30-06-2026, 06:51 AM
bro next update
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Adultery FLAT MATE
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05-07-2026, 12:54 AM
Plzz update the story. It's getting very interesting & gripping.
14-07-2026, 10:53 AM
(19-06-2026, 03:22 PM)Tanisha. Wrote: Awesome update (19-06-2026, 03:48 PM)Usha Devi Wrote: Dhamaka, dhamadar aur danshu wriitngs (19-06-2026, 06:20 PM)The Mask of Zorro Wrote: Lajawab aur jabardast update (20-06-2026, 12:19 PM)garamrohan Wrote: लाजवाब लिखाई मित्र| आप सबका बहुत धन्यवाद।
14-07-2026, 10:54 AM
(30-06-2026, 06:51 AM)momass Wrote: bro next update (05-07-2026, 12:54 AM)royarnab26 Wrote: Plzz update the story. It's getting very interesting & gripping. (05-07-2026, 07:39 AM)Asli lund Wrote: Update sir ji (07-07-2026, 11:18 AM)momass Wrote: update (10-07-2026, 09:35 AM)momass Wrote: update Soon...
14-07-2026, 03:49 PM
wonderful story, I would request to add pic and gif for more engagement.
#add more pics and gif update
28-07-2026, 12:00 PM
What a great story you written in past and present also , please keep it up ,don't stop dear please , give a bombastic big update ,early as possible
30-07-2026, 11:51 PM
एपिसोड 17: खामोश सन्नाटा
डॉक्टर द्वारा बताए गए दो हफ़्तों के बेडरेस्ट और फिर कुछ दिन ऊपर की एहतियात को मिलाकर, पूरे बाईस दिनों के लंबे इंतजार के बाद आखिरकार वह दिन आया जब मैंने दोबारा अपनी सामान्य जिंदगी की पटरी पर कदम रखा। इतने दिनों तक फ्लैट के एक ही कमरे में, बिस्तर पर पड़े-पड़े मैं भीतर तक ऊब चुका था। पैर की पट्टियां तो खुल चुकी थीं, लेकिन जब बाईस दिन बाद मैंने पहली बार अपनी बाइक को स्टैंड से उतारा, तो पैर में एक हल्की सी जकड़न महसूस हुई। शुरुआत में थोड़ा मुश्किल हुआ; पैर पर वजन देकर किक मारना और क्लच-गियर का तालमेल बिठाना थोड़ा दर्दनाक था। लेकिन मुझे दफ्तर जाना ही था, कॉर्पोरेट की दुनिया ज्यादा दिन किसी का इंतजार नहीं करती। सो, मैंने थोड़ा दर्द सहा और बाइक स्टार्ट करके निकल पड़ा। इतने दिनों के लंबे और उबाऊ गैप के बाद वापस अपने दफ्तर की बिल्डिंग में कदम रखना सचमुच बहुत अच्छा लगा। जब आप एक दुर्घटना से उबरकर वापस आते हैं, तो काम का बोझ भी आपको बोझ नहीं, बल्कि जिंदगी की जीवंतता का अहसास कराता है। मेरे केबिन में कदम रखते ही दफ्तर के साथियों, गार्ड्स और स्टाफ के चेहरों पर जो मुस्कान थी, उसने मेरा दिल जीत लिया। कलीग्स ने मेरे ठीक होकर लौटने की खुशी में दफ्तर के ही कॉन्फ्रेंस रूम में शाम को एक छोटी सी वेलकम-बैक पार्टी भी रखी थी। समोसे, पेस्ट्री और चाय के दौर के बीच सबने मेरे एक्सीडेंट वाले दिन की बातें कीं और मेरा हौसला बढ़ाया। इसी मेल-मुलाकात और पेंडिंग पड़े कामों को थोड़ा-बहुत निपटाने के चक्कर में दफ्तर में वक्त का पता ही नहीं चला। जब मैंने घड़ी देखी, तो रात के काफी बज चुके थे। इतने दिनों बाद काम करने के कारण शरीर जवाब दे रहा था, पर मन में एक तसल्ली थी। जब मैं अपनी बाइक से अपने मोहल्ले में दाखिल हुआ और गली के आखिरी मोड़ से मैंने अपने फ्लैट की ऊंची इमारत की तरफ देखा, तो मेरी नजरें सीधे हमारी बालकनी पर गईं। वहां का दृश्य देखकर मेरी बाइक के एक्सीलेटर पर टिकी उंगलियां एक पल के लिए ढीली पड़ गईं। हॉल की मद्धम रोशनी बालकनी तक आ रही थी। वहाँ दो कुर्सियाँ लगी थीं। एक कुर्सी पर मम्मी बैठी थीं और दूसरी पर इमरान। दोनों बेहद डूबे हुए अंदाज में, धीमी आवाज में कोई गंभीर बात कर रहे थे। बीच-बीच में इमरान कुछ कहता, तो मम्मी सहमति में सिर हिलातीं। दूरी इतनी थी कि मैं उनके शब्द नहीं सुन सकता था, पर उनकी शारीरिक भाषा साफ बता रही थी कि दोनों के बीच अब शायद कोई अजनबीपन या संकोच नहीं बचा था... उनके पास ही एक स्टूल रखा था जिस पर शायद कप या गिलास रखे हुए थे.... मम्मी आराम से कुर्सी से टेक लगा कर बैठी थी और इमरान अपनी जगह पे बैठा, तनिक आगे की ओर झुका हुआ था.. उसके हाथों की गति और एक्शन से लगा की किसी बात को लेकर वह बहुत उत्तेजित है. ऐसी क्या बात हो सकती है...? यह सोच कर मैं जैसे ही आगे बढ़ा, मुझे इमरान के कमरे की जलती नीली लाइट दिखाई दी. दरअसल उसने दो नाईट बल्ब लगा रखे थे... नीली बल्ब वह तब जलाता था खास कर, जिस रात को उसे पोर्न देखना होता था... उस दिन देर शाम से ही नीली लाइट ऑन कर के रखता था... उसके इस आदत के बारे में पूछने पर कहा था की उसे फेटिश है... और जब हरे बल्ब के बारे में पूछा था तब कुछ कहने के बजाए बस हँस दिया था.. पता नहीं इसमें क्या फेटिश है! तो आज भी इसी नीली लाइट को जलते देख कर मुझे आश्चर्य तो नहीं होना चाहिए था लेकिन अचानक मेरे दिल में एक अंजाना डर घर कर गया... डर आखिर था किस बात का पता नहीं, लेकिन एक गज़ब सी बेचैनी से जी भर गया... जब दोबारा उसके कमरे की ओर नज़रें गयीं तो इस बार कुछ भी कहने के लिए शब्द ही नहीं रहे... कारण था, उस कमरे की नीली रौशनी में फैली एक अजीब सी धुआँ--- बड़ी हल्की सी--- पूरे कमरे को अपने आगोश में लिए! और यहाँ… मम्मी में आ रहा यह अप्रत्याशित और गहरा बदलाव मुझे बहुत ज्यादा अजीब लगा। मेरा दिमाग सुन्न होने लगा। आखिर इतना बड़ा बदलाव क्यों और कैसे आ रहा है उनमें? जो माँ कुछ दिन पहले तक इस लड़के के साये से खौफ खाती थी, उसकी अनुपस्थिति में सांस लेती थी, वह आज आधी रात को उसके साथ बालकनी में इतनी सहजता से बैठकर बतिया रही है? बात क्या है? क्या बीरभूम की वो संभ्रांत महिला इस अजनबी शहर के तौर-तरीकों में ढल रही थी, या फिर इमरान ने उनके इस सीधेपन का कोई गलत फायदा उठा लिया था? तमाम सवाल मेरे दिमाग के दरवाजों पर दस्तक दे रहे थे, पर उस समय मेरे भीतर ज्यादा सोचने या विश्लेषण करने का दम नहीं बचा था। इतने दिनों के बेडरेस्ट के बाद अचानक दिनभर भागदौड़ करना और दफ्तर का तनाव झेलना—शारीरिक रूप से मैं अंदर तक बुरी तरह थक चुका था। हड्डियों में एक मीठा सा दर्द था और आँखें नींद के बोझ से झुकी जा रही थीं। मैंने बाइक पार्क की, ऊपर आया। मम्मी ने दरवाजा खोला, उनके चेहरे पर एक शांत भाव था। मैंने दोनों को 'गुड नाइट' कहा, कपड़े बदले और सीधे अपने बिस्तर पर ढह गया। सिर्फ एक बार ही मुझसे खाने के बारे में पूछी मम्मी... मैंने मना कर दिया। इमरान भी आया था पूछने, उसे भी वही जवाब दिया मैंने। और बड़ी हैरानी की बात की सिर्फ एक बार पूछ कर ही दोनों अपने में व्यस्त हो गए... मम्मी किचन में कुछ करने लगी थी और इमरान मुझे और मम्मी को गुड़ नाईट बोल कर अपने कमरे में जा कर अंदर से दरवाज़ा बंद कर दिया था. कमरे में अंधेरा था…. पंखा अपनी धीमी रफ्तार में घूम रहा था.. मैं तकिए पर सिर रखकर गहरी नींद की आगोश में समाने ही वाला था कि तभी... अचानक एक ठंडी बिजली सी मेरे दिमाग में कौंधी। एक ऐसी बात, एक ऐसा विचार मेरे जेहन में आकर ठिठक गया, जिसे इस बार चाहकर भी, किसी भी सूरत में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता था। नींद का वह गहरा खुमार पल भर में हवा हो गया और मेरी आँखें अंधेरे कमरे की सीलिंग को घूरने लगीं। वह बात यह थी कि... बीरभूम से लेकर इस महानगर के सफर तक, मेरा एक नियम था। जब भी मैं रात को दफ्तर से लेट होता था, या किसी फंक्शन के कारण मुझे घर लौटने में जरा भी देरी होती थी, तो मम्मी का एक के बाद एक मैसेजेस और कॉल्स आने का अंतहीन सिलसिला शुरू हो जाता था... "कहाँ पहुंचे?", "देर क्यों हुई?", "रास्ते में हो या ऑफिस में?"—ये वो सवाल थे जो उनके डर और ममता की गवाही देते थे। उनका फोन तब तक नहीं थमता था जब तक कि मेरे कमरे के दरवाजे की कुंडी नहीं खटक जाती थी। लेकिन आज... आज मैं पूरे बाईस-तेईस दिनों के बाद पहली बार ऑफिस गया था। आज मुझे रात को लौटने में इतनी देर भी हो गई थी। पर आज पूरे दिन और पूरी शाम में, मम्मी की तरफ से एक बार भी, एक सिंगल कॉल या मैसेज नहीं आया था!! उन्हें यह जानने की उत्सुकता भी नहीं हुई कि उनका बेटा, जो अभी-अभी एक बड़े एक्सीडेंट से उठा है, वह सही-सलामत ऑफिस पहुंचा या नहीं? वह रात को किस हाल में घर लौट रहा है? आखिर क्यों? क्या इसलिए कि उनका ध्यान अब पूरी तरह से इमरान की बातों में बंट चुका था? या फिर इमरान ने जानबूझकर उन्हें मुझसे दूर, उलझा रखा था ताकि उनका ध्यान मेरे फोन से हट जाए? खामोश पड़े मेरे मोबाइल की स्क्रीन अंधेरे में चमक रही थी, जिसमें मम्मी का कोई मिस्ड कॉल नहीं था यह खामोश घंटी किसी बड़े और खौफनाक तूफान के आने की पहली आहट थी, जिसने मेरे बेडरेस्ट के सुकून को एक झटके में उड़ाकर रख दिया था। To be Continued….
01-08-2026, 10:08 AM
Good story and interesting... Please post big update
01-08-2026, 12:43 PM
Wonderful update.
Waiting for next.. Iss baar jaldi dena.
06-08-2026, 10:30 AM
(This post was last modified: 06-08-2026, 10:34 AM by The_Writer. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
एपिसोड 18: अंतर्मन की उलझनें
शारीरिक चोटें वक्त के साथ भर जाती हैं… पट्टियां खुल जाती हैं, घाव सूख जाते हैं, और हड्डियां फिर से शरीर का बोझ उठाने के काबिल हो जाती हैं…। मुझे पूरा विश्वास था कि एक्सीडेंट के इस शारीरिक दर्द से मैं आज नहीं तो कल पूरी तरह उबर जाऊंगा। लेकिन उस मानसिक ज़ख्म का क्या, जो हर गुजरते पल के साथ मेरे दिल को छलनी किए जा रहा था? एक ऐसा ज़ख्म, जिसे मैंने खुद अपने ही हाथों से, और शायद अपने ही ख्यालों से कुरेदा था। मुझे ना चाहते हुए भी, अपनी ही माँ पर शक हो रहा था। यह सोचना भी पाप जैसा था, घिनौना था। एक बेटा, जो अपनी माँ को दुनिया में सबसे पवित्र मानता हो, वही आज उनके चरित्र और व्यवहार की परतों में कोई खौफनाक सच ढूंढ रहा था। मेरा शक सिर्फ मेरी मम्मी पर नहीं था, बल्कि उस लड़के पर भी था जो मेरा फ्लैटमेट होने के साथ-साथ इस अनजान शहर में मेरा सबसे अच्छा दोस्त बन चुका था—इमरान। उस रात, जब मैंने उन दोनों को आधी रात को बालकनी में इतनी सघन आत्मीयता से बैठ कर बात करते देखा था, आज उस बात को पूरे पांच दिन बीत चुके थे। इन पांच दिनों में पूरा घर एक अजीब से ठंडे युद्ध का मैदान बन चुका था, जहाँ ऊपरी तौर पर सब कुछ शांत था, लेकिन सतह के नीचे संदेह का लावा उबल रहा था। इन पांच दिनों में दो बार ऐसी घटनाएं घटीं, जिन्होंने मेरे इस बेबुनियाद शक की आग में घी डालने का काम किया… कभी-कभी बिस्तर पर लेटे हुए मेरा तार्किक मन मुझसे कहता था कि शायद मैं ही गलत हूँ--- हो सकता है कि मैं ही उन सामान्य, रोजमर्रा की घटनाओं को एक खास, संदेहास्पद ढांचे में ढालकर देखने लगा था। जब इंसान के दिमाग में एक बार शक का भूत सवार हो जाता है, तो उसे सामने वाले का सांस लेना भी एक साज़िश की तरह लगने लगता है… लेकिन मेरा अंतर्मन चीख-चीख कर कह रहा था कि मैं इतना भी गलत नहीं हो सकता। बीरभूम का वह सीधा-साधा देव इतना शक्की कैसे हो सकता है, जब तक कि उसे वाकिफ तौर पर कुछ खटक न रहा हो? मैं अपनी माँ पर शक नहीं करना चाहता था, भगवान कसम मैं अपनी आँखों को अंधा कर लेना चाहता था, लेकिन जो दृश्य मेरे सामने आ रहे थे, वे मुझे किसी और ही अंधकार की ओर ढकेल रहे थे। पहली घटना तीन दिन पहले की है। उस दिन दफ्तर में हाफ-डे था, इसलिए मैं दोपहर के करीब ढाई बजे ही फ्लैट पर लौट आया था। मैंने सोचा नहीं था कि मैं इतनी जल्दी घर पहुंच जाऊंगा। जब मैंने बेहद खामोशी से मुख्य दरवाजे का लॉक खोला और अंदर दाखिल हुआ, तो हॉल में अजीब सा सन्नाटा था। रसोई से कोई आवाज नहीं आ रही थी। तभी मुझे इमरान के कमरे से धीमी फुसफुसाहट सुनाई दी। मेरे कदम अपने आप उस बंद दरवाजे की तरफ बढ़ गए। दरवाजा पूरी तरह बंद नहीं था, उसमें एक हल्की सी दरार थी। मैंने जब उस दरार से अंदर झांका, तो मेरी छाती के भीतर की धड़कनें जैसे थम गईं। कमरे की खिड़की के पर्दे गिरे हुए थे, जिससे वहां एक मद्धम, पीली-सी रोशनी फैली थी। इमरान अपने बेड के किनारे बैठा था, और उसके ठीक बगल में, बेहद करीब, मम्मी बैठी थीं। मम्मी की पीठ मेरी तरफ थी, लेकिन इमरान का चेहरा साफ दिख रहा था। वह बहुत ही गंभीर, लगभग सम्मोहित लहजे में कुछ कह रहा था और उसके बगल में एक चेयर पर वही पुरानी, धूल-धूसरित रजिस्टर -सा खुला हुआ था, जिसे मैंने उस रात उसके लैपटॉप के बगल में देखा था। इमरान बनियान और हाफ-पैंट में बैठा था… मम्मी, जैसा कि जाहिर है, साड़ी में थी… पर वो एक बात जिसने मेरे गले में हिचकी पैदा कर दी थी, वो कभी भी भुलाए नहीं भूलूँगा। मैं चूँकि मम्मी के पीछे खड़ा था, इसलिए मैंने बड़े अच्छे से ही देखा की मम्मी के कंधे पर से उनकी साड़ी का पल्लू वाला हिस्सा मिसिंग था! मैं मामले को समझ नहीं पाया। थोड़ा और गौर किया तो इतना ही अंदाज़ा लगा पाया की उन्होंने पल्लू वाला हिस्सा कंधे पर से नीचे सरका रखा था, और यही कारण था कि रह-रह कर इमरान की नज़र उनके गले से नीचे ठहर जा रही था... ठीक सीने के आसपास! मेरे बदन में आग लग गई थी… पर आग थी कैसी, ये समझ में नहीं आया था… अत्यधिक गुस्से की, उत्तेजना की, या मेरे किसी अप्रकट जिज्ञासा की? आज भी मेरे दिमाग में जब इस रात का सीन तैरता है, तब एक उत्कंठा स्वयं ही जाग जाती है कि, 'क्या उस रात मेरी मम्मी वाकई अपना पल्लू अपने सीने से अलग कर के, हटा कर रखी थी?' 'और अगर सच में की थी, तो क्या वो डिसेंट ब्लाउज में थी, या फिर लो-कट में?' 'वैसे, ब्लाउज चाहे जैसी भी रही हो, क्या इमरान को उस ब्लाउज में उनकी क्लीवेज दिख रही थी?' 'अगर दिख रही थी तो उसका बार-बार उनके सीने की ओर देखना समझ में आता है, लेकिन अगर नहीं दिख रही थी तो, तो भी वो क्यों उस तरफ देख रहा था?' 'क्या बिना पल्लू के ब्लाउज में कैद किसी महिला के सीने को देखना वाकई बड़ा आनंददायक होता है?' 'या फिर शायद वो इस बात से बहुत खुश था की एक व्यस्क महिला बिना आँचल के उसके सामने यूँ बैठी है, और शायद अब उनकी क्लीवेज और साथ ही, चूचियों का ऊपरी हिस्सा भी दिख जाए?' इन सब सवालों के साथ एक सवाल ऐसा भी था जिसे मैं किसी भी कीमत पर अपने मन-मस्तिष्क में दौड़ाने के बावजूद भी उस सवाल के अस्तित्व के बारे में सोचना तक नहीं चाहता था.... और यह था कि... 'उस दिन वो पल्लू अपने आप ही धीरे से सरक गया था और शायद पता नहीं चला था? या शायद मम्मी ने ही हटाया हो... पर मम्मी अचानक ऐसा क्यों करेगी? औ... और.... कहीं ऐसा तो नहीं कि... कि... इमरान ने हटवा दिया हो.... या कहीं उसी ने तो.....!' मुझसे आगे सोचा नहीं गया. एक सच स्वीकार करना हो तो ये ज़रूर कहूँगा की इस दृश्य को देख कर मेरे मन कई तरह की भावनाएँ जागने लगीं थीं और इसी से मेरे कमर के नीचे के अंग में एक तनाव महसूस होने लगा था! अचानक, इमरान ने अपना दाहिना हाथ आगे बढ़ाया और मम्मी के सिर पर, उनके बालों को सहलाते हुए धीरे से अपना हाथ रख दिया। मम्मी ने उसे रोका नहीं… वह बस सिर झुकाए रही… उनके कंधे हल्के से कांप रहे थे, जैसे वह रो रही हों या किसी गहरे सदमे में हों… या फिर कुछ ऐसा, जिसे सुन या सोचने भर से बेचारी काँप रही है.... या शायद इमरान के इस तरह से उनके सर पर हाथ रखने की वजह से काँप गयी हो?! "आपको बस मुझ पर भरोसा रखना होगा...," इमरान की यह बेहद धीमी आवाज मेरे कानों में पड़ी। एक शक्की और परेशान बेटे के नजरिए से वह दृश्य किसी भयानक दुःस्वप्न जैसा था। एक जवान लड़का, मेरी माँ के इतने करीब बैठकर, उनके सिर को सहलाते हुए बंद कमरे में क्या बातें कर रहा था? आखिर किस भरोसे की बात कर रहा था? और मम्मी इस तरह से क्यों बैठी हुई है? इमरान इतनी बेबाकी से मम्मी के सर पर कैसे हाथ रख दिया और इस पर मम्मी ने रियेक्ट क्यों नहीं किया? इन सवालों के नींव ने एक नए सवाल का ईंट रख दिया... 'जिस बेबाकी से उसने मम्मी के सर पर हाथ रखा है, क्या वो कहीं और भी हाथ रखता हो.....!' मेरा खून खौल उठा… मेरा मन किया कि मैं दरवाजा लात मारकर खोलूं और इमरान का कॉलर पकड़कर उसे दीवार से टांग दूँ… लेकिन मर्यादा और अपनी माँ के सम्मान की खातिर मैंने खुद को रोका। मैं भारी कदमों से पीछे हटा और मुख्य दरवाजे को दोबारा जोर से बंद किया, ताकि उन्हें मेरे आने की आहट मिल जाए। जब मैं दोबारा हॉल में आया, तो मम्मी इमरान के कमरे से बाहर निकल रही थीं, उनके चेहरे पर एक अजीब सी घबराहट और बिखराव था, जिसे देखकर मेरा शक और गहरा हो गया। दूसरी घटना कल देर शाम की है, जिसने मेरे सोचने-समझने की शक्ति ही छीन ली… मैं अपने कमरे में लेटा हुआ था… घर में बत्तियां बुझ चुकी थीं, सिर्फ हॉल की एक छोटी सी नाइट-बल्ब जल रही थी। मुझे प्यास लगी, तो मैं पानी पीने के लिए हॉल की तरफ बढ़ा। तभी मैंने देखा कि रसोई के पास वाले गलियारे में दो परछाइयां खड़ी थीं… मम्मी और इमरान। हॉल की मद्धम रोशनी में उनका केवल अक्स दिख रहा था। इमरान ने अपने हाथ में कोई छोटी सी चीज़ पकड़ रखी थी—वह कोई ताबीज जैसी चीज़ थी या कोई अजीब सा गहना, मैं साफ देख नहीं पाया। उसने वह चीज़ मम्मी की तरफ बढ़ाई। मम्मी ने पहले थोड़ा संकोच करते हुए अपने हाथ पीछे खींचे, जैसे वह मना कर रही हों। तभी इमरान एक कदम और आगे बढ़ा… उसने मम्मी का हाथ अपने हाथों में लिया और जबरन वह चीज़ उनकी हथेलियों के बीच रख दी। इसके बाद जो हुआ, उसने मेरे अंतर्मन को पूरी तरह झकझोर दिया। इमरान ने झुककर मम्मी के कानों में कुछ फुसफुसाया। वह दूरी इतनी कम थी कि दोनों के चेहरे लगभग एक-दूसरे को छू रहे थे। मम्मी ने अपनी आँखें बंद कर लीं और उस चीज़ को अपनी छाती से भींच लिया। एक सामान्य इंसान के लिए यह शायद किसी बड़ी मुसीबत से उबरने का कोई गुप्त उपाय या कोई पारिवारिक बातचीत हो सकती थी, लेकिन मेरे अंदर बैठा शक्की देव इस दृश्य को देखकर कुछ और ही सोचने पर मजबूर हो गया था। मेरे दिमाग में इमरान का वह लैपटॉप पर मम्मी की तस्वीरों को ज़ूम करके देखना, उनके पहनावे के बारे में बारीक पूछताछ करना, और फिर मम्मी का उसके सामने इस तरह पूरी तरह समर्पित हो जाना—ये सारी कड़ियां जुड़कर एक खौफनाक और घिनौनी तस्वीर बना रही थीं। क्या इमरान मेरी माँ को सम्मोहित कर चुका था? पर वो ऐसा क्यों करेगा? ऐसा करने से उसे क्या फायदा होगा? या फिर मम्मी खुद अपनी मर्जी से इस लड़के के किसी ऐसे जाल में फंस चुकी थीं, जहाँ से वापसी का रास्ता बंद था? मैं रातभर अपने बिस्तर पर करवटें बदलता रहा। एक तरफ मेरी माँ थीं, जिन्होंने मुझे पाल-पोसकर बड़ा किया, जिनके संस्कारों पर मुझे कभी संदेह नहीं था। दूसरी तरफ मेरा वह दोस्त था, जिसने मेरे एक्सीडेंट में अपनी जान लगा दी थी। और इन दोनों के बीच में खड़ा था मैं—एक ऐसा अभागा बेटा, जो अपनी ही आँखों पर यकीन करने और अपने संस्कारों को बचाने की इस भयानक जंग में हर रोज थोड़ा-थोड़ा मर रहा था। मेरे शक का दायरा अब इतना बढ़ चुका था कि मुझे इस फ्लैट की हर एक दीवार, हर एक कोना एक खौफनाक राज छुपाए हुए मालूम पड़ता था। और... उस रात को इमरान के कमरे में दिखे धुएँ का क्या? वो आखिर किस चीज़ का धुआँ था? मैंने पहले कभी ऐसा कुछ इमरान के कमरे में नहीं देखा था.... पर अब क्यों…? To be Continued….
06-08-2026, 01:56 PM
What a fabulous update, just a small request, could it be little bit big update
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