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Misc. Erotica Kahani mere ghar ki
#1
Kahani mere ghar ki
"एक छोटा सा गाँव, जहाँ रिश्तों की अपनी मर्यादाएँ हैं... लेकिन उसी घर की चारदीवारी के भीतर एक ऐसा गुप्त खेल चल रहा है, जिससे पूरा परिवार अनजान है। एक माँ, जो अकेलेपन की बेबसी में मर्यादा की दीवारें तोड़ चुकी है, और उसका एक बेहद भोला-भाला बेटा रवि, जो सब कुछ अपनी आँखों के सामने देखकर भी अपनी नासमझी के कारण कुछ समझ नहीं पाता।
लेकिन क्या होता है जब वह नासमझ भोलापन धीरे-धीरे एक शातिर और गहरे मनोवैज्ञानिक ककहोल्ड (Cuckold) रोमांच में बदल जाता है? जब ब्लैकमेल की बजाय दिलों के तार जुड़ते हैं और बेटा ही अपनी माँ के गुप्त रिश्तों का सबसे बड़ा रक्षक और दर्शक बन जाता है?
पारिश्रमिक, रहस्य, और सस्पेंस से भरपूर एक ऐसी कहानी, जहाँ हर एक मोड़ आपकी उत्सुकता को चरम पर ले जाएगा। पहली पोस्ट आ रही है... दिल थाम कर बैठिए और किरदारों के इस अनोखे सफर का हिस्सा बनिए!"
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#2
दोस्तों, मैं पंजाब के एक छोटे से गाँव का रहने वाला हूँ। मेरा नाम रवि है और मेरी उम्र 22 साल है। आज जो कहानी मैं आपको सुनाने जा रहा हूँ, वह पूरी तरह से सच्ची घटनाओं पर आधारित है। आशा है कि आपको यह पसंद आएगी। आप सभी से अनुरोध है कि कहानी पढ़ने के बाद कमेंट करके अपनी राय ज़रूर व्यक्त करते रहें।"
दोस्तों, जैसा कि मैंने बताया मेरा नाम रवि है, घर से थोड़ी ही दूरी पर मेरा अपना एक जनरल स्टोर है, जिसे मैं संभालता हूँ।
मेरे परिवार में मेरे पापा श्री वेद प्रकाश जी हैं, जिनकी उम्र लगभग 45 वर्ष है और वे इस समय नोएडा की एक प्राइवेट कंपनी में सामान्य कर्मचारी (normal employee) के रूप में काम कर रहे हैं। मेरी माँ का नाम अंजली है, जिनकी उम्र 44 वर्ष है और वे एक गृहणी (housewife) हैं।"
हम कुल चार भाई-बहन हैं। मेरी बड़ी बहन नेहा, जो 26 साल की हैं, उनकी शादी लगभग दो साल पहले हो चुकी है। उनसे छोटी बहन अंकिता है, जिनकी उम्र 25 साल है और कुछ ही दिनों पहले उनकी भी शादी संपन्न हुई है। हमारा सबसे छोटा भाई, जो 18 वर्ष का है, इस समय पढ़ाई के सिलसिले में विदेश (videsh) में है। वैसे, उसका बचपन और ज़्यादातर समय हमारे मामा जी के घर पर ही बीता है, क्योंकि मामा जी की अपनी कोई संतान नहीं थी और उन्होंने उसे बहुत लाड-प्यार से पाला।"
पापा के एक बेहद करीबी दोस्त थे—प्रदीप अंकल। उनकी उम्र पापा से करीब तीन चार साल कम थी। प्रदीप अंकल हमारी दुकान पर काफी आते-जाते रहते थे और वे इसी इलाके में नौकरी करते थे। पापा के साथ उनकी गहरी दोस्ती की वजह से, पापा ने उन्हें हमारे घर में ही रहने के लिए एक कमरा दे रखा था।
बाद में जब पापा नोएडा नौकरी करने चले गए, तो घर में प्रदीप अंकल और मेरे छोटे भाई को मिलाकर कुल 6 सदस्य रहते थे—यानी मम्मी, मेरी दोनों बहनें, मैं, मेरा छोटा भाई और प्रदीप अंकल। जब कभी छोटा भाई मामा के घर चला जाता, तो पीछे घर में हम 5 लोग ही रह जाते थे।"
यह बात साल 2018 की है।उन दिनों हमारे घर के ही एक बाहरी कोने में हमारी जनरल स्टोर की दुकान थी। उस दुकान की बनावट कुछ ऐसी थी कि उसका एक बड़ा दरवाज़ा बाहर गली की तरफ खुलता था, जहाँ से ग्राहक आते थे। वहीं दुकान के अंदर एक छोटा दरवाज़ा भी था, जिसे हम सब घर में 'खिड़की' कहते थे, और वह खिड़की सीधे हमारे घर के आंगन की ओर खुलती थी।
पहले तो उस दुकान का पूरा काम मेरे पापा ही संभालते थे, लेकिन जब से वे नोएडा में नौकरी पर लगे थे, तब से पापा के जाने के बाद हम सभी परिवार वाले मिलजुल कर उस दुकान को संभालने लगे थे। दुकान की इस बनावट की वजह से घर और दुकान के बीच आना-जाना बहुत आसान रहता था।"
मैंने बचपन से ही घर में कई छोटी-बड़ी अजीब घटनाएँ देखी थीं, लेकिन उस दिन कुछ ऐसा हुआ जिसने मेरे मन की उत्सुकता को और बढ़ा दिया। उस दिन मेरी दोनों बहनें किसी रिश्तेदारी में बाहर गई हुई थीं। घर पर सिर्फ मैं और मम्मी ही थे
सुबह से ही हमारी मम्मी के चेहरे पर एक अजीब सी कशमकश, बेचैनी और उत्सुकता साफ़ दिखाई दे रही थी। मेरे बालमन को यह बिल्कुल समझ नहीं आ रहा था कि आखिर मम्मी किस बात को लेकर इतनी उलझन में हैं और रह-रह कर दरवाज़े की तरफ क्यों देख रही हैं। लेकिन दोपहर के समय जैसे ही प्रदीप अंकल की तरफ से एक आदमी हमारी दुकान पर कुछ सामान लेने आया, मम्मी के चेहरे पर एक राहत की लहर दौड़ गई और उनकी आँखों में एक अनोखी चमक आ गई।
मम्मी ने उसे तुरंत सामान देकर विदा नहीं किया, बल्कि जानबूझकर बातों में उलझाकर और सामान निकालने के बहाने उसे तब तक रोके रखा, जब तक कि दुकान पर खड़े बाकी के कस्टमर सामान लेकर चले नहीं गए। जैसे ही दुकान पूरी तरह खाली हुई और मम्मी ने उस आदमी से कहा—'सुनो जग्गू, प्रदीप भाई साहब को बोलना कि आज घर पर कोई नहीं है, वे अपना काम जल्दी निपटा कर आज शाम को जल्दी आ जाएँ।'
मम्मी ने यह बात सीधे मेरे सामने ही बोली थी। उस समय मेरी नासमझी का आलम यह था कि मैं यही समझ रहा था कि आज घर में कोई नहीं है और मम्मी अकेलेपन या किसी डर की वजह से अंकल को जल्दी बुला रही हैं ताकि घर में कोई पुरुष मौजूद रहे। वैसे तो वे रोजाना ही हमारे घर आ जाते थे, लेकिन कभी-कभी ऐसा भी होता था कि वे बाहर ही किसी दोस्त के यहाँ रुक जाते थे। इसलिए मम्मी ने वह मैसेज विशेष रूप से यह सुनिश्चित करने के लिए भिजवाया था कि आज उनका घर आना बिल्कुल पक्का हो जाए। मैसेज देने के बाद मम्मी अचानक पूरी तरह आश्वस्त होकर खुश हो गईं, और उनका यह अचानक बदलता रूप मेरे बालमन के लिए एक ऐसी पहेली था जिसे मैं सुलझा नहीं पा रहा था।
सच कहूँ तो, अंकल के आने की बात सुनकर कहीं न कहीं मैं भी अंदर ही अंदर बहुत खुश हो रहा था। मेरे खुश होने का कारण था कि वे जब भी घर आते थे, तो मेरे पास बैठकर बहुत अच्छी-अच्छी बातें करते थे, मुझे मज़ेदार जोक्स सुनाते थे और कई तरह की कहानियाँ सुनाकर मेरा मनोरंजन करते थे। उनके आने से घर का माहौल खुशनुमा हो जाता था, इसलिए वह एक उतावलापन और खुशी मेरे चेहरे पर भी साफ दिख रही थी।
लेकिन मुझे क्या पता था कि उस सीधे से संदेश के पीछे असली खेल कुछ और ही था। जब मम्मी उस आदमी से बात कर रही थीं, वे दोनों चुपके से एक-दूसरे को देख रहे थे। मम्मी ने अपनी आँखें हल्की सी झपकाईं और उस आदमी ने भी मुस्कुराते हुए सिर हिलाया। वे दोनों मेरे सामने ही आँखों ही आँखों में और इशारों में कुछ ऐसी गुप्त बातें कर रहे थे, जिसे मैं चाहकर भी नहीं समझ पा रहा था। शायद वह आदमी मम्मी के उस संदेश को बहुत अच्छी तरह समझ गया था, जो बात मुझे बहुत बाद में समझ आई। वह रहस्यमयी अंदाज़ में मुस्कुराया और सामान लेकर चला गया, जबकि मैं अपनी ही दुनिया में खुश था कि आज शाम को अंकल जल्दी आने वाले हैं और मुझे फिर से उनकी कहानियाँ सुनने को मिलेंगी
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#3
Mst he bhai mummy ki sewa me kami mat rakhna
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#4
(10-08-2026, 02:12 PM)Asli lund Wrote: Mst he bhai mummy ki sewa me kami mat rakhna
बिल्कुल भाई, मां की जरूरत का खयाल रखना हर बेटे का कर्तव्य है,उत्साहात करने के लिए शुक्रिया।
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#5
उस आदमी के दुकान से सामान लेकर जाने के बाद, मम्मी के चेहरे की वह रहस्यमयी मुस्कान काफी देर तक बनी रही। जैसे ही उन्हें यह पक्का भरोसा हो गया कि आज शाम को अंकल आना बिल्कुल निश्चित है, घर के अंदर उनकी व्यस्तता और गति दोगुनी हो गई। वैसे तो मम्मी रोज़ ही सलीके से रहती थीं, लेकिन उस दिन वे कुछ ज़्यादा ही खूबसूरती से तैयार हुई थीं। उन्होंने खुद को बहुत अच्छे से संवारा था और उनका वो हल्का गुलाब करती और काली सलवार उनके बदन को बहुत ही आकर्षक बना रहे थेे। रसोई में उनको खाना बनाते देखकर मेरे बालमन को तो यही लग रहा था कि मम्मी सिर्फ रात के खाने की तैयारी में जुटी हैं, लेकिन वास्तव में उनके भीतर एक अलग ही उत्सुकता हिलोरे ले रही थी। रसोई से प्रदीप अंकल के पसंदीदा पकवानों और मसालों की खुशबू आ रही थी। मम्मी ने न सिर्फ उनकी पसंद के विशेष खाने की तैयारी की थी, बल्कि उनके लिए कुछ खास मीठा भी बनाया था, जिसका वे हमेशा पूरा ख्याल रखती थीं। वे बार-बार रसोई से निकलकर बैठक के बड़े शीशे के सामने जातीं, अपनी कपड़ों को थको ठीक करतीं, अपने बालों को संवारतीं और फिर एक गहरी साँस लेकर वापस काम में लग जातीं। दोपहर ढलकर शाम होने को आई, तो मम्मी ने एक बार फिर उनके कमरे का चक्कर लगाया, वहाँ की चादर को बिल्कुल ठीक किया और खिड़की के पर्दों को एक खास कोण पर सेट कर दिया।
आखिरकार, शाम के करीब सात बजे जब बाहर थोड़ा अंधेरा घिरने लगा, तो दुकान के सामने एक जानी-पहचानी मोटरसाइकिल आकर रुकी। प्रदीप अंकल आ चुके थे। चूँकि वे लगभग रोज़ ही हमारे घर आते थे, इसलिए उनके आने में कोई औपचारिकता नहीं थी। उनके आते ही मम्मी के चेहरे पर जो चमक आई, वह देखने लायक थी। वे तुरंत रसोई से बाहर आईं। अंकल ने हेलमेट उतारा और बहुत ही शालीनता से मम्मी से कहा—'नमस्ते बहन जी, ' मम्मी ने बहुत ही सलीके से मुस्कुराते हुए जवाब दिया—'नमस्ते भाई साहब, आइए अंदर बैठिए, मैं आपके लिए चाय लाती हूँ।'
सब लोगों के सामने उनका एक-दूसरे को 'बहन जी' और 'भाईसाहब' कहना इतना स्वाभाविक था कि कोई भी उनके बीच के असली रिश्ते का अंदाज़ा नहीं लगा सकता था। लेकिन जैसे ही अंकल दुकान के अंदर आये, मम्मी ने बिल्कुल मेरे सामने खड़े होकर ही अंकल की तरफ देखा और अपनी आँखें हल्की सी मटकाकर बहुत ही कामुक अंदाज़ में मुस्कुरा दीं। वह इशारा सीधे मेरी आँखों के सामने हुआ था, लेकिन मेरी नासमझी और भोलेपन का आलम यह था कि मैं उसे देखकर भी कुछ समझ नहीं पाया। मुझे लगा कि यह तो बस रोज़ की तरह एक सामान्य बातचीत और स्वागत है। अंकल मम्मी के उस बेझिझक इशारे का मतलब समझकर अपनी धीमी मुस्कान दबाते हुए आकर मेरे पास दुकान पर बैठ गए। शायद इसलिए कि यदि उसी समय घर के अंदर चले जाते तो लोग गलत मतलब निकाल लेते,मैं इस बात से बेहद खुश था कि आज अंकल आ गए हैं और रात को मुझे फिर से उनसे मज़ेदार कहानियाँ और जोक्स सुनने को मिलेंगे, लेकिन मुझे यह बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि आज की रात मेरे और उनके बीच के इस पूरे समीकरण को हमेशा के लिए बदलने वाली है।"
हम दोनों आपस में बैठकर बातें कर ही रहे थे कि थोड़ी देर बाद मम्मी अंदर मंदिर में आरती-पूजा निपटा कर बाहर दुकान पर आईं। उनके हाथ में पूजा की थाली थी। उन्होंने बहुत ही कोमल मुस्कान के साथ हम दोनों को दुकान पर ही भोग का प्रसाद दिया। उस समय भी मम्मी और अंकल की नजरें एक पल के लिए आपस में मिलीं, लेकिन मैं प्रसाद खाने में व्यस्त था।
देखते-देखते रात के करीब आठ बज गए। अब दुकान पर ग्राहकों का आना बिल्कुल बंद हो चुका था और बाहर गली में धीरे-धीरे गहरा सन्नाटा पसरने लगा था। अंकल की बाइक को हमने पहले ही एहतियातन घर के अंदर सुरक्षित खड़ा कर दिया था। इसके बाद मैंने और अंकल ने मिलकर दुकान के शटर गिराए, ताला लगाया और हम सब घर के अंदर चले गए।
रसोई में मम्मी ने पहले ही अंकल की पसंद का सारा खाना और मीठा तैयार रखा था। जब हम सब रात के भोजन के लिए बैठे, तो खाने के दौरान मम्मी और अंकल के बीच लगातार आँखों ही आँखों में कुछ रहस्यमयी इशारे हो रहे थे। मम्मी कभी मुस्कुराकर अंकल को देखतीं, तो कभी अंकल अपनी नजरों से कोई गुप्त संदेश उन तक पहुँचाते। मेरा बालमन उस समय भी इतना भोला था कि मैं उनके इस मूक संवाद का असली मतलब ज़रा भी नहीं समझ पाया; मुझे लगा कि वे बस सामान्य रूप से एक-दूसरे के प्रति आदर दिखा रहे हैं।
खाना पीना खत्म होने के बाद, मैं और मम्मी और प्रदीप अंकल एक ही कमरे में सोने के लिए आए। कमरे में एक डबल बेड था, जिस पर मैं और मम्मी साथ सो गए। उसी बेड के पास लगी एक चारपाई पर प्रदीप अंकल सो गए। चारपाई पर लेटने के बाद अंकल ने हर बार की तरह अपनी पुरानी राजा-रानी वाली कहानी सुनाना शुरू किया। अंकल की आवाज़ का वह धीमा प्रवाह और दिनभर की थकान का असर ऐसा हुआ कि कहानी सुनते-सुनते मम्मी थोड़ी ही देर में गहरी नींद में सो गईं। मम्मी के सोने के बाद भी अंकल कुछ देर तक कहानी सुनाते रहे
कुछ देर बाद अंकल ने कहानी खत्म की और मुझसे बेहद धीमी आवाज़ में कहा—'चलो रवि बेटा, कहानी अब समाप्त हो गई है। अब तुम भी चुपचाप आँखें बंद करके सो जाओ और लाइट बंद कर दी।' उस समय रात के ठीक 10 बज चुके थे। पूरा कमरा अंधेरे में डूब गया, लेकिन मेरी आँखों में आज नींद का एक कतरा भी नहीं था; मेरा दिल किसी अनजानी उत्सुकता से तेज़ी से धड़क रहा था।
मैं बेड पर बिल्कुल शांत और सीधा लेटा रहा, मानो गहरी नींद में हूँ, लेकिन मेरी पूरी चेतना अंकल की हर एक हरकत पर टिकी थी। समय धीरे-धीरे सरकता रहा। जब रात के करीब 10:45बजे, अंधेरे में मुझे प्रदीप अंकल के हिलने-डुलने की आवाज़ आई। उन्होंने बहुत ही धीरे से, बिना कोई आवाज़ किए बेड पर करवट बदली और सोती हुई मम्मी को हौले से सहलाते हुए उठाने की कोशिश करने लगे..."


अंधेरे में मुझे बार-बार एक हाथ अपने शरीर के पास टच होता हुआ महसूस हो रहा था। । चूँकि मैं उनके बीच पहले भी कुछ अजीब शरारतें देख चुका था, इसलिए मुझे अंदाज़ा तो था, लेकिन उस उम्र में मैं इस रहस्य को समझ नहीं पाता था। बस मन में एक गहरी उत्सुकता होती थी कि वे दोनों आपस में ऐसा क्यों करते हैं।"
ना जाने किस उत्सुकता में मैंने अपना एक हाथ मम्मी के ऊपर रख दिया। तभी मुझे अंधेरे में ऐसा महसूस हुआ जैसे हमारे पलंग के पास कोई साया खड़ा है और मम्मी को अपनी तरफ खींचने की कोशिश कर रहा है। उसी पल मुझे एक बहुत ही धीमी और फुसफुसाती हुई आवाज़ सुनाई दी—'आ जा अब...'। लेकिन मम्मी दिनभर घर और दुकान के काम के कारण बुरी तरह थकी हुई थीं, इसलिए वे बहुत गहरी नींद में सो रही थीं।
तभी अंधेरे में प्रदीप अंकल ने अपना हाथ आगे बढ़ाया और शायद मम्मी का हाथ समझकर, उन्होंने मेरी बाज़ू को अपनी तरफ खींच लिया। इस अचानक हुई हलचल की वजह से मम्मी की नींद टूट गई और वे उठकर बोलीं—'क्या हुआ?' अंकल ने बहुत धीरे से कहा—'होना क्या है यार, आज इतना सुनहरा मौका मिला है और तुम हो कि इतनी गहरी नींद में सो रही हो।'
यह सुनकर मम्मी बेड पर उठकर बैठ गईं और बोलीं—'एक मिनट, लाइट जलाओ भाई साहब।' जी हाँ, मम्मी अंकल को 'भाई साहब' ही बुलाती थीं और अंकल भी मम्मी को 'बहनजी' ही कहते थे। जब मम्मी बेड से उठने लगीं, तो मैंने तुरंत अपनी आँखें बंद कर लीं ताकि उन्हें लगे कि मैं गहरी नींद में सो रहा हूँ। मम्मी ने मुझे आवाज़ दी—'रवि बेटा...'। उनके दो-तीन बार पुकारने के बाद मैंने आँखें खोलीं और बोला—'क्या है मम्मी?' मम्मी बोलीं—'चलो, उठो और बाथरूम कर लो।'
वैसे तो मम्मी रोज़ाना मुझे रात को 12 या 1 बजे उठाकर बाथरूम करवाती थीं, लेकिन जब मैंने सामने दीवार घड़ी पर देखा, तो अभी सिर्फ 11 ही बज रहे थे। खैर, मैंने उस समय ज़्यादा ध्यान नहीं दिया और बाथरूम करके वापस आकर लेट गया—यानी दोबारा सोने का नाटक करने लगा। मम्मी किचन में गईं और जो थोड़ा-बहुत काम बाकी था, उसे निपटाकर वापस कमरे में आईं। उन्होंने मुझे एक-दो बार आवाज़ देकर देखा और बुदबुदाईं—'सो गया दोबारा।' इसके बाद उन्होंने कमरे की लाइट बंद कर दी। मैंने सोचा कि मम्मी अब वापस आकर मेरे पास बेड पर सो जाएँगी, लेकिन तभी जो हुआ उसने मुझे चौंका दिया... मम्मी बहुत धीरे से सीधे जाकर चारपाई पर अंकल के साथ लेट गईं।"
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#6
Nice update
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#7
(11-08-2026, 10:19 AM)sdd2686 Wrote: Nice update

Thanks dost,bane rahiyega
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#8
Agle update kab tak daaloge bro
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#9
Ab uncle mummy ki qchche se sewa kare puri rat baki he
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#10
(11-08-2026, 01:46 PM)Asli lund Wrote: Ab uncle mummy ki qchche se sewa kare puri rat baki he

पूरी रात नहीं भाई,मम्मी तो पहले ही थकी हुई है,सुबह जल्दी दुकान पर भी जाना है
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#11
Dukan jana jaruri nahi mummy ko maza milna jauri he jo mummy ki dono tango k beech me he aur uncle ke underwear Mr he
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#12
(11-08-2026, 08:41 PM)Asli lund Wrote: Dukan jana jaruri nahi mummy ko maza milna jauri he jo mummy ki dono tango k beech me he aur uncle ke underwear Mr he

Dekho  kya hota hai
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#13
आज जब मैं काफ़ी साल बाद अपनी जिंदगी के इस सबसे बड़े राज़ को आप सबके सामने लिख रहा हूँ, तो मेरे मन में यह बात साफ़ है कि उस रात कमरे में घना अंधेरा था। एक पाठक के तौर पर आपके मन में यह सवाल उठना लाज़मी है कि जब वहाँ ज़रा सी भी रोशनी नहीं थी, तो मुझे उन बारीक शारीरिक हरकतों का एक-एक विवरण इतनी साफ़-साफ़ कैसे मालूम चला? सच कहूँ तो, उस रात बिस्तर पर लेटे-लेटे मैंने केवल उन दोनों की तेज़ होती साँसों की आवाज़ें, कपड़ों के सरकने की सरसराहट और मम्मी के मुँह से निकली बेहद धीमी सिस्कियाँ ही सुनी थीं। लेकिन आज, जब मैं एक वयस्क हो चुका हूँ और इन गुप्त संबंधों के खेल को पूरी तरह समझता हूँ, तो अपनी उसी समझ, कल्पना और बाद मे मिली कड़ियों के आधार पर मैंने उस अंधेरे के पीछे छिपी एक-एक बारीक सच्चाई को यहाँ बयां किया है। उस समय भले ही मेरा बालमन केवल आवाज़ों को सुनकर कशमकश में डूबा था, पर आज मैं उस अंधेरे के भीतर छिपे हर एक कामुक पल को बिल्कुल साफ़-साफ़ बयां कर पा रहा हूँ।"

तभी चारपाई पर हल्की सी हलचल हुई और कपड़ों की हल्की सरसराहट की आवाज़ आने लगी। शायद उन दोनों ने करवट बदली थी ताकि वे एक-दूसरे के आमने-सामने आ सकें। इसके बाद कुछ देर तक कोई बड़ी हलचल नहीं हुई, लेकिन आपस में फुसफुसाहट की बहुत ही धीमी आवाज़ सुनाई देने लगी। वह आवाज़ कुछ अस्पष्ट थी, इसलिए मैंने बहुत धीरे से करवट बदली और उनकी बातों को समझने की कोशिश करने लगा।
लेकिन अब वहाँ फुसफुसाहट नहीं, बल्कि चूमने (kiss) की धीमी-धीमी आवाज़ें आने लगी थीं। उस अंधेरे में यह समझ पाना मुश्किल था कि कौन, किसको और कहाँ पर किस कर रहा है। तभी अचानक मम्मी की एक हल्की सी सिस्कारी सुनाई दी—'सीइइइइइ... काटो मत, निशान पड़ जाएगा।' उनके इस वाक्य को सुनते ही मुझे तुरंत समझ आ गया कि प्रदीप अंकल मम्मी को चूम रहे हैं।
अब मैं बिस्तर पर लेटे-लेटे पूरी टकटकी लगाकर उस अंधेरे में देखने लगा। धीरे-धीरे मेरी आँखें अंधेरे की आदी हो चुकी थीं, जिससे मुझे दो धुंधले साये दिखाई देने लगे। मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे उन दोनों में से एक जना उठकर दूसरे के ऊपर लेट गया हो। इसके बाद चूमने की आवाज़ें पहले से थोड़ी और ज़्यादा तेज़ आने लगीं। ऐसा लग रहा था कि दोनों पूरी तन्मयता से एक-दूसरे को चूम रहे हैं, पर अब तक मैं यह साफ़ नहीं समझ पा रहा था कि नीचे कौन है और ऊपर कौन। इधर उन दोनों की इस हलचल को सुनकर मेरी उत्सुकता और उत्तेजना से बुरी हालत हो रही थी। मेरा दिल अंदर ही अंदर कर रहा था कि काश! काश ये दोनों लाइट जलाकर एक्शन में आएँ, ताकि मैं सब कुछ साफ़-साफ़ देख सकूँ।"
चारपाई से आने वाली उन मदहोश करने वाली आवाज़ों और आहों को सुनकर बिस्तर पर लेटे-लेटे मेरी हालत खराब हो रही थी। यह सब देखना और सुनना मेरे दिमाग को पूरी तरह सुन्न कर रहा था और मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धक-धक करने लगा था। उस अंधेरे कमरे में मेरा मन कई तरह की कल्पनाओं में खो गया था—कभी दिल करता कि काश वे दोनों मुझे भी अपने पास उसी चारपाई पर बुला लें, तो कभी मन में यह अजीब सी इच्छा जागती कि मम्मी खुद अंकल को छोड़कर मेरे पास आएँ और मेरे साथ भी वही सब कुछ करें जो अभी वहाँ चल रहा था।
सच कहूँ तो, मेरे सामने होने वाला वह नज़ारा मेरी उम्र के हिसाब से मुझे हद से ज़्यादा उत्तेजित कर रहा था। उस चरम उत्तेजना के कारण मेरे शरीर में एक अजीब सी गर्मी दौड़ने लगी थी और बिना सोचे-समझे, ना जाने कब मेरा हाथ अपनी पैंट के अंदर मेरे lund पर चला गया। उस समय तक वह पूरी तरह से कड़ा होकर खड़ा हो चुका था। अपनी इस अनजानी और तीव्र शारीरिक प्रतिक्रिया से मैं खुद हैरान था, लेकिन उस रोमांच को रोक नहीं पा रहा था और अंधेरे में लेटे-लेटे ही मैं उसे धीरे-धीरे सहलाने लगा ताकि अपनी उस बेचैनी को थोड़ा शांत कर सकूँ।"
तभी अंधेरे में मम्मी की बेहद हल्की और घबराई हुई आवाज़ सुनाई दी—'कपड़े मत उतारो, यदि रवि जाग गया तो मुश्किल हो जाएगी।' प्रदीप अंकल ने अपनी गहरी आवाज़ में कहा—अरे रंडी फुदी मारने का असली मजा तो पूरे कपड़े उतार कर ही आता है।' मम्मी थोड़ा हिचकिचाते हुए बोलीं—'नहीं भाई साहब, इसीलिए तो आज मैंने यह नाइटी पहनी है ताकि इसे पूरा उतारे बिना भी हमारे इस मज़े में कोई खलल ना पड़े।'
अंकल थोड़ा आक्रामक अंदाज़ में बोले, बहानचोद तू मानेगी नही,और तभी मुझे ऐसा लगा कि दो हाथों ने मम्मी की नाइटी को गले तक ऊपर की तरफ खिसका दिया है। इसके तुरंत बाद अंकल मम्मी के दोनों बूब्ज को अपने दोनों हाथों से दबाने लगे।
कमरे में मम्मी की धीमी सिसकियाँ और आहें गूँजने लगी थीं—'आह... सीइइ... हाँ, दबाओ मेरे राजा, मेरे बच्चे... आओ, आज मेरा दूध नहीं पियोगे आह... सीइइ... ओहो...'। तभी अंकल मम्मी के दूध बारी-बारी से मुँह में लेकर चूसने लगे। इस दौरान मम्मी पूरी तरह मजे के आलम में खो चुकी थीं; वे कभी अपनी उंगलियाँ अंकल के बालों में फिरा रही थीं, तो कभी उनकी पीठ को सहलाकर उन्हें और अपने करीब खींच रही थीं।"
मम्मी का मम्मा अंकल के मुँह में जाते ही चारपाई पर हलचल और बढ़ गई। नाइटी अब उनके सीने तक ही सिमटी पड़ी थी। अँधेरे में भी मुझे साफ़ महसूस हो रहा था कि अंकल के होंठ एक से दूसरे मम्मे पर घूम रहे हैं—कभी दायाँ दबाकर चूसते, कभी बायाँ। मम्मी की साँसें अब और तेज़ हो चुकी थी
आह… धीरे… दाँत मत गड़ाओ…” उनकी आवाज़ कंपकंपा रही थी, फिर भी अंकल को रोक नहीं थी रही। “उधर थोड़ा नीचे… हाँ… वहीं…”मम्मी शायद कही और दबाने को कह रही थी।
अंकल ने जवाब में कुछ नहीं कहा। बस एक गहरी आह सी आवाज़ निकाली और मम्मी के बूब्स को और ज़ोर से भींच लिया। नाइटी के ऊपर का हिस्सा अब पूरी तरह बेकार हो चुका था। मुझे कपड़े के और सरकने की आवाज़ सुनाई दी—अंकल का एक हाथ नीचे की तरफ़ बढ़ रहा था।
मम्मी अचानक सहम गईं।नहीं… वहाँ मत… रवि…”
“रवि सो रहा है,” अंकल की आवाज़ धीरे बोलने पर भी भारी थी। “और तू अब चुपचाप मज़ा ले, हरामजादी। इतने दिन बाद मिली है।”उनके हाथ ने नाइटी के नीचे घुसकर कुछ ऐसा किया कि मम्मी की जाँघें अपने-आप खुल गईं। मैंने साफ़ सुना—गीली सी, धीमी फिसलन की आवाज़। उँगली… या दो उँगलियाँ… अंदर-बाहर। “सीइइइ… अह्ह्ह… निकाल… नहीं… अंदर ही…” मम्मी की सिस्कारी अब दबी हुई भी काबू में नहीं रह रही थी। “भाई साहब… बाथरूम में… चलो न… यहाँ…रवि”
“चुप gasty यहीं चोद चोदकर तेरा भोसड़ा फाडूगा” अंकल ने साफ़ कहा। “तेरी नाइटी में ही। जैसे तू चाहती थी।”
चारपाई चरमराई। एक धुँधला साया उठकर दूसरे के बीच आ गया। कपड़ों के खुलने, सरकने और फिर शरीर के चिपकने की आवाज़ एक के बाद एक आई। मम्मी ने एक लंबी, थरथराने वाली साँस ली—जैसे कुछ मोटा, गरम और सख्त चुत में धकेल दिया गया हो।“आह्ह्ह… धीरे… पूरा… मत…डालो”
“पूरा ही जाएगा, रंडी। आज तू रो भी ले तो मैं नहीं रुकने वाला।”। हाईं… मर गई… मर गई मैं…”
“फट गई… भाई साब… फट गई मेरी…”
“अरे बाप रे… इतना मोटा… धीरे… धीरे न …करो”
“मम्मी… बच बचा लो मुझे… ये तो फाड़ देगा…”
“ह्ईं राम… पूरा अंदर… पूरा घुस गया…”हाय पापा,आज नहीं बचती तुम्हारी प्यार बेटी,
“निकल bhadve… थोड़ा बाहर निकाल… दर्द हो रहा है… हाय…”
“रंडी बना दीया मुझे… तूने… फट गई मेरी चूत…”
“बचा… बचा ले कोई… ये लंड तो मार डालेगा…”
“आह्ह… रुको… रुको भाई साहब… सहन नहीं हो रहा…”
“इतना अंदर… कोख तक… ह्ईं मर गई…”रवि बच्चा ले अपनी माँ को ,मर डालेगा ये हवसी
“ धीरे कर… फट जाएगी… पूरी फट जाएगी मेरी…”
“हाय माँ… ये हैवान… चोद के मार डालेगा…”
“निकाल ले बाहर … थोड़ा… फिर डाल… हाय… दर्द… मज़ा… दोनों
पूरा ले लिया… देख… पूरा लंड… अंदर है मेरी चूत में…”
“मा। मर गई रे… आज तो फट ही गई मेरी phudhy
अब धक्कों की आवाज़ शुरू हो गई थी।
धीमी, नियमित, चारपाई के साथ मिलकर। हर धक्के पर मम्मी की हल्की सिसकी—कभी दबी, कभी लंबे और गहरे सांस के रूप में। अंकल की साँसें उनके गले और कान के पास गरम-गरम टकरा रही होंगी;
मुझे अंकल की फुसफुसाहट सुनाई दी—
“कितनी गीली हो रही है तू… मेरे लंड के लिए… सोच,तेरा बेटा पास में सोया है…”
मम्मी -“चुप… करो… आह… और ,इतनी ज़ोर से मत…”
“मै तो तेज़ तेज़ ही चोदूंगा। बोल—किसका ले रही है?”
तुम्हारा…”
“साफ़ बोल।”
“प्रदीप… आपका… लंड… ले रही हूँ… आह्ह्ह…”
मेरा हाथ अपनी पैंट के अंदर अब और तेज़ी से चल रहा था। अँधेरे ने सब कुछ छुपा रखा था, पर आवाज़ें इतनी साफ़ थीं कि दिमाग खुद-ब-खुद तस्वीर बना रहा था—मम्मी की नाइटी कमर तक उठी हुई, जाँघें खुली, अंकल उनके ऊपर या पीछे, कमर झुकाए, पूरे जोर से अपना लंड अंदर घुसेड़ते हुए। कभी-कभी चारपाई ज़ोर से हिलती; कभी मम्मी का हाथ अंकल की पीठ या बालों में उलझने की हल्की आवाज़ आती।
“मैं… आने... वाली … हूँ… बस… और… अंदर…” उनकी आवाज़ अब टूट-टूटकर निकल रही थी। “आज… बाहर...निकालना… मत… अंदर ही… गिरा दो... गिरा दो ...अंदर ही अपना अमृत। अंकल हँसा
—अंदर ही दूंगा। तेरी कोख में। फिर देखना सुबह कैसे सती सावित्री बनती है रवि के सामने।”
धक्के अब तेज़ हो गए थे। मांस और पसीने की हल्की सी गंध कमरे में घुलने लगी थी—या शायद वह मेरी ही उत्तेजना का भ्रम था। मम्मी की आहों ने एक लय पकड़ ली थी; हर बार अंकल का लंड पूरा अंदर जाता तो तो उनके मुंह से आह की आवाज़ और मम्मी के मुंह से अलग अलग रूप में सिसकियां एक लयबद्ध रूप में निकलती। मैंने अपने लंड को और कसकर पकड़ा। उस नादानी वाली उम्र में भी शरीर समझ चुका था कि यह खेल अब चरम के करीब है।कुश ही पल बाद मेरे लंड से पिचकारी निकली जिसे मैने अपने अंडरवियर में ही रोक लिया और पूरी तरह निकलने के बाद मैने धीरे से पहले पेंट खोली फिर अंडरवियर से, लंड से निकले लावे को साफ किया और बेड के नीचे दूर तक फेंक दिया ताकि कोई भी पहले उठे तो उसे दिखाई न दे और पैंट पहन ली।

तभी मम्मी की एक लंबी, दबी हुई चीख निकली—तकिए में मुँह गड़ाकर। शरीर की कंपन की आवाज़ चारपाई तक आई। अंकल ने कुछ पल और ज़ोर लगाया, फिर एक गहरी, जानवर जैसी आवाज़ के साथ रुक गया। कमरे में कुछ क्षणों तक सिर्फ़ दोनों की हाँफती साँसें गूँजती रही।

भर दिया…” अंकल ने धीरे से कहा। “पूरा।”
मम्मी ने जवाब में सिर्फ़ एक थकी, काँपती सिसकारी दी ।थोड़ी देर बाद ममी धीरे से बोली,,"निकालो बाहर चिप चिप हो रही है“”अंकल बोले
“अंदर ही रहने दे। सुबह तक। मेरा निशान।”
नाइटी फिर से नीचे खिसकाई गई। कपड़ों के व्यवस्थित होने की हल्की सरसराहट। चारपाई पर दोनों फिर करवट लेकर लेट गए—जैसे कुछ हुआ ही न हो। पर कमरे की हवा अब पहले जैसी नहीं थी। और न मैं।
मैं अँधेरे में पत्थर की तरह पड़ा रहा। और कान उन आखिरी साँसों पर टिके हुए थे। उस रात मैंने कुछ नहीं बोला। न हिला। । बस लेटा रहा—और पहली बार समझा कि कुछ राज़ आवाज़ों से भी साफ़ सुनाई दे जाते हैं

दोस्तों, कहानी का यह भाग आपको कैसा लगा? मेरे इस वयस्क नजरिए और उस रात की रहस्यमयी शुरुआत ने आपके मन में कितनी उत्सुकता जगाई है, मुझे कमेंट करके ज़रूर बताएं। आपका एक-एक कमेंट मुझे आगे की कहानी को और भी बारीकी और रफ्तार से लिखने के लिए बहुत मोटिवेट (motivate) करेगा। इस पूरी घटना में आपको हमारी मम्मी का रूप, उनकी कशमकश या उनका वह गुप्त अंदाज़ कैसा लगा? मम्मी के किरदार के बारे में आपके मन में जो भी विचार आ रहे हों—चाहे अच्छे हों या बुरे—आप नीचे कमेंट बॉक्स में पूरी तरह खुलकर लिख सकते हैं। आपके हर एक कमेंट का मुझे बेसब्री से इंतज़ार रहेगा!"
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#14
bahut bahut hot aur masaladar writings! bahut khoob.
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#15
(12-08-2026, 02:21 PM)Ella Wrote: bahut bahut hot aur masaladar writings! bahut khoob.

Thanks aap ko Anjali se fir milwata hu ,intjar kijiye.
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#16
wah! bahut hi garam aur behad hi kamuk kahaani hai yah! Yes, please add more hotter, erotic, exciting and double meaning naughty conversations. Hats off! 
Namaskar Namaskar Namaskar
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#17
(12-08-2026, 02:34 PM)Renuka Shahane Wrote: wah! bahut hi garam aur behad hi kamuk kahaani hai yah! Yes, please add more hotter, erotic, exciting and double meaning naughty conversations. Hats off! 
Namaskar Namaskar Namaskar

धन्यवाद रेणुका जी,आप सब का ऐसे ही सहयोग मिलता रहा तो आपकी उम्मीदों पर खरा उतरने की भरपूर कौशिश करुगा।
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#18
Bahut badhiya update
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#19
(12-08-2026, 04:17 PM)Nomita Wrote: Bahut badhiya update

जी धन्यवाद!
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#20
ekdom garma garam update
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