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Adultery Adventure of sam and neha
मैंने मुख्य गेट बाहर से बंद किया।

अंदर देखा तो नेहा एक हाथ में बोतल और दूसरे में ग्लास लिए पैग बना रही थी।

उसके जिस्म पर सिर्फ़ एक क्रीम कलर की पैंटी थी।

अगर कोई दूर से देखता तो वो भी नजर नहीं आती।

उसकी पूरी देह नंगी चमक रही थी — पसीने से, नशे से, और उत्तेजना से।

मेरे सीने में एक अलग ही जलन हो रही थी।

गुप्ता जी का वो शब्द बार-बार मेरे दिमाग में गूँज रहा था — “रंडी साली”।

मैंने कोने में खड़े गुप्ता जी को देखा।

मेरे दिमाग में घूम रहा था — कैसे और क्या बोलूँ?

क्या सीधे जाकर थप्पड़ मार दूँ और बोलूँ — “साले गुप्ता... मदरचोद... क्या बोल रहा था मेरी बीवी के बारे में?”

मेरे हाथ अपने आप मुट्ठी में बंद हो रहे थे।

मैं धीरे-धीरे उनकी तरफ़ बढ़ा।

थोड़ी देर बाद मुझे गुप्ता जी की शक्ल साफ़ दिखने लगी।

आज वो बिल्कुल अलग लग रहे थे।

जो शक्ल पहले मुझे घर के बड़े बुज़ुर्ग जैसी लगती थी, आज वो मुझे बेहद खींची हुई, घटिया और घिनौनी लग रही थी।

नशे में उनकी आँखें सूजी हुई थीं, मुँह थोड़ा खुला हुआ था, और सिगरेट पीते हुए भी उनकी नज़र हमारे घर की तरफ़ ही थी।

मैं उनके करीब पहुँच गया।

मेरे अंदर गुस्सा अभी भी उबाल खा रहा था।

सम: (सख्त आवाज़ में)

“अंकल, आपने अभी क्या कहा था?”

गुप्ता जी ने सिगरेट का कश लिया, नशे में मुस्कुराते हुए सिगरेट का डिब्बा मेरी तरफ़ बढ़ाया।

मैंने ले भी लिया।

अजीब लग रहा था — जिस आदमी ने अभी थोड़ी देर पहले मेरी बीवी को गाली दी, उसी से मैं सिगरेट ले रहा हूँ और “आप” कह रहा हूँ।

गुप्ता जी: “क्या कहा था बेटा?

सम: (आवाज़ और तेज़ करते हुए)

“‘रंडी साली’ कहा था ना? मैंने साफ़ सुना है।”

गुप्ता जी एक पल के लिए रुके, फिर मुस्कुराए। उन्होंने एक लंबा कश लिया और मेरे चेहरे पर धुआँ छोड़ते हुए बोले,

गुप्ता जी: “अरे कुछ नहीं बेटा...

नशे में अक्सर पुरानी बातें याद आ जाती हैं।

वही सोच रहा था... पता नहीं मुँह से गाली निकल गई।

आज पी भी बहुत है...”

मुझे लग रहा था कि ये आदमी कहानी बना रहा है, लेकिन मैं चुप रहा।

मैंने सिगरेट का एक कश लिया और धुआँ छोड़ते हुए थोड़ा दोस्ताना अंदाज़ में पूछा,

सम: “क्या याद आ गया अंकल?”

मैं झूठ को कुरेदना चाहता था। गुप्ता जी की आँखों में देखना चाहता था कि वो कितना और झूठ बोलता है।

गुप्ता जी ने मेरी तरफ़ देखा। नशे में उनकी आँखें लाल थीं। उन्होंने एक और कश लिया और धुआँ छोड़ते हुए बोले,

गुप्ता जी: “कुछ नहीं बेटा...

एक रंडी की याद आ गई बस।

तुझे लगेगा uncle क्या बकवास कर रहे हैं, इसलिए रहने दे।”

मैंने हल्का सा मुस्कुराते हुए कहा,

सम: “नहीं अंकल...

यहाँ कोई बच्चे तो हैं नहीं। सब समझते हैं।

बताओ... मैं भी थोड़े मज़े ले लूँ आपकी कहानी में।”

गुप्ता जी ने मुझे कुछ देर तक देखा। फिर उनकी नशे वाली मुस्कान और गहरी हो गई। उन्होंने सिगरेट का बट नीचे फेंका और बोले,

गुप्ता जी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा। नशे की वजह से उनका थोड़ा वजन मेरे ऊपर आ गया था।

गुप्ता जी: (नशे में भारी आवाज़ में)

“कुछ नहीं यार... तू बच्चा नहीं तो क्या... मेरे बराबर का तो नहीं ना बेटा...”

मैंने गहरी साँस ली और थोड़ा आगे बढ़कर कहा,

सम: “आप बहुत नशे में हो अंकल... शायद अभी बता दो। होश में तो नहीं बता पाओगे।”

गुप्ता जी ने सिगरेट का एक लंबा कश लिया। धुआँ छोड़ते हुए बोले,

गुप्ता जी: “कुछ नहीं... 4-5 साल पहले मेरी पोस्टिंग हैदराबाद में हुई थी। मैं अकेला ही गया था। तेरी आंटी यहीं थीं।”

उन्होंने फिर कश लिया और आगे बोले,

गुप्ता जी: “वहाँ ऑफिस में एक लड़की काम करती थी... ‘स्वीटी’। लड़की क्या थी... मादरचोद पूरी औरत ही थी। साँवली स्किन... मोटी... भारी-भारी मम्मे...”

गुप्ता जी ने एक हाथ से स्तनों का साइज़ दिखाते हुए इशारा किया।

गुप्ता जी: “पहले हफ्ते में ही पता चल गया था कि साली पूरे ऑफिस से चुद चुकी थी वो रंडी। जब कोई रात में काम करने के लिए बोलता, भेन की लौड़ी तैयार हो जाती ‘काम करने’ के लिए उसके साथ।”

मैं चुपचाप सुन रहा था।

गुप्ता जी: “मैं बॉस था... मगर मेरे कानों में भी खबर पड़ती थी कि किसने उसे रात को किस टेबल पर चोदा है। एक बार तो अकाउंट्स वाले लड़के ने उसे कन्फ्रेंस रूम की टेबल पर लिटा के...”

गुप्ता जी रुक गए और मेरी तरफ देखा। नशे में उनकी आँखें चमक रही थीं।

प्ता जी ने सिगरेट का एक और कश लिया। नशे में उनकी आवाज़ थोड़ी भारी हो गई थी।

गुप्ता जी: “अरे यार... ऑफिस में स्मोकिंग ब्रेक के दौरान जो गॉसिप सुनता था ना... वो सुनके ही समझ जाता था कि साली कितनी चुद चुकी है।”

उन्होंने मेरी तरफ देखा और आगे बढ़ाया,

गुप्ता जी: “लोग कहते थे — ‘उसने कन्फ्रेंस रूम में चुदवाया’, ‘कार में Blowjob दी’, ‘रात को ऑफिस की टेबल पर चोदा’, ‘पूरे टीम को सर्विस दे रही है’... सब यही बातें करते थे।”

मुझे शुरू में लगा था कि वो लड़की इतनी भी खास सुंदर नहीं है। हाँ, रंग साँवला था लेकिन शरीर में वो चरबी भरी हुई थी — भारी मम्मे, मोटी जाँघें, मोटी गांड़।

गुप्ता जी: “पहले हफ्ते में ही समझ में आ गया था कि साली की अर्ध salary भी कोई नहीं देगा उसे बाहर। इतनी गलतियाँ करती थी... एक-एक प्रोजेक्ट में लाखों का नुकसान कर रही थी।”

उन्होंने धुआँ छोड़ते हुए कहा,

गुप्ता जी: “इसीलिए job बचाने का उसका अपना तरीका था।

Job बचाने के लिए लड़के boss की चाट ही है... और ये तो सच में चाट रही थी।”


मैं चुपचाप सुन रहा था।

गुप्ता जी: “एक दिन उसकी गलती से एक बड़ा कॉन्ट्रैक्ट लगभग चला गया था। मैंने चीखकर कहा — ‘Miss Sweety... ये क्या है? इतनी मिस्टेक्स? ये सब मुझे करना पड़ेगा!’”

गुप्ता जी हँस पड़े और आगे बोले,

गुप्ता जी: “वो घबरा गई। बोली — ‘Sorry Sir...’

फिर मेरी तरफ देखकर बोली, ‘आप यहाँ ऑफिस में करेंगे या गेस्ट हाउस में जो कंपनी ने आप दिया है?’

गुप्ता जी का हाथ मेरे कंधे पर था। नशे की वजह से उनका थोड़ा वजन मेरे ऊपर आ रहा था। अब मुझे उनकी कहानी थोड़ी सच लगने लगी थी।

मैंने सिगरेट का कश लेते हुए थोड़ा मजाकिया लेकिन सीधा सवाल किया,

सम: “आपने मना कर दिया?”

मैं जानता था कि ये भोसड़ी के दीवार के छेद को ना बख्शेगा।

फिर भी मैंने मज़े लेने के लिए कहा।

गुप्ता जी मेरी तरफ देखा। उनकी आँखें नशे से लाल थीं। उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ और कस लिया और बोले,

गुप्ता जी: “अरे बेटा... मैं तुझे ये trust करके बता रहा हूँ। तेरे और मेरे बीच की बात है... बाहर न जाए। खासकर आंटी को।”

मैं हल्का सा मुस्कुराया।

सिगरेट खत्म हो चुकी थी। मैंने उसे नीचे फेंक दिया और कुचल दिया। फिर उसी हाथ से — जिस हाथ में अभी-अभी सिगरेट थी — मैंने अपने लंबे कुर्ते के ऊपर से अपना लंड मसलना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे, 30 सेकंड तक।

गुप्ता जी ने ये देख लिया, लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस मुस्कुरा दिए।

गुप्ता जी: “उस रात वो आई...

घर से खाना बनाकर लाई। दाल-चावल, सब्जी, रोटी... सब। पहले हमने साथ में खाना खाया। हँसी-मज़ाक किया।”

उन्होंने धुआँ छोड़ते हुए कहा,

गुप्ता जी: “खाना खत्म होने के बाद... मादरचोद उसको मैंने रात भर खाया।

पता चला कि वो इतनी पॉपुलर क्यों थी। जिस अदा से वो सब करती थी... वो अलग ही थी।”

गुप्ता जी मेरे कंधे पर हाथ रखे हुए थे। नशे में उनकी आँखें चमक रही थीं।

गुप्ता जी: “3-4 बार मैंने उसे बजाया... जैसा चाहा, वैसा।

उसने कुछ भी करने से मना नहीं किया।

मैंने उसे घुटनों पर बैठाया, मुँह में डाला... वो गले तक ले गई। बिना किसी शिकायत के।

पीछे से लिया, सामने से लिया, साइड से लिया... जो मन किया।”

वो रुककर मुस्कुराया और बोला,

गुप्ता जी: “तेरी आंटी ने तो शादी की शुरुआत में लंड को बस चूमा था।

थोड़ा-बहुत मुँह में लेने की कोशिश भी की थी... बोलती थी, ‘बहुत बड़ा है... मोटा है...’

मगर उसके गले तक कभी नहीं गया।”

गुप्ता जी ने मेरी तरफ देखा। उनकी नज़र में नशा और यादों का मिश्रण था।

गुप्ता जी: “मगर स्वीटी... वो तो गले तक ले गई।

मुझे उसके गले की मसल्स मेरे लंड के टोपे पर महसूस हुईं।

जैसे वो निगल रही हो... और वो भी बिना रुके।

उसकी आँखों में आँसू आ गए थे... मगर उसने मना नहीं किया।

बल्कि खुद आगे बढ़कर और गहरा लेने की कोशिश कर रही थी।”

गुप्ता जी: “अक्सर वो रात को आने लगी थी... मेरे बिस्तर को गर्म करने।

घर से खाना बनाकर लाती, खाना खिलाती, और फिर रात भर मेरे नीचे रहती।”

उन्होंने सिगरेट का कश लिया और मेरी तरफ देखते हुए कहा,

गुप्ता जी: “एक रात दोनों को दारू चढ़ी हुई थी। मैंने उसे सीधा सवाल किया — ‘तू ऑफिस में किस-किस से चुद चुकी है?’”

गुप्ता जी रुककर हँसे, लेकिन उनकी हँसी में गुस्सा भी था।

गुप्ता जी: “मादरचोद... उसने जो जवाब दिया, उससे मुझे गुस्सा आ गया।

ऑफिस स्टाफ के अलावा... ये भेन की लौड़ी ऑफिस के पीऑन से भी चुद चुकी थी।”

मैंने गुप्ता जी को देखा।

गुप्ता जी: “ऑफिस में एक 55 साल का बूढ़ा पीऑन था... नाम था रघु। कभी-कभी वो नहीं आता था तो अपने बेटे को भेज देता था।

और ये साली... दोनों के सामने अपनी टाँगें खोल चुकी थी।

बाप के सामने भी और बेटे के सामने भी।”

गुप्ता जी फिर से बोलने लगे।

इस बार उनकी पकड़ मेरे कंधे से हटकर मेरी पीठ पर चली गई और फिर धीरे-धीरे मेरी गर्दन पर आ गई। उनकी उँगलियाँ अब मेरी गर्दन को थोड़ा दबा रही थीं।

गुप्ता जी: (नशे में भारी और कड़वे स्वर में)

“तब मुझे लगा था कि ये साली मज़े के लिए चुदवाती है...

मगर जो मुँह उसने नौकर बाप के मुँह में डाला, तो बेटे के और मेरे मुँह में क्यों डाला?”

अचानक उनकी बात में कड़वाहट बढ़ गई।

गर्दन पर उनकी पकड़ और मजबूत हो गई।

गुप्ता जी: (आवाज़ में गुस्सा और जलन)

“बता ना... क्या जरूरत थी?

बेटे के साथ... मादरचोद बता...

तुम शाहर में चुदवा रहे हो... मगर मेरे बेटे के पीछे क्यों पड़ी है... रंडी साली...”

आखिर वो शब्द फिर से उनकी जुबान पर आ ही गया।

“रंडी साली”

गुप्ता जी की गर्दन वाली पकड़ और “रंडी साली” वाली गाली अब समझ में आ गई थी।

वो असल में राहुल को रोकना चाहते थे।

पता नहीं क्यों, मुझे लगा कि वो थोड़ा jealous भी थे।

गुप्ता जी ने मेरे कंधे पर हाथ रखे हुए ही बोलना जारी रखा। उनकी आवाज़ अब और भारी और कड़वी हो गई थी।

गुप्ता जी: “आज मैंने उस पर हाथ उठाया...

आज के बाद वो नेहा... और वो लड़की... सब खत्म।

इसको IIT जाना है।

और ये अभी से चूतों के चक्कर में लग गया है।”

मैं चुपचाप सुन रहा था।

“एक बार पढ़ाई कर ले... IIT चला जा... अच्छा पैसा कमा...”

“भेंचोद... फिर देखना...

नेहा जैसी चूतों की लाइन लग जाएगी बेटे के पीछे!

पैसा होगा तो सब रंडियाँ अपने आप आ जाएँगी...”

उनकी बात सुनकर मेरे मुंह से निकला

मेरा दिमाग “नेहा जैसी चूतों” वाले शब्द पर अटक गया था।

जैसे वो नेहा को किसी प्रकार की चीज बना रहे हों — एक टाइप, एक कैटेगरी।

उसे मोटी स्वीटी से कंपेयर कर रहे हों।

मुझे गुस्सा आ गया।

सम: (गुस्से में, आवाज़ कड़क कर)

“ओये भेंचोद... अभी मैं इज्जत दे रहा हूँ तो तू सिर पर चढ़ा जा रहा है?

और ‘नेहा जैसी चूतों’ से तेरा क्या मतलब है?”

गुप्ता जी मुस्कुराए।

एक हाथ अभी भी मेरी गर्दन पर था, अब थोड़ा और कस गया।

दूसरा हाथ उन्होंने मेरे चेहरे के पास लाया।

उनकी उँगलियों में अभी भी सिगरेट जल रही थी।

गुप्ता जी: (धीमी, लेकिन जहरीली आवाज़ में)

“मुझे सब पता है... तू अपनी बीवी को शहर में चुदवा रहा है।”

सम: (गुस्से में)

“आपको हमारे बारे में कुछ नहीं पता।”

गुप्ता जी फिर मुस्कुराए। उनकी आँखों में नशा और घिनौना मजा दोनों थे।

गुप्ता जी: “मैंने देखे थे उस दिन... उसके स्तनों पर, कंधों पर, गर्दन पर काटने के निशान... ताज़ा निशान।

तुम बाहर से आए थे... बता, किस होटल में गए थे?”

(वो उस दिन की बात कर रहे थे जब हम “बेकार आदमी” से मिलकर आए थे। उसने नेहा को जंगली जानवर की तरह काटा और नोचा था। और घर आते समय नेहा ने गुप्ता जी के पैर छुए थे।)

गुप्ता जी: “क्या हुआ बेटा?

चुप क्यों हो गया?

स्वीटी तो सिर्फ ऑफिस वालों और पीऑन तक सीमित थी...

तेरी बीवी तो सीधे शहर में बाहर जाकर चुदवा रही है...

और तू... तू बैठा देख रहा है।”

उनकी आवाज़ में घिन और जलन दोनों थी।

गुप्ता जी की बात जितनी भी गलत तरीके से कह रहे थे, लेकिन बात वो सच कह रहे थे।

ये बात मेरे दिमाग में चुभ गई थी।
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मैंने खुद को कंट्रोल किया और उन्हें हल्का सा धक्का दिया।

नशे में उन्हें वो धक्का ज्यादा लगा। वो लगभग गिरने वाले थे कि मैंने उनका हाथ पकड़ लिया।

मैंने गहरी साँस ली।

थोड़ा सिचुएशन पर सोचने लगा — गुप्ता जी ने कई बार हमारी मदद की थी। हालाँकि दोनों घर पास थे, फिर भी ऊपर-नीचे लोग हो सकते थे।

अगर अभी झगड़ा हुआ तो इस नशे में गुप्ता जी एक मिनट भी नहीं लगाएँगे। राहुल वाली बात, ये उस शाम वाली बात को करने में।

सम: (ठंडे लेकिन सख्त स्वर में)

“अंकल, आपने सच में बहुत पी रखी है।

आपको घर जाकर सोना चाहिए।”

गुप्ता जी: (नशे में चीखते हुए)

“अच्छा... साले बाप को मत सिखा क्या करना चाहिए...

और तू क्या करेगा?”

उन्होंने कमर आगे-पीछे करके चुदाई का बेहद घटिया एक्शन किया और बोले

गुप्ता जी: “तेरी बीवी को चोदेगा ना?

मेरा गुस्सा अब शांत हो चुका था।

एक तो मुझे लग रहा था कि तमाशा नहीं करना चाहिए।

दूसरा — गुप्ता जी के गुस्से की वजह मुझे जायज भी लग रही थी।

वो पूरा पैसा पका रहे हैं अपने बेटे की पढ़ाई में, और बेटा girlfriend के साथ ऐश कर रहा है।

ऊपर से नेहा ने आज राहुल को इतना बढ़ावा दे दिया — डांस फ्लोर पर चिपककर नाचना, हँसना, छेड़खानी...

किसी का भी गुस्सा फूट ही पड़ता।

सम: “हाँ... मैं वो सब करूँगा... मेरी बीवी है वो।

आप घर जाइए।”

लेकिन फिर मेरे मुँह से वो निकल गया जो मुझे बिल्कुल नहीं बोलना चाहिए था। आधी बोतल मैंने भी पी रखी थी,

सम: “और आपको अकेले में टाइम मिले तो हिला कर सो जाइए।”

जैसे ही ये शब्द निकले, मुझे तुरंत एहसास हुआ कि मैंने गलती कर दी।

मैंने गुप्ता जी को गंदी बात करने का मौका दे दिया।

गुप्ता जी मुस्कुराए। उनकी मुस्कान में नशा, घिन और एक अजीब सी विजय थी।

गुप्ता जी: “मुझे पता था...

तुझे अच्छा लगता है ना जब कोई तेरी बीवी को देखे...

उसे सोचकर हिलाए... है ना मादरचोद?”

मैं चुप हो गया।

समझ गया था कि इस बूढ़े के पास बहुत टाइम है।

और बात नेहा की है तो ये साला रात भर मुझे रोककर बात कर सकता है।

मगर बहुत हो चुका था।

मैं थक चुका था।

नेहा अंदर इंतज़ार कर रही थी।

उसका और नीना का डांस अभी भी मेरी आँखों के सामने घूम रहा था।

उसने कुछ पक्का नया सोचा होगा।

और मैं इस बूढ़े से उलझा हुआ था।

उनका पूरा बदन झूल रहा था।

मैंने आगे बढ़कर उनके कुर्ते का कॉलर पकड़ लिया।

कान के पास मुँह ले जाकर, आँखों में आँखें डालकर गर्व के साथ बोला,

सम: “हाँ... मुझे पसंद है।

क्योंकि वो मेरी है।

जो लोग इस सोसाइटी में अपनी महँगी कार, महँगी घड़ी दिखाते हैं ना...

वो भी आज बस नेहा को देख रहे थे।

वो बस नेहा को देख सकते हैं...

उसे सोचकर आज रात हिला सकते हैं...

सोच सकते हैं कि उसकी बॉडी नंगी कैसे दिखती होगी...

मगर मैं अकेला हूँ जो देखेगा... उसके साथ खेलेगा... उसे जैसे चाहूँ, वैसा करूँगा।”

मैंने पहली बार अपने आप को गुप्ता जी से हावी महसूस किया।

नेहा मेरी ताकत थी।

गुप्ता जी थोड़ी देर तक सोचते रहे। फिर बोले,

गुप्ता जी: “कैसे इस्तेमाल करेगा?”

मैंने कहा, “जाओ ना अंकल...”

लेकिन गुप्ता जी ने मेरी बात बीच में ही काट दी।

। उन्होंने मेरे कान के पास मुँह लाकर धीमी, गंदी आवाज़ में कहा,

गुप्ता जी: “मैं बताऊँ... मैं कैसे इस्तेमाल करता नेहा को आज रात?”

मैं कुछ नहीं बोला। बस उनकी आँखों में देखता रहा।

गुप्ता जी मुस्कुराए और बोले,“पहले तो मैं उसे घुटनों पर बैठाता...

तेरे सामने ही।

तेरी बीवी को... जो आज इतना नाच रही थी।

उसके बाल पकड़कर उसके मुँह को खोलता...

और अपना मोटा, काला लंड उसके होंठों पर रगड़ता...”

“वो हिचकिचाती... लेकिन मैं बाल खींचकर उसका सिर पीछे करता...

और एक झटके में पूरा लंड उसके गले तक धकेल देता।

उसकी आँखों में आँसू आ जाते... गला फूल जाता...

मगर मैं रुकता नहीं।

दोनों हाथों से उसके सिर को पकड़कर जोर-जोर से मुँह चोदता...

गले तक... गले तक... बार-बार...”

“उसका मुँह लार से भर जाता...

थूक, आँसू, मेरे लंड का पानी... सब मिल जाता।

मैं उसे रंडी की तरह गाली देते हुए चोदता...

‘ले साली... ले मेरी बीवी... आज तुझे सिखाता हूँ असली मर्द क्या होता है...’

तेरा देखता रहता हूँ... तू बस बैठा देख रहा है... लंड हिला रहा है...”

उन्होंने मेरी आँखों में देखा और मुस्कुराते हुए आगे बोले,

गुप्ता जी: “जब मैं झड़ने वाला होता... तो उसके गले के अंदर ही झड़ता...

पूरी तरह... एक बूँद भी बाहर नहीं आने देता।

फिर उसके बाल पकड़कर उठाता... और बोलता —

‘अब जा... अपने बेकार पति के पास जा... और उसे बता कि असली मर्द का स्वाद कैसा होता है।’”

गुप्ता जी: (हँसते हुए)

“कैसा लगा बेटा?

ये है असली इस्तेमाल...

तेरी नेहा जैसी रंडी का।”शुरू में तो मैं गुप्ता जी को रोकना चाहता था, लेकिन जैसे ही उन्होंने ये सब बकवास शुरू किया, मैं रोक नहीं पाया।

वो मुझे बताते हुए अपने हाथों के इशारों से भी दिखा रहे थे — कैसे नेहा के सिर को पकड़ेंगे, बाल खींचेंगे, मुँह में ठूँसेंगे।

मेरा लंड अब पूरा तंबू बना चुका था।

एक तरफ़ दिमाग घिन कर रहा था, दूसरी तरफ़ उत्तेजना भी बढ़ रही थी।

आखिरकार मेरा अच्छा दिमाग takeover कर गया।

मैंने उन्हें हल्का सा धक्का दिया और बोला,

सम: “छी छी... कितनी गंदी सोच है आपकी...

उसे सामने बेटी कहते हो और यहाँ... बहुत घटिया इंसान हो आप।”

गुप्ता जी ने मेरी बात सुनी तो मुस्कुराए।

गुप्ता जी: “अच्छा... मेरी सोच घटिया?

और बेटी यहाँ मेरे बेटे का फ्यूचर दाँव पर लगा रही है... वो कुछ नहीं?”

मैं चुप रह गया।

मैंने फिर से सिगरेट जलाई, दो उँगलियों से इशारा किया और बोला,

सम: “जा... अपनी घटिया लाइफ और पुरानी बीवी के पास।”

गुप्ता जी लड़खड़ाते हुए अपने फ्लैट की तरफ़ जाने लगे।

मैं धीरे-धीरे उन्हें जाते हुए देख रहा था।

वो हमारे दरवाज़े के सामने से गुजर रहे थे।

अचानक वो रुक गए।

मेरे दरवाज़े की तरफ़ मुड़े।

मुझे लगा वो बस मुझे डरा रहे हैं। इतनी हिम्मत नहीं कि अंदर जाएँ।

मगर उन्होंने दरवाज़े का नॉब पकड़ा...

और एक “क्लिक” की आवाज़ के साथ उसे खोल दिया।

मैंने गुप्ता जी का चेहरा देखा —

एकदम से उस पर ताज़गी आ गई थी। नशा अभी भी था, लेकिन आँखों में एक नई चमक थी।

गुप्ता जी की आँखें एकदम बड़ी हो गई थीं।

मैं वो नज़ारा नहीं देख पा रहा था जो गुप्ता जी देख रहे थे।

जब मैं नेहा को कमरे में छोड़कर बाहर गया था, तब वो सिर्फ़ क्रीम कलर की पैंटी में थी। अब भी वही हालत थी — नंगी छातियाँ, पसीने से चमकता शरीर, पैंटी का पतला कपड़ा उसकी चूत पर चिपका हुआ।

मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।

गुप्ता जी ने मेरी तरफ़ देखा, फिर एक शैतानी आँखें मारी और नेहा की तरफ़ देखकर बोले,

गुप्ता जी: “बेटी... क्या एक पेग मिलेगा?

मेरी व्हिस्की तो खत्म हो गई है।”
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Osm yr pr jb story mai mja aata hai story end ho jaati hai nxt update pls big or jldi update krna friday night ke baad 10 days mai out of network area rhunga toh aaj kl mai update krdena as a viewer request to u????
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Please update.......... Bhai
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Update bhai krdoh yrrr
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गुप्ता जी की आँखें एकदम बड़ी हो गई थीं।

मैं वो नज़ारा नहीं देख पा रहा था जो गुप्ता जी देख रहे थे।

जब मैं नेहा को कमरे में छोड़कर बाहर गया था, तब वो सिर्फ़ क्रीम कलर की पैंटी में थी। अब भी वही हालत थी — नंगी छातियाँ, पसीने से चमकता शरीर, पैंटी का पतला कपड़ा उसकी चूत पर चिपका हुआ।

मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।

गुप्ता जी ने मेरी तरफ़ देखा, फिर एक शैतानी अँगुली मारी और नेहा की तरफ़ देखकर बोले,

गुप्ता जी: “बेटी... क्या एक पेग मिलेगा?

मेरी व्हिस्की तो खत्म हो गई है।”

मैं वहीं खड़ा था।

सिगरेट मेरे हाथ में जल रही थी, लेकिन मैं उसे पी भी नहीं पा रहा था। धुआँ धीरे-धीरे मेरे चेहरे के सामने उठ रहा था।

मैंने गुप्ता जी को अंदर जाते हुए देखा था — लड़खड़ाते कदम, नशे में झूमता बदन, लेकिन आँखों में वो भूख जो मैं पहले कभी नहीं देखा था।

अंदर से नेहा की एक हल्की-सी, घबराई हुई आवाज़ आई थी — शायद “अंकल...?” या कुछ और, लेकिन मुझे साफ़ नहीं सुनाई दिया। शायद वो चीखना चाहती थी, शायद वो घबरा गई थी।

मेरा दिमाग अभी भी प्रोसेस कर रहा था।

ये सच में हो रहा है?

क्या मैं सपना देख रहा हूँ?

क्या मैं अभी जाग जाऊँगा?

मेरा दिमाग अभी भी प्रोसेस कर रहा था।

ये सच में हो रहा है?

क्या मैं सपना देख रहा हूँ?

क्या मैं अभी जाग जाऊँगा?

सब कुछ स्लो मोशन में चल रहा था।

मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था, गले में सूखापन था, हाथ काँप रहे थे।

ज़िंदगी में पहली बार मेरा दिमाग किसी सिचुएशन में इस तरह फ्रीज हो गया था।

फिर...

क्लिक।

दरवाज़े की ऑटोमैटिक लॉक होने की वो आवाज़।

मेरा दिल एक पल के लिए रुक गया।

मैं तेज़ी से दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा।

दिमाग में सैकड़ों ख्याल एक साथ घूम रहे थे:

गुप्ता जी अंदर कहाँ होंगे?

नेहा कहाँ होगी? क्या वो अभी भी सिर्फ पैंटी में ही खड़ी है?

क्या गुप्ता जी ने उसे छू लिया होगा?

क्या नेहा घबरा रही होगी? चीख रही होगी? या... या कुछ और?

क्या वो दरवाज़ा अंदर से बंद कर चुके हैं?

अगर अंदर से बंद हो गया तो... तो क्या होगा?

मेरा हाथ काँपता हुआ दरवाज़े के हैंडल पर गया।

मैंने हैंडल दबाया...

क्लिक — लेकिन ये लॉक होने की आवाज़ नहीं थी।

दरवाज़ा अभी भी खुला था।

मैंने राहत की एक छोटी सी साँस ली, लेकिन मेरा दिल अभी भी दहाड़ रहा था।

मैंने बहुत धीरे-धीरे दरवाज़ा थोड़ा सा खोला और अंदर झाँका।


दरवाज़ा जैसे-जैसे खुल रहा था, मुझे कमरा नज़र आ रहा था।

नेहा ने पूरी सेटिंग कर रखी थी —

डिम लाइट, सॉफ्ट म्यूजिक धीरे-धीरे बज रहा था, और कमरे में वो महक थी जो नेहा की बॉडी और शराब दोनों की थी।

दरवाज़ा आधा खुला तो सबसे पहले गुप्ता जी दिखे।

वो 3 सीटर सोफे के बीच में बैठे हुए थे।

इतने नशे में थे कि गर्दन से सिर संभाला नहीं जा रहा था — सिर बार-बार आगे झुक जा रहा था।

लेकिन उनके चेहरे पर एक घिनौनी, लार टपकती हुई मुस्कान थी।

उनकी टाँगें पूरी तरह फैली हुई थीं।

एक हाथ अपनी पैंट के ऊपर से लंड पर था — वो धीरे-धीरे मसल रहे थे, ख़ुजला रहे थे।

अभी तक तंबू नहीं बना था, शायद नशे की वजह से, लेकिन हाथ की हरकत साफ़ दिख रही थी।

गुप्ता जी के बाद मेरी नज़रें पूरे कमरे में नेहा को ढूँढने लगीं।

एक पल के लिए मेरी जान में जान आई।

नेहा ओपन किचन के स्लैब की तरफ़ मुँह करके खड़ी थी।

उसने जल्दी से एक धारीदार शर्ट डाल ली थी, जो उसकी गांड़ के ठीक नीचे तक आ रही थी।

शर्ट काफी बड़ी थी, लेकिन फिर भी उसकी मोटी, गोरी जाँघें पूरी तरह दिख रही थीं।

पैंटी के किनारे शर्ट के नीचे से हल्के-हल्के झाँक रहे थे।

ये हालत सिर्फ पैंटी में होने से तो कहीं बेहतर थी।

नेहा तीन ग्लास में पेग बना रही थी। उसकी पीठ मेरी तरफ थी। शर्ट के नीचे उसकी गांड़ का हल्का उभार साफ़ दिख रहा था। हर हल्की सी हरकत के साथ शर्ट ऊपर चढ़ रही थी।


दरवाज़े ने फिर “क्लिक” किया।

नेहा ने हल्की सी गर्दन घुमाकर मेरी तरफ देखा। उसकी आँखों में राहत थी, लेकिन शर्म और घबराहट भी थी।

नेहा: (बहुत धीमी आवाज़ में)

“आ गए... लॉक कर दो।”

वो सोच रही थी कि काश कोई उसे इस हालत में न देखे। लेकिन गुप्ता जी तो पहले से अंदर बैठे थे।

मैंने गुप्ता जी को देखते हुए दरवाज़ा लॉक कर दिया।

जब नेहा मुड़ी तो मुझे झटका लगा।

उसकी शर्ट के सिर्फ़ दो बटन बीच में लगे हुए थे।

ऊपर से पूरी तरह खुली हुई थी, नीचे से भी।

साफ़ दिख रहा था कि अंदर कुछ नहीं है।

ऊपर से इतनी खुली थी कि उसके आधे से ज़्यादा स्तन और गहरी क्लिवेज़ पूरी तरह नज़र आ रही थी।

नीचे से इतनी खुली थी कि उसकी पूरी पैंटी, ऊपरी पेट और गोल नाभि सब सामने था।

किसी और दिन ये मेरे लिए बेहद इरोटिक होता...

लेकिन आज मेरे साथ गुप्ता जी भी ये सब देख रहे थे।

नेहा के हाथों में ट्रे थी, जिसमें तीन ग्लास में व्हिस्की थी।

वो धीरे-धीरे हमारे सामने आई।

जब वो ट्रे को टेबल पर रखने के लिए झुकी, तो मैंने पीछे से देखा —

उसकी शर्ट ऊपर चढ़ गई थी। उसकी मोटी, गोल गांड़ पैंटी में साफ़ दिख रही थी। पैंटी का कपड़ा उसके गूदे में हल्का सा धँसा हुआ था।

गुप्ता जी का चेहरा देखकर पता चल रहा था कि जब नेहा झुकी तो उसके स्तन पूरी तरह उनके सामने आ गए थे।

उनकी आँखें बड़ी हो गई थीं, मुँह थोड़ा खुला था।

गुप्ता जी: (नशे में भारी आवाज़ में, घूरते हुए)

“वाह बेटी...”

नेहा जल्दी से सीधी हो गई। उसका चेहरा शर्म से गहरा लाल हो गया था।

उसने शर्ट को नीचे खींचने की कोशिश की, लेकिन वो बहुत छोटी थी — न ऊपर ढक पाई, न नीचे।

नेहा: (काँपती हुई आवाज़ में)

“अंकल... आपका पेग...”

उसने गुप्ता जी को ग्लास देते हुए उनकी तरफ़ नहीं देखा।

गुप्ता जी ने ग्लास लेते हुए जानबूझकर नेहा की उँगलियों को छू लिया।

गुप्ता जी: (मुस्कुराते हुए)

“धन्यवाद बेटी...

बैठो ना... इतनी दूर खड़ी क्यों हो?”

हा इधर-उधर नज़र दौड़ा रही थी। वो समझ नहीं पा रही थी कि गुप्ता जी उसे कहाँ बैठने को कह रहे हैं।

उसके चेहरे पर कन्फ्यूजन, शर्म और नशे का मिश्रण था — मैंने उसे कभी इतना कन्फ्यूज नहीं देखा था।

उसने एक पल के लिए आँखें बंद कीं।

कुछ सोचा।

नशे की वजह से दिमाग पर बहुत ज़ोर लगाना पड़ा होगा।

फिर कुछ सोचकर वो मेरे पास वाले सिंगल सीटर सोफे पर बैठ गई।

मुझे लगा कि उसने एक पल के लिए गुप्ता जी के पास बैठने का भी मन बनाया था, लेकिन आखिरकार मेरे पास आने का फैसला किया।

नेहा अब मेरे बिल्कुल बगल में बैठी थी।

जब वो बैठी तो उसकी शर्ट और ऊपर चढ़ गई। उसकी गोरी, मोटी जाँघें पूरी तरह खुली हुई थीं। पैंटी का ऊपरी हिस्सा और नाभि साफ़ दिख रहे थे।

गुप्ता जी ने नेहा को घूरा। उनकी नज़रें उसकी जाँघों, पैंटी और खुली शर्ट पर घूम रही थीं।

गुप्ता जी ने हवा में ग्लास उठाया और बोले,

गुप्ता जी: “चीयर्स...!”

उनकी नज़रें अभी भी नेहा की पैंटी पर जमी हुई थीं।

एक हाथ अभी भी अपनी पैंट के ऊपर से लंड को धीरे-धीरे ख़ुजला रहा था — बिना किसी शर्म के, बिना किसी हिचक के।

मेरी बीवी के सामने।

मेरे सामने।

उन्हें साफ़ लग रहा था कि आज लॉटरी लग गई है।

उनका चेहरा नशे और उत्तेजना से चमक रहा था। वो सामान तैयार कर रहे थे — जैसे कोई शिकारी अपनी नज़र शिकार पर जमा कर बैठा हो।

मैंने नेहा के कान के पास मुँह ले जाकर बहुत धीरे से फुसफुसाया,

सम: “ये शर्ट...?”

नेहा ने मेरी तरफ़ देखा। उसके गाल अभी भी शर्म से लाल थे। उसने धीमी, नशीली आवाज़ में जवाब दिया,

नेहा: “वो... AC में ठंड लग रही थी...”

मेरा मतलब था कि “तुम सिर्फ शर्ट क्यों पहने हो?”

लेकिन नेहा ने गलत समझ लिया। उसे लगा मैं पूछ रहा हूँ कि “तुम नंगी क्यों नहीं हो?”

उसका चेहरा और ज़्यादा लाल हो गया। उसने मेरी आँखों में देखा, फिर शर्म से नज़रें झुका ली और बहुत धीरे से बोली,

नेहा: “मैं... मैं सोच रही थी कि तुम्हें पसंद आएगा...

अगर मैं... सिर्फ शर्ट में...”

वो वाक्य अधूरा छोड़ दिया। उसकी साँसें तेज़ हो गई थीं।

मैंने नेहा के कान के पास मुँह ले जाकर बहुत धीरे से फुसफुसाया,

सम: “इसे अंदर आने क्यों दिया?”

नेहा ने मेरी तरफ़ चौंककर देखा। उसकी आँखें एक पल के लिए बड़ी हो गईं। फिर उसने शर्म और नशे वाली आवाज़ में कहा,

नेहा: “मुझे लगा... तुमने भेजा है...

मुझे लगा जो तुम सपने में देखते हो...

आज शायद तुम्हारा मन है...”

मैं मन ही मन सोच रहा था — ये तो कन्फ्यूजन हो गया।

नेहा ने सोचा कि मैंने ही गुप्ता जी को अंदर बुलाया है।

और मैं सोच रहा था कि नेहा ने उन्हें अंदर आने दिया।

दोनों एक-दूसरे को गलत समझ रहे थे।

मैं नेहा के कान में बहुत धीरे से बोला,

सम: “अब क्या?”

नेहा ने मेरी तरफ़ देखा, फिर एक शरारती अँगुली मारी और थोड़ी तेज़ आवाज़ में (जिसमें नशा और हिम्मत दोनों थी) बोली,

नेहा: “Uncle अपने हैं... बुरा थोड़े मानेंगे?

है ना अंकल... आप किसी को थोड़े बोलोगे?

मैं घर में ऐसी रहती हूँ... घर में तो कोई कैसे भी रह सकता है ना...”

नेहा अब बात संभालने की कोशिश कर रही थी।

उसकी आवाज़ में शर्म थी, लेकिन साथ में एक हल्की शरारत और नशे का जोश भी था।

गुप्ता जी ने नेहा की बात सुनकर जोर से हँसे। उनकी आँखें नेहा की खुली शर्ट और पैंटी पर घूम रही थीं।

नेहा को अब कन्फ्यूजन साफ़ समझ में आ गया था।

लेकिन उसकी आँखों में कुछ और भी था।

वो भी समझ गई थी कि गुप्ता जी को अब हमारे बारे में काफी कुछ पता चल गया है — कि हमें किसी गैर मर्द के साथ जाने में, या ऐसे सिचुएशन में कोई प्रॉब्लम नहीं है।

नेहा ने गुप्ता जी की तरफ़ देखा।

उसकी शर्म अब थोड़ी कम हुई लग रही थी, लेकिन घबराहट अभी भी थी।

नेहा मेरे कान के पास आई। उसकी गर्म साँस मेरे कान को छू रही थी। उसने बहुत धीमी, नशीली और शरारती आवाज़ में फुसफुसाया,

नेहा: “क्या तुम थोड़े खेल के मूड में हो...?”

मैंने गर्दन घुमाकर उसे देखा।

उसकी आँखों में शर्म कम, और नशे के साथ एक नई हिम्मत थी।

मेरे जवाब का इंतज़ार किए बिना उसने अपने होंठ मेरे होंठों पर रख दिए।

गहरा किस।

बहुत गहरा।

जिसमें जीभ, लार, और पूरा जोश था।

वो जानबूझकर ज़ोर से किस कर रही थी — जैसे वो दिखाना चाहती हो कि हम दोनों को कोई शर्म नहीं है।
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उसका एक हाथ मेरी गर्दन पर था, दूसरा मेरी छाती पर।

उसकी शर्ट और ऊपर चढ़ गई थी।

मैंने भी जवाब में उसे किस किया।

हमारे होंठ एक-दूसरे को चूस रहे थे, जीभें आपस में उलझ रही थीं।

नेहा ने जानबूझकर हल्की-हल्की सिसकारी भरी — loud enough कि गुप्ता जी सुन सकें।

गुप्ता जी चुपचाप बैठे हमें देख रहे थे।

उनकी आँखें बड़ी हो गई थीं। हाथ अब भी अपनी पैंट के ऊपर से लंड को मसल रहे थे।

उनके चेहरे पर हैरानी, उत्तेजना और एक अजीब सी विजय का भाव था।

नेहा ने किस के बीच में मेरे कान में फुसफुसाया,

नेहा: “देख रहे हैं ना वो..."

फिर उसने और गहरा किस किया।

मैं समझ गया था —

नेहा अब खेलने के मूड में आ चुकी थी।

और वो चाहती थी कि गुप्ता जी सब देखें।

किस खत्म होने के बाद हम दोनों ने एक साथ गुप्ता जी की तरफ़ देखा।

अब किसी में कोई शर्म नहीं बची थी।

गुप्ता जी हमें देखते हुए मुस्कुरा रहे थे। उन्होंने अपना ग्लास उठाया और एक घूँट में पूरा खाली कर दिया। उनकी आँखें अभी भी नेहा की खुली शर्ट और पैंटी पर घूम रही थीं।

नेहा ने मेरी तरफ़ देखा, फिर मेरे हाथ में पड़े पूरे भरे ग्लास को देखा।

वो मुस्कुराई, फिर मेरे कान के पास आई और बहुत मीठी, नशीली आवाज़ में बोली,

नेहा: “बेबी... तुम भी पियो ना...”

उसने एक हाथ से मेरा ग्लास पकड़ा और मेरे होंठों पर लगा दिया।

जैसे वो चाह रही हो कि मैं और ज़्यादा नशे में चला जाऊँ...

आज कुछ भी ऐसा न सोच सकूँ जो वास्तविक लगे।

मैंने ग्लास का घूँट लिया। नेहा ने ग्लास को और झुकाया, जिससे ज़्यादा व्हिस्की मेरे मुँह में चली गई। कुछ बूँदें मेरे होंठों से नीचे टपक गईं, मेरी गर्दन पर।

नेहा ने आगे बढ़कर उन बूँदों को अपनी जीभ से चाट लिया।

फिर मेरी आँखों में देखकर बोली,

नेहा: “आज रात... कुछ भी सोचने की ज़रूरत नहीं...”

गुप्ता जी हमें देख रहे थे। उनकी मुस्कान अब और चौड़ी हो गई थी।

उन्होंने अपना खाली ग्लास टेबल पर रखा और बोले,

गुप्ता जी: “वाह बेटी...

अंकल को भी तो कुछ दो...

या... अंकल खुद ले लें?”

किस खत्म होने के बाद नेहा बैठी रही। उसने मेरी तरफ़ देखा, फिर गुप्ता जी की तरफ़ मुड़ी।

गुप्ता जी double meaning में बात कर रहे थे। उनकी मुस्कान और नज़र से साफ़ लग रहा था कि वो kiss लेना चाहते हैं या peg, कुछ समझ नहीं आ रहा था।

नेहा ने जानबूझकर peg ही समझ लिया। वो हल्के से मुस्कुराई और बोली,

नेहा: “क्यों नहीं अंकल... बहुत है...”

वो उठी।

जैसे ही वो उठी, उसकी शर्ट और खुल गई।

अब उसके हल्के भूरे रंग के निप्पल के किनारे साफ़ दिख रही थी। शर्ट का पतला कपड़ा उसके निप्पल्स पर चिपका हुआ था, जिससे उनकी शेप और सख्ती दोनों उभरकर सामने आ गई थी।

नेहा किचन स्लैब की तरफ़ गई और peg बनाने लगी।

नेहा ने ट्रे में तीन ग्लास तैयार किए।

जब वो ट्रे लेकर हमारे पास आई और झुकी तो उसके स्तन गुप्ता जी के सामने पूरी तरह लटक गए।

नेहा: (गुप्ता जी को ग्लास देते हुए)

“लीजिए अंकल...”

नेहा ने गुप्ता जी की तरफ़ ग्लास बढ़ाया।

मैंने तुरंत बीच में बोल दिया,

सम: “अंकल, मुझे लगता है आपको नहीं पीना चाहिए।

आपसे बोला भी नहीं जा रहा है।

आपने बहुत पी रखी है।”

गुप्ता जी ने एकदम से मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें नशे और गुस्से से लाल हो गई थीं। उन्होंने तेज़ आवाज़ में जवाब दिया,

गुप्ता जी: “चुप कर मादरचोद...

मुझे मत सिखा कि कितनी पीनी चाहिए!”

उनकी आवाज़ में इतना गुस्सा था कि कमरे में सन्नाटा छा गया।

नेहा का हाथ हल्का सा काँप गया।

गुप्ता जी ने नेहा से ग्लास छीन लिया और एक घूँट में आधा ग्लास खाली कर दिया। फिर नेहा की तरफ़ घूरते हुए बोले,

गुप्ता जी: “बेटी... तू तो दे रही है ना...

ये मादरचोद बीच में क्यों बोल रहा है?

नेहा मेरी तरफ़ असहाय नज़र से देख रही थी।

मैंने गुस्से को कंट्रोल करते हुए कहा,

सम: “अंकल... अब बस भी करिए।

आपको घर जाना चाहिए।”

गुप्ता जी ने मेरी तरफ़ देखकर घिनौनी मुस्कान दी और बोले,

गुप्ता जी: “घर?

अभी तो पार्टी शुरू हुई है...

तेरी बीवी ने मुझे बुलाया है... और तू बीच में बोल रहा है?

चुप बैठ...”

नेहा ने हाथ बढ़ाकर ग्लास आगे किया।

गुप्ता जी ने ग्लास लेने की बजाय नेहा का हाथ थाम लिया और उसे अपनी तरफ़ खींच लिया।


नेहा लड़खड़ाई। आधा पेग उसके हाथ से छलक गया और गुप्ता जी के कुर्ते पर गिर गया।

गुप्ता जी: (नेहा को अपनी गोद की तरफ़ खींचते हुए, नशे में हँसते हुए)

“बेटी... ऐसे पिला ना...

जैसे तूने अपने इस कुत्ते को पिलाया था...”

नेहा उनके कंधे पर हाथ रखकर खुद को संभाल रही थी। उसकी शर्ट अब लगभग पूरी तरह खुल चुकी थी।



नेहा जब गुप्ता जी की तरफ़ झुकी तो पहले तो वो पूरी तरह उनके ऊपर गिर गई।

उसके भारी स्तन गुप्ता जी की छाती से ज़ोर से टकराए। गुप्ता जी ने तुरंत दोनों हाथों से नेहा की कमर पकड़ ली।

नेहा घबरा गई और खुद को संभालते हुए थोड़ा साइड में बैठ गई, लेकिन अब भी गुप्ता जी के बहुत करीब।

दोनों के हाथ आपस में मिले हुए थे।

नेहा का शरीर गुप्ता जी से चिपका हुआ था।

उसकी भारी, नंगी छातियाँ गुप्ता जी की छाती से सटी हुई थीं। शर्ट के खुले बटन की वजह से उसकी हल्के भूरे निप्पल सीधे उनके कुर्ते से रगड़ खा रहे थे।

गुप्ता जी की साँसें भारी हो गई थीं।

उनका एक हाथ नेहा की कमर पर था, दूसरा हाथ अभी भी अपनी पैंट के ऊपर से लंड को मसल रहा था।

गुप्ता जी: (नशे में भारी आवाज़ में, मुस्कुराते हुए)

“अरे वाह बेटी...

इतना अच्छा लग रहा है...

आज तो अंकल की गोद में बैठकर पेग पिलाओ...”

नेहा का चेहरा शर्म से लाल था, लेकिन वो उठकर नहीं हटी।

उसने मेरी तरफ़ एक नज़र डाली — उसकी आँखों में शर्म, नशा और एक अजीब सी उत्तेजना थी।

नेहा: (काँपती हुई आवाज़ में)

“अंकल... आपका पेग...”

गुप्ता जी ने नेहा को और करीब खींच लिया। अब नेहा की एक जाँघ उनकी जाँघ पर थी और उनकी छाती नेहा के स्तनों से पूरी तरह दब रही थी।



नेहा कुछ सोचती, उससे पहले मैंने जोर से कहा,

सम: “नेहा... इसने तुम्हें बाहर ‘रंडी’ कहा... और भी गंदी-गंदी बातें कहीं...”

मेरी जालन से ऐसी शिकायत की, जैसे कोई छोटा बच्चा टीचर से शिकायत कर रहा हो।

नेहा ने मेरी तरफ़ देखा।

उसकी आँखों में एक पल के लिए कुछ भाव आया — शायद समझ, शायद थोड़ी निराशा।

फिर उसने मेरी तरफ़ देखा, लेकिन कुछ बोला नहीं।

उसने हाथ में जो ग्लास था, उसे गुप्ता जी की तरफ़ बढ़ा दिया।

गुप्ता जी ने ग्लास पकड़ लिया और नेहा के हाथ से ही पीने लगे।

जैसे मेरी बात का कोई असर ही नहीं हुआ हो।

गुप्ता जी: (नेहा के हाथ को थामे हुए, नशे में मुस्कुराते हुए)

“हाँ बेटी... ऐसे ही पिलाओ...

अच्छा लग रहा है...”

नेहा चुपचाप बैठी रही।

मैंने फिर से, इस बार और ज़ोर से कहा,

सम: “नेहा... सुन रही हो ना?

इसने तुम्हें रंडी कहा...”

नेहा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में अब एक अलग तरह की चमक थी — नशा, थोड़ी बगावत, और एक अजीब सी शांति।

उसने बहुत धीरे से मेरी तरफ़ देखकर कहा,

आधे से ज़्यादा ग्लास तो पहले ही छलक चुका था।

जो बचा था, वो गुप्ता जी ने नेहा के हाथों से एक ही घूँट में पी लिया।

गुप्ता जी: “आह... आहहहहह....”

पीने के बाद उन्होंने जोर से आह भरी। फिर मेरी तरफ़ घूरते हुए बोले,

गुप्ता जी: “क्या बोल रहा था तू भड़वे?

क्या शिकायत कर रहा था?”

फिर वो नेहा की तरफ़ मुड़े। उनकी आँखों में नशा और गंदी भूख थी। उन्होंने नेहा की कमर पर हाथ कसकर रखा और बोले,

गुप्ता जी: “हाँ... कहा मैंने।

है मेरी बेटी रंडी।

इसका जिस्म किसी रंडी से भी बढ़कर है...”

नेहा का पूरा शरीर सख्त हो गया।

उसकी साँसें तेज़ हो गईं। लेकिन वो गुप्ता जी की गोद से उठकर भी नहीं हटी।

गुप्ता जी ने नेहा की कमर को और कसकर पकड़ लिया और बोले,

गुप्ता जी: “देखो ना... ये स्तन... ये गांड़... ये जाँघें...

सब किसी प्रोफेशनल रंडी से भी ज्यादा माल हैं।

और तू... (मेरी तरफ़ देखकर)

इसे बाहर चुदवाता है... और घर लाकर मुझे दिखा रहा है...”

नेहा ने मेरी तरफ़ देखा।

उसकी आँखों में शर्म थी, लेकिन उत्तेजना भी थी।

वो मेरी तरफ़ देखकर हल्के से काँप रही थी, लेकिन गुप्ता जी की गोद से पूरी तरह नहीं हटी।

गुप्ता जी: (नेहा के स्तन को घूरते हुए)

“क्या बोला था तू... रंडी नहीं है?

गुप्ता जी ने नेहा की कमर को और कसकर पकड़ लिया।

उनका पूरा चेहरा अब नेहा की तरफ़ था।

उनके होंठ नेहा के होंठों से सिर्फ़ दो-तीन इंच की दूरी पर थे।

उनकी गर्म, शराब वाली साँसें नेहा के चेहरे पर पड़ रही थीं।

गुप्ता जी: (बहुत धीमी, भारी आवाज़ में, नेहा की आँखों में देखते हुए)

“क्या हुआ बेटी...

अंकल के पास आने में शर्म आ रही है?”

गुप्ता जी: (बहुत धीमी, गंदी और नशे वाली आवाज़ में)

“बोल ना... है ना तू रंडी?”

नेहा चुप रही। उसका शरीर हल्का-हल्का काँप रहा था।

गुप्ता जी ने और करीब आकर, उसके कान के पास फुसफुसाते हुए कहा,

गुप्ता जी: “बता ना मुझे... है ना तू...

अपने इस भड़वे पति के सामने... मेरे सामने... मेरी गोद में... इतने पास...

तुझमें जो रंडी है, वो तुझे भी नहीं पता...”

ये बोलते हुए उनके होंठ धीरे-धीरे नेहा के होंठों की तरफ़ बढ़ रहे थे। उनकी गर्म, शराब वाली साँसें नेहा के होंठों को छू रही थीं।

नेहा की साँसें बहुत तेज़ और भारी हो गई थीं।

उसकी छाती गुप्ता जी की छाती से पूरी तरह दब रही थी।

उसने मेरी तरफ़ एक गहरी, लंबी नज़र डाली — उस नज़र में शर्म, डर, उत्तेजना और एक सवाल सब कुछ था।

मैं चुपचाप बैठा था।

मेरा पूरा शरीर तन गया था।

गुप्ता जी के होंठ नेहा के होंठों से बस छूने ही वाले थे...

एक आदमी मेरे घर में, मेरे सोफे पर, मेरी बीवी के साथ बैठकर उसे “रंडी” कह रहा था।

मुझमें गुस्सा उबाल खा रहा था, जैसे कोई मेरी इज्जत उतार रहा हो।

मेरा हाथ अपने आप मेरे लंड पर चला गया।

चेक करने के लिए।

वो पत्थर की तरह सख्त था।

दूसरा दिमाग इसे पसंद कर रहा था।

वहाँ नेहा की आधी आँखें बंद थीं।

गुप्ता जी के होंठ उसके होंठों से सिर्फ़ आधा इंच दूर थे।

उसकी साँसें भारी थीं। वो हर पल सोच रही थी कि अब हमला हो सकता है... लेकिन हमला नहीं हुआ।

उसने धीरे से आँखें खोलीं और गुप्ता जी की आँखों में देखा — जैसे पूछ रही हो, “क्या रह गया?”

गुप्ता जी ने अपनी पकड़ और कस ली और फिर से, बहुत धीमी लेकिन सख्त आवाज़ में दोहराया,

गुप्ता जी: “बोल ना... है ना तू रंडी...

मैं तेरे मुँह से सुनना चाहता हूँ...”

नेहा की साँस अटक गई।

उसका चेहरा पूरी तरह लाल था। उसके स्तन गुप्ता जी की छाती से दबे हुए थे। शर्ट अब लगभग खुल चुकी थी।

गुप्ता जी ने उसकी कमर को और कसकर पकड़ लिया और उसके होंठों के और करीब आ गए। उनकी गर्म साँसें नेहा के होंठों को छू रही थीं।

गुप्ता जी: (फुसफुसाते हुए)

“बोल ना बेटी...

अंकल के सामने... अपने पति के सामने...

बोल... तू रंडी है...”

नेहा ने मेरी तरफ़ एक आखिरी नज़र डाली।

उसकी आँखों में शर्म, डर, नशा और एक अजीब सी हिम्मत थी।

नेहा के मुँह से हल्का सा “हाँ...” निकला।

शायद वो kiss लेने के चक्कर में मान रही थी।

उसकी साँसें बहुत तेज़ थीं। उसका शरीर गुप्ता जी से चिपका हुआ था। मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि जब मेरी बीवी इस तरह गरम होती है तो उसकी साँसें कैसे भारी हो जाती हैं।

लेकिन गुप्ता जी ने उसे इतनी आसानी से नहीं जाने दिया।

गुप्ता जी: (नेहा की कमर को कसकर पकड़े हुए, उसके होंठों के बहुत करीब)

“क्या हाँ?

बोल साफ़-साफ़...”

नेहा की गर्दन लाल हो गई। उसकी आँखें आधी बंद थीं। वो हल्के से काँप रही थी।

नेहा: (बहुत धीमी, काँपती हुई आवाज़ में)

“हाँ... मैं हूँ...

रा... रंडी...”

जैसे ही ये शब्द उसके मुँह से निकले, गुप्ता जी की आँखों में एक जंगली चमक आ गई।

गुप्ता जी: (मुस्कुराते हुए, नेहा की कमर को और कसकर)

“वाह... अच्छी लड़की...

अब दोबारा बोल... ज़ोर से...

अपने पति के सामने... अंकल के सामने...

बोल — मैं रंडी हूँ...”

नेहा की साँसें और तेज़ हो गईं।

उसने मेरी तरफ़ एक नज़र डाली — शर्म, नशा और उत्तेजना का मिश्रण।

फिर उसने आँखें बंद कर लीं और हल्की, लेकिन साफ़ आवाज़ में बोली,

नेहा: “मैं... रंडी हूँ...”

गुप्ता जी ने संतुष्ट मुस्कान दी।

उनका एक हाथ नेहा की कमर से नीचे सरक गया और उसकी गांड़ को कसकर दबा लिया।

गुप्ता जी: (नेहा की आँखों में गहरी नज़र डालते हुए, बहुत धीमी और authoritative आवाज़ में)

“Good girl...”

गुप्ता जी: “बोल... uncle की रंडी बनेगी?”

दोनों की आँखें अब एक-दूसरे में गहरी तक धँसी हुई थीं।

जैसे कोई वॉश में हो।

समय रुक गया था।

नेहा ने कुछ नहीं कहा।

बस उसकी आँखें गुप्ता जी की आँखों में डूबी रहीं।

फिर बहुत धीरे-धीरे, बिना शब्द निकाले, उसने हल्का सा सिर हिलाया।

हाँ।

एक छोटा, शर्मीला, लेकिन साफ़ इशारा।

गुप्ता जी की आँखों में एक जंगली संतोष की चमक आई।

उनके होंठ नेहा के होंठों से सिर्फ़ आधा इंच दूर थे। उनकी गर्म साँसें नेहा के चेहरे पर पड़ रही थीं।

गुप्ता जी: (बहुत धीरे से, लेकिन साफ़)

“बोल ना बेटी... ज़ोर से...

‘हाँ अंकल... मैं आपकी रंडी बनूँगी’...”

नेहा की साँसें अब बहुत तेज़ और भारी हो गई थीं।

उसके होंठ हल्के से खुले हुए थे।

गुप्ता जी ने नेहा की कमर को और कसकर पकड़ लिया। उनके होंठ उसके होंठों के बिल्कुल करीब थे।

गुप्ता जी: (धीमी, लेकिन सख्त आवाज़ में)


“अगर uncle की रंडी बनना है... तो जो uncle कह रहे हैं, वो मानना पड़ेगा... समझी?”

नेहा कुछ नहीं बोली।

न हाँ में सिर हिलाया, न ना में।

बस चुपचाप उनकी आँखों में देखती रही।

सब समझ गए थे।

गुप्ता जी ने नेहा की ठोड़ी पकड़कर हल्का सा ऊपर उठाया और बोले,

गुप्ता जी: “अपना मुँह खोल...

और जीभ बाहर निकाल...”

नेहा एक पल के लिए रुकी।

फिर धीरे-धीरे उसने अपना मुँह खोला।

उसकी गुलाबी, नम जीभ धीरे से बाहर निकल आई।

गुप्ता जी ने अपनी जीभ बाहर निकाली।

मैंने देखा — दोनों की जीभें एक-दूसरे से मिल रही थीं।

गुप्ता जी ने पहले तो नेहा की रसीली, गुलाबी जीभ को धीरे-धीरे चाटा। उनकी मोटी, गर्म जीभ नेहा की जीभ पर ऊपर से नीचे तक घूम रही थी। फिर उन्होंने नेहा की जीभ को हल्का सा काट लिया।

नेहा की आँखें बंद हो गई थीं।

वो बस महसूस कर रही थी। उसका पूरा शरीर हल्का-हल्का काँप रहा था।

गुप्ता जी ने अब और आगे बढ़कर नेहा के मुँह को पूरी तरह अपने मुँह में ले लिया।

ये किस अब बहुत गहरा और गंदा था।
उनकी जीभ नेहा के मुँह के अंदर घुस गई थी, उसके हर कोने को चाट रही थी।


नेहा की जीभ को चूस रहे थे, काट रहे थे, और फिर जोर-जोर से चाट रहे थे।

किस के दौरान नेहा की थूक और गुप्ता जी की थूक दोनों के होंठों पर और ठुड्डी पर बह रही थी।

गुप्ता जी ने जानबूझकर नेहा की निचली होंठ को काटा, फिर ऊपरी होंठ को चूसा।

नेहा बस आँखें बंद करके सब सह रही थी, कभी-कभी हल्की सिसकारी निकल जाती थी।

गुप्ता जी ने किस को थोड़ा और गहरा करते हुए नेहा की जीभ को अपने मुँह में खींच लिया और जोर से चूसने लगे, जैसे कोई फल चूस रहे हों।

गुप्ता जी: (किस के बीच में, भारी आवाज़ में)

“ममम... कितनी मीठी है तेरी जीभ रंडी...”

नेहा बस काँप रही थी।

करीब ५ मिनट हो चुके थे।

मैं डरचक की तरह बैठा अपनी बीवी को देख रहा था।

वेनु और बेकार आदमी के बाद तीसरा आदमी अब मेरी बीवी का मुँह चूस रहा था।

गुप्ता जी नेहा को जोर से किस कर रहे थे। उनकी जीभ नेहा के मुँह में घुसी हुई थी, एक हाथ उसके खुले स्तन को मसल रहा था। नेहा की साँसें भारी थीं, आँखें बंद थीं।

फिर अचानक...
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नेहा ने गुप्ता जी के सीने पर दोनों हाथ रखे और एक ज़ोरदार झटके से उन्हें पीछे धकेल दिया।

न मुझे समझ में आया, न गुप्ता जी को कि क्या हुआ।

गुप्ता जी थोड़ा पीछे हट गए। उनके होंठों पर नेहा की थूक चमक रही थी। उनकी आँखें हैरानी से बड़ी हो गई थीं।

नेहा की साँसें तेज़ थीं। उसके होंठ सूजे हुए थे, आँखें अभी भी आधी बंद थीं।

नेहा ने आस-पास देखा, जैसे कुछ ढूँढ रही हो।

उसकी नज़र खाली ग्लास पर पड़ी।

वो खड़ी हुई, ग्लास उठाया और किचन के स्लैब की तरफ़ चली गई।

वहाँ जाकर उसने बोतल से अपने लिए नया पेग बनाना शुरू कर दिया।

यहाँ गुप्ता जी ने जेब से सिगरेट का पैकेट निकाला, एक सिगरेट जलाई।

एक लंबा कश लिया।

फिर अपने बाजू को हिम्मत देकर खड़े हो गए और धीरे-धीरे नेहा की तरफ़ बढ़ने लगे।

नेहा स्लैब पर झुकी हुई पेग बना रही थी।

गुप्ता जी उसके ठीक पीछे पहुँच गए।

उन्होंने सिगरेट का कश लिया और नेहा की कमर पर हाथ रख दिया।

गुप्ता जी: (पीछे से, भारी और नशीली आवाज़ में)

“क्या हुआ बेटी...?

अचानक क्यों भाग गई?

अंकल को अकेला छोड़ दिया...”

नेहा का शरीर हल्का सा सख्त हो गया।

वो पेग बनाती रही, लेकिन उसकी साँसें तेज़ हो गई थीं।

गुप्ता जी ने नेहा की कमर को कसकर पकड़ लिया और उसके कान के पास मुँह ले जाकर फुसफुसाया,

गुप्ता जी: “डर गई क्या?

अभी तो मजा शुरू हुआ था...”

नेहा ने कुछ नहीं कहा।

वो बस पेग बनाती रही, लेकिन उसका शरीर अब गुप्ता जी से सटा हुआ था।

वो खड़ी हुई, ग्लास उठाया और किचन के स्लैब की तरफ़ चली गई।

वहाँ जाकर उसने बोतल से अपने लिए नया पेग बनाना शुरू कर दिया।

यहाँ गुप्ता जी ने जेब से सिगरेट का पैकेट निकाला, एक सिगरेट जलाई।

एक लंबा कश लिया।

फिर अपने बाजू को हिम्मत देकर खड़े हो गए और धीरे-धीरे नेहा की तरफ़ बढ़ने लगे।

गुप्ता जी इतने नशे में थे कि ठीक से चल भी नहीं पा रहे थे।

नेहा स्लैब पर झुकी हुई पेग बना रही थी।

गुप्ता जी उसके ठीक पीछे पहुँच गए।

वे झूलते हुए, लड़खड़ाते हुए नेहा के पीछे पहुँच गए, जहाँ वो किचन स्लैब पर झुकी हुई पेग बना रही थी।

वे नेहा के ठीक पीछे खड़े हो गए।

नशे की वजह से उनका बैलेंस नहीं बन पा रहा था, इसलिए वे आगे झुक गए।

पीछे गुप्ता जी, आगे नेहा।

मैं सोफे से साफ़ नहीं देख पा रहा था, लेकिन जो नज़ारा दिख रहा था, वो काफी था।

गुप्ता जी की कमर नेहा की गांड़ से सटी हुई थी।

उनका लंड, जो पैंट में था, नेहा की गांड़ पर दबा हुआ था।

नेहा का शरीर एकदम सख्त हो गया।

गुप्ता जी ने दोनों हाथों से नेहा की कमर पकड़ ली और अपने लंड को उसकी गांड़ पर धीरे-धीरे रगड़ने लगे।

गुप्ता जी: (नशे में भारी, गंदी आवाज़ में)

“उफ्फ बेटी... कितनी गर्म है तेरी गांड़..."

नेहा ने कुछ नहीं कहा।

उसके हाथ काउंटर पर टिके हुए थे। उसकी साँसें बहुत तेज़ और भारी हो गई थीं।

वो न तो आगे बढ़ी, न पीछे हटी — बस चुपचाप खड़ी रही, जबकि गुप्ता जी उसके पीछे से उसे रगड़ रहे थे।

गुप्ता जी ने अपनी कमर हल्के-हल्के आगे-पीछे करने शुरू कर दी।

उनका लंड नेहा की पैंटी वाली गांड़ पर ऊपर-नीचे रगड़ खा रहा था।
गुप्ता जी ने नेहा की कमर को और कसकर पकड़ लिया। उनके होंठ नेहा की गर्दन पर थे।

गुप्ता जी: (गर्दन चूसते हुए, भारी आवाज़ में)

“यहाँ क्यों आ गई?

मैं तो तेरे होंठों का रस पान कर रहा था...

कितना मज़ा आ रहा था...”

ये बोलते हुए उन्होंने नेहा की गर्दन पर गहरे किस करने शुरू कर दिए — चूस रहे थे, हल्का-हल्का काट रहे थे, अपनी गर्म जीभ से चाट रहे थे।

नेहा ने हल्की सी गर्दन घुमाकर, काँपती हुई आवाज़ में कहा,

नेहा: “वो... मेरा पेग खत्म हो गया था... इसीलिए...”

गुप्ता जी ने हँसते हुए नेहा की गर्दन पर और जोर से किस किया। उनका एक हाथ नेहा की कमर से नीचे सरक गया और उसकी गांड़ को कसकर दबा लिया।

गुप्ता जी ने नेहा की कमर को और कसकर पकड़ लिया। उनकी आवाज़ अब और भारी और गंदी हो गई थी।

गुप्ता जी: “तुझे दारू पीने की बेन की लौड़ी... तो पहले बताती ना...

ये देख, तूने मेरे ऊपर कितनी गिराई है...”

उन्होंने नेहा के दोनों कंधे पकड़ लिए और जोर देकर उसे पीछे घुमा दिया।

अब नेहा गुप्ता जी की तरफ़ मुंह करके खड़ी थी।

गुप्ता जी ने अपना गीला कुर्ता दिखाते हुए बोले,

गुप्ता जी: “देख... कितना गीला कर दिया तूने...

तेरे पेग की वजह से...”

नेहा की साँसें तेज़ हो गई थीं।

गुप्ता जी: (नेहा की आँखों में देखते हुए, मुस्कुराते हुए)

“अब तो तुझे साफ़ करना पड़ेगा ना बेटी...

जो तूने गिराया है...”

नेहा ने मेरी तरफ़ एक असहाय नज़र डाली।

उसका चेहरा शर्म और नशे से लाल था।

गुप्ता जी बदबदा रहे थे।

गुप्ता जी: “मैंने देखा... तूने सम के गले से व्हिस्की साफ़ की...

वो तो थोड़ी सी थी...

मुझ पर तो तूने पूरी गिरा दी है...”

नेहा बस चुपचाप देख रही थी।

कभी गुप्ता जी को, कभी मेरी तरफ़।

गुप्ता जी दोनों हाथों से अपने कुर्ते को उतारने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन नशे की वजह से उनका बैलेंस बिगड़ रहा था। वो बार-बार लड़खड़ा रहे थे, कुर्ता आधा ऊपर चढ़ा, आधा नीचे। उनकी तोंद और बालों भरी छाती आधे-आधे दिख रही थी।

नेहा ने मेरी तरफ़ देखा।

उसने हल्के से इशारा किया — पास आने का।

मुझे लगा वो कहेगी — “बाहर ले जा इस छुटिये को”।

मैं पास पहुँचा।

नेहा ने मेरी आँखों में देखा और बहुत धीमी, नशीली आवाज़ में बोली,

नेहा: “बेबी... हेल्प करो ना अंकल की...”

मैं एक पल के लिए स्तब्ध रह गया।

गुप्ता जी अभी भी कुर्ता उतारने की कोशिश में जुटे हुए थे, लड़खड़ाते हुए।

नेहा मेरे बहुत करीब खड़ी थी

उसने मेरी तरफ़ देखकर हल्का सा सिर हिलाया — जैसे मुझे आगे बढ़ने का इशारा कर रही हो।

गुप्ता जी ने मुझे देखा और नशे में हँसते हुए बोले,

गुप्ता जी: “हाँ बेटा... आ जा...

अपनी बीवी के अंकल की मदद कर...

कुर्ता उतारने में भी मदद चाहिए अब...”

मैं वहीं खड़ा था।

मेरा दिमाग पूरी तरह उलझ गया था।

मैंने सहारा दिया।

नेहा जो कह रही थी, वैसा ही किया।

मैंने गुप्ता जी के कुर्ते के किनारे पकड़े और गर्दन के ऊपर से बाहर निकाल दिया।

गुप्ता जी अब ऊपर से पूरी तरह नंगे हो गए।

उनकी छाती पर घने बाल थे — आधे सफेद, आधे काले।

आधा शरीर पसीने और छलकी हुई व्हिस्की से गीला था।

एक हाथ में सिगरेट थी।

गुप्ता जी: (नशे में हँसते हुए, सिगरेट का कश लेते हुए)

“बेटी... दारू वेस्ट नहीं करनी चाहिए...”

उनकी तोंद बाहर निकली हुई थी। छाती के बालों पर व्हिस्की की बूँदें चमक रही थीं।

नेहा उनके सामने खड़ी थी।

वो गुप्ता जी की नंगी छाती को देख रही थी।

गुप्ता जी ने नेहा की तरफ़ एक कदम बढ़ाया। उनकी नंगी छाती अब नेहा के स्तनों से सिर्फ़ कुछ इंच दूर थी।

नेहा ने एक बार मेरी तरफ़ देखा।

उसकी आँखों में शर्म, नशा और एक अजीब सी हिम्मत थी। फिर वो धीरे-धीरे गुप्ता जी की तरफ़ मुड़ी।

गुप्ता जी अभी भी नंगे ऊपर वाले हिस्से के साथ खड़े थे।

नेहा ने आगे बढ़कर सबसे पहले गुप्ता जी की दाईं छाती पर हल्के से जीभ फेरी।

फिर उनके left nipple को अपनी गर्म, नम जीभ से चाटा।

उसने धीरे-धीरे nipple को घेरते हुए चाटा, फिर हल्का सा काट भी लिया।

गुप्ता जी की साँस भारी हो गई।

नेहा ने उनके कंधों पर जीभ फिराई — दाएँ कंधे से बाएँ कंधे तक, धीरे-धीरे।

फिर उनकी गर्दन के नीचे, कॉलर बोन पर चाटा।

उसके बाद वो धीरे-धीरे नीचे की तरफ़ गई।

सकी जीभ गुप्ता जी की तोंद पर घूम रही थी।

वो नाभि के पास पहुँची, और अपनी जीभ को नाभि के अंदर डालकर चाटने लगी।

गोल-गोल घुमाते हुए, चूसते हुए।

गुप्ता जी की साँसें अब और तेज़ हो गई थीं।

उनका एक हाथ नेहा के बालों में था, दूसरे हाथ से वो अपनी पैंट के ऊपर से लंड मसल रहे थे।
नेहा की जीभ नाभि से नीचे की तरफ़ सरक रही थी।


उसने गुप्ता जी की तोंद के नीचे वाले बालों को भी चाटा।

गुप्ता जी: (हाँफते हुए)

“उफ्फ... कितनी अच्छी रंडी है तू...

अंकल की तोंद चाट रही है... नाभि चूस रही है...”

नेहा कुछ नहीं बोली।

मैं थोड़ी देर तक चुपचाप बैठा देख रहा था — नेहा को वो सब करते हुए जो गुप्ता जी कह रहे थे।

जब नेहा गुप्ता जी के nipple चाट रही थी, तब उन्होंने अपनी जलती हुई सिगरेट मुझे आगे बढ़ा दी।

गुप्ता जी: (नशे में मुस्कुराते हुए, एक अर्थपूर्ण इशारा करते हुए)

“बहुत मज़ा आ रहा है तेरी बीवी के साथ...”

मैंने सिगरेट ले ली।

मेरा हाथ हल्का सा काँप रहा था।

नेहा बिल्कुल submissive mood में चली गई थी।

जहाँ-जहाँ गुप्ता जी कह रहे थे, नेहा वहाँ-वहाँ चाट रही थी।

उसकी गर्म, नम जीभ गुप्ता जी की छाती पर, निप्पल पर, तोंद पर, नाभि में... हर जगह घूम रही थी।

गुप्ता जी के घने बालों पर भी उसकी थूक चमक रही थी।

थोड़ी देर बाद नेहा सीधी खड़ी हो गई।

उसने एक उँगली अपने दाँतों में दबाकर, बहुत ही cute और शरारती अंदाज़ में कहा,

नेहा: “सब साफ़ हो गया अंकल...”

उसका पूरा चेहरा अपने ही थूक और व्हिस्की से चमक रहा था।

होंठ सूजे हुए थे, ठुड्डी पर थूक की एक पतली लकीर बह रही थी।

गुप्ता जी ने उसे देखा और संतुष्ट मुस्कान दी।

फिर उन्होंने हल्के से नेहा के गाल पर चांटा मारा — शाबाशी में।

गुप्ता जी: “Good girl...

तूने अच्छी कुतिया की तरह साफ़ कर दिया...”

उन्होंने मेरे हाथ से सिगरेट ली और नेहा के होंठों पर लगा दी।

नेहा ने एक गहरा कश लिया और पूरा धुआँ गुप्ता जी के चेहरे पर छोड़ दिया।

नेहा ने सब कुछ किया।

बिना मेरी तरफ़ एक बार भी देखे।

बिना मेरी इज्जत का कोई ख्याल किए।

वो पूरी तरह गुप्ता जी की बात मान रही थी — जैसे मैं वहाँ था ही नहीं।

मैं उसे समझ नहीं पा रहा था।
ये वही नेहा थी जो कुछ घंटे पहले मुझसे चिपकी हुई थी, और अब...

थोड़ी देर बाद हमारी नज़रें मिलीं।

नेहा ने मुझे देखा, आँख मारते हुए हल्का सा इशारा किया।

मुझे समझ में आ गया — उसे मजा आ रहा था।

बहुत मजा आ रहा था।

फिर उसने दूसरा इशारा किया — जैसे पूछ रही हो, “तुम ठीक हो?”

मैंने कंधे उचकाए — “पता नहीं” वाला इशारा।

फिर अपना हाथ नीचे ले जाकर पैंट के ऊपर से अपना खड़ा तंबू दिखा दिया।

नेहा ने उसे देखा।

उसके होंठों पर एक छोटी सी शरारती मुस्कान आई।

उसने हल्का सा सिर हिलाया, जैसे कह रही हो — “अच्छा है...”

गुप्ता जी हमें ये सब करते हुए देख रहे थे।

उन्होंने नेहा के गाल पर फिर से एक हल्का सा चांटा मारा — शाबाशी वाला, लेकिन authority के साथ।

फिर उन्होंने नेहा का चेहरा अपनी तरफ़ घुमा लिया।

गुप्ता जी: (नेहा की ठोड़ी पकड़कर, सख्ती से)

“सब ध्यान मेरी तरफ़ दे...

सम को बाद में देख लेना...

अभी तो अंकल के सामने है तू...”

नेहा अब किचन स्लैब पर झुकी हुई थी।

उसकी पीठ slab की तरफ़ थी, यानी गुप्ता जी के सामने।

दोनों कोहनियाँ स्लैब पर टिकी हुई थीं, कमर थोड़ी ऊपर उठी हुई।

शर्ट अब उसके कंधों पर लटक रही थी, लगभग खुल चुकी थी।

उनका दायाँ हाथ धीरे-धीरे नीचे सरकने लगा।

पहले गर्दन को छुआ, नीली नसों को उँगलियों से दबाया।

फिर और नीचे... नेहा के मंगलसूत्र को छुआ, उसे हल्का सा खींचा, देखा।

मेरी तरफ़ देखकर घिनौनी मुस्कान दी।

फिर हाथ और नीचे गया... गहरी क्लिवेज में उतरा।

लेकिन स्तनों को छुआ नहीं। जानबूझकर छोड़ दिया।

हाथ और नीचे सरका...

बटनों तक पहुँचा।

पहले एक हाथ से बटन खोलने की कोशिश की, लेकिन नशे में नहीं हो पा रहा था।

नेहा के मुँह से हल्की सी हँसी निकल गई।

गुप्ता जी: (गुस्से और उत्तेजना में)

“चुप साली रंडी...”

उन्होंने दूसरा हाथ भी लगा दिया और दोनों बटन एक साथ खोल दिए।

शर्ट अब बस कंधों पर लटक रही थी।

नेहा के दोनों स्तन पूरी तरह सामने आ गए थे

भारी, गोल, nipples सख्त होकर खड़े थे।

गुप्ता जी ने शर्ट को थोड़ा और खोला।

फिर उनका हाथ और नीचे सरक गया।

सीधे नेहा की गहरी नाभि पर पहुँचा।

एक उँगली अंदर डाल दी और कुरेदना शुरू कर दिया।

नेहा के चेहरे के भाव बदलने लगे।

उसकी आँखें आधी बंद हो गईं, होंठ हल्के से खुले, साँसें भारी और अनियमित हो गईं।

कभी-कभी हल्की सिसकारी निकल जाती थी।

प्ता जी का हाथ और नीचे सरक गया।

अब उनकी उँगलियाँ नेहा की पैंटी के किनारे पर थीं।

गुप्ता जी ने नेहा की तरफ़ देखा, उनकी आँखों में भूख और विजय का मिश्रण था।

गुप्ता जी: (धीमी, काँपती हुई आवाज़ में)

“कितनी बार ये मैंने सपने में देखा है...

आज हाथ लगने वाला है...”

उन्होंने धीरे-धीरे दो उँगलियाँ नेहा की चूत के ऊपर रख दीं।

पैंटी के ऊपर से ही उसकी गर्मी और नमी महसूस कर रहे थे।

उँगलियाँ चूत की दोनों पंखुड़ियों को धीरे-धीरे महसूस कर रही थीं, दबा रही थीं।

फिर नीचे की तरफ़ सरकीं और छेद को हल्का सा दबाया।

नेहा: “आह...”

नेहा के मुँह से हल्की सी आह निकली। उसका शरीर हल्का सा काँप गया।

गुप्ता जी मुस्कुराए।

फिर पैंटी के ऊपर से ही उँगलियाँ ऊपर-नीचे करने लगे — लकीर के अंदर, चूत की पूरी लंबाई को सहलाते हुए।

गुप्ता जी: (संतुष्ट स्वर में)

“ये तो सपने से भी बेहतर है...

बहुत टाइट है तेरी चूत रंडी...”

नेहा अब स्लैब पर और झुक गई थी। उसकी कमर पीछे की तरफ़ उठी हुई थी।

गुप्ता जी की उँगलियाँ पैंटी के कपड़े के ऊपर से ही तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही थीं।

नेहा की साँसें अब पूरी तरह अनियमित हो चुकी थीं।

उसके स्तन नीचे लटक रहे थे, शरीर हल्का-हल्का काँप रहा था।

गुप्ता जी ने नेहा की पैंटी के ऊपर से चूत को रगड़ते हुए कहा,

गुप्ता जी: “ये इतनी टाइट कैसे है?

ये चोदू तुझे चोदता नहीं क्या धंधे से?”

फिर थोड़ा मुस्कुराए और बोले,

गुप्ता जी: “या फिर छोटा है साले का?”

वो लगातार नेहा की चूत को पैंटी के ऊपर से रगड़ रहे थे।

हम दोनों शांत थे।

गुप्ता जी ने फिर पूछा,

गुप्ता जी: “बता ना...”

लगा कि उन्होंने ऐसे ही नहीं पूछा था।

उन्हें जवाब चाहिए था।

नेहा मस्ती के मूड में थी।

उसने बिना कुछ बोले, अपनी उँगली और अँगूठे से इशारा किया — छोटा वाला साइन।

मतलब साफ़ था — छोटा है।

गुप्ता जी ज़ोर से गंदी हँसी हँसे।

उनकी हँसी में मजा, घिन और विजय तीनों थे।

गुप्ता जी: (हँसते हुए)

“हाहाहा... छोटा है?

अरे वाह...

कोई बात नहीं बेटी...

अंकल का मोटा वाला आज तेरी चूत को ठीक कर देगा...”

गुप्ता जी की दो उँगलियाँ नेहा की चूत की फाँकों की लकीर में पैंटी के ऊपर से दब रही थीं।

पैंटी अब पूरी तरह भीग चुकी थी, जिसकी वजह से कपड़ा चूत से चिपक गया था।

नेहा की मोटी, सूजी हुई फाँकें और बीच की गहरी लकीर साफ़ दिख रही थी।

जैसे-जैसे गुप्ता जी अपनी उँगलियाँ ऊपर-नीचे कर रहे थे, नेहा अपनी कमर को रिदम में हिला रही थी।

धीरे-धीरे आगे-पीछे...

पूरी तरह से अपनी चूत को उनकी उँगलियों पर रगड़ रही थी।

गुप्ता जी ने जैसे-तैसे संभलते हुए अपना दूसरा हाथ नेहा के आगे की तरफ़ ले जाया।

मुझे लग रहा था कि उनके सामने अब फेवरेट डिश रखी हुई है।

उन्होंने नेहा के एक स्तन को पूरा हाथ में भर लिया।

उसका मोटा, भारी स्तन उनके बड़े हाथ में पूरी तरह समा गया।

थोड़ी देर तक उन्होंने शेप और साइज़ को हाथ से टटोला — दबाया, मसला, ऊपर से नीचे तक सहलाया।

फिर मुस्कुराकर बोले,

गुप्ता जी: “तुझे ब्रा की ज़रूरत नहीं पड़ती होगी...

ये बिना ब्रा के भी शेप में तने हुए हैं...

देख... ये निप्पल कैसे मेरी तरफ़ देख रहा है...”

समझ नहीं आ रहा था कि क्या खाऊँ और क्या नहीं।

गुप्ता जी का एक हाथ उसकी चूत पर पैंटी के ऊपर से रगड़ रहा था, दूसरा हाथ अब उसके नंगे स्तन को मसल रहा था।

गुप्ता जी ने नेहा की कमर को कसकर पकड़ रखा था। उन्होंने नेहा को थोड़ा और झुका दिया।

गुप्ता जी: “कितना सख्त हो गया है... अंकल को चूसने का मन कर रहा है...”

नेहा की आँखें आधी बंद थीं। उसने हल्की, शरारती आवाज़ में कहा,

नेहा: “किसी का वेट कर रहे हो अंकल...? कोई आने वाला है क्या?”

10 सेकंड लगे गुप्ता जी को जोक समझने में।

गुप्ता जी: (गुस्से और उत्तेजना में)

“भेन की लौड़ी... मुझसे बकचोदी मत कर...”

बोलकर उन्होंने नेहा के एक स्तन को पूरा हाथ में भर लिया और जोर से दबा दिया।

नेहा के मुँह से “आह्ह्ह...” निकली।

फिर गुप्ता जी झुके और नेहा के nipple को मुँह में ले लिया।

उन्होंने पहले nipple को जीभ से चारों तरफ घेरा, फिर पूरा मुँह खोलकर स्तन का बड़ा हिस्सा मुँह में ले लिया।

गुप्ता जी ने नेहा के दूसरे स्तन पर मुँह लगा दिया।

वे बार-बार जोर-जोर से चूस रहे थे। नेहा का मंगलसूत्र बार-बार उनके चेहरे और मुँह पर टकरा रहा था, लेकिन वे उसे हटाने की बजाय और ज़ोर से चूस रहे थे।

नेहा की साँसें अब पूरी तरह बेकाबू हो चुकी थीं। उसकी आँखें बंद थीं, होंठ खुले हुए थे।

थोड़ी देर बाद नेहा ने हल्की, काँपती हुई आवाज़ में पूछा,

नेहा: “मंगलसूत्र उतार दूँ अंकल?”

उसने हाथ उठाकर मंगलसूत्र खोलने की कोशिश की।

गुप्ता जी: (तुरंत सख्ती से, स्तन चूसते हुए)

“नहीं! मत उतारो।”

वे नेहा के स्तन को मुँह से छोड़कर ऊपर उठे और उसकी आँखों में देखते हुए बोले,

गुप्ता जी: “वहाँ रहने दो...

ये मुझे याद दिलाएगा कि तुम्हारा पति घर में बैठा अपनी बीवी को देख रहा है...

और मैं उसके स्वादिष्ट मम्मे चूस रहा हूँ!”

ये कहते हुए उन्होंने नेहा के दोनों स्तनों को दोनों हाथों से कसकर पकड़ लिया और जोर-जोर से मसलने लगे। मंगलसूत्र अब भी उनके हाथों और नेहा की छाती के बीच लटक रहा था।

नेहा गुप्ता जी की आँखों में सीधे देखते हुए बोली,

नेहा: “ये गलत है अंकल जी...

आपने मेरे पति को बस अपना कुत्ता समझ लिया है...

आप मेरे सामने मेरे पति की बेइज्जती कर रहे हैं...”

उसकी आवाज़ में शर्म थी, लेकिन साथ में एक अजीब सी हिम्मत और उत्तेजना भी थी।

जैसे वो गुप्ता जी के मुँह में अपनी बात डाल रही हो।

वो मुझे भी उस अपमान में शामिल करना चाहती थी, जो वो खुद महसूस कर रही थी।

जोर-जोर से चूसने लगे — “चुप... चुप... चुप...” की आवाज़ कमरे में गूँज रही थी। बीच-बीच में नेहा का मंगलसूत्र उनके मुँह में आ जा रहा था, वो उसे भी चूस लेते थे।

नेहा ने गुप्ता जी की आँखों में देखते हुए, तेज़ और भारी साँसों के साथ कहा,

नेहा: “अंकल जी... मेरा पति... वो तो आपका वफादार कुत्ता है...

और आप उसके अपने घर में उसकी बीवी को लेना चाहते हैं!”

गुप्ता जी ने नेहा की कमर को कसकर पकड़ लिया। उनकी आवाज़ अब पूरी तरह अल्फा मेल वाली हो गई थी,

गुप्ता जी: “नेहा... तुम्हारा पति तो मेरे सामने कुछ भी नहीं है।

उसे कोई इज्जत नहीं है। वो हमेशा मुझसे डरता है।

मैं असली मर्द हूँ।

तुम चिंता मत करो मेरी जान... मैं तुम्हारी पूरी देखभाल करूँगा।

वो एक शब्द भी नहीं बोलेगा...

जो मैं कहूँगा, वो करेगा।

अगर मैं कहूँगा तो बैठ जाएगा...

अगर कहूँगा तो खड़ा हो जाएगा...”

गुप्ता जी ने मेरी तरफ़ देखा और मुस्कुराते हुए बोले,

गुप्ता जी: “देखना चाहती हो?”

नेहा ने पहले मेरी तरफ़ देखा।

मेरा चेहरा बिल्कुल भावहीन था।

फिर उसने गुप्ता जी की तरफ़ देखा।

बहुत छोटी, काँपती हुई आवाज़ में बोली,

नेहा: “हाँ...”

गुप्ता जी की मुस्कान और चौड़ी हो गई।
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Osm ur to good Mind  blowing ur writting skill. ..........Thnx 4r the update but jo seen chl rha hai yha stop nhi chahea tha nxt update long ke read krne mai bhi time lge or pls jldi update dena......
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pls update
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मैं नेहा को देख रहा था।

कभी-कभी गुप्ता जी को।

दोनों ऐसे नहीं लग रहे थे जैसे कोई मजाक चल रहा हो। सब कुछ बहुत रियल और गंभीर था।

तभी गुप्ता जी ने एक उँगली मेरी तरफ़ उठाई।

इशारा था — पास आने का।

मैं कुछ कदम दूर से ही सब देख रहा था।

इशारे पर मैं उनके पास चला गया।

लेकिन मेरा मकसद दूसरा था।

मैं नेहा के पास जाना चाहता था।

उससे कुछ पूछना चाहता था।

मेरे दिमाग में बार-बार यही घूम रहा था — ये सब क्या हो रहा है?

जब मैं पास पहुँचा, नेहा ने मेरी तरफ़ देखा।

उसकी आँखों में नशा, शर्म और एक गहरी उलझन थी।

इतने समय से सब कुछ इतना तेज़ चल रहा था कि मेरा ध्यान नहीं गया था।

जब मैं पास पहुँचा, तब जाकर साफ़ दिखा —

गुप्ता जी का हाथ नेहा की पैंटी के अंदर चला गया था।

उनकी उँगलियों की हरकत से साफ़ लग रहा था कि वो नेहा की चूत का छेद ढूँढ रहे हैं, अंदर घुसने की कोशिश कर रहे हैं।

मैंने नेहा के कान में बहुत धीरे से, लेकिन गुप्ता जी के चेहरे के बिल्कुल पास फुसफुसाया,

सम: “तुम ये सच में देखना चाहती हो?”

नेहा ने मेरी आँखों में देखा और बहुत धीमी, लेकिन साफ़ आवाज़ में कहा,

नेहा: “मैं देखना चाहती हूँ...

मगर ये तुम्हारी चॉइस है सम...

तुम ये सब करने चाहते हो या नहीं?”

उसके जवाब ने मुझे हिला दिया।

वो सच कह रही थी।

मैं बंधा हुआ नहीं था... कुछ भी करने के लिए।

न गुप्ता जी की बात मानने के लिए, न ये जो हो रहा है उसे देखने के लिए।

मैं चाहता तो ये सब रोक सकता था।


अगर मैं ये भी चाहूँ कि नेहा अपनी मर्ज़ी से जो चाहे कर सके...

फिर भी मैं बंधा नहीं था वो सब देखने के लिए।

फिर मैं क्यों खड़ा हूँ यहाँ?

नेहा ने एक ही पल में सब बदल दिया था।

वो चाहती थी कि मैं निर्णय लूँ।

नेहा की आँखों में देख रहा था।

उसकी आँखें नशे, उत्तेजना और एक सवाल से भरी हुई थीं।

गुप्ता जी की उँगली अभी भी उसकी चूत के अंदर हल्की-हल्की हिल रही थी।

मैंने गहरी साँस ली।

मेरा गला सूख गया था।

सम: (बहुत धीमी आवाज़ में)

“...जो तुम चाहती हो... वो करो।”

इतनी देर से गुप्ता जी मुझे गालियाँ दे रहे थे — कutta, भेन का लौड़ा, मादरचोद...

लेकिन उन गालियों ने मुझे उतना नहीं चुभाया, जितना नेहा का वो एक वाक्य चुभ गया।

“ये तुम्हारी चॉइस है सम... तुम ये सब करना चाहते हो या नहीं?”

ये वाक्य मेरे सीने में चुभ गया।

शायद मुझे ये न पूछना चाहिए था।

मैं ये सोच सकता था कि मैं सिर्फ़ एक दर्शक हूँ, जो सब कुछ होते हुए देख रहा है।

लेकिन अब... आगे जो होने वाला है या नहीं होने वाला है, उसमें मेरी मर्ज़ी शामिल हो गई है।


शराब ने सोचने की शक्ति आधी कर दी थी।

अब ये मेरे ऊपर है —

कि मेरी बीवी की ऊपर-नीचे चलती साँसें, जो किसी दूसरे आदमी के हाथ उसकी चड्डी के अंदर चूत से खेलने की हर हरकत से हो रही हैं...

मैं वो साँसें थामना चाहता हूँ या और उत्तेजित होते देखना चाहता हूँ।

क्या मैं उसे रोकूँ?

क्या मैं देखूँ... एक आदमी को... मेरे घर की इज्जत के साथ... खेलते हुए... घर के हर कोने में?

क्या मैं यहाँ से चला जाऊँ अपने रूम में... फिर चाहे वो आदमी उसे रंडी-कुतिया की तरह चोदे या हाई क्लास माशूका समझकर?

सब मुझ पर था।


मैं ये सब सोच ही रहा था कि गुप्ता जी ने भारी आवाज़ में ऑर्डर देते हुए कहा,

गुप्ता जी: “कुत्ता... बैठ जा ज़मीन पर... घुटनों के बल...

हम दोनों के सामने। Now.”

ये वो पल था, जब मुझे तय करना था।

मुझे क्या करना है।


मेरा दिमाग कुछ सोच पाता, उससे पहले ही मेरे घुटने मुड़ने शुरू हो गए।

जैसे मेरा शरीर मेरे दिमाग को बायपास कर चुका हो।

नेहा ने मेरी आँखों में देखा।

उसकी नज़र में एक गहरी, तीखी जिज्ञासा थी — जैसे वो मेरे अंदर की हर लड़ाई को देख रही हो।

और मैं...

धीरे-धीरे ज़मीन पर घुटनों के बल बैठ गया।

अब मैं उनके ठीक सामने था।

गुप्ता जी और नेहा दोनों के सामने।

घुटनों पर।

सिर थोड़ा झुका हुआ।

गुप्ता जी ज़ोर से हँसे। उनकी हँसी कमरे में गूँज गई।

गुप्ता जी को भी अंदाज़ा नहीं था कि मैं ये कर जाऊँगा।

वे लड़खड़ाते पैरों से मुझे ज़मीन पर घुटनों के बल बैठते हुए देख रहे थे।

धीरे-धीरे उनके चेहरे पर एक मुस्कान फैल गई — घिनौनी, विजयी मुस्कान।

नेहा दर्शक की तरह मुझे देख रही थी।

उसकी आँखें मेरे चेहरे पर टिकी हुई थीं।

गुप्ता जी ने मुझे और ऑर्डर दिए,

गुप्ता जी: “कुत्ता... सिर और नीचे झुका...

देख... तेरी बीवी मेरे सामने खड़ी है...

अब बोल... ‘थैंक यू अंकल’...”

मैंने सिर और नीचे झुकाकर कहा,

सम: “थैंक यू अंकल...”

गुप्ता जी ने नेहा की तरफ़ देखा और पूछा,

गुप्ता जी नेहा से बार-बार कुछ कहलवा रहे थे।

गुप्ता जी: “बोल... बोल ना रंडी... अगला ऑर्डर मैं तेरे पति को क्या दूँ...

बोल... क्या करवाऊँ इस कुत्ते से.

नेहा चुपचाप देख रही थी।

उसका चेहरा साफ़ और सीधा था।

न कोई मुस्कान, न कोई गुस्सा।

बस आँखों में गहरी, भारी कामुकता थी।

गुप्ता जी का हाथ अभी भी उसकी पैंटी के अंदर था।

कभी-कभी ऐसा लगता था कि एक से ज़्यादा उँगलियाँ अंदर घुसी हुई हैं — मेरी बीवी की चूत का तापमान जाँच रही हैं, अंदर की गर्मी और नमी को महसूस कर रही हैं।

नेहा बस हल्की-हल्की “आह...” करती, कुछ ज़्यादा नहीं बोलती।

उसकी साँसें भारी थीं, शरीर हल्का-हल्का काँप रहा था।

वो बार-बार मेरी तरफ़ देख रही थी — बिना किसी भाव के, सिर्फ़ गहरी नज़र से।

नेहा की आँखें और साँसें धीरे-धीरे और गहरी होती जा रही थीं।

गुप्ता जी का हाथ अभी भी उसकी पैंटी के अंदर था।
पैंटी के बाहर से ही साफ़ दिख रहा था कि उनकी उँगलियाँ अंदर-बाहर हो रही हैं — तेज़ी से, लगातार।

मैं घुटनों के बल बैठा सब देख रहा था।

फिर एकदम से गुप्ता जी ने कहा,

गुप्ता जी: “चल कुत्ते... मेरे पैरों को चाट...”

उनके पैरों में एक पारंपरिक चप्पल थी, जो कुर्ते के नीचे पहनी हुई थी।

उन्होंने एक पैर को झटका दिया — चप्पल उड़कर थोड़ी दूर चली गई।

फिर उन्होंने पैर हिलाकर मुझे दिखाया, जैसे कह रहे हों — “ये वाला चाटना है।”

मुझे लगा कि ये थोड़ा ज़्यादा हो रहा है।

मैंने कोई हरकत नहीं की।

मैं कभी गुप्ता जी को देख रहा था, कभी नेहा को।

मुझे लगा नेहा कुछ कहेगी।

लेकिन नेहा के मुँह से बस “आह्ह... आह्ह...” की सिसकारियाँ निकल रही थीं।

मेरे कुछ न करने पर शायद उन्हें गुस्सा आ गया।

उन्होंने नेहा की चूत में अचानक कुछ ऐसा किया कि नेहा के मुँह से ज़ोर से “आह्ह्ह्ह!” निकल गई।

उनका हाथ अब तेज़ी से ऊपर-नीचे होने लगा।

नेहा के मुँह से लगातार “आह्ह... आह्ह्ह... आआह्ह्ह...” निकलने लगी।

उसका पूरा शरीर काँप रहा था।

फिर गुप्ता जी ने अपना दूसरा हाथ बढ़ाकर मेरे बालों को जोर से पकड़ लिया।

गुप्ता जी ने नेहा की चूत में उँगलियाँ हिलाते हुए मुझे घूरा और बोले,

गुप्ता जी: “क्यों... तुम्हें संकोच हो रहा है मादरचोद?

तुझे तो ये पसंद है ना?

यहीं से तो सब शुरू हुआ था...

भूल गया?

तुझे दरवाज़े पर देखा था...

इस रंडी के जूतों को चाटते हुए... (Chapter 3 at Start)

तब तो कोई शर्म नहीं थी...”

ये बोलते हुए उनकी उँगलियाँ नेहा की चूत में और तेज़ हो गईं।

नेहा शायद झड़ने की कगार पर थी।

उसका चेहरा लाल, आँखें आधी बंद, होंठ खुले हुए।

मैंने उसका चेहरा देखा।

उसने मेरी आँखों में देखा — जैसे पूछ रही हो, “क्या करोगे अब?”

नेहा के झड़ने की करीब की आवाज़ मेरे कानों में संगीत का काम कर रही थी।

एक motivation की तरह।

मैंने गुप्ता जी के पैरों को घुटनों के नीचे से दोनों हाथों से लपेट लिया।

और अपना सिर धीरे-धीरे नीचे ले जाने लगा।

मैं वो करने जा रहा था, जिसे करने का मेरा मन नहीं था।

फिर भी... अपनी हवस... या नेहा की खुशी...

पता नहीं।

अभी इतना दिमाग नहीं चल रहा था।

मैं उनके पैरों के पास पहुँच ही रहा था कि मुझे अपने कंधे पर एक पैर महसूस हुआ।

नेहा का पैर।

मैंने नेहा की तरफ़ गर्दन उठाकर देखा।

उसके पैर और खुल चुके थे।

गुप्ता जी की उँगलियाँ अब और अंदर जा सकती थीं।

फिर एक ज़ोरदार धक्का।

नेहा ने ज़ोर लगाकर मुझे वहाँ से अलग कर दिया।

उस धक्के से मैं गुप्ता जी के पैरों से काफी दूर चला गया और ज़मीन पर गिर गया।

मैं पीछे की तरफ़ गिरा।

ज़मीन पर गिरने के बाद 5 सेकंड तक मुझे कुछ समझ में नहीं आया कि ये क्या हुआ।

सब कुछ धुंधला-सा था।

फिर मेरे कानों में पड़ी एक गंदी, घिनौनी हँसी — गुप्ता जी की।

वे हँस रहे थे, जैसे उन्हें बहुत मज़ा आया हो कि नेहा ने मुझे पैर से धक्का मारकर अलग कर दिया।

गुप्ता जी: (ज़ोर से हँसते हुए)

“बहुत सही... साली रंडी...

ऐसे ही करना चाहिए इस चूतिए के साथ...”

नेहा ने हल्की सी मुस्कान दी।

शायद वो मुस्कान मुझे अपमान से बचाने के लिए थी।

उसकी आँखों में अब एक अलग तरह की चमक थी — जैसे वो कह रही हो, “अभी नहीं...”

गुप्ता जी का हाथ तेज़ी से नेहा की चूत के अंदर-बाहर हो रहा था।

नेहा ने उनकी हँसी दबाने के लिए एक हाथ से उनके सिर को पकड़कर अपने सीने से चिपका लिया।

उसके भारी स्तन गुप्ता जी की छाती से पूरी तरह दब गए।

उसके होंठ गुप्ता जी के होंठों से चिपक गए।

गुप्ता जी का हाथ नहीं रुका।

वे नेहा की चूत में उँगलियाँ और तेज़ी से चला रहे थे।

नेहा की आँखें आधी बंद थीं, लेकिन उसके होंठ गुप्ता जी के मुँह में थे।

उसकी टाँगें और चौड़ी हो गईं।

पैंटी अब रोल होकर उसकी जाँघों तक चली गई थी।

गुप्ता जी भी उसे नीचे कर रहे थे।

एक ज़ोरदार किस के बीच नेहा की पैंटी पूरी तरह जाँघों तक उतर गई।

अब मेरे सामने नेहा लगभग नंगी खड़ी थी — बस पैंटी उसके जाँघों पर लटक रही थी, जिसका कोई मतलब नहीं रह गया था।

उसकी खुली टाँगें...

गुप्ता जी की खुरदुरी उँगलियाँ उसके अंदर-बाहर होती दिख रही थीं।

फिर हल्का-हल्का पानी रिसने लगा।

नेहा झड़ रही थी।

गुप्ता जी की उँगलियों पर उसका रस चमक रहा था।

उसकी जाँघों पर रस बह रहा था।

नेहा का पूरा शरीर झुरझुरी से भर गया था।

सब कुछ मेरे सामने था।

गुप्ता जी ने नेहा के होंठों को तब तक नहीं छोड़ा, जब तक वो पूरी तरह झड़ नहीं गई।

नेहा की आखिरी “आह्ह्ह...” को उन्होंने अपने मुँह में महसूस किया।

नेहा ने भी पूरी बहूबी से साथ दिया।

किस शुरू में बहुत तेज़ और गहरा था — जैसे दोनों एक-दूसरे को निगल जाना चाहते हों।

धीरे-धीरे वो हल्का होता गया... बहुत धीरे... और आखिरकार ख़त्म हो गया।

ऐसा लगा जैसे अब किसी को भी किसी के होंठ छूने का मन नहीं हो रहा था।

फिर उनके होंठ अलग हुए।

लेकिन शरीर अभी भी चिपके हुए थे।

गुप्ता जी का शरीर नेहा के थूक से भीगा हुआ था।

नेहा का शरीर गुप्ता जी के थूक से सना हुआ था।

दोनों के नंगे शरीर एक-दूसरे से सटे हुए थे।

मुझे लगा कि उनके नंगे निप्पल एक-दूसरे को महसूस कर रहे होंगे — गर्मी, नमी और सख्ती सब कुछ।

नेहा की साँसें अभी भी बहुत तेज़ थीं।

उसका पूरा शरीर हल्का-हल्का काँप रहा था।

गुप्ता जी की उँगलियाँ अभी भी उसकी चूत के अंदर थीं, धीरे-धीरे हिल रही थीं, जैसे झड़ने के बाद की नमी को महसूस कर रहे हों।

दोनों का चेहरा एक-दूसरे के सामने था।

गुप्ता जी नेहा के चेहरे को घूर रहे थे।

नेहा की आँखें अभी भी बंद थीं।

फिर धीरे-धीरे उसने अपनी नशीली आँखें खोलीं।

सामने गुप्ता जी की आँखें थीं।

उसने उन आँखों को घूरा।

वो शर्माई नहीं।

नेहा ने अपना एक भौं उठाकर हल्का सा इशारा किया — जैसे पूछ रही हो, “कैसा था?”

गुप्ता जी मुस्कुराए।

नेहा ने भी मुस्कुरा दी।

फिर उसने एक आँख मारकर अपना इज़हार किया।

फिर दोनों मुस्कुराए।

एक गहरी, समझदार, नशीली मुस्कान।

जैसे दोनों के बीच कोई गुप्त समझौता हो गया हो।

गुप्ता जी ने थोड़ा ज़ोर लगाकर खुद को नेहा से अलग किया।

वे २-३ कदम पीछे हट गए, जैसे पूरा नज़ारा बेहतर तरीके से देखना चाहते हों।

फिर उन्होंने नेहा को ऊपर से नीचे तक घूरा।

नेहा लगभग नंगी खड़ी थी — सिर्फ़ एक पैंटी, जो उसकी जाँघों तक रोल होकर लटक रही थी।

उसके स्तन, गोल नाभि, मोटी जाँघें और पूरी चूत सब साफ़ दिख रही थी।

गुप्ता जी की आँखें चौड़ी हो गई थीं।

मुझे नहीं लगता कि उन्होंने इस उम्र में इतनी खूबसूरत, जवां और नंगी लड़की कभी देखी होगी।

उनके चेहरे पर लालच, हैरानी और एक तरह की लॉटरी वाली खुशी थी।

मैं ज़मीन पर घुटनों के बल बैठा-बैठा ये सब देख रहा था।

एक हवस भरे बूढ़े को, जो मेरी जवां बीवी को इस तरह नंगा घूर रहा था।

नेहा और गुप्ता जी की नज़रें मिली हुई थीं।

नेहा के चेहरे पर कोई शर्म नहीं थी।

न झिझक, न घबराहट।

बस एक शांत, नशीली, आत्मविश्वास भरी मुस्कान।

जैसे वो जानती हो कि इस वक्त वो कितनी खूबसूरत और powerful दिख रही है।

गुप्ता जी ने एक उँगली उठाई और हवा में गोल घुमाया।

नेहा की तरफ़ देखते हुए एक साफ़ इशारा किया — घूमने का।

नेहा जैसे किसी सम्मोहन में थी।

उसके होंठों पर हल्की मुस्कान आई।

बिना किसी हिचकिचाहट के, बहुत नशीली और आकर्षक अदा से उसने अपनी जगह पर घूमना शुरू कर दिया।

धीरे-धीरे...

एक पूरा चक्कर।

उसके स्तन हल्के-हल्के लहरा रहे थे।

हर घुमाव के साथ उसकी मोटी जाँघें और गोल गांड़ हिल रही थी।

गुप्ता जी उसे घूर रहे थे।

उनकी आँखें नेहा के नंगे शरीर पर ऊपर से नीचे तक घूम रही थीं।

नेहा का पूरा शरीर शराब, पसीने, गुप्ता जी के थूक और अपनी चूत के रस से भीगा हुआ था।

कमरे की डिम लाइट में भी उसकी त्वचा चमक रही थी — जैसे कोई चिकना, गीला, हॉट मूर्ति हो।

उसकी छातियाँ, पेट, नाभि, जाँघें — हर जगह चमकदार नमी थी।

नेहा गुप्ता जी के हर हुकुम को ऐसे मान रही थी, जैसे वो एक गुड़िया हो और किसी ने उसमें चाबी भर दी हो।

गुप्ता जी ने फिर उँगली घुमाई।

नेहा बिना किसी हिचक के घूमने लगी — धीरे-धीरे, अपनी जगह पर।

गुप्ता जी दूसरा हाथ अपनी पाजामा रखकर में अपना लंड मसल रहे थे।

उनके शरीर पर अब सिर्फ़ एक पाजामा बचा हुआ था।

नेहा लगातार घूम रही थी।

3-4 चक्कर लग चुके थे।

ऐसा लग रहा था जैसे गुप्ता जी हर तरफ़ से नेहा को चेक कर रहे हों — माल खरीदने से पहले माल की जाँच।

मैंने वीडियो में देखा था थाईलैंड के रेड लाइट एरिया में ऐसे ही होता है।

जब नेहा की पीठ गुप्ता जी की तरफ़ थी, तब उन्होंने अचानक कहा,

गुप्ता जी: “रुक जा... ऐसे ही...”

नेहा तुरंत रुक गई।

उसकी पीठ गुप्ता जी की तरफ़ थी।

गांड़ थोड़ी ऊपर उठी हुई, जाँघें थोड़ी फैली हुईं।

नेहा की पतली कमर और उसके ऊपर वो परफेक्ट, गोल, मोटी गांड़...

हर हल्के से हिलने पर वो लहरा रही थी।

गुप्ता जी ने पीछे से उसे देखा।

उनकी नज़रें नेहा की नंगी गांड़ पर जमी हुई थीं।

वे कुछ पल तक उसे घूरते रहे, फिर अपनी जीभ से होंठ चाटे।

गुप्ता जी: (भारी आवाज़ में)

“चल... थोड़ा झुक जा...

हाथ स्लैब पर...”

नेहा समझ रही थी कि वो क्या करना चाह रहे हैं।

उसने बिना कुछ कहे, हल्का सा झुक गई।

दोनों हाथ स्लैब पर टिका दिए।

उसकी गांड़ अब और बाहर निकल आई थी — पूरी तरह नंगी, चमकती हुई।

गुप्ता जी ने दो कदम आगे बढ़े।

और फिर...

चटाक!

एक ज़ोरदार थप्पड़ नेहा की गांड़ पर पड़ा।

नेहा के मुँह से “आह्ह्ह!” निकल गई।

उसकी पूरी गांड़ हिल गई।

गुप्ता जी का हाथ का निशान साफ़ दिख रहा था — लाल, ताज़ा, पाँच उँगलियों वाला।

गुप्ता जी ने नेहा की गांड़ को देखा और संतुष्ट मुस्कान दी।

नेहा का शरीर झनझना गया।

उसकी जाँघें काँप रही थीं।

लेकिन वो झुकी हुई ही रही, गांड़ और बाहर निकालकर।

ये वो थप्पड़ नहीं था जो मैं अपने छोटे, मुलायम हाथों से मारता था।

ये तेज़, भारी और कड़क था।

मैंने देखा — नेहा की मोटी गांड़ थोड़ी देर तक थरथराते हुए झूल रही थी।

लाल निशान साफ़ उभर आया था।

मेरा लंड पैंट के अंदर ज़ोर का झटका लेकर और सख्त हो गया।

दर्द होने लगा था।

फिर भी मुझे लगा नेहा को बहुत दर्द हुआ होगा।

मैं गुस्से में बोल पड़ा,

सम: “ओये... ये क्या कर रहा है भेंचोद?!”

गुप्ता जी मेरी तरफ़ मुड़े। उनकी आँखें नशे और गुस्से से लाल थीं।

गुप्ता जी: (सख्ती से, घूरते हुए)

“श्श्श्श... भेन के लोड़े...

तुझसे किसी ने बात की यहाँ?

चुपचाप बैठ...”

फिर उन्होंने नेहा की तरफ़ देखा और मीठी आवाज़ में बोले,

गुप्ता जी: “ये मेरी और मेरी बेटी की बीच की बात है... है ना बेटी?”

नेहा ने गर्दन घुमाकर मेरी तरफ़ देखा।

उसकी आँखें नम थीं, लेकिन उसमें उत्तेजना भी थी।

उसने मेरी तरफ़ देखते हुए हल्का सा सिर हिलाया।

हाँ।

मैं ज़मीन पर घुटनों के बल बैठा था।

मेरा गुस्सा, जलन, उत्तेजना — सब एक साथ उबाल खा रहे थे।

लेकिन नेहा का वो “हाँ”... वो मुझे और भी चुप कर गया।

गुप्ता जी ने नेहा की गांड़ पर हाथ फेरते हुए पूछा,

गुप्ता जी: “तुझे लगी क्या बेटी?”

नेहा ने हल्का सा सिर हिलाया। हाँ।

गुप्ता जी: (मुस्कुराते हुए)

“अच्छा... लगी तुझे?

तो बता... और चाहिए तुझे??

बता अपने पति को...”

नेहा ने कुछ पल सोचा।

फिर मेरी तरफ़ देखा।

उसकी नज़र में नशा, शर्म और एक गहरी इच्छा थी।

फिर उसने धीरे-धीरे हाँ में सिर हिला दिया।

उसे और चाहिए था।

ये कोई हैरानी की बात नहीं लगी मुझे।

आज जो भी हो रहा था रात भर से, ये तो नेहा की छोटी हरकत थी।

गुप्ता जी: “Good girl...”

उन्होंने नेहा की गांड़ पर जो लाल निशान पड़ा था, वहाँ हाथ फेरते हुए बोले,

गुप्ता जी: “कहाँ चाहिए?”

नेहा ने अपना एक हाथ पीछे किया और गांड़ के दूसरे हिस्से को थपकते हुए इशारा कर दिया।

गुप्ता जी हँसे।

इस बार उन्होंने हाथ और पीछे ले जाकर...

चटाक!!!
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एक और ज़ोरदार थप्पड़।

नेहा की गांड़ फिर से थरथराई। लाल निशान और गहरा हो गया।

लेकिन इस बार गुप्ता जी ने थप्पड़ मारने में इतना ज़ोर लगा दिया कि उनका बैलेंस बिगड़ गया।

वे लड़खड़ाए और ज़मीन पर गिर गए।

धड़ाम!

गुप्ता जी ज़मीन पर बैठ गए, थोड़े से झुककर।

नेहा ने थप्पड़ के दर्द से “आह्ह्ह...” की आवाज़ निकाली।

वो कुछ समझ पाती, उससे पहले गुप्ता जी के गिरने की आवाज़ आई — धड़ाम!

नेहा ने पीछे मुड़कर देखा।

गुप्ता जी ज़मीन पर पड़े हुए थे।

फिर उसने मुझे देखा — मैं भी ज़मीन पर घुटनों के बल बैठा था।

ये देखकर नेहा की एकदम से हँसी निकल गई।

रात में पहली बार नेहा ने अपना submissive चरित्र ब्रेक किया था।

शायद सीन देखकर उससे रुका ही नहीं गया।

वो गुप्ता जी की तरफ़ इशारा करके ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगी।

उसकी आँखों में अभी भी पानी था — जो थप्पड़ के बाद आया था — लेकिन अब वो खुलकर हँस रही थी।

फिर उसने मेरी तरफ़ देखा।

मुझे हँसते देखकर वो और ज़ोर से हँस पड़ी।

गुप्ता जी का चेहरा लाल हो रहा था।

उन्हें लग रहा था कि उनका मजाक उड़ाया जा रहा है।

पहले उन्होंने अपने बल पर उठने की कोशिश की, लेकिन नशे की वजह से उनका शरीर हिला भी नहीं।

फिर वो थोड़ा सरकते हुए, पेट के बल रेंगते हुए नेहा के पास पहुँचे।

नेहा खड़ी थी।

गुप्ता जी ज़मीन पर पेट के बल लेटे हुए थे।

उन्होंने पहले एक हाथ से नेहा के बाएँ पैर को नीचे से पकड़ लिया, फिर दूसरे हाथ से दाएँ पैर को।

दोनों हाथों से नेहा की टाँगों को कसकर पकड़कर उन्होंने खींचने की कोशिश शुरू कर दी।

नेहा की टाँगें अब गुप्ता जी के हाथों में थीं।

वो ज़मीन पर पड़े हुए थे और नेहा की जाँघों को खींच रहे थे, जैसे उसे अपने पास खींचना चाहते हों।

गुप्ता जी के हाथ नेहा की जाँघों पर चढ़ रहे थे।

वे लड़खड़ाते हुए बैलेंस बनाने की कोशिश कर रहे थे, जैसे किसी तरह खड़े होना चाहते हों।

फिर उन्होंने नेहा की जाँघों को कसकर पकड़ लिया और जैसे-तैसे अपने घुटनों पर आ गए।

जैसे ही बैलेंस बना, सबसे पहला काम उन्होंने नेहा की जाँघों में फँसी हुई पैंटी को ज़मीन की तरफ़ एक ज़ोरदार झटके से खींच लिया।

पैंटी नेहा की जाँघों से निकलकर ज़मीन पर गिर गई।

अब नेहा पूरी तरह नंगी खड़ी थी।

नेहा की हँसी तो बंद हो चुकी थी, लेकिन उसकी खिलखिलाहट अभी भी हवा में तैर रही थी।

घुटनों पर बैठे गुप्ता जी के ठीक सामने नेहा की चूत थी — पूरी तरह नंगी, गुलाबी और हल्के-हल्के रिस रही थी। छोटी-छोटी बूँदें उसकी जाँघों की अंदरूनी सतह पर चमक रही थीं।

जैसे ही गुप्ता जी ने अपना मुँह और करीब लाया, नेहा की खिलखिलाहट एकदम से रुक गई।

उसने गुप्ता जी की गर्म साँसें अपनी चूत पर महसूस कीं।

नेहा नीचे झाँक कर देख रही थी। गुप्ता जी उसकी चूत से बस एक इंच दूर थे। उनकी गर्म हाँफती साँसें सीधे उसकी नम फाँकों पर पड़ रही थीं।

गुप्ता जी: (नशे और उत्तेजना में भारी आवाज़ में)

“साली बिलकुल कसी हुई है... ये मादरचोद करता क्या है इसके साथ फिर?”

नेहा ने कुछ नहीं कहा।

बस उसने अपना हाथ नीचे किया और गुप्ता जी के हल्के सफ़ेद बालों में उँगलियाँ फिराने लगी — धीरे-धीरे, लगभग प्यार से समवारते हुए।

गुप्ता जी: (और करीब आते हुए, होंठों से लगभग छूते हुए)

“मरदचोद कुछ तो करता होगा ना... नहीं तो तू काम का इसे छोड़ देती?”

नेहा शर्माते हुए मुस्कुराई। उसकी आँखें आधी बंद थीं। गुप्ता जी के बालों में उँगलियाँ फिराते हुए वो धीमी, लेकिन बिना किसी शर्म के आवाज़ में बोली:

नेहा:

“और भी तरीके होते हैं...”

गुप्ता जी: (हँसते हुए, नाक से नेहा की चूत के पास ही)

“हम्म... लगा मुझे... इसे देखकर ही लगता है ये अच्छे से खाता होगा इसे।”

नेहा: (मुस्कुराते हुए, गुप्ता जी के बालों में उँगलियाँ फिराते हुए)

“बहुत अच्छे से...”

गुप्ता जी: (ज़बान की नोक से हल्का-हल्का चाटते हुए)

“जो साले अपने लंड से कुछ नहीं कर पाते... वो ऐसे स्किल में माहिर हो जाते हैं।”

नेहा ने कुछ नहीं कहा।

बस मुस्कुराती रही।

मेरा मजाक उड़ाया जा रहा था।

मगर कोई नहीं हँसा। कमरे में सिर्फ़ भारी साँसें और नेहा की हल्की सिसकारियाँ थीं।

गुप्ता जी: (अपनी ज़बान को थोड़ा और अंदर घुसाते हुए)

“पर साला मुझे ज़रूरत नहीं पड़ी कभी इसकी... या साली तेरी जैसी चूत कभी नहीं मिली।

मगर आज...”

नेहा: (आँखें बंद करके, हल्के से काँपते हुए)

“आज क्या...?”

गुप्ता जी ने नेहा की चूत पर हल्के से फूँक मारी। गर्म हवा उसकी नम फाँकों पर पड़ी तो नेहा का पूरा शरीर सिहर गया।

नेहा:

“अच्छा करके दिखाइए ट्राई... मुझे लगता है आप भी अच्छा ही करेंगे।”

गुप्ता जी : (आँखें खोलकर, शरारत भरी नज़र से नीचे देखते हुए)

“अच्छा बेटी... क्यों लगता है तुझे ऐसा?”

नेहा: (धीरे से, लेकिन पूरी शरारत के साथ)

“मुझे लगता है क्योंकि ये आपके खून में है... आशा है आपको किसी की जूठी चीज़ खाने में कोई दिक्कत नहीं होगी।”

मैं और गुप्ता जी दोनों ही एक पल के लिए चुप।

हम दोनों सोच रहे थे कि नेहा क्या बोल रही है।

नेहा ने गुप्ता जी की आँखों में देखा और... आँख मार दी।

कुछ तो था जो वो गुप्ता जी को सिर्फ़ उनके कान में सिहरों भरे शब्दों में कह रही थी। मैं नहीं समझ पाया।

पर गुप्ता जी का चेहरा एकदम बदल गया। उनकी आँखें चौड़ी हो गईं, फिर नशे और उत्तेजना में जल उठीं।

गुप्ता जी: (हँसते हुए, लेकिन आवाज़ में एक अजीब सी गर्मी)

“चुप मादरचोद... झूठ बोल रही है साली!”

और नेहा फिर से खिलखिला पड़ी।

ये हँसी कुछ अलग थी — जैसे किसी को चिढ़ाते हुए, शरारत से हँस रही हो।



गुप्ता जी का हाथ नेहा की जाँघों से ऊपर चढ़ता हुआ उसके कंधे तक पहुँच गया। वो खड़े होने के लिए सहारा ढूंढ रहे थे। नेहा हँसते-हँसते अपना हाथ बढ़ाकर उन्हें सहारा देने लगी।

लड़खड़ाते हुए, हाँफते हुए गुप्ता जी किसी तरह अपने पैरों पर खड़े हो गए।

मुझे अभी भी पूरी तरह समझ नहीं आ रहा था कि अचानक क्या हो रहा है।

गुप्ता जी: (गुस्से और नशे में)

“तू साली झूठ बोल रही है... मेरा बेटा ऐसा नहीं है!”

उस वाक्य ने मुझे तुरंत क्लियर कर दिया — नेहा ने गुप्ता जी को उनके बेटे के बारे में चिढ़ाया था।

मुझे याद आया जब मेने नेहा को पार्टी में राहुल के साथ टॉयलेट से बहार आते हुए देखा था
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नेहा हँसते हुए ना में सिर हिलाने लगी, जैसे मासूम बच्ची की तरह।

अचानक गुप्ता जी का गुस्सा भड़क गया। उन्होंने झटके से नेहा की गर्दन पकड़ ली।

गुप्ता जी ने गर्दन कसकर पकड़ते हुए नेहा को दीवार से चिपका लिया। नेहा की नंगी देह उनके शरीर से सट गई।

नेहा: (अभी भी हँसते हुए, बिल्कुल डरे बिना)

“क्या हुआ गुप्ता जी... खाइए ना... मैं भी कंपेयर कर सकूँ कि बाप अच्छे से करता है या बेटा...”

सीन एकदम से बदल चुका था।

अभी तक जो मेरी सबमिसिव पत्नी गुप्ता जी के सामने नंगी खड़ी थी, वो अचानक उन्हें चिढ़ा रही थी। जैसे उसे पता चल गया हो कि इनको गुस्सा दिलाकर और उत्तेजित कैसे किया जाए।

गुप्ता जी का हाथ अभी भी उसकी गर्दन पर था, उँगलियाँ हल्के से दब रही थीं।

गुप्ता जी: (गुस्से में)

“नहीं नहीं... तू झूठ बोल रही है!”

नेहा: (हँसते हुए, आँखों में शरारत लिए, गर्दन पर उनका हाथ होने के बावजूद)

“क्यों? आपको झूठा पसंद नहीं है क्या...?

वैसे भी आप चख चुके हैं अपने बेटे को... मेरे होंठों से... मेरे boobs से...”

नेहा को बिल्कुल फर्क नहीं पड़ रहा था कि गुप्ता जी क्या बोल रहे हैं। वो हँसते हुए, बेफिक्र होकर बोल रही थी।

गुप्ता जी: (गुस्से में, दाँत पीसते हुए)

“नहीं... मेरा बेटा तुम लोगों की तरह नहीं है... वो बहुत शरीफ है!”

नेहा: (हँसते हुए, शरारत से)

“हाँ बहुत शरीफ है राहुल... तभी तो उसने टॉयलेट का गंदा फर्श भी नहीं देखा... वहीं बैठ गया नीचे...”

थप्पड़!

थप्पड़!

थप्पड़!

तीन जोरदार तमाचे नेहा के नाजुक गालों पर पड़े। हर तमाचे के साथ नेहा का सिर हिल गया, उसके गाल लाल होकर चमकने लगे।

मुझे भी गुस्सा आया।

पर हर तमाचे के साथ मेरे लंड ने अलग रिस्पॉन्स दिया — हर थप्पड़ पर मेरा लंड जोर से झटका खा रहा था। पत्थर जैसा खड़ा होकर बार-बार ऊपर की तरफ उछल रहा था, जैसे हर झटके में और ज़्यादा उत्तेजित हो रहा हो।

मैं तेजी से आगे बढ़ा कि गुप्ता जी का हाथ पकड़ लूँ।

लेकिन नेहा पूरी मस्ती में थी। उसने बायाँ हाथ पीछे करके मुझे रोक दिया — आँखों में साफ़ इशारा: “रुक जा”।

फिर वो गुप्ता जी की तरफ मुड़ी। अपनी नंगी देह को उनके शरीर से और भी चिपकाते हुए, उसने छाती आगे की।

भारी boobs उनके सीने से जोर-जोर से रगड़ खा रहे थे।

नेहा का पूरा चेहरा अब लाल हो चुका था।

गालों पर तमाचों के निशान गहरे लाल थे।

हाँफते हुए भी वो हँस रही थी।

गुप्ता जी: (गुस्से और नशे में चीखते हुए)

“साली बोल... ये झूठ है... मादरचोद... रंडी... कुतिया... मेरा बेटा... मेरा बेटा...!”

शराब का असर अब पूरी पीक पर था।

गुप्ता जी को शब्द भी ठीक से नहीं मिल रहे थे।

उनका हाथ अभी भी नेहा की गर्दन पर कसा हुआ था।

नेहा फिर भी नहीं रुकी।

वो हँसते-हँसते बोलती रही।

नेहा: (शरारत भरी आवाज़ में)

“मैं तो सु-सु गई थी... मैंने बोला थोड़ा क्लीन करने दो...

मगर आपका प्यारा बच्चा नहीं माना...

उसे फर्क नहीं पड़ा कि चूत गंदी है या साफ...

पूरी शिद्दत से उसने...”

गुप्ता जी और करीब आ गए।

उन्होंने नेहा की बात बीच में ही रोक दी।

अपना मुँह आगे बढ़ाकर नेहा के होंठों पर अपने होंठ रख दिए।

चुप्प...

नेहा को बात पूरी नहीं करने दी।

दो मिनट तक उन्होंने नेहा को दीवार से जोर से चिपका रखा।

अपना पूरा वजन नेहा के नंगी शरीर पर डाल दिया।

एक हाथ नेहा के बालों में घुसकर कस गया था।

दूसरा हाथ गर्दन पर था।

गुप्ता जी के होंठ नेहा के होंठों को बुरी तरह चूस रहे थे।

ज़बान जबरदस्ती उसके मुँह में घुस रही थी।

गहरे, गुस्से भरे किस थे।

नेहा पहले हल्का विरोध कर रही थी।

फिर वो भी उनके किस में घुल गई।

उसकी नंगी देह उनके शरीर से रगड़ खा रही थी।

जब गुप्ता जी ने साँस लेने के लिए हटे, तो नेहा के होंठ सूज गए थे और चमक रहे थे।

नेहा ने अपनी उँगली उठाई और सूजे हुए होंठों के खास हिस्से पर रख दी।

ऐसा लग रहा था जैसे वहाँ काटा गया हो।

दोनों के चेहरे एकदूसरे के बहुत करीब थे।

दोनों लंबी-लंबी साँसें ले रहे थे।

गुप्ता जी को लगा कि नेहा अब शांत हो गई है।

मगर नेहा का ये रूप अलग था।

नेहा: (हाँफते हुए, शरारत भरी मुस्कान के साथ)

“मगर मुझे किस में छोटे गुप्ता से ज़्यादा बड़ा गुप्ता पसंद आया...”

गुप्ता जी का चेहरा वापस तमतमा गया।

उन्होंने एक हाथ दीवार पर टिकाया।

दूसरे हाथ से नेहा के गले पर थोड़ा और ज़ोर डाल दिया।

नेहा का चेहरा और ज़्यादा लाल हो गया।

उसकी मुस्कुराहट गायब हो गई।

ऐसा लग रहा था जैसे उसे साँस लेने में दिक्कत हो रही हो।

ये देखकर गुप्ता जी ने अपना हाथ गले से हटा लिया।

फिर उनका हाथ सीधा अपने पजामे के नाड़े पर चला गया।

गुप्ता जी: (गुस्से और उत्तेजना में भारी आवाज़ में)

“साली... तुझे बताता हूँ बड़ा गुप्ता क्या कर सकता है... रंडी...”

जैसे ही गुप्ता जी का हाथ गले से हटा, नेहा खाँसते-खाँसते दीवार से सटी हुई नीचे सरक गई।

वो ज़मीन पर बैठ गई, पीठ दीवार से टिकी हुई।

लंबी-लंबी साँसें ले रही थी।

उसका चेहरा अभी भी लाल था।

थोड़ी देर बाद उसने सामने का नज़ारा देखा।

गुप्ता जी खड़े थे।

एक हाथ दीवार पर सहारे के लिए टिका हुआ था।

दूसरा हाथ अपने पजामे के नाड़े पर था।

बार-बार उँगलियाँ नाड़े की गाँठ पर फिसल रही थीं।

नशा और गुस्सा दोनों मिलकर उनकी उँगलियों को बेकाबू कर रहे थे।

वो बार-बार कोशिश कर रहे थे, लेकिन गाँठ नहीं खुल रही थी।

नेहा ने हल्का-सा मुस्कुराते हुए अपना हाथ बढ़ाया।

उस हाथ पर जो नाड़ा खोलने की कोशिश कर रहा था, उस पर हल्का सा चांटा मार दिया।

जैसे कह रही हो — “हटो, मैं करती हूँ।”

गुप्ता जी ने चौंककर हाथ हटा लिया।

नेहा ने दोनों हाथों का इस्तेमाल करके गुप्ता जी के पजामे का नाड़ा खोल दिया।

जब तक वो कर रही थी, गुप्ता जी बदबदा रहे थे।

गुस्से में।

गाालियाँ निकाल रहे थे।

गुप्ता जी: (भारी और नशीली आवाज़ में)

“बहुत शौक है रंडी बनने का...

आज बताऊँगा...

रात भर कुतिया की तरह चोदूँगा...”

नेहा की उँगलियों ने कमाल कर दिया।

सrrr...

पजामा एक झटके में नीचे आ गया।

अब गुप्ता जी के सामने डार्क नीले ट्रायंगुलर अंडरवियर में उनका खजाना छिपा हुआ था।

अंडरवियर इतना टाइट था कि आस-पास से घने बाल झाँक रहे थे।

नेहा ने दोनों हाथ अंडरवियर की इलास्टिक पर रखे।

और धीरे-धीरे नीचे खींच दिया।

गुप्ता जी: (अभी भी बदबदाते हुए)

“कुतिया... ऐसे लंड से नहीं चुदा करे तू...

आज असली मर्द क्या होता है पता चलेगा...”

लगा था जैसे कोई बड़ा साँप निकलेगा।

साँप तो निकला...

मगर सोया हुआ।

गुप्ता जी का लंड अर्द्ध-उत्तेजित अवस्था में लटक रहा था।

मोटा, लेकिन अभी पूरी तरह खड़ा नहीं हुआ था।

सिरा भारी, गोल, और घने बालों से घिरा हुआ।

नेहा ने पहले गंभीर चेहरे से गुप्ता जी के लटके हुए लंड की तरफ देखा।

फिर उसने सिर ऊपर उठाया।

पहले गुप्ता जी की तरफ।

फिर मेरी तरफ।

मैं बहुत पास खड़ा था।

अचानक नेहा की हँसी फूट पड़ी।

ज़ोर से।

जोर-जोर से।

नेहा: (हँसते-हँसते, आँखों में आँसू आ गए)

“हाहाहा... बड़ा गुप्ता तो फुस्स निकला... छोटा गुप्ता जीत गया!”

गुप्ता जी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था।

उनका चेहरा और लाल हो गया।

शायद बढ़ती उम्र, ज़्यादा शराब और गुस्से की वजह से खून लंड तक पहुँच ही नहीं पा रहा था।

नेहा की बातें उन्हें और गुस्सा दिला रही थीं।

गुप्ता जी: (गुस्से में चीखते हुए)

“रुक साली... अभी खड़ा होगा!”

उन्होंने अपना लंड हाथ में ले लिया और हिलाने की कोशिश करने लगे।

नेहा: (हँसी नहीं रुक रही थी)

“हाहाहा... बातें बड़ी-बड़ी... धमाका होगा... आप तो फुस्सी निकाले!”

मुझे लगा अब नेहा को रोकना चाहिए।

कहीं गुस्से में इस बूढ़े का हार्ट अटैक न हो जाए।

गुप्ता जी ने पहले हाथ से लंड हिलाकर खड़ा करने की कोशिश की।

फिर दूसरा हाथ दीवार से हटाकर नेहा को एक और जोरदार थप्पड़ मार दिया।

थप्पड़!

गुप्ता जी: (चीखते हुए)

“चुप साली!”

फिर उन्होंने नेहा के बालों को मुठ्ठी में कसकर पकड़ लिया।

कमर आगे बढ़ाई और अपना लटका हुआ लंड नेहा के चेहरे के पास ले गए।

गुप्ता जी: (भारी आवाज़ में)

“साली मुँह में ले... तैयार कर... फिर देखना कितना बड़ा है तेरे चूतिए पति से...”

नेहा ने गुप्ता जी की आँखों में सीधे देखा।

और ना में सिर हिला दिया।

गुप्ता जी ने अपना लटका हुआ लंड नेहा के चेहरे पर फेरना शुरू कर दिया।

धीरे-धीरे, गुस्से और हताशा के साथ वो उसे नेहा के गालों पर, सूजे हुए होंठों पर, और नाक पर रगड़ रहे थे।

पूरी कोशिश कर रहे थे कि किसी तरह लंड खड़ा हो जाए।

नेहा ने अपना मुँह कसकर बंद कर लिया था।

होंठों को भींचे हुए ऊपर गुप्ता जी की तरफ देख रही थी।

उसकी आँखों में अभी भी वही शरारत और चुनौती थी।

गुप्ता जी ने नेहा के बालों को और कसकर खींचा।

उसका सिर पीछे की तरफ झुक गया।
गुप्ता जी: (गुस्से में गरजते हुए)


“खोल ना साली मुँह...!”

नेहा ने हल्का सा ना में सिर हिला दिया।

उसके होंठ और भी कस गए।

वो बिल्कुल नहीं खोल रही थी।

गुप्ता जी के लंड से प्रीकम बह रहा था।

नेहा के पूरे चेहरे को गीला कर रहा था।

नेहा उसे करने दे रही थी।

मगर जैसे ही गुप्ता जी लंड का टोपा उसके होंठों पर लगाकर मुँह में डालने की कोशिश करते, नेहा मुँह फेर लेती।

नेहा: (शरारत भरी आवाज़ में)

“आप मुझसे ज़बरदस्ती नहीं कर सकते अंकल...”

जैसे वो कोई खेल खेल रही हो।

मैंने देखा — गुप्ता जी का हाथ ढीले लंड की खाल को तेज़ी से ऊपर-नीचे कर रहा था।

गुप्ता जी: (गुस्से में)

“साली... रंडी... ज़बरदस्ती बोल रही है... खोल ना मुँह कुतिया...”

और वो और होल्ड नहीं कर पाए।

सफ़ेद पानी की एक लहर सी उनके लंड के टोपे के छेद से बाहर निकली।

नेहा के चेहरे पर।

एक... दो... तीन... चार... पाँच...

जैसे कई सालों का स्टोर करके रखा हो।

नेहा के खूबसूरत चेहरे पर गाढ़ा, गर्म वीर्य छिटक गया।

उसकी आँखें, गाल, होंठ, नाक — सब कुछ ढक गया।

थोड़ी देर सब शांत रहा।

जैसे कोई तूफ़ान गुज़र गया हो।

सबसे पहले गुप्ता जी ने नेहा के बालों को छोड़ा।

जैसे नशा उतर गया हो।

जैसे कोई सीन खत्म होने के बाद डायरेक्टर ने “कट” बोल दिया हो।

वे अपने सहारे से खड़े नहीं हो पा रहे थे।

इसलिए ज़मीन पर धड़ाम से गिर गए।

गुप्ता जी: (बार-बार)

“सॉरी... सॉरी... सॉरी बेटी... सॉरी बेटा...”

उन्हें महसूस हुआ कि पिछले 15 मिनट में उन्होंने क्या करने की कोशिश की थी।

सिक्युरिटी में इसके लिए कई साल की सज़ा है।

थोड़ी और हिम्मत करके वे उठे।

“सॉरी... सॉरी...” अभी भी ज़ुबान पर था।

और वो बाथरूम की तरफ़ भागे।

फिर वहाँ से हमें उल्टियों की आवाज़ें आने लगी।

नेहा मेरे पास बैठी थी।

उसका चेहरा अभी भी गुप्ता जी के सफ़ेद पानी में सना हुआ था।

बेहद खूबसूरत लग रही थी।

मैं

“ये सब क्या था?”

मैं:

“क्या तुम और राहुल...?”

नेहा ने मेरी आँखों में देखते हुए ना का इशारा किया।

मैं:

“फिर क्यों?”

इस बार नेहा सीधे मेरी तरफ़ बढ़ी।

होंठ से होंठ मिले।

वो होंठ जो अभी गुप्ता जी से चिपके हुए थे।

जिन्हें खोलने के लिए गुप्ता जी ने लंड रगड़ा था।

मगर बेझिझक नेहा ने किस का स्वागत किया।

हमारे चेहरे मिले।

गुप्ता जी का पानी अब मेरे मुँह पर भी चिपचिपा रहा था।

नेहा ने मेरे लंड की हार्डनेस को अच्छे से महसूस किया।

फिर नेहा खड़े होने की कोशिश करती है, मेरे साथ।

वो स्लैब पर रखे गुप्ता जी के पैकेट से एक सिगरेट निकालती है।

मेरा हाथ पकड़कर सोफ़े की तरफ़ बढ़ी।

नेहा: (सिगरेट जलाते हुए)

“मुझे लगा नहीं था कि एक ही रात में...”

मैं:

“रात में क्या बेबी...?”

नेहा:

“कुछ नहीं... चेक करो... मर तो नहीं गया साला हमारे बाथरूम में... और कोई गंदगी की होगी तो बूढ़ा खुद साफ़ करे।”

सीधा साला।

कोई गुप्ता जी नहीं।

कोई इज़्ज़त नहीं।

ये वही नेहा थी जो आधे घंटे पहले इतनी सबमिसिव प्ले कर रही थी।

थोड़ी देर बाद मैं गुप्ता जी को आधी बेहोश हालत में बाथरूम से लाया।

आते ही सोफ़े पर पटका।

वो अपने कपड़े ढूंढ रहे थे।

मैंने मदद की।

बैकग्राउंड में “सॉरी... सॉरी...” बज रहा था।

पूरे कपड़े पहनने के बाद वो नेहा के पास आता है।

नेहा नंगी।

टाँगें खुली।

कोई शर्म नहीं।

सिगरेट का धुआँ उड़ाते हुए।

पास आते ही वो किसी बच्चे की तरह रोने लगता है।

वो आदमी जो थोड़ी देर पहले मेरे खानदान को चोदने की बातें कर रहा था।

नेहा ने उनके कंधे पर हाथ रखा।

नेहा:

“It’s ok uncle... कोई बात नहीं... मैं किसी से कुछ नहीं कहूंगी... प्लीज़ आप ये रोना-धोना मत कीजिए...”

गुप्ता जी:

“I am sorry बेटी... मैं अब कभी नहीं...”

नेहा ने पूरा सेंटेंस होने नहीं दिया।

“लेकर जाओ इसको... घर छोड़ दो।”

मैं अंकल को पकड़कर घर ले गया।

3 बज रहे थे।

उनका दरवाज़ा खुला था।

उनका रोज़ का हाल था ऐसा।

घर से कोई नहीं जागा।

वापस आया तो नेहा हमारी ऑफ़िस चेयर पर बैठी हुई थी।

लैपटॉप ऑन था।

वो एक ईमेल का जवाब दे रही थी।

“हम तैयार हैं... आप प्लीज़ डेट्स कन्फ़र्म कीजिए...”


The End

(End of Chapter 3)
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