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Chapter 5
सुबह की धूप कमरे में फ़िल्टर होकर आ रही थी। हल्की नारंगी।
सुमन अभी भी सो रही थी — नागी। नाइटी ऊपर चढ़ गई थी। थोंग रात ही कहीं खो गया था — शायद क्लब के फर्श पर, शायद टैक्सी में, शायद यहीं कहीं।
उसकी चूत खुली पड़ी थी। सुबह की ठंडी हवा उस पर पड़ रही थी। लैबिया थोड़े खुले हुए — रात की नमी अभी भी वहाँ थी। सूखी नहीं थी।
राज बाथरूम से निकला। तौलिया कमर पर लपेटे हुए। उसके सामने तंबू खड़ा था — रात के सबके बाद भी।
उसने देखा सुमन को। उसकी खुली हुई चूत को। उसकी बड़ी, गोरी, भरी हुई जांघों के बीच वह काली-गुलाबी दरार।
राज घुटनों के बल बैठ गया। बिस्तर के किनारे।
उसने अपना चेहरा सुमन की चूत के बिल्कुल पास रख लिया। सूंघा।
गंध — तेज़। नमकीन। रात का बचा हुआ पसीना, उस अजनबी आदमी की उँगलियाँ, सुमन का अपना पानी, डांस फ्लोर की धूल, क्लब की बियर। सब मिला हुआ।
राज ने एक लंबी, गहरी साँस ली। जैसे कोई नशा अंदर उतार रहा हो।
फिर उसने अपने होंठ चूत पर रख दिए। धीरे से। एक लंबा, गीला किस। बीचोंबीच — जहाँ सबसे ज्यादा गीलापन था।
सुमन करवट बदलते हुए बुदबुदाई — "हम्म्म..."
राज उठा। तैयार होने लगा।
शर्ट, पेंट, बेल्ट, घड़ी। ब्रश, परफ्यूम, फोन, वॉलेट।
बाहर निकलने से पहले — वह वापस बिस्तर पर गया। झुका। सुमन के गाल पर एक किस किया।
वह सोई हुई थी। बिल्कुल खूबसूरत। उसके होठों पर हल्की मुस्कान — किसी सपने में, शायद उसी अजनबी के साथ।
राज निकल गया।
राज अपनी कुर्सी पर पीछे की तरफ झुका हुआ था। उसके सामने कंप्यूटर स्क्रीन थी — लेकिन उस पर प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि कल रात के दृश्य चल रहे थे।
सुमन उस अजनबी के कंधे पर सिर रखे। उसकी चूत में उँगली।
वह दूसरा आदमी — बार में राज के बगल में बैठा — जिसने भी अपना लंड मसला था।
सुमन की नंगी चूचियाँ डांस फ्लोर पर हवा में झूलती हुई।
राज का लंड पेंट के अंदर दर्द करने लगा। वह मुस्कुराया।
यह तो बस शुरुआत थी।
उसने अपने फोन में एक नोट खोला — "प्लान्स"
लिखा —
1. रेस्टोरेंट में डिनर — थाई-स्लिट ड्रेस, बिना चड्डी। वेटर को इत्तेफाक से दिख जाए।
2. मेट्रो यात्रा — पीक आवर्स। कोई अनजान आदमी पीछे से रगड़ खाए।
3. ब्यूटी पार्लर — मसाज। पुरुष मसाजिस्ट। पूरा शरीर, कोई कपड़ा नहीं।
4. किसी पार्टी में — सुमन किसी और के साथ डांस करे। पूरी रात। मैं देखूँ।
राज ने फोन रखा। उसके लंड ने पेंट को और उभार दिया।
वह सोचने लगा — अगला कदम। असली कदम। जहाँ सिर्फ उँगली नहीं, बल्कि... असली लंड। किसी और का।
उसकी साँसें तेज़ हो गईं। उसने पानी पिया। ठंडा।
लेकिन अंदर आग थी।
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दस बजे।
सुमन की आँख खुली। बिस्तर खाली था। उसके बगल में एक नोट था —
"मेरी राँड। कल रात कमाल थी। आज नया टास्क मिलेगा। — तेरा बदमाश"
सुमन मुस्कुराई। बिस्तर से लुढ़की। नागी ही बाथरूम गई। शॉवर लिया — लेकिन साबुन नहीं लगाया। सिर्फ पानी। रात की गंध को वह अपने ऊपर रखना चाहती थी। थोड़ी देर और।
उसने वही सेमी-ट्रांसपेरेंट नाइटी पहनी — जिसमें उसके निप्पल और चूत के बाल साफ दिख रहे थे। बालों में हाथ फेरा। कॉफी बनाई।
बालकनी में आ गई।
धूप। गर्मी। हल्की हवा।
वह बालकनी के रेलिंग पर खड़ी हुई। कॉफी पी रही थी। उसकी नज़र सामने के पार्क पर थी, लेकिन दिमाग में कल रात का डांस फ्लोर था।
वह आदमी। उसकी उँगली। उसकी गर्म साँस उसकी गर्दन पर।
सुमन की चूत में हल्की सी नमी आ गई। नाइटी के पतले कपड़े पर एक छोटा सा गीला दाग बन गया।
"कैसी हो सुमन बेटा?"
आवाज़ — बगल वाली बालकनी से।
सुमन ने पलट कर देखा। मिश्रा अंकल। रिटायर्ड बैंक मैनेजर। पचास के आसपास। कद में ठिगने, पेट निकला हुआ, लुंगी और बनियान पहने।
सुमन मुस्कुराई। "मैं ठीक हूँ अंकल। आप कैसे हैं?"
मिश्रा अंकल की आँखें फटी की फटी रह गईं।
सुमन सामने खड़ी थी — नाइटी में। उसके निप्पल साफ दिख रहे थे। उसकी बड़ी-बड़ी चूचियाँ नाइटी को आगे की तरफ धकेल रही थीं। उसकी चूत का उभार — काला, गीला सा — कपड़े के नीचे चमक रहा था।
उसकी जांघें — गोरी, मोटी, एक दूसरे से रगड़ खाती हुई।
मिश्रा अंकल ने थूक निगला। एक बार, दो बार।
"मैं... मैं भी ठीक हूँ बेटा।"
सुमन को मज़ा आने लगा। वह जानती थी कि अंकल क्या देख रहे हैं। उनकी लुंगी के आगे हल्का सा उभार बन चुका था।
उसने सोचा — चलो थोड़ा और बढ़ा दें।
सुमन ने जानबूझकर अपना एक पैर उठाकर बालकनी में रखी हुई प्लास्टिक की कुर्सी पर रख दिया।
उसकी जांघ खुल गई। नाइटी ऊपर चढ़ गई। उसकी चूत — अब पूरी तरह सामने। लैबिया थोड़े खुले हुए। गीली चमक।
मिश्रा अंकल का मुँह खुला रह गया। उनकी लुंगी के आगे अब पूरा तंबू था। उनके हाथ लुंगी के ऊपर अपने आप चले गए। मसलने लगे। उनकी लार टपकने लगी — गाल से नीचे ठुड्डी तक।
"अंकल, क्या हुआ?" सुमन ने मासूमियत से पूछा।
"कुछ... कुछ नहीं बेटा..." मिश्रा अंकल की आवाज़ फट रही थी। "बस... आज का पेपर नहीं आया मेरे घर। तुम्हारे पास है क्या?"
सुमन मुस्कुराई। "हाँ अंकल, अंदर पड़ा है। ले आती हूँ।"
वह मुड़ी। अंदर चली गई।
पेपर फर्श पर पड़ा था। उसने धीरे से झुकना शुरू किया — जानबूझकर धीरे।
नाइटी पीछे से ऊपर चढ़ गई। उसकी गांड — दो बड़े, गोरे, भरे हुए गाल — पूरी तरह खुल गई। बीच में काला गड्ढा। उसकी चूत पीछे से भी दिख रही थी — गीली लटकनें लटक रही थीं।
सुमन ने एक बार अपनी गांड को मटकाया। जानबूझकर। धीरे से। हिली-डुली।
फिर उसने पीछे मुड़कर देखा।
मिश्रा अंकल दोनों हाथों से अपना लंड लुंगी के ऊपर से दबा रहे थे। उनकी आँखों से पानी आ रहा था — या पसीना, पता नहीं। उनका थूक ठुड्डी से टपक रहा था।
"ये लो अंकल," सुमन ने पेपर उठाया। लेकिन बालकनी तक लाने के लिए उसे पूरी तरह आगे झुकना पड़ा।
उसने बालकनी का रेलिंग पकड़ा। पूरी आगे झुक गई। अब उसकी चूचियाँ लगभग बाहर आ गई थीं — नाइटी का नेकलाइन ढीला था, स्तन लटक रहे थे। निप्पल हवा में।
"लो अंकल," उसने मुस्कुराते हुए कहा।
मिश्रा अंकल ने हाथ बढ़ाया। उनके हाथ काँप रहे थे। उन्होंने पेपर लिया — लेकिन उनकी नज़रें पेपर पर नहीं थीं। वह सुमन के स्तनों पर थीं। उसकी चूत पर। उसकी गांड पर।
"थैंक... थैंक यू बेटा..." वह बुदबुदाए।
सुमन मुस्कुराई। धीरे से सीधी हुई। उसने एक बार और मटका दिया — अपनी गांड को — जैसे कुछ खास नहीं।
"बाय अंकल," उसने कहा। और अंदर चली गई।
अंदर जाकर वह दीवार से लग गई। उसकी साँसें तेज़ थीं। उसके निप्पल खड़े थे। उसकी चूत गीली हो चुकी थी — हाथ लगाने की ज़रूरत नहीं थी, पानी बह ही रहा था।
वह मुस्कुराई। उसने सोचा — राज को ये सब बताना है। आज रात।
फिर उसने अपनी चूत पर हाथ रखा। अपनी ही उँगली अंदर डाली। एक बार। बाहर निकाली। चाट ली।
"मज़ा आ गया, अंकल जी," वह फुसफुसाई।
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मिश्रा अंकल अंदर गए। उनकी पत्नी किचन में थी।
वह बाथरूम में घुसे। लुंगी उतारी। उनका लंड — लाल, सख्त, उभरी हुई नसों के साथ — हवा में खड़ा था।
उन्होंने अपना लंड पकड़ा। हाथ तेज़ कर दिया।
उनकी आँखों के सामने — सुमन की खुली चूत। उसकी गीली चमक। उसकी गांड का मटकना। उसके निप्पल। उसकी मुस्कान।
"अह्ह साली... क्या माल है..."
शाम के सात बजे।
राज ने दरवाज़ा खोला। अंदर आया। शर्ट की बटन खोली, टाई ढीली की।
सुमन लिविंग रूम में सोफे पर बैठी थी। वही सेमी-ट्रांसपेरेंट नाइटी — पूरे दिन वही। उसके बाल बिखरे हुए। हाथ में चाय का कप।
राज ने उसके पास आकर बैठते हुए कहा, "बता। क्या हुआ आज?"
सुमन मुस्कुराई। वह मुस्कान — जो अब राज जानता था। शैतानी। भरी हुई।
"बहुत कुछ हुआ," उसने कहा।
और फिर उसने सब बता दिया। सुबह से। बालकनी से। मिश्रा अंकल से।
कैसे उसने पैर कुर्सी पर रखा। कैसे उसकी चूत खुल गई। कैसे अंकल की लार टपकने लगी। कैसे उसने पीछे मुड़कर देखा — अंकल अपना लंड मसल रहे थे।
कैसे वह पेपर लेने के लिए आगे झुकी — पूरी — और उसकी चूचियाँ लगभग बाहर आ गईं।
राज सुन रहा था। उसकी साँसें भारी हो रही थीं। उसके पेंट के अंदर लंड सख्त हो चुका था।
सुमन ने आखिरी लाइन कही — "फिर अंदर आकर मैंने अपनी उँगली अपनी चूत में डाली। चाट ली।"
दोनों चुप हो गए।
फिर राज हँसा। जोर से। खुलकर।
"पता नहीं," उसने कहा, "मिश्रा जी ज़्यादा थर्की हैं या तुम?"
सुमन भी हँसने लगी। पहले धीरे, फिर खिलखिलाकर। उसकी हँसी में वही मासूमियत थी जो पहले हुआ करती थी — और अब उसके साथ एक नई शरारत भी मिल गई थी।
"मैं तो बस वैसे ही खड़ी थी," सुमन ने कहा। "अंकल ने खुद देख लिया। मैंने क्या किया?"
"हाँ हाँ," राज ने उसकी ठुड्डी पकड़ी। "तूने कुछ नहीं किया। बस अपनी गांड मटकाई, अपनी चूत खोली, अपनी चूचियाँ बाहर निकाल दीं। बस।"
"बिल्कुल," सुमन ने आँखें सिकोड़ते हुए कहा। "यह तो गलती से हो गया।"
दोनों फिर हँसे।
राज ने उसके बालों में हाथ फेरा। "और तुझे कैसा लगा?"
सुमन ने उसकी तरफ देखा। एक लंबी, गहरी नज़र।
"बहुत अच्छा," उसने कहा। "जब उसकी आँखें फट गईं... जब उसका लुंगी के ऊपर से लंड दिखने लगा... जब उसकी लार टपकने लगी... मुझे लगा कि मेरी चूत से पानी निकल रहा है बिना छुए।"
राज ने अपनी पैंट के ऊपर से अपना लंड दबाया। "बस। अब रुका नहीं जाएगा।"
सुमन ने उसका हाथ पकड़ लिया। "पहले खाना खा। फिर देखते हैं।"
राज कराहा। "तू मुझे मार डालेगी।"
"हाँ," सुमन मुस्कुराई। "बस यही प्लान है।"
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अगली सुबह। ग्यारह बजे।
सुमन अभी तक नहीं नहाई थी। वह उसी पारदर्शी नाइटी में थी जो कल रात पहनी थी — सफेद, मसलिन, इतनी पतली कि उसके निप्पल और चूत के काले बाल साफ दिख रहे थे। बिना ब्रा, बिना चड्डी।
वह किचन में कॉफी बना रही थी। राज ऑफिस जा चुका था। घर में सन्नाटा था — सिर्फ फ्रिज की गुंजन और बाहर गलियों का हल्का शोर।
फिर दरवाज़े की घंटी बजी।
डिंग डोंग।
सुमन ने झाँका। पीकहोल से देखा — एक युवा लड़का। 20 के दशक में। सफेद हेलमेट। हाथ में एक बैग — ज़ोमैटो का। गोरा सा, दुबला-पतला, घबराई हुई आँखें।
सुमन मुस्कुराई।
उसने दरवाज़ा खोल दिया। पूरा। पीकहोल के लिए नहीं — उसे सामने देखने के लिए।
लड़के की आँखें फट गईं। उसका हाथ बैग पर सख्त हो गया। उसने सुमन को देखा — सुबह की धूप में, उस पारदर्शी नाइटी में, उसके बिखरे बालों में, उसकी खुली जांघों में।
बैग उसके हाथ से लगभग गिरा। लड़खड़ाया। उसने बैग पकड़ा।
"मैडम... ऑर्डर..." उसकी आवाज़ फट रही थी।
"अंदर आ जाओ," सुमन ने मुस्कुराते हुए कहा। "खाना टेबल पर रख दो।"
लड़के ने निगल लिया। उसने अंदर कदम रखा। जूते दरवाजे पर ही उतार दिए — उसके पैर काँप रहे थे।
सुमन ने दरवाज़ा बंद कर दिया।
क्लिक।
लड़का पीछे मुड़कर देखा — उसकी आँखों में डर और चाहत दोनों थे। वह टेबल की तरफ बढ़ा। बैग रखा। फिर खड़ा हो गया। न जाने कहाँ देखे।
सुमन पीछे थी। वह चुपचाप लड़के के पीछे आकर खड़ी हो गई। उसके बिल्कुल पीछे। इतना पीछे कि उसकी साँसें लड़के की गर्दन पर पड़ रही थीं।
लड़का थर्राया।
"क्या देख रहे हो?" सुमन ने धीरे से कहा। उसकी आवाज़ नीची, नम। "हाथ लगाओ अगर देखना है।"
लड़का मुड़ा। उसके हाथ काँप रहे थे। उसने धीरे-धीरे अपना हाथ बढ़ाया — सुमन के स्तनों की तरफ।
पहले तो उसने बस छुआ। कपड़े के ऊपर से। पारदर्शी नाइटी के ऊपर से। उसकी उँगलियाँ सुमन के निप्पल पर फिर गईं — सख्त, खड़ा हुआ, गर्म।
सुमन ने आह भरी। हल्की सी। जैसे गले की गहराई से निकली हो।
लड़के ने धीरे-धीरे हाथ रख दिया — पूरी हथेली से। सुमन की बाईं चूची। बड़ी, भरी हुई, मुलायम। उसने दबाया — सुमन की चूची उसकी हथेली में समाने लगी।
"और जोर से," सुमन फुसफुसाई।
लड़के ने जोर से दबाया। दोनों हाथों से। दोनों चूचियाँ। उसने मसल दिया, जैसे आटा गूंथ रहा हो। निचोड़ा, छोड़ा, फिर निचोड़ा। उसकी उँगलियाँ निप्पल पर घूम रही थीं, दबा रही थीं, घुमा रही थीं।
सुमन कराह उठी। अब हल्की नहीं — खुली। "अह्ह..."
लड़के का लंड उसकी पैंट के अंदर तीर की तरह खड़ा हो चुका था। जींस के कपड़े को आगे की तरफ धकेल रहा था।
सुमन ने अपना हाथ नीचे किया। उसने लड़के की पैंट के ऊपर से उसका लंड पकड़ लिया।
लड़का हाँफ उठा।
"हॉट है," सुमन ने कहा। "गरम। बहुत सख्त।"
उसने धीरे-धीरे लड़के की पैंट की ज़िप खोली। बटन खोला। पैंट नीचे सरका दी। फिर उसने उसकी बॉक्सर पकड़ी — नीचे उतारी।
लंड बाहर आया। 7 इंच के करीब। सीधा। गहरे रंग का सिरा। नसें उभरी हुई। पहले से ही पानी टपक रहा था — प्री-कम।
सुमन ने उसे पकड़ लिया। गर्म, सख्त, धड़कता हुआ। उसने एक बार ऊपर से नीचे किया — उसकी उँगलियाँ सिरे पर घूम गईं, वह गीला पानी उसके हाथ में लग गया।
लड़के के घुटने झुक गए। "मैडम... मैं..."
"चुप," सुमन ने कहा। "बस खड़ा रह।"
उसने लड़के को टेबल के किनारे से लगा दिया। फिर वह घुटनों के बल बैठ गई। लड़के के सामने।
उसने अपना मुँह खोला। लंड को अंदर ले लिया।
लड़का चीखा। दबी हुई चीख — जैसे कोई सुन न ले। उसने टेबल के किनारे पकड़ लिया — उसकी पोरें सफेद पड़ गईं।
सुमन ने उसका लंड अपने मुँह में ले लिया। पूरा। गहरा। उसके होंठ सिरे पर बंद हुए। उसकी जीभ नीचे से ऊपर घूमी — नसों के साथ, सिरे के चारों ओर।
लड़का हिलने लगा। उसके कूल्हे अपने आप आगे बढ़े — लंड सुमन के गले में धँस गया। वह लगभग उल्टी कर बैठी, लेकिन रुकी नहीं। उसने अपना सिर और आगे किया। अब उसकी नाक लड़के के पेट से लग रही थी।
सुमन ने उसका लंड मुँह से बाहर निकाला। साँस ली। फिर अंदर लिया। बाहर। अंदर। तेज़। गीली आवाज़ हो रही थी — लार की, पानी की।
"बोल," सुमन रुकते हुए बोली। "कैसा लग रहा है?"
"बहुत... बहुत अच्छा मैडम... मेरा लंड... पहली बार किसी ने मुँह में लिया है..."
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सुमन मुस्कुराई। फिर मुँह में लिया। एक हाथ से लंड पकड़ा, दूसरे से उसकी बॉल्स पर हाथ फेरा — गोल, भरे हुए, गर्म। उसने बॉल्स को दबाया — लड़का कराह उठा।
"मैडम... मैं आ रहा हूँ... रुको..."
लेकिन सुमन ने नहीं रोका। उसने और तेज़ किया। सिरे पर अपनी जीभ तेज़ी से घुमाई, फिर पूरा लंड गले तक ले गई।
लड़के ने आखिरी साँस ली — फिर उसका पूरा शरीर सख्त हो गया। उसके हाथ टेबल छोड़कर सुमन के सिर पर आ गए — उसके बाल पकड़ लिए — अनजाने में, अपने आप।
वह फूटा। सुमन के मुँह में। गर्म, गाढ़ा, तेज़ धार में। पहली धार, दूसरी, तीसरी — उसके गले में जा रहा था, उसके होठों से बाहर निकल रहा था, उसकी ठुड्डी पर टपक रहा था।
सुमन ने सब पी लिया। सब।
लड़का ढीला पड़ गया। उसके घुटने मुड़ गए — वह फर्श पर बैठ गया। पैंट टखनों पर लटक रही थी। उसका लंड अभी भी सख्त था, लेकिन गीला हो चुका था — सुमन की लार से, उसके खुद के पानी से।
सुमन उठी। उसने अपने होठों को पोंछा। फिर उसने अपनी ठुड्डी पर लगा हुआ पानी — लड़के का वीर्य — अपनी उँगली से पोछा और अपने मुँह में डाल लिया।
लड़का उसकी तरफ देख रहा था — उसकी आँखों में डर, पछतावा, और कुछ और... भूख। अभी भी भूख।
"अब उठ," सुमन ने कहा। "खाना ठंडा हो रहा है।"
लड़का उठा। धीरे-धीरे अपनी पैंट पहनी। ज़िप बंद की। बटन बंद किया। उसने बैग उठाया — लेकिन उसके हाथ अभी भी काँप रहे थे।
"मैडम... मैं..."
"जा," सुमन ने कहा। दरवाज़ा खोल दिया। "कल फिर से ऑर्डर करुँगी। कुछ और खाने का।"
लड़का बाहर निकला। सुमन ने दरवाज़ा बंद कर दिया।
वह दरवाज़े की तरफ पीठ करके खड़ी रही। उसकी साँसें तेज़ थीं। उसकी चूत गीली हो चुकी थी — नाइटी के नीचे से पानी टपक रहा था, उसकी जांघ पर बह रहा था।
उसने अपना हाथ अपनी चूत पर रखा। एक उँगली अंदर डाली — गीली, गरम, फूली हुई। वह कराही। फिर दूसरी उँगली डाल दी। दो उँगलियाँ अंदर। आगे-पीछे। आगे-पीछे।
वह बिना किसी को छुए ही आ गई। खड़े-खड़े। दरवाज़े की तरफ पीठ करके। उसका शरीर काँपा, उसकी चूत ने दो उँगलियों को दबोचा, फिर छोड़ दिया। पानी फर्श पर टपक गया।
सुमन दीवार पर झुक गई। मुस्कुराई।
फिर उसने फोन उठाया।
राज का नंबर मिलाया।
राज ने उठाया — "हल्लो?"
"सुन," सुमन ने कहा। उसकी आवाज़ में अभी भी काँप थी। "डिलीवरी बॉय आया था। ज़ोमैटो वाला।"
"हाँ?"
"मैंने उसका लंड मुँह में लिया। पूरा पी लिया।"
लाइन के दूसरी तरफ — चुप्पी। फिर साँसें तेज़ हुईं। राज ने धीरे से कहा — "बस? मुँह में?"
"बस। आज के लिए। कल फिर आएगा। शायद तब कुछ और हो।"
राज की साँसें काँप रही थीं। "तू... तूने वीडियो लिया?"
"नहीं। अगली बार लूँगी। तू देखेगा?"
राज ने निगल लिया। "हाँ।"
सुमन मुस्कुराई। "ठीक है। अब काम कर। शाम को मिलते हैं।"
उसने फोन रख दिया।
रात के ग्यारह बज रहे थे।
शहर की सड़कें सूनी पड़ी थीं। लाइटें धुंधली। हवा में ठंडक थी — अक्टूबर के आखिरी दिनों जैसी। सिर्फ कुत्ते भौंक रहे थे कहीं दूर, और कभी-कभार कोई रिक्शा गुजर जाता था।
राज और सुमन उस पार्क में घुस गए थे — जो दिन में बच्चों और बूढ़ों से भरा रहता था, लेकिन रात में उजाड़, सन्नाटा, केवल टूटी हुई बेंचें और सूखे पत्ते। पार्क की रोशनी थी — एक झिलमिलाती, पीली, इतनी धुंधली कि चेहरे नहीं पहचाने जा सकते थे।
सुमन वही काली थाई-स्लिट ड्रेस पहनकर आई थी — वही जो उसने क्लब में पहनी थी। नीचे कुछ नहीं। ब्रा नहीं। चड्डी नहीं। सिर्फ वह ड्रेस, उसके भीतर उसका गर्म, मांसल, नंगा शरीर। बाल खुले थे, कंधों पर बिखरे हुए।
राज उसके पीछे-पीछे चल रहा था। उसके हाथ उसकी गांड पर थे — ड्रेस के ऊपर से, सहला रहे थे, उसकी गांड के गोलपन को महसूस कर रहे थे।
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"सुन," राज ने फुसफुसाया। "वो देख।"
पार्क के दूसरे छोर पर — एक आदमी बेंच पर बैठा था। सिगरेट जला रहा था। चालीस के करीब। मोटा-ठिगना, शायद कोई मजदूर या नाई। उसकी बाँहों पर टैटू थे। उसने सुमन को देखा — नज़रें गड़ गईं। सिगरेट उसके हाथ में बिना जले रह गई।
राज ने सुमन के कान में कहा, "जा। उसके सामने से गुजर। धीरे से।"
सुमन मुस्कुराई। वह उस आदमी की तरफ बढ़ी। राज एक पेड़ के पीछे खड़ा हो गया — देखने के लिए।
सुमन बेंच के सामने से गुज़री। धीरे। उसके कूल्हे लहरा रहे थे। उसकी चूचियाँ ड्रेस के अंदर उछल रही थीं — बिना ब्रा, बस ड्रेस की पतली रेशम जो हर हिलाने पर उभार बता रही थी।
उस आदमी की सिगरेट गिर गई। उसने सुमन को घूरा — उसकी नज़र उसके स्तनों से उसकी खुली रान पर, फिर उसके नीचे की दरार पर — जहाँ से उसकी चूत झाँक रही थी, ड्रेस के नीचे से।
सुमन वहीं रुक गई।
बेंच के सामने। उस आदमी के बिल्कुल सामने।
उसने धीरे-धीरे अपने दोनों हाथ ऊपर उठाए — जैसे तन रही हो। उसकी चूचियाँ और ऊपर उठ गईं, ड्रेस का कपड़ा उन पर तन गया — निप्पल साफ उभर आए, कपड़े को चीरते हुए।
उस आदमी का मुँह खुल गया। उसके होंठ सूख गए। उसने अपना थूक निगला — बार-बार।
सुमन ने मुस्कुराकर कहा — "अच्छी रात है।"
उस आदमी ने कुछ नहीं कहा। वह सिर्फ देख सकता था।
सुमन ने अपना पैर बेंच के पास रखी एक छोटी सी ईंट पर रख दिया। उसकी जांघ खुल गई। ड्रेस का स्लिट और खुल गया — अब उसकी पूरी जांघ नंगी थी, ऊपर तक। उसकी चूत — वह दिखाई दे रही थी। लेबिया की गुलाबी लकीरें। कुछ काले बाल। उस पर हल्की नमी चमक रही थी।
उस आदमी ने अपनी पैंट के ऊपर से अपना लंड पकड़ लिया। उसकी आँखों में पानी आ गया — भूख से। वह अपना लंड दबा रहा था, मसल रहा था, उसका हाथ तेज़ होता जा रहा था।
सुमन ने अपनी उँगली अपने होठों पर रखी — चुप रहने का इशारा। फिर उसने अपनी उँगली नीचे उतारी — अपने निप्पल पर घुमाई — ड्रेस के ऊपर से।
उस आदमी की साँसें फट रही थीं।
सुमन ने धीरे-धीरे अपनी ड्रेस का नेकलाइन नीचे खींचा — एक चूची बाहर आ गई। बड़ी, गोरी, गोल, निप्पल सख्त और खड़ा — जैसे उँगली कर रहा हो। सुमन ने उसे अपनी हथेली में लिया, दबाया, छोड़ा, फिर निप्पल पर उँगली घुमाई।
उस आदमी ने अपना लंड पैंट से बाहर निकाल लिया। लाल, सख्त, उभरी हुई नसें। उसने उसे जोर-जोर से हाथ लगाना शुरू कर दिया। थूक उसकी ठुड्डी से टपक रहा था।
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तभी — कदमों की आवाज़।
दूसरा आदमी। युवा। दुबला। वह भी पार्क में घूम रहा था — शायद घर जा रहा था, शॉर्टकट ले रहा था। उसने सुमन को देखा — वह ठिठक गया।
उसकी नज़र पहले सुमन के चेहरे पर, फिर उसकी नंगी चूची पर, फिर उसकी खुली जांघ और चूत पर, फिर उस आदमी पर जो अपना लंड मसल रहा था।
युवा लड़का रुक गया। वह भी देखने लगा।
अब दो आदमी थे। दोनों सुमन को देख रहे थे। दोनों अपने-अपने लंड मसल रहे थे।
राज पेड़ के पीछे खड़ा था — उसका लंड पैंट के अंदर फट रहा था। वह मुस्कुरा रहा था।
सुमन ने और आगे बढ़ाया।
वह दोनों आदमियों के बीच में आकर खड़ी हो गई। उसने अपनी दोनों चूचियाँ बाहर निकाल लीं — ड्रेस कमर पर लटक रही थी। अब उसका ऊपरी धड़ पूरा नंगा था।
उसने अपनी चूचियाँ दोनों हाथों से पकड़ लीं। उन्हें दबाया — एक-दूसरे से लड़ाया, एक साथ मिलाया, फिर अलग किया। निप्पल हवा में इशारा कर रहे थे।
मोटा आदमी खड़ा हो गया। वह सुमन के पास आया। काँपते हाथों से उसने सुमन की एक चूची पकड़ ली।
सुमन ने विरोध नहीं किया।
उस आदमी ने चूची दबाई — जोर से। फिर उसने अपना मुँह उस पर रख दिया। उसने चूसना शुरू कर दिया — जोर-जोर से, गीली आवाज़ के साथ। उसकी जीभ निप्पल पर घूम रही थी, दाँत दबा रहे थे।
सुमन कराह उठी। आधी रात के सन्नाटे में वह आवाज़ साफ सुनाई दी — "अह्ह..."
युवा लड़का भी पास आ गया। वह सुमन के पीछे आकर खड़ा हो गया। उसके हाथ सुमन की कमर पर गए, फिर नीचे — उसकी गांड पर। उसने दोनों हाथों से सुमन की गांड के गाल पकड़ लिए। मुलायम, गर्म, गीला — पसीने से या चूत के पानी से।
उसने सुमन की गांड को दबाया। उसके अंगूठे बीच की दरार पर गए। उसने एक अंगूठा उसकी चूत पर रख दिया — ड्रेस के नीचे से, सीधा। लेबिया के बीच। वह पहले से ही गीली थी।
सुमन चिल्लाई — धीमी, दबी हुई चीख। "अह्ह्ह... नहीं... अंदर नहीं..."
लेकिन उस आदमी ने अंगूठा अंदर नहीं डाला। बस बाहर रखा। रगड़ा। गीले होठों पर उँगली फिराई। इतना ही। सिर्फ टीज़।
सामने वाला आदमी अब भी सुमन की चूची चूस रहा था। उसने दूसरी चूची भी पकड़ ली — एक हाथ से दोनों चूचियाँ दबा रहा था, और मुँह से एक को चूस रहा था। उसकी लार टपक रही थी — सुमन के स्तन पर, ड्रेस पर, फर्श पर।
युवा लड़के ने अपना लंड निकाल लिया। उसने सुमन की गांड की दरार पर अपना लंड रख दिया — ड्रेस के ऊपर से। रगड़ा। आगे-पीछे। उसका लंड गीला हो गया — सुमन के चूत के पानी से जो ड्रेस को भिगो चुका था।
सुमन ने अपना सिर पीछे की तरफ झुका दिया। उसकी आँखें बंद थीं। उसके मुँह से सिर्फ साँसें निकल रही थीं — तेज़, फटी हुई, गीली।
"रुको... बस... इतना ही..." वह फुसफुसाई।
लेकिन उसने उन्हें नहीं रोका।
मोटा आदमी एक चूची छोड़कर दूसरी पर आ गया। वह बारी-बारी से चूस रहा था, काट रहा था, चाट रहा था। उसके हाथ सुमन की कमर पर थे, उसे अपनी तरफ खींच रहे थे।
युवा लड़का पीछे से सुमन की गर्दन चूमने लगा। उसकी जीभ उसके कंधों पर, उसके कानों पर। उसका लंड अभी भी उसकी गांड पर रगड़ खा रहा था।
राज पेड़ के पीछे अपना लंड पकड़े हुए था। वह हाथ लगा रहा था — धीरे-धीरे — ताकि जल्दी खत्म न हो। वह देखना चाहता था। सब देखना चाहता था। सुमन का नंगा शरीर दो अजनबियों के बीच। उसकी चूचियाँ चूसी जा रही थीं। उसकी गांड रगड़ी जा रही थी।
तभी — पार्क के बाहर से सिक्युरिटी की गश्ती गाड़ी की हल्की रोशनी दिखी।
सभी लोग सन्न रह गए।
युवा लड़का तुरंत पीछे हट गया। अपना लंड अंदर किया, ज़िप बंद की। मोटा आदमी भी पीछे हटा — उसने सुमन की चूची छोड़ी, अपना लंड पैंट में किया, और बेंच पर बैठकर सिगरेट जलाने का नाटक करने लगा।
सुमन ने धीरे-धीरे अपनी ड्रेस ऊपर खींची। अपनी चूचियाँ अंदर कीं। ड्रेस को सही किया। उसने अपने बाल संवारे।
राज पेड़ के पीछे से निकला। उसने सुमन का हाथ पकड़ा। चुपचाप।
दोनों पार्क के दूसरे रास्ते से बाहर निकल गए।
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14-06-2026, 11:42 PM
(This post was last modified: 14-06-2026, 11:43 PM by Certified Addict. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
सड़क पर आकर राज ने सुमन को दीवार से लगा दिया। उसने उसका चेहरा पकड़ा। उसके होठों पर जोर से किस किया — गीला, गरम, लंबा किस। सुमन ने जवाब दिया। उनकी जीभें मिलीं, अलग हुईं, फिर मिलीं।
राज अलग हुआ। उसने सुमन की आँखों में देखा।
"कैसा लगा?" उसने पूछा।
सुमन ने साँस ली। उसकी साँसें अभी भी फट रही थीं।
"लंड... नहीं चाहिए था उनका मेरे अंदर," उसने कहा। "बस इतना। छूना। चूसना। रगड़ना। और देखना — उनकी आँखों में वह भूख, वह पागलपन..."
उसकी चूत अभी भी गीली थी। उसकी जांघों पर पानी टपक रहा था। राज ने अपना हाथ उसके नीचे किया — वह भीगा हुआ था।
"पागल है तू," राज ने मुस्कुराते हुए कहा।
"हाँ," सुमन ने कहा। "तेरे बनाई हुई। अब तू ही संभाल।"
राज ने अपनी उँगलियाँ सुमन की चूत पर रखीं। धीरे-धीरे — ड्रेस के ऊपर से नहीं, ड्रेस के अंदर। सीधा। उसकी उँगलियाँ अंदर घुस गईं। सुमन कराही।
लेकिन राज ने उँगलियाँ बाहर निकाल लीं।
"घर चल," उसने कहा। "अभी नहीं। रात बाकी है।"
सुमन ने अपनी जीभ बाहर निकाली — उसने राज की उँगलियाँ चाट लीं। अपना ही पानी।
फिर दोनों सड़क पर चल पड़े। हाथों में हाथ। राज का लंड अभी भी खड़ा था। सुमन की चूत अभी भी गीली थी।
और पार्क में वे दोनों आदमी अभी भी बैठे थे — थके हुए, शांत, अपने हाथों में लंड पकड़े हुए, जो अभी-अभी सुमन के शरीर पर रगड़ खा रहे थे।
अगली सुबह। साढ़े दस बजे।
सुमन ने नहाया था — नहाया तो था, लेकिन सिर्फ पानी से। कोई साबुन नहीं। रात की पार्क की गंध अभी भी उसके शरीर पर थी — उस मोटे आदमी की लार, युवा लड़के के हाथों का पसीना, और उसकी अपनी चूत का पानी जो रात भर सूखा नहीं था, बल्कि जम गया था — चिपचिपा, चमकदार।
उसने वही पारदर्शी सफेद नाइटी पहनी थी — आज सुबह इसे धोया नहीं था। उस पर कल के डिलीवरी बॉय के वीर्य के धब्बे थे, रात के पार्क की मिट्टी, और उसके अपने शरीर के निशान। कॉफी बनाई। बालकनी में आ गई।
धूप तेज़ थी। गर्मी। उसने अपने बाल खुले छोड़ दिए थे — लहराते, सूखे हुए, बिना कंघी के।
वह बालकनी के रेलिंग पर खड़ी हो गई। अपनी कॉफी पी रही थी। नाइटी के नीचे उसकी चूचियाँ स्वतंत्र थीं — निप्पल कपड़े को आगे की तरफ धकेल रहे थे। उसकी चूत — नाइटी के नीचे से काला उभार — उसकी जांघों के बीच छिपी हुई, लेकिन कपड़ा इतना पतला था कि हर लकीर, हर बाल साफ दिख रहा था।
"सुमन बेटा।"
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15-06-2026, 11:44 PM
(This post was last modified: 16-06-2026, 12:02 AM by Certified Addict. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
आवाज़ — बगल वाली बालकनी से। मिश्रा अंकल। आज वह पहले से ही वहाँ खड़े थे। इंतज़ार कर रहे थे। उनकी लुंगी के आगे हल्का सा उभार था — पूरा नहीं, अभी बस शुरुआत। लेकिन उनकी आँखों में वही भूख थी — और कुछ और। एक बेचैनी। जैसे पिछली बार अधूरा रह गया हो।
सुमन मुस्कुराई। "नमस्ते अंकल।"
"बहुत दिन बाद दिखी बेटा। कल नहीं दिखीं।"
सुमन ने कॉफी का घूँट लिया। "कल व्यस्त थी।"
मिश्रा अंकल ने निगल लिया। उनकी नज़र सुमन के स्तनों पर थी — उस नाइटी के नीचे की उभार पर। निप्पल। काला घेरा।
"अंकल," सुमन ने कहा। उसकी आवाज़ धीमी, मुलायम, लेकिन अंदर से तेज़। "चाय पियोगे? अंदर आ जाओ। बना दूँगी।"
मिश्रा अंकल ठिठक गए। उन्होंने सोचा — शायद मज़ाक कर रही है। लेकिन सुमन के चेहरे पर वह मुस्कान थी — जो ना नहीं कहती।
"पर... पर मैं..."
"आओ न अंकल। घर में कोई नहीं है। राज ऑफिस गया है।"
मिश्रा अंकल ने फिर निगल लिया। उन्होंने अपनी लुंगी सँभाली। अपने घर की तरफ देखा — पत्नी किचन में थी, टीवी चल रहा था, उन्हें कोई नहीं देख रहा था।
वह अपनी बालकनी से अंदर गए। पाँच मिनट बाद — सुमन के दरवाजे पर दस्तक।
खट-खट।
सुमन ने दरवाज़ा खोला। वह वही नाइटी पहने थी। बदली नहीं थी। उसके बाल अभी भी बिखरे हुए थे।
"अंदर आइए अंकल।"
मिश्रा अंकल अंदर आए। उनके हाथ काँप रहे थे। उनकी लुंगी अब पूरी तरह आगे की तरफ तनी हुई थी — उनका लंड सख्त हो चुका था। सुमन ने देखा। वह मुस्कुराई।
"बैठो अंकल। चाय बनाती हूँ।"
सुमन किचन में गई। वह जानबूझकर धीरे चल रही थी — उसकी गांड नाइटी के नीचे से हिल रही थी, एक गाल से दूसरा, लहरा रही थी। मिश्रा अंकल सोफे पर बैठे थे — उनकी नज़रें सुमन की गांड पर थीं। उनके हाथ अपने आप लुंगी के ऊपर चले गए।
सुमन ने चाय बनाना शुरू किया — पानी गरम किया, दूध डाला, चीनी। लेकिन उसका ध्यान किचन पर नहीं था। वह जानती थी कि अंकल क्या कर रहे हैं — अपना लंड मसल रहे हैं। उसकी पीठ उनकी तरफ थी — वह नाइटी इतनी पतली थी कि उसकी चूत के काले बाल पीछे से भी दिख रहे थे, नाइटी के नीचे से झाँक रहे थे।
चाय बन गई। सुमन ने दो कप उठाए — वह लिविंग रूम में आई। उसने एक कप मिश्रा अंकल के सामने रखा। फिर वह उनके बिल्कुल पास बैठ गई। इतना पास कि उसकी जांछ उनकी जांघ से लग रही थी। गर्म। मुलायम।
मिश्रा अंकल ने चाय का कप उठाया — लेकिन उसके हाथ इतने काँप रहे थे कि चाय गिरने लगी। उन्होंने कप वापस रख दिया।
"सुमन बेटा..." उनकी आवाज़ फट रही थी। "तुम... तुम बहुत..."
"क्या अंकल?" सुमन ने मासूमियत से पूछा। वह थोड़ा और पास हो गई। अब उसकी चूची उनकी बाँह से लग रही थी — नाइटी के कपड़े के बीच से। मुलायम, गर्म, दब रही थी।
मिश्रा अंकल ने अपना हाथ बढ़ाया।
पहले तो हिचकिचाए — फिर अचानक उन्होंने सुमन की चूची पकड़ ली। पूरा हाथ। जोर से।
सुमन ने आह भरी — लेकिन उसने विरोध नहीं किया। उसने बस देखा — अंकल के चेहरे पर। उनकी आँखों में पानी था — बूढ़े आदमी की भूख, जो सालों से दबी हुई थी।
"अंकल... धीरे..." सुमन ने कहा। लेकिन उसकी आवाज़ में मना नहीं थी।
मिश्रा अंकल ने दूसरी चूची भी पकड़ ली। अब दोनों हाथों से वह सुमन की चूचियाँ दबा रहे थे — मसल रहे थे, निचोड़ रहे थे, जैसे पका हुआ फल। निप्पल उनकी हथेलियों के बीच में दब रहे थे, सख्त होकर।
सुमन कराह उठी — "अह्ह... अंकल..."
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15-06-2026, 11:46 PM
(This post was last modified: 15-06-2026, 11:47 PM by Certified Addict. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
मिश्रा अंकल ने अपनी लुंगी ऊपर खींच ली। उनका लंड बाहर आ गया — बूढ़ा, सख्त तो था, लेकिन उम्र के निशान थे। नीली नसें उभरी हुई थीं। सिरा गहरा लाल। वह पहले से ही गीला था।
सुमन ने उसकी तरफ देखा। फिर उसने अपना हाथ बढ़ाया — उसने मिश्रा अंकल का लंड पकड़ लिया। गर्म। सख्त। धड़क रहा था।
मिश्रा अंकल चिल्ला पड़े — "अह्ह बेटा... बहुत दिनों बाद किसी ने छुआ है..."
सुमन ने हाथ लगाना शुरू किया — धीरे-धीरे, ऊपर-नीचे, गीले सिरे पर अंगूठा घुमाते हुए। उसने दूसरा हाथ उनकी बॉल्स पर रख दिया — ढीली, भरी हुई, गर्म।
मिश्रा अंकल का पूरा शरीर काँपने लगा। उन्होंने सुमन की चूचियाँ छोड़ दीं — अब उनके दोनों हाथ सुमन के कंधों पर थे, उसे पकड़ रहे थे, जैसे डूब रहे हों।
"बेटा... बस... बस और मत... मैं आ जाऊँगा..."
"अभी नहीं अंकल," सुमन ने फुसफुसाया। उसने हाथ रोक लिया। वह खड़ी हो गई।
मिश्रा अंकल ने उसकी तरफ देखा — बेचारगी से, भूख से। उनका लंड हवा में खड़ा था, पानी टपक रहा था।
सुमन उनके सामने खड़ी हो गई। उसने अपनी नाइटी ऊपर खींची — धीरे-धीरे। पहले जांघें खुलीं, फिर चूत, फिर पेट। उसने नाइटी अपनी चूचियों के ऊपर रोक दी — अब वह नंगी थी। सिर्फ नाइटी उसके कंधों पर लटक रही थी।
"अब देखो अंकल," उसने कहा। "जितना चाहो देखो।"
मिश्रा अंकल घूर रहे थे — सुमन की नंगी चूत पर, उसके गीले लेबिया पर, उसके काले बालों पर, उसकी बड़ी, लटकती चूचियों पर, सख्त निप्पल पर।
उन्होंने अपना हाथ बढ़ाया — उनकी उँगलियाँ सुमन की चूत पर फिरने लगीं। बाहर से। ऊपर-नीचे। लेबिया के बीच की दरार में।
सुमन कराह रही थी — लेकिन अब खुलकर। "हाँ... अंकल... वहीं..."
मिश्रा अंकल की एक उँगली अंदर घुस गई। बिना रुकावट के — सुमन की चूत गीली थी, खुली हुई, तैयार। उसने उँगली अंदर डाली — गहराई तक।
सुमन चिल्लाई — "अह्ह्ह!"
उसकी उँगली अंदर घूमी, बाहर आई, फिर अंदर। धीरे-धीरे। मिश्रा अंकल ने उँगली से ही चोदना शुरू कर दिया था — सुमन की चूत को। सुमन ने अपने हाथ उनके कंधों पर रख दिए — अपना संतुलन बनाए रखने के लिए। उसके घुटने झुक रहे थे।
"अंकल... अंकल... और... और तेज़..."
तभी — फोन बजा।
तेज़। तीखी घंटी।
[b]सुमन की आँखें खुल गईं। उसने फोन उठाया — स्क्रीन देखी। राज।
[/b]
उसने मिश्रा अंकल की तरफ देखा — उनकी उँगली अभी भी उसकी चूत के अंदर थी। सुमन ने अपनी आँखों से इशारा किया — रुको मत।
उसने कॉल उठा ली।
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15-06-2026, 11:47 PM
(This post was last modified: 16-06-2026, 12:01 AM by Certified Addict. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
"हैलो?"
राज की आवाज़ — "क्या कर रही है?"
सुमन ने साँस ली। उसकी आवाज़ सामान्य रखने की कोशिश — लेकिन उसकी साँसें भारी थीं। "बस... कुछ नहीं। कॉफी पी रही थी।"
मिश्रा अंकल की उँगली अंदर चली गई — और गहरी। सुमन की साँसें फट गईं। उसने मुँह पर हाथ रख लिया।
"आवाज़ क्यों फट रही है?" राज ने पूछा। उसकी आवाज़ में शक नहीं था — वह जानता था। वह समझ गया था। और वह खेल रहा था।
"कुछ... कुछ नहीं," सुमन ने कहा। "बस... अकेले में थोड़ी... थोड़ी गरमी लग रही है।"
मिश्रा अंकल ने दूसरी उँगली भी अंदर डाल दी। अब दो उँगलियाँ — सुमन की चूत के अंदर, अलग-अलग दिशाओं में घूम रही थीं। उनका अंगूठा सुमन के भग्ते पर दब रहा था — जोर से।
सुमन चुप रहने की कोशिश कर रही थी — लेकिन उसकी साँसें बता रही थीं सब कुछ। "हाँ... हाँ राज... मैं ठीक हूँ..."
"तुझे पता है," राज ने धीरे से कहा, "मैं यहाँ बैठा तेरी आवाज़ सुन रहा हूँ। और मेरा लंड खड़ा हो गया है। तू कुछ कर रही है। बता।"
सुमन ने अपने होंठ काट लिए। उसकी चूत फट रही थी — पानी निकल रहा था, मिश्रा अंकल के हाथ पर टपक रहा था, उनकी लुंगी पर, सोफे पर।
"बस... अंकल आए थे... चाय पीने..."
"कौन अंकल?"
"मिश्रा... मिश्रा अंकल..."
राज चुप हो गया। एक सेकंड। दो सेकंड। फिर उसकी आवाज़ आई — गहरी, काँपती हुई। "और?"
सुमन ने आँखें बंद कर लीं। मिश्रा अंकल की दोनों उँगलियाँ उसकी चूत के अंदर आगे-पीछे हो रही थीं — तेज़ होती जा रही थीं।
"उनकी उँगलियाँ... मेरे अंदर हैं, राज। दो... दो उँगलियाँ।"
राज ने लाइन पर साँस ली। लंबी, गहरी साँस।
"बोल रही है?"
"हाँ... और मैं... मैं आ रही हूँ, राज... बस अब..."
"आ जा। उनके हाथ पर आ जा।"
सुमन चिल्ला उठी। कॉल के बीच में ही। उसकी चूत ने मिश्रा अंकल की उँगलियों को दबोच लिया — जोर से, बार-बार, धक्के के साथ। उसका पानी फूट निकला — सोफे पर गिरा, मिश्रा अंकल की गोद में, उनके लंड पर।
मिश्रा अंकल भी आ गए — उनका लंड फूट गया, सुमन की जांघों पर, सोफे पर, फर्श पर। बूढ़े आदमी का वीर्य — गाढ़ा, गर्म, पीला सा — सुमन की गोरी जांघों पर चिपक गया।
सुमन का शरीर ढीला पड़ गया। वह सोफे पर गिर गई — मिश्रा अंकल के बगल में। उसने फोन उठाया — अभी भी कॉल चालू थी।
"राज... मैं आ गई..."
राज की आवाज़ काँप रही थी। "मैं भी, सुनकर ही... अभी-अभी... पेंट में ही..."
सुमन मुस्कुराई। थकी हुई, गीली, गन्दी मुस्कान।
[b]"अब," राज ने कहा, "अंकल को धन्यवाद कहो और विदा करो। मैं शाम को जल्दी आ रहा हूँ। तुझे अभी कुछ और करना है आज।"[/b]
"क्या?"
"बताऊँगा। पहले अंकल को भेज। और खुद को साफ मत करना। मैं जब आऊँ तब।"
कॉल डिसकनेक्ट हो गई।
सुमन ने फोन रखा। मिश्रा अंकल उसके बगल में बैठे थे — उनकी साँसें तेज़ थीं, उनके हाथ अभी भी गीले थे — सुमन के पानी से। उनका लंड अब ढीला पड़ गया था, उनकी जांघों पर गिरा हुआ।
सुमन ने उनकी तरफ देखा। उसने उनके गाल पर एक हल्का सा किस किया।
"थैंक यू अंकल," उसने कहा। "अब जाओ। पत्नी जी को कुछ शक न हो।"
मिश्रा अंकल ने सिर हिलाया। वह उठे। लुंगी सँभाली। उनका लंड अंदर किया। वह काँपते हुए दरवाजे की तरफ बढ़े।
बाहर निकलते समय वह मुड़े — उनकी आँखों में पानी था। भूख नहीं — कुछ और। शायद एहसान। शायद गिल्ट। शायद प्यार।
"कल... कल फिर आऊँ?" उन्होंने पूछा।
सुमन मुस्कुराई। "देखते हैं अंकल। राज से पूछूँगी।"
दरवाज़ा बंद हुआ।
सुमन अकेली रह गई। वह सोफे पर नंगी बैठी थी — उसकी चूत से पानी टपक रहा था, उसकी जांघों पर अंकल का वीर्य सूख रहा था, सोफे पर दोनों के शरीर के निशान थे।
उसने अपनी चूत पर हाथ रखा। अपना ही पानी — और अंकल का भी। उसने उसे सूंघा। फिर चाट लिया।
[b][b]फिर वह अंदर चली गई। इंतज़ार करने लगी — राज का, शाम का[/b][/b]
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15-06-2026, 11:52 PM
(This post was last modified: 15-06-2026, 11:58 PM by Certified Addict. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
शाम के सात बज रहे थे।
राज अभी-अभी ऑफिस से लौटा था। शर्ट की बटनें खुली, चेहरे पर थकान, लेकिन आँखों में वही शरारत — जो हमेशा रहती थी। उसने बैग सोफे पर फेंका और सुमन के पास आकर बैठ गया।
सुमन किचन में थी। खाना बना रही थी
— राज की पसंद का मटन, हाथी मिर्च, और गरमा-गरम रोटियाँ। लेकिन उसके हाथों की रफ्तार आज धीमी थी। कुछ बेचैन थी वह। जैसे हवा में कोई अधूरा सा एहसास तैर रहा हो।
राज ने उसे अपने पास बुलाया। "आ, यहाँ बैठ। बात करनी है।"
सुमन ने हाथ पोंछे, एप्रन उतारा और सोफे पर राज के बगल में आकर बैठ गई। उसका शरीर राज की तरफ झुक गया — जैसे कह रहा हो, 'मैं तुम्हारे बिना अधूरी हूँ।'
राज ने उसकी आँखों में देखा। गहराई में।
"सुन..." उसने एक लंबी साँस ली। "मुझे एक हफ्ते के लिए बाहर जाना है। बिजनेस ट्रिप। कल सुबह की फ्लाइट है।"
सुमन का चेहरा तुरंत बदल गया।
वह मुस्कुरा रही थी — बस एक सेकंड पहले तक। अब उसकी मुस्कान गायब थी। उसकी आँखों में कोहरा छा गया। उसने राज की कमर पकड़ ली — जैसे वह उसे जाने नहीं देना चाहती थी।
"एक हफ्ता?" उसकी आवाज़ काँप रही थी। "सात दिन? राज, तुम मुझे अकेला छोड़कर जाओगे?"
राज ने सिर हिलाया। "काम है। बहुत जरूरी। रुक नहीं सकता।"
सुमन चुप हो गई। उसके होंठ काँप रहे थे। उसने राज की तरफ देखा — और उसकी आँखों में वह भूख थी। वह ज्वाला जो राज ने खुद जलाई थी। और अब वह उसे बुझाए बिना जा रहा था।
"तुम मुझे तड़पता छोड़के जाओगे," सुमन ने धीरे से कहा। उसकी आवाज़ में दर्द था — और साथ ही, एक गहरी, जलती हुई चाहत। "मेरी ये प्यास जो अब और बढ़ गई है... इसे कौन बुझाएगा?"
उसने अपना हाथ राज के सीने पर रखा। उसके निप्पल उसी समय सख्त हो गए थे — बस राज के स्पर्श से, बस राज की बातों से।
राज एक पल चुप रहा। फिर वह मुस्कुराया। शैतानी से। उसी मुस्कान के साथ जिसने सुमन को राँड बना दिया था — जिसने उसे अपनी सीमाओं से आज़ाद कर दिया था।
"मिश्रा जी हैं ना," उसने कहा।
सन्नाटा।
सुमन ने पहले समझा नहीं। फिर उसकी आँखें फट गईं। उसने राज की छाती पर मुक्का मारा। एक नहीं, दो नहीं — बार-बार। मारा, हँसी, फिर मारा।
"गंदे कहीं के!" सुमन चिल्लाई। "बदमाश! हरामी! मिश्रा अंकल! तूने मुझे राँड बना दिया और अब मिश्रा अंकल के पास छोड़के जा रहा है?"
राज जोर-जोर से हँस रहा था। उसने सुमन का हाथ पकड़ लिया — मुक्का मारते हुए — और उसे अपने सीने से चिपका लिया।
"तेरे अलावा किसी और का लंड मेरी चूत में नहीं घुसेगा," सुमन ने उसके कान में फुसफुसाया। "याद रखना। लेकिन तू जा रहा है... तो मैं अपनी उँगलियों से काम चला लूँगी। और रात-रात तेरी फोटो देखती रहूँगी।"
राज ने उसकी ठुड्डी पकड़ी। उसके होठों पर एक किस किया। लंबा, गीला, गहरा।
"मैं जानता हूँ," उसने कहा। "इसलिए तुझपे भरोसा है।"
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रात — आखिरी चुदाई
रात का खाना खत्म हुआ। बत्तियाँ मंद थीं। बेडरूम में सिर्फ पंखे की आवाज़ और दो धड़कनों का तेज़ होता शोर था।
राज ने सुमन को बिस्तर पर लिटाया। उसने उसके सारे कपड़े उतार दिए — एक-एक करके। ब्रा, चड्डी, नाइटी — सब फर्श पर बिखर गया।
सुमन नागी थी। उसकी चूचियाँ बिस्तर पर फैल गईं — बड़ी, गोरी, निप्पल खड़े। उसकी चूत — पहले से ही गीली — लैबिया फूली हुई, उसके अंदर की गर्मी बाहर आ रही थी।
राज ने अपनी पैंट उतारी। उसका लंड खड़ा हो चुका था — सख्त, लाल, नसें उभरी हुई। उसने सुमन के ऊपर चढ़ गया। अपना लंड उसकी चूत पर रगड़ा — ऊपर-नीचे, बार-बार।
सुमन कराह उठी। "अंदर डाल... प्लीज़... आज रात मुझे ऐसे चोद कि एक हफ्ते तक तेरी याद आती रहे..."
राज ने अंदर डाल दिया।
एक ही झटके में — पूरा। सुमन की चूत ने उसका लंड ऐसे पकड़ा जैसे कोई भूखा मुँह। उसके अंदर की परतें राज के लंड को चूस रही थीं — गीली, गरम, पागल।
राज ने धक्के देने शुरू किए। तेज़, गहरे, बेरहम।
"हाँ... हाँ... चोद मुझे..." सुमन चिल्लाई। "याद रख मैं तेरी राँड हूँ... सिर्फ तेरी... तू कहीं भी जा... मेरी चूत तेरा इंतज़ार करेगी..."
राज ने उसकी टांगें अपने कंधों पर उठा लीं। अब वह और अंदर जा रहा था। सुमन के अंदर वह गहराई थी जहाँ कोई और नहीं गया था — सिर्फ राज।
सुमन पागल हो रही थी। उसने अपने नाखून राज की पीठ में गड़ा दिए। खून निकल आया — लेकिन राज को दर्द नहीं हुआ। सिर्फ और चाहत हुई।
"मेरे अंदर आ जा," सुमन ने कहा। "भर दे मुझे। पूरा भर दे। अपना दूध मेरी चूत में डाल दे... ताकि एक हफ्ते तक मैं तेरी गंध अपने अंदर रख सकूँ..."
राज ने और तेज़ किया। उसका लंड अब मशीन की तरह सुमन के अंदर जा रहा था — बाहर, अंदर, बाहर, अंदर। सुमन की चूत की गीली आवाज़ पूरे कमरे में गूंज रही थी।
"तू आ रहा है... मुझे लग रहा है..." सुमन चिल्लाई। "आ जा... मेरे अंदर... अंदर ही अंदर छूट रही हूँ मैं..."
एक आखिरी धक्का। राज का लंड सुमन के बिल्कुल अंदर धँस गया। उसका सिरा उसके गर्भाशय को छू रहा था। सुमन ने अपना मुँह खोल दिया — कोई आवाज़ नहीं निकली। बस साँसें। फिर उसके शरीर ने हिलना बंद कर दिया। वह सख्त हो गई — फिर ढीली पड़ गई।
राज ने उसके अंदर रिलीज़ कर दिया। गर्म, गाढ़ा, बहुत सारा। सुमन की चूत उसे पी रही थी। वह नहीं चाहती थी कि एक बूँद भी बाहर जाए।
राज उसके ऊपर गिर पड़ा। दोनों के शरीर पसीने से नहाए हुए थे। उनकी साँसें मिल रही थीं। उनकी चूत और लंड अभी भी जुड़े हुए थे — राज ने अपना लंड बाहर नहीं निकाला। उसे अंदर ही रहने दिया। सुमन ने उसे और अंदर खींच लिया।
"सो जा," राज ने फुसफुसाया। "मैं अभी बाहर नहीं निकलूँगा। पूरी रात तेरे अंदर रहूँगा।"
सुमन की आँखें बंद हो गईं। उसके होंठों पर एक हल्की मुस्कान थी। उसकी चूत अभी भी राज के लंड को पकड़े हुए थी — जैसे उसे जाने नहीं देना चाहती थी।
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सुबह के छह बजे।
राज ने अपना लंड सुमन की चूत से बाहर निकाला। वह अभी भी सख्त था — लेकिन कम गीला। सुमन की चूत ने रात भर उसे गर्म रखा था।
सुमन की आँख खुली। उसने देखा — राज कपड़े पहन रहा था।
"जा रहे हो?" उसकी आवाज़ कर्कश थी, नींद से भरी हुई।
राज उसके पास आया। उसके माथे पर एक किस किया।
"जल्दी आऊँगा," उसने कहा। "अपना ध्यान रखना।"
सुमन ने उसका हाथ पकड़ लिया।
"तुम्हारे बिना यह चूत," उसने अपनी चूत की तरफ इशारा किया — जो अभी भी गीली थी, खुली हुई, रात के पानी और राज के वीर्य से लथपथ — "पागल हो जाएगी।"
राज मुस्कुराया। "पागल होने दे। जब मैं लौटूंगा, तब संभालूंगा।"
उसने बैग उठाया। दरवाजे तक गया। रुका।
"बाय, मेरी राँड। जल्दी मिलते हैं।"
सुमन ने उसकी तरफ देखा। उसकी आँखों में पानी था — लेकिन वह नहीं रोई। उसने अपनी उँगली अपनी चूत पर फेरी — गीली की — और राज की तरफ उँगली उठाई।
"तेरी याद आएगी," उसने कहा।
राज ने दरवाज़ा बंद कर दिया।
सुमन अकेली रह गई।
उसने बिस्तर पर करवट ली। राज का तकिया उसके पास था। उसने उसे सूंघा। उसकी गंध अभी भी थी — नमकीन, गर्म, पुरुष जैसी।
उसने अपना हाथ अपनी चूत पर रखा। वह अभी भी गीली थी — राज के वीर्य से, उसके अपने पानी से। उसने उसे अपनी उँगलियों से फैलाया, चादर पर गीला निशान बनाया।
"एक हफ्ता," वह फुसफुसाई। "सात रातें।"
उसकी चूत ने जवाब दिया — एक धड़कन के साथ।
सात दिनों की भूख शुरू हो चुकी थी।
सुबह के नौ बज रहे थे। सुमन अभी भी बिस्तर में थी। राज का तकिया उसकी बाँहों में दबा हुआ था, उसकी गंध अब धीरे-धीरे मिट रही थी — लेकिन सुमन उसे छोड़ नहीं पा रही थी।
वह पूरी रात ऐसे ही पड़ी रही थी। करवट बदली, लेटी, फिर उठी, फिर लेट गई। कुछ अधूरा सा था हवा में। घर सन्नाटा था — फ्रिज की गुंजन, बाहर गली का शोर, कबूतरों की कूक। लेकिन राज की आवाज़ नहीं थी। उसकी हँसी नहीं थी। उसके हाथ नहीं थे — जो उसकी चूचियों पर होते, उसकी चूत में होते, उसकी गांड दबाते।
सुमन बोर हो रही थी।
बहुत ज्यादा बोर।
उसने फोन उठाया। इंस्टाग्राम खोला, रील्स देखीं — सब बेकार लगा। उसने व्हाट्सएप खोला — राज का लास्ट सीन: 2 घंटे पहले। उसने मैसेज किया था — "पहुंच गया। मिस कर रहा हूँ।" सुमन ने रिप्लाई किया था — "मैं भी। तेरी चूत रो रही है।" राज ने हँसी वाला इमोजी भेजा था, फिर बात रुक गई। शायद मीटिंग में था।
सुमन ने फोन फेंक दिया। कमरे में छत की तरफ देखती रही। एक घंटा बीत गया। दो घंटे।
"बोरियत से मर जाऊँगी," उसने खुद से कहा।
फिर दस बजे — उसे कुछ याद आया।
वह मुस्कुराई।
उठी। नहाई नहीं थी अभी। वही नाइटी पहनी थी जो कल रात पहनी थी — सफेद, पारदर्शी, बिना ब्रा के, बिना चड्डी के। उसके निप्पल साफ दिख रहे थे, उसकी चूत के काले बाल, उसके बीच की गीली दरार — राज के वीर्य का कुछ हिस्सा अभी भी सूखा नहीं था।
उसने कॉफी बनाई। अपना कप उठाया। और सीधे बालकनी में चली गई।
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मिश्रा अंकल अपनी बालकनी में थे। पहले से ही। बैठे हुए, चाय पी रहे थे, अखबार पढ़ रहे थे। लेकिन उनकी नज़र अखबार पर नहीं थी — वह तो रास्ता देख रहे थे। सुमन का।
जैसे ही सुमन ने अपनी बालकनी में कदम रखा, मिश्रा अंकल का पूरा शरीर सख्त हो गया।
उनकी आँखें सुमन के शरीर पर जम गईं। वह सफेद पारदर्शी नाइटी — उसमें सुमन जैसे देवी लग रही थी। उसके बाल बिखरे थे, उसकी आँखों में नींद और भूख मिली हुई थी। उसकी चूचियाँ नाइटी के नीचे हिल रही थीं — बिना किसी ब्रा के, बिना किसी शर्म के। उसकी चूत — वह साफ दिख रही थी, काले बालों का त्रिकोण, बीच में गीली चमक।
मिश्रा अंकल ने थूक निगला। उनकी लुंगी के सामने हल्का सा उभार बन चुका था।
"गुड मॉर्निंग अंकल," सुमन ने कहा। उसकी आवाज़ में वही मासूमियत थी — लेकिन उसकी आँखों में शैतानी चमक रही थी।
"गुड... गुड मॉर्निंग बेटा," अंकल की आवाज़ फट रही थी। उन्होंने अपना अखबार ऊपर उठा लिया — चेहरा छिपाने के लिए, लेकिन उनकी आँखें अखबार के ऊपर से झाँक रही थीं।
"राज जी नहीं हैं क्या आज?" अंकल ने पूछा। उनके हाथ काँप रहे थे।
"नहीं अंकल," सुमन ने कहा। वह बालकनी के रेलिंग के करीब आ गई। उसने अपनी कॉफी का कप रेलिंग पर रखा। झुकी। जानबूझकर झुकी।
नाइटी का नेकलाइन खुल गया। उसकी दोनों चूचियाँ लगभग बाहर आ गईं — बड़ी, गोरी, भरी हुई, निप्पल सख्त, उन पर हल्की नमी (ठंडी हवा की या अपने पसीने की — पता नहीं)।
मिश्रा अंकल का मुँह खुला रह गया। अखबार उनके हाथ से गिर गया। उन्होंने उसे उठाने का नाटक किया — और झुकते हुए उनकी नज़र सीधी सुमन की चूत पर पड़ी, जो बालकनी के रेलिंग के पिलर के बीच से खुल रही थी।
सुमन ने देखा। वह जानती थी।
वह सीधी हुई। फिर उसने अपना एक पैर बालकनी की कुर्सी पर रख दिया — जैसे आराम से खड़ी हो रही हो। उसकी जांघ खुल गई। नाइटी ऊपर चढ़ गई। अब उसकी चूत पूरी तरह खुली थी — लेबिया फूले हुए, बीच की दरार से चमक आ रही थी। राज के वीर्य का कुछ हिस्सा सूखकर उसके बालों पर जमा था — सफेद दाग।
मिश्रा अंकल के हाथ उनकी लुंगी पर चले गए। वह अपना लंड लुंगी के ऊपर से दबाने लगे। उनकी आँखों से पानी आ रहा था — या पसीना, या बस भूख।
"अंकल, आपने चाय पी ली?" सुमन ने बिल्कुल सामान्य स्वर में पूछा।
"हाँ... हाँ बेटा..." अंकल बुदबुदाए। उनकी जीभ लड़खड़ा रही थी। उनका लंड अब लुंगी के कपड़े को तीर की तरह उठा रहा था — कोई शक नहीं बचा था।
सुमन ने अपनी कॉफी का कप उठाया। वह चुस्की ले रही थी, और अपनी चूत खुली छोड़ रही थी। हवा उसके लेबिया पर पड़ रही थी — उसे ठंडक मिल रही थी, लेकिन अंदर आग थी।
"राज एक हफ्ते के लिए गए हैं," सुमन ने कहा। उसकी आवाज़ में कोई शिकायत नहीं थी — बस एक बयान था।
"एक... एक हफ्ता?" अंकल की आवाज़ फट गई। उनके दिमाग में तेजी से कुछ चल रहा था। "तो आप अकेली होंगी?"
"हाँ अंकल," सुमन ने मुस्कुराते हुए कहा। "बहुत अकेली।"
उसने अपनी कॉफी खत्म की। फिर उसने धीरे-धीरे अपना पैर कुर्सी से नीचे उतारा। अपनी नाइटी को ठीक किया — लेकिन ठीक से नहीं। थोड़ा खुला ही छोड़ा।
"फिर मिलते हैं अंकल," उसने कहा। "कल सुबह। उसी समय।"
वह अंदर चली गई।
बालकनी में मिश्रा अंकल अकेले रह गए। उनकी लुंगी के आगे तंबू था। उन्होंने अपना लंड पकड़ा। जोर से दबाया। लेकिन उन्होंने मसला नहीं। वह बाथरूम की तरफ भागे — अपनी पत्नी के देखने से पहले। बाथरूम में दरवाजा बंद किया। पैंट उतारी। अपना लंड निकाला — लाल, सख्त, सिरे पर पानी टपक रहा था। उन्होंने आँखें बंद कीं। सामने सुमन थी — उसकी खुली चूत, उसकी गीली चमक, उसके बालों में सूखा वीर्य, उसकी बड़ी चूचियाँ, उसकी मुस्कान। पाँच मिनट में वह आ गए। दीवार पर लगा दिया। फिर टॉयलेट पर बैठ गए। थके हुए। लेकिन उनके दिमाग में एक ही बात थी —
"कल सुबह। फिर से।"
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सुमन ने दिन में कुछ खास नहीं किया।
वह बिस्तर पर पड़ी रही, फोन चलाया, टीवी देखा, कुछ खाया, कुछ पिया, फिर से लेट गई। उसने राज को एक और मैसेज किया — "मिश्रा जी को टीज़ किया। उनका लंड खड़ा हो गया। मेरा भी हो गया था।"
राज ने रिप्लाई किया — "फोटो भेजती तो अच्छा था।"
सुमन ने फोटो ली — अपनी चूत की। गीली, खुली हुई। भेज दी।
राज ने लिखा — "अभी मीटिंग में हूँ। अब उठकर नहीं बैठ सकता। थैंक्यू मेरी राँड।"
सुमन हँसी। वह फोन पटककर लेट गई।
उसकी चूत — वह गीली थी। सूख नहीं रही थी। राज के बिना उसका शरीर शांत नहीं हो रहा था। वह चाहती थी कि कोई उसकी चूचियाँ दबाए। कोई उसकी गांड पकड़े। कोई उसकी चूत में उँगली डाले।
लेकिन कोई नहीं था।
सिर्फ वह थी। उसकी उँगलियाँ। और उसकी कल्पनाएँ।
शाम को उसने टीवी पर एक फिल्म लगाई — कुछ रोमांटिक सी। लेकिन उसके दिमाग में सिर्फ राज था। राज की गंध। राज का लंड। राज की वह आवाज़ — जब वह उसके कान में कहता था, "आज तू किसी और की है।"
सुमन ने अपना हाथ अपनी नाइटी के अंदर डाल दिया। अपनी चूत पर रखा। गीली थी। फूली हुई। धड़क रही थी।
लेकिन उसने अंदर नहीं डाला।
बस बाहर रखा।
बस दबाया।
और कल्पना की।
कल्पना की — राज उसके सामने बैठा है, देख रहा है। कोई और उसकी चूत में उँगली डाल रहा है। वह कोई — मिश्रा अंकल नहीं, कोई युवा, कोई अनजान, जिसके हाथ बड़े हों, जिसकी उँगलियाँ मोटी हों...
सुमन कराही। लेकिन रुक गई।
"नहीं," उसने फुसफुसाया। "पहले दिन ही नहीं। राज ने कहा है — भूखी रहो। जब वह लौटेगा, तब पूरा करेगा।"
उसने अपना हाथ बाहर निकाल लिया। अपनी गीली उँगलियाँ देखीं। उन्हें चाट लिया।
फिर वह उठी। खाना बनाया। अकेले खाया। बर्तन धोए। कपड़े बदले — उसी पारदर्शी नाइटी में सो गई।
रात को वह करवट बदलती रही। राज के तकिए को गले लगाए रही। उसकी गंध अब लगभग खत्म हो चुकी थी — बस एक धुंधली सी याद बची थी।
उसकी चूत ने पूछा — "कब तक?"
सुमन ने जवाब दिया — "छह दिन और। और रातें। बहुत लंबी रातें।"
वह सो गई। भूखी। अधूरी। लेकिन राज के इंतज़ार में।
दोपहर के लगभग डेढ़ बज रहे थे। सुमन अब भी बिस्तर में थी। राज का तकिया अब बेकार हो चुका था — उसकी गंध पूरी तरह चली गई थी। अब सिर्फ सूती कपड़े की बासी गंध बची थी। सुमन ने उसे एक तरफ फेंक दिया।
वह उठी। बालकनी में गई — मिश्रा अंकल नहीं थे। शायद दोपहर की झपकी ले रहे थे। सुमन ने एक बार चारों तरफ देखा, फिर अंदर आ गई।
बोरियत। वही बोरियत। दीवारें उसी से बात कर रही थीं। फ्रिज की आवाज़, पंखे की गूंज, बाहर गली में कुत्तों का झगड़ा — बस यही था।
वह सोफे पर लेट गई। छत की तरफ देखती रही। फिर उठी। फिर लेट गई। फिर फ्रिज खोला। कुछ नहीं चाहिए था, बस कुछ करना था।
तभी — गली से आवाज़ आई।
"तरकारी... तरकारी... ककड़ी... घीया... करेला... तरकारी ले लो..."
एक सब्जी वाला। उसका ठेला। पहिए जमीन पर घिस रहे थे — घर्र-घर्र-घर्र।
सुमन के कान खड़े हो गए। कुछ तो हुआ। उसके दिमाग में एक शैतानी ख्याल कौंधा। मुस्कुराई। सोफे से उछली। बेडरूम में भागी। अलमारी खोली। अंदर देखा।
वह टाइट लेगिंग — नेवी ब्लू, स्किन-टाइट, ऐसी कि पहनते ही उसकी चूत का उभार और गांड की लकीरें साफ दिख जाती थीं। उसने पहन ली। बिना चड्डी के। फिर वह डीप नेक टॉप — काला, स्ट्रेचेबल, सामने से नाभि तक खुला हुआ। बिना ब्रा के। उसके स्तन टॉप के अंदर आधे बाहर थे — बड़े, भारी, मुलायम, बीच की दरार गहरी।
उसने जल्दी से बालों में हाथ फेरा। लिपस्टिक नहीं लगाई। बस होंठों को चाट लिया। फिर दरवाजे की तरफ बढ़ी।
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असली कहानी अब शुरू होती है।
राज और सुमन — एक शादीशुदा जोड़ा। दो साल की शादी। राज ने अपनी बीवी में एक ऐसी आग जगाई जो अब काबू में नहीं है। उसने उसे दूसरों की नज़रों में खुद को देखना सिखाया — क्लब में, पार्क में, बालकनी में, डिलीवरी बॉय के सामने।
अब राज एक हफ्ते की बिजनेस ट्रिप पर है। सुमन अकेली है। उसकी चूत भूखी है। उसका दिमाग पागल है। और उसके सामने सात रातें हैं — बिना किसी हद के, बिना किसी को जवाब दिए।
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Nice update,
Please add more hot sex pics and gif in coming updates
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दरवाजा खोला। चौखट पर खड़ी हो गई।
ठेला सामने रुका था। सब्जी वाला — रिज़वान। कोई 25-26 का। गोरा सा, काली मूंछें, बाँहों पर बाल, कद में भरा हुआ। ढीली सी पैंट और बनियान पहने था। उसके हाथ मोटे थे — काम करने वाले हाथ। उसने सुमन की तरफ देखा। और वहीं रुक गया।
उसकी आँखें जम गईं। उसका मुँह धीरे-धीरे खुलता गया — जैसे कोई ताला खुल रहा हो। पहले उसने सुमन के चेहरे की तरफ देखा, फिर उसका गला सूख गया। उसकी नज़र सुमन के गले से नीचे उतरी — उस डीप नेक टॉप पर, जहाँ से उसकी दोनों चूचियाँ बाहर झाँक रही थीं। बीच की गहरी दरार। आधी चूचियाँ — गोरी, मुलायम, उभरी हुई।
रिज़वान का मुँह और खुल गया। उसकी आँखें फट गईं। उसका थूक — उसने निगलने की कोशिश की, लेकिन वह सूख चुका था। उसकी जीभ मुँह की छत से चिपक गई।
"भैया, रुको ज़रा," सुमन ने कहा। उसकी आवाज़ मीठी थी — शहद से भी मीठी।
रिज़वान को होश आया। उसने अपना ठेला बगल की तरफ खींचा और सुमन के घर के ठीक सामने लाकर रोक दिया।
"जी मैडम... क्या चाहिए?" उसकी आवाज़ काँप रही थी। उसने अपनी बनियान को एक बार सही किया — लेकिन अपने नीचे वाले हिस्से को छुपाने के लिए।
सुमन चौखट पर ही बैठ गई। वहीं दरवाजे के सामने — पैर फैलाए। लेगिंग उसकी जांघों पर कसी हुई थी, उसकी चूत का उभार साफ दिख रहा था। उसने टोकरी में रखी सब्जियाँ देखना शुरू किया।
"भिंडी कैसी है?" उसने पूछा। बिना ऊपर देखे। वह सब्जियाँ छाँट रही थी — छू रही थी, दबा रही थी, सूँघ रही थी।
रिज़वान उसकी तरफ घूर रहा था। उसकी नज़र सुमन के चेहरे से उसकी छाती पर, फिर उसके बीच की तरफ — जहाँ लेगिंग के नीचे उसकी चूत का पूरा उभार दिख रहा था। लेबिया की लकीरें। बीच की दरार। थोड़ी सी नमी — बाहर से दिख रही थी, लेगिंग के पतले कपड़े पर।
रिज़वान के मुँह में पानी भर आया। नहीं — उसके मुँह में और उसके लंड में। उसकी पैंट के आगे एक तंबू खड़ा हो रहा था। उसने अपनी पैंट को खींचकर ढीला करने की कोशिश की — ताकि दबाव कम हो। लेकिन लंड तो लंड था। वह उँगलियों से अपनी पैंट दबा रहा था, अपने लंड को एडजस्ट कर रहा था — एक तरफ, फिर दूसरी तरफ।
सुमन देख रही थी। चोरी की नज़रों से। उसने देखा — उसके हाथ की हरकतें, उसकी बेचैनी, उसके मुँह का सूखापन। उसने अपने आप को रोका — हँसी नहीं आई। बस अंदर ही अंदर एक गर्मी उठी। उसकी अपनी चूत में हल्की सी नमी आ गई।
"ककड़ी दिखाओ," सुमन ने कहा।
रिज़वान ने ककड़ी उठाई। उसके हाथ काँप रहे थे। उसने ककड़ी सुमन की तरफ बढ़ा दी।
सुमन ने ककड़ी ली। उसे दोनों हाथों में लिया। देखा — लंबी, मोटी, हरी, बीच से थोड़ी टेढ़ी। उसने उसे अपने हाथ में घुमाया। अपनी उँगलियों से उसकी लंबाई नापी। फिर उसे अपनी नाक के पास ले गई — सूँघा।
रिज़वान की आँखें उसके हाथों पर थीं। ककड़ी पर। उसके हाथों की हरकतें — जैसे वह ककड़ी को सहला रही हो। उसके दिमाग में क्या चल रहा था, सुमन जानती थी।
"ठीक है, ये लो," सुमन ने ककड़ी वापस रख दी। "भिंडी, करेला, ककड़ी — सब देना।"
रिज़वान ने सब्जियाँ निकालनी शुरू कीं। उसके हाथ अब भी काँप रहे थे। उसकी पैंट के आगे अब छुपाना मुश्किल हो रहा था — तंबू साफ दिख रहा था। वह एक हाथ से सब्जियाँ निकाल रहा था, दूसरे हाथ से अपने लंड को पैंट के अंदर दबाए हुए था।
सुमन को शरारत सूझी।
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उसने अपनी दोनों टाँगें और फैला दीं। लेगिंग उसके पैरों पर और तन गई। उसकी चूत का उभार और साफ हो गया — लेबिया की दरार, बीच की गीली चमक। फिर वह आगे की तरफ झुकी — ककड़ी को फिर से देखने के बहाने।
झुकते ही उसकी डीप नेक टॉप और खुल गया। उसकी दोनों चूचियाँ लगभग पूरी बाहर आ गईं। बड़ी, गोरी, भरी हुई — निप्पल छुपे हुए थे टॉप के किनारे के नीचे, लेकिन उनका उभार साफ दिख रहा था। उनकी दरार से पसीना चमक रहा था — दोपहर की गर्मी का।
रिज़वान का लंड उसकी पैंट को लगभग फाड़ रहा था। उसके मुँह से लार टपकने लगी — उसकी ठुड्डी पर एक बूँद आ गिरी। उसने उसे पोंछा नहीं। वह सुमन के स्तनों को देख रहा था, उसकी चूत को देख रहा था, उसकी खुली जांघों को देख रहा था।
साली क्या माल है, उसने अपने मन में सोचा। इसको तो अपने नीचे लाना ही पड़ेगा।
सुमन ने सब्जियाँ चुन लीं। रिज़वान ने उन्हें तौला। उसके हाथ अब भी काँप रहे थे — बाटें उसकी उँगलियों से फिसल रही थीं।
"कितने हुए?" सुमन ने पूछा।
रिज़वान ने नंबर बताए। सुमन ने पर्स निकाला। उसमें से पैसे निकाले — और उसे रिज़वान की तरफ बढ़ाया। उसकी उँगलियाँ रिज़वान की उँगलियों से छू गईं। रिज़वान पिघल गया। उसका पूरा शरीर गर्म हो गया।
उसने पैसे लिए। गिने नहीं। सीधे जेब में डाल लिए।
"नाम क्या है आपका?" सुमन ने अचानक पूछा।
रिज़वान चौंका। "रि... रिज़वान मैडम।"
"सुमन," उसने कहा। "बस सुमन।"
वह मुस्कुराई। एक लंबी, धीमी, गीली मुस्कान। फिर वह उठी। अपना टॉप एक बार ऊपर खींचा — लेकिन जानबूझकर उसने अपनी चूचियाँ ठीक से नहीं छुपाईं। थोड़ी बाहर ही रहने दीं। वह घर के अंदर चली गई। दरवाज़ा बंद करने से पहले — एक बार पीछे मुड़ी। और मुस्कुराई।
दरवाजा बंद हो गया।
रिज़वान अपनी जगह पर जमा रहा। पाँच सेकंड। दस सेकंड। फिर उसने अपनी पैंट के ऊपर से अपना लंड पकड़ा। जोर से दबाया। उसके सिरे पर पानी आ चुका था — प्री-कम। उसने देखा कि कहीं कोई देख तो नहीं रहा। गली सुनसान थी। उसने अपना हाथ अपनी पैंट के अंदर डाला। दो बार हाथ लगाया। बस दो बार। फिर हाथ बाहर निकाल लिया — क्योंकि गली में कुत्ता भौंकने लगा था।
उसने ठेला उठाया। आगे बढ़ गया। लेकिन उसके दिमाग में सिर्फ एक चीज़ थी — सुमन। उसकी खुली चूचियाँ। उसकी गीली चूत लेगिंग के नीचे। उसकी मुस्कान। उसकी आवाज़
अंदर, सुमन दरवाजे की तरफ पीठ करके खड़ी थी। उसकी साँसें तेज़ थीं। उसने अपना हाथ अपनी लेगिंग के ऊपर अपनी चूत पर रखा। गीली थी। पहले से कहीं ज्यादा गीली। उसकी उँगली ने लेगिंग के ऊपर से अपनी चूत की दरार को दबाया — और उसकी उँगली गीली हो गई। लेगिंग पर एक गोल दाग बन गया था।
सुमन ने अपनी उँगली को अपने मुँह में डाला। अपना ही पानी चाटा। फिर मुस्कुराई।
"रिज़वान," उसने धीरे से फुसफुसाया। "कल फिर आना। तब तुम्हारा लंड मेरे सामने खड़ा होगा — अकेले में।"
वह अंदर चली गई। सोफे पर लेट गई। अपनी लेगिंग उतारने से पहले — उसने अपनी चूत को एक बार और दबाया। फिर आह भरी।
राज, तुम्हारी राँड भूखी है। और यह सिर्फ दूसरा दिन है।
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