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Misc. Erotica Kahani mere ghar ki
#41
Hello dosto kaise ho aap,muje lagta hai ke aaj update aap ko pasand nhi aiyea ,aap muje bta sakkte hain bina hichkichat,mai is post ko hta  duna aur usi tarha ka update dunga jaisa aap sab chaheinge,yad kisi ki bhavna ko thes pahuchi ho to tahedil se mafi mangta hu।
Apni rai btao usi mutabik agla update hoga।
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#42
Bahut pasand aya app bahut mast lighter ho chudne do mummy bese bhi lund ki jarurat he Mummy ko aur mummy ki sewa kare beta jese daily pair dabaye
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#43
(15-08-2026, 09:39 PM)Motalund14 Wrote: Hello dosto kaise ho aap,muje lagta hai ke aaj update aap ko pasand nhi aiyea ,aap muje bta sakkte hain bina hichkichat,mai is post ko hta  duna aur usi tarha ka update dunga jaisa aap sab chaheinge,yad kisi ki bhavna ko thes pahuchi ho to tahedil se mafi mangta hu।
Apni rai btao usi mutabik agla update hoga।

Bhai aap acha likh rahe ho aap apne hisab se likho apke story hai agar aap sabke hisab se likhoge toh story kharab hojayege sabki alag alag pasand hoti hai aap ko jo pasand hai ya aap jis direction mai story ko lejana chahate ho uss hisab se likho
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#44
Bro but yrr tum itna ghuma phira ke likhate ho ki excitement hei khatam hojata hai real story ki jagah bus imagination hei chalte rhete hai tumne room ke upper hei pura update likh diya
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#45
Ok,thanks, thik hai dost aage se poora khyal rakhuga।
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#46
दुकान के उस सन्नाटे में मैं बस पत्थर बना बैठा था। बाहर की दुनिया से मेरा कोई नाता नहीं रह गया था। मेरा दिमाग उस एक ही मंज़र में फँसा हुआ था। प्रदीप अंकल की वो गंदी और नीच आवाज़ मेरे कानों में ज़हर की तरह घुल रही थी। वो जिस तरह से मेरी माँ को लफ़्ज़ों से काट रहे थे, जिस तरह से उन्हें एक 'गिरे हुए' और 'बेशर्म' औरत की तरह ज़लील कर रहे थे, वो सुनकर मेरा दिल जैसे सीने से बाहर निकल कर गिर गया।

मेरा दम घुट रहा था। एक तरफ वो अपमान था जो मेरी माँ की इज़्ज़त को मिट्टी में मिला रहा था, और दूसरी तरफ वो नज़ारा जो मेरी आँखों के सामने घटा था। "क्या सचमुच मेरी माँ इतनी गिरी हुई औरत है?" यह सवाल मेरे दिमाग में किसी हथौड़े की तरह बार बार चोट कर रहा था। मेरा दिल बैठता जा रहा था, एक अजीब सी भारीपन और घबराहट मुझे अंदर ही अंदर खाए जा रही थी।

प्रदीप अंकल का वो लहज़ा, वो ज़िल्लत भरे शब्द "तुम जैसी औरतें सिर्फ इसी लायक हैं" सुनकर मुझे ऐसा लग रहा था जैसे कोई मेरे ही वजूद को नोच रहा हो, साथ ही एक गहरी शर्मिंदगी और बेबसी मुझे जकड़े हुए थी। मैं खुद से नफरत कर रहा था मेरा मन चीखना चाहता था, पर मेरा गला सूख चुका था। मैं दुकान के काउंटर पर बैठा बस उस अपमान और उस गंदी हकीकत के बोझ तले दबकर रह गया था।

मेरी आँखों के सामने अंधेरा छा रहा था, लेकिन दिमाग में एक अजीब सी छटपटाहट थी। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूँ।
अचानक मुझे याद आया कि पिछले हफ्ते जब मैं शहर के पुराने बाज़ार की उन तंग गलियों से गुज़र रहा था, तो एक पुरानी किताबों की दुकान के कोने में मुझे यह किताब मिली थी। वह दुकान बहुत ही धुंधली और अजीब सी थी, जहाँ सिर्फ पुरानी और कुछ 'वर्जित' मानी जाने वाली किताबें ही मिलती थीं। दुकानदार ने मुझे वह किताब एक मखमली कपड़े में लपेटकर दी थी और उसकी आँखों में एक ऐसी चमक थी जैसे वह कोई बहुत बड़ा राज़ बेच रहा हो। उस वक्त मैंने इसे सिर्फ जिज्ञासावश खरीदा था, मैने पता नहीं किस भावना तहत व
कांपते हाथों से किताब निकाली , वह किताब मेरे लिए किसी जीवन रक्षक की तरह सामने आ गई।

मैंने पन्नों को पलटने लगा। मेरी आँखें उन शब्दों पर ठहर गईं जो मेरे दिमाग में चल रहे तूफान को एक ठोस आकार दे रहे थे। किताब के उस अध्याय में एक पति पत्नी के बीच के उस नग्न और बेबाक दृश्य का वर्णन था, जिसे पढ़ते ही मेरे रोंगटे खड़े हो गए। उसमें लिखा था कि कैसे चरम उत्तेजना के उस पागलपन में पति अपनी पत्नी को गंदे शब्दों से नवाज़ रहा था। वह चिल्लाकर कह रहा था, *"तुझे ऐसी रंडी बनाऊँगा कि तेरा अपना कौठा खोल दूँगा, जहाँ हर कोई आए और तुझे इस्तेमाल करे!"* और सबसे भयानक बात यह थी कि किताब में लिखा था कि पत्नी भी उस गंदे अपमान का आनंद ले रही थी। वह हाँफते हुए और उत्तेजना में डूबी हुई जवाब दे रही थी, *"हाँ! मुझे रंडी बना दो, मुझे रोज़ नए नए लंड चाहिए, मुझे बस तुम्हारी ये गंदी बातें और ये मर्दानगी चाहिए!"*

किताब में आगे लिखा था कि कैसे अगले ही पल वे दोनों पूरी तरह से शांत हो जाते हैं और सुबह होते ही वे फिर से वही सभ्य और मर्यादित पति पत्नी बन जाते हैं। लेखक ने अंत में एक विशेष नोट लिखा था: *"चरम उत्तेजना के क्षणों में इंसान अपनी सामाजिक पहचान और नैतिकता को त्याग देता है; उस वक्त बोले गए शब्द चरित्र का हिस्सा नहीं, बल्कि केवल कामुकता की पराकाष्ठा होते हैं।"* इन शब्दों को पढ़ते ही मेरे मन का बोझ अचानक हल्का होने लगा। मुझे लगा जैसे मुझे कोई जवाब मिल गया हो।
मैं उस सुबह के उस मंजर को याद करने लगा माँ का वह पसीने से लथपथ और चिपचिपा सेक्सी बदन, जो कामवासना के चरम पर पागलों की तरह थरथरा रहा था। उनकी भारी और बेकाबू साँसों की वह गंदी आवाज़ और उनके शरीर की वह बेतहाशा, मदहोश कर देने वाली हरकतें मेरी नसों में बिजली की तरह दौड़ रही थीं। और फिर मेरी यादों के अंधेरे में अंकल का वह विकराल, मोटा और सख्त लंड उभर आया, जो माँ की गीली और तड़पती हुई चूत के साथ एक हिंसक और दरिंदे की तरह खेल रहा था। मैं उस दृश्य को बार बार याद कर रहा था कि कैसे वह गरम और कठोर लंड माँ की कोमल और भीगी हुई चूत के अंदर धंस रहा था और बार बार उस मांस के टुकड़े से टकरा रहा था। वह दृश्य इतना कच्चा, इतना गंदा और इतना असली था कि मुझे अपनी त्वचा पर भी उस मर्दानगी की गर्मी और उस गीलेपन का अहसास होने लगा। मेरा दिमाग बार बार उसी बिंदु पर जाकर रुक जाता जहाँ माँ की वह सुंदर चूत अंकल के उस विशाल और बेकाबू लंड के आगे पूरी तरह से हार मान चुकी थी और उसकी मर्दानगी के नीचे पूरी तरह से दब गई थी। वे गंदी यादें अब मेरे दिमाग से हट नहीं रही थीं, बल्कि वे मेरे वजूद का हिस्सा बनती जा रही थीं।
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#47
ashadaran, mast aur zabardast update
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#48
Hot update
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#49
करीब 9 बजे, दुकान की उस छोटी सी खिड़की से जो दुकान के अंदर से घर की तरफ खुलती थी, मम्मी की आवाज़ आई। "बेटा, खाना घर बैठ कर खाओगे या दुकान पर ही ले आऊं?" उनकी आवाज़ में वही पुरानी सादगी, मासूमियत और ममता भरी मुस्कान थी। वे बिल्कुल शांत और खिली खिली लग रही थीं, जैसे उनके चेहरे पर एक अजीब सी संतुष्टि का भाव हो।

उन्हें देखकर मेरे मन में एक विचार आया कि अगर मैं घर जाकर खाना खाऊँगा, तो अंकल और घर की असली स्थिति का पता चल जाएगा। मैं तो बस यही दिखावा कर रहा था कि मैं सुबह सुबह मंदिर गया हुआ था, जबकि सच तो यह था कि मैं वहीं मौजूद था। **मुझे उस समय यह समझ नहीं आ रहा था कि अंकल ने कितनी चालाकी से यह सब किया था। मुझे तब तक यह एहसास नहीं था कि अंकल ने जानबूझकर मुझे अपने उस विकराल लंड का रूप दिखाया था और उसे माँ की चूत में फिसलते हुए दिखाया था। मुझे लगा कि वह सब बस एक इत्तेफाक था, पर असल में शायद कुछ और ही होने वाला था ,जिसकी भूमिका खुद कुदरत बंद रही थी।**
मैंने कहा, "मैं घर में बैठ कर ही खा लेता हूँ, आप खाना लगा दो।" मम्मी बोलीं, "चलो, मैं खाना लगा कर आती हूँ, तुम भी खा लो और अंकल भी खा लेंगे। आज उनकी तबीयत ठीक नहीं थी, तो उन्होंने छुट्टी ले ली है और अभी आराम कर रहे हैं। तुम दोनों खा लो, तब तक मैं दुकान देख लेती हूँ।" इसके बाद मम्मी खाना लगा कर दुकान पर आ गईं और मैं घर चला गया।
तभी खाना खाते समय अंकल ने अचानक मेरी तरफ देखा। उनकी आँखों में एक अजीब सी बेचैनी और डर साफ़ दिख रहा था। उन्हें पक्का यकीन था कि मैंने उन्हें देख लिया है, और इसी डर से वो घबराए हुए थे कि कहीं मैं उनकी पोल न खोल दूँ।

मेरे मन यही था के अंकल को बिल्कुल नहीं पता के मैं खिड़की से सब कुश देख चुका था,मैं अपनी थाली में नीचे देख रहा था और चुपचाप खाना खा रहा था। मैं नहीं चाहता था कि अंकल को ज़रा भी शक हो कि मुझे सब पता है। मैं तो बस चुपचाप छुपकर देखना चाहता था, क्योंकि सालों से मेरे मन में ये इच्छा थी। अगर उन्हें पता चल जाता कि मैंने सब देखा है, तो शायद मुझे आगे कभी ऐसा देखने का मौका ही न मिलता। इसलिए मैं पूरी कोशिश कर रहा था कि मैं बिल्कुल सीधा सादा बच्चा बना रहूँ और उन्हें लगे कि मुझे कुछ नहीं पता।

पर अंकल की वो घूरती हुई और बेचैन आँखें मुझे बार बार महसूस करा रही थीं कि वो मेरे बारे में ही सोच रहे हैं,पर क्या सोच रहे है समझ नहीं पा रहा था।
दोपहर के करीब 2:40 बज रहे थे। मैंने अपने दोस्त से कहा, "5 मिनट रुको, मुझे घर में कोई काम है, मैं जा के आता हूँ।" मैं घर के अंदर गया। घर में पसरे उस सन्नाटे के बीच मुझे अंकल के कमरे से कुछ सिसकियाँ सुनाई दे रही थीं।

मैं दबे पाँव उस कमरे की ओर बढ़ा। जैसे ही मैंने दरवाज़े की दरार से अंदर झाँका, मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं।
कमरे के अंदर का नज़ारा इतना **गंदा और उत्तेजक** था कि मेरा पूरा शरीर सुन्न पड़ गया। मम्मी बिस्तर पर थीं, और उनकी हालत देखकर मेरा गला सूख गया। उनके शरीर पर कपड़े पूरी तरह से अस्त व्यस्त थे और उनकी त्वचा पर पसीने की चमक साफ़ दिख रही थी। अंकल उनके ऊपर थे और उनके बीच की **जबरदस्त और बेकाबू** हलचल इतनी तीव्र थी कि कमरे का तापमान बढ़ता हुआ महसूस हो रहा था। मम्मी की वे सिसकियाँ अब और भी गहरी और **कामुक** हो गई थीं। जब भी अंकल उनके शरीर के साथ एक खास लय में **धक्के मारते और रगड़ते** थे, मम्मी के मुँह से एक लंबी और **गंदी** आह निकलती। उनकी आँखें आधी बंद थीं और वे पूरी तरह से उस **अत्यधिक कामुक** अहसास में डूबी हुई थीं।

अंकल की भारी मर्दानगी और मम्मी के शरीर का वह **रसीला और मांसल** मिलन देखकर मेरे अंदर एक अजीब सी **हवस की** लहर दौड़ गई। उनके अंगों के बीच से निकलने वाला **गीलापन और चिपचिपा पानी** बिस्तर की चादर को भिगो रहा था, और जब अंकल का शरीर मम्मी के शरीर से टकराता, तो वह **गीलापन और तरल पदार्थ** एक गंदी आवाज़ के साथ बाहर छलक रहा था। उनकी सिसकियाँ और उनके शरीर के टकराने की वह **चप चप** आवाज़ मेरे कानों में किसी नशीले संगीत की तरह गूँज रही थी। मैं बस वहीं खड़ा होकर उस **अश्लील** और बेकाबू होते दृश्य को अपनी आँखों में भर लेना चाहता था।

लेकिन जैसे ही मैं उस **कातिलाना** नज़ारे में और गहराई से डूबने की कोशिश कर रहा था, अचानक मुझे एक अजीब सी घबराहट हुई। मेरा दिल ज़ोरों से धड़कने लगा। बिना कुछ सोचे समझे, मैं तेज़ क़दमों से वहाँ से बाहर की ओर भागा। मैं उस **हवस भरे** नज़ारे के प्रभाव से बाहर निकलना चाहता था, लेकिन मैं यह बिल्कुल नहीं जानता था कि उस **खतरनाक** पल में, अंकल की नज़रें दरवाज़े की उस दरार से सीधे मेरी आँखों में जा धंसी थीं। उन्होंने मुझे देख लिया था। उनकी आँखों में पकड़ी जाने का डर नहीं, बल्कि एक अजीब सी शिकारी चमक थी, जैसे वे मुझे उस दृश्य का हिस्सा बनने के लिए चुनौती दे रहे हों। पर मैं उस पल की तीव्रता को झेल नहीं पाया और बदहवास होकर बाहर निकल आया।
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#50
Fantastic and fascinating writing ✍️
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#51
रात का सन्नाटा गहरा रहा है। डाइनिंग टेबल पर लाइट हल्की है और माहौल में एक अजीब सी भारीपन और **कामुक तनाव** है। मैं (रवि) अपनी प्लेट में खाना खत्म कर रहा हूँ, लेकिन मेरा पूरा ध्यान मम्मी और अंकल पर है। मैं देख पा रहा हूँ कि अंकल की नज़रें बार बार मम्मी के **गहरे गले और उभारते हुए सीने** पर टिक रही हैं। उनके चेहरे पर एक ऐसी **गंदी और भूखी चमक** है जिसे वे छिपा नहीं पा रहे।

मैं जानबूझकर अपनी आवाज़ में थोड़ी थकावट लाता हूँ और कहता हूँ, "मम्मी, डॉक्टर ने कहा ह नींद की गोली खाने को, मैं गोली खाकर सो जाता हूँ।"

जैसे ही मेरे मुँह से ये शब्द निकलते हैं, कमरे की हवा जैसे बदल जाती है। मैं देखता हूँ कि अंकल की आँखों में एक **अश्लील और विजयी चमक** कौंध जाती है। वे मेरी तरफ देखते हैं, फिर धीरे से मम्मी की तरफ मुड़ते हैं। मम्मी और अंकल के बीच शब्दों की ज़रूरत नहीं पड़ती। वे बस एक दूसरे की आँखों में देखते हैं एक ऐसा **गहरा और कामुक इशारा** जो सिर्फ दो प्यासे शिकारी ही समझ सकते हैं। उनकी आँखों की वह भाषा चीख चीख कर कह रही है: *"आज तो भगवान हम पर बहुत दयालु हैं। आज रात कोई रुकावट नहीं होगी,हम अपना खेल खुल कर खेलेंगे।"*

मम्मी के चेहरे पर एक हल्की सी शर्म और बहुत ज़्यादा **हवस भरी बेचैनी** है। वे जानती हैं कि जैसे ही मैं अपनी आँखें मूँद लूँगा, वे दोनों अपनी **बेकाबू और गंदी इच्छाओं** के साथ एक हो जाएँगे। मैं अपनी गोली हाथ में लेता हूँ, उनके उन **लालची चेहरों** को देखता हूँ और मन ही मन मुस्कुराता हूँ। मुझे पता है कि आज रात मैं सिर्फ सो नहीं रहा हूँगा, बल्कि उनकी उस **रसीली और अश्लील तबाही** का सबसे नज़दीकी गवाह बनूँगा।

मैं गोली निगलने का दिखावा करता हूँ और धीरे धीरे बिस्तर की ओर बढ़ता हूँ, और जा के लेट कर, थोड़ी देर बाद आंखें मूंद कर सोने का दिखावा करता हूं।
जैसे ही उन्हें यकीन हो जाता है कि मैं गहरी और बेसुध नींद में हूँ, कमरे का माहौल पूरी तरह बदल जाता है। अंकल की आँखों में अब कोई हिचकिचाहट नहीं है, सिर्फ एक **जंगली और बेकाबू हवस** है। वे झपटकर मम्मी के पास पहुँचते हैं और उनके **मसालेदार और उभरे हुए स्तनों** को पूरी ताकत से दबोच लेते हैं। वे मम्मी को खींचते हुए बेड की ओर ले जाने लगते हैं।

मम्मी, जो अब तक खुद को संभाल रही थीं, अंकल के इस **हिंसक और कामुक स्पर्श** से सिहर उठती हैं। वे हल्की सी आवाज़ में कहती हैं, "अरे रुको... पहले किचन का काम तो खत्म कर लूँ।" वे थोड़ा हिचकिचाती हैं और फिर धीरे से कहती हैं, "और हाँ, हमें दूसरे कमरे में सोना चाहिए...

लेकिन अंकल अब बिल्कुल भी सुनने के मूड में नहीं हैं। उनकी सांसें भारी हो चुकी हैं और उनकी मर्दानगी उनके शरीर में तड़प रही है। वे मम्मी के कान के पास झुककर एक **गंदी और गहरी आवाज़** में कहते हैं, "अब क्या डर है? बच्चा गहरी नींद में है। आज मैं तुझे बिल्कुल **नंगा** रखूँगा और पूरी रात तेरी **सवारी** करूँगा।" उनकी यह बात सुनकर मम्मी के शरीर में एक अजीब सी थरथराहट दौड़ जाती है।

मम्मी शरारत भरे अंदाज़ में, अपनी आँखों में वही **कामुक चमक** लिए मुस्कुराती हैं और कहती हैं, "मारना है क्या मुझे? मुझे तो लगता है कल ही रवि के पापा को आना पड़ेगा मेरा **अंतिम संस्कार** करने।" उनकी इस बात में एक तरह का मज़ाक है, लेकिन उनके शरीर की भाषा बता रही है कि वे भी इस **अश्लील और Taboo** मिलन के लिए अंदर ही अंदर पिघल रही हैं।
अंकल एक टेढ़ी मुस्कान के साथ उनके शरीर को और कसकर जकड़ लेते हैं और मज़ाक के लहजे में कहते हैं, "इतनी कमज़ोर तो तू भी नहीं है जो एक रात मेरे नीचे रहने पर मर जाएगी। शायद तू भूल गई है, जब बच्चे छोटे थे, तब मैं तुझे दिन में तीन चार बार चोंदता था। तू खुद बताती थी कि रवि के पापा भी तुझे रात में तीन चार बार चोंद चुके होते थे।"

वे मम्मी के कान को अपने दांतों से हल्का सा काटते हुए आगे बढ़ते हैं, "पहले तो मैं डर गया था कि मैं तुझे संतुष्ट कर भी पाऊँगा या नहीं, पर बाद में तुझे मेरा साथ पसंद आने लगा था। तू मेरे लिए हमेशा तैयार रहती थी। मैं तुझे इसलिए याद दिला रहा हूँ कि यदि तुझे तब खुद पर काबू नहीं था, तो अब क्या होगा? अब तो तू बिल्कुल **गदराई घोड़ी** बन चुकी है।"
मम्मी अपनी साड़ी का पल्लू ठीक करते हुए और चेहरे पर एक हल्की सी शर्म और कामुक मुस्कान लिए कहती हैं, *"बड़े गंदे हो तुम... हद होती है बात करने की!"* और फिर वे मुड़कर किचन की तरफ जाने लगती हैं, लेकिन उनके कदम भारी हैं और शरीर में एक अजीब सी सिहरन है।

अंकल उन्हें जाते हुए देखते हैं, उनकी नज़रें मम्मी के पीछे के हिस्से पर टिकी हैं। वे एक गहरी सांस लेते हैं और भारी आवाज़ में पीछे से चिल्लाते हैं, *"जल्दी आना! ज्यादा देर मत लगाना... क्योंकि ये छोटा बच्चा तेरी गोद में आने के लिए बहुत तड़प रहा है!"*

मम्मी किचन में पहुँचकर नल के पास खड़ी होती हैं, लेकिन उनके दिमाग में अंकल की वह बात गूँज रही है। उनका शरीर अब पूरी तरह से **'Ready'** हो चुका है


मैं बिस्तर पर लेटा हुआ था, मैंने नींद की गोली का बहाना बनाया था ताकि उन्हें लगे कि मैं गहरी नींद में हूँ, पर असल में मेरा पूरा ध्यान बाहर हो रही हर आहट पर था। मेरा शरीर उत्तेजना से तपा जा रहा था और दिमाग उन गंदी बातों को सुनकर पागल हो रहा था।

तभी मुझे कमरे में हलचल महसूस हुई। मैंने महसूस किया कि वे दोनों मेरे कमरे के पास आए। उन्होंने दबे पाँव आकर मेरे कमरे की **लाइट ऑफ** कर दी। कमरे में एकदम सन्नाटा छा गया, बस मेरी तेज़ चलती साँसों की आवाज़ आ रही थी।

मैंने सुना कि वे दोनों धीरे धीरे बाहर लॉबी की तरफ बढ़ रहे हैं। वे चाहते थे कि मैं सोता रहूँ और उन्हें लगा कि मैं कुछ नहीं सुन रहा। लॉबी में पहुँचकर मैंने उन भारी आवाज़ों को सुना सोफे को खींचने और हिलाने की आवाज़। वे उस **Adjustable Sofa cum Double Bed** को खींचकर उसे एक बड़े **Double Bed** में बदल रहे थे। सोफे के फ्रेम के टकराने और गद्दे को सेट करने की वह आवाज़ मेरे कानों में किसी नशीले संगीत की तरह गूँज रही थी।

अब वे दोनों लॉबी के उसी बिस्तर पर थे, और मैं अपने कमरे में अंधेरे में लेटा हुआ, बस उनकी अगली हरकत का इंतज़ार कर रहा था। मेरा **लंड** पैंट के अंदर इतना सख्त हो चुका था कि दर्द महसूस हो रहा था।

मैं अपने कमरे के अंधेरे में लेटा हुआ सोने का नाटक कर रहा था। तभी कमरे में मम्मी के आने की आहट हुई। मुझे लगा कि शायद वो मुझे देखने आई हैं। उन्होंने मेरे पास आकर बहुत ही कोमलता से मेरे सिर पर हाथ फेरा। उनके हाथों का वो स्पर्श इतना ममता भरा और सुकून देने वाला था कि एक पल के लिए मेरा दिल बैठ गया। मुझे डर था कि कहीं वो मेरी धड़कनों की तेज़ी से मेरी सच्चाई न भाँप लें। उन्होंने धीरे से लाइट बंद की और कमरे में सन्नाटा छा गया। उनके कदमों की आहट धीरे धीरे कमरे से बाहर लॉबी की तरफ बढ़ती चली गई।

जैसे ही उनके कदम कमरे से दूर हुए, मेरा पूरा ध्यान लॉबी की ओर चला गया। मैं जानता था कि बाहर अंकल प्रदीप उनका इंतज़ार कर रहे होंगे। सन्नाटे के बीच मुझे लॉबी से उन आवाज़ों का इंतज़ार था। और फिर, वो आवाज़ें आईं उस एडजस्टेबल सोफा कम बेड के फैलने की 'कड़क कड़क' और धातु के आपस में रगड़ने की आवाज़। वे दोनों मिलकर उस सोफे को एक बड़े डबल बेड में बदल रहे थे।

उस आवाज़ ने मेरे पूरे शरीर में एक सिहरन पैदा कर दी। मैं अपने बिस्तर पर लेटा हुआ, अपनी साँसें थामे, बस उस पल की कल्पना कर रहा था। मुझे महसूस हो रहा था कि अब वो सोफा एक बिस्तर बन चुका है और अब उनके बीच की सारी दूरियाँ खत्म होने वाली हैं। लॉबी का वो माहौल अब पूरी तरह बदल चुका था और मैं अपने कमरे के अंधेरे में लेटा हुआ, उस उत्तेजना को महसूस कर रहा था जो ठीक मेरे बाहर घटित हो रही थी।
मेरी आँखें दरवाज़े की उस दरार से चिपकी हुई थीं, जैसे मैं कोई शिकारी हूँ जो अपने शिकार को तड़पते देख रहा हो। लॉबी की रोशनी में जो नज़ारा शुरू हुआ, उसने मेरे दिमाग के सारे संयम तोड़ दिए। अंकल प्रदीप ने मम्मी को अपनी ओर खींचा और उनकी साड़ी के पल्लू को झटके से नीचे गिरा दिया। मम्मी की साड़ी सरकते ही उनके उभारते हुए मम्मे साफ़ दिखाई देने लगे। अंकल ने बिना वक्त गँवाए अपना हाथ उनके मम्मे पर रखा और उन्हें ज़ोर से भींचना शुरू कर दिया।

मम्मी के मुँह से एक दबी हुई आह निकली "आह्ह्ह... प्रदीप..." उनकी आवाज़ में डर नहीं, बल्कि एक गहरी भूख थी। अंकल ने उनके गले पर अपने दांत गड़ा दिए और उनके मम्मे के निप्पल को अपनी जीभ से चाटना शुरू कर दिया। मम्मी की सिस्सियाँ अब और भी तेज़ होने लगी थीं। "उह्ह्ह... आह्ह्ह..." उनके शरीर में एक थरथराहट सी दौड़ गई।

अंकल ने उनके ब्लाउज को ऊपर उठाया और उनके मम्मे पूरी तरह बाहर आ गए। अंकल ने एक मम्मे को अपने मुँह में भर लिया और उसे इतनी ज़ोर से चूसना शुरू किया कि मम्मी का सिर पीछे की ओर झुक गया। "आह्ह्ह... प्रदीप... बहुत अच्छा लग रहा है... उह्ह्ह..." उनकी आवाज़ में जो बेबसी और ख़ुशी थी, उसने मेरे अंदर के जानवर को जगा दिया।

तभी अंकल ने उनके पजामे के अंदर हाथ डाला और सीधे उनकी गीली चूत को छू लिया। मम्मी की एक लंबी और गंदी सी आह निकली "ओह्ह्ह... आह्ह्ह... हाँ वहीं..." अंकल की उँगलियाँ उनकी चूत के अंदर गहराई तक जा रही थीं और मम्मी का शरीर उस स्पर्श के लिए तड़प रहा था। मैंने देखा कि कैसे अंकल का मोटा और सख्त लंड उनके पजामे के बाहर से ही उभर रहा था। वे दोनों इस बात से बिल्कुल बेखबर थे कि अंधेरे में बैठा मैं उनकी हर एक सिसकी, हर एक आह और उनकी चूत से निकलने वाली गीली आवाज़ों को अपने भीतर उतार रहा हूँ।
अंधेरे में लेटे हुए मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं। लॉबी का वह नज़ारा अब और भी ज़्यादा गंदा और बेतहाशा होता जा रहा था। अंकल प्रदीप ने मम्मी के पजामे को नीचे की ओर खींचा और उनके नग्न शरीर को पूरी तरह से उजागर कर दिया। उनकी गीली और गुलाबी चूत अब रोशनी में साफ़ चमक रही थी, जो अंकल के हाथों के स्पर्श से और भी ज़्यादा भीग चुकी थी।

अंकल ने अपनी पैंट और अंडरवियर नीचे गिरा दी। उनका मोटा, नसें उभरा हुआ और सख्त लंड हवा में झूल रहा था, जो पूरी तरह से उत्तेजित था। मम्मी की नज़रें जैसे ही उस लंड पर पड़ीं, उनके मुँह से एक गंदी सी लार टपक गई। "ओह्ह्ह... प्रदीप... आपका लंड कितना बड़ा और सख्त लग रहा है... आह्ह्ह..." मम्मी की आवाज़ में अब कोई शर्म नहीं थी, बस एक जंगली भूख थी।

अंकल ने मम्मी को बेड के किनारे पर लिटा दिया और उनके दोनों मम्मे को अपने हाथों में लेकर उन्हें बेरहमी से मरोड़ने लगे। "उह्ह्ह... आह्ह्ह... प्रदीप... और ज़ोर से..." मम्मी की सिस्सियाँ अब पूरे कमरे में गूँज रही थीं। अंकल ने अपना भारी लंड मम्मी की गीली चूत के मुहाने पर टिकाया और एक झटके में उसे पूरा अंदर उतार दिया। "आह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह!" मम्मी की एक बहुत ही ऊँची और गंदी चीख निकली, जो सन्नाटे को चीरती हुई मेरे कानों तक पहुँची।

अंकल ने बिना रुके, पागलों की तरह अंदर बाहर करना शुरू कर दिया। "छप छप छप" की वह गीली आवाज़ उस सन्नाटे में साफ़ सुनाई दे रही थी उनकी चूत और लंड के आपस में टकराने की आवाज़। "आह्ह्ह... हाँ... ऐसे ही... और गहराई में... उह्ह्ह... आह्ह्ह..." मम्मी का शरीर हर झटके के साथ ऊपर नीचे उछल रहा था। अंकल का लंड जब उनकी चूत की गहराई में जा रहा था, तो मम्मी की आँखें ऊपर की ओर चढ़ रही थीं और उनके मुँह से बस बेतरतीब आहें निकल रही थीं। मैं अंधेरे में बैठा अपनी मर्दानगी को पकड़े हुए उनकी इस गंदी और रसीली करतूत को देख रहा था, मेरा अपना लंड भी अब फटने को तैयार था।
अंकल का पागलपन अब चरम पर था। वह मम्मी के शरीर पर किसी जंगली जानवर की तरह टूट पड़े थे। "छप... छप... छप..." की वह रसीली और गंदी आवाज़ अब और भी तेज़ हो गई थी क्योंकि मम्मी की चूत अब पूरी तरह से लंड के घर्षण से गीली होकर झाग छोड़ रही थी। अंकल ने मम्मी के दोनों पैरों को अपने कंधों पर चढ़ा लिया ताकि लंड उनकी चूत की गहराई तक पहुँच सकें। "आह्ह्ह... प्रदीप... मेरी फाड़ दोगे क्या... उह्ह्ह... बहुत गहरा जा रहा है... आह्ह्ह्ह!" मम्मी की आवाज़ अब एक बेकाबू चीख में बदल चुकी थी। उनके मम्मे झटकों के साथ हवा में उछल रहे थे और अंकल के हाथों के दबाव से उनके निप्पल एकदम लाल और सख्त हो गए थे।

अंकल का लंड जब उनकी चूत के अंदर पूरी ताकत से अंदर बाहर हो रहा था, तो मम्मी का पूरा शरीर धनुष की तरह तन जा रहा था। "ओह्ह्ह... हाँ... वहीं... मारो... और ज़ोर से मारो!" मम्मी अब पूरी तरह से अपनी मर्यादा भूल चुकी थीं। वह अंकल के लंड के हर झटके पर अपनी कमर को ऊपर की ओर उछाल रही थीं ताकि लंड की चोट अंदर तक महसूस कर सके। "आह्ह्ह... उह्ह्ह... आह्ह्ह!" उनकी सिसकियाँ अब एक गंदी लय में बदल गई थीं।

अचानक अंकल ने अपनी रफ़्तार और बढ़ा दी। वह अब बिना रुके, पागलों की तरह मम्मी की चूत में अपना लंड दे रहे थे। "आह्ह्ह... मैं आने वाली हूँ... प्रदीप... मैं फटने वाली हूँ... उह्ह्ह्ह!" मम्मी का शरीर काँपने लगा और उनकी आँखें पूरी तरह से सफ़ेद हो गईं। अंकल ने भी अपना जोर बढ़ा दिया और एक आखिरी, बहुत ही गहरा झटका देते हुए अपना गर्म और गाढ़ा वीर्य मम्मी की चूत की गहराई में उगल दिया। "आह्ह्ह्ह्ह्ह्ह!" मम्मी की एक लंबी और सुध बुध खो देने वाली चीख निकली और उनका शरीर ढीला पड़ गया। अंकल भी हाँफते हुए उनके ऊपर गिर पड़े। अंधेरे में बैठा मैं उनकी इस चरम सुख की गंध और उस गंदी आवाज़ को महसूस कर रहा था।
कमरे में पसरा सन्नाटा अब केवल उनकी भारी साँसों और पसीने की गंध से भरा हुआ था। मम्मी का शरीर अभी भी झटकों से काँप रहा था, जैसे उनके अंदर अभी भी अंकल के लंड की गर्मी महसूस हो रही हो। अंकल ने धीरे से अपना लंड उनकी गीली और ढीली पड़ चुकी चूत से बाहर निकाला। "पचचच..." की एक गंदी आवाज़ के साथ अंकल का लंड बाहर निकला और मम्मी की चूत से वीर्य की एक सफ़ेद धार बहकर बाहर निकल आई। "ओह्ह्ह... प्रदीप... कितना गरम था वो सब... आह्ह्ह..." मम्मी ने हाँफते हुए कहा, उनकी आवाज़ अभी भी काँप रही थी।

लेकिन यह अंत नहीं था। अंकल की आँखों में अभी भी वही जंगली चमक थी। उन्होंने मम्मी के चेहरे को अपने हाथों में लिया और उन्हें एक ज़ोरदार, गंदा और थूक से भरा हुआ चुंबन दिया। मम्मी ने भी बदले में अंकल की जीभ को अपनी जीभ से जकड़ लिया। "उह्ह्ह... प्रदीप... अभी और नहीं..." मम्मी ने धीरे से फुसफुसाया, लेकिन उनके शरीर की भाषा कुछ और ही कह रही थी। उनकी चूत अभी भी अंकल के वीर्य से लथपथ थी और उनके मम्मे अभी भी उत्तेजना से तड़प रहे थे।

अंकल ने मम्मी के कान के पास झुककर एक गंदी बात कही जिससे मम्मी की आँखों में फिर से वही प्यास लौट आई। अंकल ने मम्मी को पलट दिया और उन्हें घुटनों के बल खड़ा कर दिया। "उह्ह्ह... प्रदीप... क्या आप फिर से... आह्ह्ह..." मम्मी की बात अधूरी रह गई जब अंकल ने उनके पीछे से उनके मम्मे को पकड़ लिया और अपना सख्त हो चुका लंड फिर से उनकी गीली चूत के मुहाने पर टिका दिया। "आह्ह्ह... हाँ... फिर से मारो मुझे... उह्ह्ह... और भी गंदा तरीके से..." मम्मी की सिसकियाँ फिर से शुरू हो गई थीं, और मैं अंधेरे में बैठा अपनी लंड को और भी ज़ोर से दबा रहा था, उनकी इस अंतहीन कामुकता को देख कर।
अंकल ने मम्मी के कूल्हों को अपने हाथों से ज़ोर से जकड़ लिया और बिना किसी चेतावनी के अपना सख्त लंड उनकी गीली चूत के अंदर एक ही झटके में धंसा दिया। "आह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह! प्रदीप... उह्ह्ह... बहुत गहरा... बहुत ज़्यादा गहरा!" मम्मी की चीख इस बार और भी तीखी थी। उनके घुटने फर्श पर टकरा रहे थे और उनका पूरा शरीर अंकल के भारी झटकों के साथ आगे पीछे हो रहा था। अंकल अब पूरी तरह से जानवर बन चुके थे। वह मम्मी के पीछे खड़े होकर पागलों की तरह उनके शरीर पर वार कर रहे थे। "छप... छप... छप... थप... थप..." उनके शरीर के टकराने की आवाज़ और चूत से निकलने वाली गीली आवाज़ अब पूरी लॉबी में गूँज रही थी।

अंकल ने मम्मी के बालों को पीछे से पकड़कर उनका सिर ऊपर की ओर खींचा ताकि वह उनकी गर्दन पर अपने दाँत गड़ा सकें। "उह्ह्ह... आह्ह्ह... हाँ... ऐसे ही... मारो मुझे... उह्ह्ह... मेरी चूत फाड़ दो!" मम्मी अब पूरी तरह से कामुकता के नशे में चूर थीं। उनकी आँखें आधी बंद थीं और उनके मुँह से लार की एक पतली धार बह रही थी। अंकल का लंड जब उनकी चूत की गहराई में जा रहा था, तो मम्मी का पूरा निचला हिस्सा काँप रहा था। "आह्ह्ह... प्रदीप... मैं फिर से... मैं फिर से चरम पर जा रही हूँ... उह्ह्ह्ह!"

अंकल ने अपनी रफ़्तार को और भी बेकाबू कर दिया। वह अब मम्मी के शरीर को पूरी ताकत से झटक रहे थे। "आह्ह्ह... उह्ह्ह... आह्ह्ह!" मम्मी के मम्मे झटकों के साथ इधर उधर लटक रहे थे। अंकल ने एक आखिरी बार पूरी ताकत से अंदर वार किया और मम्मी की चूत के अंदर ही अपना गर्म वीर्य उगल दिया। "आह्ह्ह्ह्ह्ह!" मम्मी का शरीर एक ज़ोरदार झटके के साथ अकड़ गया और वह वहीं घुटनों के बल गिर पड़ीं। अंकल भी हाँफते हुए उनके ऊपर झुक गए, उनकी साँसें मम्मी की नंगी पीठ पर महसूस हो रही थीं। मैं अंधेरे में बैठा उनकी इस बेतहाशा कामुकता का गवाह बन रहा था।

मम्मी अभी भी फर्श पर घुटनों के बल झुकी हुई थीं, उनकी साँसें अभी भी उखड़ी हुई थीं और उनका शरीर पसीने से चमक रहा था। लेकिन अंकल अभी शांत होने वाले नहीं थे। उन्होंने मम्मी के कमर को पकड़कर उन्हें ऊपर की ओर उठाया और उन्हें बेड की तरफ खींच ले गए। "प्रदीप... रुकिए... अभी तो मैं... उह्ह्ह..." मम्मी की आवाज़ में थकान थी, लेकिन उनकी चूत अभी भी अंकल के पिछले वीर्य से गीली और उत्तेजित थी।

अंकल ने बिना कुछ कहे मम्मी को बेड पर पीठ के बल लिटा दिया और उनके दोनों पैरों को हवा में उठा लिया। "आज मैं तुम्हें रंडी की तरह चोद चोद कर पागल कर दूंगा," अंकल की आवाज़ में एक गंदी भूख थी। उन्होंने अपना फिर से सख्त हो चुका लंड मम्मी की गीली चूत के मुहाने पर रगड़ा। "आह्ह्ह... प्रदीप... आप तो रुक ही नहीं रहे... उह्ह्ह... मेरी चूत अब और नहीं सह पाएगी... आह्ह्ह्ह!" मम्मी ने अपनी आँखें मूँद लीं, लेकिन उनके शरीर की थरथराहट बता रही थी कि वह इस हमले के लिए तैयार हैं।

अंकल ने एक झटके में अपना लंड मम्मी की चूत की गहराई में उतार दिया। "आह्ह्ह्ह्ह्ह्ह! बहुत गहरा... उह्ह्ह... बहुत ज़्यादा!" मम्मी का शरीर बेड पर धनुष की तरह तन गया। अंकल अब एक मशीन की तरह काम कर रहे थे। "छप... छप... छप..." की आवाज़ अब और भी गंदी और तेज हो गई थी क्योंकि मम्मी की चूत अब पूरी तरह से लंड के घर्षण से झाग छोड़ रही थी। अंकल ने मम्मी के दोनों मम्मे पकड़कर उन्हें इतनी ज़ोर से भींचा कि उनके निप्पल एकदम सख्त और लाल हो गए। "आह्ह्ह... हाँ... ऐसे ही... चोदो... उह्ह्ह... मेरी रूह तक पहुँच जाओ!" मम्मी अब पूरी तरह से अपनी मर्यादा और होश खो चुकी थीं। वह बस अंकल के हर वार पर अपनी कमर ऊपर उठा रही थीं ताकि लंड और भी ज़्यादा अंदर महसूस कर सकें।
अंकल की आँखों में अब कोई इंसानियत नहीं बची थी, केवल एक जंगली जानवर की भूख थी। उन्होंने मम्मी के दोनों पैरों को पकड़कर उनके कंधों तक ऊपर खींच लिया, जिससे उनकी चूत पूरी तरह से खुल गई और अंदर का गुलाबी, गीला मांस साफ़ दिखाई देने लगा। "देख रही हो अपनी चूत को? कैसे मेरे लंड के लिए तरस रही है?" अंकल ने एक गंदी गाली देते हुए कहा। मम्मी का चेहरा शर्म और चरम उत्तेजना के मिश्रण से लाल हो गया था। "आह्ह्ह... प्रदीप... हाँ... मेरी चूत को बर्बाद कर दो... उह्ह्ह... इसे पूरी तरह गंदा कर दो!"

अंकल ने अपना लंड मम्मी की चूत के मुहाने पर जोर से रगड़ा और फिर बिना किसी रहम के, एक हिंसक झटके के साथ अंदर घुसा दिया। "आह्ह्ह्ह्ह्ह्ह! उह्ह्ह्ह... मर गई मैं! बहुत दर्द हो रहा है... पर बहुत अच्छा लग रहा है!" मम्मी की आवाज़ चीख और आह के बीच झूल रही थी। अंकल अब रुक नहीं रहे थे; वह मम्मी के शरीर पर ऐसे वार कर रहे थे जैसे वह कोई मांस का लोथड़ा हों। "थप! थप! थप!" उनके भारी कूल्हों के मम्मी के नितम्बों से टकराने की आवाज़ कमरे में गूँज रही थी। अंकल ने अपना एक हाथ मम्मी के मुँह में डाल दिया ताकि उनकी चीखें बाहर न जाएँ, और दूसरे हाथ से उनके मम्मे को इतनी ज़ोर से मरोड़ा कि मम्मी की आँखों से आँसू निकल आए।

"उह्ह्ह... आह्ह
मैं अंधेरे कोने में दुबका हुआ, अपनी साँसें रोके, उनकी इस अश्लील और बेतहाशा कामुकता को देख रहा था। मेरे अंदर एक अजीब सी बेचैनी और आग सी लगी हुई थी। जब मैं मम्मी को अंकल के नीचे तड़पते हुए और उनके लंड की हर गहरी चोट पर चीखते हुए देख रहा था, तो मेरा अपना लंड मेरी पैंट के अंदर पत्थर की तरह सख्त हो चुका था। मेरा दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि मुझे डर था कहीं उन्हें इसकी आवाज़ न सुनाई दे जाए।

मुझे एक साथ दो तरह की भावनाएँ महसूस हो रही थीं। एक तरफ, अपनी माँ को इस तरह एक अजनबी के सामने इतना गंदा और बेबस होते देख मेरे अंदर एक अजीब सा अपराधबोध (guilt) था, लेकिन दूसरी तरफ, जो नज़ारा मेरी आँखों के सामने था, वह इतना उत्तेजक था कि मैं खुद को रोक नहीं पा रहा था। मम्मी का वह बेकाबू होकर चिल्लाना, उनकी चूत से निकलने वाली वह गंदी 'छप छप' की आवाज़, और अंकल का वह जंगलीपन यह सब देखकर मेरा दिमाग सुन्न हो गया था।

मैं अपनी लंड को अपनी पैंट के अंदर इतनी ज़ोर से दबा रहा था कि मेरे हाथ काँप रहे थे। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं उस कमरे की गर्मी और उनके पसीने की गंध को महसूस कर सकता हूँ। मैं बस यही सोच रहा था कि काश मैं भी उस बिस्तर पर होता, काश उस लंड की जगह मेरा लंड होता जो मम्मी के शरीर को चीर रहा था। मेरी आँखों में एक अजीब सी चमक थी एक ऐसी भूख जो सिर्फ उस गंदगी और उस वासना को और करीब से देखने से मिट सकती थी। मैं बस एक दर्शक नहीं था, मैं उस कामुकता के पागलपन में पूरी तरह डूब चुका था।
अंकल की नज़र मुझ पर पड़ी, लेकिन उन्होंने मुझे टोकने या रोकने के बजाय अपनी कामुकता को एक नए और भयानक स्तर पर ले जाने का फैसला किया। उन्होंने मुझे देख लिया था, और मेरी मौजूदगी ने उनके अंदर के जानवर को और भी ज़्यादा पागल कर दिया था। वह अब मुझे यह दिखाने की कोशिश कर रहे थे कि वह मम्मी के शरीर के साथ क्या कर सकते हैं।

अंकल ने मम्मी के शरीर पर वार करना और भी हिंसक और बेतहाशा कर दिया। अब वह सिर्फ सेक्स नहीं कर रहे थे, वह जानबूझकर अपनी हर हरकत को मेरी तरफ मोड़ रहे थे। "देख रहे हो न?" अंकल की आँखों में एक क्रूर और गंदी चमक थी, जैसे वह सीधे मेरी आँखों में झाँक रहे हों और मुझे अपनी मर्दानगी का प्रदर्शन दिखा रहे हों। उन्होंने मम्मी के दोनों पैरों को और भी ज़ोर से ऊपर खींच लिया ताकि मैं उनकी चूत की हर हरकत, हर थरथराहट और अंकल के लंड का अंदर बाहर होना बिल्कुल साफ़ देख सकूँ।

मम्मी को इस बात का अंदाज़ा भी नहीं था कि उनका बेटा दरवाजे के पास खड़ा यह सब देख रहा है। वह तो बस उस चरम सुख और दर्द के भंवर में डूबी हुई थीं। "आह्ह्ह्ह... उह्ह्ह्ह... प्रदीप... आह्ह्ह्ह!" वह बस अपना नाम पुकार रही थीं, लेकिन वह मुझे नहीं, बल्कि उस बेकाबू मजे को पुकार रही थीं जो अंकल उन्हें दे रहे थे। अंकल अब पूरी ताकत से मम्मी के कूल्हों पर प्रहार कर रहे थे। "थप! थप! थप!" की आवाज़ इतनी तेज़ थी कि वह पूरे कमरे में गूँज रही थी। अंकल ने मम्मी के मम्मे को इतनी ज़ोर से भींचा कि उनके निप्पल पूरी तरह से सख्त होकर उभर आए। वह जानबूझकर मम्मी के शरीर को इस तरह से मोड़ रहे थे कि उनकी हर हरकत मेरे सामने एक अश्लील नज़ारे की तरह पेश हो रही थी। अंकल की हर thrust अब और भी गहरी और रफ़ थी, जैसे वह अपनी पूरी ताकत से मम्मी की चूत को चीर रहे हों।
अंकल की आँखों में एक जंगली पागलपन था। उन्हें पता चल गया था कि कोई उन्हें देख रहा है, और इस बात ने उनके अंदर के जानवर को और भी ज़्यादा बेकाबू कर दिया था। अब वह सिर्फ सेक्स नहीं कर रहे थे, वह एक प्रदर्शन कर रहे थे। उन्होंने मम्मी के कूल्हों को अपने हाथों में इतनी ज़ोर से जकड़ लिया कि उनकी उंगलियां मम्मी की गुलाबी त्वचा में धँस गईं।

"आह्ह्ह्ह... उह्ह्ह्ह... और तेज़... भाई साहब... प्लीज़ और तेज़ मारिए... आह्ह्ह्ह!" मम्मी पूरी तरह से मदहोश थीं। वह बार बार 'भाई साहब' पुकार रही थीं, जैसे वह उनके इस मर्दानगी के वार की प्यासी हों। उन्हें रत्ती भर भी अंदाज़ा नहीं था कि उनका बेटा दरवाजे के पास खड़ा होकर उनकी इस नग्न और अश्लील अवस्था को देख रहा है। वह बस उस बेतहाशा मजे में डूबी हुई थीं।

अंकल ने अब अपनी रफ़्तार को चरम सीमा पर पहुँचा दिया। "थप! थप! थप! थप!" उनके भारी लंड के मम्मी की गीली चूत में घुसने और बाहर निकलने की आवाज़ पूरी लॉबी में गूँज रही थी। "प्रदीप... उह्ह्ह्ह... और गहराई तक... आह्ह्ह्ह!" मम्मी का नाम लेना भी अब उनकी उत्तेजना का हिस्सा बन गया था।

अंकल की साँसें भारी और गंदी हो चुकी थीं। उन्होंने मम्मी के शरीर को अपनी ओर खींचा और एक बहुत ही गहरा और हिंसक प्रहार किया। "उह्ह्ह्ह्ह... अब बस... मैं निकलने वाला हूँ!" अंकल की आवाज़ में एक अजीब सी दहाड़ थी। उन्होंने मम्मी के मम्मे को इतनी ज़ोर से भींचा कि वह चीख उठीं। तभी, अंकल ने एक आखिरी, सबसे गहरा और सबसे रफ़ thrust मारा और अपना सारा गर्म गाढ़ा वीर्य मम्मी की चूत की गहराई में उगल दिया। मम्मी का पूरा शरीर एक झटके के साथ अकड़ गया और वह एक लंबी, बेकाबू चीख के साथ चरम सुख की लहर में डूब गईं।
मम्मी ने एक गहरी और थकी हुई साँस ली। उन्होंने अपने शरीर से अंकल के वीर्य और पसीने को पोंछा, लेकिन उनकी चूत अभी भी पूरी तरह से गीली और लथपथ थी। बिना एक शब्द बोले, वह अपनी नग्न अवस्था में ही उठ खड़ी हुईं और लड़खड़ाते हुए बाथरूम की ओर बढ़ गईं। अंकल ने अपनी आँखें मूँद लीं और एक गहरी संतुष्टि के साथ बेड पर ही लेट गए।

मैंने यह सब देख लिया था। मैंने सोचा कि अब अंकल तो बिल्कुल नहीं हिलेंगे और मम्मी को भी इस हालत में बाहर आने में समय लगेगा। मुझे पक्का यकीन था कि मम्मी कम से कम 20 मिनट तक बाथरूम से बाहर नहीं आएँगी। इसी सोच के साथ, मैंने भी अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं और बेड पर लेट गया। मेरा मन भी बहुत उत्तेजित था। मैंने अपना हाथ अपनी मर्दानगी पर रखा और मथना शुरू कर दिया।

मुझे इतना मज़ा आ रहा था कि मैं पूरी तरह से अपनी ही दुनिया में खो गया। मैं इतना मगन था, इतना लीन था कि मुझे आस पास की कोई खबर नहीं थी। मेरी आँखें पूरी तरह बंद थीं और मैं बस उस चरम सुख की तलाश में था। मुझे अंदाज़ा भी नहीं था कि कब अंकल अपनी आँखें खोलकर बेड से उठे और दबे पाँव मेरे पास आकर खड़े हो गए।

तभी अचानक, मुझे अपने सिर पर एक भारी और गर्म हाथ महसूस हुआ। किसी ने बहुत ही प्यार और अधिकार के साथ मेरे बालों में उंगलियाँ फिराना शुरू किया। मैं एकदम से चौंक गया और मेरा दिल ज़ोर से धड़कने लगा। मैंने घबराते हुए अपनी आँखें खोलीं। सामने अंकल खड़े थे, उनकी आँखों में एक अजीब सी शरारत और गहराई थी।

उन्होंने झुककर मेरे कान के पास फुसफुसाते हुए बड़े ही मदहोश अंदाज़ में पूछा, "क्या मैं तुम्हारी कुछ मदद कर दूँ?"

मैं एकदम से घबरा गया और मेरी साँसें अटक गईं। मेरा पूरा शरीर डर और उत्तेजना के मारे काँपने लगा।
अंकल ने देखा कि मैं डर के मारे थर थर काँप रहा हूँ और मेरी साँसें तेज़ चल रही हैं। उन्होंने अपनी आवाज़ को एकदम धीमा और सुकून देने वाला बनाया ताकि मैं शांत हो सकूँ। उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा और बड़े ही धीमे स्वर में कहा, "घबराओ मत बेटा... शांत हो जाओ। मैं तुम्हारी मम्मी को या घर में किसी को भी कुछ नहीं बताऊँगा। यह हमारे बीच का एक राज़ रहेगा।"

फिर उन्होंने मेरी आँखों में देखते हुए एक शर्त रखी, "लेकिन पहले मुझसे वादा करो... तुम भी यह बात किसी को नहीं बताओगे। यह राज़ सिर्फ तुम और मैं जानते हैं। वादा करो?"

मेरे चेहरे पर शर्मिंदगी और घबराहट के मिले जुले भाव थे। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूँ। मुझे बहुत शर्म महसूस हो रही थी कि अंकल ने मुझे इस हालत में देख लिया है और अब वह मुझसे इस तरह की बातें कर रहे हैं। उनकी आँखों में एक ऐसी चमक थी जिसे देखकर मैं चाहकर भी नज़रें नहीं मिला पा रहा था। मैं अपनी शर्मिंदगी छुपाने के लिए अपनी नज़रें नीचे झुकाए बैठा था।

मैं चाहकर भी उनसे झूठ नहीं बोल सकता था। मैंने अपनी नज़रें चुराने की कोशिश की और बहुत ही धीरे से, लगभग न के बराबर, अपना सिर हिलाया। वह एक हल्की सी सहमति थी, जैसे मैं उन्हें यकीन दिला रहा था कि मैं उनकी बात मानूँगा। मैं बस उन्हें यह आश्वासन देना चाहता था कि मैं किसी को कुछ नहीं बोलूँगा और मैं उनकी इस शर्त को स्वीकार करता हूँ। मेरा पूरा शरीर शर्म के मारे तप रहा था, लेकिन अंकल के उस वादे ने मुझे एक अजीब सी सुरक्षा और साथ ही एक गहरी बेचैनी में डाल दिया था।
अंकल ने देखा कि मैं शर्म से बुत बना हुआ हूँ। उन्होंने बहुत ही कोमलता से अपनी दो उंगलियाँ मेरी ठुड्डी के नीचे रखीं और धीरे से मुझे ऊपर की ओर उठाया। उन्होंने मेरी आँखों में सीधे देखते हुए बहुत ही शांत और समझदारी भरे लहजे में कहा, "देखो बेटा, तुम्हारा इस तरह से खुद को सुख देना और हमें छुपकर देखना... इसमें कुछ भी गलत नहीं है। इस उम्र में ऐसा होना बहुत स्वाभाविक है।"

उनकी इन बातों ने मेरी शर्मिंदगी और घबराहट को थोड़ा कम तो किया, लेकिन मेरा दिल अभी भी ज़ोरों से धड़क रहा था। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे वह मेरे मन की हर बात पढ़ रहे हों। फिर भी, मैं अभी भी उनके चेहरे पर सीधे नज़र नहीं मिला पा रहा था; मेरी नज़रें बार बार नीचे की ओर फिसल जा रही थीं।

अंकल ने मेरी खामोशी को भांप लिया और माहौल को थोड़ा हल्का करने के लिए एक और सवाल पूछा। उन्होंने एक हल्की सी मुस्कान के साथ पूछा, "अच्छा, ये बताओ... तुम्हें मेरा और तुम्हारी मम्मी का इस तरह पास बैठकर बातें करना अच्छा लगता है ना?"

उनका यह सवाल इतना सीधा और गहरा था कि मेरे पास कोई जवाब नहीं था। उनके शब्दों ने मेरे अंदर दबी हुई उस दबी हुई इच्छा को छू लिया था जिसे मैं खुद भी स्वीकार करने से डर रहा था। मैंने अपनी नज़रें नीचे ही रखे हुए, बहुत ही धीरे से और बहुत ही मुश्किल से अपना सिर हिलाया। वह एक मूक 'हाँ' थी, जो यह बता रही थी कि मुझे वह नज़दीकी और वह माहौल बहुत पसंद आता है।
अंकल के चेहरे पर एक विजयी मुस्कान आ गई। उन्होंने बड़े प्यार से मेरे सिर पर हाथ फेरा और बोले, "शाबाश बेटा! मुझे तुमसे यही उम्मीद थी। तुम बहुत समझदार हो रहे हो।"

उनकी आवाज़ में एक अजीब सा अधिकार था, जिसने मुझे और भी ज़्यादा बेचैन कर दिया। फिर उन्होंने अपनी बात जारी रखी और बड़े ही धीमे स्वर में पूछा, "अब ये बताओ... क्या हम आज रात मैं और तुम्हारी मम्मी बाहर लॉबी में सो जाएँ?"

उनका यह सुझाव सुनकर मेरा दिल एक पल के लिए थम सा गया। मुझे पता था कि अगर वे दोनों साथ में सोएंगे, तो लॉबी में जो माहौल बनेगा और जो कुछ भी होगा, वह मेरी कल्पना से भी परे होगा। मैंने अपनी घबराहट को दबाते हुए और अपनी आँखों को झुकाए रखते हुए, बहुत ही धीरे से अपना सिर 'हाँ' में हिला दिया। मेरी इस मूक सहमति ने जैसे उनके मन की बात पक्की कर दी।

अंकल ने मुस्कुराते हुए कहा, "थैंक्स बेटा! अब तू आराम कर, तेरी मम्मी आती होगी।"

इतना कहकर उन्होंने कमरे की लाइट बंद कर दी। अंधेरा होते ही मेरा कमरा और भी रहस्यमयी लगने लगा। मैंने सुना कि उनके कदमों की आहट धीरे धीरे कमरे से बाहर की ओर जा रही है। वे लॉबी में जाकर लेट गए। अब पूरे घर में एक भारी सन्नाटा था, लेकिन मेरे दिमाग में विचारों का तूफ़ान चल रहा था। मैं बेड पर लेटा हुआ बस यही सोच रहा था कि बाहर लॉबी मे आगे क्या होने वाला है।
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#52
Wonderful update
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#53
Lovely update
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#54
Bahut badhiya update
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#55
बहुत बढ़िया और एकदम शानदार अपडेट!
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#56
wah! bahut hi mast, zabardast aur behad hi exciting story writings!
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#57
Nice bro
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#58
मैं बस उस नज़ारे को देखने के लिए बेताब था जो उस रोशनी में घटित होने वाला था।
लगभग पाँच छह मिनट बीत चुके थे। सन्नाटे में घड़ी की टिक टिक भी किसी हथौड़े की तरह सुनाई दे रही थी। तभी अचानक बाथरूम का दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई। मैंने अपनी सांसें रोक लीं और दरवाज़े की दरार से बाहर की ओर देखा।

मम्मी बाथरूम से बाहर निकलकर वापस लॉबी में आ रही थीं। उन्हें देखकर मेरी धड़कनें और तेज़ हो गईं। वे बिल्कुल उसी 'नग्न अवस्था' में थीं, जिसमें वे अंकल के साथ शारीरिक मिलन के बाद बाथरूम गई थीं। शायद वे बस थोड़ा तरोताजा होने के लिए या फिर बाथरूम जाने के लिए गई थीं। उनके शरीर पर पानी की कुछ बूंदें अभी भी चमक रही थीं, जो लॉबी की मद्धम रोशनी में उनके बदन को और भी अधिक आकर्षक और कामुक बना रही थीं।

वे अब पहले से कहीं ज़्यादा तरोताजा और खिली खिली लग रही थीं। उनके चेहरे पर एक अजीब सी संतुष्टि और सुकून था, जो केवल गहरी शारीरिक तृप्ति के बाद ही आ सकता है। उनके खुले बाल और उनके शरीर की वह प्राकृतिक चमक देखकर मेरा गला सूखने लगा। वे धीरे धीरे चलकर अंकल के पास पहुँच रही थीं, और उस नग्नता में उनकी हर चाल में एक अलग ही लचक और आकर्षण था। अंधेरे कमरे में लेटा मैं बस अपनी आँखों को दरवाज़े से हटा नहीं पा रहा था, क्योंकि वह नज़ारा इतना तीव्र और उत्तेजक था कि मेरा पूरा शरीर कांपने लगा था।
मम्मी को पूरी तरह से यह विश्वास था कि नींद की गोली का असर होने के कारण मैं गहरी और बेसुध नींद में हूँ। इसी निश्चिंतता ने उन्हें इतना बेखौफ बना दिया था कि उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के अंकल से कहा, "मैं एक बार रवि को देख आती हूँ, वह ठीक से सो रहा है या नहीं।"

अंकल ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "मैं अभी गया था, वह तो बिल्कुल बेखबर है, गहरी नींद में सो रहा है।" लेकिन मम्मी ममतावश , नग्न अवस्था में ही सीधे मेरे कमरे की ओर बढ़ने लगीं। जैसे ही वे कमरे के दरवाज़े के पास पहुँचीं, अंधेरे में भी उनकी उपस्थिति का अहसास होने लगा। उनकी उस नग्न अवस्था में, चलते समय उनके उभरे हुए सीने पर मौजूद उनके दो मस्त और भारी दूध एक बेहद मदहोश कर देने वाली लय में थिरक रहे थे। उस दृश्य के दर्शन मात्र से ही मेरी बेचैनी चरम पर पहुँच गई और दिल की धड़कनें इतनी तेज़ हो गईं कि मुझे लगा कहीं वे मेरी धड़कन न सुन लें।

जैसे ही मुझे उनके कदमों की आहट अपने कमरे के भीतर आती महसूस हुई, मैं बुरी तरह घबरा गया। मुझे डर था कि अगर उन्होंने मुझे जागते हुए देख लिया, तो सारा खेल बिगड़ जाएगा। मैंने तुरंत और बहुत ही फुर्ती से करवट बदल ली और अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं, ताकि वे मेरे चेहरे के भावों या मेरी सांसों की गति से यह अंदाज़ा न लगा सकें कि मैं जाग रहा हूँ। मैं बस एक मरे हुए इंसान की तरह लेटा रहा, जबकि मेरे भीतर भावनाओं और उत्तेजना का एक ज्वालामुखी फट रहा था।
जैसे ही वे मेरे बिस्तर के पास पहुँचीं, कमरे के भीतर उनकी उपस्थिति का अहसास और भी गहरा हो गया। मैंने अपनी आँखें कसकर बंद कर रखी थीं और सांसें रोक ली थीं, लेकिन उनके पास आने से उनके शरीर की गर्माहट और उस कामुक सुगंध का अहसास मुझे अंदर ही अंदर जला रहा था।तभी मम्मी ने आगे बढ़ कर लाइट जला दी।

मम्मी ने बहुत ही स्नेह और ममता के साथ मेरे सिर पर अपना हाथ फेरा। उनके हाथों का स्पर्श इतना कोमल और धीमा था कि मुझे लगा जैसे वे मुझे सहला नहीं रही हैं, बल्कि मेरी नींद को और गहरा करने की कोशिश कर रही हैं। फिर उन्होंने धीरे से मेरे ऊपर पड़े कंबल को व्यवस्थित किया ताकि मुझे ठंड न लगे। इसके बाद, उन्होंने झुककर मेरे गाल पर एक बहुत ही मासूम और कोमल सी 'किस' की।

उस पल, जब वे मेरे इतने करीब झुकी थीं, उनकी शांत और मद्धम होती सांसें मेरे कान के पास महसूस हो रही थीं। उस नग्न अवस्था में उनके शरीर की वह प्राकृतिक महक और उनकी सांसों की गर्माहट मुझे पागल कर रही थी। मेरा पूरा शरीर उत्तेजना से कांप उठा था, लेकिन मैं हिल भी नहीं सकता था। उस एक पल में, उनकी ममता और उनकी नग्नता का वह संगम मेरे लिए किसी नशें से कम नहीं था।

जब मम्मी को पूरी तरह यकीन हो गया कि मैं गहरी नींद में हूँ और बिल्कुल बेखबर हूँ, तो उन्होंने एक आखिरी बार मेरे सिर पर प्यार से हाथ फेरा। फिर उन्होंने कमरे की लाइट ऑफ कर दी और बिना कोई आहट किए वापस बाहर निकल गईं। कमरे में फिर से वही घना अंधेरा छा गया, लेकिन मेरे भीतर जो हलचल मच गई थी, उसने मुझे सोने नहीं दिया। मैं बस अंधेरे में लेटा हुआ था, उनके उस स्पर्श और उस नज़ारे को अपने दिमाग में बार बार दोहरा रहा था।


मम्मी के जाने के बाद कमरे में फिर से वही गहरा सन्नाटा और अंधेरा छा गया था। लेकिन मेरे भीतर एक ऐसी आग सुलग रही थी जिसे बुझाना शायद नामुमकिन था। उनकी वह नग्नता, उनके शरीर की वह थिरकन, उनके सीने की वह हलचल और फिर वह कोमल स्पर्श इन सबने मेरे दिमाग में एक ऐसा तूफान खड़ा कर दिया था कि मेरा शरीर उत्तेजना से तड़प रहा था। मैं बस अंधेरे में लेटा हुआ था, लेकिन मेरी आँखों के सामने वही सब बार बार घूम रहा था।

अंदर ही अंदर जलते हुए, उस बेचैनी और उत्तेजना के चरम पर पहुँचकर, अब मुझसे और इंतज़ार नहीं हो रहा था मेरा मन उस नज़ारे को फिर से जी भर के देखना चाहता था। अपनी उत्तेजना को काबू में करने के लिए। मैने अपने सख्त हो चुके लंड आपर अपना हाथ चलाना शुरू कर दिया।

खुद को शांत करने के बाद, मैंने
फिर से लॉबी की तरफ नज़र घुमाई। वहाँ का नज़ारा देखकर मेरी साँसें फिर से अटक गईं। लॉबी में कुछ खास अलग तो नहीं दिख रहा था, लेकिन जो दिख रहा था वह बेहद कामुक था। मम्मी और अंकल एक दूसरे के आलिंगन में बंधे हुए थे। वे दोनों एक दूसरे की पीठ को बड़े ही प्यार और उत्तेजना के साथ सहला रहे थे। उनके शरीर की रगड़ और उनके बीच की वह केमिस्ट्री साफ महसूस की जा सकती थी।

तभी अंकल की आवाज़ गूँजी, "मैं अभी आता हूँ, बाथरूम करके ।" अंकल ने बाथरूम से वापस आने के बाद, एक ऐसा काम किया जिसने मेरे होश उड़ा दिए। उन्होंने लॉबी की सारी लाइटें एक साथ जला दीं। अंकल ने मुस्कुराते हुए कहा, "चलो पूरी रोशनी में खेलते हैं।"

मम्मी को लगा कि शायद यह अंकल की कोई नई शरारत या उनकी कोई निजी इच्छा है, लेकिन मुझे तुरंत अंदाज़ा हो गया कि यह कोई साधारण बात नहीं है। मुझे समझ आ गया कि अंकल को पता चल चुका है कि मैं जाग रहा हूँ। वे चाहते थे कि मैं जो भी देखूँ, उसे पूरी स्पष्टता के साथ देखूँ। वे मुझे आने वाले हर पल की बारीकी दिखाना चाहते थे हर एक हरकत, हर एक उभार और हर एक उत्तेजक क्षण को बिना किसी अंधेरे के पर्दे के, बिल्कुल साफ़ और स्पष्ट रूप से। अब लॉबी का हर कोना रोशनी से नहाया हुआ था, और अब जो होने वाला था, उसे देखने के लिए मैं पूरी तरह तैयार था।
रोशनी इतनी तेज़ थी कि अब लॉबी का हर एक दृश्य किसी नग्न सत्य की तरह मेरी आँखों के सामने नाच रहा था। अंकल ने अब कोई ढोंग नहीं किया। उन्होंने मम्मी इस तरह लिटा दिया के उनके दोनों भारी मम्मे उनके सीने से बाहर निकल आए। अंकल ने बिना देर किए अपने मुँह से एक मम्मे को अपने मुँह में भर लिया और उसे ज़ोर ज़ोर से चूसने लगे। मम्मी की चीख निकल गई "आह्ह्ह... उम्ममम..." उनकी कमर हवा में धनुष की तरह तन गई।

अंकल का कड़क और मोटा लंड अब पूरी तरह से बाहर था, जो उत्तेजना से लाल और नसदार हो चुका था। उन्होंने मम्मी के दोनों पैरों को उनके कंधों पर टिका दिया, जिससे उनकी गुलाबी और गीली चूत बिल्कुल साफ़ दिखाई देने लगी। चूत से निकलने वाला चिकना तरल (fluid) रोशनी में चमक रहा था। अंकल ने बिना किसी चेतावनी के अपना लंड मम्मी की चूत के मुँह पर टिकाया और एक ज़ोरदार झटका देकर पूरा अंदर उतार दिया।

"आआआह्ह्ह्ह!" मम्मी के गले से एक दर्द भरी लेकिन बेहद कामुक आवाज़ निकली। अंकल अब पागलों की तरह लंड को चूत के अंदर बाहर करने लगे 'चप चप' की आवाज़ पूरे कमरे में गूँज रही थी। अंकल का भारी अंडकोष हर झटके के साथ मम्मी की चूत के निचले हिस्से से टकरा रहा था। मम्मी का शरीर झटकों के साथ ऊपर नीचे हो रहा था, उनके मम्मे बेतहाशा हिल रहे थे।

तभी अंकल ने उन्हें पलट दिया और मम्मी को उल्टा कर दिया। अब मम्मी घुटनों के बल थीं और उनका पिछवाड़ा हवा में ऊँचा था। अंकल ने पीछे से उनके नितंबों को ज़ोर से पकड़कर अपने लंड को उनकी चूत में गहराई तक उतारना शुरू किया। दृश्य इतना जंगली था कि मैं अपनी नज़रें हटा नहीं पा रहा था। फिर अंकल ने उन्हें नीचे झुकाया और '69 पोजीशन' में ले आए। मम्मी का मुँह अंकल के लंड पर था और अंकल का मुँह मम्मी की गीली चूत पर।

मम्मी अपनी जीभ से अंकल के लंड को चाट रही थीं और अंकल उनकी चूत के भीतर अपनी उंगलियाँ और जीभ चला रहे थे। हवा में पसीने, कामुक गंध और शरीर के तरल पदार्थों की महक भर गई थी। अंकल का जोश चरम पर था, वे अब मम्मी की चूत को पूरी ताकत से फाड़ देने वाले अंदाज़ में चोद रहे थे।

तभी अंकल ने उन्हें पलट दिया। अब मम्मी घुटनों के बल थीं और उनका मांसल पिछवाड़ा हवा में ऊँचा उठा हुआ था। अंकल ने पीछे से उनके नितंबों को पूरी ताकत से जकड़ लिया और अपने लंड को उनकी चूत के भीतर गहराई तक धंसाना शुरू कर दिया। दृश्य इतना बेकाबू था कि मैं अपनी नज़रें हटा नहीं पा रहा था। इसके तुरंत बाद, अंकल ने उन्हें नीचे झुका दिया।

अंकल का भारी लंड जब पीछे से मम्मी की चूत के अंदर पूरी रफ़्तार से धंस रहा था, तो हर प्रहार के साथ उनके शरीर में एक बिजली सी दौड़ जाती थी। मम्मी के मम्मे ज़मीन की ओर लटक रहे थे और झटकों के कारण पागलों की तरह उछल रहे थे। "आह्ह्ह... भाई साहब... और ज़ोर से... हाँ!" मम्मी की बेकाबू चीखें कमरे की दीवारों से टकरा रही थीं।

अंकल का नियंत्रण अब पूरी तरह खत्म हो चुका था। वे एक जंगली जानवर की तरह मम्मी के शरीर पर टूट पड़े थे। उनकी उंगलियाँ मम्मी के नितंबों में गहराई तक धंस गई थीं, जिससे उनकी त्वचा पर लाल निशान पड़ गए थे। अंकल का लंड अब मम्मी की चूत के अंदर पत्थर जैसा सख्त हो चुका था और वे चरम सीमा के बिल्कुल करीब थे।

"बहनजी... अब और नहीं रुक सकता!" अंकल ने दहाड़ते हुए एक आखिरी, सबसे गहरा और सबसे तेज़ झटका मारा। मम्मी का पूरा शरीर अकड़ गया, उनकी आँखें ऊपर की ओर चढ़ गईं और वे एक तीखी चीख के साथ अपनी चरम सीमा पर पहुँच गईं। उसी पल, अंकल ने अपना सारा गर्म और गाढ़ा वीर्य मम्मी की चूत की गहराई में पूरी ताकत से छोड़ दिया। अंकल का लंड मम्मी के अंदर ही कांप रहा था और वे दोनों पसीने से लथपथ होकर एक दूसरे के शरीर में समाए हुए थे।

दोनों पसीने से लथपथ होकर एक दूसरे से लिपट गए। कमरे में केवल उनकी तेज़ चलती सांसों की आवाज़ आ रही थी। लेकिन अभी खेल खत्म नहीं हुआ था। जैसे ही अंकल ने अपना लंड थोड़ा बाहर निकाला, मम्मी की गीली चूत से वीर्य और योनि का तरल मिलकर बहने लगा। मम्मी ने अपनी गीली और कांपती उंगलियों से अंकल के चेहरे को छुआ और फुसफुसाते हुए कहा, ' नहीं भाई साब... अभी मुझे और चाहिए...'
म्मी की आँखों में वही पुरानी भूख थी। अंकल ने महसूस किया कि उनका लंड फिर से धीरे धीरे सख्त हो रहा है।

यह कल रात से लेकर अभ कल की छठी चोदाइ की शुरुआत होने वाली थी, जो पहले से भी ज़्यादा जंगली और बेकाबू होने वाली थी।
यह सिलसिला अब नियंत्रण से बाहर हो चुका था। पिछली रात से लेकर अब तक सुबह 5:30 बजे की वह दूसरी चोदाइ, फिर दोपहर की वह तड़प, रवि के नींद की गोली खाने के नाटक के दौरान हुई चौथी चोदाइ, और फिर अंकल का वह जानबूझकर लाइट जलाकर मम्मी को चोदना ताकि रवि सब देख सके ये सब अब एक अंतहीन चक्र बन चुके थे।

अंकल ने मम्मी को बेड पर उल्टा कर दिया। मम्मी का सुडौल पिछवाड़ा अब हवा में था और उनके भारी मम्मे बिस्तर पर दब गए थे। अंकल ने मम्मी की कमर को अपने दोनों हाथों से इतनी ज़ोर से जकड़ लिया कि उनकी उंगलियां मम्मी के मांस में धंस गईं। अंकल ने अपना मोटा, नसों से भरा हुआ लंड मम्मी के गीले छेद के मुहाने पर रखा और एक ही झटके में उसे पूरी गहराई तक अंदर उतार दिया। "आआआह्ह्ह्ह्ह्ह!" मम्मी की चीख पूरे कमरे में गूँज उठी। यह दर्द और बेइंतहा सुख का ऐसा संगम था जिसने मम्मी के दिमाग को सुन्न कर दिया। अंकल अब पागलों की तरह पीछे से प्रहार कर रहे थे, और हर झटके के साथ 'चप चप' की गंदी आवाज़ कमरे के सन्नाटे को चीर रही थी।
कमरे के भीतर की हवा भारी हो चुकी थी। पसीने और वासना की गंध चारों ओर फैली हुई थी। अंकल की आँखों में एक जंगली भूख थी। जैसे ही उन्होंने अपना मोटा, सख्त और गर्म **'लंड'** मम्मी की गीली और तंग **'चूत'** से बाहर निकाला, मम्मी के पूरे शरीर में एक थरथराहट दौड़ गई। लेकिन अंकल रुके नहीं; उन्होंने उस नसों से भरे भारी अंग को मम्मी के **'गुदाद्वार'** के मुहाने पर टिका दिया। मम्मी की साँसें थम गईं। डर और एक अनजाने रोमांच के बीच झूलते हुए वह घबराकर चिल्लाईं, "नहीं भाई... यहाँ नहीं ... नहीं!" डर के मारे उन्होंने अपनी कमर को थोड़ा ऊपर की ओर उठाया, जैसे वह उस अनचाहे प्रवेश को रोकना चाहती हों, और अपनी **'चूत'** को फिर से उस अंग के ऊपर सेट करने की कोशिश कीं ताकि सब कुछ पहले जैसा हो जाए। लेकिन अंकल का इरादा कुछ और ही था। उनके अंदर का जानवर जाग चुका था। उन्होंने एक गहरी और हवस भरी नज़र से मम्मी को देखा और उनके दोनों **'नितंबों'** को अपने मजबूत हाथों से इतनी ज़ोर से पकड़ा कि उनकी उंगलियाँ मांस में धंस गईं। मम्मी के शरीर पर लाल निशान पड़ गए। अंकल ने बिना किसी दया के, अपनी पूरी ताकत और नजाकत के साथ, उस सख्त अंग को धीरे धीरे लेकिन बड़ी मजबूती से मम्मी के संकरे **'गुदाद्वार'** के अंदर धकेलना शुरू कर दिया। "आआआआह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह!" मम्मी की चीख इतनी तेज़ और दर्दनाक थी कि मेरा शरीर भी थरथरा गया। उनके पीछे वाले छेद का कसाव इतना ज़्यादा था कि अंकल को लगा जैसे उनका लंड किसी गर्म और तंग मांसल गुफा में फंस गया हो। मम्मी का पिछवाड़ा दर्द और बेइंतहा उत्तेजना के मारे बुरी तरह कांप रहा था और उनके मुँह से लगातार दर्द भरी सिसकियां निकल रही थीं।

अंकल ने एक पल के लिए रुककर मम्मी के शरीर को महसूस किया, लेकिन उनकी अपनी कामुकता अब चरम पर थी। उन्होंने मम्मी की कमर को और ज़ोर से पकड़ लिया और धीरे धीरे अपना मोटा लंड पीछे वाले छेद में धंसाना शुरू किया। 'चप... चप... चप...' की गंदी और गीली आवाज़ें अब कमरे में गूँजने लगीं। जैसे जैसे अंकल की गति बढ़ी, मम्मी की सिसकियां अब बेकाबू होकर 'आह्ह्ह... उह्ह्ह... आह्ह्ह' में बदल गईं।

मम्मी का सिर बिस्तर पर पटक रहा था और उनकी आँखें ऊपर की ओर चढ़ गई थीं। "अंकल... आह्ह्ह... बहुत गहरा... बहुत ज़ोर से... आआआह्ह्ह!" वे दर्द और मज़ा दोनों के बीच झूल रही थीं। अंकल अब पागलों की तरह पीछे से प्रहार कर रहे थे। हर झटके के साथ मम्मी का पूरा शरीर आगे की ओर उछल रहा था। अंकल का मोटा लंड मम्मी के गुदा मार्ग की दीवारों को बुरी तरह रगड़ रहा था, जिससे मम्मी का पिछवाड़ा लाल पड़ गया था। कमरे में पसीने, वीर्य और शरीर के तरल पदार्थों की एक भारी और गंदी गंध फैल गई थी। रवि कोने में बैठा अपनी फटी आँखों से यह नज़ारा देख रहा था मम्मी का पिछवाड़ा अंकल के लंड के नीचे दबकर पिचक रहा था और मम्मी की सिसकियां अब एक जानवर की तरह दहाड़ने जैसी लगने लगी थीं।

अंकल की रफ़्तार अब इतनी तेज़ हो गई थी कि उनके लंड के हर प्रहार के साथ मम्मी का पूरा शरीर बिस्तर पर बुरी तरह टकरा रहा था। 'पटक... पटक... पटक...' की आवाज़ और मम्मी के पिछले छेद से निकलने वाली 'चप चप' की गंदी आवाज़ ने पूरे कमरे को वासना के माहौल में डुबो दिया था। मम्मी की सिसकियां अब बेकाबू होकर चीखों में बदल चुकी थीं "आह्ह्ह... अंकल... मेरा पिछवाड़ा फट जाएगा... आह्ह्ह... और ज़ोर से... उह्ह्ह... हाँ... वहीं... वहीं!"

मम्मी का सुडौल पिछवाड़ा अंकल के भारी प्रहारों के नीचे बुरी तरह लाल हो चुका था और हर झटके के साथ उनका मांस थरथरा रहा था। अंकल ने मम्मी के दोनों जांघों को और ज़ोर से पकड़कर ऊपर की ओर खींच लिया ताकि उनका लंड और भी गहराई तक मम्मी की गुदा की दीवारों को चीर सके। अंकल का चेहरा पसीने से तर बतर था और उनकी आँखें जुनून से लाल हो गई थीं। वे अब जानवर की तरह मम्मी के शरीर पर टूट पड़े थे।

तभी अंकल ने मम्मी के बालों को पीछे से ज़ोर से पकड़ा और उनका सिर पीछे की ओर खींच दिया। मम्मी का चेहरा दर्द और चरम सुख के मिश्रण से विकृत हो गया था। "अब बस... मैं निकलने वाला हूँ... बहनजी... आह्ह्ह!" अंकल दहाड़े। मम्मी ने भी अपनी कमर को पीछे की ओर झटका दिया, जैसे वे अंकल के लंड को अपने अंदर और भी गहराई तक खींचना चाहती हों। "हाँ भाई साब... मेरे छेद में... अपना सारा गरम वीर्य भर दो... आआआह्ह्ह्ह्ह!" मम्मी की यह गंदी और कामुक मांग सुनकर अंकल का संयम टूट गया और उन्होंने अपनी पूरी ताकत के साथ आखिरी और सबसे ज़ोरदार प्रहार करना शुरू कर दिया।
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#59
अंकल का शरीर पूरी तरह से अकड़ गया था और उनकी नसें उभड़कर बाहर आ गई थीं। उन्होंने मम्मी के पिछले छेद को अपने लंड से इतनी ज़ोर से जकड़ लिया था कि ऐसा लग रहा था जैसे वे उनके शरीर के भीतर समा जाएंगे। "आआआआह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह!" अंकल एक जंगली दहाड़ के साथ चिल्लाए और उन्होंने मम्मी के कूल्हों को अपनी ओर खींचते हुए अपना सारा वीर्य उनके गुदा के अंदर गहराई तक उगल दिया।

मम्मी का शरीर एक ज़ोरदार झटके के साथ धनुष की तरह मुड़ गया। उनके मुँह से एक लंबी और बेजान सिसकी निकली "उह्ह्ह्ह... आह्ह्ह्ह..."। उनके पिछले छेद के अंदर अंकल का गरम और गाढ़ा वीर्य तेज़ी से भर रहा था। मम्मी को ऐसा महसूस हो रहा था जैसे उनके अंदर कोई गर्म लावा बह रहा हो। वे दर्द और बेइंतहा सुख के उस चरम पर थीं जहाँ दिमाग काम करना बंद कर देता है।

अंकल ने अपना लंड बाहर निकाला, जिससे एक गंदी 'पॉप' की आवाज़ आई। मम्मी के पिछले छेद से सफेद और गाढ़ा वीर्य एक धार की तरह बाहर बहने लगा और उनके सुडौल नितंबों के बीच से फिसलकर चादर को गंदा करने लगा। मम्मी बिस्तर पर बेसुध सी पड़ी थीं, उनकी आँखें आधी खुली थीं और साँसें अभी भी तेज़ चल रही थीं। उनका पिछवाड़ा अभी भी उस गहरे प्रहार के कारण कांप रहा था।

कमरे में सन्नाटा छा गया था, बस दोनों की भारी साँसों की आवाज़ आ रही थी। रवि, जो अब तक स्तब्ध होकर यह सब देख रहा था, अपनी फटी आँखों से मम्मी के उस गंदे और वीर्य से लथपथ पिछले हिस्से को देख रहा था। लेकिन यह अंत नहीं था। अंकल ने मम्मी के कांपते हुए शरीर को देखा और उनकी आँखों में फिर से वही वासना जाग उठी। उन्होंने मम्मी के कान के पास झुककर फुसफुसाया, "अभी तो सिर्फ शुरुआत हुई है, अब तुम्हारी चूत की बारी है।"

अंकल की आवाज़ में जो भारीपन और वासना थी, उसने मम्मी के शरीर में एक नई लहर दौड़ा दी। मम्मी ने अपनी धुंधली आँखों से अंकल की ओर देखा, उनके चेहरे पर अभी भी चरम सुख की थकावट और उत्तेजना के निशान थे। "भाई साब... आप... आह्ह्ह..." मम्मी की आवाज़ लड़खड़ा रही थी, लेकिन उनकी आँखों में भी अब एक गंदी प्यास झलक रही थी।

अंकल ने बिना एक पल गंवाए मम्मी के गीले और चिपचिपे शरीर पर अपना हाथ फेरा। उन्होंने मम्मी के दोनों पैरों को और ज़ोर से फैलाया और उनके सुडौल नितंबों को अपने हाथों में भरकर अलग कर दिया। अब मम्मी का सामने वाला हिस्सा उनकी भीगी हुई और लाल पड़ चुकी चूत पूरी तरह से अंकल के सामने खुली हुई थी। 'चप... चप...' की आवाज़ तब आई जब अंकल की उँगलियाँ मम्मी की गीली योनि के बीच रगड़ने लगीं।

"उह्ह्ह... भाई साहब... वहाँ नहीं... आह्ह्ह... हाँ... वहीं..." मम्मी की सिसकियां फिर से कमरे में गूँजने लगीं। उनकी चूत अंकल के स्पर्श से और भी ज़्यादा गीली हो रही थी। अंकल ने अपना हाथ नीचे किया और मम्मी की चूत के छेद को उँगलियों से टटोलना शुरू किया। वे देख रहे थे कि कैसे मम्मी का शरीर हर स्पर्श पर कांप रहा है।

रवि भी अब अपनी जगह से हिल नहीं पा रहा था। वह देख रहा था कि कैसे अंकल अब मम्मी के सामने वाले हिस्से पर हमला करने की तैयारी कर रहे हैं। अंकल ने अपना हाथ अपनी पैंट के अंदर डाला और अपना फिर से खड़ा हुआ, मोटा और पसीने से लथपथ लंड बाहर निकाला। वह अब पहले से भी ज़्यादा बड़ा और सख्त लग रहा था। अंकल ने मम्मी की जांघों को अपने कंधों पर टिकाया और अपना लंड मम्मी की गीली चूत के मुहाने पर टिका दिया। "अब देखो तुम्हारी चूत कैसे मेरा लंड सोखती है," अंकल ने गुर्राते हुए कहा

अंकल ने बिना किसी चेतावनी के अपना मोटा और सख्त लंड मम्मी की गीली चूत के छेद पर ज़ोर से टिकाया और एक ही झटके में उसे पूरा अंदर तक धकेल दिया। "आआआआह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह!" मम्मी के मुँह से एक ऐसी चीख निकली जो दर्द और बेइंतहा कामुकता का मिश्रण थी। उनकी आँखें पूरी तरह से ऊपर चढ़ गईं और शरीर में एक ज़ोरदार झटका लगा। उनका योनि मार्ग अंकल के भारी लंड के दबाव से पूरी तरह से फैल गया था।
'चप... चप... चप...' की गंदी और गीली आवाज़ें अब और भी तेज़ हो गईं। अंकल अब पागलों की तरह मम्मी की चूत में अपने लंड को अंदर बाहर करने लगे। हर प्रहार के साथ मम्मी का शरीर बिस्तर पर बुरी तरह उछल रहा था। "भाई साहब... आह्ह्ह... बहुत बड़ा है... उह्ह्ह... मेरी चूत फट जाएगी... आआआह्ह्ह!" मम्मी की सिसकियां अब बेकाबू होकर चीखों में बदल चुकी थीं। उनके सुडौल नितंब अंकल के पेट से बार बार टकरा रहे थे, जिससे 'पटक... पटक...' की आवाज़ पूरे कमरे में गूँज रही थी।

मम्मी का योनि मार्ग अंकल के लंड के घर्षण से बुरी तरह गर्म और सूज गया था। उनके शरीर से निकलने वाला प्राकृतिक चिकना पदार्थ और अंकल के लंड का घर्षण मिलकर एक गंदी और चिपचिपी आवाज़ पैदा कर रहे थे। अंकल ने मम्मी की कमर को कसकर पकड़ लिया और उनकी गति को और भी हिंसक बना दिया। वे अब मम्मी के शरीर के अंदर अपना साम्राज्य स्थापित करने की कोशिश कर रहे थे।

मै यह सब देखकर पूरी तरह से मदहोश हो चुका था। वह देख रहा था कि कैसे मम्मी का सुडौल शरीर अंकल के हर झटके के साथ कांप रहा है और कैसे उनकी चूत से निकलने वाला तरल पदार्थ बिस्तर की चादर को गीला कर रहा है। कमरे में पसीने, योनि के तरल पदार्थ और वासना की एक भारी गंध भर गई थी।

अंकल की गति अब पूरी तरह से अनियंत्रित और हिंसक हो चुकी थी। वे अब किसी इंसान की तरह नहीं, बल्कि एक भूखे जानवर की तरह मम्मी के शरीर पर टूट पड़े थे। 'पटक... पटक... पटक...' की आवाज़ इतनी तेज़ थी कि ऐसा लग रहा था जैसे कमरे की दीवारें भी उस वासना की गूँज से हिल रही हों। मम्मी का सुडौल शरीर हर प्रहार के साथ बिस्तर पर बुरी तरह टकरा रहा था और उनकी चीखें अब एक बेकाबू संगीत बन चुकी थीं।

"आह्ह्ह... प्रदीप भाई साहब... बस... अब और नहीं... आह्ह्ह्ह! मैं मर जाऊँगी... उह्ह्ह... आह्ह्ह्ह!" मम्मी का गला चीखों से बैठ चुका था, लेकिन उनका शरीर अंकल के लंड की गहराई को महसूस करने के लिए और भी ज़्यादा छटपटा रहा था। उनकी चूत से निकलने वाला गाढ़ा और चिपचिपा तरल पदार्थ अंकल के लंड के साथ मिलकर एक गंदी 'चप चप' की आवाज़ पैदा कर रहा था।

अंकल ने मम्मी की कमर को अपने हाथों से इतनी ज़ोर से जकड़ लिया था कि उनकी उँगलियाँ मम्मी के कोमल मांस में धँस गई थीं। वे अब अपनी पूरी ताकत झोंक रहे थे। "मम्मी... अब... अब मैं निकलने वाला हूँ... अपनी चूत को कस लो... आह्ह्ह्ह!" अंकल दहाड़े। उनका चेहरा पसीने से तर था और उनकी आँखें पूरी तरह से सफेद हो चुकी थीं।

तभी अंकल ने एक आखिरी और सबसे ज़ोरदार प्रहार किया और अपना पूरा वजन मम्मी के ऊपर डाल दिया। "आआआआआआह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह!" अंकल के शरीर में एक ज़ोरदार कंपन हुआ और उन्होंने मम्मी की चूत की गहराई में अपना सारा गरम और गाढ़ा वीर्य उगल दिया। मम्मी का शरीर एक ज़ोरदार झटके के साथ धनुष की तरह मुड़ गया और वे अपनी चरम सुख की लहर में बेसुध होकर पीछे की ओर गिर गईं।
अंकल और मम्मी दोनों ही पूरी तरह से चरम सुख की उस लहर में बह गए थे जहाँ शरीर का नियंत्रण खत्म हो जाता है। अंकल ने अपना भारी और पसीने से लथपथ शरीर मम्मी के ऊपर ही टिका दिया। उनकी साँसें अभी भी किसी तेज़ दौड़ के बाद की तरह उखड़ी हुई और भारी थीं। मम्मी का शरीर अभी भी थरथरा रहा था और उनकी आँखें छत को ताक रही थीं, जैसे वे अभी भी उस अकल्पनीय सुख के बाद के शून्य में तैर रही हों।

कमरे में एक भारी सन्नाटा छा गया था, जिसमें सिर्फ दोनों की तेज़ चलती साँसों की आवाज़ आ रही थी। मम्मी के सुडौल शरीर पर अंकल के पसीने और उनके खुद के तरल पदार्थों की एक चिपचिपी परत जम गई थी। अंकल ने धीरे से अपना सिर उठाया और मम्मी के माथे पर एक पसीने से तर चुंबन दिया। "तुम... तुम बहुत लाजवाब हो," अंकल ने बहुत ही धीमी और थकी हुई आवाज़ में फुसफुसाया।

मम्मी ने बहुत मुश्किल से अपनी आँखें खोलीं और अंकल की ओर देखा। उनके चेहरे पर एक अजीब सी संतुष्टि और थकान का मिश्रण था। उन्होंने अपना हाथ धीरे से उठाकर अंकल के गाल पर फेरा। "भाई साहब... आपने तो मुझे तोड़ ही दिया," उन्होंने एक हल्की सी मुस्कान के साथ कहा, जो उनकी आवाज़ में अभी भी कामुकता का हल्का सा अंश छोड़ रही थी।

दोनों का शरीर एक दूसरे से लिपटा हुआ था। अंकल और मम्मी के बीच का वह अंतर अब पूरी तरह मिट चुका था। वे दोनों एक ऐसी दुनिया में पहुँच गए थे जहाँ सिर्फ वासना और उसका परिणाम बचा था। अंकल ने मम्मी को अपनी बाहों में और कस लिया और वे दोनों एक दूसरे की गर्माहट में खो गए।

रवि कमरे के अंधेरे कोने में बिल्कुल जड़वत खड़ा था, उसकी साँसें इतनी तेज़ और भारी थीं कि उसे डर था कहीं उनकी आवाज़ मम्मी तक न पहुँच जाए। उसकी आँखें फटी की फटी रह गई थीं। वह देख रहा था कि कैसे अंकल और मम्मी एक दूसरे में पूरी तरह खोए हुए थे, लेकिन अब अंकल ने कुछ ऐसा किया जिसे देखकर रवि के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

अंकल ने धीरे से मम्मी के शरीर को थोड़ा ऊपर उठाया और खुद उनके शरीर के नीचे झुक गए। रवि ने देखा कि अंकल का चेहरा मम्मी की जाँघों के बीच की उस गीली और लाल पड़ चुकी जगह की ओर बढ़ रहा था। रवि की धड़कनें उसके कानों में हथौड़े की तरह बज रही थीं। जैसे ही अंकल ने अपनी जीभ से मम्मी की चूत के उस संवेदनशील हिस्से को छुआ, रवि के मुँह से एक दबी हुई सिसकी निकली,सीईईईई ahhhhhhhhhhhh।

अंकल अब पूरी तरह से मम्मी की योनि को अपनी जीभ से चाट रहे थे। रवि देख पा रहा था कि कैसे अंकल की जीभ उस गीलेपन और गाढ़े वीर्य के बीच बार बार ऊपर नीचे हो रही थी। 'स्लर्प... स्लर्प...' की वह गंदी और गीली आवाज़ कमरे के सन्नाटे में रवि के कानों में किसी नशीले संगीत की तरह गूँज रही थी। अंकल का मुँह पूरी तरह से मम्मी की चूत के अंदर धँसा हुआ था, और वे बड़े ही बेरहमी और भूख के साथ उसे चूस रहे थे।
एरी नज़रें अंकल के सिर और मम्मी के काँपते हुए शरीर पर टिकी थीं। वह देख रहा था कि कैसे अंकल की जीभ मम्मी की चूत के अंदर गहराई तक जा रही थी और फिर बाहर निकलकर उस गीलेपन को पूरी तरह सोख रही थी। मम्मी का शरीर हर बार जब अंकल की जीभ उनके अंदर ज़ोर से प्रहार करती, तो वे बिस्तर पर छटपटा उठतीं, लेकिन अंकल ने अपना काम जारी रखा। मेरा अपना अंग उसकी पैंट में तंग हो चुका था और मैं बस यही चाहता था कि यह नज़ारा कभी खत्म न हो।

रवि की आँखों के सामने जो नज़ारा था, वह किसी पागलपन से कम नहीं था। वह देख रहा था कि कैसे अंकल अब और भी ज़्यादा बेकाबू हो गए थे। अंकल का सिर मम्मी की जाँघों के बीच इस कदर धँसा हुआ था कि उनकी गर्दन के बाल मम्मी के सुडौल नितंबों को छू रहे थे। अंकल की जीभ अब सिर्फ ऊपर नीचे नहीं कर रही थी, बल्कि वे मम्मी के क्लिटोरिस को अपने होंठों के बीच भरकर पूरी ताकत से चूस रहे थे।
'स्लर्प... चप... चप...' की वह गंदी और रसीली आवाज़ अब और भी तेज़ हो गई थी। रवि देख पा रहा था कि कैसे अंकल का मुँह मम्मी की योनि के गीलेपन से पूरी तरह लथपथ हो गया था। जब भी अंकल अपना मुँह पीछे खींचते, तो एक लंबी और चिपचिपी लार की लकीर मम्मी की चूत से निकलकर अंकल के होंठों तक आती थी। मम्मी का शरीर अब नियंत्रण से बाहर हो रहा था। वे अपनी कमर को ऊपर की ओर झटका दे रही थीं, जैसे वे अंकल के मुँह को और गहराई तक अपने अंदर खींचना चाहती हों।
मम्मी के मुँह से अब दबी हुई, कराहती हुई आवाज़ें निकलने लगी थीं। "आह्ह्ह... अंकल... उह्ह्ह..." वे अपनी आँखें मूँदकर और अपना सिर पीछे की ओर झुकाकर उस चरम सुख को महसूस कर रही थी ।मेरी नज़रें अब मम्मी के चेहरे के भावों और अंकल के कामुक तरीके से चूसने की क्रिया पर टिकी थीं। वह देख रहा था कि कैसे अंकल की जीभ बार बार उस गीली और लाल जगह के अंदर धँस रही थी और फिर बाहर निकलकर सारा रस सोख रही थी।

मेरा अपना शरीर पसीने से तर बतर हो चुका था। मेरी पैंट के अंदर मेरा अंग इतना सख्त और दर्दनाक हो गया था कि मुझे लग रहा था वह फट जाएगा। वह बस वहीं खड़ा होकर, साँसें थामे, इस गंदी और रसीली क्रिया को देख रहा था, जहाँ अंकल पूरी तरह से मम्मी के शरीर के रस में डूबे हुए थे।

मेरी आँखों के सामने जो हो रहा था, वह उसकी कल्पनाओं की सीमाओं को तोड़ रहा था। वह देख पा रहा था कि अंकल अब रुकने वाले नहीं थे। अंकल की जीभ की गति अब और भी तेज़ और हिंसक हो गई थी। वे मम्मी की योनि के अंदर अपनी जीभ को किसी मशीन की तरह बार बार अंदर बाहर कर रहे थे। 'स्लर्प... स्लर्प... चप...' की वह रसीली और गंदी आवाज़ अब कमरे की दीवारों से टकराकर रवि के कानों में गूँज रही थी।

मैंने देखा कि मम्मी का शरीर अब पूरी तरह से काँप रहा था। उनकी उँगलियाँ चादर को इतनी ज़ोर से जकड़ चुकी थीं कि उनके नाखून सफेद पड़ गए थे। जब अंकल ने अपनी जीभ से मम्मी के क्लिटोरिस पर ज़ोर से दबाव डाला और उसे अपने मुँह में भरकर ज़ोर से चूसना शुरू किया, तो मम्मी के शरीर में एक ज़ोरदार झटका लगा। "आह्ह्ह्ह... उह्ह्ह... भाई साब... मैं... मैं जा रही हूँ... आह्ह्ह्ह!" मम्मी की आवाज़ में एक बेइंतहा दर्द और सुख का मिश्रण था।

मेरी नज़रें मम्मी के उस हिस्से पर टिकी थीं जहाँ अंकल का चेहरा लगा हुआ था। वह देख पा रहा था कि कैसे मम्मी की चूत से निकलने वाला गाढ़ा और पारदर्शी रस अंकल के चेहरे और उनकी ठुड्डी पर फैल गया था। अंकल ने अब अपनी उँगलियाँ भी मम्मी की योनि के अंदर डाल दी थीं, जिससे वह जगह और भी ज़्यादा फैल गई थी और चूसने की आवाज़ और भी गंदी हो गई थी।

अचानक, मम्मी का पूरा शरीर अकड़ गया। उनकी पीठ बिस्तर से ऊपर उठ गई और वे ज़ोर से कराह उठीं। रवि ने देखा कि कैसे मम्मी का शरीर चरम सुख (orgasm) की लहरों में डूब रहा था। अंकल ने उस समय अपना मुँह और भी ज़ोर से उनकी चूत पर टिका दिया, जैसे वे मम्मी के शरीर से निकलने वाले उस अंतिम रस की एक एक बूंद को अपने मुँह में सोख लेना चाहते हों। रवि का अपना अंग अब इतना सख्त हो गया था कि उसे अपनी पैंट के अंदर असहनीय दर्द महसूस हो रहा था, लेकिन वह अपनी नज़रें उस गंदे और कामुक नज़ारे से हटा नहीं पा रहा था।
मम्मी के चरम सुख की लहरें अभी थमी भी नहीं थीं कि मैंने देखा कि अंकल का संयम अब पूरी तरह टूट चुका था। मम्मी का शरीर अभी भी थरथरा रहा था और उनकी योनि से निकलने वाला रस अंकल के चेहरे को पूरी तरह गीला कर चुका था। मेरी साँसें इतनी तेज़ थीं कि उसे अपने सीने में भारीपन महसूस हो रहा था।

अंकल ने धीरे से अपना सिर मम्मी की जाँघों के बीच से ऊपर उठाया। उनका चेहरा पूरी तरह से मम्मी के शरीर के रस और लार से लथपथ था। रवि ने देखा कि कैसे अंकल की ठुड्डी से मम्मी का गाढ़ा और चिपचिपा रस टपक कर उनके सीने पर गिर रहा था। अंकल की आँखों में एक जंगली चमक थी। उन्होंने मम्मी की आँखों में देखा, जो अब भी आधी खुली और मदहोश थीं।

अंकल ने बिना एक शब्द बोले अपनी पैंट की ज़िप खोली। मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं जब मैंने देखा कि अंकल का विशाल और सख्त अंग बाहर निकला। वह पूरी तरह से नीला और नसें उभरी हुई थी, जो उत्तेजना से पत्थर की तरह सख्त हो चुका था। मैने देखा कि अंकल ने मम्मी के पेट के पास अपना अंग रगड़ना शुरू कर दिया। 'स्लर्प... घिस... घिस...' की वह आवाज़ अब अंकल के अंग और मम्मी की गीली जाँघों के बीच से आ रही थी।

मम्मी ने अपनी आँखें खोलीं और अंकल के उस सख्त अंग को देखा। उनके चेहरे पर एक नई तरह की प्यास उभर आई। उन्होंने अपना एक हाथ धीरे से बढ़ाकर अंकल के उस गर्म और तने हुए अंग को सहलाया। मैं यह सब देख रहा था और मुझे महसूस हो रहा था कि उसका अपना अंग अब उसकी पैंट को फाड़कर बाहर निकलने को बेताब है। मै देख रहा था कि कैसे अंकल अब मम्मी के शरीर के ऊपर पूरी तरह हावी हो रहे थे, और कमरे का तापमान उस कामुकता और पसीने की गंध से और भी बढ़ गया था।
एरी साँसें अब पूरी तरह से उखड़ चुकी थीं। मैनेदेखा कि अंकल ने अब और इंतज़ार नहीं किया। उन्होंने मम्मी की दोनों टांगों को अपने कंधों पर उठा लिया, जिससे मम्मी की गुलाबी और रसीली योनि अब पूरी तरह से अंकल के विशाल अंग के सामने खुली हुई थी। मम्मी की चूत अभी भी चरम सुख के बाद से गीली और लाल थी, और उस पर अंकल के लार और उनके रस की चमक साफ़ देखी जा सकती थी।

अंकल ने अपने सख्त और नसदार अंग के सिरे को मम्मी के गीले मुहाने पर टिकाया। अंकल का अंग मम्मी के मांस को हल्का सा दबा रहा था। फिर, एक झटके के साथ, अंकल ने अपना पूरा अंग मम्मी के अंदर धकेल दिया। "आह्ह्ह्ह्ह्ह! उह्ह्ह्ह्ह!" मम्मी के मुँह से एक ऐसी चीख निकली जो दर्द और बेइंतहा सुख का मिला जुला मिश्रण थी। उनका शरीर बिस्तर पर धनुष की तरह तन गया।

'पच... पच... पच...' की वह गंदी और भारी आवाज़ अब पूरे कमरे में गूँजने लगी थी। जैसे ही अंकल ने अपना अंग अंदर बाहर करना शुरू किया, मम्मी की योनि और अंकल के अंग के बीच से निकलने वाला सफ़ेद और पारदर्शी रस चारों तरफ बिखरने लगा। मै अच्छे से देख पा रहा था कि कैसे अंकल का अंग मम्मी के अंदर गहराई तक जा रहा था और फिर बाहर निकलते समय मम्मी की योनि की दीवारों को खींचकर ला रहा था।
अंकल अब पूरी ताकत से और तेज़ी से वार कर रहे थे। उनकी छाती मम्मी के सुडौल स्तनों से बार बार टकरा रही थी। 'थप... थप... थप...' की आवाज़ अब और भी तेज़ हो गई थी। मम्मी का चेहरा अब पूरी तरह से पसीने और वासना से भीगा हुआ था। उनकी आँखें ऊपर की ओर चढ़ गई थीं और वे बस अंकल के इस हिंसक प्रहार को महसूस कर रही थीं। रवि की आँखों के सामने यह नज़ारा किसी ज्वालामुखी के फटने जैसा था कच्चा, गंदा और बेहद उत्तेजक।
अंकल की गति अब नियंत्रण से बाहर हो चुकी थी। वे अब किसी जानवर की तरह मम्मी के शरीर पर टूट पड़े थे। उनके हर वार के साथ मम्मी का शरीर बिस्तर पर पीछे की ओर धकेला जा रहा था। 'पच... पच... पच... चप...' की वह रसीली और गंदी आवाज़ अब कमरे में एक लय बना चुकी थी। मम्मी के सुडौल स्तन अंकल के सीने से टकराकर बुरी तरह हिल रहे थे, और उनके निप्पल अब पूरी तरह से सख्त और लाल हो चुके थे।

"भाई साहब... और... और तेज़... उह्ह्ह्ह... हाँ... वहीं... आह्ह्ह्ह!" मम्मी की आवाज़ अब पूरी तरह से वासना में डूबी हुई थी। वे अब शर्म महसूस नहीं कर रही थीं, वे बस उस जानवर जैसे सुख की भूखी थीं। अंकल ने मम्मी की कमर को अपने हाथों से इतनी ज़ोर से जकड़ लिया था कि उनके उँगलियों के निशान मम्मी की कोमल त्वचा पर साफ़ दिखाई दे रहे थे।
मेरा दिमाग अब काम करना बंद कर चुका था। मै देख रहा था कि कैसे अंकल का अंग मम्मी की योनि के अंदर गहराई तक जा रहा था और बाहर निकलते समय वह हिस्सा पूरी तरह से मम्मी के रस से लथपथ होकर चमक रहा था। मैने देखा कि मम्मी की योनि के चारों ओर का मांस अब अंकल के अंग के घर्षण से सूजन की तरह लाल हो गया था।

अचानक, अंकल ने अपनी गति को और भी हिंसक बना दिया। वे अब मम्मी के ऊपर पूरी तरह से हावी होकर, अपने पूरे शरीर का भार उन पर डालकर वार कर रहे थे। मम्मी का सिर बिस्तर पर बार बार पीछे की ओर टकरा रहा था, लेकिन उन्हें अब सिर्फ उस चरम सुख की तलाश थी। मैने देखा कि अंकल के चेहरे पर भी एक अजीब सी तड़प थी, जैसे वे बस अब अपने भीतर के उस गर्म लावा को मम्मी के शरीर के अंदर छोड़ देना चाहते हों।
अंकल और मम्मी दोनों ही चरम सुख की दहलीज पर थे, लेकिन वे रुकने के मूड में नहीं थे। वे पहले ही कई बार डिस्चार्ज हो चुके थे, लेकिन अब उनकी वासना एक जंगली जानवर की तरह बेकाबू हो चुकी थी। अब वे सिर्फ सुख नहीं, बल्कि एक दूसरे को पूरी तरह से निगल जाने की कोशिश कर रहे थे।

अंकल ने मम्मी की टांगों को अपने कंधों पर इतनी ज़ोर से टिका दिया कि उनके घुटने मुड़ गए। अब अंकल का अंग मम्मी की योनि के अंदर एक मशीन की तरह बिना रुके, बेहद हिंसक और तेज़ गति से धँस रहा था। 'पच... पच... पच... चप!' की वह गंदी और रसीली आवाज़ अब कमरे की दीवारों से टकराकर गूँज रही थी। मम्मी का सुडौल शरीर हर वार के साथ बिस्तर पर बुरी तरह उछल रहा था।

"उह्ह्ह्ह... हाँ भी साब! ऐसे ही... मारो मुझे... तोड़ दो मुझे! आह्ह्ह्ह!" मम्मी की आवाज़ अब पूरी तरह से गंदी और अश्लील हो चुकी थी। वे अब किसी सभ्य महिला की तरह नहीं, बल्कि एक ऐसी औरत की तरह चिल्ला रही थीं जो सिर्फ वासना के लिए बनी है। "आपका अंग... कितना बड़ा और गरम है... मेरे अंदर सब कुछ भर दो... आह्ह्ह्ह!"

अंकल भी अब अपनी पूरी ताकत लगा रहे थे। उनके चेहरे पर पसीना और वासना का पागलपन था। वे मम्मी के कान के पास झुककर गंदी और फूहड़ बातें करने लगे, "देख रही हो इस सुडौल शरीर को? तुम्हारी योनि कितनी तंग और गरम है... मेरा अंग इसमें डूबकर पागल हो रहा है! मैं तुम्हें पूरी तरह बर्बाद कर दूँगा!"

मम्मी ने अंकल के बालों को ज़ोर से खींचते हुए कहा, "हाँ प्रदीप भाई साहब... और तेज़! मुझे अपना सारा गंदा रस मेरे अंदर डाल दो... मुझे गंदा कर दो! आह्ह्ह्ह... मैं मर जाऊँगी इस सुख से!"

अंकल की गति अब इतनी तेज़ हो गई थी कि उनके शरीर का मांस मम्मी के मांस से टकराकर लाल पड़ गया था। अचानक, अंकल का शरीर एक ज़ोरदार झटके के साथ अकड़ गया। वे मम्मी के शरीर के भीतर गहराई तक धँस गए और एक भयानक गर्जना के साथ अपना सारा गाढ़ा और गर्म वीर्य मम्मी की गर्भाशय की गहराई में छोड़ दिया।

उसी पल मम्मी का शरीर भी थरथराने लगा। उनकी योनि की मांसपेशियाँ अंकल के अंग को इतनी ज़ोर से जकड़ लिया कि अंकल की चीख निकल गई। मम्मी का डिस्चार्ज भी उनके शरीर से एक फव्वारे की तरह निकलकर बिस्तर को पूरी तरह भिगोने लगा। दोनों एक दूसरे से लिपटकर, पसीने और वीर्य में लथपथ लेट गए।
कमरे में व्याप्त वह भारी और गंदी गंध अब और भी तीव्र हो गई थी। अंकल का अंग अभी भी मम्मी की योनि के भीतर गहराई तक धँसा हुआ था, जहाँ वे दोनों एक दूसरे के चरम सुख के अवशेषों को महसूस कर रहे थे। मम्मी का शरीर अभी भी छोटे छोटे झटकों के साथ काँप रहा था, और उनके जननांगों से निकलने वाला तरल पदार्थ अंकल के अंग के साथ मिलकर बिस्तर की चादर पर एक बड़ा सा गीला धब्बा बना रहा था।

दोनों की साँसें अब धीरे धीरे सामान्य होने लगी थीं, लेकिन उनके बीच का तनाव और वासना की वह गूँज अभी भी हवा में तैर रही थी। अंकल ने धीरे से अपना शरीर मम्मी के ऊपर से हटाया, जिससे एक 'चप' की आवाज़ के साथ उनका अंग मम्मी के गीले और सूजे हुए द्वार से बाहर निकला। मम्मी ने अपनी आँखें खोलीं, जो अभी भी धुंधली और कामुकता से भरी थीं। उन्होंने एक गहरी और थकी हुई आह भरी और अपने बिखरे हुए बालों को पीछे किया।

कमरे में पसरा सन्नाटा अब केवल उनकी भारी साँसों और शरीर से टपकते पसीने की बूंदों की आवाज़ से टूट रहा था। वह दृश्य पूरी तरह से कच्चा, अनफ़िल्टर्ड और वासना से लथपथ था एक ऐसा अंत जो किसी भी मर्यादा को तोड़ चुका था।
उस भीषण और जंगली समागम के बाद, कमरे में एक भारी और मदहोश कर देने वाली शांति छा गई थी। मम्मी पूरी तरह से थककर चूर हो चुकी थीं। उनका शरीर पसीने से भीगा हुआ था और उनकी साँसें अभी भी उखड़ी हुई थीं। वे बेड के बीचों बीच बेसुध सी पड़ी थीं, जैसे किसी गहरे समुद्र में डूब गई हों। उनके चेहरे पर एक अजीब सा सुकून और थकावट का मिला जुला भाव था।

अंकल उनके बिल्कुल बगल में थे। उनका भारी शरीर मम्मी के शरीर से सटा हुआ था। उन्होंने एक हाथ मम्मी की कमर पर रखा हुआ था, जैसे सोते हुए भी वे उन्हें अपनी गिरफ्त में रखना चाहते हों। उनके शरीर की गर्मी मम्मी के ठंडे पड़ते शरीर को गर्माहट दे रही थी। अंकल की गहरी और भारी साँसें मम्मी के कंधे से टकरा रही थीं।

और मैं? मैं वहीं अंधेरे के एक कोने में, कम्बल के नीचे सिमटा हुआ था। मेरी आँखें खुली थीं, लेकिन मेरा शरीर सुन्न पड़ चुका था। जो मैंने देखा था, उसने मेरे दिमाग के सारे न्यूरॉन्स को झकझोर कर रख दिया था। मैं बस उन तीनों को एक साथ देख रहा था मम्मी का वो बेसुध शरीर, अंकल की वो भारी मौजूदगी, और उनके बीच का वो अनकहा संबंध।

कमरे में केवल उनकी साँसों की आवाज़ आ रही थी। मम्मी का शरीर बीच बीच में हल्का सा काँप जाता, शायद उस चरम सुख की यादों की वजह से जो उन्होंने अभी अभी महसूस किया था। अंकल और मम्मी एक दूसरे की गर्मी में लिपटे हुए थे, और मैं उस दृश्य का मूक गवाह बनकर बस उनकी लयबद्ध साँसों को सुन रहा था। उस पल में, हम तीनों एक ही धुन में थे, एक ही गहरी नींद की आगोश में समाने की कोशिश कर रहे थे।


*** वह सब कुछ जो मेरी आँखों के सामने हुआ था था, वह किसी फिल्म की तरह मेरे दिमाग में तेज़ी से चल रहा था। उन दृश्यों की तीव्रता, वह शोर, वह वासना और वह सब कुछ इतना गहरा और वास्तविक था कि मेरा दिमाग उस पर काबू नहीं रख पा रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे मैं किसी सपने और हकीकत के बीच की धुंधली रेखा पर खड़ा हूँ। वह सब कुछ एक फिल्म की तरह मेरी आँखों के सामने घूम रहा था हर एक हरकत, हर एक आवाज़ और वह सब कुछ जो मेरी कल्पनाओं से भी परे था।

उसी मानसिक उथल पुथल और उन दृश्यों के भारीपन के बीच, धीरे धीरे मेरी चेतना कम होने लगी। मेरी पलकें भारी होने लगीं और वह सब कुछ जो मेरे दिमाग में चल रहा था, धुंधला पड़ता गया। जैसे किसी ने मुझे गहरी नींद की आगोश में खींच लिया हो। मुझे पता ही नहीं चला कि कब वह फिल्म की तरह चलता हुआ नज़ारा मेरे दिमाग से ओझल हुआ और कब मैं नींद के उस गहरे और काले अंधेरे में समा गया। मेरा शरीर ढीला पड़ता गया और मैं पूरी तरह से बेसुध होकर नींद की गोद में जा गिरा।

***
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#60
****नहाकर जब मैं बाहर आया, तो देखा कि अंकल लॉबी में बैठे हुए थे। तभी मम्मी पूजा रूम से आरती की थाली लेकर बहुत ही सलीके से बाहर निकलीं। उसी दौरान मेरी और अंकल की नज़रें मिलीं और हमने आँखों ही आँखों में एक दूसरे को इशारों से 'थैंक्स' कहा। ****

****मम्मी हम दोनों को आरती और प्रसाद देती हैं। उसी दौरान मैं मम्मी के पैर छूता हूँ, जो मैं कभी कभी करता ही हूँ। पैर छूते वक्त मैं मम्मी को भरपूर नज़रों से देखता हूँ। मम्मी को इस बात का कारण तो समझ नहीं आता कि मैं उन्हें इस तरह क्यों देख रहा हूँ, पर वो इतना ज़रूर महसूस कर पाती हैं कि मेरी नज़रें उन पर टिकी हुई हैं।****

****तभी अंकल मेरी तरफ देखते हैं और मम्मी की ओर इशारा करते हुए धीरे से कहते हैं, "रवि, तेरी मम्मी आज बहुत थकी हुई लग रही हैं।" यह सुनकर मम्मी एकदम से चौंक जाती हैं और शरमाते हुए मुस्कुरा के अंकल को घूरती हैं। वे कुछ बोलती तो नहीं हैं, पर उनके हाव भाव से लगता है जैसे कह रही हों बच्चे के सामने क्या बोल रहे हो!

****पर मैं सब देख लेता हूँ। मैं वो इशारा और अंकल की बात समझ जाता हूँ। मम्मी को भी यह एहसास हो जाता है कि मैंने अंकल की बात सुन ली है और मैंने उन्हें इशारे से घूरते हुए देख लिया है। मम्मी की आँखों में एक अजीब सी घबराहट और शर्मिंदगी साफ़ झलक रही थी।****और शायद समझती है कि रवि तो बहुत भोला है,इसे क्या पता इन बातों का।
सुबह का समय था। अंकल अपने काम पर चले गए और मैं भी कॉलेज के लिए निकल गया। मम्मी घर के कामों और दुकान की ज़िम्मेदारियों में व्यस्त थीं।
दोपहर में जब मैं कॉलेज से वापस आया, तो घर का नज़ारा बदला हुआ था। मेरी दोनों बड़ी बहनें शादी से वापस आ चुकी थीं। उनके साथ मेरा छोटा भाई भी घर आ गया था, जो मामा के घर में रहकर अपनी पढ़ाई करता था।
घर में अब सब लोग मौजूद थे। बहनें और भाई के आने से घर में काफी चहल पहल मच गई थी। सब अपने अपने कामों और बातों में लग गए थे, जिससे घर का माहौल पूरी तरह बदल चुका था।
अंकल रोज़ाना घर आ जाते थे, पर घर में सभी के होने के कारण वे कुछ कर नहीं पाते थे। मम्मी और अंकल अवसरों की तलाश में रहते। हालांकि, उनके बीच छोटी मोटी इशारों का सिलसिला चलता रहता था, जिसे मैं पिछले कई सालों से देख रहा था। मैं यह भी समझता था कि उनके बीच पहले भी कुछ था, पर वह किस हद तक था, यह बात मुझे पिछले दो दिनों से ही पता चल पाई थी। मुझे नहीं पता कि मेरे दूसरे भाई बहनों को इस बारे में कोई अंदाज़ा था या नहीं।

"घर के माहौल में एक अजीब सी कड़वाहट अक्सर महसूस होती थी। कभी कभी मम्मी और मेरी बड़ी बहनों के बीच अचानक और तीखी बहसबाजी शुरू हो जाती थी। उन झगड़ों का कोई स्पष्ट कारण समझ नहीं आता था कभी छोटी सी बात होती, तो कभी बिना किसी वजह के तनाव बढ़ जाता था। उस वक्त मैं बहुत छोटा था और उन बहसों के पीछे की असली वजह को समझने में असमर्थ था।

लेकिन अब जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो समझ आता है कि वह सिर्फ मामूली झगड़े नहीं थे। उन बहसों के पीछे एक गहरा राज़ छिपा था, जो सीधा अंकल और मम्मी के बीच के उस अनकहे रिश्ते से जुड़ा था।

"अंकल का आना अब एक तरह की रस्म बन गया था। वह हर दो तीन दिन में घर आ तो जाते थे, लेकिन उनका आना मम्मी की प्यास बुझाने के लिए काफी नहीं था। विडंबना तो देखिए, अंकल के आते जाते रहने के बावजूद, मम्मी को उनके साथ उस बेतहाशा और रसीले मिलन का मौका महीने डेढ़ महीने में सिर्फ एक ही बार मिल पाता था। वह एक लंबा इंतज़ार था एक ऐसी तड़प जो मम्मी के जिस्म को अंदर ही अंदर गला देती थी।

"अंकल से मिल न पाने के कारण मम्मी के व्यवहार में बदलाव आने लगा था। रवि ने कई बार देखा कि कैसे उनकी नज़रों में मर्दों के लिए एक अजीब सी प्यास उभरने लगी थी। कभी पड़ोसियों के आने पर उनकी नज़रों का ठहर जाना, तो कभी अकेले में खुद को सँवारते हुए उनके चेहरे पर आने वाली वह मदहोश कर देने वाली मुस्कान इन छोटी छोटी घटनाओं ने रवि को यकीन दिला दिया था कि मम्मी की आँखों में अब एक मूक आमंत्रण है।"

"एक दिन मैने मम्मी और उनकी एक सहेली के बीच हो रही आपसी बातचीत भी सुनी, जो इस बात की पुष्टि करती थी कि मम्मी अब अपनी प्यास बुझाने के लिए कोई भी रास्ता चुन सकती है।"

आंटी कह रही थीं, *'अरे, वो ड्राइवर लोग बड़े अच्छे होते हैं!'* उस वक्त मुझे कुछ समझ नहीं आया, पर अब समझ आता है कि आंटी का 'अच्छे' से मतलब उनकी **ज़बरदस्त और बेतहाशा चोदाई** करने की काबिलियत से था। मम्मी की आँखों में भी वही चमक थी जैसे वो उन ट्रक ड्राइवरों के उस कच्चे और जंगली अंदाज़ को आज़माने के लिए बेताब हों, जहाँ कोई औपचारिकता नहीं, बस शुद्ध और रसीला मिलन हो।"

कभी कभी जब वो रात को अकेले कमरे में बैठी रहतीं और उनकी आँखों में वो अधूरी प्यास और तड़प साफ़ झलकती, तो मेरा जी करता कि मैं उनके पास जाऊँ, उनके उस तड़पते हुए जिस्म को छू लूँ और उनकी उस महीनों की प्यास को एक पल में बुझा दूँ। मेरा मन करता कि मैं उन्हें बता दूँ कि मैं उनकी उस हर एक आह और हर एक चाहत को महसूस कर सकता हूँ।

लेकिन फिर अचानक **रिश्ते की मर्यादा** का डर मुझे झकझोर देता। एक पल में मैं एक बेटा बन जाता जो शर्म से झुक जाता, और दूसरे ही पल मैं एक जवान मर्द बन जाता जो उनकी उस रसीली और प्यासी देह को पाने के लिए बेताब रहता। मैं उनके करीब तो जाना चाहता था, पर वो 'रिश्ते की मार' मुझे रोक देती। मैं चाहकर भी कुछ कह नहीं पाता था न अपनी मर्दानगी की उस चाहत के बारे में, और न ही उस कामुकता के बारे में जो मुझे उनकी तरफ खींचती थी। मैं बस चुपचाप खड़ा रहकर उनकी उस तड़प को देखता रहता और खुद भी उस आग में जलता रहता ।**
" मम्मी कभी कभी उस आंटी के साथ सत्संग , बाबा की हाज़िरी या किसी और बहाने बाहर जाती थीं। शुरुआत में मुझे कुछ समझ नहीं आया, लेकिन कुश समय बीतने के बाद मुझे ,मम्मी और आंटी की बातें सुनधीरे धीरे अहसास होने लगा कि वो असल में बाबा की भक्ति के लिए नहीं, बल्कि अपनी उस दबी हुई प्यास और अपनी मानसिक शांति के लिए जाती थीं। मुझे अब समझ आने लगा था कि उस आंटी के साथ जाने का असली मकसद कुछ और ही था।
"मेरे मन में चल रहे शकों और तड़प के बीच एक ऐसी खबर आई जिसने सब कुछ बदल दिया। पापा एक दो महीने के लिए घर वापस आ रहे थे। रवि को लगा था कि अब सब कुछ बदल जाएगा, अब माँ को सब छुपाना पड़ेगा। लेकिन उसे क्या पता था कि खेल तो अब शुरू होने वाला है।
पापा कोई साधारण इंसान नहीं थे, वो इस खेल के मंझे हुए खिलाड़ी थे। उन्हें पता था कि माँ की आँखों में वो चमक कहाँ से आती है और उनकी वो 'शांति' कहाँ मिलती है। घर में अब कुछ भी छुपाने की ज़रूरत नहीं थी। पापा के आने का मतलब था माँ की उस प्यासी धरती पर संतुष्टि की वो बरसात, जिसका इंतज़ार उन्हें बरसों से था। अब घर के बंद दरवाजों के पीछे एक ऐसा खेल खेला जाएगा जहाँ दो शरीरों में मिलन की आंधी आने वाली है,और वासना का एक नया अध्याय शुरू होगा। रवि बस एक गवाह बनकर इस अद्भुत और वर्जित नज़ारे को देखने के लिए बेताब था।"

पापा के घर कदम रखते ही माहौल में एक अजीब सी भारीपन और गर्मी महसूस होने लगी। रवि ने देखा कि जैसे ही पापा ने माँ को देखा, उनके बीच का मिलना कोई साधारण मिलन नहीं था। पापा ने माँ को जिस तरह से गले लगाया, वो गले मिलना नहीं बल्कि एक दूसरे में समा जाने की पहली कोशिश थी। उनकी बाँहों की पकड़ में एक ऐसी तड़प थी जिसे देखकर रवि की साँसें भी थम गईं। माँ की आँखों में भी वही बेताबी थी, वो पापा के सीने से ऐसे चिपकीं जैसे बरसों की प्यास एक पल में मिटाना चाहती हों। उनके बीच की वो 'गर्मजोशी' इतनी तीव्र थी कि रवि को लगा जैसे कमरे का तापमान अचानक बढ़ गया हो।

पापा अपने साथ सिर्फ यादें नहीं, बल्कि एक पूरा पिटारा लेकर आए थे एक ऐसा पिटारा जो उस रात को यादगार बनाने के लिए था। रवि ने देखा कि पापा के बैग में कुछ ऐसी चीज़ें थीं जो घर के सलीके से बिल्कुल अलग थीं। रेशमी और बेहद **sexy undergarments** का वो ढेर, जो माँ के बदन पर आग लगाने के लिए काफी था। कमरे को महकाने के लिए महंगे **room sprays** और पापा के खुद के शरीर को मदहोश करने वाले **body sprays**। इतना ही नहीं, माँ की त्वचा को रेशम जैसा चिकना बनाने के लिए **hair remover** और वो सब कुछ जो एक बेतहाशा रात के लिए ज़रूरी था।

कमरे में रखे ताज़ा **फूलों** की खुशबू और उन नशीले स्प्रेज़ के मिश्रण ने हवा को भारी बना दिया था। रवि समझ गया कि आज रात उस कमरे की दीवारों के पीछे जो होने वाला है, वो किसी तूफ़ान से कम नहीं होगा। वो सामान, वो खुशबू और वो गर्मजोशी सब कुछ इशारा कर रहे थे कि पहली रात का वो एहसास अब बस दरवाज़ा खटखटाने ही वाला है।
पापा के पास वो सब कुछ था जो एक औरत की प्यास को पूरी तरह से मिटाने के लिए चाहिए होता है। रवि सोच रहा था कि कैसे पापा उन महंगे स्प्रेज़ की खुशबू के बीच माँ के बदन को अपने हाथों से सहलाएंगे, कैसे वो नए रेशमी कपड़ों को उतारकर माँ की नग्नता का स्वागत करेंगे, और कैसे वो 'सर्विस' इतनी गहन होगी कि माँ की सिसकियाँ पूरे घर में गूँज उठेंगी।

उस कमरे के भीतर अब मर्यादा का कोई अस्तित्व नहीं था। वहाँ सिर्फ एक पुरुष की ताकत और एक स्त्री की बेताबी का मिलन होने वाला था। रवि को लग रहा था कि आज की रात तो बस एक शुरुआत है; आने वाले दो महीनों में पापा माँ के शरीर के साथ जो खेल खेलेंगे, वो माँ को एक ऐसी दुनिया में ले जाएगा जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं होगा।

रात गहराती जा रही थी और घर के उस कोने में सन्नाटा नहीं, बल्कि एक भारी और नशीली बेचैनी पसरी हुई थी। रवि अपने कमरे में लेटा हुआ था, लेकिन उसकी आँखें बंद नहीं हो रही थीं। उसके कानों में उस बंद कमरे के भीतर होने वाली हलचल की कल्पनाएँ गूँज रही थीं।

जैसे ही रात के सन्नाटे ने अपना डेरा जमाया, रवि को लगा कि उस कमरे के भीतर 'सर्विस' का असली दौर शुरू हो चुका है। पापा ने कमरे के दरवाज़े को अंदर से कुंडी लगाकर बंद कर दिया था एक ऐसा संकेत जो यह बता रहा था कि अब दुनिया का कोई भी नियम या मर्यादा उस कमरे की दहलीज पार नहीं कर सकती।

मैं कल्पना कर सकता था कि कैसे पापा ने सबसे पहले उन महकते हुए **room sprays** का इस्तेमाल किया होगा, जिससे कमरे की हवा एकदम भारी और मदहोश कर देने वाली हो गई होगी। फिर शुरू हुआ हाेगा वो खेल, जिसमें माँ के शरीर को एक खिलौने की तरह सजाया जा रहा होगा। पापा ने उन नए और **sexy undergarments** को माँ के बदन पर ऐसे चढ़ाया होगा जैसे किसी बेशकीमती तोहफे को रैप किया जाता है। माँ का वो रेशमी बदन, जो अब तक सादे कपड़ों में ढका रहता था, अब पापा के हाथों के स्पर्श से थरथरा रहा होगा।

मेरे दिमाग में दृश्य और भी गहरा होता गया पापा ने माँ के बदन पर वो **body spray** छिड़का होगा जिसकी खुशबू माँ की अपनी प्राकृतिक गंध के साथ मिलकर एक नशीला मिश्रण बना रही होगी। फिर शुरू हुआ वो स्पर्श, जहाँ पापा के हाथ माँ की चिकनी और **hair remover** से साफ की हुई त्वचा पर फिसल रहे होंगे। माँ की वो दबी हुई सिसकियाँ अब धीरे धीरे बाहर आने लगी होंगी।
मुझे लग रहा था जैसे दीवारें भी उस गर्मी को महसूस कर रही हैं। पापा माँ के हर उस हिस्से को सहला रहे होंगे जिसे उन्होंने बरसों से छुपा कर रखा था। वह सिर्फ मिल नहीं रहे होंगे, बल्कि माँ के शरीर के हर रोम रोम को अपनी मर्दानगी से तृप्त कर रहे होंगे। उस कमरे के भीतर अब केवल वासना का साम्राज्य होगा, जहाँ माँ की सिसकियाँ और पापा की भारी साँसें मिलकर एक ऐसा संगीत रच रही होंगी, जो आने वाले दो महीनों तक थमने वाला नहीं था।
उस पहली रात के बाद से मेरा पूरा वजूद जैसे बदल गया था। जब सुबह मेरी आँख खुली और मैं दबे पाँव पापा के कमरे की तरफ बढ़ा, तो मेरा दिल सीने को चीरकर बाहर आने को बेताब था। जैसे ही मैंने दरवाज़े की दरार से अंदर झाँका, मेरी साँसें थम गईं।

फर्श पर बिखरा हुआ वो नज़ारा देख कर मेरा दिमाग सुन्न हो गया। माँ का वो कीमती **makeup** इधर उधर फैला था, और उनके वो **sexy lacey undergarments** फर्श पर ऐसे पड़े थे जैसे किसी ने उन्हें झपट्टा मारकर उतार फेंका हो। उन्हें देखकर मेरे शरीर में एक अजीब सी बिजली दौड़ गई। मेरा मन कर रहा था कि मैं झुकूँ और उन कपड़ों को छूकर देखूँ कि उनमें अभी भी माँ की खुशबू और रात की वो गर्मी बाकी है या नहीं।
लेकिन जब मेरी नज़र बिस्तर की तरफ गई, तो मेरी आँखों के सामने अंधेरा छा गया। बेडशीट पूरी तरह से अस्त व्यस्त थी और उस पर पसीने और **body fluids** के सूखे हुए निशान साफ़ चमक रहे थे। वो **चिपचिपी और गीली बेडशीट** देख कर मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे मैं खुद उस रात के उस बेतहाश और गंदे खेल का हिस्सा था।

मुझे डर लग रहा था, पर उससे कहीं ज़्यादा मैं उत्तेजित था। मेरा शरीर कांप रहा था और मेरा प्राइवेट पार्ट उस दृश्य की कल्पना मात्र से ही सख्त हो रहा था। मैं उन निशानों को देख कर बस एक ही बात सोच पा रहा था *'रात भर माँ के साथ क्या क्या हुआ होगा? पापा ने उन्हें कितनी बेदर्दी से इस्तेमाल किया होगा?'* वो बिखरा हुआ सामान और वो गीली बेडशीट मेरे लिए किसी नशीले ड्रग्ग की तरह काम कर रही थी। मैं डर नहीं रहा था, मैं उस गंदगी में डूब जाने के लिए बेताब हो रहा था।
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