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तीसरा दिन। सुबह के 11 बज रहे हैं। गर्मी बहुत है।
सुमन अकेली बिस्तर पर पड़ी है। उसकी आँखें खुली हैं। वह छत की तरफ देख रही है। उसके हाथ उसके शरीर पर हैं — एक हाथ उसके बड़े स्तनों पर, दूसरा हाथ उसकी जांघों के बीच।
वह सोच रही है: राज ने यह आग लगाई। और अब वह आग बुझने वाली नहीं।
उसकी चूत — बेचारी उसकी चूत — लंड के बिना पागल हो रही है। वह सूखी नहीं बैठ सकती। वह खाली है। खोखली है। उसके अंदर कुछ ऐसा है जो चीख रहा है। भर दो। कुछ भी करो। बस भर दो।
वह उठती है। नहा लेती है। ठंडे पानी से। पर ठंडा पानी भी उसकी गर्मी नहीं बुझा पाता।
अलमारी खोलती है। राज के कपड़े देखती है। उन्हें सूंघती है। उसकी महक। उसकी याद। उसका लंड।
वह रोना चाहती है। वह चिल्लाना चाहती है। पर आवाज़ नहीं निकलती।
बाहर निकलने का फैसला:
वह खुद से कहती है — मैं राज को धोखा नहीं देना चाहती। मैं उससे बहुत प्यार करती हूँ। बेइंतहा प्यार।
लेकिन उसकी चूत। वह चूत — वह सिर्फ लंड चाहती है। लंड। बस लंड। कोई भी लंड।
लंड के भूख के आगे सब कुछ फेल है। यही सच है। यही उसकी हकीकत है।
वह टाइट लेगिंग पहनती है। वही काली लेगिंग — जिसमें उसकी गांड गोल और भारी दिखती है। ऊपर एक छोटी सी कमीज। हल्के रंग की। बहुत हल्की। ब्रेसलेस। उसके निप्पल कपड़े के नीचे दब रहे हैं। साफ दिख रहे हैं।
वह आईने में देखती है।
तेरी शक्ल देख, सुमन, वह सोचती है। तेरी आँखों में क्या है? भूख। बस भूख।
वह गहरी सांस लेती है। और घर से निकल जाती है।
दुविधा में कदम:
बाजार दूर नहीं है। पंद्रह मिनट की पैदल दूरी। रिक्शा है। बस है। टैक्सी है। सब कुछ है।
लेकिन वह पैदल ही चल रही है। धीरे-धीरे। अपनी रफ्तार से।
वह सोच रही है — क्या कर रही हूँ मैं? कहाँ जा रही हूँ?
पर उसके पैर नहीं रुक रहे। उसकी चूत उसे खींच रही है। बाजार की तरफ। भीड़ की तरफ। नज़रों की तरफ।
वह कुछ ही कदम आगे बढ़ी थी कि पीछे से आवाज़ आई —
सुबह के 11 बज रहे थे। गर्मी अपने चरम पर। सूरज सीधा सिर पर। सड़कें पिघल रही थीं।
सुमन घर से निकली। उसके कदम भारी थे। पर उसके अंदर कुछ और ही चल रहा था। एक बेचैनी। एक आग। राज ने जो आग लगाई थी, वह अब उसे अंदर से जला रही थी। वह रुकने वाली नहीं थी।
उसने टाइट लेगिंग पहनी थी। वही काली लेगिंग जो उसके गांड की गोलाई को पूरी तरह दिखाती थी। ऊपर एक छोटी सी कमीज। हल्के नीले रंग की। बहुत हल्की। बिना ब्रा के। उसके बड़े स्तन कमीज के नीचे स्वतंत्र थे। उसके निप्पल कपड़े को चीरते हुए बाहर झाँक रहे थे। उसकी चूत पहले से ही गीली थी। सिर्फ सोच से। सिर्फ राज के नाम से। सिर्फ उस आग से जो उसके अंदर लगातार धधक रही थी।
वह बस स्टैंड की तरफ बढ़ी। पर उसके कदम कुछ और ही कह रहे थे। वह रिक्शा या बस में नहीं बैठना चाहती थी। वह चाहती थी — कुछ और। कोई हाथ। कोई लंड। कोई साहसिकता।
तभी पीछे से आवाज़ आई।
"कहाँ जाना है, मैडम?"
आवाज़ भारी थी। गरज जैसी। पर फिर भी नर्म।
सुमन ने पीछे मुड़कर देखा। वह टैक्सी थी। एक पुरानी सफेद इंडिका। खिड़कियों पर धूल। पर अंदर एसी चल रहा था — उसकी ठंडी हवा बाहर निकल रही थी।
खिड़की से एक चेहरा बाहर आया। मूंछें। गहरी आँखें। गोरा रंग। हाथ स्टीयरिंग पर। और आँखें — उसके सिर से पैर तक घूम चुकी थीं।
"मैं संदीप, मैडम। याद है? क्लब वाली रात। राज सर के साथ थीं आप। मैं ही लेकर आया था घर।"
सुमन को कुछ याद आया। धुंधली सी तस्वीरें। नशे में उतारा गया शरीर। राज का हाथ उसकी कमर पर। और यह चेहरा — पीछे के शीशे में। उसे देखता हुआ।
"हाँ, याद आया," उसने कहा। उसकी आवाज़ में वह गर्मी नहीं थी जो वह दिखाना चाहती थी। वह बस कह रही थी। पर उसके अंदर कुछ और ही चल रहा था — यह वही है जिसने उस रात मुझे घर छोड़ा था। मेरी नींद में। मेरे नशे में। क्या उसने मुझे देखा था? क्या उसने...
"मार्केट चलोगे?" उसने पूछा।
संदीप की आँखें चमक गईं। "हाँ-हाँ, बिल्कुल। बैठिए। चलते हैं।"
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सुमन ने पीछे का दरवाजा खोला। गर्मी की लहर ने उसका स्वागत किया। पर फिर उसने दरवाजा बंद कर दिया। वह आगे गई। ड्राइवर की बगल वाली सीट खोली। और बैठ गई।
सीधे उसके बगल में।
संदीप ने उसकी तरफ देखा। एक बार। पर वह देख बहुत कुछ था। उसकी आँखें सुमन की जांघों पर गईं — जो लेगिंग में जकड़ी हुई थीं और मोटी, रसीली, गोल दिख रही थीं। फिर उसके स्तनों पर — जो बिना ब्रा के कमीज के नीचे हिल रहे थे। फिर उसकी गर्दन पर — जहाँ पसीने की बूँदें चमक रही थीं। फिर उसके चेहरे पर — जो गर्मी से लाल हो चुका था, और कुछ और वजह से भी।
"एसी तेज कर दो, भैया। बहुत गर्मी लग रही है," सुमन ने कहा। उसने अपनी कमीज का गला थोड़ा खोला। सिर्फ थोड़ा सा। पर उसके स्तनों का काला क्लीवेज निकल आया। गहरा। नम। पसीने से चमकता हुआ।
संदीप का गला सूख गया। उसने एसी की स्पीड बढ़ा दी। ठंडी हवा सुमन के चेहरे पर आई। उसने अपना चेहरा उसकी तरफ कर लिया — जैसे वह हवा का मजा ले रही हो, पर असल में वह अपने क्लीवेज को संदीप की तरफ कर रही थी।
गाड़ी चलने लगी। रास्ते में गड्ढे थे। हर झटके पर सुमन के स्तन झूलते थे। उसकी जांघें संदीप के हाथ से रगड़ खाती थीं — कभी-कभी। जानबूझकर। गलती से नहीं। सुमन जानती थी।
"आज बहुत गर्मी है," सुमन ने फिर कहा। उसने अपने बालों को गर्दन से हटाया। उसकी गर्दन गीली थी। पसीने से। पर सिर्फ पसीना नहीं था वहाँ — उसकी नसें उभर आई थीं। उसकी गर्दन की धड़कन दिख रही थी।
संदीप ने अपनी पैंट में हलचल महसूस की। उसका लंड — अनुशासनहीन — सिर उठाने लगा था। उसने अपनी कमर को आगे किया। उसे छिपाने की कोशिश की। पर सुमन की आँखें नीचे गईं। एक सेकंड के लिए। उसने देख लिया था।
वह मुस्कुराई। अंदर ही अंदर।
"जी मैडम, है तो गर्मी। और आप तो वैसे भी... हॉट हैं। तो आपको और लगती होगी। हे हे हे," संदीप ने कहा। वह हंसा। अपनी हिमाकत पर। उसके दांत निकल आए। सुमन को उसकी बात में दोहरा अर्थ सुनाई दिया।
वह भी मुस्कुरा दी। "बहुत चालाक हो भैया तुम।"
संदीप का दिल जोर से धड़का। उसने सोचा — यह मुझे टीज़ कर रही है। साली... मजे ले रही है।
अब सुमन ने वह किया जो उसने पिछले दो महीनों में किसी और के साथ नहीं किया था। वह आगे की तरफ झुकी। इतना आगे कि उसकी छाती एसी के ठीक सामने आ गई। उसकी कोहनियाँ डैशबोर्ड पर टिक गईं। उसकी कमीज आगे की तरफ लटक गई — पूरी तरह।
अब संदीप साफ-साफ देख सकता था।
उसके स्तन लटक रहे थे। बड़े। भारी। मोटे। उनके निप्पल कड़े थे — पत्थर जैसे। कमीज का कपड़ा उन पर चढ़ गया था, जैसे वहाँ कुछ भी न हो। उसके स्तनों के बीच की दरार गहरी थी। पसीने से चमक रही थी। और उस गहराई से एक गंध आ रही थी — उसके शरीर की गंध। नम। गर्म। औरत की।
संदीप की साँसें रुक-रुक कर चलने लगीं। उसका लंड अब पूरी तरह सख्त था। उसकी जींस में जगह कम थी। उसने अपना हाथ नीचे रखा — ढकने के लिए। पर वह ढक नहीं पा रहा था। उसका लंड उसकी जींस से बाहर निकलने को था।
उसकी आँखें सड़क पर थीं। पर उसकी नज़रें सुमन के स्तनों पर थीं। वह तिरछी नज़रों से देख रहा था — बार-बार। रोड देखता, फिर उसकी तरफ देखता। उसकी गर्दन दुखने लगी थी। पर वह रुक नहीं सकता था।
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सुमन ने और झुक कर उसे मजा दिया।
उसने अपने स्तनों को हाथों से उठाया — जैसे उन्हें सहारा दे रही हो — और एसी की हवा उनके नीचे जाने दी। उसकी यह हरकत इतनी स्पष्ट थी कि संदीप लगभग कराह उठा।
"तुम्हारी तो... बहुत गर्मी लग रही है मैडम," उसने कहा। उसकी आवाज़ में काँप थी। "अंदर से।"
सुमन ने पीछे मुड़कर उसकी तरफ देखा। उसकी आँखों में शरारत थी — और कुछ और भी। भूख। "हाँ भैया। बहुत। बहुत ज्यादा।"
संदीप ने अपनी पैंट का बटन खोल दिया। चुपके से। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं। उसका लंड बाहर निकल आया — उसकी बॉक्सर में ही सही, पर अब वह पूरी तरह सीधा था। वह उसे छिपा नहीं सकता था। उसका सिरा काला दिख रहा था। उसमें से एक बूँद टपकी — उसकी अपनी लार — उसकी जींस पर।
पर उसने कुछ नहीं कहा। वह वैसे ही झुकी रही। अपने स्तनों को एसी के सामने रखे। अपनी गांड को सीट पर उठाए। लेगिंग के ऊपर से उसकी चूत का आकार साफ दिख रहा था — और वहाँ एक गीला पैच था। बड़ा। गहरा। गीला।
संदीप ने वह भी देखा। उसकी जीभ सूख गई। उसने सोचा — यह रांड मुझे पागल कर देगी आज।
गाड़ी रुकी। सुमन सीधी हुई। उसकी कमीज ठीक की। पर उसने अपना क्लीवेज नहीं छिपाया। उसने पैसे निकाले। पर्स खोला। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं — पर वह उत्तेजना से, डर से नहीं।
"पैसे लो, भैया," उसने कहा।
संदीप ने पैसे लिए। पर उसका हाथ उसके हाथ पर रुक गया। एक सेकंड। दो सेकंड। तीन सेकंड। उसने उसकी हथेली दबाई। सुमन ने हाथ नहीं हटाया।
"मैं वेट करूँ, मैडम?" उसने पूछा। उसकी आवाज़ में मिन्नत थी। "आपका क्या?"
उसकी आँखों ने कहा — तुम्हारे अंदर उतरूँ? तुम्हारी चूत चाटूं? तुम्हारे ऊपर अपना लंड रगड़ूं?
सुमन ने अपना हाथ हटाया। पर वह गाड़ी से नहीं उतरी। वह उसे देख रही थी। उसकी आँखें उसके लंड पर थीं — जो अब पूरी तरह सीधा और उसकी जींस से बाहर निकलने को था।
"नहीं भैया," उसने कहा। पर उसकी आवाज़ में इनकार नहीं था। "आज नहीं।"
आज नहीं — मतलब कभी और। संदीप ने समझ लिया।
सुमन गाड़ी से उतरी। उसके पैर डगमगा रहे थे। उसकी लेगिंग अब पूरी तरह गीली थी। उसने एक कदम बढ़ाया। फिर रुक गई।
वह मुड़ी। संदीप की तरफ देखा। और एक बार मुस्कुरा दी।
एक मुस्कान जिसका मतलब था — रुक। मैं अभी वापस आती हूँ। और तब...
वह मार्केट में अंदर चली गई। उसकी चूत धड़क रही थी। उसके स्तन भारी थे। उसके निप्पल कड़े थे। उसकी सांसें तेज़ थीं। और उसके दिमाग में सिर्फ एक ही शब्द था —
लंड। टैक्सी में संदीप अकेला रह गया था। उसका लंड अब भी सीधा था। उसने अपने हाथ में लिया। उसे रगड़ा। उसकी आँखें सुमन के जाते हुए गांड पर थीं। उसके होंठ सूख गए थे।
"साली... क्या माल है," वह फुसफुसाया। "तेरी तो... चूत में आग लगी है। और आज वह आग... मुझे जलाएगी।"
उसने अपना लंड जींस के अंदर दबाया। बटन बंद किया। और टैक्सी वहीं खड़ी रखी। इंतज़ार करता रहा।
उसे यकीन था — सुमन वापस आएगी।
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18-06-2026, 10:13 PM
(This post was last modified: 18-06-2026, 10:14 PM by Certified Addict. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
सुमन बाजार के अंदर घुस गई। भीड़ थी। गर्मी थी। धूप तेज़ थी। पर उसके अंदर की आग उससे भी तेज़ थी।
वह चल रही थी। उसकी लेगिंग में पसीना और उसकी चूत का रस एक हो गया था। गीला पैच अब साफ दिख रहा था। पर उसे परवाह नहीं थी।
तभी — पीछे से आवाज़ आई।
"मैडम जी... मैडम..."
सुमन ने मुस्कुरा दी। खुद से। क्योंकि पिछले दो महीनों में बहुत कुछ बदल गया था। अब वह वो सुमन नहीं थी जो गली में चुपके से चलती थी। अब उसे राह चलते लोग आवाज़ लगाते थे। पुरुष। जवान। बूढ़े। सब।
वह मुस्कुरा देती थी। पीछे मुड़कर देखती थी। नहीं डरती थी।
उसने मुड़कर देखा।
रिजवान।
वही पतला, दुबला, चालाक रिजवान। वही आँखें जो उसके शरीर को कपड़ों के अंदर भी नंगा कर देती थीं। वही मुस्कान जो झूठी थी पर फिर भी खींचती थी।
सुमन मुस्कुरा दी। उसने कहा, "रिजवान।"
रिजवान करीब आ गया। उसकी साँसों में तंबाकू की बू थी। उसकी आँखें नीचे — उसके स्तनों पर, उसके क्लीवेज पर — फिर ऊपर।
"मैडम, आप यहाँ? क्या काम था?"
सुमन की जीभ ने कुछ सोचा, पर उसके मुँह ने कुछ और कहा — "कुछ काम था।"
रिजवान झट से बोला, "शायद मैं आपकी कोई मदद कर दूं?"
सुमन उसे घूरने लगी। ऐसे घूरा जैसे कहना चाहती हो — तू जानता है मुझे क्या चाहिए, रिजवान। तू देख चुका है मेरी गांड। तू सूंघ चुका है मेरी चूत।
पर उसने कुछ नहीं कहा। उसे कुछ सूझ नहीं रहा था कि बहाना क्या बनाए।
फिर बोली — "मैं कुछ कपड़े सिलवाने आई हूँ।"
रिजवान की आँखें चमक गईं। उसने दोनों हाथ जोड़े, जैसे कोई राहत की सांस ली हो।
"अरे, अच्छा हुआ। बहुत अच्छा हुआ कि आप मुझे मिल गईं। चलिए, मेरे दोस्त की दुकान है। बहुत अच्छा टेलर मास्टर है। एक बार उसके यहाँ सिलवा लिया तो बार-बार वहीं जाओगे। डबल मीनिंग — सिलाई भी अच्छी, और... बाकी भी।"
वह जोर से हंसा। अपनी बात पर। सुमन भी मुस्कुरा दी। क्योंकि वह सब समझ चुकी थी।
चलो, उसने सोचा। आज और आगे।
"चलो, रिजवान। दिखाओ अपनी दुकान।"
रिजवान उसे एक बहुत पतली गली में ले गया। दो दीवारों के बीच। इतनी तंग कि दो आदमी साथ नहीं चल सकते थे।
और भीड़ थी। भयंकर भीड़। लोग धक्का दे रहे थे। कोई पीछे से छू के निकल रहा था। कोई सामने से रगड़ के।
सुमन का बड़ा सा गांड हर कदम पर किसी न किसी के हाथ लग रहा था। उसके स्तन किसी के कंधे से रगड़ खा रहे थे। वह बेचैन थी। पर रुकी नहीं।
उसकी चूत अब पूरी तरह गीली थी। लेगिंग में पानी उतर आया था।
रिजवान उसके ठीक आगे चल रहा था। वह बीच-बीच में पीछे मुड़ता। देखता। मुस्कुराता।
फिर गली खत्म हुई। एक छोटी सी दुकान।
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वही दुकान। वही लकड़ी का काउंटर। वही कपड़ों का ढेर। और वही इमरान — मोटा, भारी हाथों वाला, काली मूंछों वाला, चुप रहने वाला शिकारी।
उसने सुमन को देखा। खुले मुँह। आँखें उसके सिर से पैर तक उतर गईं। फिर ऊपर चढ़ गईं। उसके निप्पल पर रुकीं। फिर उसकी कमर पर। फिर उसकी लेगिंग के उस गीले पैच पर।
उसने मुँह बंद किया। थूक निगला। और बोला — "लाइए मैडम, क्या सिलवाना है?"
सुमन ने कहा — "मुझे कुछ ब्लाउज और सूट सिलवाने हैं। रिजवान तुम्हारी दुकान पर ले आया।"
इमरान ने रिजवान की तरफ देखा। रिजवान ने आँखों ही आँखों में कुछ इशारा किया। फिर इमरान बोला — "हाँ-हाँ, मैडम। बिल्कुल। पहले कपड़े पसंद कर लो। फिर... लूँगा। फिर लूँगा आपका नाप।"
सुमन ने जान-बूझकर पूछा — "क्या मतलब, इमरान जी?"
इमरान सकपका गया। "मतलब... नाप लूँगा। मैडम। नाप।"
सुमन मुस्कुराई। अपनी जीत पर। उसने कहा — "अच्छा। कपड़े दिखाओ।"
सुमन काउंटर के सामने खड़ी थी। एक पल के लिए सब कुछ रुक गया था — दुकान की धूल भरी हवा, बाहर गली का शोर, पंखे की धीमी आवाज़। सिर्फ तीन साँसें चल रही थीं। उसकी। रिजवान की। इमरान की।
इमरान ने कपड़े बिछाए। रेशमी साड़ियाँ। सूती सूट। पर उसकी आँखें कपड़ों पर नहीं, सुमन के शरीर पर थीं। उसकी नज़रें उसकी गर्दन से उतरती हुई उसके क्लीवेज तक पहुँचीं, और वहीं अटक गईं।
सुमन ने वही किया जो वह अब अच्छे से जानती थी। उसने अपने दोनों हाथ काउंटर पर रखे। धीरे से। जैसे थक गई हो। जैसे कोई आराम कर रही हो। पर उसकी कोहनियाँ काउंटर पर टिकीं, उसकी पीठ झुकी, उसकी गांड पीछे को निकल आई।
उसकी कमीज — वह छोटी, हल्के रंग की, बिना ब्रा वाली कमीज — आगे की तरफ लटक गई। दोनों स्तन झूल गए। उनके बीच की दरार गहरी और काली दिख रही थी। उसके निप्पल कड़े थे। कपड़े के नीचे से वे बाहर झाँक रहे थे। वह जानती थी।
इमरान के मुँह से हवा निकली। एक सीटी नहीं, बल्कि एक लंबी, भारी साँस। उसकी पैंट के अंदर हलचल हुई। उसने अपने कूल्हे आगे किए। जैसे वह अपने लंड को और जगह देना चाहता हो।
रिजवान पीछे था। बिल्कुल पीछे। उसने दो कदम और बढ़ा लिए। अब वह सुमन से बस एक इंच दूर था। उसकी आँखें उसकी गांड पर जमी थीं।
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सुमन की लेगिंग काली थी। साधारण। पर उसके शरीर पर वह साधारण नहीं रह गई थी। वह उसकी गांड के हर गोलाई को, हर उभार को, हर दरार को दिखा रही थी। लेगिंग का कपड़ा उसकी चूत के आकार में बिल्कुल फिट था। और अब, वहाँ, बीच में — एक गीला पैच। छोटा नहीं। अंडाकार। गहरा। पानी का। गर्मी का। उसकी चूत का रस लेगिंग के दूसरी तरफ आ चुका था।
रिजवान ने उसे देखा। उसकी साँसें तेज़ हो गईं। उसने अपनी पैंट के अंदर हाथ डाला — बिना किसी शर्म के — अपने लंड को ऊपर की तरफ कर दिया। वह बाहर निकलने को था। उसकी पैंट में तम्बू अब साफ दिख रहा था। उस लंड की नोक सुमन की गांड की दरार के ठीक पीछे थी। बस एक कपड़े का फर्क था।
उसने अपनी कमर हिलानी शुरू कर दी। धीरे-धीरे। जैसे कोई गाना सुन रही हो। दाएँ-बाएँ। आगे-पीछे। उसकी गांड उसी ताल पर हिल रही थी। रिजवान की तरफ। उसके लंड की तरफ।
रिजवान की आँखें बंद हो गईं। एक सेकंड के लिए। फिर खुल गईं। उसके होंठ सूख गए थे। उसने अपना लंड पकड़ रखा था — पैंट के ऊपर से ही। वह उसे दबा रहा था। रगड़ रहा था। उसकी लार टपकने लगी थी।
"कपड़े तो देख लीजिए मैडम," इमरान ने कहा, पर उसकी आवाज़ में दम नहीं था। वह टूट रहा था।
"हाँ," सुमन बोली। उसने एक हाथ बढ़ाया। कपड़े को छुआ। रेशम। मुलायम। उसकी उँगलियाँ कपड़े पर फिर रही थीं, पर उसके निप्पल काउंटर के किनारे से रगड़ खा रहे थे। उसने आह भरी। छोटी सी। इतनी छोटी कि सुनना मुश्किल था। पर रिजवान ने सुन लिया। इमरान ने भी।
रिजवान अब स्थिर नहीं रह सकता था। उसने एक कदम और बढ़ाया। उसकी कमर सुमन की गांड से लग गई। सीधे। बिना किसी हिचक के। उसका लंड — कपड़े के अंदर ही सही — उसकी गांड की दरार में समा गया। वह दब गया। गर्मी ने उसे झुलसा दिया।
सुमन की साँसें रुक गईं। उसकी आँखें बंद हो गईं। उसका मुँह थोड़ा खुल गया। वह चुप थी। पर उसके शरीर ने जवाब दे दिया। वह और नीचे झुक गई। उसने अपनी गांड और पीछे धकेल दी। अब उसका गांड उसके लंड पर पूरी तरह बैठ गया था। लेगिंग के कपड़े के उस पार — वह महसूस कर सकती थी उसकी सख्ती। उसकी गर्मी। उसका आकार।
"ये कलर... आप पर बहुत सेक्सी लगेगा मैडम," रिजवान ने कहा। उसकी आवाज़ में काँप थी। उसने अपने कूल्हे और आगे बढ़ाए। अपने लंड को और अंदर धकेला। उसकी जांघें सुमन की जांघों से चिपक गईं।
सुमन के मुँह से एक छोटी सी "आह" निकली। बस इतनी सी। पर काफी थी।
इमरान वहाँ खड़ा था। उसके हाथ काउंटर पर थे। उसकी उँगलियाँ लकड़ी में गड़ रही थीं। उसके लंड ने उसकी पैंट को पूरी तरह ऊपर उठा दिया था। वह इतना सख्त था कि दर्द हो रहा था। वह सुमन के चेहरे को देख रहा था — आँखें बंद, होंठ खुले, सिर पीछे झुका। और फिर नीचे — उसका क्लीवेज। इतना करीब कि वह उसकी चूचियों की नसें देख सकता था। उनका भार। उनकी गर्मी।
इमरान ने अपनी पैंट के ऊपर से अपने लंड को दबाया। जोर से। उसने आह भरी। और फिर — उसने अपनी उँगली बढ़ाई। सुमन के निप्पल की तरफ। बस एक इंच रह गया था छूने को।
"कपड़ा मत छुओ मैडम," उसने कहा, बहाना बनाकर। "उससे दाग लग जाता है। मैं दिखाता हूँ।"
उसने अपनी उँगली कपड़े पर रखी। पर वह कपड़ा सुमन के निप्पल के ठीक ऊपर था। उसकी उँगली दब गई। सुमन का निप्पल उसकी उँगली के नीचे कड़ा हो गया।
सुमन की साँसें फट गईं। "आह..."
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अब तीनों एक ही लय में थे। सुमन आगे-पीछे हिल रही थी — उसके स्तन इमरान की तरफ, उसकी गांड रिजवान की तरफ। उसकी चूत से पानी टपक रहा था। लेगिंग का गीला पैच अब पूरे कपड़े में फैल चुका था। उसके पीछे रिजवान का लंड उसकी गांड पर रगड़ रहा था — धीरे-धीरे, फिर तेज़, फिर धीरे। उसके सामने इमरान की उँगलियाँ उसके निप्पल पर गोले लगा रही थीं।
रिजवान का लंड अब पैंट से बाहर निकलने को था। उसने अपना कमर का बटन खोल दिया — धीरे से, चुपके से, सुमन को पता न चले। पर सुमन को पता चल गया। उसने उसकी जींस का बटन खुलते हुए सुना। उसने उसकी चैन खुलते हुए सुनी। और फिर — उसने उसका लंड महसूस किया। बिना कपड़े के। सीधा। काला। गर्म। सख्त। उसकी लेगिंग के ऊपर से नहीं — वह तो पहले भी था। अब वह सीधा उसकी लेगिंग के नीचे, उसकी गांड की दरार में, सिर्फ एक पतले कपड़े के बीच में था। और वह कपड़ा अब पूरी तरह गीला था। उसकी चूत के रस से। उसकी लेगिंग पारदर्शी हो चुकी थी।
रिजवान का लंड उसकी चूत के ठीक बाहर था। बस एक धागा बाकी था।
इमरान अब काउंटर के पार से बाहर आ गया था। वह सुमन के बिल्कुल सामने खड़ा था। उसने इंची टेप निकाल ली थी। बहाना चाहिए था। और उसके पास था।
"मैडम, नाप ले लूँ? फिर कपड़ा कट जाएगा।"
सुमन ने अपना सिर हिलाया। हाँ।
इमरान ने टेप उसके कंधे पर रखा। फिर उसके सीने पर। फिर उसकी कमर पर। पर हर बार उसके हाथ कुछ देर और रुकते थे। उसकी उँगलियाँ दबती थीं। सहलाती थीं। मसलती थीं।
फिर टेप नीचे आया। उसकी नाभि। उसके कूल्हे। और फिर — उसकी टांगों के बीच से।
इमरान ने टेप को उसकी चूत के ऊपर से गुजारा। पर उसका हाथ टेप के साथ नहीं, बल्कि टेप के नीचे था। उसकी हथेली सुमन की चूत पर थी। सीधे। लेगिंग के ऊपर से। उसने दबाया। उसकी चूत ने जवाब दिया — वह फूल गई, वह सख्त हो गई, उसने और पानी छोड़ दिया।
इमरान ने अपनी हथेली को दबाते हुए टेप को पीछे खींचा। टेप उसकी गांड की दरार में घुस गया। गीली दरार। गर्म दरार।
"कितना टाइट रखना है मैडम?" उसने पूछा। उसकी आवाज़ में साँस थी। हीट थी। लंड था।
सुमन ने कहा — "जितना..." उसकी साँस रुक गई। "...तुम रख सकते हो।"
इमरान ने टेप और कस दिया। टेप उसकी चूत और गांड के बीच फँस गया। वह पूरी तरह गीला हो चुका था। इमरान ने टेप को उतारा। अपनी उँगलियों से उसे सहलाया। और फिर — उसने अपनी उँगलियाँ अपने मुँह तक उठाईं। चाटा। अपना हाथ चाटा। सुमन के रस को चाटा।
सुमन ने देखा। उसकी आँखें खुली हुई थीं। वह देख रही थी। उसने कुछ नहीं कहा।
रिजवान पीछे अब पूरी तरह अपने लंड को उसकी गांड पर रगड़ रहा था। उसकी लेगिंग अब पूरी तरह नीचे उतरने को थी। वह बस अपने हाथों से उसे थामे हुए था। एक और हरकत — और उसकी गांड नंगी हो जाती।
पर सुमन ने हाथ बढ़ाया। अपनी गांड पर। उसने रिजवान का हाथ पकड़ लिया। धीरे से। उसे हटाया नहीं। बस पकड़ लिया।
उसने कहा — "बस। आज बस।"
रिजवान रुक गया। पर उसका लंड नहीं रुका। वह हवा में खड़ा था। नंगा। काला। मोटा। उसकी नोक से एक बूँद टपकी। सुमन की लेगिंग पर।
उसने कपड़े चुन लिए। पैसे दिए। और बिना पीछे देखे दुकान से बाहर निकल गई।
बाहर गली में उसके पैर काँप रहे थे। उसकी चूत जल रही थी। उसकी लेगिंग बर्बाद हो चुकी थी। और वह जानती थी — वह दोबारा आएगी। बस कुछ दिनों में। फिटिंग के नाम पर।
और अगली बार, वह रिजवान का हाथ नहीं पकड़ेगी।
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रिजवान ने लार टपकाते हुए कहा — "हाये, क्या कमाल का माल है यार। क्या गांड है। क्या चूचियाँ।"
इमरान बोला — "बहन की लोडी, बहुत गर्मी है इसके अंदर। लगता है इसका पति इसे चोदता नहीं है।"
"नहीं चोदता होगा, या फिर चोदता है तो बहुत कम। पर यार, इसकी चूत ने मेरी उँगली जला दी। गर्म आग थी।"
"जल्दी अपने नीचे होगी ये रांड। बहुत जल्दी।"
"अगले हफ्ते आएगी फिटिंग कराने।"
"तो फिर वहाँ से... आगे।"
दोनों ने एक दूसरे की तरफ देखा। और हँसे। धीरे से। गीले लंडों के साथ।
बाहर सुमन गली में खड़ी थी। उसकी साँसें तेज़ थीं। उसकी चूत धड़क रही थी। उसने फोन निकाला। राज का नंबर देखा। कॉल नहीं की।
बल्कि एक मैसेज लिखा — सब ठीक है। जल्दी आ जाओ।
फिर उस मैसेज को डिलीट कर दिया। और लिखा — कब आ रहे हो?
सेन्ड कर दिया।
राज को पता था कुछ। पर सब कुछ नहीं।
और सुमन चुप रही। अपनी गीली लेगिंग। अपनी जलती चूट। अपने सख्त निप्पल। और अपने अगले हफ्ते के इंतज़ार के साथ।
रिज़वान के मन में कुछ और ही चल रहा था। सुमन में कितनी भी आग हो पर उसे अपनी हद पता है जिससे वो इतनी आसानी से पार नहीं करेगी। इसके लिए कुछ प्लान बनाना पड़ेगा, और रिज़वान इस काम में लग जाता है कि कहीं से कुछ ऐसा हाथ लगे कि वो अपनी हद से आगे बढ़ जाए।
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राज को आए चार दिन हो चुके थे। चार दिन। चार रातें। चार बार वह अपनी उँगलियों से खुद को संतुष्ट कर चुकी थी। पर हर बार के बाद खालीपन और बढ़ जाता था।
आज सुबह वह उठी तो उसकी चूत पहले से ही नम थी। उसके स्तन भारी थे। उसके निप्पल कड़े — बिना किसी वजह के। बस सोच से। राज के लंड की सोच से। उन हाथों की सोच से जो उसे क्लब में छू चुके थे। उन उँगलियों की सोच से जो दर्ज़ी की दुकान पर उसकी चूत के अंदर थीं।
वह बिस्तर पर करवट बदल कर लेट गई। उसके स्तन बाजू में दब गए। उसकी गांड हवा में निकल आई। उसने अपनी जांघों को आपस में रगड़ा। चूत गीली थी — उसकी जांघों पर लसलसा पानी लग गया।
उसने अपना फोन उठाया।
सुबह का पोर्न — पहली बार
उसने टेलीग्राम खोला। उसे एक लिंक मिला। वह क्लिक किया। एक पोर्न वीडियो चलने लगा।
एक औरत घुटनों पर थी। उसके मुँह में दो लंड थे। वह उन्हें बारी-बारी से चूस रही थी। उसकी लार ठुड्डी से टपक रही थी। उसकी आँखों में पानी था। पर वह रुक नहीं रही थी। वह और तेज़ चूस रही थी। जैसे उसे जिंदगी भर की भूख हो।
सुमन की साँसें तेज़ हो गईं। उसके निप्पल पत्थर हो गए। उसकी चूत — वह सिहर उठी। पानी निकलने लगा।
उसने अपना हाथ अपनी चूत पर रखा। एक उँगली। धीरे से। बाहर से घुमाई। गोल-गोल। अपने लैबिया पर। वह सूजे हुए थे। गीले। गरम।
वीडियो में दूसरा शॉट। अब वह औरत पीछे से चोदी जा रही थी। उसके स्तन लटक रहे थे। हिल रहे थे। उसके मुँह से सिर्फ एक ही आवाज़ आ रही थी — "हाँ... चोदो... और... और..."
सुमन ने अपनी उँगली अपनी चूत के अंदर डाल दी। सिर्फ एक। फिर दूसरी।
दो उँगलियाँ। उसकी चूत ने उन्हें चूस लिया।
"आह्ह्ह..." वह कराही। उसने अपनी आँखें बंद कर लीं। अब वह वीडियो नहीं देख रही थी। वह उस औरत की जगह खुद को देख रही थी। दो लंड। उसके मुँह में। उसकी चूत में।
उसने अपनी उँगलियाँ तेज़ी से अंदर-बाहर करनी शुरू कर दीं। उसकी चूत चटक रही थी। चूची — वह अपने बाएँ हाथ से अपनी बाईं चूची दबा रही थी। निप्पल को मरोड़ रही थी।
"हाँ... राज... चोद मुझे... तेरा लंड चाहिए... बहुत दिन हो गए..."
वह फटने वाली थी। उसकी चूत उसकी उँगलियों को दबा रही थी। उसका पूरा शरीर काँप रहा था।
और तभी — वीडियो में वह औरत चीखी। जोर से। सुमन भी चीखी। उसकी चूत ने उसकी उँगलियों को बाहर निकाल दिया। पानी की एक लहर बिस्तर पर गिरी। चादर गीली हो गई। उसकी जाँघें गीली थीं। उसके हाथ गीले थे। बिस्तर पर उसके रस का एक बड़ा सा धब्बा।
वह थक कर लेट गई। साँसें तेज़। आँखें खुली। छत की तरफ देख रही थी।
"पागल हो गई हूँ मैं," वह फुसफुसाई।
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शाम के 2 बजे थे। सुमन नहा चुकी थी। उसने नए कपड़े पहने — वही जो उसने राज के लिए खरीदे थे। काले रंग का बिकनी सेट। ऊपर से एक पारदर्शी साड़ी। अंदर कुछ नहीं। बस वह बिकनी — जो उसकी चूचियों को उठाए हुए थी, उनके बीच की दरार को गहरा कर रही थी। और नीचे — बिकनी का निचला हिस्सा — जो उसकी चूत पर खिंच रहा था। उसके लैबिया का आकार साफ दिख रहा था।
वह आईने के सामने खड़ी हुई। मोबाइल उठाया।
नया इंस्टाग्राम अकाउंट — नाम: "अकेली_रानी_100"
उसने अपनी तस्वीरें लीं। पहली — आईने में। पूरा बदन। चूचियाँ। गांड। गीली जरूरत भरी आँखें।
दूसरी — बिस्तर पर लेटी हुई। एक हाथ से अपनी चूची दबाती हुई। दूसरा हाथ कैमरे के लिए अलग।
तीसरी — पीछे से। गांड हवा में उठी हुई। बिकनी की डोरी गांड की दरार में धंसी हुई।
उसने सब अपलोड कर दीं। पब्लिक अकाउंट।
पाँच मिनट में पचास लाइक्स। बीस कमेंट्स।
"क्या माल है" "दिखाओ और" "डीएम देखो" "कितनी गरम हो बे"
सुमन ने सब इग्नोर किया। उसे सिर्फ एक चीज़ चाहिए थी — ध्यान। देखा जाना। वांछित होना।
शाम के 5 बजे। सुमन ने टेलीग्राम खोला। एक ग्रुप में उसने लिखा — "कोई वीडियो कॉल पर मेरे साथ टाइम पास करेगा? बिना फेस दिखाए। बिना नाम।"
एक मिनट में दस रिक्वेस्ट।
उसने रैंडमली एक चुन लिया। नाम था "नो_नेम_69"।
कॉल कनेक्ट हुई।
दूसरी तरफ एक आदमी था। उसका चेहरा दिखता था — गोरा, दाढ़ी, 30 के आसपास। वह अपनी कमीज उतार चुका था। उसकी छाती पर बाल थे। उसकी पैंट खुली थी। उसका लंड बाहर था — खड़ा हुआ। काला मोटा। नसों से भरा। उसका सिरा चमक रहा था — पानी से।
सुमन ने अपना चेहरा नहीं दिखाया। उसने सिर्फ अपनी गर्दन से नीचे का हिस्सा दिखाया।
"नमस्ते," उस आदमी ने कहा। उसकी आवाज़ भारी थी।
"नमस्ते," सुमन ने कहा। उसने अपनी बिकनी का ऊपरी हिस्सा खोल दिया।
उसके स्तन बाहर आ गए। बड़े। गोरे। निप्पल कड़े। पसीने से चमकते हुए।
उस आदमी की साँसें तेज़ हो गईं। "तुम... कमाल हो।"
सुमन मुस्कुराई। उसने अपनी चूचियाँ दोनों हाथों में पकड़ लीं। दबाया। उठाया। अपने निप्पलों को अपनी उँगलियों से मरोड़ा।
"अह्ह्ह..." वह कराही।
उस आदमी ने अपना लंड पकड़ लिया। हिलाना शुरू कर दिया। ऊपर-नीचे। तेज़ी से।
"तुम अपनी चूत दिखाओ। जल्दी।"
सुमन ने अपनी बिकनी नीचे उतारी। उसकी नंगी चूत। शेव्ड। गीली। लैबिया फूले हुए। बीच का छेद — बंद था। पर पानी टपक रहा था।
उसने अपनी उँगली उसके ऊपर फेरी। अपने रस को इकट्ठा किया। फिर अपने निप्पल पर लगा दिया। फिर चूसा। अपनी ही उँगली।
"तुम पागल हो," उस आदमी ने कहा। "बिल्कुल पागल।"
"हाँ," सुमन ने कहा। "पागल हूँ। चार दिन से लंड नहीं मिला।"
उस आदमी की आँखें लाल हो गईं। उसने अपना लंड और तेज़ी से हिलाया। उसके अंडकोष ऊपर-नीचे हो रहे थे।
"अपनी चूत में उँगली डालो," उसने आदेश दिया।
सुमन ने डाल दी। एक। फिर दो। तीन।
तीन उँगलियाँ। उसकी चूत ने उन्हें चूस लिया। अंदर तक। उसने उन्हें घुमाया। बाहर निकाला। फिर अंदर। तेज़ी से।
"हाँ... चोदो मुझे... अपने लंड से चोदो... मैं तुम्हारी राँड हूँ..." उसकी आवाज़ फट रही थी।
उस आदमी की साँसें अब सिर्फ घरघराहट थीं। उसका लंड फड़क रहा था। उसके अंडकोष सिकुड़ रहे थे।
"मैं आ रहा हूँ... तुम्हारे चेहरे पर... तुम्हारी चूचियों पर..."
"हाँ... आ जाओ... भर दो मुझे..."
उस आदमी ने जोर से कराहा। उसका बीज हवा में छूटा — उसके पेट पर, उसकी छाती पर, उसकी गर्दन पर। सफेद। गरम। चिपचिपा।
उसी सेकंड — सुमन की चूत ने उसकी उँगलियों को बाहर निकाल दिया। पानी का फव्वारा। कैमरे पर। उसके हाथ से लेकर उसके पेट तक। बिस्तर पर गिरा। वह कराहती रही।
"अह्ह्ह... राज... राज... मैं तुम्हारे बिना मर जाऊँगी..."
उसने कुछ पलों के लिए आँखें बंद कर लीं। जब खोलीं — कॉल डिस्कनेक्ट हो चुकी थी।
उस आदमी का अकाउंट गायब था। नाम बदल चुका था। सुमन अकेली थी।
फिर से।
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रात के 11 बजे। राज ने वीडियो कॉल किया।
सुमन बिस्तर पर थी। लाइट धीमी। उसने एक पारदर्शी नाइटी पहन रखी थी। अंदर कुछ नहीं।
"हैलो जान," राज मुस्कुराया। होटल के कमरे में था। उसने भी अपनी कमीज उतार रखी थी। उसका लंड उसकी पैंट के अंदर सख्त हो रहा था।
"हैलो," सुमन ने कहा। उसकी आवाज़ में तकलीफ थी।
"क्या हुआ?" राज ने पूछा।
"तुम याद आ रहे हो। बहुत।"
"मैं भी। कल आ रहा हूँ। शाम तक।"
"कल बहुत दूर है," सुमन ने अपनी नाइटी उतार दी। नंगी। उसकी चूचियाँ कैमरे में। उसका चेहरा अंधेरे में।
राज की साँसें तेज़ हो गईं। उसने अपनी पैंट खोल दी। उसका लंड बाहर आ गया। खड़ा। बिना छुए — वह हवा में था।
"मैं तुम्हें देख रहा हूँ," राज ने कहा।
"देखो," सुमन ने कहा। उसने अपनी चूचियाँ पकड़ीं। दबाईं। निप्पल मरोड़े। अपनी जीभ से निप्पल चाटा।
राज ने अपना लंड पकड़ लिया। हिलाने लगा।
"अपनी चूत दिखाओ," उसने कहा।
सुमन ने अपनी जाँघें खोल दीं। चूत। नंगी। गीली। लैबिया फूले हुए। बीच की दरार से पानी निकल रहा था।
"कितनी गीली है?" राज ने पूछा।
"बहुत। चार दिन से तुम्हारे लंड के लिए तरस रही है।"
"क्या कर रही थी चार दिन में?"
"सोच रही थी। तुम्हारे बारे में। उस रात के बारे में। क्लब वाली रात।"
राज की हरकतें तेज़ हो गईं। उसका लंड फड़क रहा था।
"क्या सोच रही थी?"
"सोच रही थी — काश वहाँ तुम न होते। तो मैं उन दोनों के साथ चली जाती। उनके कमरे में। क्या होता वहाँ?"
राज की आँखों में आग थी। उसने अपना लंड और तेज़ी से हिलाया।
"क्या होता, बता," उसने कहा।
सुमन ने अपनी चूत में तीन उँगलियाँ डाल दीं। तेज़ी से। पागलों की तरह।
"वह मुझे ले जाते। मेरे कपड़े उतारते। एक मेरा मुँह चोदता। एक मेरी चूत। दोनों एक साथ। मैं चीखती। पर कोई नहीं सुनता। वे मुझे रात भर चोदते। सुबह तक मैं उनकी राँड बन जाती।"
राज कराह उठा। "साली राँड... मेरी राँड..."
"हाँ तुम्हारी। सिर्फ तुम्हारी। लेकिन आज रात — मैं अपनी हूँ।"
सुमन ने अपनी उँगलियाँ और गहरी डाल दीं। अपनी चूत को चीरती हुई। उसकी चूत ने उँगलियों को चूसा। पानी टपका।
राज का लंड फटने वाला था। वह हिल रहा था — पूरा शरीर हिल रहा था।
"मैं... आ रहा... हूँ..."
"आ जाओ... मेरे अंदर... भर दो मुझे..."
राज चीखा। उसका बीज हवा में छूटा — उसके पेट पर, उसके हाथ पर, कैमरे के लेंस पर। सफेद धब्बे।
सुमन भी फट गई। उसकी चूत ने उसकी उँगलियों को बाहर फेंका। पानी की एक और लहर। बिस्तर की चादर अब पूरी तरह भीग चुकी थी।
वह कराहती रही। "राज... राज... मैं..."
शब्द नहीं निकले।
दोनों चुप हो गए। स्क्रीन पर एक दूसरे को देख रहे थे। साँसें सामान्य हो रही थीं।
राज बोला — "सुनो। मैंने तुम्हारे लिए एक गिफ्ट भेजा है। कल आ जाएगा।"
सुमन की आँखें चमक गईं। "क्या?"
"सरप्राइज़। पसंद आएगा। बहुत।"
वह मुस्कुराई। थकी हुई, तृप्त, और फिर से भूखी।
"मैं तुम्हारा इंतज़ार करूँगी। गिफ्ट का भी। तुम्हारा भी।"
राज ने कहा — "गुड नाइट, मेरी राँड।"
"गुड नाइट, मेरे लंड।"
कॉल डिस्कनेक्ट हो गई।
सुमन अकेली थी। बिस्तर भीगा हुआ था। उसका शरीर दर्द कर रहा था — भूख से। कल राज आ रहा था। कल गिफ्ट आ रहा था।
वह सोच में पड़ गई। क्या होगा कल? क्या गिफ्ट है? लंड? कोई खिलौना? कोई नया आदमी?
वह मुस्कुराई। अंधेरे में।
"कल," उसने कहा, "कल मैं फिर से जलूँगी। और इस बार — पूरी तरह।"
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सुबह के 10 बज रहे थे। सूरज पहले से ही तेज़ था। सुमन बिस्तर पर पड़ी थी। आँखें खुली थीं। पर वह कहीं और थी।
पिछली रात उसने सोचा था — कल दर्ज़ी की दुकान जाना है। इमरान ने कहा था — तीन दिन में आना। तो आऊँगी।
पर आज सुबह — जब उसकी आँखें खुलीं — तो उसके दिमाग में कुछ और ही था।
वह उठी। फ्रिज से पानी पिया। अपना चेहरा देखा — आईने में। उसके चेहरे पर थकान थी। कल रात की बेचैनी। रिजवान का वह मैसेज — "कल मिलना ज़रूरी है।" राज की वो तस्वीरें — जो अब भी उसके दिमाग में घूम रही थीं। और नीशा — उसकी अपनी बहन — राज की गोद में।
उसने सोचा — क्या मैं सच में आज इमरान के पास जाऊँगी? उसके सामने झुकूँगी? अपनी गांड और चूत दिखाऊँगी? उसकी उँगलियाँ अपने अंदर लेने दूँगी?
पर क्यों?
क्योंकि राज मुझे धोखा दे रहा है? तो क्या मैं भी उसे धोखा दूँ?
लेकिन वह धोखा — क्या वह मुझे शांति देगा? क्या मेरी चूत में इमरान का लंड जाने से मेरा दर्द कम होगा?
उसने गहरी साँस ली। अपनी आँखें बंद कर लीं। फिर खोलीं।
"नहीं," उसने खुद से कहा। "आज नहीं। आज मैं घर पर रहूँगी। सोचूँगी। समझूँगी। क्या करना है।"
सुमन ने चाय बनाई। गरम। तेज़। उसने पिया। पर उसका स्वाद नहीं आया।
वह सोफे पर बैठी। टीवी चालू किया। कोई धारावाहिक चल रहा था — औरतें रो रही थीं, पति झूठ बोल रहे थे, ससुराल वाले झगड़ रहे थे। सुमन ने बंद कर दिया।
वह उठी। बालकनी में गई। बाहर देखा। बाजार की भीड़ दूर से दिख रही थी। उसी रास्ते पर लोग जा रहे थे — जिस रास्ते से वह दर्ज़ी की दुकान तक जाती थी।
उसने सोचा — वहाँ रिजवान होगा। इमरान होगा। वे मेरा इंतज़ार कर रहे होंगे। सोच रहे होंगे — आएगी कि नहीं?
उसके शरीर में एक झटका सा लगा। उसकी चूत में गीलापन आ गया — सिर्फ सोच से। उसने अपनी जांघों को दबाया।
"नहीं," वह फिर बोली। "आज नहीं।"
वह वापस अंदर आ गई। किताब निकाली — जो बहुत पुरानी थी, जिसे उसने कभी खत्म नहीं किया था। उसने पढ़ने की कोशिश की। तीन पन्ने। फिर वही शब्द आँखों के सामने घूमने लगे। उसे समझ नहीं आ रहा था क्या लिखा है।
उसने किताब रख दी।
वह बेडरूम में गई। बिस्तर पर लेट गई। राज के तकिए को गले लगाया। उसकी महक अब लगभग खत्म हो चुकी थी। बस एक धुंधली सी बू — उसकी याद।
"राज..." वह फुसफुसाई। "तुम कहाँ हो? क्या कर रहे हो? क्या सच में... नीशा के साथ हो?"
उसकी आँखों में आँसू आ गए। उसने रोया। चुपचाप। तकिए में मुँह छुपाकर।
उसी समय — दर्ज़ी की दुकान पर।
रिजवान दुकान के बाहर खड़ा था। उसकी आँखें गली की तरफ थीं। उसके हाथ जेब में थे। उसके पैर बेचैन थे।
इमरान अंदर से बोला — "आई क्या?"
"नहीं," रिजवान ने कहा। "अभी नहीं।"
"आएगी?"
रिजवान ने अपनी घड़ी देखी। 11 बज गए थे।
"पता नहीं," उसने कहा। "पर मुझे लगता है — नहीं आएगी।"
"क्यों?"
रिजवान अंदर आ गया। उसने एक कुर्सी खींची। बैठ गया।
"क्योंकि उसे किसी ने बताया है," उसने कहा। "राज के बारे में।"
इमरान की आँखें फटी रह गईं। "तूने बताया?"
"मैंने नहीं," रिजवान ने कहा। "पर कोई और बता सकता है। कोई जो राज से जलता है। कोई जो सुमन को चाहता है।"
"कौन?"
रिजवान ने सिगरेट जलाई। धुआँ छोड़ा। आँखें सिकोड़ीं।
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सुमन ने सोचा — मैं क्या कर रही हूँ? क्यों कर रही हूँ? राज से प्यार है। बहुत है। पर फिर भी... मैं क्यों?
वह उठी। फ्रिज से पानी लिया। तभी उसकी नज़र अपने फोन पर पड़ी। फोन पर एक नोटिफिकेशन था। एक मैसेज। नंबर नहीं था। नाम नहीं था। सिर्फ लिखा था —
"मैडम। कल मिलना ज़रूरी है। बहुत ज़रूरी।"
सुमन ने उस नंबर को पहचानने की कोशिश की। नहीं पहचाना। संदीप नहीं था। रिजवान नहीं था। इमरान तो कभी फोन नहीं करता था।
उसने रिप्लाई किया — "कौन?"
जवाब आया — "मैं। वह जो हमेशा देख रहा था।"
सुमन की रूह काँप गई। उसने फोन रख दिया। फिर उठाया। फिर रख दिया। उसका दिल तेज़ धड़कने लगा — डर से? उत्तेजना से? दोनों से शायद।
तीसरा मैसेज आया — "पार्क। कल सुबह 9 बजे। अकेले। बताना नहीं किसी को। राज को भी नहीं।"
सुमन ने पूछा — "क्यों?"
जवाब — "तुम्हारे पति की कुछ बातें हैं मेरे पास। तुम नहीं जानती हो। वह भी नहीं जानता कि मैं जानता हूँ।"
पूरी रात सुमन ने आँख नहीं मारी। वह राज के बारे में सोचती रही।
राज क्या छुपा रहा है? क्या वह भी... कहीं जाता है? किसी और के पास? कोई औरत? कोई आदमी? क्या वह मुझसे झूठ बोल रहा है?
या फिर यह कोई जाल है? कोई जो मुझे फँसाना चाहता है? रिजवान? इमरान?
पर उन्होंने क्यों? वे तो पहले ही मुझे छू चुके हैं। उन्हें क्या चाहिए?
और अगर यह सच है — अगर राज सच में कुछ छुपा रहा है — तो मैं क्या करूँगी?
वह उठी। फिर से नहाई। इस बार ठंडे पानी से। पर उसकी चूत की आग नहीं बुझी। और उसके दिमाग की आग तो और भी तेज़ थी।
सुमन पहुँची। उसने साधारण कपड़े पहने थे — जींस, कुर्ती, बाल बाँधे। पर उसके अंदर कुछ और ही चल रहा था। उसकी साँसें तेज़ थीं। उसके हाथ काँप रहे थे।
पार्क खाली था। इक्का-दुक्का लोग। एक बूढ़ा। एक औरत। दो बच्चे।
फिर उसने उसे देखा।
एक आदमी। पीछे की बेंच पर बैठा था। काला चश्मा। टोपी। हाथ में एक लिफाफा। वह सीधे सुमन को देख रहा था।
उसने सुमन को इशारा किया — आओ।
सुमन उसके पास गई। उसके पैर भारी थे। वह बैठ गई। बेंच पर। उससे दो फुट दूर।
"तुम हो कौन?" सुमन ने पूछा। उसकी आवाज़ काँप रही थी।
उस आदमी ने चश्मा उतारा। टोपी उतारी।
सुमन की आँखें फटी रह गईं।
वह रिजवान था।
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"तुम... यह क्या चक्कर है?" सुमन ने कहा। उसकी आवाज़ में गुस्सा था, डर था, और हैरानी थी।
रिजवान मुस्कुराया। वह मुस्कान — वही जो दुकान में होती थी। पर अब कुछ और थी। गंदी। खतरनाक।
"तुम्हारे पति," रिजवान ने कहा। "राज। बहुत अच्छे आदमी हैं। पर एक बात... वह तुम्हें नहीं बताते।"
"क्या बात?"
रिजवान ने लिफाफा खोला। उसमें से कुछ फोटो निकालीं। सुमन के हाथ में थमा दीं।
फोटो में राज था। एक क्लब में। एक लड़की के साथ। लड़की राज की गोद में बैठी थी। राज का हाथ उसकी कमर पर था। और लड़की — उसकी शक्ल... सुमन की तरह थी। वही बाल। वही शरीर। वही मुस्कान।
"यह तुम्हारी छोटी बहन है," रिजवान ने कहा। "नीशा।"
सुमन के हाथ से फोटो गिर गई। उसका चेहरा सफेद पड़ गया।
"नीशा... राज के साथ? कब? क्यों?"
"पिछले दो महीने से," रिजवान ने कहा। "तुम्हारी नीशा राज से मिलती है। हर हफ्ते। तुम्हारे घर में। जब तुम बाजार जाती हो। या नहाती हो। या सोती हो।"
"झूठ," सुमन फुसफुसाई। पर उसकी आवाज़ में यकीन नहीं था।
"तुम्हारे घर की चाबी," रिजवान ने कहा। "तुम्हारी नीशा के पास है। राज ने दी।"
सुमन ने अपना चेहरा हाथों में छुपा लिया। वह रोना चाहती थी। पर आँसू नहीं आ रहे थे। उसकी आँखें सूखी थीं। उसकी चूत — जो कल तक इतनी गीली थी — वह भी सूख चुकी थी। जैसे कोई आग लगा दी गई हो। अंदर की आग नहीं — बाहर की। जलाने वाली।
उसने सोचा — तो मैं जब रिजवान के लंड पर अपनी गांड रगड़ रही थी, उसी समय कहीं राज नीशा के स्तन चूस रहा था? जब मैं इमरान की उँगलियाँ अपनी चूत में ले रही थी, राज नीशा की चूत में अपना लंड डाल रहा था?
उसका पेट मरोड़ने लगा। उसे उल्टी आने लगी। वह उठी। पेड़ के पास गई। उल्टी नहीं आई। बस सूखी उल्टी।
रिजवान उसके पास आया। उसने सुमन की पीठ पर हाथ रखा। धीरे से।
"मैं नहीं चाहता था कि तुम्हें ऐसे पता चले," उसने कहा। "पर मैं तुम्हें तकलीफ देख नहीं सकता था। तुम जो कर रही थी वह सब... वह सब राज की कमी थी। मैं समझता हूँ।"
सुमन ने उसकी तरफ देखा। उसकी आँखों में अब डर नहीं था। गुस्सा नहीं था। बस एक खालीपन था। और उस खालीपन में — एक अजीब सी राहत।
"क्या मैं तुम्हारे घर चल सकती हूँ?" रिजवान ने पूछा। "तुम अकेली नहीं रह सकती।"
सुमन ने सिर हिलाया। कुछ नहीं बोली।
रिजवान का घर छोटा था। अकेले का। अफीम और लार्ड की बू आ रही थी। सुमन को बैठाया। पानी दिया। उसने पानी पिया। फिर रिजवान ने शराब दी। उसने दो घूँट पिए। फिर पूरा गिलास। फिर दूसरा।
उसकी आँखें लाल हो गईं। उसके गाल गुलाबी। उसके हाथ काँप रहे थे। पर उसकी चूत... वह फिर से गीली होने लगी थी।
क्यों? क्योंकि वह गुस्से में थी। और उस गुस्से को वह सिर्फ एक तरीके से निकाल सकती थी।
"रिजवान," उसने कहा। उसकी आवाज़ में एक अलग आग थी। "मुझे चोदोगे?"
रिजवान की साँसें रुक गईं। उसने सोचा था — शायद वह रोएगी। चिल्लाएगी। घर जाएगी। पर यह... उसने यह नहीं सोचा था।
"तुम अभी ठीक नहीं हो..." उसने कहा।
"मैं बिल्कुल ठीक हूँ," सुमन ने कहा। उसने अपनी कुर्ती निकाल दी। अपनी जींस खोल दी। अपनी ब्रा — नहीं थी। अपने स्तन बाहर आ गए। बड़े। भारी। निप्पल पहले से ही कड़े।
"राज मुझे धोखा दे रहा है," वह बोली। "तो मैं भी उसे धोखा दूँगी। पर सिर्फ एक बार नहीं — हर उस तरीके से जो तुम सोच सकते हो। और तुम — तुम पहले हो।"
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रिजवान के घर का वह कमरा। अंधेरा था। सिर्फ एक मोमबत्ती जल रही थी — कोने में। उसकी लौ हिल रही थी, दीवारों पर परछाइयाँ बना रही थी।
सुमन सोफे पर लेटी हुई थी। उसकी साँसें भारी थीं। उसका दिल धड़क रहा था — इतना तेज़ कि उसे अपनी गर्दन में उसकी धड़कन महसूस हो रही थी।
रिजवान उसके बगल में बैठा था। उसने अभी तक उसे छुआ नहीं था। बस देख रहा था। उसकी आँखें सुमन के शरीर पर घूम रही थीं — उसके चेहरे से, उसकी गर्दन से, उसके स्तनों से, उसकी जांघों से, और फिर वापस उसकी आँखों पर।
"तुम बहुत सुंदर हो," उसने कहा। उसकी आवाज़ में कोई जल्दबाजी नहीं थी। कोई भूख नहीं थी। बस एक गहरी, धीमी प्रशंसा थी।
सुमन ने अपनी आँखें बंद कर लीं। उसने खुद को उसके हाथों में छोड़ दिया था — अब वह नहीं लड़ रही थी। न सोच रही थी। बस महसूस कर रही थी।
रिजवान का हाथ उसके बालों पर आया। उसने उन्हें सहलाया — धीरे-धीरे, उँगलियों से। उसके सिर की त्वचा पर हल्का दबाव। सुमन ने आह भरी — एक लंबी, रुकी हुई साँस।
"तुम्हारे बाल," उसने कहा। "मुलायम हैं। रेशम की तरह। राज कभी तुम्हारे बालों को ऐसे सहलाता है?"
सुमन ने कोई जवाब नहीं दिया। उसकी आँखें बंद थीं। उसके होंठ थोड़े खुले थे।
रिजवान ने अपना हाथ उसके कंधे पर रखा। उँगलियाँ उसकी कुर्ती के कपड़े पर। उसने धीरे से उसे नीचे सरकाया — बिना खोले, बस इतना कि उसका कंधा निकल आए। उसके कंधे की त्वचा — गोरी, चिकनी, गर्म — मोमबत्ती की रोशनी में चमक रही थी।
रिजवान ने अपना सिर झुकाया। उसके होंठ उसके कंधे को छूने को आए। पर छुआ नहीं। उसकी साँसें उसकी त्वचा पर गर्म हवा छोड़ रही थीं।
"तुम्हारी गंध," उसने फुसफुसाया। "फूलों की तरह। और कुछ और... कुछ ऐसा जो मुझे पागल कर रहा है।"
सुमन ने अपना सिर थोड़ा झुका लिया — जैसे वह उसे अपनी गर्दन और दे दे रही हो।
रिजवान के होंठ अब उसकी गर्दन पर थे। हल्के से। बिना दबाव के। बस त्वचा पर होंठों का स्पर्श। गरम। कोमल।
"तुम्हारी गर्दन," उसने कहा, उसके होंठ अब भी उसकी त्वचा पर थे। "इतनी पतली। इतनी नाजुक। और इतनी गर्म। राज कभी तुम्हारी गर्दन को चूमता है?"
"हाँ..." सुमन फुसफुसाई। पर उसकी आवाज़ में पूरा यकीन नहीं था।
रिजवान ने उसकी गर्दन को चूसना शुरू किया। धीरे-धीरे। उसके होंठ उसकी त्वचा पर सरक रहे थे। उसकी जीभ ने एक छोटा सा घेरा बनाया — गोल-गोल — उसकी गर्दन की नस पर।
सुमन की नस धड़क रही थी। रिजवान ने उसे महसूस किया। उसकी जीभ ने उसे और गहरा दबाया। उसके होंठों ने चूसा — एक छोटा सा, लाल निशान बनाने के लिए।
"अह्ह..." सुमन के मुँह से निकल गया।
"यह निशान," रिजवान ने कहा। "यह तुम्हें राज की याद दिलाएगा। पर राज ने यह नहीं बनाया है। मैंने बनाया है।"
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रिजवान ने अब सुमन की कुर्ती के बटन खोलना शुरू किए। पहला बटन। दूसरा बटन। तीसरा।
प्रत्येक बटन के साथ, उसके होंठ उसके शरीर पर और नीचे उतर रहे थे। पहले बटन खोलने पर — उसके कंधे। दूसरे पर — उसके कॉलरबोन। तीसरे पर — उसके स्तनों का ऊपरी हिस्सा, उभरता हुआ, मोमबत्ती की रोशनी में चमकता हुआ।
रिजवान ने अपनी उँगलियाँ उसके स्तनों के ऊपर रखीं — बिना दबाए, बस छूकर। उसकी उँगलियाँ गर्म थीं। उन्होंने सुमन की त्वचा पर हल्के-हल्के घेरे बनाए।
"तुम्हारी चूचियाँ," उसने कहा। "बहुत बड़ी हैं। बहुत भारी। राज कैसे पकड़ता है उन्हें?"
सुमन के मुँह से कोई शब्द नहीं निकला। बस एक कराह — जो रुकी हुई थी, दबी हुई।
रिजवान ने अपना मुँह उसके बाएँ स्तन पर रखा। उसके होंठ उसके निप्पल के चारों तरफ थे — पर उन्होंने छुआ नहीं। बस हवा। गर्म हवा।
"क्या राज तुम्हारे निप्पल को चूसता है?" उसने पूछा। उसकी साँसें सुमन के निप्पल पर गर्म लहर की तरह गिर रही थीं।
"हाँ..." सुमन ने कहा। "पर..." उसकी आवाज़ रुक गई।
"पर?"
"पर उतना नहीं जितना तुम कर रहे हो।"
रिजवान की साँसें और भारी हो गईं। उसने अपना मुँह खोला। उसने सुमन के निप्पल को अंदर ले लिया — पूरा। उसकी जीभ उसके चारों तरफ लिपट गई।
"अह्ह्ह..." सुमन ने अपना सिर पीछे झुका लिया। उसकी पीठ सोफे से ऊपर उठ गई। उसके हाथ रिजवान के बालों में चले गए।
रिजवान ने उसे चूसा। धीरे-धीरे। गहरा। उसका मुँह उसके निप्पल पर था — उसकी जीभ उसे घुमा रही थी, उसके दाँत हल्के से उसे दबा रहे थे, उसके होंठ उसे खींच रहे थे। उसने चूसा — जोर से — दूध पी रहा हो जैसे।
सुमन की साँसें फट गईं। "अह्ह्ह... बहुत... बहुत अच्छा..."
फिर उसने दूसरा निप्पल पकड़ा। इस बार उसने उसे और जोर से चूसा। उसकी जीभ उसे काट रही थी — उसके दाँत उसे दबा रहे थे। सुमन चीखी — एक दबी हुई, रुकी हुई चीख।
"अह्ह्ह... रुको मत... रुको मत..."
रिजवान ने अब सुमन की कुर्ती पूरी तरह उतार दी। वह नंगी थी — सिर्फ एक पतली सी लेगिंग के साथ। उसका शरीर मोमबत्ती की रोशनी में सुनहरा दिख रहा था।
रिजवान ने अपनी उँगलियाँ सुमन की नाभि पर रखीं। धीरे-धीरे, उसने उन्हें नीचे सरकाया — उसके पेट पर, उसके नाभि के ठीक नीचे। उसकी त्वचा वहाँ मुलायम थी — इतनी मुलायम कि उसकी उँगलियाँ डूब रही थीं।
"तुम्हारा पेट," उसने कहा। "बहुत मुलायम है। राज कभी तुम्हारे पेट को चूमता है?"
"कभी-कभार..." सुमन ने कहा। पर उसकी आवाज़ में अब कोई शक नहीं था — बस एक अलग तरह की नमी थी।
रिजवान ने अपना सिर नीचे किया। उसने उसके पेट को चूमा — एक लंबा, गीला चुंबन। उसकी जीभ उसकी त्वचा पर एक रास्ता बना रही थी — नाभि से जांघों की तरफ।
सुमन का शरीर काँप गया। उसकी साँसें तेज़ थीं।
"रिजवान..." उसने फुसफुसाया। "क्या कर रहे हो?"
"मैं तुम्हें जान रहा हूँ," उसने कहा। उसकी आवाज़ अब उसके पेट के पास से आ रही थी। "हर इंच। हर त्वचा का कण।"
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रिजवान ने अपनी उँगलियाँ सुमन की लेगिंग के कमरबंद पर रखीं। धीरे-धीरे, उसने उसे नीचे सरकाया — बहुत धीरे-धीरे।
लेगिंग का कपड़ा उसकी त्वचा पर रगड़ खा रहा था — उसकी जांघों पर, उसके घुटनों पर, उसकी पिंडलियों पर — जब तक कि वह पूरी तरह नीचे नहीं आ गई। सुमन की चूत अब बिल्कुल नंगी थी।
रिजवान ने एक पल के लिए रुक गया। उसने उसे देखा — पूरी तरह से। उसकी चूत — गीली, फूली हुई, लेबिया खुले हुए, अंदर का गुलाबी रंग मोमबत्ती की रोशनी में चमक रहा था। उसके पैर थोड़े खुले थे — बहुत खुले नहीं, बस इतने कि उसे देख सके।
"तुम्हारी चूत," उसने कहा। उसकी आवाज़ में एक गहरी, खनकती हुई भूख थी। "मैंने उसे महसूस किया है। पर आज मैं उसे चखूँगा।"
रिजवान ने अपना सिर झुकाया। वह सुमन की चूत के ठीक ऊपर रुका — एक इंच दूर। उसकी साँसें उसकी चूत पर गर्म लहर की तरह गिर रही थीं।
"तुम्हारी गंध," उसने फुसफुसाया। "बहुत गहरी है। बहुत नम। राज ने कभी तुम्हारी चूत चूसी है?"
सुमन की आवाज़ में काँप थी। "नहीं... कभी नहीं..."
"तो आज पहली बार," रिजवान ने कहा। "मैं तुम्हारी पहली बार हूँ।"
उसने अपनी जीभ निकाली — धीरे-धीरे — और उसके सिरे से सुमन की चूत के ऊपरी होंठ को छुआ। हल्का स्पर्श। बिना दबाव के। बस एक नम, गर्म बिंदु — जो उसकी त्वचा पर टिका और फिर सरक गया।
सुमन की साँसें रुक गईं। उसका शरीर सख्त हो गया — फिर ढीला पड़ गया।
"अह्ह..."
रिजवान ने अपनी जीभ को और नीचे सरकाया — उसके भीतरी होंठों के किनारे पर। वहाँ उसका रस था — गीला, चमकता हुआ, मीठा। उसकी जीभ ने उसे चाटा।
"तुम्हारा स्वाद," उसने कहा — बिना अपना मुँह उठाए। "बहुत नरम है। बहुत गरम। मुझे यह चाहिए और।"
रिजवान ने अपनी जीभ को सुमन की चूत के अंदर धकेल दिया — पूरी जीभ, न कि सिर्फ नोक। उसकी जीभ अंदर गई — उसकी भीतरी दीवारों को छूती हुई, उसके रस में लिपटी हुई।
"अह्ह्ह्ह..." सुमन चीखी। उसके हाथ रिजवान के बालों में जा गिरे। उसने उसे अपनी चूत पर दबा लिया।
रिजवान की जीभ अंदर थी — वह उसे बाहर निकाल रहा था, फिर अंदर, बाहर, अंदर। उसकी जीभ की हरकतें धीमी और गहरी थीं — जैसे कोई घोंघा अपनी तरल लय में चल रहा हो। हर बार जब वह अंदर जाती, तो सुमन की चूत उसे चूस लेती। हर बार बाहर आती, तो उसके साथ सुमन का रस भी आता — उसके होंठों पर, उसकी ठुड्डी पर, उसकी जीभ पर।
उसने अपनी जीभ को अंदर ही अंदर घुमाना शुरू किया — गोल-गोल — जैसे वह उसकी चूत की भीतरी परतों को चाट रहा हो। सुमन की चूत उसकी जीभ पर चटक रही थी — उसे अंदर खींच रही थी, उसे बाहर निकालना नहीं चाहती थी।
"अह्ह्ह... रिजवान... रुक मत... बहुत अच्छा लग रहा है..." सुमन के शब्द टूट रहे थे, उसके साथ उसकी साँसें भी।
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रिजवान ने अपना एक हाथ ऊपर बढ़ाया — उसने सुमन के स्तन को पकड़ लिया, जोर से दबाया, और उसे अपने मुँह में ले लिया — जिससे वह अब भी उसकी चूत चाट रहा था। उसकी जीभ एक साथ दो काम कर रही थी — एक तरफ चूत को चूसना, दूसरी तरफ स्तन को चूसना।
सुमन चीखी — एक लंबी, रुकी हुई चीख, जो उसके गले में फँस गई और फिर बाहर निकली।
"अह्ह्ह्ह्ह... अह्ह्ह्ह्ह... बहुत... बहुत..." वह पूरा वाक्य नहीं बोल पाई।
रिजवान ने अपनी जीभ को और अंदर धकेल दिया — अब वह उसकी चूत के भीतर की गर्मी को महसूस कर रहा था, उसके रस को पी रहा था जैसे कोई शराब पी रहा हो। उसके होंठ उसके लेबिया के चारों तरफ लिपट गए — उन्हें चूसा, खींचा, और फिर से चूसा।
सुमन का शरीर काँपने लगा — पहले हल्के से, फिर पूरी तरह से। उसके पैर फैल गए, उसके पैर की उँगलियाँ मुड़ गईं, उसके स्तन हिल रहे थे — उसके शरीर में लहरें उठ रही थीं जो वह रोक नहीं सकती थी।
"मैं आ रही हूँ... रिजवान... मैं आ रही हूँ..."
रिजवान ने अपनी एक उँगली — उसके बाएँ हाथ की — सुमन की चूत के अंदर डाल दी, जबकि उसकी जीभ अभी भी उसके भीतर थी। उसकी उँगली अंदर गई — उसके अंदर की परतों को छूती हुई — और वहाँ उसने उसे घुमाया। अंदर-बाहर, अंदर-बाहर, उसी लय में — जीभ और उँगली, एक साथ, दो अलग-अलग गतियाँ।
सुमन का शरीर ऐंठ गया — उसके पेट की मांसपेशियाँ सख्त हो गईं, उसकी पीठ कमान की तरह झुक गई, उसका मुँह खुला, उसकी आँखें बंद हो गईं।
"अह्ह्ह्ह्ह्ह..." वह चीखी — एक लंबी, रुकी हुई चीख, जो उसके गले से निकली और फिर रुक गई — और फिर एक दूसरी, और एक तीसरी — और वह फट गई।
उसकी चूत ने रिजवान की जीभ और उँगली को अंदर खींच लिया — उसके रस ने उसके मुँह को भर दिया, उसका शरीर थरथरा उठा, उसके हाथ रिजवान के बालों को और जोर से खींच रहे थे, उसके पैर काँप रहे थे, उसकी साँसें नहीं आ रही थीं।
रिजवान ने रुका नहीं। उसने उसे तब तक चूसा जब तक कि उसकी चूत की धड़कन शांत नहीं हो गई। उसने अपनी जीभ को धीरे-धीरे बाहर निकाला — और अपने होंठों को चाटा, जिसमें सुमन का रस था।
"तुम्हारा स्वाद," उसने कहा। "बहुत मीठा है।"
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रिजवान ने सुमन को जाने दिया था। लेकिन उसके चेहरे पर वह मुस्कान — वह मुस्कान जो कह रही थी, "अब तुम मेरी हो।"
सुमन रिजवान के घर से बाहर निकली। उसके पैर काँप रहे थे। उसकी चूत अब भी धड़क रही थी। उसके होठों पर रिजवान की जीभ का अहसास था। उसके स्तनों पर उसके हाथों की गर्मी। उसकी गर्दन पर वह लाल निशान — जो राज को बताएगा कि किसी और ने उसे छुआ है।
पर रिजवान ने उसे चोदा नहीं था। उसने सिर्फ उसकी चूत चूसी थी। और वही बात सुमन को और अधिक उसकी ओर खींच रही थी।
"अगर मैं तुम्हें आज चोद देता," रिजवान ने उसके जाने से पहले कहा था, "तो तुम सोचती — 'बस एक बार की बात थी।' पर मैंने तुम्हें नहीं चोदा। अब तुम सोचोगी — 'क्यों नहीं?' और वह सवाल तुम्हें मेरे पास वापस लाएगा।"
उसका प्लान काम कर गया था।
सुमन टैक्सी में बैठी। संदीप ने उसे उसके घर पहुँचाया। पर सुमन का मन वहाँ नहीं था। वह रिजवान के घर में थी — उसके सोफे पर, उसकी जीभ के नीचे, उसके हाथों के बीच।
उधर राज सुमन को अकेला छोड़ बिज़ी था, पर राज को ऐसा क्या हुआ जो वो सुमन को इस राह पे आया और अगर वो ऐसा चाहता तो तो शादी के 2 साल बाद है क्यूँ उसे कुछ ऐसा पता चला जिसके बारे में उसने सोचा भी नहीं था आखिर ऐसा क्या हुआ,
सुमन टैक्सी के अंदर बैठी थी। उसके पैर काँप रहे थे — पर वह काँप थकान से नहीं थी, बल्कि रिजवान के घर की गर्मी से थी।
रिजवान की जीभ अब भी उसकी चूत पर थी — उसका अहसास, उसका स्वाद, उसकी गहराई। रिजवान ने उसे चोदा नहीं था, पर उसकी चूत रिजवान की जीभ और उँगलियों से इतनी देर तक खेली गई थी कि वह अब जल रही थी — एक ऐसी आग जो बुझती नहीं थी, बल्कि और भड़कती थी।
सुमन की चूत से पानी टपक रहा था — उसकी लेगिंग गीली हो चुकी थी। वह बेचैन थी। उसका शरीर अब रिजवान से भी अधिक चाहता था — पर रिजवान ने उसे जाने दिया था। उसकी जीभ ने उसे पागल कर दिया था, और अब वह उस पागलपन को सहन नहीं कर सकती थी।
"संदीप..." उसने फुसफुसाया — इतनी धीरे कि शायद उसे सुनाई न दे।
पर संदीप ने सुन लिया। उसकी आँखें पीछे के शीशे में सुमन पर थीं — उसके गीले होठों पर, उसकी बेचैन साँसों पर, उसके पैरों के बीच उस गीले पैच पर।
"क्या हुआ, मैडम?" उसने पूछा।
सुमन ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने अपने हाथों को अपनी जांघों पर रखा — और धीरे-धीरे, उन्हें ऊपर की तरफ सरकाना शुरू कर दिया। उसकी उँगलियाँ उसकी लेगिंग के ऊपर से उसकी चूत की तरफ बढ़ रही थीं। वहाँ — वह गीली थी। गरम। तैयार।
[b]अंधेरे में, संदीप की आँखों के सामने — सुमन ने अपनी उँगली अपनी लेगिंग के अंदर डाल दी।
[/b]
उसने अपनी लेगिंग की कमरबंद को धीरे से नीचे सरकाया — बस इतना कि उसकी चूत नंगी हो जाए — और अपनी उँगली अंदर डाल दी।
"अह्ह..." वह कराही — एक दबी हुई, रुकी हुई कराह।
उसकी चूत ने उसकी उँगली को अंदर चूस लिया। वह गीली थी — इतनी गीली कि उसकी उँगली बिना किसी रुकावट के अंदर चली गई। उसने उसे अंदर-बाहर करना शुरू किया — धीरे-धीरे, अपनी साँसों की लय में। उसके मुँह से "आह... आह... आह..." निकल रहा था।
संदीप उसे पीछे के शीशे में देख रहा था। उसकी साँसें तेज़ हो गई थीं। उसका लंड उसकी पैंट में सख्त हो गया था — इतना सख्त कि उसे दर्द हो रहा था। उसने अपनी पैंट के ऊपर से उसे दबाया।
"मैडम..." उसने कहा — पर उसकी आवाज़ में अब कोई सवाल नहीं था। बस एक बेचैनी थी।
सुमन ने अपनी आँखें खोलीं। उसकी आँखों में एक अलग आग थी — रिजवान की दी हुई, और अब संदीप को दिखाने वाली।
[b]"रुको मत," उसने कहा। "जारी रखो।"[/b]
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संदीप रुका नहीं।
उसने अपनी गाड़ी को एक सुनसान रास्ते पर मोड़ लिया — जहाँ कोई रोशनी नहीं थी, कोई आवाज़ नहीं थी। उसने गाड़ी रोकी। वह सुमन की तरफ मुड़ा — और अंधेरे में, उसके हाथ सुमन के स्तनों पर आ गए।
"तुम्हारी चूचियाँ," उसने कहा — उसकी आवाज़ में अब कोई शर्म नहीं थी। "इतनी बड़ी। इतनी गरम।"
उसने उन्हें दबाया — जोर से — उसकी उँगलियाँ उसके निप्पल पर गोल-गोल घूम रही थीं। सुमन के निप्पल पत्थर की तरह कड़े हो चुके थे।
सुमन की आँखें बंद थीं — पर उसके मुँह से "आह" निकल रही थी। उसने संदीप के सिर को अपनी चूचियों पर दबा लिया — जैसे वह और चाहती हो।
"चूसो मुझे," उसने कहा — उसकी आवाज़ में एक आदेश था, एक बेचैनी, एक भूख। "चूसो मेरी चूचियाँ।"
संदीप ने अपना मुँह उसके बाएँ स्तन पर रख दिया। उसने उसे पूरा मुँह में ले लिया — निप्पल, आइरोला, सब कुछ — और जोर से चूसा।
"अह्ह्ह्ह..." सुमन चीखी — उसकी पीठ कमान की तरह झुक गई, उसके हाथ संदीप के बालों में जा गिरे।
संदीप ने उसके निप्पल को दाँतों से दबाया — हल्का सा — और फिर चूसा। उसकी जीभ उसके निप्पल पर गोल-गोल घूम रही थी। उसके होंठ उसे खींच रहे थे। उसने दूसरा स्तन पकड़ा — उसे भी चूसा — दोनों को बारी-बारी से, बिना रुके।
सुमन का शरीर काँप रहा था। उसकी चूत अब पानी छोड़ रही थी — इतना कि उसकी लेगिंग पूरी तरह गीली हो चुकी थी।
संदीप का हाथ अब नीचे की तरफ सरक गया।
उसने सुमन की लेगिंग के अंदर हाथ डाला — बिना पूछे, बिना रुके — और उसकी नंगी चूत को छू लिया।
"तुम्हारी चूत," उसने कहा — उसकी आवाज़ में अब एक गहरी, जंगली भूख थी। "इतनी गीली... इतनी गरम..."
"अंदर डालो," सुमन ने कहा — उसकी आवाज़ में अब कोई सवाल नहीं था। "अंदर डालो अपनी उँगली।"
संदीप ने अपनी उँगली — उसके मध्यमा — सुमन की चूत के अंदर डाल दी। उसकी उँगली बिना किसी रुकावट के अंदर गई — उसकी चूत इतनी गीली थी कि वह फिसल गई। उसने अपनी उँगली को अंदर-बाहर करना शुरू किया — धीरे-धीरे — और फिर तेज़।
"अह्ह्ह्ह्ह..." सुमन चीखी — उसके मुँह से एक लंबी, रुकी हुई चीख निकली। "बहुत अच्छा... बहुत अच्छा लग रहा है..."
संदीप ने अपनी दूसरी उँगली भी अंदर डाल दी — अब दो उँगलियाँ उसकी चूत के अंदर — और उन्हें घुमाना शुरू कर दिया। वह उसके अंदर की परतों को छू रहा था — उसके रस को महसूस कर रहा था — और उसकी चूत उसकी उँगलियों को चूस रही थी।
सुमन का शरीर काँप रहा था — उसके पैर फैल गए थे, उसके स्तन हिल रहे थे, उसके हाथ संदीप के बालों में थे — और उसके मुँह से "आह... आह... आह..." निकल रहा था, बिना रुके।
"मुझे चोदो, संदीप," उसने कहा — उसकी आवाज़ में एक आदेश था — "मुझे चोदो। अब।"
[b]सुमन ने अपना हाथ नीचे बढ़ाया — संदीप की पैंट पर।
[/b]
उसने उसकी पैंट का बटन खोला — जोर से — और ज़िप खींची। उसका लंड बाहर आ गया — काला, मोटा, नसों से भरा हुआ, इतना सख्त कि उसकी नसें बाहर उभर आई थीं — और उसके सिरे से पानी टपक रहा था।
"तुम्हारा लंड," सुमन ने कहा — उसकी आवाज़ में एक अजीब सी आश्चर्य थी। "बहुत बड़ा है।"
"तुम चाहोगी तो," संदीप ने कहा — उसकी आवाज़ में एक अजीब सी बेचैनी थी। "पर अभी... अभी नहीं।"
"क्यों?" सुमन ने पूछा — उसकी आवाज़ में गुस्सा था।
"क्योंकि," संदीप ने कहा — उसकी आवाज़ में एक शरारत थी, "अगर मैं तुम्हें अभी चोद दूँगा — तो तुम रिजवान को भूल जाओगी। और मुझे तुम याद रखोगी। पर अगर मैं तुम्हें अभी नहीं चोदूँगा — तो तुम मुझे और चाहोगी।"
सुमन की आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई। उसने संदीप के लंड को पकड़ लिया — उसे हाथ में लिया — और धीरे से मसलना शुरू कर दिया।
"तो — मुँह?" उसने पूछा — उसकी आवाज़ में एक शरारत थी।
[b]"हाँ," संदीप ने कहा — उसकी आवाज़ में एक गहरी, रुकी हुई भूख थी। "मुँह।"[/b]
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