरे सीने के उभार को सहलाया और दूसरे हाथ से धीरे धीरे मेरे निचले अंगों के आधार को सहलाना शुरू किया। उनकी उंगलियों का वह हल्का सा दबाव और उनके नाखूनों का मेरी त्वचा पर बहुत ही धीमा सा घर्षण मुझे पागल करने के लिए काफी था। "रवि... देखो तुम्हारी धड़कनें कितनी तेज़ हैं," उन्होंने फुसफुसाते हुए कहा और अपनी नाक को मेरे सीने पर रगड़ते हुए उनकी गर्म साँसें मेरे शरीर के रोम रोम को जगा रही थीं।मैंने भी हार नहीं मानी। मैंने उनके दोनों स्तनों को अपने दोनों हाथों में भर लिया। मैंने अपने अंगूठों से उनके कड़क हो चुके निप्पल्स को बहुत ही कोमलता से गोल गोल घुमाना शुरू किया। मम्मी ने एक लंबी और गहरी आह भरी और अपनी आँखें बंद कर लीं। उन्होंने अपने पैर मेरी कमर के चारों ओर लपेट लिए, जिससे हमारे शरीर के बीच का फासला पूरी तरह खत्म हो गया। उनकी भीतरी जाँघों की कोमलता अब मेरे अंगों से टकरा रही थी।मम्मी ने अब खुद आगे बढ़कर मेरे होंठों को अपने होंठों में ले लिया। यह चुंबन कोई साधारण चुंबन नहीं था; यह एक बहुत ही धीमी और गहरी जीभ की जुगलबंदी थी। उनकी जीभ मेरी जीभ के साथ ऐसे खेल रही थी जैसे वह मेरे अस्तित्व के हर कतरे को चखना चाहती हों। उनके होंठों का स्वाद और उनकी साँसों की वह मदहोश करने वाली महक मुझे एक अलग ही दुनिया में ले जा रही थी। उनके हाथ अब मेरी पीठ के निचले हिस्से से होते हुए मेरे गुप्तांगों के बिल्कुल करीब पहुँच चुके थे, जहाँ उनकी उंगलियों की हल्की सी थरथराहट मेरे पूरे शरीर में एक बिजली सी दौड़ा रही थी। हम दोनों एक दूसरे के स्पर्श से पागल हो रहे थे। मैंने अपनी पकड़ उनके स्तनों पर और भी मजबूत कर ली और अपनी उंगलियों को उनके **मोटे और कड़क हो चुके निप्पल्स** के चारों ओर घुमाना शुरू किया। उनके निप्पल्स इतने उभरे हुए और संवेदनशील थे कि जैसे ही मेरी उंगलियों का दबाव उन पर पड़ता, मम्मी के शरीर में एक तीव्र लहर दौड़ जाती। मैंने अपने अंगूठे से उनके एक **मोटे निप्पल** को धीरे से दबाया और फिर उसे अपनी जीभ से सहलाया। उनके निप्पल का वह भारीपन और कड़ापन मेरे मुँह में महसूस हो रहा था, जिससे उनकी उत्तेजना और भी बढ़ गई।

मम्मी ने अपनी आँखें खोलकर मेरी ओर देखा, उनकी आँखों में वासना की एक गहरी चमक थी। उन्होंने अपने हाथ मेरे बालों में डाले और मुझे और ज़ोर से अपनी ओर खींचा। "रवि... तुम्हारे ये निप्पल्स भी कितने उत्तेजित हैं," उन्होंने फुसफुसाते हुए कहा और अपना हाथ मेरे सीने पर ले गईं। उन्होंने अपने नाखूनों से मेरे **मोटे और कड़क निप्पल्स** को बहुत ही धीरे से सहलाया। उनके नाखूनों का वह हल्का सा खुरदरापन और उनकी उंगलियों की गर्माहट मुझे सुध बुध खोने पर मजबूर कर रही थी।
मम्मी ने अब अपना चेहरा मेरे सीने के बीचों बीच झुका लिया। उन्होंने अपने होंठों से मेरे **मोटे निप्पल** को अपने मुँह के घेरे में ले लिया और उन्हें बहुत ही धीरे से चूसना शुरू किया। उनकी जीभ का वह गीला स्पर्श और उनके होंठों का वह खिंचाव मेरे पूरे शरीर में एक बिजली जैसा करंट दौड़ा रहा था। मैं अपनी आँखें मूँदकर उनकी इस क्रिया का आनंद लेने लगा। उधर मेरा हाथ उनकी कमर से नीचे खिसककर उनकी **भीतरी जाँघों के उस बेहद संवेदनशील हिस्से** पर था, जहाँ उनकी त्वचा अब पूरी तरह से गीली और गर्म हो चुकी थी।
मैंने अपनी उंगलियों को उनकी जाँघों के बीच के उस **गीले और गर्म द्वार** के बिल्कुल करीब ले जाकर केवल अपनी उंगलियों के पोरों से उन्हें सहलाना शुरू किया। मम्मी ने एक बहुत ही गहरी और कामुक आह भरी और अपनी कमर को मेरी उंगलियों की दिशा में और भी ज़्यादा झुका दिया। "हाँ रवि... वहीं... और भी धीमे," उन्होंने एक ऐसी आवाज़ में कहा जो किसी आदेश की तरह लग रही थी। हम दोनों अब एक दूसरे के शरीर की हर बारीकी को, हर उभार को और हर संवेदनशील बिंदु को बहुत ही धीमे और नशीले तरीके से महसूस कर रहे थे।
मम्मी के उस मदहोश कर देने वाले स्पर्श से मेरी चेतना पूरी तरह से धुंधली हो चुकी थी। मम्मी का वह कामुक अंदाज़ अब और भी गहरा और निष्ठुर होता जा रहा था। उन्होंने मेरे **मोटे निप्पल्स** को अपने मुँह में और भी गहराई से भर लिया और अपनी जीभ से उनके चारों ओर एक चक्रवात सा बना दिया। उनकी जीभ का वह गीलापन और उनके होंठों का वह खिंचाव मुझे एक ऐसी चरम सीमा की ओर ले जा रहा था जहाँ से वापसी मुमकिन नहीं थी।
मैंने भी अब अपनी उत्तेजना को पूरी तरह से उग्र कर दिया था। मैंने उनके दोनों हाथों को पकड़कर उनके सिर के ऊपर सटा दिया और अपने शरीर का पूरा भार उनके ऊपर डाल दिया। मम्मी ने अपनी जाँघों को और भी ज़्यादा फैला लिया ताकि मैं उनके **बेहद संवेदनशील और गीले हिस्से** के और करीब आ सकूँ। मैंने अपना चेहरा उनकी गर्दन के उस हिस्से में छिपा लिया जहाँ उनकी खुशबू सबसे तीव्र थी। मैंने उनकी गर्दन पर अपने दाँतों से हल्के से काटते हुए अपनी जीभ को उनकी त्वचा पर रगड़ना शुरू किया। उनकी गर्दन की वह कोमलता और मेरी जीभ का वह गीला घर्षण उन्हें बेकाबू कर रहा था। "आह्ह्ह... रवि... तुम मुझे पागल कर दोगे," उन्होंने अपनी आवाज़ में एक तड़प के साथ कहा।
अब फोरप्ले का स्तर और भी गहरा हो चुका था। मैंने अपना एक हाथ उनकी **भीतरी जाँघों के उस सबसे कोमल और गीले हिस्से** पर रखा। मेरी उंगलियाँ अब केवल सहला नहीं रही थीं, बल्कि वे धीरे धीरे उस **गीले और गर्म द्वार** की ओर बढ़ रही थीं जो अब पूरी तरह से मेरे स्पर्श के लिए तैयार था। जैसे ही मेरी उंगलियों के पोरों ने उनके **मखमली और भीगे हुए हिस्से** को छुआ, मम्मी के पूरे शरीर में एक तीव्र झटका सा लगा। उन्होंने अपनी कमर को ऊपर की ओर झटका दिया और मेरे हाथ को अपने उस हिस्से के और भी अंदर की ओर धकेल दिया।
उनकी उंगलियों ने अब मेरे **मोटे और कड़क हो चुके अंगों** को पूरी ताकत से पकड़ लिया और उन्हें एक लय में ऊपर नीचे सहलाना शुरू किया। उनकी पकड़ में अब एक ऐसी भूख थी जो मेरे भीतर के मर्दानगी को झकझोर रही थी। एक तरफ उनके मुँह का मेरे **मोटे निप्पल्स** के साथ वह गहरा खेल चल रहा था, और दूसरी तरफ मेरी उंगलियाँ उनकी **भीतरी नमी और गर्माहट** के बीच गहराई से उतर रही थीं। हम दोनों के बीच का घर्षण अब इतना तीव्र हो गया था कि हमारे शरीर से पसीना निकलने लगा था, जिससे हमारी त्वचा एक दूसरे से चिपक रही थी। उनकी साँसें अब उखड़ी उखड़ी हुई साँसें अब मेरे कानों के पास किसी तूफान की तरह गूँज रही थीं। फोरप्ले अब अपने चरम पर था और शरीर की प्यास अब और भी अधिक तीव्र हो चुकी थी। मैंने अपनी उंगलियों को उनकी **भीतरी जाँघों के उस बेहद गीले और गर्म द्वार** के बिल्कुल बीचों बीच टिका दिया। मेरी उंगलियों ने अब उनके **मखमली और उभरे हुए क्लिटोरिस (clitoris)** को अपने घेरे में ले लिया। मैंने अपनी उंगली के पोरों से उस छोटे से, बेहद संवेदनशील और कड़क हो चुके हिस्से को बहुत ही धीरे से और गोल गोल घुमाते हुए सहलाना शुरू किया। मम्मी के मुँह से एक ऐसी चीख निकली जो कामुकता और दर्द के बीच की एक महीन रेखा पर थी। "आह्ह्ह... रवि... हाँ... वहीं... बहुत तेज़... नहीं, और भी धीमे," वे बेकाबू होकर चिल्ला रही थीं। उनकी कमर अब मेरे हाथों के इशारों पर नाच रही थी।
उनकी उत्तेजना अब उस मोड़ पर थी जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं था। उनके शरीर से निकलने वाली वह **भीनी और कामुक खुशबू** और उनके उस हिस्से की **भीनी सी गीलापन** मेरे दिमाग पर हावी हो रही थी। मैंने अपने शरीर को थोड़ा पीछे खींचा ताकि मैं अपने **मोटे, कड़क और धड़कते हुए लिंग** को उनके उस द्वार के मुहाने पर रख सकूँ। जैसे ही मेरा **गर्म और सख्त सिरा** उनके उस गीले और संकुचित द्वार के संपर्क में आया, मम्मी ने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं और उनके शरीर में एक थरथराहट दौड़ गई।
बीबीबीमैंने बहुत ही धीमे से, केवल एक इंच की गहराई तक अपना **मोटा अंग** उनके भीतर उतारा। वह अहसास इतना गहरा और इतना संकुचित था कि मुझे लगा जैसे मैं किसी गर्म और मखमली भँवर में समा रहा हूँ। "ओह्ह्ह... रवि... तुम... तुम बहुत बड़े हो... आह्ह्ह," उन्होंने अपने होंठों को दांतों तले दबाते हुए कहा, लेकिन उनकी जाँघों ने मुझे और भी ज़ोर से अपनी ओर खींच लिया। मैंने रुककर उन्हें उस नए अहसास को अपनाने का समय दिया। मैंने उनके **मोटे निप्पल्स** को अपने मुँह में भरा और उन्हें चूसते हुए धीरे धीरे अपने कूल्हों को आगे बढ़ाया।
अचानक मैंने अह्ह्ह्ह्हःह्हुह्ह्हहः की एक ज़ोरदार दहाड़ के साथ अपना मोटा और अकड़ा हुआ लंड मम्मी की गर्म और तंग गीली चूत में एक ही झटके में पूरा अंदर घुसेड दिया।मजे के मारे मेरे मुँह से "आह्ह्ह... मम्मी... आह्ह्ह्ह!" निकला
। मम्मी का पूरा शरीर धनुष की तरह तन गया और उन्होंने अपनी उंगलियाँ मेरी पीठ में ज़ोर से गड़ा दीं। वो दर्द और बेइंतहा सुख के मारे कराह उठीं, "हाय... मार डाला रवि तूने! क्या तू जल्लाद है? हाय मेरी माँ... भोसड़ी के, मैं तेरी माँ हूँ... उफ़्फ़!"
उनकी आवाज़ में एक अजीब सी तड़प और बेबसी थी, "कोई रहम नहीं है तुझे? जानवरों की तरह चोद रहा है मुझे... उफ़्फ़! इतनी उग्रता है तुझमें? लगता है, तुझे फिर से चूत की ज़रूरत नहीं, तू तो इस चूत को बहुत ही बेरहमी से फाड़ रहा है! हाय माँ... फंस गई मैं इस हवसी के चंगुल में! भोसड़ी के, मैं तेरी माँ हूँ कोई रंडी नहीं जो इतनी गंदी तरह से चोद रहा है!"
मैंने धीरे धीरे अंदर बाहर करना शुरू किया और मम्मी की सिसकियों के साथ मेरा शरीर भी लय में आ गया। "आह्ह्ह... आह्ह्ह... उफ़्फ़..." मम्मी के मुँह से लगातार ये आवाज़ें निकल रही थीं। मैंने उनके कान के पास झुककर कहा, "ये लो मम्मी... अब पूरा अंदर तक अपने बेटे का लंड..."
मैंने अपनी गति को धीरे धीरे बढ़ाते कर उग्र और बेकाबू कर दिया। अब मैं रुक रुक कर उन्हें झटके दे रहा था। मैंने अपने कूल्हों को पूरी ताकत से पीछे खींचा और अपना **पूरा मोटा अंग** उनके शरीर से लगभग पूरी तरह बाहर निकाल लिया, जिससे उनके द्वार पर एक गहरा खालीपन महसूस हो रहा था। फिर, मैंने एक ज़ोरदार और हिंसक **झटका** दिया, जिससे मेरा अंग उनके गर्भगृह में इतनी गहराई तक धंस गया कि मम्मी की आँखें फटी की फटी रह गईं। इस झटके की तीव्रता इतनी अधिक थी कि हमारे शरीर के टकराव से **बेड भी खिसक कर काफी आगे तक सरक गया**।
"आह्ह्ह... उफ़्फ़... रवि... रुकना मत... और ज़ोर से!" मम्मी की आवाज़ अब एक बेकाबू सिसकी में बदल चुकी थी। उनके मुँह से लगातार **सिसकियाँ** निकल रही थीं। हर झटके के साथ उनका शरीर बेड पर पीछे की ओर धकेला जा रहा था। मैंने अपनी एक उंगली को उनके **निचले संवेदनशील हिस्सों** के पास की कोमल त्वचा पर फेरा और दूसरे हाथ से उनकी **पीठ** को नीचे से ऊपर की ओर सहलाया, जिससे उनकी रीढ़ की हड्डी में एक सिहरन दौड़ गई। बीच बीच में मैं अपना चेहरा उनके चेहरे के पास ले जाता और उनके **गालों और चेहरे** को अपने होंठों से सहलाता, जिससे उनकी उत्तेजना चरम पर पहुँच रही थी।
मैंने फिर से एक लंबा और गहरा झटका दिया। इस बार मैंने अपना पूरा भार उनके ऊपर डाल दिया और उन्हें बेड के सिरहाने की ओर धकेलते हुए **काफी दूर तक धकेल दिया**। बेड के सरकने की आवाज़ और हमारे शरीर के टकराने की आवाज़ कमरे में गूँज रही थी। "ओह्ह्ह... रवि... मैं... मैं मर जाऊँगी... आह्ह्ह... मुझे मार डालो... हाँ, ऐसे ही!" मम्मी की आवाज़ में अब एक अजीब सी तड़प थी, जैसे वे इस चरम सुख के बोझ तले दबकर **मर जाना चाहती हों**। उनकी सिसकियाँ अब चीखों में बदल रही थीं। उनके शरीर का हर हिस्सा मेरे हर झटके के साथ काँप रहा था। मैंने उनके **मोटे निप्पल्स** को फिर से अपने मुँह में लिया और उन्हें ज़ोर से चूसते हुए अपने **मोटे अंग** को उनके अंदर पूरी ताकत से मारना जारी रखा। हर झटके के साथ बेड
बेड के सरकने की आवाज़ और हमारे शरीर के टकराने की आवाज़ कमरे में गूँज रही थी। मैंने अपनी गति को और भी तेज़ कर दिया। अब मैं रुक नहीं रहा था, बल्कि एक मशीन की तरह लगातार और हिंसक झटके दे रहा था। "आह्ह्ह... रवि... बस... अब और नहीं... मैं फटने वाली हूँ!" मम्मी का शरीर अब पूरी तरह से नियंत्रण खो चुका था। उनके हाथ बेड की चादर को इतनी ज़ोर से जकड़े हुए थे कि उनकी उंगलियाँ सफेद पड़ गई थीं।
बमैंने एक बार फिर अपना **मोटा और कड़क अंग** पूरी तरह बाहर निकाला और फिर एक ऐसा **विस्फोटक झटका** दिया कि मेरा पूरा शरीर उनके शरीर से जा टकराया। इस बार मैंने अपना पूरा वजन उनके ऊपर डाल दिया और उनके गीले छेद के पास की कोमल त्वचा को अपने हाथों से सहलाते हुए उन्हें और भी उत्तेजित कर दिया। उनके चेहरे पर अब एक अजीब सी बेखुदी थी, उनकी आँखें ऊपर की ओर चढ़ गई थीं और मुँह से केवल बेतरतीब **सिसकियाँ और आहें** निकल रही थीं।
"रवि... मुझे... मुझे खत्म कर दो... आह्ह्ह!" वे चिल्लाईं और उनके शरीर में एक ज़ोरदार **कम्पन (orgasm)** महसूस हुआ। उनके भीतर की मांसपेशियां मेरे अंग को इतनी ज़ोर से भींच रही थीं कि मुझे लगा जैसे मेरा अंग फट जाएगा। उनकी सिसकियाँ अब एक लंबी, गहरी और थकी हुई आवाज़ में बदल गईं। वे पूरी तरह से **बेहोश होने की कगार पर** थीं, जैसे कि उस चरम सुख ने उनकी जान ही निकाल ली हो।
मैंने महसूस किया कि मेरा अपना **वीर्य (semen)** अब बाहर आने के लिए छटपटा रहा था। मम्मी का शरीर अब पूरी तरह से बेकाबू हो चुका था।मैंने उनके शरीर को और भी कसकर जकड़ लिया ।मैंने अपने कूल्हों को पीछे खींचकर एक और गहरा झटका दिया। मेरे **भारी और लटकते हुए अंडकोष** हर बार जब मैं ज़ोर से अंदर बाहर होता, मम्मी की ** की कोमल त्वचा** और उनके **योनि द्वार** से ज़ोर ज़ोर से टकराते थे। उस टकराव की आवाज़ *चप चप, थप्प थप्प* पूरे कमरे में गूँज रही थी।
"आह्ह्ह... रवि... तुम्हारे ये **अंडकोष**... जब वे मेरे शरीर से टकराते हैं, तो मुझे पागल कर देते हैं... आह्ह्ह!" मम्मी की सिसकियाँ अब और भी गहरी और कामुक हो गई थीं। मैंने अपना एक हाथ नीचे ले जाकर उनके **गीले और गर्म हिस्से** को सहलाया और दूसरे हाथ से उनके **चेहरे और गालों** को ज़ोर से अपनी ओर खींचा। मेरा चेहरा उनके चेहरे के इतने करीब था कि हमारी साँसें आपस में टकरा रही थीं।
मैंने अपनी गति को और भी हिंसक कर दिया। अब मैं रुक नहीं रहा था। मैं अपने **मोटे और कड़क लंड** को उनके अंदर पूरी गहराई तक मार रहा था। हर झटके के साथ मेरे **लटकते हुए अंडकोष** उनके शरीर पर ज़ोर से प्रहार कर रहे थे, जिससे मम्मी का पूरा शरीर बेड पर पीछे की ओर धकेला जा रहा था। बेड के पैर फर्श पर रगड़ खाकर **काफी दूर तक सरक चुके थे**।
"रवि... मार डालो मुझे... आह्ह्ह... मैं मर जाऊँगी इस ज़ोर से... उफ़्फ़!" मम्मी की आँखें ऊपर की ओर चढ़ गई थीं और वे पूरी तरह से चरम सुख के नशे में डूबी हुई थीं। उनकी सिसकियाँ अब चीखों में बदल रही थीं। मैंने उनके **निप्पल्स** को अपने मुँह में भर लिया और उन्हें ज़ोर से चूसते हुए अपने **अंडकोशों** को उनके शरीर से टकराना जारी रखा। मेरा वीर्य अब फटने को तैयार था। मैंने मम्मी की कमर को अपने हाथों से इतनी ज़ोर से जकड़ लिया कि मेरी उंगलियाँ उनके **कोमल मांस** में धँस गई थीं। "रवि... बस... अब और नहीं सह पा रही मैं... आह्ह्ह!" मम्मी की आवाज़ अब एक टूटी हुई चीख जैसी लग रही थी। उनका पूरा शरीर धनुष की तरह तन गया था और वे थर थर काँप रही थीं।
मैंने अपनी गति को और भी **हिंसक और बेकाबू** कर दिया। अब मैं सिर्फ झटके नहीं दे रहा था, बल्कि मैं उनके शरीर के अंदर अपने **मोटे लंड** को पूरी ताकत से गाड़ रहा था। हर बार जब मैं पीछे हटता और फिर पूरी रफ़्तार से अंदर घुसता, तो मेरे **भारी और लटकते हुए अंडकोष** उनके **योनि द्वार** और **गुदा** के बीच के हिस्से पर इतनी ज़ोर से टकराते कि एक मांस के टकराने की तेज़ *चटाक चटाक* की आवाज़ पूरे कमरे में गूँज उठती। "ओह्ह्ह... रवि... तुम्हारे **अंडकोष**... आह्ह्ह... वे मेरे शरीर को चीर रहे हैं... बहुत अच्छा लग रहा है... आह्ह्ह!" मम्मी की सिसकियाँ अब पूरी तरह से कामुक उत्तेजना में डूब चुकी थीं।
मैंने महसूस किया कि मेरा **वीर्य** अब अपने चरम पर था। मेरा लंड अंदर ही अंदर फटने को तैयार था। मैंने मम्मी के दोनों पैरों को अपने कंधों पर उठा लिया ताकि मैं और भी गहराई तक जा सकूँ। अब मैं उनके **गर्भगृह के सबसे गहरे कोने** तक पहुँच रहा था। "रवि... अब... अभी कर दो... मुझे भर दो... आह्ह्ह्ह!" मम्मी ने अपनी आँखें बंद कर लीं और उनके मुँह से एक लंबी, दर्दनाक लेकिन सुखद चीख निकली।
तभी, मैंने एक आखिरी और सबसे **विस्फोटक झटका** दिया। मैंने अपना पूरा शरीर उनके ऊपर झुका दिया और अपनी पूरी ताकत झोंक दी। "आह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह!" एक साथ हमारी चीखें निकलीं। मैंने अपना सारा **गर्म, गाढ़ा और चिपचिपा वीर्य** उनके अंदर के सबसे गहरे हिस्से में छोड़ दिया। मेरा वीर्य इतनी तेज़ी से और इतनी मात्रा में निकल रहा था कि मुझे महसूस हुआ जैसे मेरा पूरा शरीर खाली हो रहा है। मम्मी का शरीर भी एक ज़ोरदार **कम्पन** के साथ फटने लगा। वे मेरे नीचे दबी हुई, बेसुध होकर बस हाँफ रही थीं। उनके शरीर से मेरा **वीर्य और उनका गीलापन** मिलकर बेड की चादरों को पूरी तरह भिगो चुका था। बेड अब कमरे के एक कोने में पूरी तरह से सरक चुका था, और कमरे में केवल हमारी **भारी और बेतरतीब साँसों** की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
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shandar updaete
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उस दिन के बाद से यह सिलसिला हर रात को चलने लगा। कभी एक बार, कभी दो बार और कभी कभी तो तीन तीन बार हमारी हवस का खेल चलता। हमारी भूख इतनी बढ़ गई थी कि अब सिर्फ रातें ही काफी नहीं थीं; कभी कभी तो दोपहर में भी हमारा मिलन हो जाता था, क्योंकि घर में सिर्फ मैं और मम्मी ही होते थे।हां,जब कभी कोई बहन या भाई आया होता तब थोड़ा सावधानी रखनी पड़ती ,जिससे शारीरिक संबंधों का सिलसिला पूरी तरह बंद तो नहीं होता काफी धीमा हो जाता।
नअंकल ने उस दिन के बाद घर आना बिल्कुल बंद कर दिया था।मुझे बाद में पता चला कि असल में, मम्मी ने ही उन्हें ये कहते हुए के रवि ने देख लिया है,तो अब उनको नहीं आना चाहिए, आने से मना कर दिया था। उन्हें इस बात की ज़रा भी भनक नहीं थी कि ,,, मेरा मम्मी को अंकल के साथ sex करते देख लेना ,फिर मम्मी को रूठने का बहाना करके इमोशनल ब्लैकमेल करके अपने नीचे लाने का masterplan मैंने और अंकल ने ही बनाया था। अंकल ने भी बहुत सब्र दिखाया और घर आना बंद कर दिया था। पर मैं इस बात के लिए अंकल का दिल से ऋणी था कि उन्हीं के कारण मैं मम्मी के साथ इस तरह के सेक्स संबंध बना पाया था। मैं यह बात उनसे मिलकर भी कहना चाहता था, पर अंकल से मेरी मुलाकात ही नहीं हो पा रही थी। शायद उन्हें इस बात का ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि मेरे और मम्मी के बीच अब किस हद तक संबंध बन चुके हैं और हमारी हवस अब अपने चरम पर पहुँच चुकी है।
सच पूछो तो कहीं न कहीं मेरे मन में थोड़ी सी बेईमानी भी थी एक ऐसा अहसास कि अंकल के न आने से मुझे मम्मी के इस सुलगते हुए जिस्म से अकेले खेलने का सौभाग्य मिल रहा है। पर फिर मेरे मन में एक ख्याल आया कि काश! एक बार अंकल से मुलाकात हो जाए।
सब कुछ एक तय रूटीन से चल रहा था। मेरा सुबह 8 बजे से 1 बजे तक कॉलेज जाना, मम्मी का पूजा पाठ करके घर संभालना और दुकान की देखभाल करना। दोपहर 1 से 3 बजे तक दुकान का शटर डाउन रहता था। फिर 3 बजे मैं दुकान पर जाता और दुकानदारी के साथ साथ पढाई करता, मम्मी घर के बाकी काम निपटाकर थोड़ा आराम करती थीं। रात को 8 बजे शटर डाउन होने के बाद रात का खाना ,उसके बाद सोने की तैयारी शुरू हो जाती और लगभग 9 बजे तक हम बिस्तर पर होते। बाकी तो मैं फिजिकल होने का हमारा रूटीन बता ही चुका हूँ।
उस दिन रविवार था। मैंने मम्मी से कहा, "मम्मी, मुझे थोड़ा घूमने जाना है।" मम्मी के 'हाँ' कहते ही मैंने अपनी बाइक उठाई और सीधे अंकल के पास पहुँच गया। अंकल को दफ्तर के ही प्रांगण में एक कमरा मिला हुआ था,अंकल मुझे देखकर बहुत खुश हुए। वो मुझसे ऐसे मिले जैसे किसी बच्चे से नहीं, बल्कि किसी बहुत गहरे राज़दार दोस्त से मिल रहे हों। उनकी आँखों में एक अलग ही चमक थी, जैसे उन्हें पता हो कि मैं यहाँ सिर्फ घूमने के लिए नहीं आया हूँ।
अंकल ने चाय बनाई और पास की दुकान से गरमा गरम समोसे मंगवा लिए
अंकल ने चाय बनाई और पास की दुकान से गरमागरम समोसे मंगवा लिए। चाय पीते हुए अंकल ने मुस्कुराते हुए पूछा, "और सुनाओ ,कैसे हो दोस्त?"
मैंने हैरानी से अंकल की ओर देखा। पहले तो अंकल मुझे हमेशा 'बेटा' कहकर बुलाते थे, लेकिन आज वो मुझे 'दोस्त' कह रहे थे। मुझे यह सुनकर बहुत अच्छा लगा कि मुझसे लगभग तीन गुना उम्र के अंकल मुझे अपना दोस्त मान रहे हैं। शायद अंकल ने मेरे मन में चल रहे विचारों को पढ़ लिया था, क्योंकि उन्होंने तुरंत कहा, "हाँ रवि, अब हम अच्छे दोस्त हैं, क्योंकि अब हम सभी *विषयों* पर खुलकर डिस्कशन कर लेते हैं।" उनका इशारा साफ़ तौर पर सेक्स की तरफ था।
उनकी यह बात सुनकर मुझे बहुत खुशी हुई और मैंने अपनी मुस्कुराहट से अपनी खुशी ज़ाहिर कर दी। अंकल ने मेरा उत्साह बढ़ाने के लिए मेरे कंधे पर थपकी दी, जैसे वो मुझे यह एहसास दिला रहे हों कि अब हमारे बीच कोई पर्दा नहीं रहा।
अंकल ने मेरी आँखों में आँखें डालकर बड़े ही बेबाक अंदाज़ में पूछा, "और बताओ रवि, कुछ हुआ क्या मम्मी के साथ?"
मैंने बिना किसी हिचकिचाहट के, एक शरारती मुस्कुराहट के साथ अंकल को सब कुछ विस्तार से बता दिया। मैंने उन्हें बताया कि कैसे उनके बनाए हुए प्लान के मुताबिक मम्मी पूरी तरह मेरे समर्पण में आ गईं और कैसे वो मेरे नीचे आकर पूरी तरह मेरी हो जाती हैं। मैं एक एक पल का वर्णन कर रहा था और अंकल पूरी उत्सुकता से मेरी बातें सुन रहे थे। उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी और वो बीच बीच में सुनकर मुस्कुरा रहे थे।
जैसे ही मेरी बात खत्म हुई, अंकल के चेहरे पर एक विजयी मुस्कान आई। उन्होंने जोश के साथ मेरी जांघ पर ज़ोर से थपकी दी और बोले, "वाह! ये हुई न मर्दों वाली बात! शाबाश मेरे शेर!" उनकी आवाज़ में एक तरह का गर्व था शायद इसलिए कि उनका प्लान कामयाब हो गया था, जैसे वो मम्मी पर मेरी पकड़ से बेहद खुश और संतुष्ट हों।
अंकल की उस शाबाशी ने मेरे अंदर एक अजीब सा जोश भर दिया था। मैंने थोड़ा रुककर, अपनी आवाज़ को थोड़ा धीमा और गहरा करते हुए कहा, "अंकल, सच कहूँ तो मम्मी के साथ जो मज़ा आता है, वो लाजवाब है। लेकिन कभी कभी मुझे ऐसा महसूस होता है कि जैसे कुछ कमी है। जैसे कोई चीज़ अधूरी रह गई हो।"
अंकल ने अपनी चाय का आखिरी घूँट भरा और मेरी तरफ झुकते हुए बोले, "कमी? कैसी कमी रवि? क्या मम्मी तुम्हें पूरा नहीं दे पा रही हैं?"
मैंने अपनी उत्सुकता को रोकते हुए सीधे पूछा, "अच्छा अंकल, पहले सच सच बताइए... आपको मम्मी में सबसे ज्यादा क्या पसंद है?" अंकल ने एक गहरी साँस ली, जैसे वो किसी बहुत ही खूबसूरत याद में खो गए हों। उन्होंने अपनी चाय का कप मेज पर रखा और एक गहरी नज़र मुझ पर डालते हुए बोलना शुरू किया। उनकी आवाज़ में एक अजीब सा ठहराव और प्रशंसा थी।
"रवि, अब हम दोनों दोस्त बन चुके हैं,तो मै तुमसे कुछ भी छिपाऊंगा नहीं। 20--22 सालों में मैने पता नहीं कितनी औरतों को भोगा है पर किसी में भी वो बात नहीं जो तुम्हारी मम्मी में है।तुम्हारी मम्मी सिर्फ एक औरत नहीं हैं, वो एक जीती जागती काम कला की मूर्ति हैं," अंकल ने शुरू किया। "उनकी खूबसूरती की तारीफ करना तो बहुत छोटी बात होगी। उनकी आँखों में जो गहराई है, जो शरारत है, वो किसी को भी अपना दीवाना बना दे। और उनका वो बदन... उफ़! उनकी कमर की लचक और उनकी त्वचा की वो मखमली कोमलता, जिसे छूते ही इंसान सुध बुध खो दे।"
अंकल ने मेरे कंधे को थोड़ा को थोड़ा दबाते हुए अपनी बात जारी रखी, "लेकिन रवि, उनकी सबसे बड़ी खूबी उनका जिस्म नहीं, बल्कि उनकी समझ है। वो काम कला में बहुत निपुण हैं। उन्हें पता है कि किस समय, किस सिचुएशन में एक मर्द के जिस्म को किस चीज़ की ज़रूरत होती है। उन्हें ये मालूम है कि कब उसे अपनी उंगलियों से सहलाना है और कब अपनी साँसों की गर्मी से उसे पिघलाना है।
तभी मेरे ख्यालो में मम्मी के साथ बिताए उन शेक्सी पलों की तस्वीर एक फिल्म के रूप में चलने लगी,मैने सोचा अंकल सच ही तो कह रहे हैं,सच में मम्मी ऐसी ही तो है।
अंकल ने मुझे ख्यालों में डूबा हुआ देखकर मुझे कंधे से पकड़ का झिंझोड़कर कहा, "क्या हुआ कहाँ खो गए।,""मैने तुरंत उनकी तरफ देखा जैसे गहरी नींद से किसी ने जगा दिया हो,हाँ बताइए मै सुन रहा हु।" अंकल की आँखों में एक चमक आ गई ,उन्होंने आगे कहा, "वो जानती हैं कि एक मर्द को कब सुकून चाहिए और कब उसे उकसाकर पागलपन की हद तक ले जाना है। वो बिना कहे समझ जाती हैं कि कब मर्द को प्यार की गर्माहट चाहिए और कब उसे अपनी मर्दानगी दिखाने के लिए एक चुनौती चाहिए। उनकी सबसे बड़ी ताकत यही है कि वो सिर्फ शरीर से नहीं, बल्कि अपनी रूह और अपनी समझ से खेलती हैं। वो जानती हैं कि मर्द के अंदर के जानवर को कैसे जगाना है और फिर उसे कैसे अपनी उंगलियों पर नचाना है।"
अंकल की ये बातें सुनकर मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मुझे एहसास हुआ कि मम्मी के बारे में अंकल की सोच कितनी गहरी और कामुक और बिल्कुल सच्ची है। अंकल की बातों ने न केवल मम्मी की तारीफ की थी, बल्कि उन्होंने अनजाने में ही उस 'थ्रीसम' के लिए एक ऐसा माहौल तैयार कर दिया था जहाँ अब सिर्फ शरीर का मिलन नहीं, बल्कि अनुभवों का एक महाकुंभ होने वाला था।
मैंने अपनी नज़रें अंकल की आँखों में गड़ा दीं और थोड़ा और झुककर, आवाज़ को एकदम धीमा और शरारती बनाते हुए पूछा, "अंकल, एक बात बताइए... ये तो सब जानते हैं कि इस काम को पर्दे के पीछे, अकेले में करने में बहुत आनंद आता है। लेकिन मुझे ये जानना है कि जब हमें ये पता हो कि कोई हमें देख रहा है कोई ऐसा जो भरोसेमंद हो, जो हमारी प्राइवेसी का सम्मान करे पर हमारी हर हरकत का गवाह बने तो क्या इससे वो मज़ा और भी बढ़ न जाता है क्या?"
अंकल ने मेरी बात सुनकर एक लंबी और गहरी साँस ली। उनकी आँखों में एक ऐसी चमक थी जैसे कोई पुराना राज़ खुल गया हो। उन्होंने अपनी कुर्सी पर थोड़ा पीछे झुकते हुए अपनी नज़रें मेरी आँखों में गड़ा दीं और एक बेहद गहरी, भारी आवाज़ में बोले,मै समझ गया रवि,"तुम यही पूछना चाहते हो न के उस दिन मुझे कैसा लगा था,जब तुम नींद की गोली खाने का बहाना करके सोने की एक्टिंग कर रहे थे,तो मैने और तेरी मम्मी ने लॉबी में पूरी तरह निर्वस्त्र हो के chudai की थी ,जब राउंड खत्म हुआ तेरी मम्मी नंगी ही बाथरूम चली गई,मुझे थोड़ा शक हुआ तो मै चुपके से तेरे रूम में जाकर देखा तो तुम जाग रहे थेे ,मैने तुम्हे विश्वास में लेके दूसरी बार तुमारी मम्मी की पूरी रोशनी में मारी थी ताकि तुम अच्छे से देख सको।
मैं थोड़ा सकपका गया। मेरी आँखों में हैरानी और घबराहट साफ़ दिख रही थी। मैंने अपनी आवाज़ को थोड़ा संभालते हुए कहा, "हाँ अंकल... मैं बस यही पूछना चाहता था। पर... पर आपको कैसे पता चला कि मेरे दिमाग में क्या चल रहा है? मैं तो खुद भी नहीं समझ पा रहा था कि मैं क्या पूछना चाह रहा हूँ।"मैं एक पल के लिए चुप रहा, जैसे खुद को कोस रहा हूँ। फिर मुझे अचानक एहसास हुआ कि मैं कितनी बड़ी भूल कर रहा हूँ। मैं उनसे ऐसे सवाल पूछ रहा था जैसे मैं कोई बच्चा हूँ जो अभी दुनिया देख रहा है। मैं भूल गया था कि सामने कोई अनजाना नहीं, बल्कि मुझसे कहीं ज़्यादा उम्र का एक ऐसा तजुर्बेकार आदमी बैठा है जिसने ज़िंदगी और इंसानी फितरत के वो रंग देखे हैं जिनकी मैं अभी कल्पना भी नहीं कर सकता। वो मेरी तरह अनाड़ी नहीं थे; उनके पास वो अनुभव और वो समझ थी जो एक पल में मेरे मन की हर उलझन को सुलझा सकती थी।अंकल ने मेरी इस घबराहट को देख लिया। उनके चेहरे पर एक समझदार और हल्की सी मुस्कान उभरी ऐसी मुस्कान जो कहती है कि 'बेटा, तुम अभी बहुत कुछ सीख रहे हो'। उन्होंने मेरी घबराहट को भांपते हुए मेरी आँखों में देखा, और उनकी उस शांत नज़र ने मुझे बता दिया कि उन्हें मेरे शब्दों से ज़्यादा मेरे मन की तड़प और मेरी उलझन का पता है।
मैंने अपनी घबराहट को थोड़ा किनारे रखा और हिम्मत जुटाकर फिर से वही सवाल दोहराया, जो मेरे दिमाग में बार बार घूम रहा था। मैंने उनकी आँखों में सीधे देखते हुए कहा, "हाँ अंकल... मैं सच में यही पूछना चाहता हूँ कि जब आपने यह जानते हुए कि मैं सब कुछ देख रहा हूँ, मम्मी के साथ सभी बल्ब जला कर सम्बोग किया था,... तो क्या आपको पहले से कहीं ज़्यादा आनंद आया? क्या उस रोशनी ने और उस 'देखने' के अहसास ने आपके अनुभव को बदल दिया था, या फिर यह सिर्फ एक मामूली सा फर्क था?"
"" अंकल के चेहरे पर एक मदहोश कर देने वाली मुस्कान आ गई।" वो बोले, "जब मैं तुम्हारी मम्मी के साथ था, और मुझे इस बात का पूरा अहसास था कि तुम अंधेरे में खड़े होकर हमारी हर एक हरकत को अपनी आँखों में उतार रहे हो... तो उस अहसास ने मेरे अंदर के मर्द को एक अलग ही स्तर पर पहुँचा दिया था।"
उन्होंने थोड़ा और आगे झुककर अपनी आवाज़ को और भी धीमा और कामुक कर लिया, "मम्मी के जिस्म की गर्माहट तो थी ही, लेकिन तुम्हारी मौजूदगी का वो दबाव, वो 'देखने' का अहसास... उसने मेरे हर स्पर्श को और भी ज़्यादा तीव्र बना दिया था। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं सिर्फ मम्मी को नहीं छू रहा हूँ, बल्कि तुम्हारी नज़रों की गर्मी भी मेरे जिस्म को छू रही है। हर बार जब मम्मी कराहती थीं, तो मुझे लगता था कि तुम्हारी साँसें भी तेज़ हो रही हैं। उस पल में, हम सिर्फ दो लोग नहीं थे, बल्कि एक त्रिकोण (triangle) बन गए थे जहाँ तुम हमारी उत्तेजना का ईंधन बन रहे थे।"
अंकल की आँखों में अब एक बेकाबू प्यास साफ़ दिख रही थी। उन्होंने आगे कहा, "सच तो ये है रवि, कि उस दिन मुझे पहली बार समझ आया कि 'परफॉर्म' करने का असली मज़ा क्या होता है। जब तुम्हें पता हो कि कोई तुम्हें देख रहा है, तो तुम अपनी सीमाओं को तोड़ देते हो। मैं तेरी मम्मी के साथ और भी ज़्यादा बेबाक और बेखौफ हो गया था, क्योंकि मुझे पता था कि तुम्हारी आँखें मेरी मर्दानगी का गवाह बन रही हैं। उस दिन मज़ा सिर्फ शारीरिक नहीं था, वो मानसिक रूप से इतना गहरा था कि आज भी जब मैं उस पल के बारे में सोचता हूँ, तो मेरा शरीर कांप उठता है। तेरी मम्मी का जिस्म और तुम्हारी नज़रें, दोनों मिलकर मुझे एक ऐसी चरम सीमा पर ले जा रहे थे जो मैंने पहले कभी महसूस नहीं की थी। तो हाँ रवि, वो आनंद पहले से कहीं ज़्यादा गहरा, ज़्यादा तीव्र और कहीं ज़्यादा बेबाक था।""
मेरा अगला सवाल सीधा और बिना किसी लाग लपेट के था,मेरी आवाज़ में एक अजीब सी बेचैनी और एक दबी हुई चाहत थी। मैंने अपनी नज़रें झुका लीं, "अंकल, मुझे वो सब देखने में बहुत अच्छा लग रहा था। और अब तो ये साफ़ हो गया कि आपकी उत्तेजना में मेरी मौजूदगी का बहुत बड़ा हाथ था। यानी देखने में भी मज़ा है और किसी के सामने होकर करने में भी।मैंने एक गहरी साँस ली और हिम्मत जुटाकर फ़िर पूछा , "एक और सवाल है... उस दिन को ही ध्यान में रखते हुए बताना अंकल, मेरा तो दिल कर रहा था कि काश मैं भी आपको और मम्मी को जॉइन कर पाता... क्या उस वक्त आपके मन में भी यही ख्याल आया था कि मुझे भी बुला लिया जाए और हम तीनों मिलकर एक 'थ्रीसम' (threesome) करें?"
सवाल पूछते ही कमरे का तापमान जैसे अचानक बढ़ गया। अंकल के चेहरे पर एक पल के लिए सन्नाटा छा गया, और फिर उनकी आँखों में एक ऐसी चमक उतरी जिसे देखकर मेरी रूह कांप गई। वो चमक कोई साधारण चमक नहीं थी, वो एक शिकारी की चमक थी जिसने अपने शिकार को देख लिया हो।
उन्होंने अपनी कुर्सी पर थोड़ा और आराम से बैठते हुए मेरी तरफ एक बेहद गहरी और नशीली नज़र डाली। "रवि..." उन्होंने मेरा नाम ऐसे लिया जैसे वो मेरे मन की गहराई को पढ़ रहे हों। "तुमने जो पूछा है, वो सिर्फ एक ख्याल ही नहीं , एक ऐसी इच्छा थी जो उस वक्त मेरे पूरे वजूद में दौड़ रही थी। जब मैं तुम्हारी मम्मी के जिस्म में खोया हुआ था और तुम्हारी उन नज़रों की तपिश को अपने ऊपर महसूस कर रहा था, तो मेरा दिमाग बार बार एक ही चीज़ की तरफ भाग रहा था कि काश तुम ये नज़ारा सिर्फ देखने तक सीमित न रहो बल्कि खुद भी इसका हिस्सा बन जाओ।"
उनकी आवाज़ अब और भी भारी और कामुक हो गई थी। "उस पल में, जब मैं तुम्हें देख रहा था और तुम हमें देख रहे थे, तो हमारे बीच एक अदृश्य तार खिंच गया था। मेरा मन कर रहा था कि मैं तुम्हें उस अंधेरे से खींचकर ले आऊं, तुम्हें भी वो नशा महसूस कराऊं जिस में , मैं और तेरी मम्मी डूबे हुए थे। मेरा मन था कि तुम्हारी वो तड़पती हुई आँखें सिर्फ देख न रही हों, बल्कि तुम्हारी वो गर्म साँसें भी हमारे बीच महसूस हों। उस वक्त एक थ्रीसम का ख्याल मेरे दिमाग में किसी आग की तरह सुलग रहा था। अगर तुम उस वक्त वहां होते, तो वो रात सिर्फ कामुकता की नहीं, बल्कि एक ऐसी चरम सीमा की होती जिसे शब्दों में बयां करना नामुमकिन है। तुम्हारा शामिल होना उस पूरी प्रक्रिया को पूर्ण बना देता।"
मैंने उनकी आँखों में सीधे देखते हुए कहा, " बस ये ही कमी महसूस करता हु मै, मम्मी तो सब कुछ देती हैं, पर जब मैं उनके जिस्म के साथ खेलता हूँ, तो अक्सर मेरा मन करता है कि काश कोई और भी होता जो इस खेल को और भी रोमांचक बना देता। काश कोई ऐसा होता जो हमारे इस पागलपन को देख पाता और उसमें शामिल हो पाता।"
अंकल के चेहरे पर एक गहरी और समझदार मुस्कान तैर गई। उन्होंने समझ लिया था कि मैं किस तरफ इशारा कर रहा हूँ। उन्होंने धीरे से कहा, "रवि, एक मर्द को पता होना चाहिए कि कब अकेले खेलना है और कब पूरी महफ़िल जमानी है। अगर तुम और मम्मी दोनों मिलकर एक ऐसा अनुभव चाहते हो जो तुम्हारी रूह को झकझोर दे, तो उसके लिए सही साथी का होना ज़रूरी है।"
मैंने उत्सुकता से पूछा, "कैसा साथी अंकल?"
अंकल ने थोड़ा रुककर, एक रहस्यमयी अंदाज़ में कहा, "ऐसा साथी जो तुम्हारी हर ख्वाहिश को समझे, जो मम्मी के जिस्म की हर थरथराहट को महसूस कर सके और जो इस खेल का हिस्सा बनकर उसे और भी गहरा बना दे। अगर तुम चाहो, तो हम इस 'अधूरी कमी' को मिलकर पूरा कर सकते हैं।"
उनकी बात सुनकर मेरे दिल की धड़कन तेज़ हो गई। मुझे समझ आ गया कि अंकल अब सिर्फ एक दर्शक ही नहीं , बल्कि वो इस खेल के खिलाड़ी बनने के लिए तैयार थे।
मैंने एक लंबी और गहरी साँस ली। अब बात उस मोड़ पर आ गई थी जहाँ से आगे का रास्ता बहुत संजीदा और पेचीदा था। मैंने अपनी आवाज़ को थोड़ा धीमा और गंभीर करते हुए कहा, "अंकल, अब असली समस्या यह है कि मम्मी को इस बात का ज़रा भी अंदाज़ा नहीं है कि आप और मैं एक दूसरे के राज़दार हैं। उन्हें तो यह भी लगता है कि आपको इस माँ बेटे के बीच चल रहे इस खेल या हमारी इस 'सेटिंग' के बारे में कुछ पता ही नहीं है। वो आपको एक बिल्कुल अलग नज़र से देखती हैं। अब सवाल यह है कि उन्हें इस सच्चाई का अहसास कैसे कराया जाए? उन्हें कैसे मनाया जाए कि वो इस खेल का हिस्सा बनें और हमें इस तरह स्वीकार करें?"
अंकल ने मेरी बात सुनी और एक पल के लिए अपनी आँखें मूँद लीं, जैसे वो इस जटिल पहेली को सुलझाने का कोई रास्ता खोज रहे हों। फिर उन्होंने अपनी आँखें खोलीं, और उनके चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान थी जो रहस्यमयी भी थी और आत्मविश्वास से भरी भी। उन्होंने थोड़ा आगे झुककर मेरी तरफ देखा और बहुत ही शांत लेकिन भारी आवाज़ में कहा, "रवि, यह कोई ऐसी समस्या नहीं है जिसे सुलझाया न जा सके। बस इसमें जल्दबाजी की ज़रूरत नहीं है।तुम्हारी मम्मी को सीधे तौर पर यह बताना कि हम दोनों क्या करना चाहते हैं, उन्हें डरा सकता है या उन्हें रक्षात्मक बना सकता है।"
मैंने कहा, "पर अंकल, उस रात जब मम्मी को पता चला कि मैंने आप दोनों को उस हालत में देख लिया है, तो शायद मम्मी ने आपको को घर आने से मना कर दिया होगा। तो फिर आपका घर में आना जाना दोबारा कैसे शुरू होगा?"
अंकल ने सोचते हुए कहा, "यह बात तो है दोस्त।" और फिर मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए बोले, "अब क्या करें यार।"
मैं थोड़ा मुस्कुराते हुए बोला, "मैं सब कर लूँगा अंकल, आपके आशीर्वाद से।" मेरी बात सुनकर अंकल ने मुझे सवालिया नज़रों से देखा, जैसे वो मेरी बातों पर यकीन न कर पा रहे हों। मैंने उनके हाथ को अपने हाथों में थाम लिया और आश्वासन देती हुई नज़रों से उनकी तरफ देखा।
मैं थोड़ी देर और अंकल के पास बैठा रहा, फिर उन्हें नमस्ते करते हुए विदा ली और घर आ गया। घर पहुँचकर मैं सीधा दुकान पर जाकर बैठ गया। उधर मम्मी घर जाकर अपना कामकाज निपटाने लगीं, इधर मैं मन ही मन योजना बनाने लगा कि इस विषय पर मम्मी से कब और कैसे बात करूँ। थोड़ी देर के विचार मंथन के बाद, मैं अपने प्लान को कैसे अमल में लाना है, उसका पूरा खाका मन ही मन तैयार कर चुका था।
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दुकान पर बैठे बैठे मेरा मन बार बार उन बातों पर लौट रहा था जो अंकल ने कही थीं। मैंने मन ही मन योजना तो बना ली थी, लेकिन जैसे जैसे वह योजना मेरे दिमाग में साफ़ होती जा रही थी, वैसे वैसे मेरे सीने में एक अजीब सी घबराहट बढ़ने लगी थी।

एक तरफ अंकल का वह भरोसा था, और दूसरी तरफ मम्मी का वह चेहरा, जो शायद मेरे सच जानने के बाद पूरी तरह बदल जाएगा। क्या मैं वाकई इतना हिम्मत वाला हूँ? क्या मैं उस सच का सामना कर पाऊँगा जो मैं बोलने जा रहा हूँ? यह सवाल मेरे अंदर एक युद्ध छेड़ रहा था।

मेरा हाथ बार बार अपने माथे पर जा रहा था। एक अजीब सी झिझक मुझे बार बार रोक रही थी। "अगर मम्मी ने मुझे गलत समझा तो? अगर उन्होंने मुझे घर से ही निकाल दिया तो?" ये विचार किसी ज़हरीले सांप की तरह मेरे दिमाग में घूम रहे थे। योजना तो तैयार थी, पर उस योजना को हकीकत में बदलने के लिए जो कलेजा चाहिए था, वह जैसे कहीं खो गया था।

मैं दुकान के सामानों को बिना मतलब ही इधर उधर खिसका रहा था, बस इसलिए ताकि मेरा ध्यान उन विचारों से हट सके। पर जितना मैं भागने की कोशिश करता, उतना ही मेरा डर मुझे घेर लेता। मैं चाहकर भी खुद को यह यकीन नहीं दिला पा रहा था कि जो मैं करने जा रहा हूँ, वह सही है या गलत। बस एक ही चीज़ साफ़ थी रास्ता कठिन था और वापसी का कोई रास्ता नहीं था।

***

रात का खाना खत्म करने के बाद मम्मी ने किचन का सारा काम निपटाया और फिर हम दोनों कमरे में सोने चले गए। आज मम्मी ने बहुत ही महीन, गुलाबी रंग की नाइटी पहनी हुई थी, जिसमें वो बेहद खूबसूरत और खिलखिलाती हुई लग रही थीं। मैं अपने कुर्ते पजामे में बिस्तर पर लेटा हुआ था, लेकिन मेरा मन कहीं और था मैं अपने ही ख्यालों के भंवर में खोया हुआ था।

तभी मम्मी मेरे पास आकर लेटीं और उनका चुलबुलापन शुरू हो गया। उन्होंने शरारत भरी नज़रों से मुझे देखते हुए मेरे सिर पर हाथ फेरना शुरू किया। वो जानती थीं कि मैं सामान्य नहीं हूँ। उन्होंने थोड़ा करीब आकर, बड़े लाड़ और प्यार से मेरी आँखों में झाँकते हुए पूछा, "अरे ओ मेरे उदास शहज़ादे! आज क्या बात है? आज मेरा बच्चा इतना चुप चाप क्यों बैठा है? कहीं कोई परेशानी तो नहीं?"

उन्होंने मेरे गाल को धीरे से सहलाया और फिर एक प्यारी सी मुस्कान के साथ थोड़ा और करीब आकर फुसफुसाते हुए बोलीं, "मुझसे कुछ छुपा रहे हो क्या? देखो, अगर मुझसे कुछ कहना है तो कह दो, वरना मैं पूरी रात तुम्हें ऐसे ही तंग करती रहूँगी जब तक तुम मुस्कुरा न दो।" उनके इस चुलबुलेपन और बेपनाह प्यार ने माहौल को इतना हल्का और आत्मीय बना दिया कि मेरा मन चाहकर भी अपनी बात छुपा नहीं पा रहा था। उनकी आँखों में मेरे लिए वो बेइंतहा फिक्र और प्यार देखकर मेरा दिल पिघलने लगा।

मैंने एक फीकी सी मुस्कान के साथ अपनी नज़रें चुराते हुए कहा, "बस ऐसे ही मम्मी... कुछ खास नहीं।"
मेरे "कुछ खास नहीं" कहने पर मम्मी ने अपनी आँखें सिकोड़ीं और एक मासूम सा मुँह बनाकर मुझे घूरने लगीं। उन्होंने मेरा चेहरा अपने दोनों हाथों के बीच थाम लिया और बिल्कुल एक छोटे बच्चे की तरह लाड़ जताते हुए बोलीं, "अच्छा? कुछ खास नहीं? और ये जो चेहरा लटका हुआ है, ये भी कुछ खास नहीं है? मुझसे झूठ मत बोलो, मैं तुम्हारी माँ हूँ, तुम्हारी आँखों में देखकर ही समझ जाती हूँ कि मेरे बच्चे के मन में कुछ चल रहा है।"

उन्होंने मेरे माथे को चूमते हुए और धीरे धीरे सहलाते हुए बड़े ही प्यार से कहा, "चलो अब जल्दी से बताओ, क्या बात है? अगर नहीं बताओगे तो मैं नाराज़ हो जाऊँगी और फिर तुम्हें बिल्कुल प्यार नहीं करूँगी। बोलो, क्या हुआ है मेरे प्यारे बच्चे को?"
मैंने कहा, "रहने दो मम्मी... न बताने से तो शायद आप नाराज़ न हो, पर लगता है कि बता दिया तो ज़रूर नाराज़ हो जाओगी।"
मम्मी बोलीं, "बताओ बेटा, मैं नाराज़ नहीं होऊंगी।"
मैंने कहा, **"मम्मी... वो... दरअसल बात कुछ ऐसी है कि मैं समझ नहीं पा रहा कि कैसे कहूँ। मुझे डर लग रहा है कि कहीं आप मुझे गलत न समझ लें या मुझसे नाराज़ न हो जाएँ।"** मेरी आवाज़ में एक अजीब सी थरथराहट थी और मैं उनकी आँखों में देखने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। मेरा गला सूख रहा था और दिल की धड़कनें इतनी तेज़ थीं कि मुझे लग रहा था जैसे वे मेरे कानों में सुनाई दे रही हों।

मम्मी ने मेरी घबराहट को भांप लिया। उन्होंने मेरा चेहरा अपने हाथों में और भी मजबूती से थाम लिया और बहुत ही कोमल स्वर में बोलीं, **"अरे पागल, डर कैसा? मैं तुम्हारी माँ हूँ। दुनिया की कोई भी बात हो, तुम मुझसे क्यों डर रहे हो? जो भी है, बिना डरे कह दो। मैं वादा करती हूँ कि मैं नाराज़ नहीं होऊँगी।"**

उनका यह आश्वासन सुनकर एक पल के लिए मुझे हिम्मत मिली, लेकिन अगले ही पल मेरा मन फिर से उसी कश्मकश में फंस गया। मैं सोच रहा था कि क्या मैं वाकई वो सब कह पाऊँगा जो मेरे दिमाग में चल रहा है? क्या मैं उन्हें वो सच बता पाऊँगा जो शायद हमारे रिश्ते की परिभाषा ही बदल दे? मेरा हाथ कांप रहा था और मैं बस उनके स्पर्श को महसूस करते हुए उस सच को अपने होंठों तक लाने की कोशिश कर रहा था जो मेरे अंदर एक तूफान की तरह उठ रहा था।
मैंने मम्मी की आँखों में देखते हुए अपनी आवाज़ को थोड़ा और धीमा और गहरा कर लिया। मैं जानता था कि मैं किस रास्ते पर चल रहा हूँ, लेकिन मेरा लक्ष्य साफ़ था। मैंने धीरे से उनका हाथ अपने हाथ में लिया और कहा, **"मम्मी,मै सोच रहा था कि अंकल का अब घर आना जाना कम हो गया है... क्या आप उन्हें याद नहीं करतीं? मतलब, मेरा मतलब है कि वो भी तो आपको बहुत पसंद करते थे, और आप भी तो उन्हें पसंद करती थीं ना ,फिर add अब क्यों नहीं आते वो?"**

मम्मी के चेहरे पर एक पल के लिए एक अजीब सी चमक आई, जो तुरंत ही शर्मिंदगी में बदल गई। उन्होंने अपनी नज़रें चुरा लीं और एक लंबी साँस भरते हुए बोलीं, **"रवि, तू ये क्या बातें कर रहा है? वो सब पुरानी बातें हैं। अब वो नहीं आते, तो क्या हुआ? बेटा... सच तो ये है कि मैं नहीं चाहती थी कि तुझे कभी बुरा लगे। मुझे डर था कि अगर वो यहाँ आए और हमारे बीच वो सब हुआ जो पहले हुआ करता था, तो शायद तू मुझे अलग नज़र से देखने लगेगा। मैं नहीं चाहती थी कि मेरी वजह से तेरे मन में मेरे लिए कोई गलत विचार आए। इसलिए मैंने ही उन्हें मना कर दिया कि वो अब यहाँ न आएँ। तेरे लिए तो बेटा, मैं कुछ भी कुर्बाानी देने को तैयार हूँ।"**

मैंने हार नहीं मानी। मैं थोड़ा और करीब आया, उनके और भी करीब, ताकि मेरी मौजूदगी का अहसास उन्हें पूरी तरह महसूस हो। मैंने उनके कान के पास झुककर बहुत ही कोमल स्वर में कहा, **"पर मम्मी, क्या आपको सच में उनकी कमी महसूस नहीं होती? वो जो नज़दीकियाँ थीं, वो जो प्यार था... क्या वो सब बस एक सपना था?"**

मम्मी का चेहरा लाल हो गया। वे मेरी बातों के पीछे के इरादे को पूरी तरह तो नहीं समझ पा रही थीं, लेकिन उन्हें अपनी भावनाओं की हलचल साफ़ महसूस हो रही थी। उन्होंने मेरा हाथ झटकने की कोशिश की, पर उनके हाथ में वो ज़ोर नहीं था। उन्होंने एक गहरी साँस ली और मेरी आँखों में देखते हुए बड़े ही भावुक और दृढ़ स्वर में कहा, **"नहीं रवि... अब मुझे किसी और की ज़रूरत नहीं है। अब तू है ना मेरा ख्याल रखने के लिए, मेरा साथ देने के लिए। मुझे किसी और की क्या ज़रूरत?"**

उनका यह कहना कि 'अब तू है ना मेरा ख्याल रखने के लिए', मेरे अंदर एक अजीब सी उत्तेजना और जीत का अहसास जगा गया। उनके इस वाक्य ने अनजाने में ही मुझे वो जगह दे दी थी जिसकी मुझे तलाश थी। अब खेल और भी गहरा होने वाला था।
"अब तू है ना मेरा ख्याल रखने के लिए" यह वाक्य सिर्फ एक माँ का अपने बेटे के प्रति भरोसा ही नहीं , पूर्ण समर्पण की भावना से ओत प्रोत था।"पर मेरे मन में तो कुछ और ही था न, और वो थी मेरे ,मम्मी और अंकल के बीच threesom की भावना।

मैंने धीरे से अपना हाथ उनके चेहरे से नीचे खिसकाते हुए उनके कंधे पर रखा। उनकी साँसें अब तेज़ हो चली थीं और उनके शरीर में एक हल्की सी थरथराहट महसूस हो रही थी। मैंने उनकी आँखों में आँखें डालकर, बेहद धीमी और गहरी आवाज़ में कहा, **"मम्मी, आप मेरे लिए इतना कुछ करने को तैयार हैं... पर क्या आप जानती हैं कि आपका ये ख्याल रखना मेरे लिए क्या मायने रखता है? आप कहती हैं कि आपको किसी और की ज़रूरत नहीं है, पर मुझे पता है आप ये सिर्फ मेरी खुशी के लिए कह रही हैं क्योंकि आप मुझे बहुत प्यार करती हैं,मम्मी आप मेरे लिए इतना त्याग कर सकती हो तो मेरा भी तो फर्ज है कि मैं भी आप की इच्छाओं का ख्याल रखूँ, मम्मी मैं जनता हु के आप के दिल में अंकल के प्रति सम्मानजनक जगह है और मैं नही चाहता कि आप अपनी इच्छाओं का गला घोंट दो**

मम्मी ने अपनी पलकें झुका लीं, जैसे वो सच का सामना करने से डर रही हों। उनका चेहरा शर्म से सुर्ख हो चुका था। मैंने उनके और करीब झुकते हुए उनके कान के पास फुसफुसाया, **"अगर आप मेरे लिए इतना त्याग कर सकती हैं, तो क्या मैं आपको वो सब नहीं दे सकता जो आपको खुशी दे सके? मैं चाहता हूँ कि आप फिर से वही महसूस करें जो आप अंकल के साथ करती थीं... पर इस बार, मैं भी आपके साथ रहूँगा। मैं आपको वो सब दूँगा जो आपको चाहिए।"**

मम्मी के होंठ हल्के से काँपे। उन्होंने कोई विरोध नहीं किया, बस एक गहरी और भारी साँस ली। उनके शरीर की ढीली पड़ती पकड़ इस बात का सबूत थी कि उनका मन अब मेरी बातों के आगे हार मान रहा था। सैयद,उनके अंदर का कोई दबा हुआ अहसास अब बाहर आने को बेताब था।

मैंने उनके कंधे पर अपनी पकड़ थोड़ी मज़बूत की और महसूस किया कि उनका शरीर अब पूरी तरह से मेरी छुअन के प्रति संवेदनशील हो चुका था। मैंने उनके माथे को चूमते हुए कहा, **"मम्मी, आज से आपको कोई भी कमी महसूस नहीं होने दूँगा। मैं आपका ख्याल रखूँगा... बिल्कुल वैसे ही जैसे आप चाहती हैं।"**

कमरे में सन्नाटा था, लेकिन दोनों की तेज़ होती साँसों की आवाज़ साफ़ सुनी जा सकती थी। खेल अब सिर्फ बातों तक सीमित नहीं रहा था, अब भावनाओं और इच्छाओं का एक ऐसा भंवर शुरू होने वाला था जिससे वापस लौटना नामुमकिन था।
मम्मी ने मेरी आँखों में देखा , शायद उनको मेरी आँखों में अब सिर्फ एक बेटे का प्यार नहीं , बल्कि एक पुरुष की तीव्र चाहत और अधिकार दिखाई दे रहा था। मेरा हाथ अपने कंधे पर महसूस करके उनकी सांसें और उखड़ने लगीं।

मैने आगे बढ़ते हुए कहा, **"मम्मी, ख्याल रखने का मतलब सिर्फ ज़रूरतें पूरी करना नहीं होता... ख्याल रखने का मतलब होता है आपको उस सुकून में ले जाना जहाँ आप खुद को पूरी तरह भूल जाएँ। जहाँ आप सिर्फ और सिर्फ महसूस करें।"**

मम्मी ने कांपती आवाज़ में पूछा, "तू... तू क्या कहना चाहता है रवि?"

रवि ने उनके और करीब आकर उनके कान के पास झुककर फुसफुसाया, **"मैं चाहता हूँ कि हम तीनों मिलकर एक ऐसा रिश्ता बनाएँ, जहाँ कोई पर्दा न हो, कोई शर्म न हो। मैं चाहता हूँ कि आप अंकल के साथ और मेरे साथ, उस चरम सुख को महसूस करें जिसका सपना शायद हम तीनों ने देखा है।"**



मैंने मम्मी के चेहरे पर छाई उस घबराहट को महसूस किया। उनके होंठ थरथरा रहे थे और आँखों में एक अजीब सा डर और संकोच था। उन्होंने हड़बड़ाते हुए मुझसे कहा, **"ये... ये तू क्या बोल रहा है रवि? पागल हो गया है क्या तू?"**

उनकी इस बात पर मेरे चेहरे पर एक गहरी और मदहोश कर देने वाली मुस्कान आ गई। मैंने उनके और करीब जाकर, उनकी आँखों में सीधे देखते हुए बड़े ही शांत लेकिन दृढ़ स्वर में कहा, **"मम्मी, मैं आपको एक ऐसा सच बताता हूँ जिसका शायद आपको अंदाज़ा नहीं है। मुझे आपके और अंकल के बीच के उन गुप्त और गहरे संबंधों के बारे में सालों से पता है। सच तो यह है कि पिछले कुछ महीनों में मैंने आप दोनों को कई बार उस चरम सुख में डूबते हुए देखा है।"**

मम्मी का चेहरा शर्म से एकदम लाल पड़ गया। उन्हें तो अब तक यही लग रहा था कि मैने सिर्फ एक बार ही उन्हें अंकल के साथ देखा है। मैंने अपनी बात जारी रखी, **"क्या बताऊं मम्मी? कई बार मुझे ऐसा लगता था कि अंकल जानबूझकर मुझे दिखाते हुए आपके साथ सब कुछ कर रहे हैं। और मेरी यह बात सिर्फ मेरा वहम नहीं थी। मुझे याद है वो दिन जब अंकल ने मुझे देखते हुए ही आपको पकड़ लिया था, और दूसरी बार जब उन्होंने जानबूझकर कमरे की सारी लाइटें जला दी थीं ताकि मैं आपकी और उनकी उस क्रिया को पूरी स्पष्टता से देख सकूँ। मुझे यकीन है कि उन्हें भी इस बात से एक अलग ही उत्तेजना मिलती थी कि कोई उन्हें देख रहा है, और उस अहसास से उनकी प्यास और उत्तेजना कई गुना बढ़ जाती थी।"**

मैंने उनके कांपते हुए हाथों को अपने हाथों में थाम लिया और बड़े ही नशीले अंदाज़ में उनके कान के पास फुसफुसाया, **"मम्मी, सच तो यह है कि मैं भी वही चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ कि जब मैं आपको प्यार करूँ, जब मैं आपके शरीर की गहराइयों में उतरूँ, तो कोई पास बैठकर हमें निहार रहा हो। मैं महसूस करना चाहता हु कि वो एहसास किस्सा होता है जब आपको कोई मिलाप करते देख रहा होता है। मम्मी, आप तो जानती हैं कि अंकल के सिवा इस दुनिया में कोई ऐसा नहीं जिस पर हम इतना भरोसा कर सकें। इसलिए प्लीज मम्मी, मेरी इस ख्वाहिश को मान जाइए।"**

मैंने उनकी आँखों में देखते हुए कहा, मैं चाहता हूँ कि यह हमारे आने वाले समय का एक नया अध्याय बने। एक ऐसा रिश्ता जो हर रात, हर पल हमारे बीच की सारी मर्यादाओं को तोड़कर हमें एक नए और बेबाक अहसास से जोड़ दे।"**

मम्मी के चेहरे पर डर, शर्म और संकोच के मिले जुले भाव आ गए। वो बिल्कुल बेबस दिख रही थी, लेकिन उसकी वो बेबसी मुझे पागल कर रही थी।

उसने कांपती हुई आवाज़ में मुझसे कहा *'बेटा नहीं, ऐसा नहीं कर सकती। तेरे अंकल क्या सोचेंगे कि माँ बेटा में कैसे संबंध हैं... चोदने वाले?'*

जब उसके मुँह से वो शब्द निकले, तो मेरा पूरा शरीर उत्तेजना से भर गया। वो खुद को रोक रही थी, समाज का डर दिखा रही थी, लेकिन उसके शब्द कुछ और ही कहानी कह रहे थे। उसने आगे कहा *'और उनको ये सुनकर कैसा लगेगा कि कैसी औरत है जो एक ही समय पर अपने बेटे और यार के साथ सोना चाहती है!'*

उसकी ये बातें सुनकर मुझे लगा जैसे उसने खुद ही अपनी सारी पाबंदियाँ तोड़ दी हों। वो एक तरफ तो डर रही थी, लेकिन दूसरी तरफ वो अपनी उस गंदी इच्छा को भी स्वीकार कर रही थी। उसकी वो शर्म और वो गंदी बातें मुझे और भी ज़्यादा उसकी तरफ खींच रही थीं। मुझे समझ आ गया कि मेरी माँ के अंदर एक ऐसी औरत छिपी है जो मर्यादाओं की परवाह नहीं करती, जो बस अपनी प्यास बुझाना चाहती है।***
"उसकी बातें सुनकर मुझे एक पल के लिए लगा जैसे वो सच में डर रही है, लेकिन मैं जानता था कि ये सिर्फ एक दिखावा है, एक आखिरी कोशिश है खुद को बचाने की। मैंने उसकी आँखों में सीधे देखते हुए अपना तर्क उसके सामने रख दिया। मैंने उसे वो सच बताया जो हम तीनों के बीच एक गहरा राज बन चुका है।

मैंने बड़े शांत लेकिन भारी स्वर में उससे कहा, *'मम्मी, ये अंकल और समाज का डर दिखाना बंद करो। सच तो ये है कि अंकल को सब पता है हमारे और आपके बीच के इस संबंध के बारे में। वो सब जानते हैं कि हम क्या कर रहे हैं।'*

मैंने देखा कि उसके चेहरे पर एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। मैंने आगे बढ़ते हुए उसकी बात का जवाब दिया, *'जब हम तीनों एक दूसरे का राज जानते हैं, जब हम तीनों को पता है कि असल में क्या चल रहा है, तो फिर ये दिखावा करने की क्या जरूरत है? इसमें अब छुपाने जैसा कुछ बचा ही नहीं है।'*

मेरी ये बात सुनकर उसके चेहरे की वो शर्म और डर अब धीरे धीरे एक अजीब सी राहत और उत्तेजना में बदलने लगा था। उसे समझ आ गया था कि अब भागने का कोई रास्ता नहीं है, और शायद... शायद वो अब इस सच को स्वीकार करने के लिए तैयार थी।"
"उसकी आँखों में वो खौफ और उलझन देख कर मेरा दिल तो पिघल ही रहा था, लेकिन मेरा जुनून उससे कहीं ज्यादा गहरा था। मैं बस और इंतज़ार नहीं कर पा रहा था। मैंने धीरे से अपना हाथ आगे बढ़ाया और उसके कांपते हुए हाथों को अपने मजबूत हाथों में थाम लिया। उसकी त्वचा इतनी कोमल और गर्म थी कि जैसे मेरे स्पर्श से ही उसमें बिजली दौड़ रही हो।

मैंने उसके हाथों को कसकर पकड़ा और झुककर उसकी आँखों में सीधे झाँका। उसकी आँखों में आँसू थे, पर उनमें एक अजीब सी चमक भी थी। मैंने बहुत ही धीमी और भारी आवाज़ में, लगभग फुसफुसाते हुए उससे उसकी रजामंदी मांगी:

*'मम्मी... बस एक बार... अपनी आँखें बंद मत करना। बस एक बार मुझे अपनी सहमति दे दो। मुझे तुम्हारी वो सारी पाबंदियाँ नहीं चाहिए, मुझे बस तुम चाहिए। क्या तुम वाकई इस सच को स्वीकार नहीं कर पाओगी? क्या तुम वाकई मेरे और अंकल के साथ इस पागलपन को जीने से डर रही हो? बस एक बार हाँ कह दो...'*

उसकी आँखों में मैंने वो पल देखा जहाँ उसकी सारी मर्यादाएँ हार रही थीं। वो मेरी आँखों में देख रही थी, और मैं उसके उस मौन जवाब का इंतज़ार कर रहा था जो उसकी रजामंदी बन जाए।"

मम्मी ने एक गहरी और लंबी सांस ली। उनके शरीर की थरथराहट अब डर से नहीं, बल्कि एक दबी हुई उत्तेजना से थी। उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं मेरे कंधे को अपने हाथ से और ज़ोर से दबाते हुए कहा, **"अगर तुम्हारी यही इच्छा है... तो मैं अपनी सारी मर्यादाएँ तुम्हारे कदमों में रख देती हूँ। मुझे बस तुम्हे खुश रखना है।"**

यह सुनते ही मेरे अंदर जैसे ज्वालामुखी फट पड़ा। मैने एक झटके में मम्मी को अपनी ओर खींचा और अपने होंठ उनके होंठो पर रख दिए "
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Awesome and fascinating update
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Ekdum kamaal ka update hai yah
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Lajawab aur chamatkar update
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Very much interesting writing
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