25-08-2026, 05:19 AM
Ekdum dhamadar aur fataka update
|
Adultery FLAT MATE
|
|
26-08-2026, 11:26 AM
26-08-2026, 11:29 AM
(13-08-2026, 02:03 PM)Sara Khan Wrote: kamaal ka update (13-08-2026, 02:10 PM)Fanfunda Wrote: Blockbuster and super excellent update! (14-08-2026, 05:26 PM)रसगुल्ला Wrote: very nice update (20-08-2026, 01:42 PM)jamanuram Wrote: It's being a long gap , could you please bring a big update (21-08-2026, 08:55 AM)Rexd_101 Wrote: Waiting for update (24-08-2026, 07:41 AM)momass Wrote: please update (24-08-2026, 08:44 PM)KkkNad Wrote: Good going superb , Please Update In Next 2 days.
27-08-2026, 12:01 AM
30-08-2026, 10:30 PM
Hopefully you update it after being 4 days long gap, I know it's difficult and passionate job to write such story, but at other side the readers are still waiting, please update
30-08-2026, 10:35 PM
एपिसोड 22: नाकाम साज़िश
संदेह की आग जब मन में जल रही हो, तो नींद और चैन दोनों जलकर राख हो जाते हैं। उस रात जब मैं दफ्तर से घर लौटा था, तो मेरा दिमाग सिर्फ उस एक ख्याल पर अटका हुआ था—मम्मी की वह पुरानी डायरी। उस पन्ने पर लिखा हर शब्द मेरे लिए या तो इस मानसिक बीमारी का इलाज साबित होने वाला था, या फिर मेरी बची-कुची दुनिया को हमेशा के लिए तबाह करने वाला था…. अगली ही सुबह, मैंने अपने प्लान के पहले चरण को अंजाम दिया… मैंने बिस्तर से उठते ही अपना सिर थाम लिया और एक झूठी कराह के साथ लेट गया। "देव! क्या हुआ बेटा?" मम्मी तुरंत मेरे कमरे में भागती हुई आईं --- उनके चेहरे पर वही पुरानी, जानी-पहचानी फिक्र थी। उन्होंने मेरे माथे पर हाथ रखा, "बुखार तो नहीं लग रहा, पर चेहरा बहुत उतरा हुआ है।" "मम्मी, रात से ही बहुत तेज सिरदर्द और बदन दर्द है। आज दफ्तर जाने की हिम्मत बिल्कुल नहीं है," मैंने अपनी आवाज में एक बनावटी कमजोरी लाते हुए कहा। शुरुआत में मम्मी बहुत ज्यादा परेशान हो गईं… वह कभी पानी का गिलास लातीं, तो कभी विक्स मलने की जिद करने लगतीं। उनका यह पुराना, ममता से भरा रूप देखकर एक पल के लिए मेरा दिल पसीज गया। मुझे खुद पर ग्लानि महसूस हुई कि मैं एक शरीफ, फिक्रमंद माँ के सामने बीमारी का नाटक कर रहा था। लेकिन जैसे ही मैंने उन्हें समझाया कि यह सिर्फ थकान और हल्के सिरदर्द का असर है और थोड़ा आराम करने से ठीक हो जाएगा, वह शांत हुईं --- और उनके शांत होते ही, उस शांत फ्लैट के भीतर का असली खेल शुरू हो गया। पूरे दिन घर में जो कुछ भी हुआ, उसने मेरी उस झूठी बीमारी को एक असली, खौफनाक मानसिक तड़प में बदल दिया। मैंने सोचा था कि, ‘मैं घर पर रुकूंगा, आराम करने का नाटक करूंगा, और दोपहर में जब हमेशा की तरह मम्मी बाज़ार के लिए निकलेंगी और इमरान अपने किसी काम से बाहर जाएगा, तब मुझे पूरे फ्लैट में अकेले रहने का मौका मिलेगा। मैं सीधे मम्मी के कमरे की अलमारी, उनके सूटकेस और तकियों के नीचे छान मारूंगा। उस डायरी को ढूंढकर या तो तुरंत पढ़ लूंगा, या फिर अपने फोन से हर पन्ने की तस्वीरें खींच लूंगा ताकि बाद में फुर्सत से उस कड़वे सच का विश्लेषण कर सकूँ…’ लेकिन मेरी किस्मत इतनी बदतर निकलेगी, इसका अंदाजा मुझे नहीं था। सुबह के करीब ग्यारह बजे से मैंने एक अजीब सी बात नोटिस करना शुरू की… मम्मी और इमरान के बीच बातचीत तो हो रही थी, लेकिन उसका पैटर्न बहुत संदेहास्पद था। जब भी वे दोनों हॉल में होते या मेरे कमरे के पास से गुजरते, तो उनकी आवाजें बहुत साफ और सामान्य होती थीं। "चाय में चीनी और डालूँ?" मम्मी हॉल से पूछतीं। "नहीं आंटी जी, बिल्कुल परफेक्ट है," इमरान डाइनिंग टेबल से जोर से जवाब देता। वे जब जोर से बात करते, तो बातें बिल्कुल मामूली, घरेलू और बेमतलब होती थीं। लेकिन जैसे ही वे दोनों रसोई में साथ होते, या इमरान के कमरे के आसपास होते, अचानक उनकी आवाजें एक रहस्यमयी फुसफुसाहट में तब्दील हो जाती थीं! मेरे कमरे का दरवाजा आधा खुला था। मैं बिस्तर पर लेटा-लेटा अपने कान दीवारों से सटाए रहता। रसोई से बर्तनों के खटकने के बीच से उन दोनों की दबी-दबी फुसफुसाहटें मेरे कानों तक पहुँचती थीं। हालांकि मुझे एक भी शब्द साफ-साफ सुनाई नहीं दे रहा था, लेकिन कोई भी इंसान आसानी से समझ सकता था कि वे कोई बेहद गंभीर, और बहुत सेंसिटिव टॉपिक पर बात कर रहे थे। वह फुसफुसाहट साधारण बातचीत नहीं थी; उसमें एक तरह की हड़बड़ी थी, एक अजीब सी कशिश थी। मम्मी कुछ धीमी आवाज में पूछतीं, और इमरान बहुत करीब झुककर उन्हें कोई हिदायत देता नजर आता। बीच-बीच में वे दोनों रुककर मेरे कमरे के दरवाजे की तरफ देखते, यह सुनिश्चित करने के लिए कि कहीं मैं उठ तो नहीं गया हूँ! दोनों की हरकतें बहुत अजीब और वाकई में शक पैदा करने वाली थीं. खैर, शक तो बहुत पहले से ही हो रहा था... पर इमरान पर शक करने का मुझे घंटा कोई शौक था... मैं तो दरअसल इस टेंशन में जला जा रहा था कि कहीं सच में मम्मी भी तो दोषी नहीं निकल जाएगी? लेटे-लेटे मैं ऊपरवाले से ही यही माँग रहा था की मेरे सारे शक गलत साबित हों.... लेकिन.... लेकिन सच कहूँ तो बीच-बीच में ऐसी फीलिंग आ रही थी की जब मैं डायरी देखूँगा और मुझे उसमें से कोई ऐसी बात पता चले जिसके न होने का मैं दुआ कर रहा हूँ, तब मेरा रिएक्शन क्या होगा? कहीं सच में तो कुछ हासिल नहीं हो जाएगा? मम्मी और इमरान... एक व्यस्क महिला और एक कम आयु के लड़के के बीच में कहीं वही सब तो देखने को नहीं मिलेगा जिसे देखने, सुनने और पढ़ने के लिए इंटरनेट में हमेशा से भीड़ लगी रहती है? "उफ्फ्फ!" मुझसे आगे नहीं सोचा गया… इसका एक कारण ये भी था की एक व्यस्क महिला और एक कम आयु के लड़के के बीच अफेयर की बात सोचते ही मेरे कमर के नीचे का हिस्सा धीरे-धीरे सख्त होने लगा था..! मेरी खुद भी ऐसी ही एक फैंटेसी रही थी कि कभी मौका मिले तो मैं खुद किसी मालदार, रसभरी एक व्यस्क महिला के साथ रिलेशनशिप में आऊँ! साला, खुद का तो हो नहीं रहा; अब कहीं अपनी मम्मी और दोस्त के बीच के ही ऐसी किसी बात का गवाह न बन जाऊँ। फ़िलहाल तो यूँ लगा रहा है की वे दोनों मिलकर मुझसे कुछ छुपाना चाहते थे! कोई ऐसी बात, कोई ऐसा राज, जिसे सिर्फ वे दोनों जानते थे और जिससे मुझे बिल्कुल बेखबर रखा जा रहा था। ‘आखिर क्यों...? क्या छुपा रहे हैं ये दोनों मुझसे?’ यह सवाल मेरे दिमाग में लोहे की गर्म सलाखों की तरह चुभने लगा। मैं बिस्तर पर पड़ा-पड़ा अंदर ही अंदर तड़प उठा। मेरी छाती में इतना गुस्सा भर गया कि मेरा मन किया कि मैं एक झटके में बिस्तर से उठूँ, भागकर रसोई में जाऊं और उन दोनों पर पागलों की तरह चीखना-चिल्लाना शुरू कर दूँ! ‘क्या चल रहा है तुम दोनों के बीच? बंद करो यह नाटक! क्या रिश्ता बन गया है तुम दोनों का कि अब अपने ही बेटे से बातें छुपानी पड़ रही हैं?’ लेकिन... मैं ऐसा कर न सका… क्योंकि मैं ऐसी कोई भी बकचोदी नहीं करना चाहता था. अगर मैं चिल्लाता, अगर मैं उन पर झपट पड़ता, तो आखिर मैं उन्हें वजह क्या बताता? क्या मैं सीधे उनके मुंह पर यह स्वीकार कर लेता कि मैं अपनी सीधी-सादी माँ पर एक घिनौना शक कर रहा हूँ? क्या मैं अपने उस दोस्त को यह बताता कि मैं उसकी हर हरकत को, उसके कपड़ों की पसंद को और उसकी हर फुसफुसाहट को एक चरित्रहीन नजरिए से देख रहा हूँ? अगर मेरा यह शक गलत निकलता, तो मेरी माँ उस दिन मेरे सामने ही दम तोड़ देतीं। उनका मुझ पर से, अपने ही बेटे पर से भरोसा हमेशा के लिए उठ जाता… और अगर मेरा शक सही निकल भी जाता, तो भी बिना किसी सबूत के उन पर आरोप लगाने से वे दोनों कोई नया झूठ गढ़ लेते और ज्यादा सतर्क हो जाते। इसी लाचारी और गुस्से के बवंडर में मैं अपने कमरे की चादर को उंगलियों में भींचकर रोता रहा, अंदर ही अंदर घुटता रहा। दोपहर के एक बज चुके थे, पर मेरी फूटी किस्मत ने मेरा साथ यहाँ भी छोड़ दिया। मैंने जो प्लान बनाया था कि दोपहर में पूरा फ्लैट खाली होगा, वह पूरी तरह से फ्लॉप हो गया। काफी देर तक इंतजार करने के बाद भी, उन दोनों में से कोई बाहर नहीं गया। मम्मी जो पिछले एक हफ्ते से रोज दोपहर को बेखौफ होकर अकेले मार्केट निकल जाती थीं, आज वह पूरे समय घर पर ही टिकी रहीं। कारण? कारण था 'मेरा ख्याल रखना'! मम्मी हर आधे घंटे में मेरे सिर पर गीली पट्टी रखने आतीं, कभी सूप का कटोरा लेकर आतीं, तो कभी मेरे पैर दबाने लगतीं। उनकी इस अत्यधिक सेवा भावना ने मेरे उस गुप्त प्लान की धज्जियां उड़ा दी थीं। जिस माँ की ममता पर मैं अपनी पूरी जिंदगी कुर्बान कर सकता था, आज उसी माँ की मौजूदगी मुझे एक पहरेदार की तरह लग रही थी। वह पल भर के लिए भी अपने कमरे की तरफ नहीं जा रही थीं; उनका पूरा ध्यान मेरे कमरे पर और रसोई पर था। करीब तीन बजे के आसपास, सिर्फ इमरान ही बाहर गया। "भाई, मैं जरा कुछ जरूरी काम से बाहर जा रहा हूँ। शाम तक लौटूँगा। कोई दवाई लानी हो तो बता दे," उसने मेरे कमरे में झांककर कहा। "नहीं, सब ठीक है," मैंने बेमन से कहा। इमरान तो चला गया, लेकिन मम्मी घर में ही रहीं। वह हॉल में बैठकर कोई टीवी सीरियल देखने लगीं, और बीच-बीच में उठकर मेरे पास आकर बैठ जाती। मैं बिस्तर पर लेटा-लेटा अपने भाग्य को कोस रहा था। मम्मी का रूम महज दस कदम की दूरी पर था। उनकी वह अलमारी, वह सूटकेस, और शायद वह डायरी मेरे सामने थी, पर बीच में मम्मी की वह अटूट मौजूदगी एक लोहे की दीवार बनकर खड़ी थी। पूरा दिन ढल गया। मेरी बीमारी का नाटक का असल उद्देश्य तो कारगर साबित नहीं हुआ, लेकिन उस ढलती दोपहर के सन्नाटे में, उन बंद कमरों की दबी फुसफुसाहटों ने मेरे दिल में एक ऐसा ज़हर घोल दिया था, जिसका असर किसी भी दुर्घटना से ज्यादा जानलेवा था। मैं चुपचाप लेटा रहा, यह जानते हुए कि इस घर की हवा में कोई बहुत बड़ा राज सांस ले रहा था ---जिसका मुझे हल्का अंदेशा भी था, लेकिन अपने ही बुने हुए जाल में बेबस होकर तड़प रहा था। To be Continued…
30-08-2026, 10:41 PM
Bro atleast move this story to next level suspence, its very short update, we all are read it but seems story suck on first phase only, I know it's different and difficult to write, but atleast give some big update, thank you for your writing
30-08-2026, 10:51 PM
एपिसोड 23: गहराता दलदल
इंसान जब किसी भयानक सच की तलाश में निकलता है, तो कुदरत कभी न कभी उसे वह मौका जरूर दे देती है जिसका वह बेसब्री से इंतजार कर रहा होता है। लेकिन विडंबना यह है कि जब वह मौका हाथ आता है, तो दिल की धड़कनें सच के उस बोझ को उठाने से पहले ही कांपने लगती हैं। मेरी उस झूठी बीमारी के करीब चार दिन बाद, भाग्यवश एक ऐसा अवसर बन ही गया जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी। उस दिन सुबह इमरान किसी काम के सिलसिले में शहर के दूसरे कोने के लिए निकला था। उसने नाश्ते की मेज पर ही बता दिया था कि उसे लौटने में शाम हो जाएगी। और रही बात मम्मी की—तो सुबह करीब ग्यारह बजे उन्हें पास के मंदिर और वहां से बीरभूम की एक पुरानी परिचित महिला से मिलने जाना था, जो हाल ही में इस शहर में शिफ्ट हुई थीं। मम्मी ने मुझसे सुबह ही कह दिया था कि वह दोपहर बाद ही लौटेंगी। इधर दफ्तर में, एक जरूरी सर्वर मेंटेनेंस के चलते दोपहर एक बजे ही 'हाफ-डे' घोषित हो गया। जैसे ही बॉस ने घोषणा की, मेरे भीतर बिजली की एक तेज लहर दौड़ गई। चार दिनों से जिस मौके के लिए मेरी आँखें तरस रही थीं, वह मौका खुद चलकर मेरे सामने आ खड़ा हुआ था। मैंने बिना एक पल गंवाए अपनी बाइक उठाई और हवा से बातें करते हुए फ्लैट की तरफ दौड़ पड़ा। रास्ते भर मेरे सीने में हथौड़े बज रहे थे। बाइक का हैंडल थामे मेरे हाथ पसीने से भीग चुके थे। दिमाग में बस एक ही धुन सवार थी—आज पर्दा उठकर रहेगा। आज मुझे वह डायरी हर हाल में ढूंढनी है। जब मैं बिल्डिंग के नीचे पहुंचा, तो मैंने सबसे पहले पार्किंग एरिया में नजर दौड़ाई... इमरान की बाइक नदारद थी! फ्लैट की सीढ़ियां चढ़ते वक्त मेरे कदम बेहद हल्के थे, जैसे कोई चोर अपने ही घर में सेंध लगाने जा रहा हो...! ऊपर जाकर जब मैंने अपने फ्लैट के दरवाजे पर कान लगाया, तो भीतर गहरा, सन्नाटेदार सन्नाटा पसरा हुआ था। मैंने चाबी लगाई और बड़ी नज़ाकत से दरवाजा खोला... अंदर एक दम घोंटू सन्नाटा पसरा हुआ था... पूरा फ्लैट खाली था... रसोई की सिंक सूखी थी, और हॉल के पंखे बंद थे। मैंने तुरंत मुख्य दरवाजा अंदर से लॉक किया... मेरे पास ज्यादा वक्त नहीं था; मम्मी या इमरान में से कोई भी कभी भी लौट सकता था। मैं बिना जूते उतारे, सीधे मम्मी के कमरे की तरफ लपका। मम्मी के कमरे में कदम रखते ही मुझे वही जानी-पहचानी खुशबू आई—अगरबत्ती की धीमी महक के साथ घुली हुई वही नई, मॉडर्न बॉडी लोशन की खुशबू। वह कमरा बीरभूम के उस सादे कमरे से बिल्कुल अलग था। बिस्तर की चादर करीने से बिछी थी और ड्रेसिंग टेबल पर नए-नए प्रसाधन सजे हुए थे। मेरी निगाहें सीधे अलमारी पर गईं। लकड़ी की पुरानी अलमारी, जिसे मम्मी बीरभूम से अपने साथ लाए सामान को रखने के लिए इस्तेमाल करती थीं। मैंने अलमारी का पल्ला खींचा। साड़ियों की तहें सलीके से लगी थीं। मैंने अपनी कांपती उंगलियों से साड़ियों के बीच टटोलना शुरू किया। पहले रैक में कुछ नहीं था, सिर्फ सूती साड़ियां और कुछ शॉल। दूसरे रैक में उनके कुछ पुराने कागजात और दवाइयां थीं। मेरा दिल डूबने लगा... "क्या वह डायरी नहीं लाईं? क्या वह बीरभूम वाले घर में ही छूट गई?" तभी मेरी नजर अलमारी के सबसे निचले हिस्से में रखे उस गहरे भूरे रंग के पुराने लेदर सूटकेस पर पड़ी। यह वही सूटकेस था जिसमें पापा के पुराने कागजात और मम्मी की बेहद निजी चीजें रहा करती थीं। मैंने सूटकेस को बाहर खींचा… उसकी ज़िप खोली... ऊपर पुराने स्वेटर रखे थे। मैंने उन स्वेटरों को हटाया, और नीचे... कपड़ों की तह के बिल्कुल बीचों-बीच, कपड़े के एक मटमैले कवर में लिपटी हुई वह मोटी, नीली जिल्द वाली डायरी रखी थी! मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं। सांस गले में अटक गई। यह वही डायरी थी—मम्मी की 'ला-इलाज बीमारी', उनका सबसे गहरा राजदार। मैंने कांपते हाथों से उस डायरी को बाहर निकाला। उसका कवर छूते ही मुझे ऐसा लगा जैसे मैंने कोई जलता हुआ अंगारा छू लिया हो। मैं कमरे के फर्श पर, दीवार से पीठ टिकाकर बैठ गया। हाथों की थरथराहट इतनी ज्यादा थी कि डायरी का पहला पन्ना खोलने में भी मुझे मशक्कत करनी पड़ी। शुरुआती पन्ने बीरभूम की यादों से संबंधित थे.... नीली स्याही से बांग्ला और हिंदी के मिले-जुले शब्दों में पापा की यादें लिखी थीं... अकेलेपन का वो पुराना, घिसा-पिटा रोना था— "आज फिर शाम को आंगन में अंधेरा जल्दी उतर आया... देबू (मेरा निकनेम) बड़ा हो रहा है, पर उसकी आँखों में सन्नाटा देखता हूँ तो डर लगता है... काश वो होते तो घर इतना बड़ा न लगता..." मैं पन्ने तेजी से पलटता गया... मुझे अतीत नहीं, वर्तमान चाहिए था। मुझे इस महानगर की तारीखें चाहिए थीं। और फिर... करीब बीस पन्ने पलटने के बाद, लिखावट की स्याही बदल गई। नीली की जगह काली स्याही आ गई थी, और अक्षरों की बनावट में एक अजीब सी हड़बड़ी, एक बेचैनी साफ झलक रही थी। यह इस शहर में आने के बाद के पन्ने थे। मैंने पन्नों को पढ़ना शुरू किया। लेकिन जैसा मैंने सोचा था कि वहाँ साफ-साफ अक्षरों में कोई पूरी कहानी लिखी होगी, वैसा कुछ नहीं था। कोई स्पष्ट वाक्य या पैराग्राफ नहीं था। वहाँ सिर्फ टूटे-फूटे, अधूरे शब्द, बेतरतीब पंक्तियाँ और बिखरे हुए जज्बात दर्ज थे। ऐसा लग रहा था जैसे लिखने वाले के हाथ कांप रहे थे, या वह लिखते-लिखते खुद से ही कुछ छुपाने की कोशिश कर रहा था। पर उन टूटे-फूटे शब्दों में जो कुछ भी था... उसने मेरे पैरों तले से जमीन, और सीने से सांस दोनों एक साथ खींच ली। एक पन्ने पर, जहाँ तारीख करीब दस दिन पुरानी थी, लिखा था: "....यह कैसा बंधन है? मैं चाहकर भी नजरें नहीं हटा पाती। जब वह पास आता है, तो बीरभूम की वो सूखी नदी जैसे अचानक भर जाती है। पाप है यह... बहुत बड़ा पाप है। पर वो निगाहें... वो मुझे उस तरह देखता है जैसे बरसों से किसी ने नहीं देखा..." यह पढ़कर मेरे माथे पर पसीने की ठंडी बूंदें छलक आईं... "वो मुझे उस तरह देखता है..." यहाँ 'वो' कौन था? इमरान के अलावा इस घर में तीसरा मर्द कौन था? मैंने कांपती उंगलियों से अगला पन्ना पलटा। वहाँ की लिखावट और भी ज्यादा बिखरी हुई थी, जैसे आंसुओं की बूंदों ने स्याही को कई जगह फैला दिया हो: "....आज उसने फिर छुआ। मना करना चाहा, हाथ कांप गए। उसने कहा कि इस उम्र में भी रूप का ढलना जरूरी नहीं। वो वाइन रंग... ये रंग मुझे कभी पसंद नहीं थे, पर जब उसने वह कपड़ा मेरे कंधे पर रखा, तो लगा जैसे बरसों की धूल छंट गई हो… वो कहता है कि ये रंग मुझ पर खिलता है। देबू से नजरें चुराना अब भारी पड़ रहा है। अगर उसे पता चला तो? नहीं, वो नहीं समझेगा। एक औरत का जिस्म और उसका मन... सिर्फ माँ बनकर नहीं जी सकती। यह आग मुझे जला देगी... पर यह जलन अच्छी क्यों लग रही है?...." "हे भगवान! हे मेरे भगवान!" मेरे मुंह से एक बेबस, रुंधी हुई चीख निकली… मेरा पूरा शरीर थर-थर कांपने लगा… आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा। 'उसने फिर छुआ... वो वाइन रंग... सिर्फ माँ बनकर नहीं जी सकती...' ये कोई टूटे-फूटे शब्द नहीं थे, यह मेरे संस्कारों, मेरी आस्था और मेरी पूरी दुनिया पर लिखा गया एक क्रूर सच था! वह वाइन रंग का सलवार-सूट, जिसकी फिटिंग पर मुझे शक था, उस ड्रेसिंग टेबल के आईने के सामने उनका संवरना... सब कुछ इसी डायरी के पन्नों से निकलकर सच साबित हो रहा था। इमरान और मम्मी के बीच कोई सामान्य जान-पहचान या औपचारिक रिश्ता नहीं था। उन दोनों के बीच एक ऐसा संबंध बन चुका था, जिसकी कल्पना करना भी एक बेटे के लिए मौत से बदतर था। वह आकर्षण, वह शारीरिक और मानसिक खिंचाव, जिसकी तरफ मेरा शक बार-बार इशारा कर रहा था और जिसे मेरा मन 'baseless', बेबुनियाद कहकर खारिज कर रहा था—आज खुद मेरी माँ के हाथों से उस पन्ने पर कबूल किया जा चुका था। मैंने पन्ने को और आगे पलटने की कोशिश की, जहाँ आखिरी कुछ तारीखों में सिर्फ कुछ अजीब से शब्द लिखे थे: "....वक्त खत्म हो रहा है... वो ताबीज, मुझे बांध दिया है! अब पीछे हटने का रास्ता नहीं बचा। या तो सब कुछ खत्म होगा, या मैं..." इसके आगे पन्ना खाली था… डायरी मेरे हाथ से छूटकर फर्श पर गिर पड़ी… कमरे की दीवारें मेरे ऊपर गिरती हुई महसूस हुईं। मेरा शक अब सिर्फ बलवान नहीं हुआ था; वह एक खूंखार हकीकत बनकर मेरे सामने खड़ा था और मुझ पर ठहाके मार रहा था। वह इमरान... मेरा दोस्त, मेरा भाई जैसा रूममेट, जिसने मेरे एक्सीडेंट में खून पसीना बहाया था—वह मेरी माँ की उस तन्हाई का, उनके ढलते जिस्म की प्यास का सौदागर निकला!! …. और मेरी माँ...?! जिन्होंने मुझे मर्यादा की घुट्टी पिलाई थी, वह उस 22-23 साल के लड़के के स्पर्श में अपनी ममता को, अपने पति की यादों को स्वाहा कर चुकी थीं?! कमरे की खामोशी में मेरी तेज-तेज सांसों की आवाज गूंज रही थी। मेरे भीतर आँसूओं की जगह एक भयानक, खौफनाक लावा उबलने लगा था। दर्द की सीमा खत्म हो चुकी थी, अब सिर्फ नफरत और इंतकाम का अंधकार बाकी था। पर.... पर इसमें और भी ऐसा बहुत कुछ लिखा था जोकि अभी - अभी मैंने अपनी मम्मी और इमरान के बीच जो कुछ भी सोच रहा था, उसके ठीक उल्टा भी साबित हो रहा था...! उन लाइन्स को और उन पन्नों को पढ़ने के उद्देश्य से जैसे ही मैंने डायरी उठाया.... तभी... …. फ्लैट के मुख्य दरवाजे के ताले में चाबी घूमने की हल्की सी 'क्लिक' आवाज हुई। मम्मी या इमरान में से कोई एक लौट आया था! To be Continued....
30-08-2026, 11:31 PM
Good going , suspense is going to create,let's see what happened next
31-08-2026, 09:00 AM
Nice work bhai ji aapne ek aurat ke jism ki pyas , dost ke dwara dost ke sath vishwasghat or usse bhi jyada ek bete ki or dost ki tadap ko jise pata chalta hai ki uska dost uski maa ko chod raha hai ya chodne ki koshish kar raha hai or uski maa isme uska bakhubi sath de rahi hai to uske ek gairatmand mard ko mar jane ke alawa or koi rasta hi nahi bachega to apne Hero ko chahiye ki apni maa se khul kar baat kare flat ko change karre or dhokhebaaz dost ko khule shabdon me warm karke dosti ko khatam kare or sabse jyada apni maa ki jaruraton ko khud hi pura kare or iske liye MAA ko bhi taiyar kare fir bhi maa nahi manti hai to sabse bada hathiyar emotional blackmail jaise ki bete or dost me se kisi ek ko chune jane ke liye bolna baki aapki marji hai maa ko dusron se hi chudwana hai bete ko cuckold banana hai ya ghut ghut ke marne ke liye vivash karna hai agar dost se hi chudwana hai maa ko to sorry ye story mere jaison ke liye nahi hai or ye mera pahla or akhiri response hoga.... Dhanyawad
31-08-2026, 11:59 AM
(31-08-2026, 09:00 AM)Skb21 Wrote: Nice work bhai ji aapne ek aurat ke jism ki pyas , dost ke dwara dost ke sath vishwasghat or usse bhi jyada ek bete ki or dost ki tadap ko jise pata chalta hai ki uska dost uski maa ko chod raha hai ya chodne ki koshish kar raha hai or uski maa isme uska bakhubi sath de rahi hai to uske ek gairatmand mard ko mar jane ke alawa or koi rasta hi nahi bachega to apne Hero ko chahiye ki apni maa se khul kar baat kare flat ko change karre or dhokhebaaz dost ko khule shabdon me warm karke dosti ko khatam kare or sabse jyada apni maa ki jaruraton ko khud hi pura kare or iske liye MAA ko bhi taiyar kare fir bhi maa nahi manti hai to sabse bada hathiyar emotional blackmail jaise ki bete or dost me se kisi ek ko chune jane ke liye bolna baki aapki marji hai maa ko dusron se hi chudwana hai bete ko cuckold banana hai ya ghut ghut ke marne ke liye vivash karna hai agar dost se hi chudwana hai maa ko to sorry ye story mere jaison ke liye nahi hai or ye mera pahla or akhiri response hoga.... Dhanyawad Don't give him suggestions I guess , he already decide earlier when he started a story, he was a professional writer he knows how to create a awesome and wonderful situation, don't force to change hi mind man, he is a wonderful writer ,I know him previously, and it's just a suggestion don't take me wrong |
|
« Next Oldest | Next Newest »
|