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Misc. Erotica Kahani mere ghar ki
#61
मेरे मन में मम्मी के लिए जो नज़रिया बना, वह किसी इत्तेफाक का नतीजा नहीं था। वह बहुत ही शातिर और चालाक थीं। मुझे याद है, कई बार जब मैं रात के सन्नाटे में या दरवाज़े की हल्की सी दरार से झाँकता था, तो मम्मी और पापा के बीच चल रहे शारीरिक संबंध केवल एक पति पत्नी का मिलन नहीं लगते थे। मम्मी जानबूझकर अपनी आवाज़ें और अपनी हरकतें इस तरह करती थीं कि मुझे यह साफ़ महसूस हो सके कि उनकी कामुकता का स्तर क्या है।

वह बहुत चालाकी से खुद को एक ऐसी औरत की तरह पेश करती थीं जो अपनी वासना और अपनी देह के सुख के लिए बेताब है। जब पापा उनके करीब आते, तो मम्मी का शरीर जिस तरह से प्रतिक्रिया करता, उनकी सिसकियाँ जिस तरह से कमरे की दीवारों से टकरातीं, वह सब मुझे यह बताने के लिए काफी था कि मेरी माँ केवल एक घरेलू महिला नहीं हैं वह एक बेहद कामुक स्त्री हैं।

वह जानती थीं कि मैं कहीं न कहीं देख रहा हूँ। वह पापा के साथ संबंध बनाते समय अपनी कमर को एक खास तरीके से मरोड़ती थीं या अपने शरीर को ऐसे पेश करती थीं जैसे वह अपनी कामुकता का प्रदर्शन कर रही हों। वह चाहती थीं कि मेरे छोटे से दिमाग में उनकी एक ऐसी छवि छप जाए जिसे मैं चाहकर भी भूल न पाऊँ। वह मुझे यह एहसास दिलाना चाहती थीं कि उनके भीतर एक ऐसी आग दबी है जो सिर्फ महसूस की जा सकती है। और उन्होंने यह काम इतनी सफाई से किया कि मुझे लगा जैसे यह सब अनजाने में हो रहा है, जबकि असल में वह मुझे मानसिक रूप से अपनी ओर खींच रही थीं।

***पापा के जाने में अब बस कुछ ही दिन बचे थे, और मम्मी ने अपना खेल अब अगले स्तर पर पहुँचा दिया था। अब वह केवल दरवाज़े की दरार से नहीं, बल्कि घर के चलते फिरते माहौल में मुझे अपनी देह का प्रदर्शन करने लगी थीं। वह जानबूझकर ऐसी स्थितियाँ पैदा करतीं कि मेरी नज़रें उनसे हटने का नाम ही न लें।

सुबह के समय जब मैं डाइनिंग टेबल पर नाश्ता कर रहा होता, तो मम्मी रसोई से निकलते समय जानबूझकर ऐसे कपड़े पहनतीं जो उनके शरीर के हर उभार को साफ़ साफ़ बयां कर रहे हों। कभी वह बहुत ही पतली और हल्की सिल्क की साड़ी पहनतीं, जो उनके शरीर से ऐसे चिपक जाती थी जैसे कि वह कुछ पहन ही न रही हों। जब वह झुककर सामान उठातीं या चाय छानने के लिए झुकतीं, तो वह जानबूझकर अपनी कमर को इस तरह मोड़तीं कि उनकी साड़ी का पल्लू थोड़ा सरक जाए और उनकी कामुक देह का एक हिस्सा मेरी नज़रों के सामने आ जाए।

मुझे पता था कि वह यह सब जानबूझकर कर रही हैं। जब भी मेरी नज़रें उनके शरीर पर ठहरतीं, वह अपनी नज़रें झुकातीं या फिर एक ऐसी शरारती मुस्कान देतीं जिसे मैं समझ नहीं पाता था क्या वह मुझे शर्मिंदा कर रही थीं या मुझे उकसा रही थीं?

एक शाम, जब मैं सोफे पर बैठा किताब पढ़ रहा था, मम्मी कमरे में आईं। उन्होंने बहुत ही छोटा और ढीला सा गाउन पहना हुआ था।  वह सोफे के पास आकर रुकीं और ऐसे बैठ गईं कि उनके पैरों का एक हिस्सा मेरे बहुत करीब था। वह अ हाथों की उंगलियों से अपने बालों को पीछे हटा रही थीं, और उस प्रक्रिया में उनका गाउन उनके कंधों से थोड़ा नीचे सरक गया। उनकी त्वचा की चमक और उनके शरीर का वह नज़ारा इतना तीव्र था कि मेरी सांसें थम गईं। वह मुझे देख नहीं रही थीं, लेकिन उनकी हर हरकत मुझे यह बता रही थी कि वह जानती हैं कि मैं उन्हें देख रहा हूँ और वह मुझे अपनी वासना की आग में झोंकना चाहती हैं।

"एक दिन मैं और अंकल अकेले थोड़ा घूमने निकले थे। टहलते हुए अंकल मुझसे पूछने लगे, 'बेटा, तुम आजकल कुछ परेशान से रहते हो क्या? क्या मैं तुम्हारी परेशानी का कारण जान सकता हूँ?' मैंने उनकी बात का कोई जवाब नहीं दिया और चुप रहा। मेरे कुछ भी रिप्लाई न करने पर, उनका पूछने का तरीका थोड़ा बदल गया और वो कुछ अलग ही अंदाज़ में मुझसे बातें करने लगे।"
अंकल मुझसे कई तरह की बातें पूछ रहे थे, कोशिश कर रहे थे कि मेरी चुप्पी का कारण समझ सकें, पर हर बार मेरा जवाब सिर्फ 'ना' ही निकलता। वह बार बार अलग अलग वजहें तलाश रहे थे, पर नतीजा कुछ नहीं निकल रहा था। फिर धीरे धीरे, माहौल बदलने लगा और वह सीधे उस मुद्दे पर आ गए जिसे सुनकर मेरी धड़कनें तेज हो रही थीं।

उन्होंने मेरी आँखों में देखते हुए बहुत ही धीमी और गंभीर आवाज़ में पूछा, "रवि, क्या तुम्हारी इस परेशानी की वजह मेरा और तुम्हारी मम्मी का वह रिश्ता तो नहीं है? मेरे न कहने पर वो बोले... क्या तुम्हें उससे कोई एतराज़ नहीं है?"

मैंने बिना झिझके कहा, "हाँ।"

सन्नाटे को तोड़ते हुए उन्होंने अगला सवाल किया, "क्या तुम्हें हमारा दोनों का इस तरह मिलना अच्छा लगता है?"

मैंने फिर से वही कहा, "हाँ।"

उनकी आवाज़ में अब एक अलग तरह की गहराई थी जब उन्होंने पूछा, "क्या तुम चाहते हो कि हमारा मिलन तुम्हारे सामने  हो?"

मेरा जवाब तुरंत था, "हाँ।"

बात अब और भी गहरी होती जा रही थी। उन्होंने पूछा, "क्या तुमने पापा और मम्मी को भी देखा है?"

"हाँ," मैंने जवाब दिया।

"और उन दोनों को देख कर भी तुम्हें अच्छा लगा?" उन्होंने मेरी प्रतिक्रिया टटोलने के लिए पूछा।

"हाँ," मैंने कहा।

अंकल ने अब सीधा और सबसे महत्वपूर्ण सवाल किया, "क्या तुम्हें मम्मी अच्छी लगती हैं?"

"हाँ," मैंने बिना पलक झपकाए कहा।

और फिर उन्होंने वह सवाल पूछा जिसका मुझे इंतज़ार था, "क्या तुम्हें मम्मी को नंगा देखना अच्छा लगता है?"

मैंने अपनी बात पूरी की, "हाँ।

अंकल के आखिरी सवाल ने जैसे मेरे पूरे वजूद को हिला कर रख दिया। वह सवाल जो मेरे दिमाग के सबसे अंधेरे कोने में दबा हुआ था, आज अचानक मेरे सामने खड़ा था। उन्होंने मेरी आँखों में आँखें डालकर बहुत ही भारी और सीधे लहजे में पूछा, "क्या तुम भी मम्मी की लेना चाहते हो?"

उस एक सवाल ने मेरे अंदर जैसे विस्फोट कर दिया। मैं पूरी तरह से कश्मकश में पड़ गया। मेरा शरीर सुन्न पड़ गया और दिल इतनी ज़ोर से धड़कने लगा । मेरे अंदर एक भयानक युद्ध चल रहा था। मेरा जवाब 'हाँ' था, मेरा मन चीख चीख कर कह रहा था कि 'हाँ, मैं चाहता हूँ', लेकिन मेरे गले से शब्द नहीं निकल रहे थे।

मैं सोच में पड़ गया कि मैं यह कैसे कहूँ? यह इतना बड़ा और इतना 'Taboo' सच था। मैं डर रहा था कि अगर मैंने सीधे 'हाँ' कह दिया, तो शायद यह सब खत्म हो जाए या फिर मैं बहुत ज़्यादा आगे निकल जाऊँ। मैं चाहता था कि अंकल खुद मेरी इस इच्छा को समझें, वह खुद मेरे प्यार और मेरी तड़प को पहचानें और बड़ी ही कोमलता से, बड़े ही प्यार से इस बात को मेरे मुँह से निकलवा लें। मैं चाहता था कि वह मुझे मजबूर न करें, बल्कि मेरी इस दबी हुई चाहत को खुद महसूस करके मुझसे यह कबूल करवाएं।
मेरे चेहरे पर फैली उस कश्मकश और मेरी खामोशी को अंकल ने तुरंत भांप लिया। उन्हें समझ आ गया था कि मेरा जवाब 'हाँ' ही है, बस मैं उसे शब्दों में पिरोने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा हूँ। कमरे में एक भारी सन्नाटा पसर गया था, जिसमें सिर्फ मेरी तेज़ होती सांसों की आवाज़ सुनाई दे रही थी।

अंकल ने अपना हाथ मेरे सिर पर रखा और बहुत ही धीमे, सुकून देने वाले लहजे में मेरे पास आकर बोले, "रवि... तुम चुप क्यों हो गए? क्या तुम डर रहे हो? मुझसे डरो मत बेटा। मैं यहाँ तुम्हें जज करने के लिए नहीं हूँ। मैं बस तुम्हारी सच्चाई जानना चाहता हूँ।"

उनकी आवाज़ में एक अजीब सा जादू था, जो मेरी घबराहट को कम कर रहा था। उन्होंने थोड़ा और झुकते हुए, लगभग मेरे कान के पास आकर बहुत ही कोमलता से पूछा, "क्या तुम्हारे मन में भी वही इच्छा है जो मेरे मन में है? क्या तुम भी मम्मी को उसी तरह महसूस करना चाहते हो जैसे मैं करता हूँ? क्या तुम भी उनके साथ उस सुख को बाँटना चाहते हो?"

उनकी इस बात ने मेरे अंदर की सारी झिझक को जैसे पिघला दिया। उनकी आवाज़ का वह प्यार भरा और गहरा अंदाज़ मुझे सच बोलने के लिए उकसा रहा था। मैं बस उनकी आँखों में देख रहा था, जहाँ कोई नफरत नहीं बल्कि एक तरह की स्वीकृति थी। मेरा गला अभी भी सूखा हुआ था, लेकिन अब मेरा मन उस 'हाँ' को कहने के लिए बेताब था जिसे मैं कब से दबाए बैठा था।
अंकल के उन शब्दों ने जैसे मेरे अंदर के बांध को तोड़ दिया। उनकी आवाज़ में जो भरोसा और जो अपनापन था, उसने मेरी सारी हिचकिचाहट को राख कर दिया। उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा और बहुत ही प्यार से, लगभग फुसफुसाते हुए कहा, "बोलो बेटा... डरो मत। मैं यहाँ तुम्हारा दुश्मन नहीं हूँ। अगर तुम्हारे मन में कोई ऐसी इच्छा है जो तुम्हें बेचैन कर रही है, तो मुझे बताओ। मैं वादा करता हूँ कि मैं तुम्हारी उस इच्छा को पूरी करवाने की पूरी कोशिश करूँगा।"

उनके 'कोशिश करूँगा' शब्द मेरे कानों में किसी संगीत की तरह गूँज रहे थे। उस एक वाक्य ने मुझे वह सुरक्षा दे दी जिसकी मुझे सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी। अब मुझे डर नहीं लग रहा था कि मैं कुछ गलत कह रहा हूँ या मैं कुछ गलत सोच रहा हूँ। अंकल ने मुझे एक ऐसी अनुमति दे दी थी जिसका सपना मैं अपनी बंद आँखों से देख रहा था।

मेरे अंदर एक अजीब सी सिहरन दौड़ गई। मेरा गला अभी भी थोड़ा भारी था, लेकिन अब वह डर की वजह से नहीं, बल्कि उस उत्तेजना और उत्साह की वजह से था जो मेरे पूरे शरीर में बिजली की तरह दौड़ रहा था। मैं उनकी आँखों में देख रहा था, जहाँ अब मुझे सिर्फ एक मार्गदर्शक और एक साथी नज़र आ रहा था। अब बस उस एक शब्द की देरी थी वह 'हाँ' जो मेरे दिल के सबसे करीब था और जिसे अब मैं बिना किसी झिझक के उनके सामने रखने के लिए तैयार था।

अंकल के वादे ने मेरे अंदर की आग को तो भड़का दिया था, लेकिन साथ ही मेरे दिमाग में सवालों का एक तूफ़ान भी खड़ा कर दिया था।
मैंने अपनी नज़रें झुका लीं और एक बहुत ही भारी और कांपती हुई आवाज़ में आखिरकार अपने दिल का हाल कह ही दिया।

"हाँ अंकल... मैं भी मम्मी के साथ... मैं भी उनके साथ वैसा ही करना चाहता हूँ जैसा आप करते हैं।"

जैसे ही ये शब्द मेरे मुँह से निकले, मुझे ऐसा लगा जैसे मैंने कोई बहुत बड़ा गुनाह कर दिया हो। मैंने तुरंत अपनी आँखें बंद कर लीं और डरते हुए आगे पूछा, "पर अंकल... क्या यह सही है? क्या मम्मी मान जाएँगी? क्या उन्हें बुरा नहीं लगेगा? और सबसे बड़ी बात... क्या यह पाप नहीं होगा? क्या मैं कोई बहुत बड़ा गुनाह तो नहीं कर रहा?"

मेरा गला रुँध रहा था। मैं अंकल के जवाब का इंतज़ार कर रहा था, लेकिन मेरा पूरा वजूद उस डर से कांप रहा था कि कहीं मेरा यह सच मुझे एक अपराधी न बना दे। मैं चाहकर भी अपनी इस तीव्र इच्छा को अपनी नैतिकता के बोझ से अलग नहीं कर पा रहा था। मैं बस उनके मुँह से यह सुनना चाहता था कि जो मैं महसूस कर रहा हूँ, वह गलत नहीं है।
मेरी आवाज़ में जो डर और अपराधबोध था, उसे देखकर अंकल ने मुझे और भी करीब खींच लिया। उन्होंने अपना हाथ मेरे कंधे पर और मजबूती से रखा, जैसे वह मुझे गिरने से बचा रहे हों। फिर उन्होंने बहुत ही कोमलता से मेरा चेहरा अपने हाथों में थाम लिया और मेरी आँखों में झाँकते हुए बोले। उनकी आवाज़ में एक ऐसी गहराई और सुकून था कि मेरी कांपती हुई धड़कनें धीरे धीरे शांत होने लगीं।

उन्होंने मुझे समझाना शुरू किया कि जिसे मैं 'पाप' समझ रहा हूँ, वह असल में गलत नहीं है। उन्होंने कहा कि पाप तब होता है जब हम किसी का दिल दुखाते हैं, लेकिन जो मैं महसूस कर रहा हूँ, वह तो कुदरत का एक स्वाभाविक आकर्षण है। उनकी बातों ने मेरे दिमाग में चल रहे उस नैतिक युद्ध को जैसे थाम ही दिया।

जब उन्होंने मम्मी के बारे में बात की, तो मेरे रोंगटे खड़े हो गए। उन्होंने कहा कि मम्मी को बुरा नहीं लगेगा, बल्कि उन्हें एक औरत होने का असली अहसास होगा। उन्होंने मुझे यकीन दिलाया कि जब उन्हें पता चलेगा कि उनका अपना बेटा उन्हें कितनी शिद्दत से चाहता है, तो उन्हें गर्व महसूस होगा, न कि शर्म। अंकल की उन मखमली बातों ने मेरे मन के सारे संशय और डर को जैसे पिघला दिया। अब मुझे वह 'पाप' जैसा बोझ महसूस नहीं हो रहा था, बल्कि एक ऐसी नई और तीव्र चाहत महसूस हो रही थी जो अब मेरे पूरे वजूद पर छा गई थी। उनके शब्दों ने मेरे अंदर के डर को खत्म कर दिया था और अब मेरी जगह सिर्फ एक बेतहाशा भूख ने ले ली थी।

अंकल की उन मखमली बातों ने मेरे मन के सारे संशय और डर को जैसे पिघला दिया। अब मुझे वह 'पाप' जैसा बोझ महसूस नहीं हो रहा था, बल्कि एक ऐसी नई और तीव्र चाहत महसूस हो रही थी जो अब मेरे पूरे वजूद पर छा गई थी। उनके शब्दों ने मेरे अंदर के डर को खत्म कर दिया था और अब मेरी जगह सिर्फ एक बेतहाशा भूख ने ले ली थी। मुझे महसूस हो रहा था कि मैं अब किसी अपराध की ओर नहीं, बल्कि अपनी नियति की ओर बढ़ रहा हूँ।

मैंने अंकल की आँखों में देखते हुए एक गहरी साँस ली और कहा, "आप सही कह रहे हैं अंकल। अब मुझे सिर्फ वही दिख रहा है जो मैं पाना चाहता हूँ। अब मुझे डर नहीं लगता, मुझे बस उनकी प्यास बुझानी है।" अंकल ने मेरी बात सुनकर मेरे कंधे पर अपना हाथ रखा और एक गहरी, अर्थपूर्ण मुस्कान के साथ बोले, "यही तो मैं सुनना चाहता था। अब खेल शुरू होगा, रवि।" उनकी उस मुस्कान ने मेरे अंदर की उस बेतहाशा भूख को और भी बढ़ा दिया। अब मैं उस पल के लिए पूरी तरह तैयार था।
अंकल ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और उसकी आँखों में आँखें डालकर एक गहरी, भारी आवाज़ में कहना शुरू किया। "रवि, तू जो देख रहा है न, वो सिर्फ उसकी देह नहीं है... वो एक जलता हुआ ज्वालामुखी है। तेरी मम्मी के अंदर की कामुकता कोई दबी हुई चीज़ नहीं है, वो तो भड़क रही है, वो तो हर पल बाहर निकलने के लिए छटपटा रही है। तूने उनकी आँखों में वो तड़प देखी है? वो जो एक अनकही प्यास है?"मेरा शरीर उत्तेजना से तपने लगा।  धड़कनें तेज़ हो गईं। मैने बेताबी से पूछा, "पर अंकल... उन्हें इस आग से बाहर निकालने के लिए, उन्हें पूरी तरह मेरे सामने झुकाने के लिए मुझे क्या करना होगा?"

अंकल ने एक कुटिल मुस्कान के साथ मेरे कान के बेहद करीब आकर फुसफुसाया, "तुझे बस उन्हें उस मोड़ पर ले जाना है जहाँ उनकी मर्यादा हार मान ले। तू बस एक बार ये तरीका आज़मा कर देख... तू देख लेना कि वो कितनी व्याकुल और बेकाबू हो जाती हैं। वो इतनी बेताब हो जाएँगी कि तुझे रात दिन अपनी देह की गर्मी से सहलाने के लिए खींच लाएंगी। वो खुद तुझे अपने बिस्तर पर खींच लाएंगी और तुझे जन्नत के ऐसे नज़ारे दिखाएंगी कि तू दुनिया भूल जाएगा। वो खुद तुझे निर्वस्त्र करेंगी और तुझे अपनी कामुकता के उस समंदर में डुबो देंगी जहाँ से वापस आने का रास्ता ही नहीं होगा। तू बस तैयार रह, क्योंकि वो तुझे अपनी देह का हर एक कतरा, अपनी हर एक बूंद तेरे नाम करने के लिए पागल हो जाएँगी।"

एरे अंदर का संयम टूट रहा था। अंकल की बातें मेरे दिमाग में ज़हर की तरह घुल रही थीं और उसकी भूख को एक भयानक आकार दे रही थीं। अब मुझे बस उस पल का इंतज़ार था जब मैं अपनी मम्मी की उस भड़कती हुई आग को अपनी मर्ज़ी से ठंडी करूंगा।

***

मेरे  दिमाग में अंकल की कही बातें किसी नशीले ज़हर की तरह फैल रही थीं। मेरी आँखों के सामने मेरी  मम्मी का वो सुराहीदार बदन और उनकी वो दबी हुई कामुकता नाचने लगीमेरी  उत्तेजना अब मेरे काबू से बाहर हो रही थी। मैने अंकल की आँखों में सीधे देखते हुए, एक भारी और लड़खड़ाती हुई आवाज़ में पूछा, "अंकल... क्या ये वाकई मुमकिन है? क्या मेरे लिए उनकी इस भड़कती हुई आग को शांत करना संभव है? क्या मैं सच में उन्हें उस मोड़ पर ला पाऊँगा?"
अंकल ने रवि के कंधे पर हाथ रखा और एक गहरी, गंदी आवाज़ में कहा, "बिलकुल हो पाएगा रवि... जब वो तुम्हारे नीचे तड़प रही होगी और तुम्हारी गर्मी उसके जिस्म में उतरेगी, तब वो खुद तुमसे माँगेगी। बस तुम्हें बस थोड़ा सा शैतानी दिमाग लगाना होगा।"

"पर मुझे क्या करना पड़ेगा उन्हें अपने बिस्तर पर लिटाने के लिए?" मैंने पूछा। तो अंकल ने मेरे सर पर प्यार से हाथ रखते हुए मेरे कान में कुछ प्लान समझाया जिसे सुनकर मैं खुश हो गया।
"पर अंकल, मुझे तो कुछ करना ही नहीं आता," मैंने जवाब में कहा। तो अंकल बोले, "बेटा, जब वो तेरे पास आ गई, तो सब कुछ सिखा देगी।"
अब मुझे लगा कि अंकल मेरी भलाई चाहते हैं,  मैंने अब पक्का इरादा बना लिया था इस बड़े गुनाह के रास्ते पर चलने का।  

मुझे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि मुझसे ज़्यादा मज़ा उनको आने वाला है ऐसा मज़ा जो माँ बेटे के वर्जित संबंधों को देख कर वो लेना चाहते थे।
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Do not mention / post any under age /rape content. If found Please use REPORT button.
#62
Excellent update
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#63
Waiting for update
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#64
*"Hi everyone! ❤️ सबसे पहले तो आप सभी का दिल से शुक्रिया उन प्यारे कमेंट्स के लिए जो पिछले कुछ दिनों में आए हैं। सच कहूँ तो मुझे बहुत खुशी हुई। दरअसल, मैं अगला अपडेट देने ही वाला थी, पर फिर मुझे लगा कि शायद कमेंट्स नहीं आ रहे तो शायद कोई पढ़ ही नहीं रहा है। पर अब जब आप लोगों का प्यार मिल रहा है, तो मेरा हौसला बढ़ गया है! मैं पूरी कोशिश करूंगा कि आज शाम तक आपको नया अपडेट दे दूँ। Stay tuned! ✨"*
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#65
Bro starting mai tumhare writing mai kami thi lekin lekin jaise jaise aage likh rahe ho acche hote ja rahe ho
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#66
सुझाव के लिए शुक्रिया! आपकी बात सुनकर अच्छा लगा कि कहानी में सुधार दिख रहा है। मैं लगातार सीखने और बेहतर करने की कोशिश कर रहा हूँ। अपना प्यार और साथ बनाए रखें।"
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#67
This is an awesome story
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#68
> "आप सभी पाठकों का बहुत बहुत धन्यवाद और इस थ्रेड पर स्वागत है! आपके कमेंट्स और सुझावों ने कहानी को एक नया मोड़ दिया है। इसी के आधार पर पेश है अगला अपडेट। पढ़िए और बताइए आपको कैसा लगा! ✨"
एक दिन मैं, मम्मी, पापा और छोटा भाई सब मिलकर खाना खा रहे थे। दोनों बहनें दुकान पर थीं और खाना खा चुकी थीं। इधर उधर की बातें हो रही थीं, इसी बीच मुझे मम्मी के स्त्री चरित्र का वो रूप दिखा, जिसकी मुझे काफी दिनों बाद समझ आई।

मम्मी ने पापा की तरफ देखते हुए कहा, "भाई साहब (प्रदीप अंकल की तरफ इशारा करते हुए) को बोल दो न कि रात को घर आ जाया करें।कह तो आपने पहले भी रखा है पर ये बहुत कम आते हैं। मैं बच्चों के साथ अकेली रहती हूँ तो बहुत डर लगता है, वैसे भी हमारे घर के आस पास अंधेरा होते ही सन्नाटा छा जाता है।"
अंकल ने मुस्कुराते हुए मजाक में कहा, "अरे बहनजी, आ तो जाता हूँ! क्यों झूठी शिकायत लगा रही हो? कभी काम की वजह से देर हो जाती है तो कभी गाँव जाना पड़ता है।" फिर उन्होंने शरारत भरी नज़रों से मम्मी की तरफ देखा और हँसते हुए बोले, "तुम तो हो ही बड़ी
डरपोक हो! चूहे के खड़के की आवाज सुनकर ऐसे डर गईं थीं जैसे कोई चोर आ गया हो!" कहकर अंकल जोर से हंसने लगे,यह सुनकर पापा समेत घर के सब लोग ठहाका मारकर हँस पड़े।


मुझे समझ आ गया था कि मम्मी अंकल का घर आना सुनिश्चित करने के लिए डर का बहाना कर रही थी और अंकल ने वो चूहे वाली बात सुना कर पापा को यकीन दिला दिया था के सच में मम्मी अकेली घर रहने पर डरती है,इसीलिए पापा को कह रही थी के अंकल को रोजाना आने के लिए बोल दें।

"सच तो यह था कि यह सब कोई नई शुरुआत नहीं थी, बल्कि यह खेल तो काफी समय से पर्दे के पीछे चल रहा था। मम्मी ने यह बात पापा के सामने बड़ी ही चतुराई से कही थी ताकि कल को अगर कोई पापा के कान भरे भी, तो उन्हें ज़रा भी शक न हो। आखिर अंकल मम्मी को हमेशा 'बहन जी' कहकर ही बुलाते थे, और इसी वजह से पापा भी कभी गहराई से नहीं सोचते थे। उनके लिए तो यह सिर्फ एक भाई का अपनी बहन की सुरक्षा की फिक्र करना था।

पर मैं पास ही बैठा यह सब देख रहा था और मुझे मम्मी की इस सोची समझी चाल का पूरा अंदाज़ा था। मम्मी ने इस 'डर' के बहाने को एक ढाल की तरह इस्तेमाल किया था ताकि अंकल के घर आने का सिलसिला और भी गहरा हो सके। यह कोई अचानक हुआ फैसला नहीं था, बल्कि यह तो उस खेल का हिस्सा था जो काफी समय से धीरे धीरे आगे बढ़ रहा था। पापा को लग रहा था कि घर में सुरक्षा बढ़ रही है, पर मुझे पता था कि असल में घर के भीतर वह वर्जित खेल पहले से ही अपनी जड़ें जमा चुका था। अंकल का 'बहन जी' कहना और पापा का उन पर आँख मूँदकर भरोसा करना ही तो इस खेल को अब तक सुरक्षित बनाए हुए था। जिसे पापा सुरक्षा समझ रहे थे, वह दरअसल उस गुनाह को और भी ज्यादा गति देने की तैयारी थी जो काफी समय से परदे के पीछे पक रहा था।"

पापा दो महीने घर में रहने के बाद अब वापस विदेश जाने वाले थे। मेरी दोनों बहनें भी हॉस्टल जाने वाली थीं। उन्हें तो पहले ही जाना था, पर वो चार पांच दिन और रुक गई थीं क्योंकि सबने सोचा था कि जब पापा को एयरपोर्ट छोड़ने जाएंगे, तो वहीं से सीधा हॉस्टल चली जाएंगी।
मेरा छोटा भाई भी कुछ दिनों के लिए मामा के घर से आया हुआ था(बता चुका हूं शुरू में के छोटा भाई मामा के पास ही रहता था)। तो सबने मिलकर यह तय किया कि जब पापा को एयरपोर्ट छोड़ने का वक्त आएगा, तब घर के बाकी सभी लोग एक साथ निकल जाएंगे। प्लान के मुताबिक, पापा को छोड़ने के बाद मैं,मेरी मम्मी और छोटा भाई मामा के घर चले जाएंगे। वहाँ एक दो दिन रुकने के बाद, छोटे को वहीं छोड़कर मैं और मम्मी वापस घर आ जाएंगे।
इस तरह जब पापा , भाई और बहनें सब के चले जाने के बाद घर में मैं और मम्मी दोनों ही रह गए।अंकल रोजाना घर आ जाते,उन दोनों का पो पुराना chudai वाला
सिलसिला फिर से उसी रफ्तार से चल पड़ा।" अब धीरे धीरे
घर की स्थिति वैसी ही बन रही थी जैसा मैंने चाहा था।
अब अंकल के बताए गए प्लान पर अमल करने का समय आ चुका था।
और फिर वो दिन भी आ ही गया"रात का सन्नाटा गहरा चुका था। मम्मी को लगा के मैं आज भी मै(रवि) नींद की दवाई के नशे में गहरी नींद न में सोया हुआ हूँक्योंकि उनको लगा कि इस अंधेरे और खामोशी का फायदा उठाने का यह सबसे सही वक्त है।

मैं असल में सोया नहीं था, बस अपनी आँखें मूँदकर सोने का नाटक कर रहा था। तभी मैंने देखा कि मम्मी दबे पाँव अंकल के कमरे की तरफ बढ़ रही हैं। मेरा दिल ज़ोरों से धड़कने लगा। थोड़ी देर बाद मैं धीरे से उठा और दबे पाँव उस कमरे के दरवाज़े तक जा पहुँचा। दरवाज़ा थोड़ा सा खुला था, और अंदर का नज़ारा देखकर मेरी साँसें थम सी गईं।
मम्मी अंकल के साथ बेहद उत्तेजक और बेबाक अंदाज़ में थीं। वह पूरी तरह से उस वर्जित खेल में डूबी हुई थीं, उनकी हर हरकत में एक अजीब सी बेताबी और प्यास थी। वह अंकल के साथ कुछ ऐसा कर रही थीं जो किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा। मैं दरवाज़े की दरार से यह सब देख रहा था और मेरा शरीर रोमांच से काँप रहा था। पर तभी, अचानक मम्मी की नज़र दरवाज़े की तरफ गई। उनकी आँखें मेरी आँखों से टकरा गईं। वह पल ऐसा था जैसे वक्त वहीं रुक गया हो मम्मी के चेहरे पर घबराहट थी पर मेरे मन में कोई डर नहीं था क्योंकि ये सब उसी प्लान का हिस्सा था जो अंकल और मैने मिल कर बनाया था,पर मम्मी को इस प्लान वाली साजिश के बारे में भौरा भी अंदाजा नहीं था।"

"मम्मी की आँखों में जो खौफ़ मैंने देखा, वह सिर्फ पकड़े जाने का नहीं था, बल्कि उस शर्मिंदगी का था जो उनके पूरे वजूद को झकझोर रही थी। हमारी आँखें टकराते ही उनके हाथ काँपने लगे और वह अंकल के साथ जो उत्तेजक हरकतें कर रही थीं, वे अचानक एक ठिठक सी गईं। उनके चेहरे का रंग उड़ चुका था। उन्हें लगा कि आज उनका सारा सच, उनकी सारी मर्यादा एक पल में तार तार हो जाएगी।

मम्मी के मन में डर का एक बवंडर उठ रहा था उन्हें लग रहा था कि अब पर्दाफाश हो चुका है। वह बार बार अपनी बिखरी हुई साड़ी और अस्त व्यस्त हालत को संभालने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन उनकी घबराहट उन्हें स्थिर नहीं होने दे रही थी। उनके दिमाग में बस एक ही ख्याल चल रहा था कि अगर मैंने ज़रा सी भी आवाज़ की या पापा को बता दिया, तो उनका क्या होगा? वह डर उन्हें अंदर से सुखा रहा था। वह इतनी डरी हुई थीं कि उनकी साँसें तेज़ चलने लगीं और वह बार बार दरवाज़े की तरफ और फिर मेरी तरफ देख रही थीं, जैसे किसी चमत्कार का इंतज़ार कर रही हों कि शायद मैं उन्हें अनदेखा कर दूँ।

मम्मी के उस डर और बेबसी को देखकर मुझे अहसास हुआ कि वह इस वक्त कितनी कमज़ोर पड़ चुकी हैं। वह खुद को बचाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार थीं। उन्हें अंदाज़ा भी नहीं था कि जिस डर की वजह से वह काँप रही हैं, वह डर ही अब इस खेल का सबसे बड़ा हथियार बनने वाला था। वह पर्दाफाश होने के डर से इतनी सहमी हुई थीं कि अब वह पूरी तरह से मेरे नियंत्रण में आने की कगार पर थीं।"

"मम्मी की आँखों में जो खौफ़ और घबराहट का समंदर उमड़ रहा था, मैं उसे बखूबी महसूस कर सकता था। वह थर थर काँप रही थीं, जैसे किसी ने उनके सीने से उनकी पूरी दुनिया ही छीन ली हो। उन्हें लग रहा था कि अब मैं चिल्लाऊँगा, हंगामा करूँगा या फिर इस शर्मनाक सच को पूरे घर में फैला दूँगा। वह अपनी बिखरी हुई हालत और अपनी उन उत्तेजक हरकतों के बीच बुरी तरह फंस चुकी थीं। वह डर के मारे जम सी गई थीं।

लेकिन मेरा मकसद उन्हें डराना या उनके इस डर का फायदा उठाकर उन्हें नीचा दिखाना नहीं था। मेरा इरादा इससे कहीं ज़्यादा गहरा और सोची समझी चाल का हिस्सा था। मैंने उनकी आँखों में देखा उस डर को, उस बेबसी को और बिना एक शब्द बोले, बिना कोई भाव दिखाए, मैं चुपचाप पीछे हट गया। मैंने दरवाज़ा धीरे से बंद किया और बिना पीछे मुड़े अपने कमरे की तरफ बढ़ गया।
मैं अपने कमरे में वापस आया और बिना किसी शोर शराबे के चुपचाप अपने बिस्तर पर लेटकर सो गया। लेकिन उस सन्नाटे में, उस चुप्पी के पीछे एक गहरा खेल चल रहा था। मैंने उन्हें उनके ही डर के साथ उस कमरे में अकेला छोड़ दिया था। मम्मी के लिए वह सन्नाटा किसी चीख से भी ज़्यादा भयानक था। उन्हें लग रहा था कि मेरी यह चुप्पी किसी बड़े तूफान के आने से पहले की शांति है। वह उस कमरे में अंकल के साथ तो थीं, लेकिन उनका पूरा ध्यान अब उस डर पर था जो मैंने उन्हें दिया था एक ऐसा डर जो उन्हें अब और भी ज़्यादा बेचैन और मेरे ख्यालों में उलझाए रखने वाला था।"

अब सवाल यह है कि क्या मम्मी इस स्थिति का सामना कर पाएंगी,क्या रवि के बिछाये इस जाल से निकलने का कोई रास्ता निकाल पाएगी , क्या रवि कोई नया पैंतरा खेलेगा? आपके इन सब सवालों का जवाब अतिशीघ्र अगले अपडेट में मिलने वाला है।
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#69
Awesome aur ekdom ashadaran update
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#70
Zabardast update
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#71
Thanks @wetpussy and @ jasmin ,aaj ke update me bhi sab kush wet hone wala hai
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#72
"रात के दो बज रहे थे। पूरा घर गहरी खामोशी में डूबा हुआ था, लेकिन मेरे कमरे के बाहर कदमों की बहुत ही धीमी सी आहट सुनाई दी। मैं असल में सो नहीं रहा था, बस अपनी आँखें बंद करके उस पल का इंतज़ार कर रहा था जिसका मुझे बेसब्री से इंतज़ार था। दरवाज़ा बहुत धीरे से खुला और एक हल्की सी आहट हुई।

मम्मी अंदर आईं। उनकी चाल में एक अजीब सी हिचकिचाहट और घबराहट थी। उन्होंने अपनी साड़ी को ठीक से लपेट लिया था और चेहरे पर एक ऐसा मुखौटा ओढ़ने की की नाकामयाब कोशिश कर रही थी जिसे देखकर कोई भी कह दे कि वह एक फिक्रमंद माँ हैं। लेकिन उनकी आंखों में एक एक डर ,एक बेचैनी थी और उनके काँपते हुए हाथ साफ दिखाई दे रहे थे। वह मेरी तरफ धीरे धीरे बढ़ीं और बिस्तर के किनारे बैठ गईं।

'बेटा... तू सो गया क्या?' उनकी आवाज़ में एक अजीब सी थरथराहट थी, जैसे वह खुद को संभाल रही हों। 'मुझे लगा शायद तुझे नींद नहीं आ रही... तुझे कुछ चाहिए तो?' उन्होंने एक माँ की तरह मेरा माथा सहलाने की कोशिश की, लेकिन उनके हाथ का स्पर्श इतना काँप रहा था कि वह डर साफ़ महसूस हो रहा था। वह यह दिखाने की कोशिश कर रही थीं कि वो अपनी गलती पर शर्मिन्दा है। उनके शरीर की हर हरकत कह रही थी कि वह इस वक्त अंदर से कितनी टूटी हुई और डरी हुई हैं। वह मेरे पास बैठी तो थीं, लेकिन उनकी नज़रें बार बार दरवाज़े की तरफ जा रही थीं, जैसे वह यह देख रही हों कि कहीं कोई और तो नहीं आ रहा। वह खुद को बचाने के लिए मेरे करीब आई थीं, लेकिन उनका वह डर ही अब उन्हें मेरे और करीब खींच रहा था।"उनकी इस हालत को देख कर मेरा दिल भी कहीं न कहीं बैठा जा रहा था
मैंने बिना कुछ कहे, धीरे से अपनी आँखें खोलीं और उन्हें अपनी ओर खींच लिया। मैं उन्हें गले लगा लेता हूँ। उस पल, उनके शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। वह पूरी तरह से **'मंझधार'** में थीं उनके दिमाग में यह युद्ध चल रहा था कि क्या उनका बेटा उन्हें इस डर से बाहर निकालने के लिए गले लगा रहा है, या फिर वह इस मौके का फायदा उठाना चाहता है। वह चाहकर भी खुद को पीछे नहीं हटा पा रही थीं।

मैंने अपना हाथ उनके कंधे से नीचे की ओर सरकाना शुरू किया। मेरा हाथ धीरे धीरे उनके **वक्षस्थल** की ओर बढ़ रहा था। जैसे ही मेरा हाथ उनके शरीर के उस संवेदनशील हिस्से के करीब पहुँचा, मम्मी के शरीर में एक बिजली सी दौड़ गई। वह घबराकर झटके से पीछे हट गईं। उनकी आँखों में डर और शर्मिंदगी का एक मिला जुला भाव था। वह काँपते हुए बोलीं, 'रवि... ये क्या कर रहे हो तुम?'

मैंने कोई जवाब नहीं दिया। मैंने बस एक गहरी ठंडी सांस ली और अपनी नज़रें नीचे झुका लीं। मैंने अपने चेहरे पर एक गहरी **'निराशा'** का भाव ला दिया, जैसे उनका पीछे हटना मेरे दिल को छलनी कर गया हो। मैंने बहुत ही ठंडी और बेजान आवाज़ में कहा,कहा,"क्यों मम्मी क्या हुआ...।' मम्मी बोलीनहीं बेटा ,"ये पाप है"। उमर के उस दौर में मुझे कुश समझ नहीं आया कि मुझे अब क्या करना चाहिए।
मैं फिर से आँखें बंद करके लेट गया। तभी पता नहीं किस भावना के साथ मम्मी उठ कर अपने कमरे में जा कर सो गई।

उस रात के बाद से मेरा व्यवहार पूरी तरह बदल गया। मैं एकदम चुप रहने लगा। न किसी से बात करना, न किसी की तरफ देखना। मैंने खाना पीना लगभग छोड़ दिया था। मैं बस एक ज़िंदा लाश की तरह अपने कमरे में पड़ा रहता। शाम ढलते ही लाइट्स बंद कर लेता।मेरा यह **'इमोशनल ड्रामा'** मम्मी को अंदर ही अंदर खाए जा रहा था। उन्हें लग रहा था कि उन्होंने अपने बेटे का दिल दुखी किया है।मम्मी के मन में अपराधबोध का एक अजीब सा तूफान चल रहा था। उन्हें लग रहा था कि उनकी बेरुखी ने मेरे मासूम दिल को तोड़ दिया है। वह मुझे यह महसूस कराना चाहती थीं कि मैं अकेला नहीं हूँ।

दो तीन दिन ही बीते होंगे ,मै अपने कमर में सोने की
कोशिश कर रहा था पर नींद का कोई आता पता नहीं था,मै सोच रहा था क्या मेरा ये प्लान असफल हो गया?,कही अंकल ने मुझे बेवकूफ तो नहीं बना दिया? क्या मम्मी के साथ sex करने का मेरा सपना अब कभी पूरा नहीं होगा?मम्मी का वो वो गोरा चिट्ठा नंगा और कामिक बदन मेरे दिमाग में घूम रहा था।मैने अपने दिमाग में चल रहे सब विचारों को झटक कर फिर से सोने की कोशिश के तहत अपनी आंखें बंद का लीं पर नींद तो आने का नाम ही नहीं ले रही थी।
तभी जैसे कोई चमत्कार हो गया हो ,मम्मी दबे पाँव मेरे कमरे में दाखिल हुईं
वह धीरे से बिस्तर के पास आईं और बिना कुछ सोचे, अंधेरे का फायदा उठाते हुए मेरे बगल में लेट गईं। कमरे में इतना अंधेरा था कि कुछ साफ दिखाई नहीं दे रहा था, बस एक भारी सन्नाटा था। मैंने गहरी नींद का नाटक जारी रखा, लेकिन मेरा दिमाग पूरी तरह जाग रहा था। मुझे उनकी मौजूदगी का अहसास हो रहा था।

जैसे ही वह मेरे करीब आईं, मैने नींद में होने का बहाना करते हुए अपना हाथ मम्मी के ऊपर रख दिया, जैसे ही मेरा हाथ उनके शरीर से टकराया, मेरे शरीर में एक बिजली सी दौड़ गई। मुझे लगा जैसे मेरा हाथ किसी कपड़े से नहीं, बल्कि सीधे **कोमल और गर्म त्वचा** से टकराया है।

मैं चौंक गया। मैंने अंधेरे में ही महसूस किया कि वह **बिल्कुल नग्न** थीं। उनके शरीर की गर्माहट और उनकी त्वचा का अहसास इतना वास्तविक था कि मेरी सांसें थम गईं। वह बिना किसी कपड़े के, पूरी तरह से असुरक्षित और समर्पित होकर मेरे पास लेटी हुई थीं। उस पल मुझे समझ आ गया कि वह केवल 'माँ' बनकर मुझे सांत्वना देने नहीं आई थीं, बल्कि उन्होंने मेरा रूखापन और तड़प को देखते हुए अपनी सारी मर्यादाएँ और शर्म पीछे छोड़ दी थी। वह खुद को पूरी तरह मेरे हवाले कर चुकी थीं।


उस पल कमरे का तापमान जैसे अचानक बढ़ गया था। अंधेरे में भी मैं उनकी तेज चलती हुई साँसों की आवाज़ साफ सुन सकता था। मेरा हाथ अभी भी उनकी उस मखमली और गर्म त्वचा पर टिका हुआ था। मुझे लगा कि वह डर के मारे जम गई हैं, लेकिन उन्होंने मुझे पीछे धकेलने की कोई कोशिश नहीं की। इसके बजाय, उन्होंने एक लंबी और भारी आह भरी, जो उनके भीतर चल रहे द्वंद्व और समर्पण का प्रमाण थी।
इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता, उनकी ममता और वासना के बीच का संघर्ष खत्म हो चुका था। उन्होंने धीरे से अपना हाथ मेरे सीने पर रखा और बहुत ही कोमल लेकिन दृढ़ता के साथ मेरी टी शर्ट को ऊपर की ओर खींचना शुरू किया। उनकी उँगलियाँ मेरी त्वचा को सहलाते हुए मेरे शरीर से कपड़ा अलग कर रही थीं। जैसे ही मेरी टी शर्ट सिर के ऊपर से निकली और बिस्तर पर गिरी, मुझे उनकी गर्म हथेलियों का अहसास अपनी नग्न छाती पर हुआ। वह मेरे शरीर की गर्मी को महसूस करना चाहती थीं।

फिर उनके हाथ मेरे पजामे की गाँठ तक पहुँचे। उनकी साँसें अब और भी भारी और अनियंत्रित हो चुकी थीं। उन्होंने बहुत ही धीमी और काँपती हुई उँगलियों से पजामे की गाँठ को ढीला किया। जैसे ही पजामे का दबाव कम हुआ, उन्होंने उसे धीरे धीरे मेरे पैरों के नीचे तक सरका दिया। उन्होंने अपने दोनों हाथों से मेरे नग्न शरीर को ऐसे सहलाया जैसे वह किसी पवित्र वस्तु को छू रही हों, लेकिन उनके बदन में एक अलग ही प्यास मै fमहसूस कर रहा था।



मैंने अपनी आँखें नहीं खोलीं, लेकिन मेरा दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था। मैंने धीरे से अपनी उँगलियों को उनके शरीर पर और गहराई से चलाना शुरू किया। जैसे ही मेरा हाथ उनके शरीर के उभारों से टकराया, उनके शरीर में एक सिहरन सी दौड़ गई। उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं और अपना सिर धीरे से मेरे कंधे की ओर झुका दिया। उनकी गर्म साँसें अब मेरी गर्दन को छू रही थीं।

तभी उन्होंने बहुत ही धीमी और काँपती हुई आवाज़ में फुसफुसाते हुए कहा, *"रवि... मेरा बच्चा..."* उनकी आवाज़ में ममता कम और एक औरत की बेबसी ज़्यादा थी। उन्होंने अपना नग्न शरीर धीरे से मेरे शरीर के साथ सटा लिया। उनकी त्वचा की गर्मी अब मेरे पूरे शरीर में उतर रही थी। उस सन्नाटे में, दो शरीरों का आपस में टकराना और उनकी रगड़ का अहसास इतना तीव्र था कि मेरा नियंत्रण खोने लगा था। मैंने महसूस किया कि वह अब खुद को पूरी तरह ढीला छोड़ चुकी थीं, जैसे वह चाहती हों कि मैं अब आगे बढ़ूँ और जो कुछ भी होना है, उसे होने दूँ।
अंधेरे कमरे में अब सिर्फ दो जिस्मों की बेताबी और उनकी भारी होती सांसों का शोर था। हमारे दोनों के नग्न शरीर पूरी तरह एक दूसरे में उलझ चुके थे। मम्मी की त्वचा की वो रेशमी गर्माहट और उनके शरीर का भारीपन मेरे ऊपर इस कदर हावी था कि मेरा दिमाग काम करना बंद कर चुका था। उनके नग्न अंगों का मेरे शरीर से रगड़ खाना एक ऐसी बिजली पैदा कर रहा था जो मेरे पूरे वजूद को झकझोर रही थी।

मम्मी ने अपनी बेताबी को और बढ़ाते हुए मुझे बिस्तर पर पूरी तरह दबा लिया। उनके शरीर का हर उभार, उनकी छाती की कोमलता और उनके अंगों का दबाव मेरे अंगों से टकराकर मुझे पागल कर रहा था। उनकी सांसें मेरी गर्दन पर तप रही थीं। उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के, अपनी पूरी वासना को मुझ पर जाहिर कर दिया। उनके हाथों का स्पर्श अब और भी उग्र और बेखौफ हो गया था।

जैसे ही उन्होंने खुद को पूरी तरह मेरे करीब लाया, हमारे बीच का घर्षण चरम पर पहुँच गया। उनके शरीर की उत्तेजना और मेरी बेकाबू होती प्यास ने मिलकर एक ऐसा माहौल बना दिया था जहाँ अब कोई मर्यादा नहीं बची थी। उनके अंगों का मेरे अंगों के साथ वो जबरदस्त और रसीला घर्षण अब एक गहरे मिलन की ओर बढ़ रहा था।

मम्मी की आँखों में एक अजीब सी मदहोशी थी और उनके शरीर की हर हरकत मुझे और भी उत्तेजित कर रही थी। उनके नग्न शरीर की रगड़ और उनकी भारी साँसों के बीच, अब हम दोनों एक ऐसी चरम सीमा की ओर बढ़ रहे थे जहाँ सिर्फ मांस का मांस से टकराना और एक दूसरे के भीतर समा जाने की तीव्र इच्छा ही शेष थी। वह पल इतना उग्र और तीव्र था कि ऐसा लग रहा था जैसे पूरी दुनिया थम गई है और बस हम दोनों का यह नग्न और अनियंत्रित मिलन ही सच है।
> "...अंधेरे में हम दोनों की साँसें एक दूसरे के शरीर से टकरा रही थीं। तभी अचानक... **'खट... खट... खट...'**।
>
> दरवाज़े पर किसी के धीरे धीरे दस्तक देने की आवाज़ आई। मेरे शरीर का खून जैसे जम गया। मम्मी का हाथ मेरे कंधे पर कस गया और उनकी साँसें एकदम से थम गईं। हम दोनों बिना किसी हरकत के, पत्थर की तरह बिस्तर पर पड़े रहे। अंधेरे में डर और वासना का ऐसा संगम था कि समझ नहीं आ रहा था कि मैं डर से कांप रहा हूँ या उत्तेजना से। क्या कोई हमें इस हाल में देख लेगा? क्या हमारी ये गुनाहगार रात यहीं खत्म हो जाएगी?"
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#73
Zabardast aur jhakkas update
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#74
(24-08-2026, 07:09 AM)Sumitra Sen Wrote: Zabardast aur jhakkas update

"Sumitra Sen जी, आपके इस शानदार कमेंट के लिए बहुत बहुत धन्यवाद! आपकी सराहना ने मेरा हौसला और बढ़ा दिया है। ❤️"
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#75
Wonderful & amazing erotic update continue ur writing
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#76
(24-08-2026, 09:10 AM)sdd2686 Wrote: Wonderful & amazing erotic update continue ur writing

"आपके इन शब्दों के लिए बहुत बहुत शुक्रिया! आप न केवल एक पाठक हैं, बल्कि मेरी प्रेरणा भी हैं। शुरू से लेकर आज तक जिस तरह आपने मुझे मोटिवेट किया है, उसके बिना यह सफर इतना खूबसूरत नहीं होता। आपका यह 'Wonderful and Amazing' कहना मेरे लिए बहुत मायने रखता है। बस ऐसे ही साथ बने रहें! ❤️?"
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#77
bahut bahut shandaar writings
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#78
(24-08-2026, 12:21 PM)Jasmin. Wrote: bahut bahut shandaar writings

"आपकी सराहना के लिए तहे दिल से शुक्रिया! आपके शब्द मेरे लिए बहुत मायने रखते हैं। ❤️?"
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#79
Mast hai yaar plz NXT update de do jaldi se
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#80
Bahut mast
Plz NXT update de do jaldi se
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