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Misc. Erotica Kahani mere ghar ki
#21
ekdom super duper hit aur hot update
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#22
(12-08-2026, 07:15 PM)Suhana. Wrote: ekdom garma garam update

Haa garmi to garmi ko kategi
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#23
(12-08-2026, 07:35 PM)shalini Wrote: ekdom super duper hit aur hot update

Thanks ji
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#24
Wonderful update
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#25
थोड़ी देर की  शांति के बाद, कमरे में अचानक चारपाई की चरचराहट और फिर गहरे, रसीले चुंबनों की आवाज़ गूँजने लगी। तभी मुझे मम्मी की एक थकी हुई सी फुसफुसाहट सुनाई दी, "नहीं... अब नहीं... मैं बहुत थक गई हूँ।"अंकल उनकी इस थकान को नज़रअंदाज़ कर रहे थे। उनकी आवाज़ में एक हताशा भरी ज़िद थी, "बड़ी मुश्किल से आज मौका मिला है, प्लीज करने दो ना।" मम्मी ने फिर से मना करते हुए कहा, "नहीं भाई जी, काफी टाइम हो गया है। मुझे पता है, दूसरी बार में तो तुम सुबह 5 बजे तक मुझे छोड़ोगे नहीं, फिर मेरे लिए मुश्किल हो जाएगी। ऐसा करो, कल दिन में पक्का।" अंकल ने आह भरते हुए कहा, "पर दिन में तो तुम काम में लगी रहती हो।"तभी मम्मी ने एक योजना बनाई, "कल पक्का !आप काम से छुट्टी कर लेना। मैं रवि को भी बोल दूँगी कि कॉलेज से छुट्टी ले ले, इससे उसे शक भी नहीं होगा कि आप क्यों घर पर हैं। और आप कर लेना अपनी मनमर्जी। रवि तो है ही भोला भाला, मैं उसे बोल दूँगी कि वो दुकान संभाल ले और मैं घर का काम कर लूँ।"इतना कहकर मम्मी उठीं और धीरे से मेरे पास आकर लेट गईं। उनके पास से पसीने की वह सोंधी और अजीब सी महक आ रही थी।जब मम्मी ने करवट बदल कर मुंह मेरी तरफ कर लियटो थोड़ी देर बाद मैने सोये होने  का बहाना करते हुए मैंने धीरे से अपना एक हाथ उनकी ऊपर और एक टांग  उनके  टांग पर रख दी। कुछ ही मिनटों के भीतर, पता नहीं किस अहसास के चलते, मम्मी ने मुझे अपनी बाहों में भर लिया यानी मुझे अपनी जाँफी में ले लिया। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि यह एक माँ का अपने बेटे के प्रति ममता भरा स्पर्श था या फिर कुछ और... मैं उस अहसास को पूरी तरह समझ नहीं पा रहा था।थोड़ी ही देर बढ़ मुझे नींद आ गई। मम्मी के बदन के ममता भरे गरम स्पर्श,इतनी देर जागते रहने,और मुठ मारने के बाद मिली मानसिक और शारीरक संतुष्टि के कारण बहुत ही गहरी और मीठी नींद आई थी।
   सुबह के पाँच बजे मम्मी मेरे पास आईं और मेरे गाल पर किस करके बड़े प्यार से बोलीं, "बेटा रवि, उठो,मुँह हाथ धो लो। अगर नहाना है तो नहा लो, मैंने तो नहा लिया है, अब मैं पूजा करने जा रही हूँ।"मैने आँख खोली ,देखा मम्मी बहुत ही ही खूबसूरत लग रही  और शांत भी ,मै थोड़ा मुस्कुरा के हा का इशारा किया, मम्मी फिर बोली," बेटा आज कॉलेज से छुट्टी करलो मेरे काफी काम हैं घर के,तुम दुकान संभालना मै घर का काम निबटा लूंगी"। मै मन ही मन सोचने लगा के मम्मी कितनी चतुर है ,कितनी सफाई से उस प्लान पर काम शुरू कर दिया है जो रात को दोनों ने मिलकर कर बनाया था।मैं बोला," ठीक है है मम्मी मैं आज कॉलेज नहीं जाता"। इतना कहकर मैं मम्मी के जाने का इंतज़ार किया।मम्मी के बाहर जाते ही  झट से बेड के नीचे से अंडरवियर निकालकर बाथरूम में चला गया।
मम्मी जब सुबह नहाती थीं, तब मेरे कपड़े और तौलिया भी वहीं रख देती थीं। आप सोच रहे होंगे कि अंकल ने नहीं देखा? दरअसल, अंकल सुबह 4:30 बजे ही छत पर चले जाते थे और वहाँ कुछ कसरत करने लगते थे।तभी मेरी नज़र बाथरूम में धोने के लिए रखे कपड़ों की तरफ गई। मैंने देखा कि जो तौलिया कल मम्मी ने अंकल की चारपाई के पास टांगा था, वह भी गंदे कपड़ों के साथ वहीं पड़ा है। मैंने सोचा कि यह तौलिया तो किसी ने इस्तेमाल भी नहीं किया, तो फिर यह गंदे कपड़ों के साथ क्यों है? उत्सुकतावश मैंने तौलिया उठा लिया और मुझे महसूस हुआ कि इससे वैसी ही महक आ रही थी जैसी रात को मम्मी के शरीर से आ रही थी।मैंने थोड़ा पलट कर देखा तो तौलिया काफी जगहों से गीला था। पता नहीं मन मे  क्या आया कि मैंने  हाथ से छूकर देखा, तो मुझे चिपचिपाहट महसूस हुई। मैं इस उलझन में पड़ गया कि यह चिपचिपाहट कहाँ से आई? मैं सोच रहा था कि ऐसा ही चिपचिपा पानी तो मेरे लंड से भी निकला था, पर अंकल ने तो मम्मी की चूत के अंदर गिराया था, तो फिर तौलिया पर कैसे और  वो बी इतना ज्यादा ? तब तक मैं यही समझता था कि मर्द का माल औरत के अंदर ही रहता है, इसलिए मैं इस पहेली को सुलझा नहीं पा रहा था।अभ जब भी वो सीन  याद करता हु तो अपने भोलेपन पर मुस्कुरा देता हु।वैसे तो मैं दो साल पहले एक लड़की की ले चुका था,पर तब तो मेरी उमर और भी कम थी तो कुश सीख नहीं पाया था।उस लड़की की लेने का किस्सा भी बहुत मजेदार है(,इसी कहानी में शेयर करूगा )    खैर, मैंने नहाने के बाद अपना अंडरवियर पानी में भिगो दिया और कपड़े पहनकर बाथरूम से बाहर आ गयाl
जब मैं नहाकर बाहर निकला, तो लॉबी में मेरा सामना मम्मी से हुआ। वह अभी अभी पूजा करके पूजा घर से बाहर निकली थीं।
उस वक्त जो दृश्य मेरी आँखों के सामने था, वह इतना सुंदर और पवित्र था कि मैं बस देखता ही रह गया। मम्मी का वह रूप एकदम दिव्य और धार्मिक लग रहा था। उनकी वह **दूधिया गोरी त्वचा** सुबह की मद्धम रोशनी में चमक रही थी, और उनके चेहरे पर एक असीम शांति थी। माथे पर लगा वह गहरा लाल कुमकुम का तिलक और आँखों के बीच सजी वह छोटी सी बिंदी उनके चेहरे की सुंदरता में चार चाँद लगा रही थी। उनकी नाक में सजी वह छोटी सी नथनी और कानों के झुमके सुबह की मद्धम रोशनी में चमक रहे थे, जो उनके चेहरे की सुंदरता को और भी निखार रहे थे। उनकी माँग में भरा वह गहरा लाल सिंदूर और उनके चेहरे की वह असीम शांति उन्हें एक **धर्मपरायण सुहागन और एक आदर्श पतिव्रता स्त्री** के रूप में दर्शा रही थी। वह दृश्य इतना पवित्र था कि उन्हें देखकर मन में श्रद्धा अपने आप जाग उठी।"
उनके गीले बाल और चेहरे पर छाई वह पवित्र चमक देखकर ऐसा लग रहा था जैसे कोई देवी साक्षात सामने खड़ी हों।
वह पूरी तरह से भक्ति में लीन लग रही थीं। उनके हाथों में पूजा की थाली की महक और अगरबत्ती का हल्का धुआँ हवा में तैर रहा था। उनकी सादगी और उस धार्मिक रूप ने मुझे मंत्रमुग्ध कर दिया था। मैं बस वहीं लॉबी में खड़ा होकर उन्हें निहारता रहा। उनके चेहरे की वह सौम्यता और वह पवित्र आभा इतनी प्रभावशाली थी कि मेरे मन में उनके प्रति सम्मान और श्रद्धा और भी बढ़ गई। वह पल बहुत ही शांत और गरिमामय था, जहाँ सिर्फ उनकी सुंदरता और उस धार्मिक वातावरण का जादू छाया हुआ था।"
मैं अपने कमरे में गया और जूते पहनकर बाहर निकलने की तैयारी करने लगा। आमतौर पर तैयार होने और जूते पहनने में मुझे १० १५ मिनट लग जाते थे, लेकिन आज जैसे मेरे अंदर एक अजीब सी बेचैनी थी मैं बस जल्दी से बाहर निकलना चाहता था। देखते ही देखते सिर्फ दो मिनट में ही मैं बाहर आ गया।
सबसे पहले मैं मम्मी के कमरे में गया, लेकिन वहाँ कोई नहीं था। मम्मी अंदर नहीं थीं। तभी अचानक मुझे बगल वाले कमरे से, यानी अंकल के कमरे से कुछ हल्की हल्की फुसफुसाहट की आवाज़ सुनाई दी। मेरा ध्यान उस आवाज़ की ओर खिंचा चला गया। मैं दबे पाँव उस आधे खुले दरवाज़े के पास पहुँचा और कान लगाकर सुनने की कोशिश करने लगा।
अंदर से अंकल की आवाज़ आ रही थी। वह मम्मी से कुछ कह रहे थे, 'अरे, अब मुझे भी भोग लगवाओ ना...' उनकी आवाज़ में एक तरह की ज़िद थी। मम्मी ने बहुत ही धीमी और संभली हुई आवाज़ में जवाब दिया, 'पर मैंने आपसे कहा था ना कि जब रवि दुकान पर चला जाएगा, तब कर लेना।'
तभी अंकल ने तुरंत टोकते हुए कहा, 'अरे छोड़ो भी, तुम खाना बनाने लग जाओगी बाद में, अभी ही मौका है। मैं दोपहर तक इंतज़ार नहीं कर सकता।' उनकी बातों से लग रहा था कि वह बहुत बेताब थे।"

अंकल की बातें सुनकर मेरा दिमाग चकरा गया। मुझे अचानक याद आया कि इनका दोपहर का प्रोग्राम तो बिल्कुल पक्का है। पर अब समस्या यह थी कि मैं इसे देख कैसे पाऊँगा? दोपहर के समय तो दुकान पर ग्राहकों की भारी भीड़ होती है और मैं वहाँ से एक पल के लिए भी नहीं हट सकता। मैं चाहकर भी उस समय वहाँ नहीं पहुँच पाऊँगा।

तभी अचानक मेरे दिमाग में एक योजना आई। मैंने सोचा कि अगर मुझे यह सब देखना है, तो मुझे कुछ अलग करना होगा। मैं दबे पाँव वापस अपने कमरे में गया और फिर बहुत ही सावधानी से, ताकि किसी को शक न हो, मैंने मम्मी को आवाज़ लगाई, 'मम्मी... ओ मम्मी! ज़रा सुनना!' मेरी आवाज़ में एक ऐसी बनावट थी जैसे मैं कोई साधारण काम बता रहा हूँ, ताकि अंकल को भी कुछ महसूस न हो।"
"मम्मी तुरंत लॉबी में आ गईं और बड़े प्यार से पूछा, 'क्या हुआ बेटा? क्यों आवाज़ दे रहे हो?'
मैंने एक गहरी साँस ली और चेहरे पर एक स्वाभाविक मुस्कान लाते हुए कहा, 'मम्मी, मेरा मन कर रहा था कि मैं पास वाले मंदिर, जो हमारे घर से करीब दो किलोमीटर दूर है, वहाँ जाकर दर्शन कर आऊँ। इससे मेरी थोड़ी सैर भी हो जाएगी और मन भी शांत हो जाएगा। अभी साढ़े पाँच बज रहे हैं, तो मैं दो घंटे में वापस लौट आऊँगा, यानी सात साढ़े सात के आसपास तक घर पहुँच जाऊँगा। दुकान तो हमें आठ बजे ही खोलनी है, तब तक मैं सब संभाल लूँगा।'
मम्मी को मेरी बात पर रत्ती भर भी शक नहीं हुआ। पर असल में मेरा इरादा कुछ और ही था। मेरा असली प्लान तो कुछ और ही था मैं बस उन्हें वह मौका देना चाहता था ताकि वे दोनों पूरी तरह बेपरवाह होकर अपना क्रिया कलाप कर सकें।मैने  मम्मी को बोला, "आप आराम करना अभी काम मत करने लग जाना।सारा दिन कम करती रहती हो।।" मेरा ऐसा कहने का कारण ये ये था के मम्मी काम की टेंशन  मन से काम की टेंशन निकाल कर  अच्छे से काम लीला में शामिल हो और मुझे देखने का मौका मिले। मैं चाहता था कि जब घर में कोई न हो, तब मैं घर के पीछे वाले अपने प्लॉट में जाकर खिड़की के सहारे छिपकर अंदर का सारा नज़ारा देख सकूँ। मेरा दिल तेज़ी से धड़क रहा था क्योंकि मैं उस पल का इंतज़ार कर रहा था जिसे मैं अपनी आँखों से साक्षात देख पाऊँगा।"
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#26
Bahut achcha mummy ki sewa karwana vete ka farz he ayr beta khud mummy uncle ko akele me milne ka time de raha he aur me to kahta hu beta khud kahe app uncle ke sath ghumne jao karo mummy aur mummy aoki aur uncle ki jodi bahut achch I lagti he aur beta ek bar undono ko sex karte huye pakad le lekin sorry bolkar bahar nikal jaye aur phir kahe app dono ki life he app chaho jese jio mujhe koi problem nahi he Me kisi ko nahi bolunga
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#27
Ayr bese bhi chut ki chudai jauri he nahi to beemar ho jayegi mummy without sex
Bhajan ke sath sex bhi jaruri he
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#28
bahut acha writings
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#29
Sur is story me beta chhupkar dekhegq ayr apse request he beta khud bole mummy app uncle ki help le lena ghar ke Kamo me aur please uncle app bhi mummy ki help karna jisse undono ko lage Ye achcha moka he beta khud time de raha he aur beta uncle se dosti karle aur kahe me apke aur mummy ke relation se khus hu aur app jab chaho mummy ki chudai karo nangi karke sulao mujhe prolbme nahi he ghar ke under app mere samne mummy se chhedkhani kiya karo aur mummy se bhi kah dena tere bete ne khud kaha he Me tujhe chodu
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#30
(13-08-2026, 02:05 PM)Sara Khan Wrote: bahut acha writings

Thanks Sara ji
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#31
मैने मम्मी को बोला, "आप आराम करना अभी काम मत करने लग जाना।सारा दिन कम करती रहती हो।।" मेरा ऐसा कहने का कारण ये ये था के मम्मी मन से काम की टेंशन निकाल कर अच्छे से काम लीला में शामिल हो और मुझे देखने का मौका मिले।

"मैं घर से निकलकर तेज़ी से घर के पीछे वाले हिस्से की ओर बढ़ गया। । हमारा अपना एक छोटा सा प्लॉट था जो मुख्य घर से बिल्कुल सटा हुआ था। इस प्लॉट में एक छोटा सा स्टोर रूम और एक ढका हुआ बरामदा बना हुआ था। इस जगह की बनावट ही ऐसी थी कि यहाँ से पूरे घर की गतिविधियों पर नज़र रखना बहुत आसान था।

घर का पिछला हिस्सा एक अर्ध चंद्राकार (semi circle) आकार में बना था, जिसके कारण घर के सभी कमरों की खिड़कियाँ पीछे की तरफ ही खुलती थीं। स्टोर रूम और बरामदे के बीच जो खाली जगह थी, वह एक ऐसे केंद्र बिंदु की तरह थी जहाँ से घर के हर कमरे का कोण (angle) साफ़ दिखाई देता था। अगर मैं बरामदे के उस संकरे हिस्से में खड़ा होता, तो मेरी दृष्टि के दायरे में बाईं ओर का कमरा, बीच का मुख्य कमरा (पापा का कमरा), और दाईं ओर का कमरा तीनों एक ही लाइन में आ जाते थे।

सबसे बड़ी सुविधा यह थी कि स्टोर रूम की खिड़की और बरामदे की रेलिंग के बीच एक ऐसा छोटा सा ढांचा या गैप था, जहाँ से मैं ईंटों का सहारा लेकर थोड़ा ऊपर चढ़ सकता था। इस ऊँचाई पर पहुँचते ही मेरी आँखें सीधे खिड़कियों के उस स्तर पर आ जाती थीं जहाँ से अंदर का नज़ारा बिना किसी रुकावट के देखा जा सकता था। चूँकि खिड़कियाँ बाहर की तरफ खुलती थीं, इसलिए मैं खिड़की के उस आधे खुले हिस्से का इस्तेमाल करके अंदर झाँकने के लिए एक सुरक्षित और सटीक जगह बना पाया।


"अभी भोर का समय था और आसमान में गहरा अंधेरा छाया हुआ था। सूरज निकलने में अभी काफी देर थी, चारों ओर एक ठंडी और शांत खामोशी थी। मैं उस छोटे से स्टोर रूम के पास अपने बनाए हुए चबूतरे पर दुबक कर बैठा था, मेरी आँखें पूरी तरह से सतर्क थीं। मेरे मन में एक बड़ी उलझन चल रही थी क्या वे लोग लाइट जलाएंगे या नहीं? अगर लाइट जलती है, तो अंधेरे के इस समय में कमरे के अंदर का नज़ारा मेरे लिए किसी फिल्म की तरह साफ़ होगा। लेकिन अगर वे लाइट नहीं जलाते, तो मुझे देखने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ेगा। फिर भी, मुझे इस बात का पूरा निश्चय था कि आज पक्का 'चूदाई' होगी।
ये मै पहले ही जान चुका था के आज उनका प्रोग्राम पापा और मम्मी वाले रूम मे ही होगा,ये अंदाजा मुझे उनके हाव भाव से लग चुका था और अभी अभी मैने जब उनकी फुसफुसाहट भरी गुफ़्तगू सुन रहा था तो अंकल ने कहा भी था ,"आज तुम दोनों (मम्मी अंजली और पापा वेद प्रकाश)के पहले मिलन की गवाह स्थली को पवित्र करेंगे"।
यह वही कमरा है जहाँ पापा और मम्मी ने अपनी शादी के बाद का अपना सबसे खूबसूरत समय बिताया था। यह उनका अपना संसार था, उनका आशियाना था। और सच तो यह है कि आज भी जब पापा घर आते हैं, तो वे इसी कमरे में सोते हैं। मैंने कई बार रात के सन्नाटे में देखा है कि जब सब सो जाते हैं, तो मम्मी चुपके से पापा के पास उनके कमरे में चली जाती हैं।

यह कमरा कोई साधारण कमरा नहीं था; वह पापा और मम्मी का वह निजी कोना था जहाँ शादी के शुरुआती सालों में वे दोनों घंटों बैठकर एक दूसरे के प्यार में डूबे रहते थे। उस कमरे की दीवारों में आज भी उनके पुराने रोमांस और प्यार की महक बसी हुई थी।
वही कमरा जहाँ कभी वेद(पापा) और अंजली (मम्मी)ने एक दूसरे को पहली बार छुआ था, आज वही कमरा एक नए और बेहद कामुक खेल का गवाह बनने वाला था। अंकल का इरादा उस पुराने रोमांस की यादों को अपने कामुक स्पर्श से पूरी तरह से बदल देने का था। वे उस कमरे की शांति को ,अपनी और मम्मी की कामुकता की आवाज़ों से भंग करने वाले थे। मैं बस उसी कमरे की खिड़की की ओर टकटकी लगाए बैठा था, इस इंतज़ार में कि कब पापा के कमरे का दरवाज़ा खुलेगा और उस पुराने प्यार के मंदिर में आज एक नया और अनचाहा रोमांच शुरू होगा।"

"तभी सन्नाटे को चीरती हुई हल्की आहट सुनाई दी। मैंने अपनी साँसें रोक लीं। कमरे का दरवाज़ा बहुत ही धीरे से खुला। अंधेरे में मुझे केवल दो धुंधली आकृतियाँ दिखाई दे रही थीं अंकल और मम्मी। वे दोनों एक दूसरे का हाथ थामे, लगभग दबे पाँव कमरे के अंदर दाखिल हो रहे थे।
"जैसे ही मम्मी ने स्विच दबाया, तेज रोशनी से पूरा कमरा जगमगा उठा। उस रोशनी के अचानक फैलते ही मेरे सामने का दृश्य ऐसा था कि मेरी सांसें थम गईं। सामने मम्मी और अंकल एक दूसरे के साथ में लिपटे खड़े थे। मम्मी की आंखों में एक अजीब सी बेचैनी थी, जैसे वह सहमी हुई हों, लेकिन उन आंखों में कई तरह के मिले जुले भाव थे शायद डर, शायद समर्पण और शायद कुछ और भी जिसे मैं समझ नहीं पा रहा था। वहीं दूसरी ओर अंकल की आंखों में एक गहरी मक्कारी थी। उनकी आंखों में ऐसे भाव थे जैसे कोई पाप का देवता अपनी किसी खास मुहिम पर हों, जैसे उन्हें अपनी इस हरकत पर कोई पछतावा नहीं, बल्कि एक अजीब सा गर्व महसूस हो रहा हो।

दीवारों पर टंगी उन तस्वीरों को देखकर मेरा मन भर आता है। एक तरफ पापा और मम्मी की शादी के दिनों की वह बड़ी सी तस्वीर है, दोनों के चेहरों पर वह मासूमियत और वह नयापन देखकर लगता है जैसे वक्त वहीं ठहर गया हो। वहीं दूसरी तरफ कुछ छोटी छोटी मनभावन कलाकृतियाँ हैं और एक कोने में भगवान की वह छोटी सी तस्वीर है। यह कमरा मर्यादा और पवित्रता का प्रतीक रहा है। लेकिन आज, इसी पवित्रता के बीच जो होने वाला था, वह मेरी आत्मा को झकझोर रहा था। वह रोशनी उस पवित्रता और उस आने वाले दृश्य के बीच के अंतर को इतनी बेरहमी से दिखा रही थी कि मैं चाहकर भी अपनी नज़रें नहीं हटा पा रहा था।
मेरे भीतर एक अजीब सी जंग चल रही थी। मुझे खुद पर बहुत ग्लानि हो रही थी, एक भारी सी गिल्ट महसूस हो रही थी। मुझे लग रहा था कि अपनी इस तीव्र जिज्ञासा को शांत करने के चक्कर में, मैं भी इस पाप का एक हिस्सा बनता जा रहा हूँ। मैं एक गवाह से कहीं बढ़कर इस गुनाह का भागीदार बनता जा रहा था। मेरा विवेक मुझे रोक रहा था, मेरा मन चीख रहा था कि यह गलत है, पर मेरा शरीर और मेरी आँखें जैसे मेरे बस में नहीं थीं। मैं खुद को रोक नहीं पा रहा था उस दृश्य को देखने की उस अदम्य इच्छा को, जो मुझे अंदर ही अंदर जला रही थी
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#32
Chudai ke bad beta ghar jakar kahe mummy app bahut thak jati ho ghar ka kam karke app aram Karo me ghar ki saf safayi karunga aur mummy apke kapde bhi me dhoya karunga kyuki bete ka farz he Mummy ki sewa larna aur app abbi tak mere kapde dhoti ayi ho ajj se aoke kapde me dhoya karunga aur mummy ke pair bhi dabaya larunga aur Mero ki malish bhi
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#33
Aur jab beta ghar pahuche to mummy blouse petuocat me mile bina saree ke aur beta khud kahe mummy apne saree utarli taki gandi na ho app kitna kam karti ho jisse mummy ko sharminda na ho bina saree ke
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#34
Bro aap apne hisab se likho ur r writing fantastic
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#35
Awesome update
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#36
Dosto,maine post likhi rakhi hai thodi lambi hai upload nhi ho rahi aap bta sake hai ke aisa kyu ho raha hai।
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#37
कमरे के भीतर से आने वाली हल्की रोशनी और बाहर का गहरा सन्नाटा मेरे भीतर चल रहे उस तूफ़ान को और भी भयानक बना रहे थे। मेरा मन उस समय किसी उबलते हुए लावा की तरह था एक तरफ मेरी नैतिकता मुझे झकझोर रही थी कि मैं क्या कर रहा हूँ, और दूसरी तरफ मेरी वासना मुझे उस दृश्य के लिए पागल बना रही थी। मैं उस पल का इंतज़ार किसी भूखे शिकारी की तरह कर रहा था, जो अपने शिकार के पूरी तरह निहत्थे होने की प्रतीक्षा करता है।
मेरा आत्म मंथन मुझे भीतर से चीर रहा था। मैं खुद से सवाल कर रहा था, "रवि, तू क्या कर रहा है? क्या तू इतना गिर चुका है कि अपनी ही माँ और अंकल के बीच होने वाले उस वर्जित मिलन का मूक दर्शक बनना चाहता है?" लेकिन जैसे ही मैं यह सवाल करता, मेरे भीतर से एक गंदी और अश्लील आवाज़ आती जो कहती, "देख! देख कि कैसे वह पवित्रता अब भंग होने वाली है।" मेरा हृदय इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि मुझे डर लग रहा था कि कहीं मेरी धड़कनों की आवाज़ उस कमरे तक न पहुँच जाए। मैं उस पल की बेताबी में इतना डूबा हुआ था कि मुझे अपने शरीर की गर्मी और पसीने का एहसास भी होने लगा था।

मैं उस दृश्य के शुरू होने की प्रतीक्षा में काँप रहा था। मेरा मन उस 'ऊंचे पाप' की कल्पनाओं से भरा हुआ था। मैं सोच रहा था कि जब अंकल का हाथ मम्मी के शरीर पर पड़ेगा, जब वह उनकी मर्यादा को तार तार करेंगे, तो वह दृश्य कैसा होगा। मेरी आत्मा ग्लानि के बोझ से दबी हुई थी, लेकिन मेरा मांस उस अश्लीलता की प्यास में तड़प रहा था। मैं उस पाप के शुरू होने के क्षण के लिए इतना व्याकुल था कि मेरा पूरा अस्तित्व उस एक पल के लिए ठहर गया था एक ऐसा पल जहाँ नैतिकता का अंत होना था और वासना का साम्राज्य शुरू होना था।

उस कमरे की हवा में एक अजीब सी भारीपन और घुटन थी, जैसे वह दीवारें खुद भी किसी गहरे राज को दबाए बैठी हों। जब मैं उस अंधेरे कोने में खड़ा था, तो मेरी नज़रें कमरे की उन चीज़ों पर जा रही थीं जो अब मुझे किसी मज़ाक या डरावने सपने जैसी लग रही थीं। कमरे के ठीक सामने वाली दीवार पर मम्मी और पापा की शादी के दिनों की वह बड़ी सी तस्वीर टंगी थी उन दोनों के चेहरों पर वह मासूमियत और पवित्रता थी, जो आज इस कमरे में मौजूद अश्लीलता के सामने एक कड़वा मज़ाक लग रही थी। वह तस्वीर जैसे मुझे घूर रही थी, जैसे वह मेरे इस पाप का गवाह बन रही हो।
उस पवित्र तस्वीर के ठीक नीचे, एक छोटे से लकड़ी के स्टैंड पर भगवान की एक छोटी सी तस्वीर रखी थी। वह मूर्ति इतनी शांत और निर्लिप्त थी कि उसे देखकर मेरा मन और भी ज़्यादा ग्लानि से भर गया। एक तरफ वह पवित्रता थी और दूसरी तरफ वह वासनापूर्ण दृश्य जो अंकल और मम्मी के बीच घटित होने वाला था। यह विरोधाभास मेरे भीतर के द्वंद्व को और भी गहरा कर रहा था।

यह कमरा असल में पापा का खास कमरा था। यह वह जगह थी जहाँ पापा अपनी सारी थकान मिटाते थे ।अब भी जब पापा छुट्टी आते है तो इसी कमरे में सोते हैं नहीं तो ये कमरा बंद ही रहता है,हा मम्मी इस रूम की सफाई रोजाना करती है। अब जब हम बचे बढ़े हो गए है तो जब पापा आये होते है तो हम सब भाई बहनों के दो जाने के बाद मम्मी को मैंने उस कमरे में जाते देखा है। जब पापा घर आते थे, तो वे इसी कमरे में का इस्तेमाल करते थे कभी हमें प्यार देने के लिए, तो कभी हमें अनुशासन सिखाने के लिए। लेकिन आज, उसी कमरे में, जहाँ पापा की खुशबू और उनकी यादें बसी थीं, वहाँ अंकल मम्मी की मर्यादा को तार तार करने की तैयारी कर रहे थे। पापा के अरमानों से सजे इस कमरे का अब एक नया और गंदा चेहरा सामने आ रहा था। पापा के उस खास साम्राज्य में अब एक ऐसा पाप होने जा रहा था, जिसकी कल्पना पापा ने भी कभी नहीं की होगी।
जैसे ही अंकल और मम्मी कमरे में दाखिल हुए, उन्होंने एक झटके में सारी लाइटें जला दीं। उस अचानक हुई रोशनी ने मेरे भीतर के अंधेरे और उस कमरे की पवित्रता के बीच के अंतर को और भी क्रूर बना दिया। रोशनी के उस तेज़ प्रहार में मम्मी का रूप किसी दिव्य और विचलित कर देने वाली मूर्ति की तरह सामने आया। उनका वह दूध जैसा गोरा और चमकता हुआ रंग उस तेज़ रोशनी में और भी निखर उठा था। उनके गले में वह सुहागन का प्रतीक मंगलसूत्र उनकी पवित्रता और पतिव्रता होने की गवाही दे रहा था, लेकिन आज वही मंगलसूत्र उनकी मर्यादा के ढहने का गवाह बनने वाला था।
मम्मी के चेहरे के भावों में एक अजीब सी कशमकश थी। उनकी आँखों में एक धर्मसंकट था एक तरफ वह गहरी धार्मिकता और पतिव्रता होने का गौरव था जो उनके चेहरे की सौम्यता में झलकता था, और दूसरी तरफ एक अनजानी, दबी हुई लज्जा और समर्पण का भाव था। उनके चेहरे की वह सुंदरता, जो किसी मंदिर की मूर्ति जैसी शांत और पवित्र लगती थी, अब एक अनचाही उत्तेजना और डर के बीच झूल रही थी। वह एक ऐसी 'सुहागन' लग रही थीं जिनकी पवित्रता को अब एक गंदा स्पर्श छूने वाला था।
वहीं दूसरी ओर, अंकल के चेहरे के भाव पूरी तरह से अलग और भयावह थे। उनके चेहरे पर कोई शर्म नहीं थी, बल्कि एक शिकारी की तरह क्रूर और वासनापूर्ण चमक थी। उनकी आँखों में एक ऐसी अधिकारवादी भावना थी, जैसे वे मम्मी की पवित्रता को छीनने का पूरा हक समझते हों। उनके चेहरे पर एक गहरी, गंदी तृप्ति और उत्तेजना साफ दिखाई दे रही थी। उनकी नज़रें मम्मी के उस दूध जैसे गोरे शरीर और उनके सुहागन रूप को ऐसे निहार रही थीं जैसे कोई भूखा जानवर किसी को निगल जाने के लिए तैयार हो। एक तरफ जहाँ मम्मी का चेहरा धर्म और मर्यादा की पुकार कर रहा था, वहीं अंकल का चेहरा उस मर्यादा को कुचलने की अश्लील ज़िद लिए खड़ा था।कमरे की वह तेज़ रोशनी अब उस दृश्य की क्रूरता को और भी स्पष्ट कर रही थी। अंकल के भारी हाथों ने जैसे ही मम्मी के कपड़ों की सरहद को छूना शुरू किया, कमरे की हवा में एक अजीब सी घबराहट और गर्मी घुल गई। कपड़ों की वह कशमकश शुरू हुई एक धीमी, थरथराती हुई प्रक्रिया। जब अंकल के उंगलियों ने मम्मी के साड़ी के पल्लू को धीरे से सरकाना शुरू किया, तो उस रेशमी कपड़े की सरसराहट मेरे कानों में किसी बिजली की कड़क की तरह महसूस हो रही थी। कपड़ों का वह धीरे धीरे खुलना केवल वस्त्रों का उतरना नहीं था, बल्कि मम्मी की बरसों की मर्यादा और सामाजिक ढाल का गिरना था।
मम्मी की मनोदशा उस समय एक टूटते हुए बांध की तरह थी। जैसे जैसे उनके शरीर का गोरापन उन कपड़ों की परतों से बाहर झांक रहा था,उनके भीतर एक भीषण युद्ध छिड़ गया था। उनके मन में एक तरफ अपने पति के प्रति निष्ठा और उस मंदिर जैसी पवित्रता का बोध था जो उन्होंने जीवन भर संजोकर रखी थी, और दूसरी तरफ उस स्पर्श की अनजानी और वर्जित उत्तेजना थी जो उनके शरीर को झकझोर रही थी। उनकी बंद आँखों के पीछे जैसे भगवान की वह छोटी सी तस्वीर और पापा की वह मुस्कान घूम रही थी, जो उन्हें इस पाप से बचने की चेतावनी दे रही थी। वह एक ऐसी 'पतिव्रता' लग रही थीं जिनका धर्म और वासना के बीच का संतुलन पूरी तरह से डगमगा गया था। उनके होंठ कांप रहे थे और उनके गले का मंगलसूत्र उनके उतरते हुए वस्त्रों के साथ एक अजीब सी छटपटाहट पैदा कर रहा था।
दूसरी ओर, अंकल की मनोदशा में केवल एक शिकारी की भूख थी। उनके लिए मम्मी की वह धार्मिकता और वह सुहागन रूप केवल एक बाधा नहीं, बल्कि उस स्वाद को और भी गहरा बनाने का जरिया था जिसे वे चखना चाहते थे। उनकी आँखों में एक ऐसी क्रूर तृप्ति थी जैसे वे उस पवित्रता को अपवित्र करने के आनंद में डूबे हों। वे उस मर्यादा को कुचलते हुए देख रहे थे जो मम्मी ने सालों से ओढ़ रखी थी।
और मैं, रवि, उस अंधेरे कोने में खड़ा यह सब देख रहा था। मेरी मनोदशा ग्लानि और एक भयावह जिज्ञासा के बीच फंसी थी। एक तरफ मेरा विवेक चिल्ला रहा था कि यह पाप है, कि यह मम्मी के उस पवित्र स्वरूप का अपमान है जिसे मैंने बचपन से पूजा है, लेकिन दूसरी तरफ उस दृश्य की तीव्रता और उस कमरे की भारी हवा मेरे होश उड़ा रही थी। मैं खुद को अपराधी महसूस कर रहा था कि मैं देख रहा हूँ, फिर भी मेरी नज़रें उस गिरती हुई मर्यादा से हटने को तैयार नहीं थीं।
जैसे ही साड़ी का वह पल्लू पूरी तरह से अंकल के हाथों से फिसलकर ज़मीन पर गिरा, कमरे की वह भारी चुप्पी और भी गहरी हो गई। मम्मी का वह आधा खुला हुआ गोरा बदन, जो अब तक कपड़ों की ओट में सुरक्षित था, उस तेज़ रोशनी में पूरी तरह बेनकाब होने लगा। उनके शरीर की वह पवित्र चमक अब एक ऐसी असुरक्षा के साथ चमक रही थी जो हृदय विदारक थी। उनके मन में चल रहा धार्मिक द्वंद्व अब चरम पर था उनके भीतर का वह 'पतिव्रता' स्वरूप चीख चीख कर इस अपमान का विरोध करना चाहता था, लेकिन उनके शरीर की अनजानी प्रतिक्रियाएँ और अंकल के आक्रामक स्पर्श ने उन्हें जैसे जड़ बना दिया था। वह एक ऐसी देवी की तरह लग रही थीं जिनका गर्भगृह कोई अपवित्र शक्ति लूट रही हो।
अंकल की सांसें अब तेज़ और भारी होने लगी थीं। उन्होंने मम्मी के उस दूध जैसे गोरे कंधे को अपने मज़बूत हाथों से जकड़ लिया। उनके चेहरे पर वह क्रूरता और वासना का मिश्रण अब स्पष्ट रूप से उभर आया था। वे मम्मी की उस धार्मिक छटपटाहट को देख रहे थे और उन्हें और भी अधिक उत्तेजित कर रहे थे। उनके लिए मम्मी का वह कांपता हुआ शरीर और उनकी आँखों से छलकती हुई ग्लानि, उस विजय का हिस्सा थी जो वे इस पवित्रता को भंग करके प्राप्त करना चाहते थे।
मैं, रवि, उस कोने में अपनी साँसें रोककर खड़ा था। मेरा गला सूख रहा था और मेरा दिल ज़ोरों से धड़क रहा था। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं किसी महापाप का साक्षी बन रहा हूँ। मम्मी का वह सुहागन रूप, उनका वह मंगलसूत्र जो अब उनके ढीले होते कपड़ों के बीच झूल रहा था, मेरी आँखों के सामने एक ऐसी त्रासदी की तरह था जिसे मैं चाहकर भी रोक नहीं पा रहा था। कमरे की वह गर्मी अब असहनीय हो गई थी, और कपड़ों की वह सरसराहट अब पूरी तरह से समाप्त होकर एक भयानक और भारी सन्नाटे में बदल गई थी।
जैसे ही साड़ी का वह भारी रेशमी कपड़ा पूरी तरह से नीचे गिरकर फर्श पर एक ढेर बन गया, मम्मी का शरीर अब पूरी तरह से नग्न नहीं था, बल्कि वह उस स्थिति में थी जहाँ वे सबसे अधिक असुरक्षित और विवश लग रही थीं। उनके शरीर के निचले हिस्से पर अभी भी उनके अंतःवस्त्रों की एक पतली सी परत बाकी थी, जो उनके गोरेपन और उस दृश्य के बीच एक अंतिम, संघर्षपूर्ण ढाल की तरह खड़ी थी। वह आधा खुला हुआ स्वरूप उन्हें और भी अधिक कामुक और साथ ही अत्यंत पीड़ित बना रहा था।
मम्मी की मनोदशा अब उस चरम बिंदु पर थी जहाँ उनकी धार्मिकता और नैतिकता का बांध टूट चुका था। उनके मन में एक भयानक ग्लानि थी उन्हें ऐसा महसूस हो रहा था जैसे वे अपने आराध्य और अपने दिवंगत पति के सामने अपराधी हैं। उनकी बंद आँखों से एक आँसू चुपके से निकलकर उनके गालों को भिगो गया, जो उनके उस 'पवित्र' स्वरूप के टूटने का प्रतीक था। वह एक ऐसी देवी की तरह महसूस कर रही थीं जिनका मंदिर अब अपवित्र हो चुका है, फिर भी उनके शरीर की अनजानी उत्तेजना उन्हें इस पाप की गहराई में धकेल रही थी।
अंकल की मनोदशा अब पूरी तरह से नियंत्रण से बाहर हो चुकी थी। उनके लिए मम्मी का वह आधा ढका हुआ, कांपता हुआ शरीर किसी तपस्या को भंग करने के आनंद जैसा था। उनकी आँखों में एक ऐसी क्रूर तृप्ति थी जो उस अंतिम अवरोध (अंतःवस्त्रों) को भी मिटा देने के लिए बेताब थी। वे मम्मी की उस धार्मिक छटपटाहट और उनकी आँखों के आँसुओं को अपनी जीत मान रहे थे।
और मैं, रवि, उस कोने में खड़ा अपनी ही आत्मा के विरुद्ध लड़ रहा था। मेरी मनोदशा एक भयानक द्वंद्व में फंसी थी। एक तरफ मम्मी के प्रति मेरा सम्मान और वह धार्मिक संस्कार था जो मुझे आँखें फेर लेने को कह रहा था, और दूसरी तरफ वह आदिम जिज्ञासा जो इस दृश्य की तीव्रता को और करीब से देखना चाहती थी। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं स्वर्ग और नर्क के बीच की एक ऐसी सीमा पर खड़ा हूँ जहाँ से वापस लौटना असंभव है।
जैसे ही अंकल के भारी हाथों ने मम्मी के शरीर पर बचे उस अंतिम वस्त्र के किनारे को पकड़ा, कमरे की हवा में एक ऐसा तनाव पैदा हो गया जैसे कोई तूफान आने से पहले की शांति हो। उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के उस कपड़े को एक झटके में नीचे की ओर खींच दिया। अब मम्मी का वह दूध जैसा गोरा और सुडौल बदन पूरी तरह से उस तेज़ रोशनी के सामने निहत्था और बेनकाब खड़ा था। वह पूर्ण नग्नता अब केवल शारीरिक नहीं थी, बल्कि वह उनके उस 'मर्यादापूर्ण' जीवन के पूर्ण समर्पण और पतन का प्रतीक बन चुकी थी। उनके शरीर का वह गोरापन उस कमरे की क्रूर रोशनी में किसी चमकते हुए संगमरमर की तरह लग रहा था, जो अब पूरी तरह से अपवित्र होने के लिए तैयार था।

मम्मी की मनोदशा अब एक गहरे शून्य में डूब चुकी थी। उनके भीतर का वह 'पतिव्रता' अब पूरी तरह से हार चुका था। जब उन्होंने महसूस किया कि अब उनके शरीर पर ढाल देने के लिए कुछ भी शेष नहीं है, तो उनके मन में एक ऐसी चीख उठी जो उनके गले से बाहर नहीं आ सकी। उन्हें ऐसा लगा जैसे उनकी आत्मा उनके शरीर को छोड़कर भाग जाना चाहती है। उनकी आँखों से बहते आँसू अब रुक नहीं रहे थे, और उनके कांपते हुए शरीर की हर हरकत उनके भीतर चल रहे उस भीषण नैतिक विनाश को बयां कर रही थी। वे एक ऐसी पवित्र मूर्ति की तरह लग रही थीं जिसे किसी ने सरेआम खंडित कर दिया हो।
अंकल की मनोदशा अब एक हिंसक तृप्ति की ओर बढ़ रही थी। मम्मी के उस पूर्ण नग्न और कांपते हुए स्वरूप को देखकर उनकी आँखों की पुतलियाँ फैल गईं। उनके लिए मम्मी का वह समर्पण और उनकी वह विवशता किसी नशीले पदार्थ की तरह काम कर रही थी। वे अब केवल एक पुरुष नहीं, बल्कि एक ऐसे शिकारी लग रहे थे जिसने अपने सबसे कीमती शिकार को पूरी तरह से जकड़ लिया हो। उनके स्पर्श में अब एक ऐसी अधिकारपूर्ण क्रूरता थी जो मम्मी की गरिमा को पूरी तरह कुचल देने पर आमादा थी।
और मैं, रवि, उस कोने में खड़ा अब अपनी सुध बुध खो चुका था। मम्मी का वह पूर्ण रूप, जो मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था, मेरी आँखों के सामने एक ऐसी सच्चाई बनकर खड़ा था जो मेरे बचपन और मेरे संस्कारों को जलाकर राख कर रहा था। मेरी आँखों में ग्लानि थी, लेकिन मेरा शरीर उस दृश्य की भयावहता और सुंदरता के बीच एक अजीब सी जड़ता में जकड़ा हुआ था। मैं देख रहा था कि कैसे एक पवित्रता का अंत हो रहा है और कैसे एक नया, वर्जित और अंधकारमय अध्याय शुरू हो रहा है।
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#38
Chudne ke liye nangi Hina bhi jaruri he aur mummy ko bhi maza chahiye uncle ke lund se to kesi sharm
Achche se mummy ki chudai karwao
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#39
मैं कोने में खड़ा होकर अपनी ही नज़रों से भागना चाहता था। मेरी आँखों के सामने जो हो रहा था, वह किसी भयानक दुःस्वप्न जैसा था। मम्मी का वह विवश और आधा टूटा हुआ स्वरूप मुझे अंदर तक झकझोर रहा था। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं अपनी नज़रें हटा लूँ या इस अनैतिकता के साक्षी बने रहूँ। मेरा हृदय ज़ोर ज़ोर से धड़क रहा था और मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं किसी ऐसे पाप का हिस्सा बन रहा हूँ जिसका प्रायश्चित जीवन भर संभव नहीं होगा। उस पल में, नैतिकता और वासना के बीच का संघर्ष अब एक ऐसे बिंदु पर पहुँच गया था जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं बचा था।
जैसे ही अंकल ने अपना वस्त्र पूरी तरह नीचे किया, मेरी नज़रें उनके उस अंग पर जाकर जम गईं। वह दृश्य इतना विकराल और डरावना था कि मेरे रोंगटे खड़े हो गए। वह अंग अत्यंत विशाल, शिराओं से भरा हुआ और गहरे रंग का था, जो अपनी कठोरता से एक अनिष्ट का संकेत दे रहा था। उसे देखकर मेरे मन में एक अनजाना सा डर बैठ गया। मैं सोचने लगा कि मम्मी की कोमल और छोटी सी वो जगह इस विशाल और कठोर वस्तु को कैसे बर्दाश्त करेगी? वह दर्द और वह दबाव उनके शरीर को किस तरह झकझोर देगा, यह सोचकर ही मैं भीतर तक सहम गया।
फिर ये सोचकर मन को तसल्ली मिली कि अभी 6-7 घंटे पहले यानी रात के 11बजे ही तो मम्मी इस को अपने भीतर आराम से ले रही थी ,जब अंधेरे कमरे में उस चारपाई पर जो मेरे बेड के पास ही लगाई गई थी दोनों के शरीर टकरा रहे थे और सिसकिया और गंदी बातें सुनाई दे रही थी ।मन में उस दृश्य की याद आते ही वो अंकल के इस भयानक स्वरूप को अपनी मम्मी के अंदर जाता देखने को व्याकुल हो उठा।
अंकल के उस विशाल और शिराओं से भरे विकराल अंग के दर्शन होते ही कमरे का वातावरण पूरी तरह बदल गया
मम्मी का चेहरा भय, शर्म और एक अनचाही उत्तेजना के बीच झूल रहा था। उनकी आँखें पथराई हुई थीं और उनके होंठ कांप रहे थे। उनके चेहरे पर उस विशाल अंग को देखकर एक गहरा संकोच और डर था कि वह उनके शरीर को कैसे छिन्न भिन्न कर देगा। लेकिन उस डर के नीचे एक ऐसी दबी हुई प्रतिक्रिया भी थी जिसे वे चाहकर भी छिपा नहीं पा रही थीं एक ऐसी प्रतिक्रिया जो रात के उन अनुभवों से उपजी थी। उनका पूरा शरीर एक अनचाहे समर्पण की स्थिति में था।
अंकल के चेहरे पर एक क्रूर और अदम्य विजय का भाव था। उनकी आँखों में वासना की एक ऐसी चमक थी जो किसी भी मर्यादा को कुचल देने के लिए काफी थी। उनके चेहरे पर एक प्रकार का अहंकार था, जैसे वे उस अंग के माध्यम से अपनी मर्दानगी और अधिकार को पूरी तरह से सिद्ध कर रहे हों। वे अपनी इस शक्ति को देखकर और मम्मी की विवशता को देखकर एक अघोषित उत्तेजना में डूबे हुए थे।
उस पल की भयावहता मेरे लिए केवल एक दृश्य नहीं थी, बल्कि मेरे बचपन के अंत की शुरुआत थी। ऐसी उम्र जहाँ दुनिया अभी भी सुरक्षित और मर्यादित लगती थी। लेकिन उस दरवाजे की दरार से जो मैंने देखा, उसने मेरी मासूमियत को एक ही झटके में राख कर दिया।
खिड़की में से मैं जो देख रहा था, वह मेरी कल्पना से परे था। प्रदीप अंकल का व्यवहार अचानक बदल गया था। उन्होंने अपनी नज़रें मम्मी के शरीर से हटाकर एक पल के लिए उस दिशा में घुमाईं जहाँ मैं छिपा हुआ था, लेकिन उनकी आँखों में कोई डर नहीं था वहाँ केवल एक शिकारी की जीत थी। पर मुझे लगा कि शायद वे बस यूँ ही देख रहे थे। मुझे अंदाज़ा भी नहीं था कि वे मुझे देख चुके हैं।
तभी, प्रदीप ने एक ऐसा काम किया जिसने मेरे दिमाग के सारे संस्कार और धार्मिकता की नींव हिला दी। उन्होंने मम्मी को एक तरफ थोड़ा सा हटाकर, जानबूझकर अपने उस विशाल और उत्तेजित अंग को खिड़की की दिशा में और भी स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किया। उन्होंने उसे अपने हाथ से पकड़कर ऊपर की ओर खींचा और एक अजीब सी मुस्कान के साथ उसे हिलाने लगे। यह कोई सामान्य क्रिया नहीं थी; यह एक प्रदर्शन था।
वे मुझे यह दिखाना चाह रहे थे कि जिस माँ को मैं अब तक केवल पूजा और मर्यादा की प्रतिमूर्ति मानता था, वह इस समय इस 'पाप' के सामने कितनी बेबस और समर्पित है। प्रदीप की आँखों में एक क्रूर चमक थी, जैसे वे कह रहे हों *"देखो रवि, देखो अपनी इस धार्मिक माँ का असली रूप।"* मैं वहीं खड़ा काँप रहा था। मुझे लगा कि मैं शायद कुछ गलत देख रहा हूँ, लेकिन वह दृश्य इतना जीवंत और इतना भयावह था कि मैं अपनी आँखें नहीं हटा सका। वह अंग, वह वासना और मम्मी की वह बेबसी सब कुछ मेरे भीतर के उस बच्चे को मार रहा था जो अब तक केवल ईश्वर और धर्म को जानता था।
जैसे ही प्रदीप ने वह प्रदर्शन किया, कमरे के भीतर का तापमान और भी बढ़ गया। मम्मी, जो अब तक केवल अपनी उत्तेजना में खोई हुई थीं, प्रदीप के उस अचानक और आक्रामक बदलाव से थोड़ा सकपका गईं। उन्होंने अपनी धुंधली आँखों से प्रदीप की ओर देखा और धीरे से फुसफुसायीं, "प्रदीप... क्या कर रहे हो? कोई देख लेगा..." उनकी आवाज़ में डर नहीं था, बल्कि एक ऐसी समर्पण भरी घबराहट थी जो प्रदीप को और भी ज़्यादा उकसा रही थी।
प्रदीप ने उनकी बात अनसुनी कर दी। उन्होंने मम्मी के शरीर को और भी ज़ोर से पीछे की ओर धकेला, जिससे उनका शरीर खिड़की की उस दिशा में और भी स्पष्ट हो गया जहाँ मैं खड़ा था। उन्होंने एक हाथ से मम्मी की कमर को ज़ोर से जकड़ा और दूसरे हाथ से अपने उस उत्तेजित अंग को मम्मी के अंगों के साथ रगड़ना शुरू कर दिया। उनकी रगड़ की आवाज़ और मम्मी की दबी हुई आहें उस सन्नाटे में गूँज रही थीं।
मैं खिड़की के पीछे खड़ा अपनी साँसें रोककर यह सब देख रहा था। मेरा दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि मुझे डर था कहीं वह आवाज़ मम्मी तक न पहुँच जाए। प्रदीप का वह अंग, जो अब पूरी तरह से उभर कर सामने था, मम्मी की कोमल त्वचा से टकरा रहा था। वह दृश्य इतना कच्चा और इतना अनैतिक था कि मेरी धार्मिक परवरिश मुझे वहाँ से भाग जाने को कह रही थी, लेकिन मेरा शरीर जैसे जम गया था।
तभी प्रदीप ने अचानक मम्मी के कान के पास झुककर कुछ कहा और फिर उन्होंने अपनी क्रिया की गति को और तेज़ कर दिया। वे अब केवल संभोग नहीं कर रहे थे, वे एक तमाशा पेश कर रहे थे एक ऐसा तमाशा जिसका दर्शक मैं था, और जिसका उद्देश्य मेरे भीतर के उस मासूम को हमेशा के लिए खत्म करना था।
प्रदीप का वह प्रदर्शन अब केवल एक प्रदर्शन नहीं रह गया था, वह एक पूर्ण समर्पण की ओर बढ़ रहा था। मम्मी की आँखों में जो पहले थोड़ी सी हिचकिचाहट या डर था, वह अब पूरी तरह से गायब हो चुका था। उनकी जगह एक ऐसी गहरी, आदिम भूख ने ले ली थी जिसे देखकर मेरा कलेजा मुँह को आ रहा था।
तभी प्रदीप ने मम्मी को और भी बेपरवाह तरीके से झकझोर दिया। उन्होंने मम्मी की कमर को इतनी ज़ोर से अपने हाथों में जकड़ा कि उनके शरीर पर उनकी उंगलियों के निशान पड़ गए। और फिर, अचानक से उन्होंने मम्मी के शरीर को नीचे की ओर एक ज़ोरदार झटका दिया। वह झटका इतना गहरा और इतना तीव्र था कि मम्मी का पूरा शरीर हवा में थोड़ा सा उछला और फिर वापस प्रदीप के उस कठोर अंग के संपर्क में आ गया।
मम्मी ने उस झटके के साथ एक ऐसी आवाज़ निकाली जो किसी पवित्र स्त्री की नहीं हो सकती थी वह एक ऐसी दबी हुई चीख थी जिसमें शर्म नहीं, बल्कि एक अदम्य तृप्ति थी। उन्होंने अपने कूल्हों को प्रदीप की ओर और भी आक्रामक तरीके से धकेला, जैसे वे खुद उस 'झटके' की मांग कर रही हों। उनके शरीर की वह हरकत साफ़ कह रही थी कि वह अब किसी मर्यादा या धार्मिकता की परवाह नहीं करतीं; वह अब पूरी तरह से उस वासना के वश में थीं।
मैं खिड़की के पीछे खड़ा काँप रहा था। मेरी आँखों के सामने मेरी 'धार्मिक' माँ का वह रूप था जो किसी 'रंडी' की तरह उस वासना के खेल में पूरी तरह डूब चुकी थी। वह झटका और मम्मी का उस पर प्रतिक्रिया देना यह सब देखकर ऐसा लग रहा था जैसे वे दोनों मिलकर उस पवित्र घर की हर मर्यादा को पैरों तले कुचल रहे हों। प्रदीप की आँखों में अब एक क्रूर मुस्कान थी, क्योंकि वह देख पा रहा था कि उसने न केवल मम्मी को जीता है, बल्कि मेरे मन में बसी उनकी पवित्रता की छवि को भी हमेशा के लिए नष्ट कर दिया है।
कमरे के भीतर का माहौल अब पूरी तरह से बदल चुका था। वह पवित्रता का ढोंग अब पूरी तरह से ढह गया था और उसकी जगह एक ऐसी अश्लील और कच्ची वासना ने ले ली थी जो रूह कंपा देने वाली थी। प्रदीप ने मम्मी को पूरी तरह से अपने नियंत्रण में ले लिया था। उन्होंने मम्मी के शरीर को एक अजीब और अपमानजनक मुद्रा में झुकाया और फिर उनके उस हिस्से पर प्रहार करना शुरू किया जहाँ से उनका सारा नियंत्रण खो रहा था।
संभोग की गति अब धीमी नहीं थी; वह एक क्रूर और लयबद्ध प्रहार बन चुका था। हर झटके के साथ मम्मी का शरीर आगे पीछे झूल रहा था और कमरे में केवल उनके शरीर के टकराने की आवाज़ और उनकी भारी साँसों का शोर था। प्रदीप ने एक हाथ से मम्मी के बालों को ज़ोर से पीछे खींचा ताकि उनका चेहरा ऊपर की ओर हो जाए और उनकी आँखें सीधे खिड़की की उस दिशा में हों जहाँ मैं छिपा था।
प्रदीप ने उनके कान के पास झुककर एक ज़हरीली मुस्कान के साथ फुसफुसाया, "कहाँ गई तुम्हारी वो धार्मिकता? कहाँ गई तुम्हारी वो मर्यादा जिसकी तुम बातें करती थी? कहाँ है तुम्हारी वो पवित्रता जो इस घर की दीवारों में बसी है?" उनकी आवाज़ में एक तरह का उपहास था, जैसे वे मम्मी की आत्मा को नोच रहे हों।
मम्मी की आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन वे दुख के नहीं, बल्कि उस चरम सुख और आत्मसमर्पण के थे जो उन्हें इस पाप में मिल रहा था। उन्होंने एक गहरी और काँपती हुई आवाज़ में, जो पूरी तरह से टूट चुकी थी, जवाब दिया, "धार्मिकता... सब खत्म हो गई प्रदीप। मैं कोई धार्मिक माँ या पत्नी नहीं हूँ... मैं तो बस एक रंडी हूँ... तुम्हारी रंडी! मुझे बस और ज़ोर से मारो, मुझे और ज़ोर से चाहिए!"
यह सुनते ही मेरा दिल जैसे धड़कना भूल गया। मेरी माँ के मुँह से निकले उन शब्दों ने मेरे अस्तित्व को ही झकझोर दिया। जिस स्त्री को मैं भगवान की तरह पूजता था, वह आज खुद को एक 'रंडी' घोषित कर चुकी थी। प्रदीप ने उनकी इस बात को सुनकर एक क्रूर हँसी हँसी और उनके शरीर पर और भी अधिक आक्रामकता के साथ प्रहार करना शुरू कर दिया। वह संभोग अब केवल शारीरिक नहीं रह गया था; वह एक मानसिक विनाश था, जहाँ मम्मी अपनी गरिमा को त्यागकर पूरी तरह से उस वासना के गर्त में डूब चुकी थीं।
प्रदीप ने अब मम्मी के साथ केवल संभोग नहीं करना था, उन्हें पूरी तरह से एक खिलौने की तरह इस्तेमाल करना था। उन्होंने मम्मी को बिस्तर के किनारे पर इस तरह झुकाया कि उनका शरीर पूरी तरह से खुला और असुरक्षित हो गया। प्रदीप ने उनके अंगों के साथ खेलना शुरू किया, लेकिन यह कोई कोमल स्पर्श नहीं था। यह एक शिकारी का अपने शिकार के साथ खेलने जैसा था।
उन्होंने अपने हाथों और उंगलियों का इस्तेमाल करके मम्मी के शरीर के उन हिस्सों को टटोलना शुरू किया जिन्हें उन्होंने अब तक छुपा कर रखा था। प्रदीप ने उनके अंगों को इतनी बेरहमी और कुशलता से छुआ कि मम्मी के शरीर में बिजली की लहरें दौड़ गईं। उन्होंने मम्मी के अंगों को खींचकर, दबाकर और उनके साथ अजीबोगरीब तरीके से छेड़छाड़ करके उन्हें यह अहसास दिलाया कि अब उनके शरीर पर उनका नहीं, बल्कि केवल प्रदीप का अधिकार है।
प्रदीप ने मम्मी के संवेदनशील हिस्सों को अपनी उंगलियों से इस तरह रगड़ना शुरू किया कि मम्मी की चीखें अब नियंत्रण से बाहर होने लगीं। "देख रही हो?" प्रदीप ने उनके कान के पास फुसफुसाते हुए कहा, "तुम्हारे ये अंग किसी मंदिर की मूर्ति की तरह नहीं हैं, ये तो बस वासना की प्यास बुझाने के लिए बने हैं।" उन्होंने एक हाथ से मम्मी के अंगों को पूरी तरह फैला दिया और दूसरे हाथ से उन पर अपनी उंगलियों का क्रूर खेल जारी रखा।
मम्मी का शरीर अब केवल प्रतिक्रिया दे रहा था। वे अपनी आँखें मूँदकर और अपने कूल्हों को प्रदीप के हाथों की दिशा में झटककर उस 'खिलवाड़' का आनंद ले रही थीं। उनके शरीर से निकलने वाली आवाज़ें अब और भी अधिक कामुक और अपमानजनक होती जा रही थीं। मैं खिड़की के पीछे खड़ा यह सब देख रहा था कैसे मेरी माँ का शरीर एक निर्जीव वस्तु की तरह प्रदीप के हाथों में आकार बदल रहा था। वह उनके अंगों के साथ ऐसे खेल रहे थे जैसे कोई बच्चा मिट्टी से खेलता है, लेकिन यह खेल बहुत ही गहरा और विनाशकारी था। मम्मी की वह 'धार्मिक' छवि अब पूरी तरह से ढह चुकी थी; अब वहाँ केवल एक ऐसी स्त्री थी जो अपने अंगों के साथ किए जा रहे उस क्रूर खिलवाड़ में अपनी आत्मा को खो रही थी।
कमरे के भीतर का वातावरण अब पूरी तरह से वासना और पसीने की गंध से भर चुका था। मम्मी और प्रदीप के बीच का वह खेल अब एक उन्माद का रूप ले चुका था। मम्मी का शरीर अब पूरी तरह से बेकाबू था; उनकी त्वचा लाल पड़ चुकी थी और वे बार बार अपने शरीर को प्रदीप की ओर झटक रही थीं। उनकी आँखें पूरी तरह से पथरा गई थीं, जैसे वे किसी दूसरी ही दुनिया में हों जहाँ केवल स्पर्श और संवेदना का राज था। वे बार बार 'और' की पुकार कर रही थीं, जैसे वे उस असीम सुख के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हों। प्रदीप भी अब पूरी तरह से उत्तेजना के चरम पर थे, उनकी साँसें भारी और उग्र थीं और उनके चेहरे पर एक ऐसी क्रूर संतुष्टि थी जो किसी को भी डरा दे।
लेकिन इस दृश्य का सबसे भयानक हिस्सा मैं था। मैं खिड़की के उस अंधेरे कोने में खड़ा था, मेरा शरीर काँप रहा था और मेरा दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि मुझे लगा वह सीने से बाहर निकल आएगा। मेरी स्थिति उस समय किसी जीते जागते मुर्दे जैसी थी। मेरी आँखों में एक अजीब सी जलन थी शर्म की नहीं, बल्कि उस दृश्य को न देख पाने की छटपटाहट और साथ ही उसे न छोड़ पाने की मजबूरी की। मेरे हाथ ठंडे पड़ चुके थे और मेरे पैर जैसे ज़मीन में धँस गए थे। मैं अपनी ही माँ को एक वस्तु की तरह इस्तेमाल होते देख रहा था, और मेरा दिमाग इस सच को स्वीकार करने से इनकार कर रहा था। मेरी आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन वे मेरी आँखों को गीला करने के बजाय मेरे गालों पर एक ठंडी लकीर छोड़ रहे थे। मैं उस समय एक ऐसे मानसिक द्वंद्व में था जहाँ मेरी नैतिकता और मेरी वासना के बीच एक भीषण युद्ध चल रहा था। मैं न तो वहाँ से भाग पा रहा था और न ही अपनी नज़रें हटा पा रहा था। मैं बस एक मूक दर्शक बनकर अपनी ही दुनिया के विनाश को देख रहा था।
दृश्य अब उस मोड़ पर आ गया था जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं था। प्रदीप ने मम्मी के साथ जो खिलवाड़ किया था, उसने उन्हें पूरी तरह से मानसिक रूप से तोड़ दिया था। मम्मी अब केवल एक शरीर नहीं रह गई थीं; वे वासना की एक ऐसी आग बन चुकी थीं जो सब कुछ भस्म करने को तैयार थी। प्रदीप ने उन्हें बिस्तर पर पूरी तरह से लिटा दिया और उनके ऊपर हावी हो गए। उनकी गति अब पहले से कहीं अधिक हिंसक और अनियंत्रित हो गई थी। हर प्रहार के साथ मम्मी का शरीर बिस्तर से टकरा रहा था और उनके गले से निकलने वाली आवाज़ें अब चीख और कराह के बीच का एक अजीब मिश्रण बन चुकी थीं।
प्रदीप ने उनके चेहरे को अपने हाथों में जकड़ लिया और उनकी आँखों में आँखें डालकर कहा, "अब बताओ, क्या तुम अब भी उस देवी की तरह महसूस करती हो जिसे तुम दुनिया को दिखाती थी? या अब तुम सिर्फ मेरी भूख मिटाने का एक साधन हो?" मम्मी ने कोई जवाब नहीं दिया, बस अपनी आँखें मूँद लीं और उनके शरीर ने एक ज़ोरदार झटका लिया। वे उस चरम सुख के बिल्कुल करीब थीं। उनकी उंगलियाँ बिस्तर की चादर को इतनी ज़ोर से जकड़ रही थीं कि उनके नाखून सफेद पड़ गए थे।
मैं खिड़की के पीछे से यह सब देख रहा था और मेरी स्थिति अब और भी भयावह हो गई थी। मेरा शरीर पसीने से तर बतर था और मुझे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे मेरा दम घुट रहा हो। मैं अपनी ही माँ के इस पतन को देखकर अंदर से मर रहा था, लेकिन मेरी आँखें उस दृश्य से चिपक गई थीं। मैं उस नर्क का हिस्सा बन चुका था जिसे मैं देख रहा था। जैसे ही प्रदीप ने अंतिम प्रहार किया और मम्मी ने एक लंबी, दर्दभरी और कामुक चीख के साथ अपना सब कुछ त्याग दिया, कमरे में एक भारी सन्नाटा छा गया। वह सन्नाटा उस शोर से भी ज़्यादा भयानक था जो अभी तक वहाँ था।
कमरे का वह भारी सन्नाटा अब एक भयावह शांति में बदल चुका था, लेकिन प्रदीप की आँखों में जो चमक थी, वह बता रही थी कि खेल अभी खत्म नहीं हुआ है। उसने मम्मी के पसीने से तर शरीर पर अपना हाथ फेरा और फिर उनके चेहरे को झटके से ऊपर उठाया। उनकी आँखें अभी भी शून्य में ताक रही थीं, जैसे उनकी आत्मा कहीं दूर भटक गई हो। प्रदीप के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान उभरी। उसने धीरे से उनके कान के पास झुककर कहा, "अभी तो तुमने केवल स्वाद चखा है, असली दावत तो अब शुरू होगी। अब से तुम मेरी मर्जी के बिना अपनी पलकें भी नहीं झपका सकतीं।"
उसने मम्मी को बिस्तर से खींचकर फर्श पर घुटनों के बल बैठा दिया। यह एक अत्यंत अपमानजनक स्थिति थी। मम्मी, जो कुछ क्षण पहले तक एक गरिमामयी माँ थीं, अब एक बेबस और अपमानित स्त्री की तरह फर्श पर बैठी थीं। प्रदीप ने उन्हें आदेश दिया कि वे अपनी मर्यादा को पूरी तरह त्याग दें और उनके सामने एक वस्तु की तरह पेश आएँ। उसने उन्हें ऐसे काम करने पर मजबूर करना शुरू किया जो उनकी आत्मा को झकझोर देने वाले थे ऐसे काम जो केवल वासना की संतुष्टि के लिए थे और जिनमें उनकी गरिमा का कोई स्थान नहीं था। वे अब केवल प्रदीप के इशारों पर नाचने वाली एक कठपुतली बन चुकी थीं।
मैं खिड़की के पीछे से यह सब देख रहा था और मेरा दम घुटने लगा था। मेरी मानसिक स्थिति अब पूरी तरह से बिखर चुकी थी। मैं देख रहा था कि कैसे एक इंसान को धीरे धीरे एक निर्जीव वस्तु में बदला जा रहा है। मेरे भीतर का द्वंद्व अब समाप्त हो चुका था; अब वहाँ केवल एक गहरा कालापन था। मुझे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे मैं उस अंधेरे का हिस्सा बनता जा रहा हूँ। मैं अपनी माँ के उस क्रमिक पतन को देख रहा था कैसे वे हर अपमान के साथ और भी अधिक टूट रही थीं, लेकिन साथ ही उस अपमानजनक सुख के प्रति और भी अधिक झुकती जा रही थीं। मेरा मन चीखना चाहता था, लेकिन मेरी आवाज़ गले में ही फंस गई थी। मैं उस नर्क का साक्षी था जहाँ नैतिकता की बलि दी जा रही थी।
कमरे की हवा अब और भी भारी और घुटन भरी हो गई थी। प्रदीप का व्यवहार अब केवल वासना तक सीमित नहीं रहा था; वह अब एक क्रूर शासक की तरह व्यवहार कर रहा था। उसने मम्मी को फर्श पर घुटनों के बल ही रहने का आदेश दिया और उन्हें अपनी आँखों के सामने अपनी गरिमा को पूरी तरह से मिटाने के लिए मजबूर किया। उसने उन्हें ऐसे आदेश देने शुरू किए जो किसी भी सभ्य समाज की सीमाओं को लांघ चुके थे। मम्मी का चेहरा शर्म और अपमान से लाल हो रहा था, लेकिन उनके शरीर की वह अनियंत्रित वासना उन्हें प्रदीप के हर अपमानजनक आदेश को मानने पर मजबूर कर रही थी। वे अब एक माँ नहीं, बल्कि एक ऐसी दासी की तरह लग रही थीं जो अपने स्वामी के हर क्रूर इशारे पर नाचने को तैयार थी।
प्रदीप ने उन्हें और भी अधिक अपमानित करने के लिए उन्हें अपनी सेवा में लगा दिया। उसने उन्हें ऐसे काम करने पर मजबूर किया जो उनकी आत्मा को छलनी कर रहे थे। वह उन्हें बार बार यह एहसास दिला रहा था कि अब वे किसी की माँ या कोई सम्मानित महिला नहीं हैं, बल्कि केवल उसकी एक 'चीज़' हैं। मम्मी की आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन वे आँसू पछतावे के नहीं, बल्कि उस चरम मानसिक और शारीरिक गुलामी के थे जिसे वे अब स्वीकार कर चुकी थीं। वे उस अपमान को भी एक तरह के नशीले सुख की तरह महसूस करने लगी थीं।
मैं खिड़की के उस अंधेरे कोने में अब एक पत्थर की मूर्ति की तरह जम चुका था। मेरा दिमाग अब काम करना बंद कर चुका था। मैंने देखा कि कैसे एक इंसान का अस्तित्व धीरे धीरे मिटाया जा रहा है। मेरी आँखों के सामने मेरी माँ का वह पवित्र रूप पूरी तरह से नष्ट हो चुका था। मैं उस नर्क का हिस्सा बन चुका था जहाँ अब केवल शक्ति और समर्पण का खेल चल रहा था। मेरा मन अब चीखना चाहता था, लेकिन मेरे भीतर का वह लड़का मर चुका था। अब मैं केवल एक ऐसा साया था जो उस पतन को देख रहा था, और मुझे डर लग रहा था कि क्या अगला नंबर मेरा है? क्या प्रदीप अब मेरी ओर मुड़ेगा?
प्रदीप की आँखों में एक जंगली चमक थी। उसने अंजलि के शरीर को पूरी तरह से अपने वश में कर लिया था। उसने अंजलि की आँखों में देखते हुए बहुत ही गंदी और अश्लील भाषा में बोलना शुरू किया, जिससे अंजलि का शर्म से चेहरा लाल हो गया, लेकिन उसके शरीर में एक अनचाही उत्तेजना भी दौड़ रही थी।
उसने अंजलि की जाँघों को ज़ोर से फैलाया और अपनी गंदी बातों के साथ उसे और भी उकसाने लगा। "तुम्हें क्या लगा था? कि मैं बस थोड़ा सा करके रुक जाऊँगा?" उसने अंजलि के कान के पास फुसफुसाते हुए कहा, "अभी तो मुझे तुम्हारी इस गहराई में पूरी तरह डूबना है।"
उसने बिना किसी देरी के अपनी सारी वासना अंजलि की योनि (choot) के भीतर उतार दी। वह पूरी तरह से बेकाबू हो चुका था। वह गंदी बातें करना बंद नहीं कर रहा था, बल्कि हर झटके के साथ अंजलि को और भी अपमानित और उत्तेजित महसूस करा रहा था। वह चाहता था कि अंजलि अपनी सारी मर्यादा भूलकर केवल उसके शरीर की भूख मिटाने का एक जरिया बनकर रह जाए
प्रदीप ने जैसे ही अंजलि के भीतर अपना सारा वेग उतारा, कमरे का माहौल पूरी तरह बदल गया। वह शारीरिक चरम पर था, लेकिन उसके दिमाग में अब भी वही गंदी और अपमानजनक बातें चल रही थीं। वह अंजलि को केवल एक स्त्री की तरह नहीं, बल्कि एक ऐसी चीज़ की तरह देख रहा था जिसे उसने पूरी तरह जीत लिया है।
उसने अंजलि के पसीने से तर शरीर पर झुकते हुए, बहुत ही अश्लील लहजे में कहा, "देखा? तुम्हारी ये सारी मर्यादाएं, ये संस्कार... सब मेरे एक झटके के सामने घुटने टेक देते हैं। तुम कितनी पवित्र बनने का ढोंग करती थी, लेकिन तुम्हारी योनि तो मेरी गंदी बातों और मेरे वेग के लिए ही बनी है।"
अंजलि की आँखों में आँसू थे, लेकिन वे आँसू केवल शर्म के नहीं थे, बल्कि उस मानसिक हार के भी थे जो वह महसूस कर रही थी। प्रदीप ने उसके चेहरे पर थूकते हुए या उसे नीचा दिखाते हुए अपनी गंदी बातों का सिलसिला जारी रखा। वह उसे बार बार याद दिला रहा था कि वह अब एक 'पवित्र माँ' नहीं रही, बल्कि उसकी वासना का एक साधन बन चुकी है।
वह अंजलि के कानों में गंदे शब्द फुसफुसा रहा था, जिससे अंजलि का आत्मसम्मान पूरी तरह कुचल रहा था। वह उसे यह अहसास दिलाना चाहता था कि उसका पतन अब स्थायी है। प्रदीप का जुनून अब केवल शरीर तक सीमित नहीं था; वह अंजलि की आत्मा को गंदी बातों के जरिए मैला करना चाहता था।

प्रदीप ने अंजलि को अपनी गिरफ्त में ऐसे जकड़ा था जैसे वह कोई इंसान नहीं, बल्कि मांस का एक लोथड़ा हो। अंजलि की आँखों में जो बेबसी थी, वह प्रदीप के लिए ईंधन का काम कर रही थी। वह अंजलि के शरीर के साथ जो भी कर रहा था, उसके साथ उसकी जुबान से निकलने वाले शब्द और भी ज्यादा गंदे और अपमानजनक होते जा रहे थे।
उसने अंजलि के शरीर को उलट पुलट कर उसे अपनी वासना का केंद्र बना लिया था। वह अंजलि के अंगों को छूते हुए बार बार चिल्लाकर गंदी बातें कर रहा था, "देख रही हो न तुम? तुम्हारी ये जो मर्यादा की दीवार थी, वो अब ढह चुकी है। अब तुम सिर्फ मेरी हो, मेरी वासना की गुलाम।"
उसने अंजलि के शरीर के उन हिस्सों पर अपनी गंदी टिप्पणियाँ करना शुरू किया जिन्हें वह अब तक पवित्र मानती थी। वह अंजलि को यह महसूस करा रहा था कि उसका शरीर अब केवल उपभोग की वस्तु है। वह अंजलि के शरीर को चखते हुए और उसे गंदे शब्दों से कोसते हुए अपनी उत्तेजना को और बढ़ा रहा था। वह रुकने का नाम नहीं ले रहा था; वह अंजलि को मानसिक रूप से इतना मैला करना चाहता था कि अंजलि खुद को कभी माफ न कर पाए। वह अंजलि के पतन का आनंद ले रहा था और अपनी गंदी बातों से।
उसने अंजलि के शरीर के उन हिस्सों पर अपनी जीभ और हाथों का इस्तेमाल करना शुरू किया जिन्हें वह अब तक 'मर्यादा' के नाम पर छुपाती आई थी। वह जानबूझकर बहुत ही गंदे और अपमानजनक शब्दों का प्रयोग कर रहा था ताकि अंजलि का मानसिक संतुलन बिगड़ जाए। वह उसे बार बार यह अहसास दिला रहा था कि उसकी हर एक सांस, उसका हर एक अंग अब केवल प्रदीप के उपभोग के लिए है।
प्रदीप का हाथ अंजलि के शरीर पर रेंग रहा था और उसकी जुबान से निकलने वाले शब्द अंजलि के कानों में ज़हर की तरह घुल रहे थे। वह उसे मानसिक रूप से इतना मैला कर देना चाहता था कि अंजलि को अपनी पवित्रता का अहसास ही न रहे। वह अंजलि के पतन के हर पल का स्वाद ले रहा था, और उसकी गंदी बातें उस माहौल को और भी अधिक भारी और घृणित बना रही थी।
प्रदीप की वासना अब एक उन्माद का रूप ले चुकी थी। अंजलि का शरीर पसीने और थकावट से भीगा हुआ था, लेकिन प्रदीप के लिए यह सब अभी बहुत कम था। उसने अंजलि को बिस्तर पर पूरी तरह बेबस कर दिया था और अब वह उसके शरीर के साथ एक जानवर की तरह खेल रहा था।
उसने अंजलि के शरीर को अपनी मर्ज़ी से मोड़ना शुरू किया। वह उसके अंगों को छूते हुए और उन्हें अपनी गंदी नज़रों से देखते हुए लगातार अश्लील टिप्पणियाँ कर रहा था। "तुम्हारी ये देह... ये सब कितना गंदा और कामुक है," उसने अंजलि के कान के पास फुसफुसाते हुए कहा, "तुम जितना खुद को पवित्र दिखाने की कोशिश करती हो, तुम उतनी ही ज़्यादा मेरी वासना की भूखी हो।
"प्रदीप के उस अंतिम और प्रचंड वेग के साथ, उसके शरीर का सारा रस अंजलि के भीतर समा गया। उस तीव्र मिलन और चरम सुख के बाद, जब सब कुछ शांत हुआ, तो अंजलि के शरीर से वह गर्म और चिपचिपा तरल धीरे धीरे बाहर बहने लगा, जो उस पूरी घटना की गवा
ही दे रहा था।"
पसीने और उस गर्म तरल की वजह से बेडशीट पूरी तरह से भीग चुकी थी। उस गीली और दागदार बेडशीट को देखकर मुझे अचानक उस रात वाले तौलिये के गीले और चिपचिपे होने का पूरा रहस्य समझ आ गया था। वह सब अब मेरे दिमाग में एक फिल्म की तरह चल रहा था वह चिपचिपाहट और वह गीलापन, जो अब तक एक रहस्य था, अब मेरे सामने पूरी तरह स्पष्ट हो चुका था।
प्रदीप अपने कमरे में जाकर लेट गया और आराम करने लगा। अंजलि के शरीर से उसका वीर्य अब धीरे धीरे बाहर बह रहा था। अंजलि उठकर बैठी और उसने बेडशीट उठाई ताकि वह अपनी योनि को साफ कर सके। उसने देखा कि बेडशीट उस सफेद तरल से पूरी तरह गीली हो चुकी थी। उसने तुरंत दूसरी साफ बेडशीट बिछाई और खुद को ढककर बाथरूम की ओर चली गई।
मेरा सिर चकराने लगा और मेरा मानसिक संतुलन डगमगा गया। मैं उस भयावह दृश्य से खुद को बाहर निकालने के लिए घर से थोड़ा दूर भागा और हैंडपंप से अपने चेहरे पर ठंडे पानी के छींटे मारे ताकि होश में आ सकूँ।
जब मैं वापस घर आया, तो देखा कि मम्मी शायद दोबारा नहाकर अपने कमरे में आराम कर रही थीं। मैं उनसे नज़रें चुराते हुए बाहर निकल आया और अपनी दुकान खोलकर बैठ गया, लेकिन मेरे दिमाग में वही सब चल रहा था।
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#40
Uncle se bege ki dosti karwao aur beta Mummy ke pair dabaya kare
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