14-06-2026, 05:11 AM
Wonderful story
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Adultery FLAT MATE
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14-06-2026, 06:55 AM
Zabardast update. Bahut hi shandar writing ✍️
15-06-2026, 10:59 AM
एपिसोड 14: सवाल
इमरान के जाने के बाद घर में जो सुकून लौटा था, वह बदकिस्मती से ज्यादा दिनों तक टिक नहीं पाया। राहत की वह धूप जो मम्मी के चेहरे पर खिली थी, पाँचवें दिन की शाम होते-होते फिर से धुंधली पड़ने लगी। उनके भीतर का वह अनजाना डर, जो कुछ समय के लिए सो गया था, एक बार फिर करवट लेने लगा था। मैं दफ्तर से लौटा तो देखा कि वह बालकनी में खड़ी थीं, पर उनकी निगाहें सामने की सड़क पर नहीं, बल्कि घर के ही किसी अंदरूनी हिस्से पर टिकी थीं। उस रात जब हम दोनों डाइनिंग टेबल पर खाना खाने बैठे, तो माहौल में एक भारीपन था। मम्मी अपनी थाली में चम्मच घुमा रही थीं, जैसे उनका ध्यान खाने में बिल्कुल न हो…
अचानक उन्होंने अपनी नजरें उठाईं और सीधे मेरी आँखों में झांकते हुए पूछा,
"देव, एक बात बता... तुझे यह जगह कुछ अजीब नहीं लगती?"
मैंने अपना निवाला मुंह में डालते-डालते सिरा हिलाया,
"अजीब? ना मम्मी, मुझे तो कुछ अजीब नहीं लगता। पर आप किस हिसाब से कह रही हैं? क्या हुआ है?"
मम्मी मेरी बात सुनकर कुछ पल के लिए ठिठक गईं।
उनके चेहरे पर असमंजस के भाव साफ थे। उन्होंने अपनी नजरें नीचे कर लीं और धीमी आवाज में बोलीं,
"पता नहीं... मैं खुद भी पक्की तरह से नहीं कह सकती। पर ऐसा लगता है जैसे कोई चीज़... जो सही नहीं है।"
वह अपनी उस असहजता को शब्दों में ढाल नहीं पा रही थी… ऐसा लग रहा था कि उनका कोई छठा अहसास उन्हें लगातार टोक रहा था, पर उनके पास साबित करने के लिए कुछ नहीं था।
अगले दिन सुबह मेरी आँख खुली तो मैंने एक बात नोटिस किया….
मम्मी पूरे फ्लैट का चक्कर लगा रही थीं….!
वह घर के हरेक कोने को, हर एक दीवार को और खिड़कियों के पर्दों के पीछे तक को बहुत गौर से देख रही थीं। वह हॉल की सीलिंग से लेकर फर्श के कोनों तक अपनी नजरें दौड़ा रही थीं, जैसे वह यह समझने की कोशिश कर रही हों कि आखिर उन्हें इस घर में क्या खटक रहा है।
इसी जांच-पड़ताल के दौरान, मैंने देखा कि वह दो-तीन बार इमरान के बंद कमरे के दरवाजे के बाहर जाकर खड़ी हुईं। उस बंद दरवाजे की लकड़ी को वह ऐसे घूर रही थीं मानो उसके पार देखना चाहती हों। वह वहां खड़ी होकर कुछ गहरे ख्यालों में डूब जातीं, कुछ सोचतीं, और फिर एक ठंडी सांस लेकर वहां से बिना दरवाजा छुए चुपचाप हट जातीं।
रसोई में चाय उबल रही थी और मेरे दिमाग में सवालों का बवंडर चल रहा था। मैंने सोचा कि आज दफ्तर जाने से पहले मम्मी के पास बैठूंगा। उनका हाथ थामकर उनसे कहूँगा कि वे खुलकर कहें कि आखिर बात क्या है…?
मैं उनकी किसी भी उलझन को हर हाल में सुलझाना चाहता था....
लेकिन तभी मेरे फोन की घंटी बजी…
ऑफिस से मेरे बॉस का कॉल था… क्लाइंट मीटिंग और एक नए प्रोजेक्ट के सबमिशन का भारी प्रेशर था। दफ्तर से लगातार आ रहे मैसेजेस और काम के उस अचानक बढ़े बोझ के फेर में मैं ऐसा उलझा कि खुद को तैयार करने और बैग उठाने की आपाधापी में लग गया।
जब मैं घर से निकल रहा था, तो मम्मी दरवाजे पर खड़ी थीं, उनकी आँखें अब भी उसी उलझन में थीं…
उनके चेहरे के भाव ये बात साफ़ कह रहे थे की कुछ तो ऐसा है जो वो मुझसे शेयर करना चाहती है लेकिन कर नहीं पा रही... कुछ है ऐसा शायद जिसे पहले वो खुद क्लियर कर लेना चाहती है.
पर क्या...?
मैं उनसे वह जरूरी सवाल पूछना ही भूल गया।
कारपोरेट की इस भागदौड़ ने मुझे अपनी माँ की उस मूक पुकार से दूर कर दिया था।
मैं लिफ्ट की तरफ बढ़ तो रहा था, पर मेरे दिल में एक अजीब सी कसक थी। क्या मम्मी को वाकई उस फ्लैट में ऐसे किसी चीज़ या बात का अहसास हो रहा था जो मेरी आँखों के सामने होते हुए भी मेरी पकड़ में नहीं आ रहा था?
यह सवाल अब उस बंद फ्लैट के भीतर अभी के लिए मम्मी के साथ अकेला रह गया था…।
To be Continued….
15-06-2026, 12:16 PM
15-06-2026, 03:10 PM
bahut bahut shandaar aur behad hi mast writings!
15-06-2026, 03:49 PM
Really wonderful, beautiful and brilliant writings!
15-06-2026, 08:30 PM
Ashadaran aur dhamaka update. Danshu aur kadak writing ✍️
18-06-2026, 02:41 PM
एपिसोड 15: एक अनहोनी
जिंदगी की रफ्तार जब अपनी चरम सीमा पर होती है, तो अक्सर वक्त हमें यह बताने के लिए एक ब्रेक लगा देता है कि हम इंसान हैं, मशीन नहीं। इमरान के जाने के बाद घर का माहौल शांत जरूर हुआ था, और मैं मम्मी की उस अजीब उलझन को भूलकर पूरी तरह से दफ्तर के काम में डूब चुका था। प्रोजेक्ट्स के डेडलाइंस और क्लाइंट्स के कॉल्स के बीच मैं इतनी तेजी से भाग रहा था कि मुझे आने वाले खतरे का जरा भी अंदाजा नहीं था। इमरान के जाने के ठीक दो दिन बाद ही मेरी जिंदगी ने एक ऐसा मोड़ लिया, जिसने सब कुछ रोक दिया। वह मंगलवार की एक उमस भरी सुबह थी... मैं हमेशा की तरह थोड़ा लेट हो रहा था, इसलिए अपनी बाइक की रफ्तार सामान्य से थोड़ी ज्यादा रख कर दफ्तर की ओर भाग रहा था। दिमाग में बस यही चल रहा था कि ठीक दस बजे की मीटिंग में प्रेजेंटेशन कैसे शुरू करना है। शहर का वो व्यस्त चौराहा पार करते ही मेरे दफ्तर की ऊंची इमारत साफ नजर आने लगी थी। मैंने राहत की सांस ली और बाइक को दफ्तर के मुख्य गेट की तरफ मोड़ने के लिए इंडिकेटर दिया। तभी, न जाने कहाँ से एक तेज रफ्तार ऑटो गलत दिशा से अचानक सामने आ गया…. सब कुछ इतनी तेजी से हुआ कि मुझे ब्रेक मारने का भी मौका नहीं मिला… एक जोरदार आवाज हुई, टायर सड़क पर घिसटने की चीख गूंजी और अगले ही पल मैं हवा में था…! मेरी बाइक सड़क के एक तरफ जा गिरी और मैं सीधे कंक्रीट की सड़क पर जा गिरा। मेरे सिर और दाहिने कंधे पर बहुत तेज झटका लगा। एक पल के लिए मेरी आँखों के सामने पूरी तरह से अंधेरा छा गया। कानों में गाड़ियों के हॉर्न और लोगों के चिल्लाने का शोर आ रहा था, पर मैं चाहकर भी हिल नहीं पा रहा था। गनीमत बस यही रही कि यह भयानक दुर्घटना ठीक मेरे ऑफिस के गेट के बाहर ही हुई थी। दफ्तर के गार्ड्स और मेरे कुछ कलीग्स, जो ठीक उसी वक्त ऑफिस आ रहे थे, उन्होंने जैसे ही मेरी बाइक को पहचाना, वे सब तुरंत भागते हुए मेरी तरफ आए, "अरे, ये तो देव है! जल्दी आओ, एम्बुलेंस को फोन करो!" मेरे सीनियर अमित जी की घबराई हुई आवाज मेरे कानों में पड़ी। ऑफिस के स्टाफ ने बिना एक पल गंवाए मुस्तैदी दिखाई…. उन्होंने मुझे संभाला और पास के ही एक बड़े अस्पताल में तुरंत एडमिट कराया। समय पर अस्पताल पहुंचने और दफ्तर के लोगों की तुरंत मदद के कारण एक बहुत बड़ा अनर्थ होने से बच गया। डॉक्टरों ने तुरंत इमरजेंसी में ले जाकर एक्स-रे और बाकी जांचें शुरू कर दीं। जब मुझे होश आया, तो मैंने खुद को अस्पताल के सफेद कमरे में पाया। मेरे दाहिने हाथ और पैर पर पट्टियां बंधी हुई थीं और ग्लूकोज की बोतल चढ़ रही थी। डॉक्टर ने अंदर आकर मेरे कलीग्स और मुझसे बात की, "घबराने की कोई बात नहीं है। समय पर एडमिट होने के कारण कोई इंटरनल ब्लीडिंग या गंभीर हेड इंजरी नहीं हुई है। चोटें ज्यादा सीरियस नहीं हैं," डॉक्टर के इन शब्दों ने मेरे सहकर्मियों के चेहरे पर राहत ला दी। लेकिन डॉक्टर ने अगली ही सांस में जो कहा, उसने मेरी चिंता बढ़ा दी…. "चोटें भले ही गहरी नहीं हैं, लेकिन दाहिने पैर की मांसपेशियों में गंभीर खिंचाव है। इसलिए, अस्पताल की तरफ से आपको अगले दो सप्ताह के लिए पूरी तरह से बेडरेस्ट की सलाह दी जाती है। आप अगले चौदह दिनों तक अपने पैर पर ज्यादा वजन नहीं डाल सकते और न ही ऑफिस जा सकते हैं।" बेडरेस्ट की बात सुनते ही मेरे दिमाग में सबसे पहला ख्याल काम का नहीं, बल्कि मम्मी का आया। वह फ्लैट में अकेली थीं, शहर उनके लिए नया था। अब जब उन्हें मेरी इस दुर्घटना का पता चलेगा, तो उनकी क्या हालत होगी? जो माँ पहले से ही उस फ्लैट में एक अनजाने डर से सहमी हुई थी, वह मुझे इस हाल में देखकर कितनी टूट जाएगी, यह सोचकर ही मेरा दिल बैठने लगा…. To be Continued….
18-06-2026, 02:43 PM
(15-06-2026, 03:10 PM)wetpussy Wrote: bahut bahut shandaar aur behad hi mast writings! (15-06-2026, 03:26 PM)Sicario Wrote: Wonderful and awesome update! (15-06-2026, 03:49 PM)Rajun Wrote: Really wonderful, beautiful and brilliant writings! (15-06-2026, 08:30 PM)Kamdevi. Wrote: Ashadaran aur dhamaka update. Danshu aur kadak writing ✍️ (16-06-2026, 07:18 AM)momass Wrote: awesome update bro (18-06-2026, 12:06 PM)jamanuram Wrote: Great, ? , waiting for more आप सबको दिल से बहुत - बहुत धन्यवाद।
18-06-2026, 09:13 PM
Tu rhne de bhai... itna short update deta h . Time le aur long update de
18-06-2026, 10:32 PM
एपिसोड 16: संकट में सहारा...?
अस्पताल के उस सफेद, ठंडे कमरे में लेटे हुए मेरे दिमाग में सिर्फ एक ही चिंता चौबीसों घंटे घूम रही थी—मम्मी की। शहर उनके लिए बिल्कुल नया था, और मेरे इस एक्सीडेंट ने उन्हें भीतर से हिलाकर रख दिया था। वह अस्पताल और फ्लैट के चक्कर काटते-काटते खुद ढहने की कगार पर पहुंच गई थीं। लेकिन तभी, हमारी इस बेबस और बिखरी हुई दुनिया में एक अप्रत्याशित मोड़ आया। इमरान को, जो काफी अच्छे दिनों की छुट्टी ले कर अपने घर गया था अचानक परिवार के साथ समय बिताने के लिए, न जाने कहाँ से मेरे इस भयानक एक्सीडेंट की खबर मिल गई..! वह अपने सारे काम बीच में ही छोड़कर तुरंत शहर लौट आया.... उसका इस तरह संकट के समय वापस आना हमारे लिए एक बहुत बड़ा सहारा साबित हुआ… फ्लैट पर कदम रखते ही उसने बिना वक्त गंवाए सब कुछ अपने हाथों में ले लिया। वह सुबह-सुबह अस्पताल पहुंच जाता, डॉक्टरों से मेरी मेडिकल रिपोर्ट्स को लेकर बात करता, दवाइयों के लंबे-चौड़े पर्चे खुद जाकर मेडिकल स्टोर से लाता और मम्मी को अपनी बाइक पर बैठाकर अस्पताल से घर और घर से अस्पताल ले जाता। इतना ही नहीं, उसने घर के कामकाज की जिम्मेदारी भी संभाल ली थी…. राशन लाना हो, दूध का हिसाब रखना हो या रसोई के भारी काम, वह हर जगह ढाल बनकर खड़ा हो गया। "देव भाई, तू बस आराम कर और जल्दी ठीक होने पर ध्यान दे। जब तक तेरा ये भाई यहाँ है, आंटी को एक भी परेशानी नहीं होने देगा," अस्पताल के बेड के पास खड़े होकर इमरान ने जब यह कहा, तो उसकी आवाज़ में एक अजीब सा अपनापन था। धीरे-धीरे, इमरान का यह निस्वार्थ सेवा भाव रंग लाने लगा… वह मम्मी का भरोसा जीतने में पूरी तरह सफल होने लगा था! जो माँ कुछ दिन पहले तक उसके साये से भी कतराती थीं, उसके आने पर सहम जाती थीं, अब उनके व्यवहार की बर्फ पिघलने लगी थी। अब जब मैं फ्लैट पर बेडरेस्ट के लिए शिफ्ट हो चुका था, तो मैंने खुद अपनी आँखों से देखा कि मम्मी कई बार इमरान के साथ बहुत कंफर्टेबल होकर बातें कर रही थीं। कभी रसोई में चाय बनते वक्त दोनों खान-पान पर चर्चा करते, तो कभी इमरान अपनी किसी बात से मम्मी के चेहरे पर मुस्कान ले आता। मम्मी अब उसके सामने सहमती नहीं थीं, बल्कि एक अभिभावक की तरह उसे डांटकर ज्यादा खाना खाने के लिए भी कहती थीं। सतह पर शायद सब कुछ बिल्कुल ठीक हो चुका था…. । ऐसा लग रहा था कि संकट ने हमारे बीच के सारे अजनबेपन और दूरियों को मिटा दिया है। लेकिन, इन सब बदलते समीकरणों के बीच... मेरे मन का अंतर्द्वंद्व शांत नहीं हुआ था। सब कुछ सामान्य दिखने के बावजूद, कहीं न कहीं मेरे दिल और दिमाग के किसी गहरे कोने में एक बहुत ही अजीब और तीखी फीलिंग रह गई थी…. मैं जब भी मम्मी को इमरान के साथ मुस्कुराकर बात करते देखता, मेरी आँखों के सामने मम्मी द्वारा पहले किया गया वह 'weird' व्यवहार घूम जाता। मैं भूल नहीं पा रहा था कि कैसे इमरान के सामने आते ही मम्मी का चेहरा सफेद पड़ जाता था…. मैं भूल नहीं पा रहा था कि कैसे वह इमरान के बंद कमरे के दरवाजे को एक अनजाने खौफ से घूरती थीं— और सबसे बढ़कर, मेरे दिमाग में वह रात आज भी जिंदा थी, जब वह लैपटॉप पर मम्मी की तस्वीर को ज़ूम करके उस रहस्यमयी पुराने रजिस्टर से कुछ मिला रहा था। इमरान की यह अत्यधिक भलमनसाहत, उसका यह अचानक आ जाना, और मम्मी का इतनी जल्दी उस पर भरोसा कर लेना—यह सब मुझे सुकून देने के बजाय एक नए अंदेशे से भर रहा था…. …… ‘क्या इमरान वाकई दिल का साफ था और संकट में दोस्त की मदद कर रहा था...? कहीं सहारा बनने के नाम पर कोई और ही खेल तो नहीं चल रहा था...?! To be Continued….
20-06-2026, 12:19 PM
(This post was last modified: 20-06-2026, 06:44 PM by garamrohan. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
लाजवाब लिखाई मित्र|
संकट अचानक दस्तक नही देता, सामान्य आदमी उसकी धीमी आहट या तो महासुस नाही कर पाता, या फिर अनसुना कर देता है| दुर्भाग्यसे देव के साथ ये दोनो हुआ है| इसपरीणाम वो खुद को और अपनी मम्मी को इस मोड पे ले आया है, जहा उपरी दिखावा एक आनंद भरे यात्रा का है| पण पुरी संभावना है की किसी भी वक्त ऐसि दुर्घटना हो जाये की सब तिथर बिथर हो जाये| आपने कथा को लाजवाब ढंग से लिखा है, कही भी जलदी नाही, ना ही व्यर्थ का वर्णन | प्रतीक्षा है |
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