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Incest खेल ससुर बहु का
कमाल हो गया! ये आजकल हो क्या रहा है? पहले राजा अपने आप मर जाता है,अब उसकी बहू.............भी...........!!!!
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कौतुहल भरा अपडेट
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(15-04-2026, 04:55 PM)@@004 Wrote: कौतुहल भरा अपडेट

अच्छा तो लगा ना दोस्त????

शुक्रिया दोस्त...................
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चलिए दोस्तों कहानी में थोडा आगे बढ़ते है.........................
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"कमाल हो गया! ये आजकल हो क्या रहा है? पहले राजा अपने आप मर जाता है,अब उसकी बहू मुझ से मिलना चाहती है!",जब्बार अपना मोबाइल बंद कर मलिका की चूचिया फिर से मसलने लगा। जब सेशाद्री का फोन आया तो वो मलिका को चोद रहा था,वो ज़मीन पे बिछे कालीन पे लेटी थी और जब्बार उस पर चढ़ कर उसकी चूत को अपने मोटे लंड से पेल रहा था।

"अकेले जाओगे या उस सरदार को भी ले जाओगे?",मलिका ने उसका मुँह अपनी छातियो पे दबाया।

"अभी नही,मेरी जान पहले खुद तो बात कर लू।",उसने उसके निपल को काट लिया।

"आ..ह..",जब्बार ने उसकी निपल चूस्ते हुए अपने धक्के तेज़ कर दिए।

"जब मिल्स खरीदोगे तो उसमे मुझे भी पार्ट्नरशिप चाहिए। ऊऊ...ऊओवव्व!",जब्बार अब घुटनो पे बैठ कर उसे चोद रहा था और एक हाथ से उसकी चूत के दाने को रगड़ने लगा था।
मैत्री की पेशकश.

"ले लेना मेरी जान! जो चाहिए वो ले लेना।",उसने अपने हाथ और कमर की रफ़्तार तेज़ कर दी। मलिका अपनी चूत पे इस दोहरी मार को ज़्यादा देर तक नही झेल पाई और तुरंत झड़ गयी और उसके थोड़ी देर बाद जब्बार ने अभी अपना लंड उसके अंदर खाली कर दिया।

-------------------------------------------------------------------------------

राजकुल शुगर मिल के पीछे एक खाली ज़मीन का टुकड़ा था जहा लोग कम ही आते-जाते थे।दोपहर के एक बजे मेनका सेशाद्री और अपने ड्राइवर के साथ कार मे बैठी जब्बार का इंतेज़ार कर रही थी।

"काफ़ी देर हो गयी है,पता नही ये कम्बख़्त कब आएगा।",सेशाद्री अपनी घड़ी देखते हुए बोले। ये आदमी बिल्कुल भी भरोसे के लायक नही है,रानी साहिबा। आप उस से इस वीरान जगह मिलने को क्यू तैयार हो गयी?"

मेनका कुछ कहती उस से पहले ही जब्बार की कार आती दिखाई दी। जब्बार कार से उतर कर मेनका के पास आया,"नमस्ते।",वो उसके सीने की तरफ देख रहा था।

"नमस्ते।"

"मुझ से क्या काम आन पड़ा आपको?"

"अभी जो मिल मे स्ट्राइक हुई थी उसी के बारे मे बात करनी थी।",मेनका कार से उतर कर खड़ी हो गयी,सेशाद्री भी उसके साथ खड़े थे।

"उस के बारे मे अपने वर्कर्स से बात कीजिए,मुझ से क्या बात करेंगी? मेरा उस स्ट्राइक से कोई वास्ता नही था।",वो मेनका के जिस्म को उपर से नीचे तक घूर रहा था।

"देखिए मिस्टर जब्बार,मैं घूमा-फिरा कर बात करने नही आई हू। सभी जानते है कि स्ट्राइक के पीछे आपका हाथ था। आप यही चाहते हैं ना कि हम मिल्स का अपना शेर आपको या आपके किसी आदमी को बेच दे?"

"खूबसूरत होने के साथ-साथ आप समझदार भी हैं। सीधा मुद्दे पे आ गयी।",जब्बार बदतमीज़ी से बोला।

"अपनी ज़बान सम्भालो!",सेशाद्री गुस्से मे बोले।
मैत्री रचित.

"एक मिनिट अंकल,हा, तो मिस्टर जब्बार, आप ये बताइए कि कैसे ख़रीदेंगे आप हमारा हिस्सा? आपके लिए हमारे वर्कर्स बस मोहरे हैं जिन्हे आप अपना उल्लू  सीधा करने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं,पर हुमारे लिए ये वो नमकहलाल लोग हैं जिनके बिना हमारी तरक्की नामुमकिन थी। हम अपना हिस्सा तभी बेचेंगे जब हमे ये तसल्ली हो जाएगी की हमारे वर्कर्स सही हाथों मे जा रहे हैं।"


अब जब्बार भी संजीदा होकर उसकी तरफ देखने लगा," ये लड़की तो काम की बात कर रही है!",उसने सोचा।

"हम आपके बारे मे भी अच्छी तरह से जानते हैं। आपकी इतनी औकात है नही कि आप अकेले मिल्स खरीद सके,तो फिर कैसे ख़रीदेंगे ज़रा हमे भी बताइए।"

"अकेला नही एक और शख्स है मेरे साथ। एक एनआरआइ है।"

"अच्छा! तो मिलवाए उस से हमे।"

"रानी साहिबा,ये आप क्या कर रही हैं! इस इंसान को आप राजकुल की विरासत बेचेगी!"

"सेशाद्री साहब,चुप रहिए,मालिक की बात तभी काटिए जब कुछ बहुत ज़रूरी कहना हो।"


सेशाद्री साहब हैरत से उसे देखने लगे। आज तक उन्हे ऐसे तो राजासाहब ने भी बेइज़्ज़त नही किया था।

"ठीक है,मैं उस इंसान से आपको कल ही मिलवाता हू।"

"ठीक है,हम भी चाहते हैं कि दशहरे के त्योहार तक ये काम पूरा हो जाए।"

"ओके,तो मैं चलता हू। कल इसी वक़्त आपको उस से मिलवाऊंगा।",जब्बार कार मे बैठा और चला गया।

"हमे माफ़ कर दीजिए अंकल,हमने बहुत बदतमीज़ी की आपके साथ।"


सेशाद्री साहब को अब और ज़्यादा हैरत हो गयी!,"पर ये सब हमने जब्बार को बेवकूफ़ बनाने के लिए किया।"

"अंकल,ये इंसान हमे सपरू साहब के साथ डील करने नही देगा और शराफ़त की भाषा ये समझता नही। तो हमने सोचा की इसको इसी की भाषा मे जवाब दें। सपरू साहब ही हमारे हिस्से को ख़रीदेंगे और ये डील हमलोग अगले 4 दिनो मे ही कर लेंगे। मैने उनसे भी कहा है कि वो इस बात को अपने तक ही रखें।"


दोनो कार मे बैठ कर वापस ऑफीस जा रहे थे,”इस डील के बारे मे हमारे जर्मन पार्ट्नर्स,सपरू साहब और उनका लड़का और हम और आप जानते हैं। डील तो अगले 4-5 दीनो मे हो जाएगी पर इसकी अनाउन्स्मेंट दशहरे के अगले दिन होगी।"

"पर इस जब्बार के साथ क्या करेंगी?"
मैत्री की लेखनी.

"इसे हम तब तक बातों मे उलझाए रखेंगे। एक बार हमारी डील हो जाए,फिर सपरू साहब ने कहा है कि वो इस से निपट लेंगे।"

"मान गये,रानी साहिबा आपकी सोच को।"

"थॅंक यू,अंकल।"


क्रमशः।।।।।।।।।।।।।।।।।।।


बने रहिये .................................
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पार्ट--16



गतान्क से आगे।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।


जब्बार ने मेनका और सोढी की मीटिंग करवा दी जिसमे मेनका उसे अपना हिस्सा बेचने को राज़ी हो गयी। जब्बार की तो खुशी का ठिकाना नही था। अब तो वो बेसब्री से उस दिन का इंतेज़ार कर रहा था जिस दिन मिल्स के पेपर्स उसके हाथों मे आते।

इधर मेनका ने सपरू साहब के साथ चुप-चाप डील साइन कर ली। इस डील के मुताबिक दशहरे के अगले दिन एक फॉर्मल अनाउन्स्मेंट होनी थी जिसके बाद मिल्स के मालिक सपरू साहब हो जाते। मेनका ने अपनी वसीयत मे भी ज़रूरी बदलाव कर दिए।

और आख़िर दशहरे का दिन आ ही गया जब जब्बार का सपना पूरा होने वाला था। आज वो सुबह से ही बॉटल खोल कर बैठा था और अभी जब शाम के 4 बज रहे थे,पी कर पूरी तरह से नशे मे था। मैत्री रचित कहानी.

"सोढीसाहब,आप ना होते तो मैं आज का दिन कभी नही देख पता। थेंक यु,सर!"

"अरे,जब्बार भाई इसमे थॅंक्स की क्या बात है,आपने हमारी मदद की हमने आपकी।बस।"

"नही,सर। आपने मुझपे बहुत बड़ी कृपा की है,आज। आज जाके मेरी मा की आत्मा को शांति मिलेगी।"

"जी,मैं समझा नही।"

"सोढी साहब अपने मुझे अपनी दास्तान सुनाई थी ना कि कैसे राजा ने आपकी ज़िंदगी का रुख़ बदल दिया। आज मैं आपको अपनी कहानी सुनाता हूँ।"

"मैं कोई 13-14 साल का था। मैं शहर मे अपनी मा के साथ रहता था,पिता तो थे ही नही। माँ के लिए तो बस मैं ही सब कुछ था,हर वक़्त उसे बस मेरी ही फ़िक्र लगी रहती थी। पर एक बात थी जो मुझे कभी-कभी ख़टकती थी। मैं बड़ा हो रहा था और मैने एक बात गौर की थी कि हर शनिवार को माँ शाम 5 बजते कही चली जाती और दूसरे दिन दोपहर 2-3 बजे तक आती। पुच्छने पर टाल जाती कि पास के गाँव के मंदिर जाती है और चूँकि वहा बहुत भीड़ रहती है इसीलिए उसे इतना समय लगता है।"

"...माँ अपनी एक सहेली के परिवार के पास मुझे छोड़ कर जाती थी पर इधर कुछ महीनो से मैं अकेला ही घर पे रह जाता था,अब मैं बड़ा हो रहा था और किसी और के घर पे रहना मुझे अच्छा नही लगता था। उस शनिवार भी मा शाम होते चली गयी। मैं घर पे यूही बैठा था कि तभी मेरा एक दोस्त आ गया और मुझ से साथ मे बाज़ार चलने को कहने लगा। माँ तो दूसरे दिन से पहले आती नही सो मैं उस के साथ चला गया।"

"...हम काफ़ी देर तक बाज़ार मे घूमते रहे कि तभी एक आलीशान कार की पिछली सीट के दरवाज़े को खोल कर अंदर बैठती मुझे माँ नज़र आई। मैं उस तरफ बढ़ गया। मुझे हैरत हो रही थी माँ इतनी शानदार कार मे! मैं उस कार की तरफ बढ़ ही रहा था कि तभी देखा कि दूसरी तरफ का दरवाज़ा खोल कर एक शख्स कार के अंदर बैठा और बैठते ही माँ को बाहों मे भर लिया। आगे मैं कुछ देख नही पाया क्यो कि कार के काले शीशे बंद हो गये थे और कार वहा से निकल गयी।"


********************************

आज के लिए बस यही तक.

जय भारत.
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उत्तम अपडेट
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(16-04-2026, 05:12 PM)@@004 Wrote: उत्तम अपडेट

शुक्रिया दोस्त............

बने रहिये......................
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चलिए दोस्तों कहानी में थोडा आगे बढ़ते है..........................

अब हम कहानी के अंत के काफी नजदीक है......................

बने रहिये............................
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"आप सोच भी नही सकते सोढी साहब, मेरे दिल पे क्या गुज़री थी! कैसे-कैसे ख़याल आ रहे थे मेरे मन मे। पूरा हफ़्ता मैं इसी उधेड़बुन मे रहा और फिर से शनिवार आ गया। मैने सोच लिया कि इस बार इस मामले की तह तक ज़रूर पहुँचुँगा।"

"...इस बार माँ निकली तो मैने माँ का पीछा किया और पहुँच गया एक शहर के सबसे पॉश इलाक़े मे एक आलीशान कोठी के सामने। माँ कार मे बैठ अंदर चली गयी थी और गेट पे गार्ड्स खड़े थे। मैं वही कोने मे छिप कर बैठ अंदर जाने का रास्ता सोचता रहा। घड़ी देखी तो पाया कि 9 बज रहे थे। मैने कोठी का एक चक्कर लगाया और एक जगह पाया कि दीवार पर चढ़ा जा सकता है।"

"...फिर सोढी साहब मैं जैसे-तैसे करके उस कोठी मे दाखिल हो गया और सावधानी से हर कमरे मे झाँकने लगा। एक कमरे से खिलखिलाने की आवाज़ आई तो मैं लपक कर वहा पहुँचा। दरवाज़ा बंद था पर तभी मेरा ध्यान उस कमरे की बाल्कनी पे गया तो मैं किसी तरह उसपे पहुँच गया। वहा एक रोशनदान था,मैने पास पड़ी एक कुर्सी पे चढ़ उस रोशनदान से झाँकने लगा।"

"अंदर हमारे दिवंगत राजा यशवीर के पिता पूरे नंगे घुटनो के बल बिस्तर पे खड़े थे। उनके एक हाथ मे फोन का रिसीवर था जिस से वो किसी से बात कर रहे थे और दूसरे हाथ मे मेरी माँ का सर जो कि उनके लंड पे उपर-नीचे हो रहा था। मैं तो सकते मे आ गया,कुछ होश नही रहे। अपनी माँ को उस हाल मे देख मुझे शरम  कर हट जाना चाहिए था पर मेरा तो दिमाग़ सुन्न हो गया था।"

"...तभी उन्होने रिसीवर रख दिया और दोनो हाथों से मेरी माँ के सर को पकड़ अपनी कमर हिला उसके मुँह को चोदने लगे।"
मैत्री की रचना.

"ऐसी कौन सी ज़रूरी बात थी कि मुझ से भी ध्यान हटा दिया था?,माँ उनसे पूछ रही थी।"

"वो राजकुमार की पढ़ाई के बारे मे कुछ बात थी।"

"एक राजकुमार तो आपका शहर मे भी है,हुज़ूर।माँ ने उनके लंड को हिलाते हुए कहा।"

"कौन?,राजा सहब ने पूछा"

"मेरा बेटा जब्बार भी तो आप ही का खून है तो वो भी तो राजकुमार हुआ। माँ ने लंड को दोनो हाथों मे भर अपने गाल से रगड़ा।"

"राजा ने इतनी ज़ोर का थप्पड़ माँ को मारा कि माँ पलंग से नीचे गिर गयी,उसके होठ के कोने से खून बह रहा था।"

"कान खोल के सुन ले, तू हमारी रखैल है और तेरा बेटा एक रखैल का बेटा। कभी सपने मे भी उसकी बराबरी हमारे राजकुमार से नही करना,समझी!,कह कर वो पलंग से नीचे उतरे और मेरी माँ को उल्टा कर उसकी कमर पकड़ कर अपना लंड उसकी गांड मे पेल दिया।"

"..बस उस दिन से मैने सोच लिया था कि राजकुल का विनाश कर दूँगा।"

"बहुत दर्द भरी कहानी है,जब्बार साहब। चलिए राजा को उसके किए की सज़ा मिली। पूरा खानदान अपनेआप ही मौत के मुँह मे समाता चला गया।"

"ग़लत,सोढी साहब। राजा यशवीर केवल अपनी मौत मरा है। उसकी दोनो औलादो को मैने उपरवाले के पास पहुँचाया है।"

"क्या?"

"जी,बड़े लड़के यूधवीर की कार के ब्रेक्स फैल कर दिए थे। बहुत पापड बेलने पड़े थे तब जा के कार से छेड़-खानी का मौका मिला था। लोगो को लगा कि आक्सिडेंट है और मेरा काम हो गया। और दूसरा लड़का विश्वजीत-उसको तो ऐसी ड्रग्स की लत लगाई की पुछो मत। राजा ने उसे हमारे चंगुल से निकल ही लिया था पर मैने उसे भी नही छोडा। मार कर ही दम लिया।"


जब्बार की शराब से खुलती ज़ुबान ने मलिका को चौकन्ना कर दिया,"डार्लिंग,अब बस करो,महल जाना है ना, डील साइन करने। इस हालत मे तो खड़े भी नही हो पायोगे।"उसने ग्लास उसकी गिरफ़्त से अलग कर दिया।

"ओके,जानेमन,आज तो मैं तुम्हे महल की सैर कारवंगा। तुम मेरी रानी, अब महल की रानी बनोगी। चलो,जाके तुम भी रानियो की तरह साडी पहन लो,जाओ!"

"पर मैं जा के क्या करूँगी?"
मैत्री की प्रस्तुति है.

"पर-बर कुछ नही,तुम भी जाओगी। तुम रानी हो। जाओ साडी पहन कर आओ, ओके!"

सोढी ने मलिका को उसकी बात मान ने का इशारा किया। बस कुछ ही देर मे उन्हे मेनका से मिलने महल पहुँचना था।

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बने रहिये दोस्तों................

क्रमश:
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अब आगे...................

आज दशहरे का दिन था और पास के गाँव मे बहुत बड़ा मेला लगा था,जहा रावण को जलाया जाने वाला था। पूरा राजपुरा वही जा रहा था। मेनका ने भी महल के एक-एक नौकर को वही भेज दिया,यहा तक की गेट पे एक गार्ड को भी नही रहने दिया। जब उन्होने उसके बारे मे पूछा तो उसने कहा कि वो सेशाद्री साहब की फॅमिली के साथ आ जाएगी।


पूरा गाँव मेले की ओर जा रहा था और थोड़ी ही देर बाद राजपुरा मे सन्नाटा च्छा गया और महल मे भी। मेनका नही चाहती थी कि जब्बार महल आए तो कोई भी देखे।

"रानी साहिबा,मैं एक घंटे बाद महल पहुँच जाऊँगा।"
मैत्री रचित.

"ठीक है,सेशाद्री अंकल। मैं आपके साथ ही दशहरे के मेले मे जाउंगी।",मेनका ने फोन रख दिया। तभी बाहर कोई कार रुकने की आवाज़ आई।


मेनका बाहर आई तो देखा कि कार से जब्बार,मलिका और सोढी उतर रहे हैं।

"नमस्कार रानी साहिबा,हम आ गये आपका भार हल्का करने। चलिए पेपर्स साइन करते हैं।"जब्बार नशे मे चूर बोले जा रहा था।

तीनो मेनका के साथ अंदर हॉल मे आकर बैठ गये। हॉल मे कुछ अजीब सी बू आ रही थी। मलिका बुरा सा मुँह बनाते हुए मेनका से बोली,"कुछ बदबू नही आ रही?"

"नही तो।"

"ये लीजिए पेपर्स,साइन कीजिए और अगले 3 दीनो मे आपके बॅंक अकाउंट्स मे सारे पैसे जमा हो जाएँगे।",जब्बार ने कुछ काग़ज़ मेनका की तरफ बढ़ाए।


मेनका ने काग़ज़ उठाए और बगल की टेबल से एक लाइटर उठाकर उन पेपर्स को आग लगा दी।

"ये क्या बेहूदगी है!",जब्बार चीखा। प्
रस्तुतकर्ता मैत्री है.

"नीच इंसान! तूने ये सोच भी कैसे लिया कि हम तुझे,उस इंसान को,जिसने हमारे खानदान को तबाह कर दिया,उसे अपनी अमानत बेचेंगे!" मेनका ने जलते कागज़ात सोफे पे फेंक दिए जिस से कि सोफा धू-धू कर जलने लगा। आग तेज़ी से हॉल मे फैलने लगी तो मलिका को समझ मे आया कि वो बू पेट्रोल की थी। वो घबरा गयी। आख़िर ये रानी क्या चाहती है?

"हमे यहा से निकलना चाहिए,जब्बार। ये औरत पागल हो गयी है। खुद भी मरेगी हमे भी मारेगी।" उसने जब्बार का हाथ पकड़ कर बाहर निकलने का इशारा किया।

"तुम लोग कही नही जाओगे। यही इस आग मे जलके अपने कर्मो की सज़ा पाओगे।" मेनका गर्जि।

" साली मादरचोद,कुतिया!",जब्बार ने झपट कर मेनका को पकड़ लिया पर तभी एक करारा हाथ उसके जबड़े पे पड़ा। सोढी ने उसे मारा था पर सोढी कहा! ये तो....ये तो कोई और था। सोढी ने अपनी पगड़ी उतार फेंकी थी,जब्बार ने गौर से देखा तो उसकी आँखे हैरत से फैल गयी।
ये तो राजा,यशवीरसिंग था। इतने दिन ये आदमी भेस बदल कर उसके पास आता रहा,बात करता रहा और वो अपने सबसे बड़े दुश्मन को पहचान नही पाया!

किसी ने सही कहा है,विनाश काले विपरीत बुद्धि।

"जब्बार,तूने हमारे दोनो मासूम बेटो को मौत की नींद सुला दिया। उनका क्या कसूर था। हमारे पिताजी की ग़लती की सज़ा हमे देता। एक मर्द की तरह सामने से वार करता, पर नही तू एक बुज़दिल चूहा है और आज चूहे की मौत मरेगा।"


आग ने पूरे हॉल को अपने आगोश मे ले लिया था। मलिका नज़र बचा कर भागने ही वाली थी कि तभी राजासाहब ने उसे पकड़ लिया,"तूने भी विश्वा की हत्या की थी। तेरे दूसरे आशिक़ कल्लन ने हमे सब बताया था,चल!",राजासाहब ने उसे एक रस्सी से बाँध वही फर्श पे पटक दिया। मलिका अपनी जान की भीख मांगती रही पर राजासाहब और मेनका जैसे बहरे हो गये थे।

थोड़ी ही देर मे मलिका की चीखें बढ़ती लपटो मे घुट गयी। मैत्री की पेशकश.

राजासाहब ने जब्बार को एक जलती लकड़ी से जम कर पीटा और आख़िर मे उस लकड़ी से उसके चेहरे को झुलस कर मौत के घाट पहुँचा दिया।

"मेनका,चलो यहा से निकले। सेशाद्री के आने से पहले हमे निकलना होगा। हमारा हाथ पकड़ो।" उन्होने मेनका का हाथ पकड़ा और जलते हुए हॉल से निकलने लगे कि तभी आग से खाक हो दीवार का एक बड़ा हिस्सा उनके सामने गिरा,"यश!",मेनका की चीख सुनाई दी ,फिर इतना धुआँ फैला कि कुछ नज़र नही आया।

 
वह दोनो  ससुर और बहु, कहा गये?
 
निकल भी पाए की नही उस आग के तूफान से!
जल कर वे लोग भी मर गए????????????

चारो तरफ बस आग ही आग थी। सेशाद्री तो ये नज़ारा देख बेहोश ही हो गये। किसी तरह उन्होने अपनी जेब से मोबाइल निकाला और पोलीस को और फायर ब्रिगेड को फोन मिलाने लगे।


**********************************


जानेंगे अगले एपिसोड में....तब तक के लिए मैत्री आपसे विदा लेती है। और आप इस एपिसोड और कहानी के बारे में अपने मंतव्य की प्रतीक्षा करेगी।

क्रमशः।।।।।।।।।।।।।।।।।।।

जय भारत.
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बेहद धमाकेदार प्रस्तुति
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(Yesterday, 03:27 PM)@@004 Wrote: बेहद धमाकेदार प्रस्तुति

धन्यवाद दोस्त

जुड़े रहिये...............
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शुक्रिया दोस्तों अब तक कहानी में बने रहने के लिए.


कुछ लोगो को यह कहानी बिलकुल अच्छी नहीं लगी क्यों की इसमें चुदाई कम थी. कुछ लोगो को अच्छी लगी तो कुछ लोगो को पढ़ी हुई और फ्रेश होने के लिए ही थी.

खेर जिन लोगो ने कहानी को सराहा और जिन लोगो ने कहानी की आलोचना की उन सभी दोस्तों का दिल से आभार।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।


चलिए अब हम कहानी को ख़त्म करने के लिए जाते है................अगला हिस्सा आखिरी है...............

चलो चलते है और कहानी का अंत की मजा लेते है.......................
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पार्ट -17 लास्ट



गतान्क से आगे…………………….

10
दिन बाद


मेनका की वसीयत पढ़ी जा रही थी। राजासाहब की मौत के बाद सारी जयदाद की वो अकेली मालकिन थी और सभी लोगो को बहुत इच्छा थी ये जानने कि उसने अपनी वसीयत मे क्या लिखा था।

मेनका ने सारी जयदाद दान कर दी थी-अनाथ बच्चों,विधवा उद्धार और धार्मिक काम और ऐसे ही काई चीज़ों के लिए। उसके माता-पिता बड़ी मुश्किल से अपने दुख को झेल पा रहे थे पर अब शायद वसीयत पढ़े जाने के बाद उन्होने ने भी इस सच्चाई को स्वीकार कर लिया था कि उनकी बेटी अब इस दुनिया मे नही है।

सेशाद्री साहब भी अब शांत थे पर उनकी आखों के आगे अभी भी वो दशहरा की काली रात घूम जाती थी। जब पोलीस और फायर ब्रिगेड वाले पहुँचे तब तक महल का एक बड़ा हिस्सा जल चुका था। पोलीस को अंदर से एक औरत की बुरी तरह जली हुई लाश मिली थी जिसे मेनका के पिता ने शिनाख्त करके अपनी बेटी की बताया। बाहर जब्बार भी मरा पड़ा था।

छान-बीन के बात पोलीस को जब पता चला कि आग पेट्रोल से लगाई गयी थी तो उनका ये शक़ पुख़्ता हो गया कि ये जब्बार की हरकत थी। पोलीस ने सेशाद्री साहब से भी पूछताछ की और अंत मे जिस नतीजे पे पहुँची वो ये था:

जब्बार राजासाहब से बेइंतहा नफ़रत करता था और सभी जानते थे कि उनकी मिल्स को हड़पने के लिए वो पागल था। राजासाहब की मौत के बाद जब मेनका ने मिल्स को सपरू साहब को बेचने का फ़ैसला किया तो उसने मेनका को धमका कर उसे ऐसा करने से रोकने की कोशिश की पर जब मेनका नही मानी तो वो गुस्से मे पागल हो के दशहरे की रात महल पहुँचा और वहा उसने जो भयानक खेल खेला उसमे उसकी खुद की भी जान चली गयी। मैत्रीपटेल की रचना है.

राजकुल की कहानी यही ख़तम हो गयी और लोगो के लिए राजपरिवार अब बस उनके दान किए गये पैसों से बनी समाज सेवा के कामो और इमारतो पे लिखा नाम रह गया।
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वहा बहमास में.....


एरपोर्ट पे मियामी से आई फ्लाइट से उतरे मुसाफिर सेक्यूरिटी चॅनेल से बाहर निकल रहे थे। ज़्यादातर अमेरिकन थे या फिर बेहेमीयन, एक लड़की के सिवा। वो कातिल फिगर वाली लड़की एक पीले रंग की घुटनो तक की फ्लॉरल ड्रेस पहने थी। कंधो पे डोरियाँ स्ट्रॅप्स का काम कर रही थी और ड्रेस के गले मे से उसके बड़े क्लीवेज का हिस्सा एरपोर्ट पे मौजूद मर्दों की निगाहों को अपनी तरफ ललचा रहा था और औरतों को जला रहा था।

"
मिस.अनितासिंग?" कस्टम ऑफीसर ने उसके पासपोर्ट पे लगे फोटो से उसका चेहरा मिलाया। मैत्री द्वारा रचित कहानी पढ़ रहे है

"
यस!"


"
वेलकम तो बहामास, मॅ'म,एंजाय योर स्टे।"उसने पासपोर्ट उसे वापस थमा दिया और एक आखरी भर नज़र भर कर उसके सीने की दरार का दीदार किया।

"
थॅंक यू।"


बाहर निकलते ही उसने देखा कि एक लंबा-चौड़ा नीग्रो उसके नाम का बोर्ड लेकर खड़ा है,वो उसके पास जा पहुँची और थोड़ी ही देर बाद एक कार मे पीछे की सीट मे बैठी अपनी मंज़िल की तरफ रवाना हो गयी। थोड़ी देर बाद कार ने उसे जेटी पे उतार दिया।

"
धीस बोट विल टेक यू टू योर डेस्टिनेशन,मॅ'म।" उस नीग्रो ने उसका सारा समान एक बड़ी सी योच मे चढ़ा कर उस से कहा।

"
ओके,थॅंक्स।" मैत्री की प्रस्तुति और रचित.


शाम ढल रही थी और आसमान सिंदूरी हो गया था। वो बस अब जल्द से जल्द अपनी मंज़िल तक पहुँचना चाहती थी। 45 मिनिट बाद याच एक आइलॅंड पे रुकी। उतरते ही एक और नीग्रो ने उसका समान लिया,
"वेलकम,मॅ'म।मिस्टर.विजयसिंग ईज़ वेटिंग फॉर यू इन ध विला।" उसने एक बड़े-से शानदार घर की तरफ इशारा किया। वो भागती हुई उस घर तक पहुँची और गेट मे दाखिल हो गयी। चारो तरफ तरह-तरह के पौधे लगे थे,एक बड़ा सा स्विमिंग पूल भी था। वो उस नीग्रो के पीछे चलती हुई विला के अंदर दाखिल हो गयी। सब कुछ बहुत शानदार था और वैसा ही जैसा उसे पसंद था।

वो नीग्रो उसका समान ले पता नही विला मे कहा गायब हो गया कि तभी 2 मज़बूत बाज़ुओं ने उसे पीछे से अपनी गिरफ़्त मे जाकड़ लिया। वो घूम कर उस इंसान के सामने हो गयी और उस से लिपट गयी। दोनो एक दूसरे से चिपके एक दूसरे को बेतहाशा चूमने लगे।

"
ओह....मेनका....आख़िरकार।"

"
हाँ,यश आख़िरकार हम फिर मिल गये।" वो अनितासिंग और कोई नही बल्कि अपनी मेनका थी और ये विजयसिंग है राजासाहब।


दोनो एक दूसरे को बाहों मे भरे वहा बड़े से सोफे पे बैठ गये और फिर से एक दूसरे के होठ का रस पीने लगे। मैत्री की प्रस्तुति.

जब अलग हुए तो मेनका ने सवाल किया, "ये सब तुमने कैसे सोचा यश?

"
सब बताते हैं,मेरी जान।" राजासाहब ने उसे अपनी गोद मे उठा लिया और एक बेडरूम मे ले जाकर बिस्तर पे लिटा दिया। दरवाज़ा बंद कर वो घूमे तो मेनका ने उन्हे नज़र भर के देखा। वो एक टी-शर्ट और हाफ-पॅंट मे थे। दाढ़ी-मूँछछ साफ करा ली थी और बहामा के सूरज ने उनके रंग को काँसे जैसा निखार दिया था। उसकी चूत गीली होने लगी। कितने दीनो बाद वो अपने प्रेमी के साथ अकेली थी पर मन मे कई सवाल घूम रहे थे और उसे उनका जवाब भी चाहिए था।



bane rahiye dosto................
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"बताओ ना,कैसे सोचा ये सब?" मैत्री की रचना.

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बताते हैं।" राजासाहब बिस्तर पे उसकी बगल मे बैठ गये और उसे बाहों मे भर उसकी आँखो मे झाँकने लगे।

"तुम्हे वो दिन याद है, जब हम तुम्हारे मायके से लौटने के बाद अपने वकील से मिलने शहर गये थे?" उन्होने अपना एक हाथ उसकी ड्रेस मे घुसा दिया और उसकी जांघे सहलाने लगे। मेनका भी मचल गयी और उनसे और सताते हुए उनकी टी-शर्ट मे हाथ घुसा उनकी पीठ पे फेरने लगी।

"हाँ।"

"वकील के साथ जैसे ही हमारी मीटिंग ख़त्म हुई कि हुमारे दोस्त दुष्यंत का फोन आया। दुष्यंत एक डीटेक्टिव एजेन्सी चलाता है और हमारे कहने पे वो विश्वा की मौत की छानबीन कर रहा था। उसने उस आदमी को ढूंढ निकाला था जिसपे उसे और हमे विश्वा का कातिल होने का शक़ था।" मेनका की ड्रेस उसकी कमर तक उठ चुकी थी और राजासाहब का हाथ अब उसकी पेंटी मे घुस उसकी गांड मसल रहा था।


मेनका ने अपनी टांग उठा कर उनकी टांग पे रख दी तो राजासाहब ने भी अपनी टांग उसकी टांगो के बीच घुसा उसकी गांड को भीचते हुए अपने से इस तरह सटा लिया कि उनका लंड सीधा उसकी चूत पे रगड़ खाने लगा। मेनका ने उनकी शर्ट निकाल दी और मस्त हो उनके बालो भरे सीने को चूमने-सहलाने लगी;
"फिर क्या हुआ?"


"हमने किसी तरह से उस इंसान को अपने क़ब्ज़े मे इस तरह ले लिया कि दुष्यंत को पता भी ना चला।" राजासाहब ने अपना हाथ उसकी पेंटी मे से निकाल कर उसकी ड्रेस का ज़िप खोल दिया और उसमे हाथ घुसा उसकी पीठ सहलाने लगे और बताने लगे कि कैसे उन्होने कल्लन को पकड़ा और उस से सारी बात उगलवाई।

इतने दीनो बाद अपने आशिक़ से ऐसी बेताकल्लूफ़ी से मिलने के कारण मेनका अब पूरी तरह से गरम हो चुकी थी। उसने अपने ससुर की पॅंट निकाल दी और खुद ही खड़ी हो कर अपनी ड्रेस और पेंटी अपने जिस्म से अलग कर दी। फिर बेड पे चढ़ि और राजासाहब को धकेल कर लिटा दिया और फिर झुक गयी उनके लंड पे।

"एयेए....आअहह!" राजासाहब की आँखे मज़े मे बंद हो गयी और वो अपनी बहू की जीभ का लुत्फ़ उठाने लगे।
मैत्री द्वारा लिखित प्रस्तुती.

"मुझे समझ मे नही आ रहा था कि मैं क्या करू? दिल तो कर रहा था कि कल्लन,जब्बार और मलिका को तुरंत मौत के घाट उतार दे। पर ऐसा करने से हमे सज़ा होती और मैं तुम से दूर हो जाता।" राजासाहब अपनी लंड चुस्ती बहू के बाल सहला रहे थे।

"इसी पशोपेश मे ड्राइव करते मैं कल्लन को बंदी बना कर राजपुरा लौट रहे था, जब उसने गाड़ी से भागने की कोशिश की और हमारा एक्सिडेंट हो गया और हम कार सहित खाई मे जा गिरे।" मेनका उनके लंड और आंडो पे पूरे जोश के साथ जुटी उनकी बात सुन रही थी।

"भगवान की दया से हमे थोड़ी खरोन्चे ही आई थी और कोई गहरी चोट नही पर कल्लन मर चुका था। तभी हमारे दिमाग़ मे एक तरकीब आई। हमने कल्लन को अपने कपड़े पहनाए और उसे कार मे बिठा उसमे आग लगा दी और ध्यान रखा कि उसका चेहरा पूरी तरह से जल जाए। हमने अपना ब्रेसलेट उसे पहना दिया ताकि जिस से तुम उसकी शिनाख्त हमारे नाम की कर दो।" मेनका ने लंड छोड़ उनकी तरफ भारी आँखो से देखा तो राजासाहब ने उसे खीच कर अपने उपर ले लिया और बाहो मे भर उसके चेहरे पे किसो की बैछार कर दी।

"मुझे माफ़ कर देना। मैंने तुम्हे बहुत तकलीफ़ पहुँचाई ना उस समय?"

"कोई बात नही। अब तो सब ठीक है।" उन्होने उसके आँसू अपने होंठो से साफ कर दिए तो मेनका मुस्कुरा दी।

"पर उन कामीनो तक कैसे पहुँचे?" अपनी भारी छातिया उनके सीने पे दबाए हुए उसने उनके चेहरे को अपने हाथों मे ले चूम लिया।

"मैं कुछ दीनो के लिए हमारे एक घर मे छुप गया और दाढ़ी-मूँछ बढ़ा एक सरदार का भेस ले लिया। फिर जब्बार की हर हरकतों पे निगाह रखने लगे और एक दिन मौका देख उस से मुलाकात कर ली।"

 राजासाहब उसे बाहों मे भर करवट ले उसके उपर सवार हो गये और उसकी मस्त,कसी हुई बड़ी चूचियों से खेलने लगे। उसकी चूचियो को दबाने,मसलने,चूमने,चाटने और चूसने के बीच उन्होने उसे बताया कि कैसे उन्होने भाड़े के गुंडों से जब्बार और मलिका पे हमला करवाया और फिर उनका विश्वास जीत लिया और कैसे जब्बार उन्हे मिल्स खरीदने राजपुरा ले गया। मैत्री रचित और फनलव की मदद से आप तक पंहुचा.

वो नीचे उतर उसकी चूत चाटने लगे, "उसके बाद तो तुम्हे पता ही है कि हम गुप्त रास्ते से महल मे घुस कर तुमसे मिलने आए और ये प्लान बनाया कि सारी इल्लीगल प्रॉपर्टी और पैसों को इकट्ठा कर यहा बहामास मे सेट्ल हो जाएँ और तुम अपनी वसीयत मे अपनी मौत के बाद सबकुछ दान कर दो,ताकि हमने तुम्हे जो वादा किया था वो भी पूरा हो जाए।"

"ह्म्म्म....!" मेनका उनके सर को अपनी चूत पे दबाती अपनी कमर उचकती बस इतना ही कह पाई।

"मेनका,मेरी जान! हमारा मक़सद था अपनी बची हुई ज़िंदगी तुम्हारी बाहों मे गुज़ारना और इसीलिए हमने तुम्हारे ज़रिए जब्बार को ये धोखा दिया कि तुम मिल्स उसे बेचोगी जबकि तुमने सपरू साहब के साथ डील कर ली थी। हमारे महल मे आग लगाके मलिका और उसे मौत की नींद सुलाने से हमारा बदला तो पूरा हुआ ही,साथ मे मलिका की जाली लाश मिलने से सब ने यही समझा कि वो तुम हो।" मेनका अब तक 3 बार झड़ चुकी थी। अपने प्रेमी की हरकते ही नही उसकी बातें-जो ये ज़ाहिर करती थी कि वो उसे कितना चाहता है और केवल उसके साथ चैन से ज़िंदगी बिताने के लिए उसने इतना जोखिम उठाया-भी उसे मस्त किए जा रही थी।
मैत्री रचित और फनलवर के सहकार से.

उसने हाथ बढ़ा राजासाहब का सर अपनी चूत से अलग किया और खींच कर अपने उपर आने का इशारा किया। राजासाहब फ़ौरन उसके उपर आ गये तो उसने अपनी टांगे फैला दी, "उन पैसों से यहा हमने काफ़ी प्रॉपर्टी खरीदी है,जानेमन। दुनिया के लिए राजा यशवीर और मेनका मर चुके हैं पर अनिता और विजय के नाम से आज हम अपनी नयी ज़िंदगी का यहा इस खूबसूरत जगह मे आगाज़ करते हैं।"
और उन्होने अपना लंड उसकी गीली चूत मे पेल दिया,मेनका ने भी अपनी टांगे और बाहें उनके जिस्म के गिर्द लपेट दी और दोनो प्यार के समंदर मे गोते लगाने लगे।

तो दोस्तो इस तरह दोनो ससुर बहू अब एक पति-पत्नी बनकर अपनी जिंदगी गुजारने लगे। समय के पैहो को कौन रोक सकता है?

समय के साथ मेनका ने 4 बच्चो को जन्म दिया दो बेटे और दो बेटी और सभी एक सुखमय,शांतिमय और आनंदित जीवन गुजार रहे है।
 
आप सब का बहोत बहोत धन्यवाद की आपने इस कहानी को शुरू से अंत तक पढ़ी। कुछ लोगो ने कोमेंट कर के सराहा भी।
 
चलिए अब आप इस कहानी की लेखिका "मैत्री " को अगली कहानी शुरू करू तब तक के लिए जाने की आज्ञा चाहूंगी।
 
जल्द ही नयी कहानी शुरू करुँगी।
 
मिलते है एक नयी मजेदार कहानी में। तब तक के लिए शुक्रिया, बाय बाय।

जय भारत.

ध एंड ************* समाप्त........................



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Requesting to add pictures or gif or video link ,it makes story sexy
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कमाल अपडेट और बेहद सुखद अंत
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