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Adultery FLAT MATE
#61
(06-08-2026, 01:56 PM)jamanuram Wrote: What a fabulous update, just a small request, could it be little bit big update

(06-08-2026, 05:42 PM)KkkNad Wrote: Good update ,please give an big update ,by the way good going ,keep it up sir

Apologies, dear readers. To be honest, I really want to write, but as fate would have it, I am caught up in struggles that are extremely difficult to break free from. However, because I love writing, I somehow manage to squeeze out a bit of time here and there to write. For now, I am completely unable to provide any major updates. Heartfelt gratitude and a huge thank you to all of you for your love and support.
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#62
एपिसोड 19: वाज़िब.... लेकिन... बेबुनियाद

शंका एक ऐसा धीमा ज़हर है जो इंसान के सोचने-समझने की पूरी तासीर बदल देता है। जब आपके मन में एक बार अविश्वास का बीजारोपण हो जाए, तो सामान्य से सामान्य घटना भी किसी बहुत बड़ी साज़िश का हिस्सा लगने लगती है। मैं अपनी ही माँ और अपने दोस्त के बीच की इन अदृश्य कड़ियों को जोड़ने में लगा हुआ था, पर हर नया दिन मेरे लिए एक नया मोड़, एक नई उलझन लेकर आ रहा था।

पिछले कुछ दिनों से मैंने मम्मी में एक बहुत ही छोटा, लेकिन बेहद चौंकाने वाला बदलाव नोटिस करना शुरू किया था। एक ऐसा बदलाव जिसे कोई भी गैर-इंसान या दूर का व्यक्ति शायद नज़रअंदाज़ कर देता, लेकिन मैं... मैं तो जैसे अपनी माँ के हर एक कदम, उनकी हर एक सांस पर किसी जासूस की तरह निगाह गड़ाए बैठा था।

बदलाव यह था कि मम्मी आजकल अक्सर अकेली ही बाज़ार या लोकल मार्केट के लिए निकल जाया करती थीं।

यह वही महिला थीं, जो बीरभूम से इस महानगर में आते वक्त ट्रेन के डिब्बे से बाहर झांकने में भी कतराती थीं। जिन्हें शुरुआत में इस बड़े शहर का नाम सुनकर ही घबराहट होने लगती थी, जो फ्लैट की बालकनी से नीचे गाड़ियों के शोर और भागते-दौड़ते लोगों को देखकर सिर पकड़ लिया करती थीं और मुझसे कहती थीं,

"देव, मुझे अकेले बाहर मत छोड़ना, मैं तो रास्ता ही भूल जाऊंगी।"

लेकिन पिछले करीब एक सप्ताह से, मैं देख रहा था कि मम्मी बिना किसी हिचकिचाहट के, बेखौफ होकर अकेले ही मार्केट के लिए निकल जाती थीं। वह घर से निकलतीं, और दो-तीन घंटे बाहर एक अच्छा-खासा समय बिताकर वापस लौटती थीं। जब वह लौटतीं, तो उनके चेहरे पर वह पुराना डर या अजनबीपन नहीं होता था, बल्कि एक अजीब सी आत्मसंतुष्टि और सुकून होता था।

इतना ही नहीं, पिछले सात दिनों में दो बार तो मैंने खुद देखा कि वह इमरान के साथ भी बाहर गई थीं। जब मैंने पहली बार इमरान को उसकी बाइक पर मम्मी को पीछे बैठाकर ले जाते देखा, तो मेरे पैरों तले की जमीन खिसक गई थी,

"मम्मी, आप इमरान के साथ कहाँ जा रही हैं?" मैंने उस दिन फ्लैट के दरवाजे पर ही उन्हें रोककर पूछा था।

मम्मी ने अपनी साड़ी का पल्लू संभाला और बेहद सहजता से मुस्कुराकर कहा,

"अरे, कुछ घर का जरूरी सामान लेना था तू तो दफ्तर के काम में व्यस्त रहता है, तो इमरान ने ही कहा कि वह मुझे पास वाले सुपरमार्केट ले जाएगा। तू बेकार में चिंता करता है।"

उनका लहजा इतना स्वाभाविक था कि मेरे पास कोई सवाल ही नहीं बचा था

लेकिन मेरा अंतर्मन जल रहा था जो माँ किसी गैर के साथ बात करने में भी संकोच करती थीं, वह आज मेरे दोस्त की बाइक पर बैठकर शहर के चक्कर काट रही थीं? और इमरान... वह इमरान जो कभी दोपहर 12:00 – 12:30 बजे से पहले बिस्तर से नहीं उठता था, वह सुबह-सुबह तैयार होकर मम्मी को शॉपिंग पर ले जा रहा था!

लेकिन बात सिर्फ अकेले बाहर जाने या इमरान के साथ वक्त बिताने तक सीमित नहीं थी

….. बदलाव उससे भी ज्यादा गहरा और व्यक्तिगत था।

मैंने गौर किया कि अब मम्मी के पहनावे में, उनके सजने-संवरने के ढर्रे में भी एक स्पष्ट परिवर्तन आ गया था। बीरभूम में मम्मी हमेशा ढीले-ढाले, सादे सूती ब्लाउज और पारंपरिक तरीके से पहनी गई साड़ियों में नजर आती थीं। उनके सलवार-कमीज भी बहुत साधारण और ढीले-ढाले हुआ करते थे, जिन्हें वह सिर्फ घर की साफ-सफाई या यात्रा के वक्त ही पहनती थीं।

पर अब?

अब उनके साड़ी-ब्लाउज और सलवार-कमीज पहनने के अंदाज में एक अजीब सी आधुनिकता और कसाव आ गया था।

उनके ब्लाउज के कट और उनके सलवार-सूट की फिटिंग में एक नया सलीका दिखने लगा था। आगे और पीछे,... दोनों ही जगहों से गहराई थोड़ी डीप होने लगी थी....! साथ ही, वह कपड़े पहनते वक्त आइने के सामने थोड़ा ज्यादा वक्त बिताने लगी थीं। उनके बालों का जूड़ा, जो पहले थोड़ा बेतरतीब होता था, अब सलीके से बंधा होता था। यहाँ तक कि उनकी साड़ियों की प्लेट्स और पल्लू को ढालने का तरीका भी काफी हद तक इस शहर की मध्यमवयस्क महिलाओं जैसा स्टाइलिश होने लगा था।

एक दिन जब वह बाज़ार जाने के लिए तैयार होकर अपने कमरे से निकलीं, तो मैंने उन्हें गौर से देखा। उन्होंने एक हल्के गहरे नीले रंग का सलवार-सूट पहन रखा था जो उन पर बहुत जंच रहा था। उनका साइड प्रोफाइल... बिल्कुल वैसा ही दिख रहा था जैसी तस्वीरें इमरान उस रात अपने लैपटॉप पर ज़ूम करके देख रहा था और उन पर शोध कर रहा था!

मेरा दिल दहल गया

क्या यह सब महज एक इत्तेफाक था? क्या एक महिला का बड़े शहर में आकर अपने पहनावे को थोड़ा बदलना और आत्मनिर्भर बनना कोई अपराध था?

इसी सवाल ने मेरे भीतर अंतर्द्वंद्व का एक भयानक बवंडर खड़ा कर दिया था।

मैं अपने कमरे में अकेला बैठा सोचता रहता। मेरे पास शक करने का समुचित कारण था। एक के बाद एक कई कड़ियां जुड़ रही थींइमरान का उस रजिस्टर को पढ़ना, लैपटॉप पर मम्मी की तस्वीरों की बारीकियों को घंटों निहारना, फिर अचानक मेरे एक्सीडेंट के बाद उसका वापस आना और मम्मी का उसके प्रति पूरी तरह बदल जाना। और अब, मम्मी का यह अचानक बेखौफ होकर बाहर जाना, अपने लुक्स और पहनावे में बदलाव लाना, और इमरान के साथ इतनी घनिष्ठता...

ये सारे कारण एक शक्की इंसान के लिए किसी भी खौफनाक नतीजे तक पहुंचने के लिए काफी थे। मेरे भीतर का 'जासूस' चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा था कि इमरान अपनी किसी गुप्त मनोरथ के तहत मम्मी को प्रभावित कर रहा है, और मम्मी जाने-अनजाने उसके जाल में फंसती जा रही हैं।

लेकिन... जैसे ही मेरा तार्किक मन इन कारणों का विश्लेषण करता, मुझे यह सारे कारण बेहद खोखले और अपर्याप्त लगने लगते।

"देव, तू पागल हो गया है क्या?" मैं आइने में अपने खुद के चेहरे को देखकर खुद से ही बहस करने लगता..

"तू किस पर शक कर रहा है? अपनी माँ पर? जिन्होंने पूरी जिंदगी तेरे और पापा के अलावा किसी तीसरे इंसान के बारे में सोचा तक नहीं? क्या एक 40 साल की महिला, जो अब भी दिखने में ढलती उम्र की खूबसूरत औरत लगती है, अगर इस नए शहर में आकर थोड़ा खुलकर जीना चाहती है, तो क्या वह गलत हो गई?"

मेरा मन दूसरा तर्क देता कि अगर कोई औरत सालों के अकेलेपन के बाद, अपने पति के जाने के बाद, पहली बार किसी नए शहर में आकर थोड़ा आत्मविश्वास महसूस कर रही है, अकेली बाज़ार जाना सीख रही है, और अपने पहनावे को थोड़ा बेहतर बना रही है, तो इसमें बुराई क्या है? क्या अपनी बीती ज़िंदगी की तन्हाई से निकलकर अगर वह यहाँ थोड़ा सा जीवन महसूस कर रही हैं, तो एक बेटे के तौर पर मुझे खुश होना चाहिए…?

या, उन पर घिनौना शक करना चाहिए?

और इमरान...

….. क्या इमरान वाकई कोई साज़िश रच रहा था?

हो सकता है कि वह सचमुच एक अच्छा दोस्त हो उसने मेरे एक्सीडेंट के वक्त अस्पताल से लेकर घर तक हर वो काम किया जो एक सगा भाई करता। हो सकता है कि मेरी सीधी-साधी माँ में उसे अपनी माँ की छवि दिखती हो, और वह बस उन्हें इस शहर से रूबरू करा रहा हो। जहाँ तक उस रहस्यमयी रजिस्टर या तस्वीरों को देखने का सवाल थाहो सकता है कि वह सचमुच जैसा कहता था, एक आर्टिस्टिक या फोटोग्राफिक नज़रिए से ही उन्हें देखता हो??!

"नहीं... नहीं! यह सब इतना सीधा नहीं हो सकता," ये सब कुछ सोचते - सोचते मैं अपना सिर पकड़कर बैठ जाता था।

शक का यह दायरा मुझे निगल रहा था मेरे पास पर्याप्त सबूत थे, पर एक भी सबूत ऐसा नहीं था जो ठोस अदालत में या खुद मेरे संस्कारों की अदालत में टिक सके…. सब कुछ 'संभावनाओं' और 'आभासों' पर टिका था…. अगर मैं आज जाकर मम्मी से कहूँ कि,

"आप आजकल अच्छे कपड़े पहनकर अकेले बाज़ार क्यों जाती हैं?"

तो वह मुझ पर हँसेंगी या फिर इस घिनौने संशय को महसूस करके अंदर तक टूट जाएँगी और अगर मैं इमरान का कॉलर पकड़कर पूछूँ कि,

"तू मेरी माँ को अपनी बाइक पर क्यों घुमाता है?" तो वह मुझे नासमझ, एहसानफ़रामोश कहेगा और हँस कर बात टाल देगा।

मैं एक ऐसी दहलीज पर खड़ा था जहाँ से आगे बढ़ने पर सिर्फ अपनों के विश्वास का कत्ल होता, और पीछे हटने पर उस अनजाने खौफनाक सच का ख़तरा था जो शायद इस घर की दीवारों में खामोशी से अपना जाल बुन रहा था।

उस शाम, जब मम्मी बाज़ार से लौटीं, तो उनके हाथ में बेला के फूलों की एक छोटी सी लड़ी थी..! उन्होंने उसे बड़ी सादगी से अपने जुड़े में सजाया रसोई में काम करते वक्त उनकी पीठ मेरी तरफ थी, और वह कोई पुराना लोकगीत बहुत धीमी आवाज़ में गुनगुना रही थीं।

मैंने दरवाजे के पीछे छिपे रहकर उन्हें देखा

उनकी वह बदली हुई वेशभूषा, वह बेफिक्री, और उनका वह गुनगुनाना... मेरे दिल को एक साथ सुकून भी दे रहा था और शक की एक नई फ़ांस बनकर कलेजे में चुभ भी रहा था। मैं समझ नहीं पा रहा था कि यह मेरी माँ का एक नया, आत्मनिर्भर रूप था... या फिर किसी बहुत बड़े तूफ़ान से पहले की एक भयावह, सुंदर शांति..??!




To be continued…
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#63
Gajab keep it up , fantastic update
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#64
Wow, could you please update it, it's interesting
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#65
update please
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#66
एपिसोड 20: सिलवटें

हमेशा, हर दिन शक करने के लिए कुछ नहीं होता था.... कभी-कभी दो-तीन सप्ताह ऐसे बीत जाते थे मानो मुझे मम्मी और इमरान को लेकर कभी कोई शिकायत थी ही नहीं!

यकीन मानिए, ऐसे दिन और सप्ताह मेरे लिए किसी मृत-संजीवनी से कम नहीं होते थे.... मम्मी वाकई में मेरी प्यारी मम्मी लगती थीं और इमरान मेरा सबसे अच्छा दोस्त। खुशियाँ, सौहार्द और शान्ति तो मानो चौबीस घंटे घर के मेन दरवाज़े के बाहर हाथ जोड़े खड़े रहते हैं की, 'भैया, प्लीज़... थोड़ा सा और अंदर आने दो...'

ऐसे दिनों में, मम्मी का पूरा ध्यान घर और मेरे पे होता था.... मैंने टाइम पर खाया की नहीं, सही मात्रा में खाया... कितना खाया... कब तक काम रहेगा... समय निकाल कर थोड़ा ज़्यादा आराम क्यों नहीं कर लेता, इत्यादि।

इमरान भी अपने काम में जी तोड़ व्यस्त रहता। कई बार ऐसा हुआ की वो रातों में घर लौटा तक नहीं!

दो-तीन दिन बाद जब लौटता तब देख कर ऐसा लगता की मानो कहीं से जंग लड़ कर आया है, या फिर शायद कुली-मिस्त्री का काम कर रहा था... उसके कपड़ों और शक्ल की हालत ही ऐसी होती थी।

ऐसे ही दिन कट रहे थे....

कि एक दिन अचानक कुछ ऐसा हुआ जिसकी एक महीन कल्पना शायद मैंने बहुत पहले ही कर लिया था अपने दिमाग के किसी कोने में, लेकिन स्वीकार करने या फिर इसके वास्तविक होने की सोच भर को दूर से प्रणाम कर लेता था...
 
हुआ कुछ ऐसा....

रविवार का दिन था....

सुबह के आठ बजे थे। अमूमन इस वक्त मम्मी रसोई में पुरानी, घरेलू सूती साड़ी का पल्लू कमर में लपेटे, भाप उड़ाती चाय और नाश्ते की तैयारी में जुटी होती थींऔर नाश्ते के साथ-साथ दोपहर के खाने का प्रबंध भी शुरू हो जाता था.... लेकिन, आज जब मैं कमरे से बाहर निकला, तो रसोई सूनी थी।

ड्राइंग रूम से आती हल्की सी महक ने मेरा ध्यान खींचावह कोई धुप-अगरबत्ती या फिर मम्मी की फेवरेट चंदन की खुशबू नहीं थी, बल्कि इमरान के उस महंगे बॉडी लोशन और फ्रेंच परफ्यूम की बहुत बारीक, धीमी सी महक थी जिसका वो अक्सर ही शो ऑफ किया करता था...

मैं दबे पांव हॉल की तरफ बढ़ा

मम्मी अपने कमरे का दरवाजा थोड़ा खुला रखकर आईने के सामने खड़ी थीं। जो दृश्य मैंने देखा, उसने मुझे अपनी ही जगह पर जड़ कर दिया मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं, और दिल में दबा शक अचानक एक तीखे सच की तरह सामने आकर खड़ा हो गया।

मम्मी ने एक नए डिजाइन का गहरा वाइन-रेड रंग का सलवार-सूट पहन रखा थाअच्छा जँच भी रही थी... लेकिन बात सिर्फ नए कपड़ों की नहीं थी; बात उस 'कट' और 'फिटिंग' की थी जो कभी मेरी सीधी सादी मम्मी की पसंद से कोसों दूर हुआ करती थी।

गदराए कंधे पर टिकने वाला वो डीप-कट वाला गला, और कुर्ती का वो बॉडी-हगिंग शेप... वह पोशाक किसी भी लिहाज से बीरभूम की उस ढलती उम्र की शांत महिला की नहीं लग रही थी। वह कपड़ा मम्मी के शरीर से इस कदर चिपका हुआ था कि उनकी सुडौल काया की एक-एक बनावट उभर कर सामने आ रही थी। वह आईने में घूम-घूमकर खुद को देख रही थींकभी थोड़ा मुड़कर अपना साइड प्रोफाइल देखतीं, तो कभी अपने कंधे पर से सरकते हुए दुपट्टे को एक बहुत ही आधुनिक और सलीकेदार अंदाज में ढीला छोड़ देतीं...

कभी थोड़ा आगे झुक कर कुर्ती के डीप गले से झाँकते क्लीवेज को देख कर मंद-मंद मुस्कराती, तो कभी पूरी तरह मुड़ कर उस कसे कपड़े में अपना पिछवाड़ा देखती…!

दुपट्टा छाती को ढकने के बजाय केवल एक तरफ के कंधे पर पिन से अटका हुआ था.. उनका दूसरा कंधा और कुर्ती की वो बारीक सिलाई साफ झलक रही थी। यह बिल्कुल वैसा ही स्टाइल था जैसा शहर की आज़ाद ख्याल, स्टाइलिश और एलिट-क्लास औरतें अपनाती थीं।

मम्मी ने अपने हाथों में कांच की पारंपरिक चूड़ियों की जगह केवल एक हाथ में पीतल का एक चौड़ा, नक्काशीदार ब्रेसलेट पहन रखा था। उनके बालों का जूड़ा भी आज गायब था; उसकी जगह उनके बाल पीछे आधे बंधे थे और बाकी कंधे पर बिखरे हुए थे। वह आईने के करीब गईं, अपने होठों पर हल्के गुलाबी रंग की लिप-ग्लोस की चमक को देखा और मुस्कुरा दीं।

वह मुस्कान... वह एक 40 के पार की माँ की सादगी भरी मुस्कान नहीं थी, उसमें एक औरत का अपने रूप को लेकर जगा नया आकर्षण, नयी जिज्ञासा थी

मेरी छाती में जैसे सांस अटक गई। यह वो महिला बिल्कुल नहीं थी जिसे मैं बीरभूम से लाया था। मुझे तुरंत इमरान के लैपटॉप की वो खौफनाक रात याद आई

पता नहीं क्यों याद आई... लेकिन आई...

याद आने का कोई कारण अगर देना ही पड़े तो यही दूँगा कि उस रात लैपटॉप की स्क्रीन पर इमरान जिस तरह से मम्मी की पुरानी सलवार-सूट वाली तस्वीरों को ज़ूम कर-करके देख रहा थाउनके साइड प्रोफाइल का झुकाव, उनकी कुर्ती का कसाव, और पीछे से उनके चलने का अंदाजआज मम्मी का यह नया रूप हूबहू उसी 'डिजाइन' में ढला हुआ लग रहा था! ऐसा लगता था जैसे इमरान ने ही किसी कुशल मूर्तिकार की तरह मेरी माँ के पहनावे और उनके हाव-भाव को अपनी पसंद के मुताबिक ढाल दिया हो।

"मम्मी..."  एक सूखी सी आवाज़ निकली।

मम्मी ने चौंककर पीछे देखा।

एक पल के लिए उनके चेहरे पर चोरी पकड़े जाने जैसी घबराहट आई। उन्होंने तुरंत अपने दुपट्टे को दोनों हाथों से खींचकर आगे करने की कोशिश की, लेकिन फिर ना जाने कहाँ से एक नया आत्मविश्वास उनके चेहरे पर आ गया।

"अरे देव, तू उठ गया?" उन्होंने अपने बाल संवारते हुए कहा, "देख तो, यह सूट कैसा लग रहा है? वो... इमरान कह रहा था कि इस शहर में इतने ढीले-ढाले कपड़े पहनकर बाहर निकलोगी तो लोग अजीब नजरों से देखेंगे। कल जब मैं उसके साथ मार्केट गई थी, तो उसने ही बुटीक से यह नया कपड़ा पसंद करवाया था। कह रहा था कि आंटी आप पर यह रंग और यह कट बहुत जंचेगा।"

'इमरान ने पसंद कराया था...' ये शब्द मेरे कानों में किसी जलते हुए तेजाब की तरह गिरे…. 'यह रंग और यह कट'....! तो बात अब धीरे-धीरे यहाँ तक पहुँच रही है!!

इमरान ने मेरी माँ के कपड़ों की फिटिंग तय की थी? इमरान ने यह तय किया था कि मेरी माँ का गला कितना गहरा होगा और उनका दुपट्टा किस कंधे पर ढलकेगा?

'साला मादरच...'     मैंने मन ही मन कहा...

"मम्मी, आप... आप ये क्या पहन रही हैं?" मेरी आवाज अविश्वास से कांप रही थी "आपको कभी इस तरह के कपड़े पहनते नहीं देखा। यह फिटिंग, यह स्टाइल... बीरभूम में तो आपने कभी..."

"बीरभूम अलग था देव," मम्मी ने मेरी बात बीच में ही काट दी। उनकी आवाज में पहली बार एक अजीब सी कड़वाहट या शायद एक तीखी आत्मनिर्भरता थी,

"वहां जिंदगी ठहर गई थी अब मैं इस शहर में हूँ, तेरे साथ। क्या मुझे थोड़ा सा सजने-संवरने का हक नहीं है? क्या उम्र के इस पड़ाव पर आकर मैं अपनी पसंद के कपड़े भी नहीं पहन सकती? तू भी अब इमरान की तरह सोच में थोड़ा आधुनिक बन।"

"मैं आधुनिक हूँ मम्मी,..."


"ओह! आधुनिक हो? किस तरह के आधुनिक जो अपनी मम्मी की ज़रा सी आधुनिकता पर आपत्ति कर रहे हो?"


मम्मी ने काफी तीखा कटाक्ष किया।

मैं शायद दुनिया का सब कुछ बर्दाश्त कर सकता था और हूँ, लेकिन मम्मी का ऐसा कटाक्ष नहीं... और, जहाँ तक मुझे याद है मम्मी ने इससे पहले सिर्फ एकबार ऐसा किया था, वो भी मेरे जॉब करने या न करने के निर्णय को लेकर।

आज का ये रूप और बात, पहले से कहीं अधिक अलग, बिल्कुल ही जुदा है....

मैं खामोश खड़ा उन्हें देखता रह गया।

इमरान का नाम उनके मुंह से इतनी सहजता से निकल रहा था जैसे वह कोई गैर नहीं, बल्कि उनके इस नए रूप का कोई राजदार हो। जब वह मेरे सामने से गुजरकर रसोई की तरफ गईं, तो उनकी चाल में भी एक नया लचीलापन था। उनके सूट की सिलवटें और उनकी पीठ पर झूलती वो बारीक डोरी... सब कुछ चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा था कि मेरे पास शक करने की कोई बेबुनियाद वजह नहीं थी!!


यह कोई मेरा वहम नहीं था एक बेटा अपनी माँ के पहनावे में आए इतने बारीक और बोल्ड बदलाव को कभी गलत नहीं समझ सकता। इमरान ने मेरी माँ की सादगी पर अपनी पसंद का रंग चढ़ा दिया था, और सबसे भयानक बात यह थी कि मम्मी को इस बदलाव से कोई ऐतराज नहीं था; बल्कि वह इस नए रूप में खुद को पाकर मुस्कुरा रही थीं।


मेरे भीतर का बेटा उस दिन हार गया, और शक का वो खौफनाक भूत एकबार फिर पूरी तरह से मेरे सिर पर सवार हो गया।
 



To be Continued….
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#67
bahut badhiya update
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#68
Very good story writings!
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#69
bahut bahut hot aur masaladar writings! bahut khoob.
[+] 1 user Likes Ella's post
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#70
chamatkar update
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#71
chamatkar aur mast update
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#72
ekdom super duper hit aur hot update
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#73
एपिसोड 21: मन का बवंडर

संदेह जब फेफड़ों की सांसों में समा जाए, तो इंसान खुली हवा में भी घुटने लगता है। मम्मी के उस नए वाइन-रेड सलवार-सूट, उनकी बदली हुई मुस्कान और आईने के सामने उनके संवरने के उस दृश्य ने मेरे भीतर एक ऐसा भूचाल ला दिया था, जिसकी गूंज मेरे दफ्तर की दीवारों तक सुनाई दे रही थी। मेरा वजूद दो हिस्सों में बंट चुका थाएक हिस्सा वह बेटा था जो अपनी माँ को दुनिया का सबसे पवित्र रूप मानता था, और दूसरा हिस्सा वह शक्की इंसान था जिसके सामने सबूतों की एक पूरी किताब खुली पड़ी थी।

उस दिन दफ्तर में मेरा दिल बुरी तरह घबरा रहा था। सीने के भीतर जैसे कोई लोहे की हथौड़ी चल रही थी। सामने कंप्यूटर की स्क्रीन पर डेटा और फाइलों के अक्षर घूम रहे थे, पर मेरे दिमाग में सिर्फ और सिर्फ घर का वो नजारा घूम रहा था। काम में रत्ती भर भी मन नहीं लग रहा था।

हर दस-पंद्रह मिनट में मैं अपनी डेस्क से उठता, कॉरिडोर में जाता और बालकनी में खड़े होकर एक के बाद एक सिगरेट फूंकने लगता। निकोटिन का धुआं फेफड़ों में उतरता, पर अंदर की बेचैनी कम होने का नाम नहीं लेती। कॉफी मशीन के पास जाकर ब्लैक कॉफी के डिस्पोजेबल कप खाली करना मेरी मजबूरी बन गया था। कैफीन और सिगरेट के इस जानलेवा कॉकटेल ने मेरी धड़कनों को और तेज कर दिया था। दफ्तर के कलीग्स मुझे अजीब नजरों से देख रहे थेवह लड़का जो कभी अनुशासित था, चाय-सिगरेट से दूर रहता था, आज बेतरतीब तरीके से ब्रेक पर ब्रेक लिए जा रहा था।

सिगरेट का धुआं हवा में उड़ाते हुए मेरा दिमाग चक्रव्यूह में उलझा रहता।

कभी मेरा मन इमरान पर जाकर अटक जाता—"वह कमीना! उसने मेरी मम्मी की सादगी का फायदा उठाया है। उसने अपनी बातों के जाल में मम्मी को फंसा लिया है। वही उन्हें ये तंग गले के कपड़े पहनने पर मजबूर कर रहा है। वही उन्हें अपनी बाइक पर घुमाता है।"

लेकिन अगले ही पल, मन का दूसरा कोना पलट जाता और मम्मी पर शक करने लगता—"पर क्या मम्मी इतनी नादान हैं? क्या 40 साल पार की एक समझदार औरत, जिसने पूरी जिंदगी मर्यादा में बिताई, वह किसी 22-23 साल के लड़के की बातों में आकर इस तरह बदल जाएगी? क्या मम्मी खुद भी इस बदलाव को इन्जॉय कर रही हैं? क्या उन्हें भी अपनी इस ढलती उम्र में अपनी खोई हुई सुंदरता की तारीफ सुनना अच्छा लग रहा है?"

फिर अचानक, एक गहरा अपराधबोध मुझे कसकर जकड़ लेता—"नहीं-नहीं! मैं यह क्या सोच रहा हूँ? मैं अपनी ही माँ के बारे में इतना नीच ख्याल कैसे ला सकता हूँ? और इमरान... इमरान ने तो मेरे एक्सीडेंट में अपनी जान लगा दी थी। वह तो मेरा भाई जैसा दोस्त है। क्या मैं एक शक्की मनोरोगी बनता जा रहा हूँ? क्या वे दोनों पूरी तरह बेकसूर हैं और पाप सिर्फ मेरी सोच में है?"

तभी विचारों की एक ओर आंधी ने मुझे घेरा,

"एक मिनट, आखिर ये सब हो भी कैसे रहा है? क्या ये संभव है? अम्म,... हाँ, संभव तो है क्योंकि ठीक मेरी आँखों के सामने हो रहा हैपर... पर... उसने ये संभव किया कैसे? मम्मी जब पहले-पहल यहाँ आई थी, तब तो इससे दूर ही रहती थी.... ये साला, अचानक ऐसा क्या हुआ की... नहीं, नहींसब कुछ अचानक बिल्कुल नहीं हुआ है! तकरीबन महीने भर बाद से होना शुरू हुआ है.... धीरे-धीरे! अभी याद आ रहा है... मम्मी अक्सर ही पूरे घर में, कमरों में कहीं कुछ ढूँढती रहती थी... मुझे बहुत अजीब लगा करता था, लेकिन कभी पूछा नहीं था. वो कई बार इमरान के कमरे के बंद दरवाज़े के सामने भी खड़ी रह कर कुछ न कुछ करती थी... आई मीन, उसके बंद दरवाज़े को ही बड़े गौर से देखती थीबट व्हाई? मैंने इसके बारे में भी कभी नहीं पूछा। और एक दिन जब मैं नाश्ता कर रहा था, वो तब मुझसे कुछ कहने की कोशिश कर रही थी.... पर ऑफिस जल्दी जाने की भागदौड़ में मैंने न तो उनकी पूरी बात सुनी और न ही बाद में जानने की कोई कोशिश की.. शिट!"

मुझे अचानक से वो दिन याद आने लगा जब मैं अपनी ही धुन में खोया, नाश्ता कर रहा थामम्मी बगल की कुर्सी में बैठ कर मेरी ओर देख रही थी और बीच-बीच में इमरान के कमरे के बंद दरवाज़े की ओर भी देख रही थी... मुझसे कुछ कहने की कोशिश कर रही थीपर मैंने ध्यान देना ज़रूरी नहीं समझा था.. जब मैं ऑफिस के लिए निकल रहा था, उस समय वो दरवाज़े के पास खड़ी मुझे जाते हुए देख रही थीउनके चेहरे के भाव ही ऐसे बन रहे थे कि मानो आज नहीं बोली तो शायद बहुत देर हो जाएगी।

मैंने सोचा भी था की ऑफिस से लौट कर घर में आराम करते हुए मम्मी से पूरी बात जान लूँगा। फिर ये सोच कर नहीं पूछा था कि शायद बीरभूम में स्थित हमारे घर की याद सता रही होगी, उसी के बारे में बात करना चाहती होगी।

कुछ दिन उस घर की याद आएगी, फिर खुद ही यहाँ ढल जाएगी। यहाँ मन लग जाएगा इनका

पर ऐसा क्या हो सकता है जिसने इनका दिल और दिमाग, दोनों को ही....

मुझे आगे सोचने लायक और कोई शब्द, कोई घटना, कोई बात... कुछ नहीं सूझा।

वैसे भी, विचारों की आँधी मेरे मन में जब चाहे तब बवंडर बना ही रहे थे पिछले कुछ समय से...

यह विचारों का ऐसा झूला था जो मुझे हर सेकंड एक छोर से दूसरे छोर पर फेंक रहा था।

मैं कॉफी का कप थामे बालकनी की ग्रिल पर टेक लगाकर खड़ा हो जाता और अपनी याददाश्त की परतों को उधेड़ने लगता। मैं इमरान और मम्मी के बीच हुई बातचीत के दौरान उनके चेहरों के हाव-भाव को याद करने की कोशिश करता।

मुझे याद आता कि कैसे जब इमरान मम्मी से बात करता था, तो उसकी आँखों में एक अजीब सी टकटकी और सम्मोहन होता था, पर साथ ही एक अजीब सा खिंचाव भी। और मम्मी? मम्मी जब इमरान की तरफ देखती थीं, तो शुरुआत में उनके चेहरे पर डर और सहम जाने के भाव होते थे, लेकिन अब... अब उन आँखों में एक नया संकोच था, एक ऐसी हया या झिझक थी जो कोई औरत किसी खास इंसान के सामने महसूस करती है। जब इमरान उनकी तारीफ करता, तो मम्मी की नजरें नीचे झुक जाती थीं और उनके गालों पर एक हल्की सी लाली छा जाती थी।

क्या यह किसी सम्मोहन का असर था? या फिर यह दो इंसानों के बीच पनपते किसी नए, अनकहे रिश्ते की शुरुआत थी? ये यादें मेरे कलेजे को आरी की तरह काट रही थीं।

इसी मानसिक उथल-पुथल, सिगरेट के धुएं और कॉफी की कड़वाहट के बीच, दोपहर के करीब तीन बजे, जब मैं अपनी डेस्क पर सिर पकड़े बैठा था... तभी अचानक मेरे दिमाग में एक बात कौंधी!

एक ऐसी बात, जिसने पल भर के लिए मेरी सांसें रोक दीं।

मुझे अचानक याद आया कि बीरभूम में रहने के दौरान, मम्मी की एक बहुत ही खास आदत थी। आदत क्या... एक तरह से कहा जाए तो उनके लिए वह एक 'ला-इलाज बीमारी' थी--- वह अपनी दिनचर्या, अपने मन की उलझनों, अपनी खुशियों और अपने सबसे गहरे राज़ को एक डायरी में लिखा करती थीं।

पापा के जाने के बाद तो उनकी यह आदत और भी गहरी हो गई थी

हर रात सोने से पहले, वह अपनी उस बंद डायरी में बीरभूम के उस शांत घर की खामोशियों को शब्दों में ढालती थीं। आस-पड़ोस की बातें, पड़ोसियों से हुई अनेकानेक बातें, वहाँ का वातावरण, बच्चे, बूढ़े, जवान, धूप-गर्मी, बरसात, सर्दी, इत्यादि। सब कुछ लिखती थीं वो... वह किसी से अपना दर्द नहीं बांटती थीं, बस उस पन्ने पर लिख देती थीं। उनकी अलमारी का वह कोना हमेशा उस डायरी का गवाह रहता था।

जैसे ही यह याद मेरे जेहन में आई, मेरा पूरा शरीर ठंडा पड़ गया।

"क्या..." दफ्तर के उस वातानुकूलित केबिन में बैठ-बैठे मुझे पसीना आने लगा,

"….क्या मम्मी अब भी लिखती होंगी? क्या इस बड़े शहर में, इस नए फ्लैट में आने के बाद भी उनकी वह 'बीमारी', वह आदत जिंदा होगी?"

और अगर वह अब भी लिखती हैं... तो क्या?

विचारों का एक भयानक बवंडर मेरे सिर में घूमने लगा। अगर मम्मी आज भी डायरी लिख रही हैं, तो क्या वह अपने भीतर आए इन बदलावों के बारे में लिख रही होंगी? क्या वह उस वाइन-रेड सलवार-सूट और उस बुटीक के सच के बारे में भी लिख रही होंगी? क्या उस डायरी के पन्नों पर इमरान का नाम दर्ज होगा? क्या वह इमरान के साथ बिताए उन एकांत पलों, उस बालकनी की रातों का सच लिख रही होंगी? और सबसे बढ़कर... क्या वह मेरे बारे में, मेरे इस बदले हुए शक्की मिजाज और मेरी इस घुटन के बारे में भी लिख रही होंगी?

और... इमरान... क्या उसके बारे में भी?!

"हे भगवान..." यह ख्याल आते ही मेरा दिल धक्क से रह गया!

ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरी छाती पर भारी पत्थर रख दिया हो। मेरी हथेली से कॉफी का प्लास्टिक कप छूटते-छूटते बचा। अगर वह डायरी इस शहर में, इस फ्लैट में मौजूद है... तो इसका मतलब था कि सारे सवालों के जवाब, सारे रहस्य, सारे काले और सफेद सच उस डायरी के पन्नों में कैद होंगे!

वह डायरी सिर्फ एक पन्ना नहीं थी, वह मेरी माँ की आत्मा का आईना थी। उसमें कोई झूठ नहीं हो सकता था। उसमें न तो इमरान की 'स्मार्ट टॉकिंग' का पर्दा हो सकता था और न ही मम्मी की झूठी मुस्कान का ढोंग। उसमें जो भी लिखा होगा, वह नग्न और कड़वा सच होगा।

मेरी आँखों के सामने दफ्तर का कंप्यूटर, कलीग्स और फाइलें सब धुंधली हो गईं। अब मुझे सिर्फ एक ही चीज़ दिखाई दे रही थीअपने फ्लैट की वह अलमारी, या मम्मी का वह सूटकेस, जहाँ वह डायरी छिपी हो सकती थी।

मेरा मन किया कि मैं अभी इसी वक्त सब कुछ छोड़-छाड़कर घर भाग जाऊं। जब तक मम्मी बाज़ार में हों या इमरान अपने कमरे में न हो, मैं उस डायरी को ढूंढ निकालूं और एक ही सांस में पढ़ डालूं कि आखिर इस घर की आबो-हवा में कौन सा ज़हर घुला हुआ है। लेकिन साथ ही, एक खौफनाक डर भी मेरे मन में बैठ गयाअगर उस डायरी में कुछ ऐसा लिखा हुआ निकला, जिसे पढ़ने के बाद मेरी माँ की छवि मेरे दिल में हमेशा के लिए चकनाचूर हो जाए, तो क्या मैं उस सच का बोझ सह पाऊंगा?

दफ्तर की घड़ी की सुइयां टिक-टिक कर रही थीं, पर मेरी जिंदगी का वक्त उस एक सवाल पर आकर ठहर गया थाक्या वह डायरी सच में लिखी जा रही थी?
 



To be Continued…
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#74
kamaal ka update
[+] 1 user Likes Sara Khan's post
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#75
Blockbuster and super excellent update!
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#76
very nice update
[+] 1 user Likes रसगुल्ला's post
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#77
It's being a long gap , could you please bring a big update
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#78
Waiting for update
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#79
please update
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#80
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