25-03-2026, 08:11 PM
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Adultery Adventure of sam and neha
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25-03-2026, 08:11 PM
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31-03-2026, 05:15 PM
"मम्ह्ह्ह्ह... गुड बॉय..."
वो मेरे चेहरे पर अपना पैर रखकर धक्का दिया—हल्का सा। "अब... तुम्हारी बारी है... । और लगता है... तुम तैयार हो..." उसने अपना पैर नीचे किया। उसकी नज़र मेरे लुंड पर गई। मैं अभी भी सेमी-हार्ड था—प्रीकम की बूँदें लुंड पर चमक रही थीं। "क्या मदद चाहिए... कुछ देखने के लिए?" वो अपनी निप्पल्स को ट्वीक करने लगी—धीरे से, होंठ काटते हुए। एक गहरी साँस ली। फिर... अपना पैर फैलाया—उसकी चूत अब पूरी तरह दिख रही थी—गीली, चमकती हुई। फिर... पैर क्रॉस कर लिया—ज्यादातर छुपा दिया। लेकिन वो जानती थी... मैं देख रहा हूँ। वो सिगरेट का एक कश ली। धुआँ मेरे चेहरे पर छोड़ा। फिर बोली—आवाज़ में वो क्रूर, सेक्सी टोन— "झड़ो मेरे लिए... माधरचोद। मुझे दिखाओ... तुम कैसे खुद को सहलाते हो... जब ऑफिस में दूसरे मर्द मेरी तरफ देखते हैं। बताओ... किस-किस को इमेजिन करते हो... मेरी गंदी, छोटी, हॉर्नी स्लट को चोदते हुए?" मैं शर्म से लाल हो गया। गाल जल रहे थे। सीना धड़क रहा था। लेकिन... मेरा लुंड अब पूरा रेजिंग हार्ड था। वो अपनी निप्पल्स ट्वीक करती रही। उसकी उँगली धीरे-धीरे नीचे गई—उसकी चूत की फोल्ड्स में। उसने इंडेक्स फिंगर अंदर डाला। फिर बाहर निकाला—उसका रस चमक रहा था। उसने फिंगर को अपने होंठों पर रखा। धीरे से चूसा। "वाह... जस्ट वाह..." वो कभी ऐसा नहीं करती थी। अपना रस... अपने फिंगर से... मेरे सामने... चूस रही थी। मैं... उस पल में ही झड़ गया। अनएक्सपेक्टेड। अनप्रिपेयर्ड। बहुत ज़्यादा। गाढ़े, चिपचिपे रस की लकीरें मेरे लुंड से निकलीं—उसके पैरों पर... उसके काफ पर... मेरे हाथ पर। नेहा ने कराहा—"मम्ह्ह्ह्ह... येस... ब्यूटीफुल... कम फॉर मी... सिसी बॉय... लेट इट आउट..." वो अपना फिंगर और गहरा चूस रही थी। फिर... वापस अपनी चूत में डाला। मैं काँप रहा था। वाइब्रेट कर रहा था। मुझे याद नहीं... आखिरी बार कब इतना जोर से झड़ा था। नेहा ने मेरी तरफ देखा। उसकी आँखें अभी भी चमक रही थीं। "अब... चाट लो।" मैंने उसकी तरफ देखा। क्या उसने सच में कहा था? पोस्ट-ऑर्गेज़्म क्लैरिटी अब आने लगी थी। ये... ग्रॉस लग रहा था... शर्मनाक... गंदा... लेकिन... मेरा शरीर... अभी भी हार्ड था। मेरा दिमाग... अभी भी सबमिसिव था। वो मेरे बालों को हल्का-सा खींचकर बोली—आवाज़ अब रफ़, ब्रेथी, लेकिन अभी भी कमांडिंग। "कम ऑन, हनी... तुम्हें अच्छा लगा था ना... जब मैंने अपना रस चूसा?" उसने अपना फिंगर फिर से अपनी चूत में डाला—धीरे से, गहराई से। फिर बाहर निकाला—उसका रस चमक रहा था। उसने फिंगर को अपने होंठों पर रखा। धीरे से चूसा—मेरी आँखों में देखते हुए। उसकी जीभ फिंगर पर घूम रही थी—लंबी, सेक्सी लिक। "देखा... कैसा लगता है... अपनी ही चूत का स्वाद?" मेरा लुंड फिर से हार्ड हो गया। पोस्ट-ऑर्गेज़्म क्लैरिटी अब कहीं दूर जा चुकी थी। मेरा शरीर फिर से जल रहा था। उसकी आँखें... वो भूख... वो क्रूर मुस्कान... सब मुझे अंदर से जला रही थीं। मैंने कभी नहीं सोचा था कि मेरी नेहा... इतनी डोमिनेंट हो सकती है। इतनी सेक्सी... इतनी क्रूर। मैं घुटनों पर था... शर्म से काँप रहा था... लेकिन लुंड फिर से हार्ड हो गया था। पोस्ट-ऑर्गेज़्म क्लैरिटी आ रही थी—वो "ईक" फैक्टर... वो ग्रॉस फीलिंग... वो शर्म... सब वापस आ गया था। मैं सोच रहा था—ये गंदा है... ये गलत है... मैं ऐसा नहीं कर सकता। लेकिन नेहा ने मेरे बाल पकड़े। मेरा सिर ऊपर खींचा। उसकी आँखें अब जल रही थीं—गुस्सा, भूख, और एक गहरी क्रूरता। उसकी आवाज़ पूरी तरह बदल गई—रफ़, तेज़, गाली देने वाली। "कम ऑन यू स्टूपिड स्लट..." वो मेरे चेहरे के ठीक सामने झुकी। उसकी साँस मेरे गाल पर लग रही थी। "अपना कम चाटो... मिस नेहा के लिए। वरना... मैं तुम्हें ऐसे ही बाहर ले जाऊँगी। सिर्फ़ अंडरवियर में... नंगे... सबके सामने। और सब मर्द हँसेंगे... तुम्हारे छोटे लुंड पर।" फक... ये पहली बार था... उसने मेरे लुंड पर कमेंट किया। "छोटा लुंड"। वो सच में गुस्से में लग रही थी। लेकिन साथ ही... उसकी उँगली उसकी चूत में तेज़ी से अंदर-बाहर हो रही थी। उसकी कराहें बीच-बीच में आ रही थीं—अनकंट्रोल्ड। "आह्ह... आह्ह... ओह फक..." मैंने एक सेकंड भी नहीं सोचा। अपना हाथ उठाया—जो अभी भी मेरे कम से गीला था। उसे अपने होंठों पर ले गया। जीभ निकाली। चाटा—एक-एक बूँद। नमकीन... मस्की... गाढ़ा। गर्ल कम जितना स्वादिष्ट नहीं... लेकिन... मैंने सब चाट लिया। पाम... उँगलियाँ... हर ड्रॉप। नेहा ने देखा। उसकी उँगली अभी भी उसकी क्लिट पर रगड़ रही थी—तेज़ी से। वो कराही—"आआह्ह... आह्ह्ह्ह... गॉड... यू बिच..." फिर... उसने अपना पैर आगे बढ़ाया। उसके पैरों पर मेरे कम की बूँदें चमक रही थीं, उसके काफ पर। वो बोली— "अब... मेरे पैर चाटो। अपना कम... मेरे पैरों से साफ़ करो।" मैंने झुककर चाटा। उसके पैरों पर... काफ पर। नमकीन... गाढ़ा... उसकी स्किन की खुशबू के साथ मिला हुआ। मैं... सच में एक रियल बिच बन गया था। कोई सेल्फ रिस्पेक्ट नहीं बचा था। लेकिन... मैं एंजॉय कर रहा था। मेरा लुंड फिर से हार्ड हो गया था। मैं कह नहीं सकता था "नहीं"। नेहा कराह रही थी—"उग्ग्ग्ग्ग्ह्ह्ह्ह... ओह्ह फक... ओओओह्ह येस... येस... येस..." उसकी आवाज़ में अब वो प्लेजर और टेंशन दोनों थे। वो काँप रही थी—उसकी जांघें हिल रही थीं। फिर... वो शांत हुई। एक गहरी, संतुष्ट साँस ली। "वेल... दैट वॉज़ फन... माय पर्वी लिटिल चूतिया..." वो हँसी। मेरे गाल पर हल्का-सा थप्पड़ मारा—प्यार से। फिर... तेज़ी से उठी। बेडरूम की तरफ चली गई। उसकी गांड लहरा रही थी—सोफे से उठते हुए। मैं... अभी भी घुटनों पर था। उसकी स्विंगिंग गांड को देखता रहा। मेरा लुंड... अभी भी हार्ड... इम्पॉसिबली हॉर्नी। और दिमाग में एक ही सवाल घूम रहा था— मेरी नेहा के साथ... ये क्या हो गया? मैं वहीं घुटनों पर बैठा रहा... काफी देर तक। पता नहीं क्या होने वाला है। क्या खेल खत्म हो गया? या आज रात नेहा के और शेड्स देखने को मिलेंगे? घुटने दुख रहे थे—फ्लोर बर्न हो रहा था। लेकिन मैं उठने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था। कहीं नेहा गुस्सा न हो जाए। कहीं वो सोचे कि मैं कमिट नहीं हूँ। करीब 15 मिनट हो गए। मैं धीरे से उठा। सीधा किचन की तरफ गया। विस्की की बॉटल निकाली। ग्लास में डाला—एक बड़ा पैग। एक घूँट में गटक लिया। अपने कम का वो नमकीन, मस्की स्वाद... जल्दी से मुँह से निकालना था। फिर बालकनी पर गया। सिगरेट सुलगाई। एक-दो कश लिए। धुआँ बाहर छोड़ा। दिमाग थोड़ा साफ हुआ... लेकिन अभी भी घूम रहा था। वापस हॉल में आया। नेहा का कोई नामोनिशान नहीं। मैं धीरे-धीरे बेडरूम की तरफ बढ़ा। दरवाज़ा आधा खुला था। अंदर झाँका। नेहा बिस्तर पर पड़ी थी। सिर्फ़ टी-शर्ट में—नीचे कुछ नहीं। पेट के बल लेटी हुई। उसकी गोरी, गोल गांड डिम लाइट में चमक रही थी। वो सो रही लग रही थी। मैं धीरे से पास गया। हमने डिनर नहीं किया था। वो भूखी होगी। उसकी जांघें अभी भी गीली थीं—पसीने और उसके रस से। वो तीन बार झड़ी थी—पीछे-पीछे। मैंने हल्के से उसके कंधे पर टैप किया। नहीं पता था कैसे अप्रोच करूँ—"नेहा" या "मास्टर"? लेकिन मैंने नेहा चुना। खेल खत्म लग रहा था। "नेहा... हनी... सो रही हो?" वो एक झटके से जागी। "हाँ..." जैसे गहरी नींद से उठी हो। उसने मेरी तरफ देखा। फिर मुस्कुराई—वो पुरानी वाली प्यारी मुस्कान। "तुम ठीक हो... बेबी?" मेरे दिमाग में राहत हुई। लेकिन एक कोने में... अभी भी वो चाहत बाकी थी। क्या पता... वो और प्लान कर रही हो। क्या पता... अभी भी मालकिन बनी रहे। लेकिन वो अब कैरेक्टर से बाहर थी। फिर से वही नेहा—केयरिंग, ऑबिडिएंट वाइफ। "बेबी... डिनर? ऑर्डर करूँ... या बाहर चलें?" वो बिस्तर से उठी। टी-शर्ट नीचे खींची। "नहीं... कोई बात नहीं। मैं कुछ बना लेती हूँ।" वो किचन की तरफ चली गई। उसकी गांड अभी भी लहरा रही थी। मैं पीछे-पीछे गया। वो स्टोव पर कुछ करने लगी। मैंने सोचा—ये... ये सब कितनी जल्दी बदल गया। एक पल पहले... वो मालकिन थी। अब... फिर से मेरी नेहा। केयरिंग... प्यारी... घरेलू। मैं अब भी... थोड़ा डरा हुआ था। थोड़ा एक्साइटेड। थोड़ा कन्फ्यूज़। लेकिन वो... फिर से वही नेहा बन गई थी। जैसे कुछ हुआ ही नहीं। नेहा ने अच्छी बीवी की तरह आधे घंटे में कुछ बना दिया। सिंपल—रोटी, सब्जी, दाल। खुशबू पूरे घर में फैल गई। मैंने टीवी ऑन किया—कोई सीरियल या मूवी, ध्यान नहीं था। दिमाग कहीं और था। एक घंटा पहले... इसी कमरे में... मैं घुटनों पर था। उसकी चूत चाट रहा था... दरवाज़ा खुला... गुप्ता जी ने देख लिया... और अब... सब नॉर्मल। जैसे कुछ हुआ ही नहीं। मैं तीसरा ग्लास विस्की पी रहा था। धीरे-धीरे... गटक-गटक। हम दोनों में से कोई एक शब्द नहीं बोला। सन्नाटा... लेकिन अजीब सा कम्फर्टेबल सन्नाटा। फिर नेहा मेरे बगल में आकर बैठ गई। उसने रिमोट उठाया। "नेटफ्लिक्स लगा दो... जो हम देख रहे थे... उसको कंटिन्यू करते हैं।" उसकी आवाज़ बिल्कुल वैसी ही—बबली, खुश, उत्साही। कोई हार्शनेस नहीं... कोई मालकिन वाली ठंडक नहीं। जैसे वो पूरी तरह स्विच ऑफ कर चुकी हो। या... शायद खुद को फोर्स कर रही हो... उस सब को भूलने के लिए। मैंने नेटफ्लिक्स खोला। वही सीरियल प्ले किया। हम खाना खाने लगे। फिर वो हँसते हुए बोली— "मेरी बियर कहाँ है?" मैं हँसा। "ओह... अभी लाता हूँ।" उठा... फ्रिज से एक बियर निकाली। उसे पकड़ाई। वो मुस्कुराकर बोली— "थैंक्स, हनी।" हमने साथ में खाना खाया। टीवी पर कुछ चल रहा था। हँसते-हँसते बातें कीं—ऑफिस की, दोस्तों की, कुछ भी। रोल प्ले का... एक शब्द नहीं। जैसे... कुछ हुआ ही नहीं।
31-03-2026, 05:25 PM
हम खाना खाते रहे... चैट करते रहे... पीते रहे... स्मोक करते रहे।
नेहा टी-शर्ट और ब्लैक पैंटी में थी—बैठी हुई, पैर सोफे पर मोड़कर, जैसे कोई नॉर्मल शाम हो। मैं शॉर्ट्स में—एक हाथ में विस्की का ग्लास, दूसरा सिगरेट। टीवी पर वही शो चल रहा था। हम उसकी बातें कर रहे थे—कैरेक्टर कौन सा अच्छा है, ट्विस्ट क्या होगा, हँसी-मज़ाक। उसका चेहरा पूरी तरह बबली था—वही पुरानी वाली नेहा—कोई ट्रेस नहीं कि एक घंटा पहले वो मुझे "भेनचोद" कहकर थप्पड़ मार रही थी, दरवाज़ा खुला रखकर मेरी चूत चटवा रही थी। कोई शर्म नहीं... कोई ग्लानि नहीं... जैसे कुछ हुआ ही नहीं। मैं भी हँस रहा था... जवाब दे रहा था... लेकिन दिमाग कहीं और था। विस्की मदद कर रही थी—थोड़ा डिस्ट्रैक्ट कर रही थी—लेकिन बार-बार वो बातें वापस आ रही थीं। उसने पहली बार मेरे लुंड को "छोटा" कहा था। "सब मर्द हँसेंगे... तुम्हारे छोटे लुंड पर।" क्या ये सिर्फ़ रोल प्ले का हिस्सा था? क्या वो बस मुझे ह्यूमिलिएट करने के लिए बोला था—कैरेक्टर में रहने के लिए? या... सच में वो सोचती है? क्या मैं उसके लिए काफी नहीं हूँ? क्या मेरा लुंड... उसके लिए इनएडिक्वेट है? क्या वो कभी किसी और के बारे में सोचती है... जो बड़ा हो... जो उसे भर दे... जो मुझे भर नहीं पाता? हम डिनर खत्म करके बेडरूम में आ गए। दोनों बिस्तर पर लेट गए—फोन हाथ में। पहले की तरह... बोरिंग कपल वाली रूटीन। मैं स्क्रीन पर रील्स टैप कर रहा था—ध्यान कहीं नहीं था। नींद आने की उम्मीद में बस स्क्रॉल करता रहा। नेहा भी अपने फोन में खोई हुई थी। हमारे शरीर एक-दूसरे को छू भी नहीं रहे थे। बस... सन्नाटा। फोन की रोशनी हमारे चेहरों पर पड़ रही थी। फिर... नेहा की आवाज़ आई—धीमी, लेकिन साफ़। "क्या हुआ बेबी?" मैंने फोन नीचे रखा। उसकी तरफ देखा। वो मुझे देख रही थी—उसकी आँखें थोड़ी चिंतित, थोड़ी प्यारी। मैंने कुछ नहीं कहा। बस... सोच रहा था कि वो क्या बात कर रही है। वो थोड़ा करीब आई। फोन साइड में रख दिया। उसने मेरी तरफ हाथ बढ़ाया—मेरे गाल पर हल्के से लगाया। "डोन्ट यू लाइक इट बेबी... क्या मैं बहुत हार्श थी?" उसकी आवाज़ में अब वो क्रूरता नहीं थी। बस... चिंता। वो सच में जानना चाह रही थी। मेरे दिमाग में दो हिस्से लड़ रहे थे। एक हिस्सा—मेरा मेल ईगो—चिल्ला रहा था— "ये सब बकवास है... कभी मत करना... कैसे तुमने मेरा लुंड 'छोटा' कहा... मैं तुम्हें माफ नहीं करूँगा..." ये सब खत्म हो जाता। सब नॉर्मल हो जाता। लेकिन... दूसरा हिस्सा... वो बहुत ज़्यादा चाहता था। नेहा की वो रफ ट्रीटमेंट... वो गालियाँ... वो डोमिनेशन... उसकी क्यूट, मासूम फेस पर वो क्रूरता... उसने जो किया... वो मुझे और चाहता था। और जानना चाहता था—वो कितनी दूर जा सकती है। कितनी गहरी... कितनी क्रूर... कितनी गंदी। मेरा सबमिसिव माइंड... हमेशा की तरह... जीत गया। दिमाग के दोनों हिस्से लड़ रहे थे—एक तरफ ईगो चिल्ला रहा था कि "ये सब बंद करो... ये गलत है... वो तुम्हें छोटा कह रही थी..." दूसरी तरफ... वो गहरी, पुरानी क्यूरियोसिटी... वो बचपन से चली आ रही आदत... कि "देखें... ये कितनी दूर तक जा सकती है... कितनी गहरी... कितनी क्रूर..." और हमेशा की तरह... वो दूसरा हिस्सा जीत गया। मैंने धीरे से कहा—आवाज़ में अभी भी थोड़ी काँप... "नो... इट वॉज़ फाइन... बहुत अच्छा था।" नेहा ने मेरी तरफ देखा। उसकी आँखें अब फिर से वही पुरानी वाली—प्यारी, चिंतित, लेकिन अब थोड़ी राहत वाली। वो मेरे करीब आई। मेरे बाइसेप्स पर सिर टिका दिया। उसकी ब्रालेस टी-शर्ट में उसके स्तन मेरी साइड चेस्ट से दब रहे थे—नरम, गरम। उसकी नंगी जांघें मेरी जांघों पर रख दीं। उसका हाथ मेरे सीने पर—धीरे-धीरे घूम रहा था... मेरे निप्पल्स के आसपास... छूता हुआ... खेलता हुआ। वो धीरे से बोली— "सच में? मुझे डर लग रहा था... कहीं तुम्हें बुरा न लगे। मैंने पहली बार... इतना हार्श किया। तुम्हें... थप्पड़... गालियाँ... सब... मैंने सोचा था... शायद तुम्हें पसंद आएगा... लेकिन कन्फर्म नहीं थी।" मैंने उसके बालों में हाथ फेरा। उसकी खुशबू... अभी भी मेरे नाक में थी—पसीने, उसके रस की, सिगरेट की मिली हुई। "नहीं... बेबी... मुझे बहुत अच्छा लगा।" वो धीरे से बोली—आवाज़ में अब वो पुरानी वाली मासूमियत लौट आई थी— "जस्ट फाइन? मतलब... तुम्हें ज्यादा पसंद नहीं आया?" उसने अपना हाथ मेरे गाल पर रखा—वही गाल जहाँ उसने थप्पड़ मारा था। उसकी उँगलियाँ अभी भी गर्म थीं। गाल अभी भी लाल था... जलन अभी भी बाकी थी। "इतना हार्ड लगा क्या?" मैंने हल्के से सिर हिलाया। "नहीं... अब ज्यादा नहीं... पहले से कम हो गया है।" वो हँसी—एक नॉटी, शरारती हँसी। उसकी उँगलियाँ मेरे गाल पर घूम रही थीं—हल्के से मसाज करती हुईं। "ओह्ह... मैं तो सोच रही थी... तुम इन सॉफ्ट हाथों के थप्पड़ को भी एक मर्द की तरह बर्दाश्त कर लोगे... लेकिन सॉरी बेबी... ये सब तो प्ले के लिए था।" मैंने उसके हाथ को पकड़ा। उस हाथ को जो मुझे थप्पड़ मार चुका था... मैंने उसे किस किया। धीरे से... होंठों से। "नो... मैं सच में बहुत पसंद करता हूँ... सच में।" वो मेरी तरफ मुड़ी। उसकी आँखें चमक रही थीं। उसने मेरे गाल पर फिर किस किया—इस बार प्यार से। "ओह्ह... सो स्वीट..." वो मुझे ऐसे देख रही थी... जैसे कोई छोटा कॉलेज बॉय हो। मासूम... नाज़ुक... जिसे प्यार से सहलाना है। उसकी उँगलियाँ अब मेरे सीने पर घूम रही थीं—धीरे-धीरे... मेरे निप्पल्स को छूते हुए। मैं सोच रहा था... "लाइक ए मैन..." क्या वो अभी भी प्ले में है? या... ये उसकी असली फीलिंग है? क्या वो सच में सोचती है... कि मैं "मर्द की तरह" नहीं बर्दाश्त कर सका? क्या वो मेरे सबमिसिव साइड को... और गहराई से देख रही है? मैंने कुछ नहीं कहा। बस... उसके हाथ को पकड़कर चूमता रहा। वो मेरे सीने पर सिर टिका दिया। उसकी साँस मेरी गर्दन पर लग रही थी। वो अचानक उठी—कोहनी के बल। उसकी आँखें मेरी आँखों में टिकीं—नॉटी, शरारती, लेकिन थोड़ी सीरियस। "तो... स्वाद कैसा था?" उसने नॉटिली अंदाज़ में पूछा। मुझे पता था... वो मेरे कम के बारे में पूछ रही है। मैंने मुस्कुराकर आँख मारी। जवाब नहीं दिया। अभी भी थोड़ा अनकम्फर्टेबल था—अपने कम का स्वाद... अपने मुँह में... वो मेरे गाल पर हल्का-सा थप्पड़ मारा—प्यार से। "बोलो ना... स्वाद कैसा था?" मैंने फिर आँख मारी। "अच्छा था..." वो हँसी—एक छोटी, क्यूट हँसी। फिर... और करीब आई। उसकी साँस मेरे होंठों पर लग रही थी। "क्या तुमने पहले कभी टेस्ट किया है?" ये सवाल... मुझे झटका लगा। मेरा दिल एक झटके से धड़का। क्या वो सोचती है... कि मैं... लेकिन मैंने हल्के से, सूटल तरीके से कहा— "कई बार... जब तुम मुझे ब्लोजॉब के बाद किस करती हो... तो... थोड़ा-सा... मुँह में आ जाता है।" वो हँसी—अब थोड़ी शरमाते हुए। फिर... मेरे कान के पास मुँह ले जाकर फुसफुसाई— "नहीं सिली... ऐसा नहीं। जैसे मैंने आज किया... डायरेक्ट... अपनी उँगली से... अपना रस चूसा। क्या तुमने कभी... अपना कम... अपने हाथ से... चाटा है?" "ना..." मैंने यह सवाल नेहा से किया ? क्या तुमने पहले इसे किआ है इसे। .. अपनी उंगली से चाटना उसकी आँखें थोड़ी नीची हो गईं—शरम और नशे का मिक्स। "हाँ... कई बार किया है।" वो बोली—आवाज़ में अब वो बबलीपन नहीं था, बल्कि एक गहरी, पुरानी सच्चाई। "तुम्हें पता है... मैंने मास्टरबेशन बहुत जल्दी शुरू कर दिया था।" वो रुकी। जैसे खुद को रोक रही हो। जैसे उसे एहसास हो गया कि वो कुछ ऐसा बोल गई जो उसने पहले कभी नहीं बोला। कमरे में सन्नाटा छा गया। विस्की का नशा हमें दोनों को ढीला कर रहा था—बातें बाहर आ रही थीं, बिना सोचे। मैंने सन्नाटा तोड़ा। धीरे से, लेकिन साफ़— "इट्स ओके... तुम शेयर कर सकती हो मेरे साथ। तो... कब शुरू किया था? मतलब... कितनी उम्र में?" पहली बार... हम अपना पास्ट खोल रहे हैं। मैंने कभी नहीं पूछा था। शादी की पहली रात... मैंने उसे साफ़-साफ़ कहा था— "मुझे तुम्हारा पास्ट नहीं जानना... ।" नहीं पूछा कि छोटे शहर में... हमारी कास्ट की छोटी कम्युनिटी में... लोग तुम्हें क्यों नहीं चाहते थे। क्यों सबने मना कर दिया—एक स्मार्ट इंजीनियरिंग ग्रेजुएट को... जो इतनी खूबसूरत है... इतनी सेक्सी है... इतनी इंडिपेंडेंट है। क्यों कोई भी लड़का... या लड़के का परिवार... तुम्हें नहीं चाहता था। क्यों... एक 24 साल की जवान लड़की... ने 34-35 साल के मिडिल एज मर्द से शादी कर ली। मैंने कभी नहीं पूछा। क्योंकि मुझे सच में फर्क नहीं पड़ता था। मुझे बस... तुम चाहिए थी। तुम्हारी स्माइल... तुम्हारी आँखें... तुम्हारा वो क्यूट, नॉटी अंदाज़... सब कुछ। मैंने सोचा... पास्ट पास्ट है। लेकिन आज... आज सब कुछ अलग था। फिर... वो धीरे से बोली— "18... मैं 18 की थी जब पहली बार किया था।" मैंने "हम्म..." कहा—बिना सोचे। मेरा दिमाग अभी भी घूम रहा था—उसके पास्ट के सवालों में। फिर... अचानक... मैंने पूछ लिया— "और... तुमने मुझसे शादी क्यों की? मतलब... क्यों हाँ किया?" नेहा एक झटके से सिर उठाया। उसकी आँखें मेरी आँखों में टिकीं—थोड़ी चौड़ी, थोड़ी हैरान। "क्यों पूछ रहे हो बेबी... अचानक?" मैंने सिर हिलाया। "बस... आज... जानना चाहता हूँ। पहली बार... सच में जानना चाहता हूँ।" वो मेरे गाल पर हाथ फेरा—वही गाल जहाँ उसने थप्पड़ मारा था। उसकी उँगलियाँ अभी भी गर्म थीं। "मैंने हाँ किया... क्योंकि मुझे तुम पसंद आए। तुम्हारी बातें... तुम्हारे विचार... तुम्हारा मुझे देखने का तरीका... सब कुछ। तुमने मुझे जज नहीं किया। तुमने कहा—'मुझे तुम्हारा पास्ट नहीं चाहिए... बस तुम्हें चाहिए।' और... मैं उस हेल से बाहर निकलना चाहती थी। मेरे घर से... मेरे छोटे शहर से... वो सब... मैं वहाँ से भागना चाहती थी। तुम... मेरी आज़ादी थे। तुमने मुझे वो जगह दी... जहाँ मैं वैसी ही रह सकती थी... जैसी मैं हूँ। बिना किसी डर के... बिना किसी कंट्रोल के।" "वो शहर... इतना खूबसूरत है... पहाड़... नदियाँ... फिर क्यों? नेहा ने एक पल के लिए रुककर सिर उठाया। उसकी आँखें थोड़ी नम हो गईं। "क्योंकि... लोग थे।" मैंने पूछा— "कौन से लोग?" वो रुकी। फिर... धीरे से बोली— "छोड़ो ना..." मैंने उसके हाथ को पकड़ा। उसे किस किया। "बेबी... तुम मुझे बता सकती हो। मैं तुम्हारे सामने एक ओपन बुक हूँ। मैंने तुम्हें सब बताया—मेरी कॉलेज गर्लफ्रेंड श्रुति के बारे में... कि मैं वर्जिन नहीं था जब हम शादी की... सब कुछ। क्या तुम्हें लगता है... हमारा रिलेशनशिप इतना कमज़ोर है कि तुम्हारा पास्ट हमें दूर कर देगा? कम ऑन... हर किसी का पास्ट होता है।"
31-03-2026, 05:27 PM
नेहा के पास्ट के बारे में मेरे मॉनोलॉग के बाद कमरे में सन्नाटा छा गया।
फोन की स्क्रीन अभी भी चमक रही थी, लेकिन हम दोनों का ध्यान कहीं और था। वो धीरे से उठी। बिस्तर से उतरी। कमरे से बाहर चली गई। मैंने सोचा—शायद मैंने कोई गलत स्ट्रिंग छू ली। शायद वो गुस्सा हो गई। शायद वो रोने लगी। मेरा दिल धड़क रहा था। मैंने सोचा—अब सब बर्बाद हो गया। लेकिन... 1-2 मिनट में वो वापस आई। उसके हाथ में वोदका की बॉटल थी। वो मेरे सामने बैठ गई—बिस्तर पर, क्रॉस लेग्स में। मैं भी बैठ गया—उसके सामने, क्रॉस लेग्स में। बॉटल हमारे बीच में रखी थी। उसने बॉटल खोली। एक बड़ा सा घूँट लिया। जैसे... हिम्मत जुटा रही हो। उसका चेहरा अब सीरियस था—कोई हँसी नहीं, कोई शरारत नहीं। बस... एक गहरी, पुरानी सच्चाई। वो बोली—आवाज़ थोड़ी काँप रही थी— "बेबी... मैं शादी के समय वर्जिन थी... लेकिन..." वो रुकी। एक और घूँट लिया। फिर... एक साँस में बोली— "लेकिन... मेरा बॉडी... यूज़ हुआ था। ओरली... मेरे स्तन... मेरी चूत... दूसरे मर्दों ने छुए थे।" मेरा लुंड... एक झटके से ट्विच कर गया। ये वो रिएक्शन नहीं था जो मुझे अपेक्षित था। मुझे गुस्सा आना चाहिए था... या शॉक... या दुख। लेकिन... मेरा लुंड... और सख्त हो गया। फड़कने लगा। मैं शर्म से जल रहा था... लेकिन उत्तेजना भी बढ़ रही थी। नेहा ने मेरी आँखों में देखा। उसकी आँखें नम थीं। "तुम्हें... बुरा लगा?" मैंने कुछ नहीं कहा। बस... उसकी आँखों में देखता रहा। नेहा ने वो बात कही—"मैं वर्जिन थी... लेकिन मेरा बॉडी यूज़ हुआ था"—और मेरे दिमाग में तुरंत एक तस्वीर बन गई। शादी की पहली रात। होटल का कमरा... डिम लाइट्स... वो लाल साड़ी... उसकी नर्वस स्माइल। मैंने उसे धीरे से अनड्रेस किया था। उसकी चूत... इतनी टाइट... इतनी गर्म... जैसे कभी किसी ने छुआ ही न हो। जब मैंने अंदर डाला... थोड़ा सा खून आया था। वो दर्द से कराही थी... लेकिन आँखों में वो प्यार था। मैंने सोचा था—वो सच में वर्जिन है। फिर... श्रुति याद आई। कॉलेज टाइम की गर्लफ्रेंड। उसकी चूत... पहले टाइट थी... लेकिन मेरे साथ कई बार होने के बाद... लूज़ हो गई थी। कुछ और सीज़न्स भी थे तो... नेहा की टाइटनेस... वो खून... सब मेरे दिमाग में घूम रहा था। उसने सिर उठाया। उसकी आँखें मेरी आँखों में टिकीं—थोड़ी नम, थोड़ी दूर की यादों में खोई हुई। मैंने धीरे से पूछा—आवाज़ में चिंता थी— "कौन था वो? और... सब कुछ कंसेंसुअल था ना? तुम्हें कभी फोर्स नहीं किया गया... राइट?" नेहा ने मेरी चिंता देखी। उसके होंठों पर एक हल्की, थकी हुई मुस्कान आई। वो मेरे गाल पर हाथ फेरा—वही गाल जहाँ उसने थप्पड़ मारा था। "हाँ... सब कंसेंसुअल था। सब कुछ... मेरी मर्ज़ी से। मैं... उससे प्यार करती थी।" "प्यार?" मैंने पूछा—आवाज़ में थोड़ा सा झटका। "हाँ... प्यार।" वो एक पल के लिए रुकी। फिर... बॉटल से एक और घूँट लिया। जैसे हिम्मत जुटा रही हो। "वो... मुझसे बहुत प्यार करता था। इतना प्यार... कि उसने कभी मुझे फक नहीं किया। वो हमेशा मेरे फ्यूचर की फिक्र करता था। मेरे फ्यूचर हसबैंड की... मेरी लाइफ की... मेरे घर की। वो कहता था—'मैं तुम्हें खराब नहीं करना चाहता... तुम्हारा फ्यूचर परफेक्ट होना चाहिए।' इसलिए... वो कभी आगे नहीं बढ़ा। बस... छुआ... किस किया... मेरे स्तन दबाए... उँगली अंदर डाली... लेकिन पूरा सेक्स... कभी नहीं।" मैंने पूछा— "तो... फिर तुमने उससे शादी क्यों नहीं की?" और बीच में ही रुक गया। मुझे लगा... शायद मैं ज़्यादा पूछ रहा हूँ। शायद वो अनकम्फर्टेबल हो जाए। मैंने खुद को रोक लिया। लेकिन नेहा ने सिर उठाया। उसकी आँखें मेरी आँखों में टिकीं। वो धीरे से बोली— "बेबी... तुम सच में जानना चाहते हो?" मैंने सिर हिलाया। "हाँ... जानना चाहता हूँ। पूरा। फ्रॉम द बिगिनिंग।" नेहा ने एक गहरी साँस ली। फिर... बॉटल से एक और घूँट लिया। जैसे... हिम्मत जुटा रही हो। उसने बॉटल साइड में रखी। मेरे सामने क्रॉस लेग्स में बैठ गई। उसकी आँखें अब सीरियस थीं। "तुम्हें यकीन है... ये सुन सकते हो?" मैंने उसके हाथ को पकड़ा। "ऑफ कोर्स... हर किसी ने युवा होने पर एक बार प्यार किया है। मैं... सब सुनना चाहता हूँ।" "बेबी... मैं 19 की थी... 12वीं के बाद। JEE की तैयारी के लिए एक अकादमी जॉइन की थी। सेंटर दूसरे शहर में था—देहरादून। हमारे घर से २ घंटे की दूरी। एक मारुति ओमनी आती थी... रोज़ 5-6 स्टूडेंट्स को पिकअप करने। मैं पहली स्टूडेंट थी... जिसे सबसे पहले उठाया जाता था। और... वहीं... मुझे अपना प्यार मिला।" मैंने बीच में पूछ लिया— "फेलो स्टूडेंट?" नेहा ने सिर हिलाया—नहीं में। उसके चेहरे पर शर्म और मुस्कान दोनों थीं। "नहीं... ड्राइवर।" मैं स्तब्ध रह गया। एक सेकंड के लिए... दिमाग खाली हो गया। फिर... मैंने धीरे से कहा— "ड्राइवर...?" वो मेरे सीने पर सिर टिका दिए। उसकी साँसें मेरी गर्दन पर लग रही थीं। वो बोली—धीरे से, जैसे पुरानी यादों में खो गई हो— "कैसे शुरू हुआ... मैं ठीक-ठीक नहीं बता सकती... लेकिन क्यूरियोसिटी से शुरू हुआ।" वो एक पल के लिए रुकी। फिर... जारी रखा— "मैंने तुम्हें बताया था... मैंने 18 की उम्र में फिंगरिंग शुरू की थी। पोर्न लैपटॉप पर आसानी से मिल जाता था। मेरे पास अपना पीसी था—१२वीं में कंप्यूटर साइंस सब्जेक्ट था... तो पापा ने दिलवा दिया था। रात को... जब सब सो जाते... मैं अकेले में... पोर्न देखती थी। हर रात। फिर... एक दिन मेरी एक फ्रेंड ने कहा—'पोर्न देखते हुए अपनी पुसी से खेलो।' मैंने ट्राई किया। पोर्न स्टार जो कर रही थी... मैंने वैसा ही करने की कोशिश की। कैसे वो कर रही थी... कैसे उँगली डाल रही थी... कैसे रगड़ रही थी... और... कुछ देर बाद... मुझे पहला ऑर्गेज़्म मिला। बहुत... अजीब लगा। बहुत... अच्छा लगा। फिर... रोज़ करने लगी। "मैं... बहुत इंटेलिजेंट लड़की थी... एकेडमिक्स में। तो... किसी को कभी शक नहीं हुआ। लेकिन... मेरी क्यूरियोसिटी... बहुत इमेजिनेटिव हो गई थी। मैं... मर्दों की क्रॉच की तरफ देखती थी... सोचती थी—उसका लुंड कैसा होगा? कॉलेज में टीचर... मार्केट में अनजान आदमी... यहाँ तक कि मेरे करीबी रिश्तेदार भी... सबके बारे में सोचती थी। उनके कपड़ों के नीचे... क्या छुपा है... कैसा लगेगा... कैसा फील होगा..." वो रुकी। एक गहरी साँस ली। फिर... जारी रखा— "फिर... एग्जाम हुए। फिर... कोचिंग शुरू हुई। मैं बहुत बिज़ी हो गई। लेकिन... रात को पोर्न... वो वही रहा। हर रात... देखती थी... उँगली से खेलती थी... ऑर्गेज़्म लेती थी। "रात को पोर्न देखने के बाद... सुबह 7 बजे... पहला चेहरा जो मुझे दिखता था.ड्राइवर वो असल में ड्राइवर नहीं था... उसके पास ट्रैवल एजेंसी थी। लेकिन... इतनी सुबह कोई और ड्राइवर नहीं आता था... तो वो खुद ही स्टूडेंट्स को ड्रॉप करता था। ट्रैकसूट में होता था... और... उसके पैंट में... टेंट लगा हुआ। मैंने कभी किसी मर्द में ऐसा नहीं देखा था। अब... मुझे पता है... इसे 'मॉर्निंग वुड' कहते हैं... तुम लोगों का लुंड... तुमसे पहले जाग जाता है।" वो हँसी—एक छोटी, शरारती हँसी। उसकी हँसी में अब कोई ग्लानि नहीं थी... बस... एक पुरानी याद की मिठास। "एक दिन... मैंने उसे पेशाब करते देखा। पहली बार... मैंने किसी ग्रोनअप मर्द का लुंड रियल में देखा। वो पर्पल हेड... काली स्किन... मैं... इंस्टेंट गीली हो गई। ये... नया फीलिंग थी। उस दिन से... मेरे अंदर कुछ बदल गया। मैं... उसका ध्यान खींचने की कोशिश करने लगी। रोज़... १५-२० मिनट... अकेले में... अगले बच्चे को पिक करने से पहले। कभी-कभी... मैं अपनी यूनिफॉर्म की ऊपरी बटन खोल देती थी... अपनी नई उभरी हुई चेस्ट दिखाने के लिए। उठाकर स्कर्ट थोड़ी ऊपर करती थी... लेकिन... वो कभी कुछ नहीं करता था। हमेशा... स्ट्रेट फेस। न कोई बात... न कोई नज़र। बस... ड्राइव करता रहता था।" रोज़... सबसे पहले मुझे पिक करता था। कार में... सिर्फ़ मैं और वो... 15-20 मिनट। "एक दिन... मैंने कार का गियर पकड़ा। जैसे... मैं कोई लुंड पकड़ रही हूँ। पोर्न में देखा था... कैसे वो औरत हाथ ऊपर-नीचे करती है... मैंने वैसा ही किया। मेरा हाथ... गियर पर... ऊपर-नीचे... धीरे-धीरे... जैसे मसाज कर रही हूँ। पहली बार... वो मुस्कुराया। उसकी वो स्ट्रेट फेस... टूट गई। वो बोला—'क्या कर रही हो बेटी?'" मैंने बीच में पूछ लिया— "बेटी?" नेहा ने उँगली दाँतों में दबा ली। उसके चेहरे पर शर्म थी... बहुत गहरी शर्म। वो मेरी तरफ देखकर बोली—आवाज़ काँप रही थी— "वो... मुझसे बहुत बड़ा था।" "कितना बड़ा?" मैंने पूछा। नेहा ने मेरी आँखों में देखा। उसकी आँखें नम हो गईं। "प्लीज़... जज मत करना... प्लीज़ बेबी।" मैंने उसके हाथ को पकड़ा। उसे किस किया। "नहीं करूँगा... बताओ।" वो एक गहरी साँस ली। फिर... धीरे से बोली— "वो... उस टाइम मेरे पापा जितना बड़ा था... या शायद उससे भी बड़ा।" मैं स्तब्ध रह गया। मेरा दिल एक झटके से धड़का। "उस टाइम... वो बूढ़ा आदमी... मेरे लिए सबसे बेहतर था। मैं... उसकी तरफ बहुत अट्रैक्टेड थी। उसकी वो सादगी... वो इज्ज़त... वो कंट्रोल... सब मुझे पागल कर देता था। एक दिन... उसका हाथ मेरी जांघ पर लगा। जानबूझकर... या गलती से... पता नहीं। लेकिन... स्कर्ट के ऊपर से... मेरी इनर थाइज़ पर। उसकी उँगलियाँ... हल्के से रगड़ रही थीं। मैंने कहा—'अंकल...' वो तुरंत हाथ हटा लिया। 'सॉरी बेटा... गियर बदल रहा था... गलती से हो गया।' मैंने कहा—'इट्स ओके अंकल।' लेकिन... उस रात... मैंने उँगली से खुद को बहुत जोर से किया... सिर्फ़ उसके टच को याद करके। उसकी उँगलियाँ... मेरी जांघ पर... वो गर्माहट... वो दबाव... सब मेरे दिमाग में घूम रहा था। मैं... झड़ी... बहुत जोर से।" वो रुकी। उसकी साँसें थोड़ी तेज़ हो गईं। फिर... जारी रखा— "अगले दिन... जब उसका हाथ फिर गियर पर था... मैंने उसका हाथ पकड़ा। और... धीरे से अपनी जांघ पर रख दिया। वो हाथ हटाने की कोशिश करने लगा... लेकिन मैंने दबाकर रखा। मैंने कहा—'इट्स ओके अंकल... मुझे अच्छा लगता है।' वो... रुक गया। उसका हाथ... वहाँ रहा। धीरे-धीरे... रगड़ने लगा। १० मिनट तक... अगले बच्चे को पिक करने तक। उसकी उँगलियाँ... मेरी स्कर्ट के ऊपर से... इनर थाइज़ पर... हल्के-हल्के दबाव डाल रही थीं। मैं... गीली हो गई थी। बहुत गीली। उसके बाद... हर दिन... यही होता। कार में... अकेले में... वो मुझे छूता था। धीरे-धीरे... और गहराई से। लेकिन... कभी आगे नहीं बढ़ा। हमेशा... रुक जाता था।
02-04-2026, 12:57 AM
Nice cuckold story please update next part
02-04-2026, 03:30 PM
अगला दिन, कार में
मैंने फिर वही टाइट स्कर्ट और शर्ट पहनी—स्कर्ट थोड़ी और छोटी, शर्ट के ऊपरी बटन खुले। मैं जानती थी... अंकल को आज और सरप्राइज मिलेगा। अंकल... वही ड्राइवर लुक में—पजामा और शर्ट। वो कार के पास खड़ा था—मुझे देखकर मुस्कुराया। मैं उसके पास गई। उसे एक नॉटी विंक दी। "गुड मॉर्निंग... अंकल जी।" वो हँसा। "गुड मॉर्निंग... बेटा । हम कार में बैठे। वो स्टार्ट किया। सड़क सुनसान थी। खिड़कियाँ थोड़ी ऊपर। सन्नाटा... सिर्फ़ हम दोनों। कुछ देर बाद... मैंने उसका हाथ पकड़ा। धीरे से अपनी जांघ पर रख दिया। उसने मुस्कुराकर रगड़ना शुरू किया। स्कर्ट के ऊपर से... फिर धीरे से नीचे सरकाया। उसकी उँगलियाँ मेरी नंगी इनर थाइज़ पर। वो गहराई में जा रही थीं... मेरी चूत के बहुत करीब। फिर... उसने महसूस किया। उसकी उँगलियाँ मेरी नंगी स्किन पर... कोई पैंटी नहीं। उसकी आँखें चौड़ी हो गईं। वो मेरी तरफ देखकर मुस्कुराया—एक गहरी, भूखी मुस्कान। "ओह्ह... नेहा... आज... ?" मैंने शरमाते हुए हँसी। पैर थोड़े और फैलाए। "हाँ... अंकल जी... आज... तुम्हारे लिए स्पेशल। अब... और ऊपर... छूओ ना..." उसने हाथ और ऊपर सरकाया। उसकी उँगलियाँ मेरी चूत पर—सीधे नंगी स्किन पर। वो सर्कल बनाने लगा... रगड़ने लगा... हल्का-सा दबाव डालने लगा। मैं सिहर गई। "आह्ह... येस... ऐसे ही..." वो ड्राइव कर रहा था... एक हाथ स्टीयरिंग पर... दूसरा मेरी चूत पर। उसकी उँगलियाँ... मेरी क्लिट पर... मेरी लेबिया पर... खेल रही थीं। मैं कराह रही थी—धीमी, लेकिन गहरी। "आह्ह... अंकल जी... " उसका हाथ... अब और तेज़ हो गया। उसकी उँगली... मेरी चूत के छेद पर... हल्का-सा अंदर। मैं... उसकी उँगलियों की वजह से... धीरे-धीरे... ऑर्गेज़्म की तरफ बढ़ रही थी। ये... बहुत अच्छा लग रहा था। स्कर्ट पहले से ही काफी ऊपर थी। उसकी उँगलियाँ मेरी नंगी स्किन पर रगड़ रही थीं—गरम, नरम, तड़पाने वाला स्पर्श। मैंने पैर और थोड़े फैलाए। उसे और एक्सेस दिया। मेरा हाथ उसकी तरफ बढ़ा। पजामा के ऊपर से... उसके लुंड को पकड़ने की कोशिश की। पहली बार... कार में... उसके लुंड को छुआ। वो सख्त था—बहुत सख्त। मैंने उसे टाइट पकड़ा... हाथ में भर लिया... ऊपर-नीचे हल्का-सा सहलाया। उसकी साँसें तेज़ हो गईं। वो मेरी तरफ देखकर मुस्कुराया—एक गहरी, भूखी मुस्कान। "तुम... बहुत नॉटी हो ।" मैंने उसके कान में फुसफुसाया— "हाँ... अंकल जी... मुझे आपका ये... बहुत पसंद है। कितना गरम है... कितना सख्त है..." अंकल का लुंड मेरे हाथ में था—पजामा के ऊपर से, सख्त, गरम, फड़कता हुआ। मैंने उसे टाइट पकड़ा... ऊपर-नीचे... तेज़ी से जर्क करने लगी। उसकी साँसें तेज़ हो गईं... कराहें निकलने लगीं। उसकी उँगलियाँ मेरी चूत में थीं—एक उँगली... गहराई में... टाइट, गीली, मेरी दीवारों पर कस रही थी। मैं भी कराह रही थी—धीमी, गहरी। "आह्ह... नेहा... तुम... बहुत अच्छा... कर रही हो..." उसका लुंड मेरे हाथ में और सख्त हो गया। वो काँपने लगा। उसने मेरे कान में फुसफुसाया—आवाज़ काँप रही थी— "स्टॉप... स्टॉप... प्लीज़... तुम मेरे पजामा को गंदा कर दोगी..." मैंने मुस्कुराकर उसकी आँखों में देखा। नहीं रुकी। और तेज़... और टाइट... जर्क करती रही। उसकी उँगलियाँ मेरी चूत में और गहरा जा रही थीं। मैं... उसकी उँगलियों की वजह से... ऑर्गेज़्म की कगार पर थी। फिर... वो झड़ गया। जोर से... पजामा के अंदर। गाढ़ा, गरम रस... पजामा पर बड़ा सा पैच... साफ़ नज़र आ रहा था। वो काँप रहा था... सिहर रहा था। और उसी पल... मैं भी झड़ गई। उसकी उँगली की वजह से... जोर से... एक लाउड मोअन के साथ। "आआह्ह्ह... ... येस...!" मैंने उसकी तरफ देखा। उसका पजामा पर वो बड़ा पैच... गीला, चिपचिपा। मैंने हँसकर कहा— "देखो... कितना गंदा कर दिया... अंकल जी। वो पूरे दिन कार से बाहर नहीं निकला। जैकेट से छुपाता रहा—कभी घुटनों पर रखकर... कभी सीट पर लपेटकर। मैं हँस-हँसकर मर रही थी। "देखो... कितना बड़ा पैच... ड्राइवर जी... आज तो तुम्हें कार से उतरना ही नहीं है!" वो शर्म से लाल हो गया। लेकिन उसकी आँखें... खुशी से चमक रही थीं। अगली सुबह। मैंने फिर वही टाइट स्कर्ट और शर्ट पहनी। आज भी पैंटी नहीं। जानबूझकर। वो... शर्ट में—लेकिन इस बार... पैंट पहनी थी। ज़िप वाली। वो तैयार था। मैं कार में बैठी। उसे विंक दी। "गुड मॉर्निंग... " कार चली। सन्नाटा। कुछ देर बाद... मैंने उसका हाथ पकड़ा। धीरे से अपनी जांघ पर रख दिया। उसने मुस्कुराकर रगड़ना शुरू किया। स्कर्ट के ऊपर से... फिर नीचे सरकाया। उसकी उँगलियाँ मेरी नंगी इनर थाइज़ पर। वो गहराई में जा रही थीं... मेरी चूत के बहुत करीब। फिर... उसने महसूस किया। कोई पैंटी नहीं। वो मुस्कुराया—भूखी मुस्कान। उसने हाथ और ऊपर सरकाया। उसकी उँगलियाँ मेरी चूत पर—नंगी स्किन पर। सर्कल... रगड़... हल्का-सा दबाव। मैं सिहर गई। "आह्ह... येस... ऐसे ही..." मेरा हाथ उसकी तरफ बढ़ा। इस बार... पैंट की ज़िप पर। मैंने ज़िप नीचे की। उसका लुंड बाहर आया—सख्त, गरम, फड़कता हुआ। मैंने उसे टाइट पकड़ा। ऊपर-नीचे... सहलाने लगा। वो कराहा— उसकी उँगलियाँ मेरी चूत में थीं—अब दो उँगलियाँ... गहराई में... टाइट, गीली। वो धीरे से अंदर-बाहर कर रहा था। मैं... उसकी उँगलियों की वजह से... कराह रही थी। अंकल का लुंड मेरे हाथ में था—पहली बार.... नंगा। पजामा की ज़िप नीचे की थी... और वो सख्त, गरम, फड़कता हुआ मेरी उँगलियों में था। मेरी उँगलियाँ... नरम, ठंडी... उसकी गर्माहट महसूस कर रही थीं। उसकी स्किन... बहुत गरम... बहुत स्मूद। सारे वेंस... साफ़ नज़र आ रहे थे—उभरे हुए, नीले-नीले। हेड... पर्पल, चमकता हुआ... प्रीकम से गीला। मैंने उसे देखा। अमेज़मेंट से... थोड़ी सी शर्म से... बहुत सारी चाहत से। पहली बार... इतने करीब... इतने नंगे... दिन की रोशनी में। मैंने धीरे से... ऊपर-नीचे... सहलाना शुरू किया। उसकी साँसें तेज़ हो गईं। वो कराहा—धीमी, गहरी। मैंने मुस्कुराकर उसकी आँखों में देखा। मेरी उँगलियाँ... अब और टाइट... और तेज़। उसके लुंड को... ऊपर-नीचे... हल्का-सा दबाव... फिर और तेज़। उसकी वेंस... मेरी उँगलियों पर महसूस हो रही थीं। उसका हेड... मेरी हथेली में... गीला, गरम। उसकी उँगलियाँ मेरी चूत में थीं—दो उँगलियाँ... गहराई में... टाइट, गीली। वो धीरे से अंदर-बाहर कर रहा था। मैं... उसकी उँगलियों की वजह से... कराह रही थी। "आह्ह.... तुम्हारी उँगलियाँ... बहुत अच्छी लग रही हैं..." मैं कराह रही थी—धीमी, लेकिन गहरी। वो काँप रहा था। उसकी साँसें बहुत तेज़ हो गईं। फिर... अचानक उसने कहा—आवाज़ में पहली बार वो कमांड वाली टोन। एक ऑर्डर। "नेहा... फास्ट करो... और...अपना हाथ ऊपर-नीचे... तेज़... बहुत तेज़..." मैंने उसकी आँखों में देखा। उसकी आँखें भूख से जल रही थीं। मैंने मुस्कुराकर सिर हिलाया। उसके लुंड को और टाइट पकड़ा। ऊपर-नीचे... बहुत तेज़... बहुत फास्ट। उसकी वेंस मेरी उँगलियों पर महसूस हो रही थीं। उसका हेड... मेरी हथेली में... गीला, गरम। वो फिर बोला—आवाज़ में और सख्ती— "और... इस बार... गंदा मत करना... जैसे कल हुआ था... अपना हाथ में ले लो... सब... मेरे हाथ में..." मैंने हँसकर कहा— "जी... अंकल जी... जैसा आप कहें।" मैंने अपना हाथ और तेज़ किया। ऊपर-नीचे... टाइट ग्रिप... बहुत फास्ट। उसकी उँगलियाँ मेरी चूत में और तेज़ हो गईं। हम... दोनों... एक-दूसरे को तेज़ी से... महसूस कर रहे थे। फिर... वो झड़ गया। जोर से... मेरे हाथ में। गाढ़ा, गरम रस... मेरी हथेली में... उँगलियों पर... भर गया। मैंने उसे टाइट पकड़ा... सब बाहर निकाला। कोई गंदगी नहीं... सब मेरे हाथ में। और उसी पल... मैं भी झड़ गई। उसकी उँगलियों की वजह से... जोर से... एक लाउड मोअन के साथ। "आआह्ह्ह.. येस...!" अंकल का रस मेरे हाथ में था—गाढ़ा, गरम, सफेद। मेरी उँगलियाँ... उसकी हथेली... सब भर गया था। मैंने हाथ ऊपर उठाया। उसे देखा—करिब से। वो चमक रहा था... ताज़ा... उसकी खुशबू... नमकीन, मस्की, बहुत इंटेंस। मैंने धीरे से... हाथ नाक के पास ले जाकर सूंघा। ताज़ा... गर्म... उसकी खुशबू मेरे नाक में घुस गई। मैंने मुस्कुराकर सैम की तरफ देखा। उसकी आँखें चौड़ी थीं—शर्म, एक्साइटमेंट, और थोड़ी सी हैरानी। "देखो... कितना गरम है... " मैंने हल्के से कहा। फिर... कार के डैशबोर्ड में रखी बोतल उठाई। वो पानी की बोतल थी। ढक्कन खोला। उसके सामने... अपना हाथ धोया। पानी से... धीरे-धीरे... सब साफ़ कर दिया। उसका रस... मेरी उँगलियों से... धुल गया। फिर... मैंने हाथ झटका। उसे देखकर मुस्कुराई—एक गहरी, सेक्सी मुस्कान। "अब... क्लीन हो गया... अंकल जी। अंकल शर्म से लाल हो गया। कार घर की तरफ चल रही थी। सड़कें अब भी सुनसान थीं। वो जैकेट से छुपा रहा था—शर्म से, लेकिन उसकी आँखें... अभी भी चमक रही थीं। वो अचानक बोला—आवाज़ थोड़ी काँप रही थी, भावुक। "नेहा... तुमने मुझे इतने दिनों बाद... इतनी खुशी दी है। बहुत दिनों बाद... ऐसा लगा... जैसे सब कुछ... फिर से जिंदा हो गया।" मैंने उसकी तरफ देखा। उसकी आँखें नम थीं। वो इमोशनल था—बहुत। उसने मेरे हाथ को पकड़ा। धीरे से बोला— "लेकिन... बेटा... हमें ये रिस्क नहीं लेना चाहिए। कार में... ओपन में... अगर किसी ने देख लिया... हमारी रेपुटेशन... सब बर्बाद हो जाएगा। हम... दोनों के लिए... ये बहुत बड़ा रिस्क है।" मैंने मुस्कुराकर उसकी आँखों में देखा। उसके हाथ को दबाया। "इट्स ओके... ।" वो चुप रहा। उसकी आँखें अभी भी नम थीं। फिर... कार पार्क की। घर पहुँचने से पहले... "कल... हम थोड़ा पहले निकलेंगे। 15 मिनट पहले। मैंने उसे विंक दी। उसका दिल एक बीट के लिए रुक गया—मैंने महसूस किया। वो मेरी तरफ देख रहा था—शर्म, एक्साइटमेंट, और थोड़ा डर। "कल... क्या होने वाला है...?" घर लौटकर शावर लिया। इयरफोन लगाए। पोर्न खोला। बहुत एक्साइटेड थी। मैं... कुछ नया सीखना चाहती थी। कुछ ऐसा... जो कल उसे और पागल कर दे। कुछ ऐसा... जो कल और गहरा... और इंटेंस हो। XXXXX सुबह ठीक 6:45। मैंने आज भी वही टाइट स्कर्ट और शर्ट पहनी—स्कर्ट थोड़ी और छोटी, शर्ट के ऊपरी बटन खुले। पैंटी नहीं। जानबूझकर। मैं जानती थी... आज 15 मिनट एक्स्ट्रा हैं। कल रात... पोर्न देखते हुए... मैंने कुछ प्लान किया था। मैं कार के पास पहुँची। पहले से ही वहाँ था—१५ मिनट पहले। पजामा और शर्ट में, लेकिन आज... अंदर पैंट थी—ज़िप वाली। वो मुझे देखकर मुस्कुराया—उत्सुक, थोड़ा नर्वस, लेकिन बहुत एक्साइटेड। "गुड मॉर्निंग... आज जल्दी आ गए?" वो हँसा। मैं कार में बैठी। उसे एक गहरी, नॉटी स्माइल दी। कार चली। कार अब वही सुनसान रोड पर थी। अंकल ने स्टीयरिंग पर हाथ रखे रखे कहा—आवाज़ में थोड़ी हिचकिचाहट, थोड़ी उत्सुकता। "नेहा... वहाँ एक कंस्ट्रक्शन साइट है... बहुत सुनसान... कोई नहीं होगा। हम... वहाँ रुक सकते हैं।" मैंने उसकी तरफ देखा। उसकी आँखें आगे सड़क पर थीं, लेकिन उसका चेहरा... थोड़ा लाल था। वो नहीं जानता था... मैं क्या प्लान कर रही हूँ। मैंने मुस्कुराकर सिर हिलाया। "ओके... चलो वहाँ रुकते हैं।" उसने कार मोड़ी। कंस्ट्रक्शन साइट की तरफ। कार को गेट के अंदर ले लिया। चारों तरफ दीवारें... अधबनी इमारत... धूल... और सन्नाटा। कोई नहीं। वो कार रोककर स्टीयरिंग पर हाथ रखे बैठा रहा। उसकी साँसें तेज़ थीं। मैं भी थोड़ी घबरा गई थी—दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। ये जगह... सच में सुनसान थी। कोई नहीं दिख रहा था। मैंने गेट की तरफ देखा। फिर... कार से उतरी। धीरे से गेट बंद किया। चारों तरफ देखा—कोई नहीं। सिर्फ़ हवा... और दूर से कोई कुत्ते की भौंकने की आवाज़। मैंने अंकल की तरफ देखा। उसे एक छोटी-सी स्माइल दी। वो कार से उतरा। उसकी पैंट में टेंट साफ़ नज़र आ रहा था—सख्त, उभरा हुआ। वो मेरी तरफ देख रहा था—आँखें भूख से जल रही थीं, लेकिन थोड़ा डर भी था। मैंने दीवार की तरफ पीठ करके खड़ी हो गई। स्कर्ट थोड़ी ऊपर सरकाई। पैर थोड़े फैलाए। उसे एक गहरी, नॉटी विंक दी। वो जैसे जादू में चला आया। उसकी आँखें मेरी आँखों में टिकी हुईं थीं। वो मेरे बहुत करीब आया। उसकी साँसें मेरे चेहरे पर लग रही थीं। मैंने उसके हाथ पकड़े। मेरे बहुत करीब था। उसकी साँसें मेरे चेहरे पर लग रही थीं—गरम, तेज़, थोड़ी काँपती हुईं। उसकी आँखें मेरी आँखों में टिकी हुई थीं—उत्सुक, थोड़ा डरा हुआ, लेकिन बहुत चाहत भरी। मैंने धीरे से उसके सिर को हाथों में लिया। उसके बालों में उँगलियाँ फेरीं। उसके चेहरे को और करीब खींचा। हमारे होंठ... बस कुछ इंच दूर। "अंकल..." मैंने फुसफुसाया। उसकी आँखें बंद होने लगीं। मैंने अपना सिर थोड़ा झुकाया। हमारे होंठ मिले। पहला किस... बहुत धीमा... बहुत नरम। उसने पहले रिस्पॉन्स नहीं किया। वो... अभी भी हैरान था। इतने सालों बाद... ऐसा। मैंने धीरे से अपने होंठ उसके होंठों पर दबाए। उसकी साँसें और तेज़ हो गईं। फिर... उसने भी जवाब दिया। धीरे से... लेकिन गहरा। मैंने अपने होंठों से उसके होंठों को अलग किया। फिर... धीरे से... जीभ से उसके होंठों को पार किया। मेरी जीभ... उसके मुँह में... बहुत धीरे। उसने भी अपनी जीभ मिलाई। स्वीट... स्वीट टेस्ट। उसकी जीभ... मेरी जीभ से खेल रही थी। हम... दीवार के पास... एक-दूसरे को किस करते रहे। बहुत लंबा... बहुत गहरा। ये... मेरा भी पहला... किसी के साथ। मैं... उसके बालों में उँगलियाँ फेर रही थी। उसके होंठ... मेरे होंठों से चिपके हुए। उसकी जीभ... मेरी जीभ में... स्वीट, गरम। मैंने उसके होंठों को चूसा... हल्का-सा काटा... फिर चूसा। मेरे मुँह में... सुबह की मिंट की ताज़गी थी—टूथपेस्ट का वो स्वीट, कूल टेस्ट। उसके मुँह में... थोड़ा सा तंबाकू था... कल रात की बीड़ी का... और सुबह का वो हल्का सा स्वाद। मुझे पता था... वो थोड़ा शर्मिंदा था—शायद सोच रहा था कि मैं महसूस कर रही हूँ। लेकिन... मैंने एक सेकंड के लिए भी नहीं रुकने दिया। नहीं हिचकिचाई। नहीं पीछे हटी। मैं... उसे चाहती थी। बहुत ज़्यादा। सोसाइटी के सारे नियम... सारे डर... सब पीछे छूट गए थे। बस... वो थ्रिल... वो चाहत... वो प्यार। उसके स्वाद में... वो तंबाकू... वो बीड़ी का हल्का सा कड़वाहट... लेकिन वो सब... मुझे और एक्साइट कर रहा था। उसका स्वाद... उसकी साँसें... सब कुछ... बहुत रियल था। बहुत इंटेंस। मेरा हाथ... धीरे से नीचे गया। उसकी पैंट पर। उसका टेंट... साफ़ महसूस हो रहा था—सख्त, उभरा हुआ। मैंने हल्का-सा दबाया। उसकी साँसें रुक गईं। फिर... मैंने ज़िप पकड़ी। धीरे से नीचे की। उसका लुंड बाहर आया—गरम, सख्त, फड़कता हुआ। मैंने उसे हाथ में लिया। नरम... लेकिन सख्त। उसकी स्किन... मेरी उँगलियों में। मैंने धीरे से... ऊपर-नीचे... सहलाना शुरू किया। उसके हाथ... मेरी शर्ट के बटन पर थे। एक-एक करके... खोलने लगा। मेरी शर्ट खुल गई। अंकल ने किस तोड़ा। उसकी साँसें मेरे चेहरे पर लग रही थीं—गरम, तेज़। उसने मेरी आँखों में देखा। उसकी आँखें... बहुत गहरी थीं—चाहत, थोड़ा डर, थोड़ा सपना सा। वो धीरे से नीचे झुका। उसके होंठ मेरे स्तनों के पास आए। वो मेरी शर्ट पूरी तरह खोल चुका था। मेरे स्तन बाहर—नरम, छोटे, पिंक निप्पल्स... अभी भी सख्त। वो रुका। उसने मेरी आँखों में देखा। फिर... मेरे कान में फुसफुसाया—आवाज़ बहुत धीमी, बहुत प्यार भरी। "क्या मैं... इन्हें टेस्ट कर सकता हूँ?" मैंने मुस्कुराकर कहा— "ये सब... तुम्हारे हैं।" वो मेरे सामने आ गया। उसने दोनों स्तनों को नीचे से कप किया। हथेलियाँ गरम... नरम। उसने धीरे से... एक निप्पल को मुँह में लिया। उसकी जीभ... मेरे निप्पल पर... हल्का-सा चक्र बनाया। फिर... चूसा। धीरे से... फिर और गहरा। मैं... सिहर गई। "आआह्ह..." ये... मेरा भी पहला था। किसी ने... मेरे स्तनों को चूसा नहीं था। किसी के साथ। मैंने उसके सिर को पकड़ा। उसके बालों में उँगलियाँ फेरीं। उसे और करीब खींचा। "आह्ह...... येस... ऐसे ही..." वो दूसरे स्तन पर गया। उसी तरह... जीभ से खेला... चूसा... हल्का-सा काटा। मैं... कराह रही थी—धीमी, लेकिन गहरी। मेरी चूत... और गीली हो गई। मेरा शरीर... काँप रहा था। वो ऊपर आया। मेरी आँखों में देखा। उसके होंठ... मेरे स्तनों की खुशबू से भरे हुए। "नेहा... तुम... बहुत स्वीट हो। तुम्हारे स्तन... इतने नरम... इतने परफेक्ट..." फिर... अचानक... वो रुक गया। उसने खुद को पीछे खींचा। उसकी साँसें तेज़ थीं। उसकी आँखें... डर से भरी हुईं। वो मेरी तरफ देखकर बोला—आवाज़ काँप रही थी— "हम... ये नहीं करना चाहिए... ये गलत है... बहुत रिस्की है।" मैं... दीवार पर पीठ टिकाए खड़ी थी। मेरे निप्पल्स... अभी भी उसके लार से गीले थे। मैंने आँखें आधी बंद कर लीं। उसके शब्द सुनकर... एक पल के लिए... सब रुक गया। हाँ... वो सही कह रहा था। ये जगह... ओपन थी। अगर कोई देख ले... हमारी रेपुटेशन... सब खत्म हो सकता था। मैंने भी... एक पल के लिए... सोचा। शायद... ये बहुत बड़ा रिस्क था। मैंने धीरे से कहा—आवाज़ में थोड़ी समझदारी... थोड़ा दुख। "इट्स ओके... । मैं समझती हूँ। हम... रिस्क नहीं लेंगे।" शर्ट के बटन बंद किए। धीरे-धीरे... सब ठीक किया। वो भी... पैंट की ज़िप ऊपर की। हम दोनों... एक-दूसरे की तरफ देखते रहे। एक पल का सन्नाटा। फिर... सैम दीवार की तरफ गया। उसने पैंट की ज़िप नीचे की। लुंड बाहर निकाला। और... पेशाब करने लगा। मैंने देखा। एक शरारती हँसी आई। मैं धीरे से उसके पास गई। उसके पीछे खड़ी हो गई। फिर... धीरे से... अपना हाथ आगे बढ़ाया। उसके लुंड को पकड़ लिया। वो पेशाब कर रहा था... और मेरा हाथ... उस पर। वो चौंक गया। "नेहा...?" मैंने हँसकर कहा— "तो... ऐसे करते हो तुम लोग?" मैंने उसे टाइट पकड़ा। उसके लुंड को... हल्का-सा हिलाया। उसका पेशाब... दीवार पर... "N" बना रहा था। जैसे कोई पिचकारी। वो हँस पड़ा—शर्म से... और मज़े से। "तुम... पागल हो।"
02-04-2026, 03:34 PM
नेहा मेरे सीने पर सिर टिकाए लेटी थी।
उसकी आवाज़ धीमी थी... लेकिन हर शब्द मेरे दिमाग में चाकू की तरह घुस रहा था। वो बता रही थी... कैसे उसने बूढ़ा आदमी के लुंड को पकड़ा... कैसे हिलाया... कैसे आखिरी बूँदें दीवार पर गिराईं... कैसे उसका हाथ गीला हो गया...। मेरा दिमाग... मान नहीं पा रहा था। ये... नेहा? मेरी नेहा? जो घर में इतनी साफ-सुथरी... इतनी घरेलू... इतनी "ऑर्थोडॉक्स" लगती है... वो इतनी गंदी... इतनी मेस्सी... इतनी बेबाक हो सकती है? उसने कभी... मेरे साथ ऐसा नहीं किया। कभी मेरे लुंड को पेशाब करते हुए नहीं पकड़ा। लेकिन... आज... वो सब बता रही है। और... मैं... पागल हो रहा हूँ। मेरा लुंड... रॉक हार्ड हो चुका था। शॉर्ट्स में... दर्द करने लगा। फड़क रहा था... जैसे बाहर निकलने को बेताब हो। मैं... उसकी बातें सुनकर... और ज्यादा एक्साइटेड हो रहा था। उसकी वो शरारती आवाज़... वो पुरानी यादों वाली मुस्कान... वो गंदी डिटेल्स... सब कुछ... मुझे पागल कर रहा था। अचानक... सवाल मुँह से निकल गया—वो सवाल जो शुरुआत से दिमाग में घूम रहा था। "नेहा... वो... उसका... मुझसे बड़ा था?" वो एक पल के लिए रुक गई। उसकी उँगलियाँ मेरे लुंड पर रुक गईं। वो मेरी तरफ मुड़ी। उसकी आँखें मेरी आँखों में टिकीं। फिर... वो धीरे से मुस्कुराई—एक प्यारी, समझदार मुस्कान। "बेबी... ये कैसा सवाल है?" उसकी आवाज़ में हल्की हिचकिचाहट थी। वो जानती थी... मैं ये सवाल पूछूँगा। वो जानती थी... ये सवाल मेरे मन में कितनी देर से घूम रहा है। वो नहीं चाहती थी... मुझे हर्ट करना। लेकिन... मैं... रोक नहीं पाया। "बताओ... मैं जानना चाहता हूँ। सब कुछ जानना चाहता हूँ। प्लीज़... सच बताओ।" वो मेरी आँखों में देखती रही। एक लंबा पल। फिर... धीरे से बोली—आवाज़ में बहुत प्यार... बहुत समझ। "हाँ... वो बड़ा था। मैसिव। तुम जानते हो... पहाड़ी इलाके में... बहुत फिजिकल लेबर करना पड़ता है। ट्रैवल एजेंसी... सुबह जल्दी उठना... भारी सामान उठाना... लंबी ड्राइविंग... सब कुछ। उसका बदन... बहुत स्ट्रॉन्ग था। और... वो... दिखता था।" वो रुकी। उसने मेरे गाल पर हाथ फेरा। उसकी उँगलियाँ मेरे होंठों पर। "लेकिन बेबी... ये तुम्हारी गलती नहीं है। तुम... मेरे लिए परफेक्ट हो। उसकी आवाज़ में... वो पिटी थी। वो पिटी... जो मैंने पहले भी सुनी थी। पिछले रिलेशनशिप्स में... कई बार। जब लड़कियाँ... मेरे साइज़ के बारे में बात करती थीं... या तुलना करती थीं... वो पिटी वाली टोन। "तुम अच्छे हो... साइज़ मैटर नहीं करता..." ये शब्द... दिल को चीर देते थे। मुझे पता था... वो मुझे हर्ट नहीं करना चाहती। वो... सच में कोशिश कर रही थी... मुझे कंसोल करने की। लेकिन... वो पिटी... वो समझ... वो "तुम्हारी गलती नहीं है" वाली फीलिंग... सब कुछ... मुझे अंदर से हर्ट कर रहा था। मैंने चेहरा नहीं बदला। मुस्कुराने की कोशिश की। आँखें बंद नहीं कीं। उसे देखता रहा। लेकिन... अंदर... कुछ टूट रहा था। थोड़ा सा... लेकिन बहुत गहरा। उसकी उँगलियाँ अब मेरे बालों में धीरे-धीरे खेल रही थीं। उसकी आवाज़ फिर से शुरू हुई—धीमी, लेकिन साफ़... जैसे वो सब कुछ फिर से जी रही हो। "उस घटना के बाद... हम बहुत सावधान हो गए। अंकल ने सख्ती से कहा—'ये सब खत्म।' वो बहुत गुस्से में था... खुद पर... और थोड़ा मुझ पर भी। कहा—'ये गलत है... हम दोनों के लिए बहुत बड़ा रिस्क है। मेरा परिवार... तुम्हारा परिवार... हमारा समाज... सब कुछ बर्बाद हो सकता है।' मैं... बहुत हर्ट हुई थी। बहुत रोई थी। रात को... अकेले में... बहुत रोई। लेकिन... मैं समझ गई थी... इस रिलेशनशिप का कोई फ्यूचर नहीं है। कभी नहीं था। तो... मैंने भी... उसे मान लिया।" वो रुकी। उसकी साँसें थोड़ी भारी हो गईं। फिर... जारी रखा— "मैंने अपनी बेस्ट फ्रेंड से बात की। डिटेल्स में नहीं... बस आइडिया। कहा—'मुझे एक लड़का पसंद है... और... वो बड़ा है।' वो बहुत गुस्सा हो गई। मुझे डाँटा... जैसे कोई बड़ी बहन डाँटती है। कहा—'पागल हो गई हो? तुम्हारी उम्र में... ऐसे रिस्क मत लो। तुम्हारा फ्यूचर... तुम्हारी पढ़ाई... तुम्हारी जिंदगी... सब बर्बाद हो जाएगा। उसकी बातें... मेरे दिमाग को थोड़ा क्लियर कर गईं। मैंने सोचा... शायद वो सही है। तो... मैंने भी दूरी बना ली। धीरे-धीरे... बातें कम हुईं। फिर... बिल्कुल बंद हो गईं। और... वो सब... खत्म हो गया।" लेकिन... मैं... पूरी तरह खत्म नहीं कर पाई। कभी-कभी... कार में... मैं उसके लुंड को पजामा के ऊपर से छू लेती थी। मज़ाक में... शरारत में। वो मुस्कुराता था... लेकिन रुकने को कहता था। कभी... वो पेशाब करते हुए... मैं उसे देखती रहती थी। उसकी आँखें... मेरी तरफ आतीं... और वो... शायद जानबूझकर... थोड़ा सा दिखाता था। लेकिन... कभी आगे नहीं बढ़ा। वो जानता था... ये छोटा शहर है। एक छोटी सी अफवाह... जंगल की आग की तरह फैल जाती है। हमारे लिए... बहुत बड़ा खतरा था। तो... वो हमेशा रुक जाता था। और... मैं भी... मजबूरन रुक जाती थी।" मैंने एक पल के लिए रुककर सैम की आँखों में देखा। उसकी आँखें... बहुत गहरी थीं। वो सुन रहा था... बहुत ध्यान से। मैंने उसके लुंड को थोड़ा और टाइट पकड़ा। धीरे से सहलाया। "फिर... मेरे एग्जाम हुए। मैंने अच्छा किया। सिलेक्शन हो गया। कॉलेज शहर में शिफ्ट हो गया—बहुत दूर। अंकल अब नहीं आता था। कार पूल खत्म हो गया। 6 महीने बीत गए। मैंने नए दोस्त बनाए। नए लड़के... नए ग्रुप... नई ज़िंदगी। लेकिन... किसी भी लड़के में... वो आकर्षण नहीं था। कोई भी... वैसा नहीं था। जैसे अंकल था। उसकी वो इज्ज़त... वो कंट्रोल... वो प्यार... वो सब... मेरे दिमाग में रह गया। कॉलेज के लड़के... बहुत फास्ट थे... बहुत जल्दी आगे बढ़ना चाहते थे। मुझे... वो अच्छा नहीं लगता था। छुट्टियाँ खत्म हो रही थीं। मैं घर में बैग पैक कर रही थी। पापा ने कैब बुक की थी—कॉलेज तक का सफर लंबा था, 5-6 घंटे। मैंने सोचा... कोई लोकल ड्राइवर होगा। बैग उठाया... बाहर निकली। गेट पर कैब खड़ी थी। ड्राइवर की तरफ देखा... और दिल एक झटके से धड़क गया। अंकल। 8-9 महीने बाद... पहली बार। वो वही था—वही चेहरा... वही आँखें... वही मुस्कान जो कभी मेरी साँसें रोक देती थी। वो मुझे देखकर रुक गया। उसकी आँखें भी चौड़ी हो गईं। एक पल... हम दोनों बस एक-दूसरे को देखते रहे। मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़ पहले आधे घंटे... पूरी खामोशी। शहर की सीमा पार हो गई थी। घर की गलियाँ... बाज़ार... लोग... सब पीछे छूट गए थे। अब सिर्फ़ हाईवे था... पेड़... और दूर-दूर तक फैली खामोशी। मैं पिछली सीट पर बैठी थी। शर्ट के बटन... एक खुले। ड्राइव कर रहा था। रियर व्यू मिरर में उसकी आँखें बार-बार मुझ पर टिक रही थीं। वो देख रहा था—मेरी आँखें... मेरी स्माइल मैं मुस्कुरा रही थी। बहुत हल्की... बहुत जानबूझकर। मैं जानती थी... वो क्या चाहता है। मैं भी... जानती थी... मैं क्या चाहती हूँ। लेकिन... साथ ही... ये गलत था। मैंने इसे भुला दिया था। 7-8 महीने में... मैंने खुद को बहुत संभाल लिया था। नई ज़िंदगी... नए दोस्त... नई पढ़ाई... सब अच्छा चल रहा था। फिर से... ये सब शुरू करना... सब बर्बाद कर सकता था। फिर... उसने सन्नाटा तोड़ा। आवाज़ में वो पुरानी वाली गर्माहट... और थोड़ा सा डर। "कैसी हो?" मैंने हल्के से मुस्कुराकर जवाब दिया— "गुड।" वो रियर व्यू में मुझे देखता रहा। फिर... मिरर को थोड़ा एडजस्ट किया। अब... उसकी नज़र... मेरी चेस्ट पर थी। शर्ट के खुले बटन से... मेरी चेस्ट की हल्की झलक। वो बोला—आवाज़ में वो पुरानी वाली चाहत— "तुम... बहुत अच्छी लग रही हो... डेवलप हो गई हो।" मैंने नोटिस किया। मिरर का एंगल... जानबूझकर बदला हुआ था। वो मेरी चेस्ट देख रहा था। मैंने मुस्कुराई। पहली बार... वो खुद इनिशिएट कर रहा था। शायद... शहर पीछे छूट गया था। शायद... अब वो सोच रहा था... ये उसकी आखिरी चांस है। शायद... अब वो डर कम था। या... शायद... वो भी... उतना ही चाहता था... जितना मैं चाहती थी। मैं पिछली सीट पर बैठी रही—स्कर्ट थोड़ी ऊपर, लेकिन पैर बंद। मैंने जानबूझकर कोई रिस्पॉन्स नहीं दिया। न मुस्कुराई... न बात की... न आँख मिलाई। शायद... मैं खुद को समझा रही थी। "ये गलत है... अब नहीं... अब सब ठीक चल रहा है... मत करो कोई सिली बिज़नेस।" मैंने सोचा... अगर मैं इग्नोर करूँगी... तो वो भी कुछ नहीं बोलेगा। रियर व्यू मिरर में मुझे देखता रहा। उसकी आँखें... मेरी आँखों से मिलती रहीं... लेकिन मैंने नज़रें फेर लीं। वो समझ गया था... मैं इंटरेस्ट नहीं दिखा रही। न चिटचैट... न फ्लर्ट... न कुछ। फिर... उसने कार साइड में रोकी। एक सुनसान जगह... हाईवे के किनारे... कोई नहीं। वो बाहर निकला। कार के कोने में खड़ा हो गया। ज़िप नीचे की। लुंड बाहर निकाला। पेशाब करने लगा। पूरी तरह ओपन... मेरी तरफ। वो जानता था... मैं देख रही हूँ। रियर व्यू से... या सीधे खिड़की से। ये... उसका आखिरी मास्टर स्ट्रोक था। एक आखिरी कोशिश... मुझे तड़पाने की... मुझे याद दिलाने की... कि वो अभी भी वही है। मैंने देखा। उसका लुंड... बड़ा... सख्त... पेशाब करते हुए भी थोड़ा उभरा हुआ। मेरी चूत... फिर से गीली हो गई। बहुत गीली। मैंने मुस्कुरा दिया—हल्का सा... लेकिन जानबूझकर। वो पेशाब खत्म करके हाथ धोया। बीड़ी सुलगाई। एक कश लिया। फिर... वापस ड्राइवर सीट पर आया। और... सरप्राइज। मैं... पहले से ही फ्रंट सीट पर थी। पैसेंजर सीट पर... उसके बगल में। उसका चेहरा... खुशी से चमक उठा। उसकी आँखें... चमक रही थीं। वो समझ गया... मैं तैयार हूँ। वो रुका नहीं। झुका... मेरी तरफ। उसके होंठ मेरे होंठों के पास आए। मैंने विरोध नहीं किया। हमारे होंठ मिले। पहला किस... बहुत धीमा... बहुत नरम। फिर... गहरा। बहुत लंबा... बहुत इंटेंस। उसकी जीभ मेरी जीभ से मिली। उसका स्वाद... बीड़ी का हल्का कड़वाहट... लेकिन वो सब... मुझे और पागल कर रहा था। मैंने उसके गले में हाथ डाल दिया। उसे और करीब खींचा। हम... कुछ देर तक... ऐसे ही रहे। किस करते हुए... एक-दूसरे के शरीर को महसूस करते हुए। उसके हाथ मेरी चेस्ट पर थे—धीरे से मसलते हुए... मेरे निप्पल्स को उँगलियों से छूते हुए। मैंने अपनी जीभ उसके मुँह में और गहराई से डाली। उसकी जीभ मेरी जीभ से खेल रही थी। स्वीट... गरम... बहुत इंटेंस। उसका एक हाथ मेरी मेरी जींस पर। उसने मेरी पुसी को जींस के ऊपर से रगड़ा। हल्का-सा दबाव... सर्कल... फिर और दबाव। मैं सिहर रही थी... कराह रही थी उसके मुँह में। मेरा हाथ... उसकी पैंट की ज़िप पर। नीचे की। उसका लुंड बाहर आया—सख्त... गरम... फड़कता हुआ। मैंने उसे पकड़ा। उसकी स्किन... मेरी उँगलियों में। ऊपर-नीचे... धीरे से... फिर तेज़। सब कुछ... पैशन में। बिना एक शब्द... बिना प्लानिंग... बस... वो पल... वो चाहत। तभी... एक लंबा ट्रक का हॉर्न बजा। बहुत तेज़... बहुत करीब। ट्रक पास से गुज़रा। मैंने महसूस किया... वो ड्राइवर हमें देख रहा था। हम... गले लगे हुए... किस करते हुए... उसकी उँगलियाँ मेरी जींस पर... मेरा हाथ उसके लुंड पर। ट्रक ड्राइवर ने हॉर्न मारा—शायद एक्साइटमेंट में... शायद मज़ाक में। हम... झटके से अलग हुए। किस टूटा। हम दोनों... एक-दूसरे की तरफ देखते रहे। साँसें तेज़। चेहरा लाल। फिर... मैंने हल्के से हँसकर कहा— "तुमने... पेशाब के बाद... हिलाया नहीं... देखो... आखिरी बूँद... मेरे हाथ में लग गई... सब गंदा हो गया।" वो मेरी तरफ देखा। फिर... हँस पड़ा। एक गहरी, थकी हुई, लेकिन खुश हँसी। "तुम... कभी नहीं बदलती.. " मैंने उसके गाल पर हल्का-सा थप्पड़ मारा—प्यार से। ड्राइवर सीट पर बैठ गया। वो थोड़ा थका हुआ लग रहा था... लेकिन उसकी आँखें अभी भी चमक रही थीं। कार अभी भी ओपन थी—खिड़कियाँ नीचे... कोई कवर नहीं। कभी भी कोई कार गुज़र सकती थी... कोई ट्रक... कोई लोकल... और सब देख सकता था। ये... सेफ नहीं था। लेकिन... उस पल में... मुझे कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। साँसें तेज़ थीं। शरीर... गरम... बहुत गरम। मैं... दूसरे लेवल की हॉर्नीनेस पर थी। सब कुछ... गंदा लगने के बजाय... मुझे किक दे रहा था। मैंने अपना हाथ उसके सामने किया। दो उँगलियाँ... अभी भी गीली... उसके पेशाब से... और थोड़ा सा मेरा स्पर्श। मैंने उसे दिखाया। वो बोतल उठाने लगा—साइड में रखी पानी की बोतल। मेरे हाथ धोने के लिए। लेकिन... मैंने उसे रोक लिया। उसकी आँखों में देखा। फिर... धीरे से... अपनी उँगलियाँ अपने मुँह के पास ले गई। उसे देखते हुए... एक उँगली... जीभ पर रखी। चाट ली। नमकीन... गरम... थोड़ा कड़वा। फिर... दूसरी उँगली... पूरी तरह जीभ से साफ़ की। सब... मेरे मुँह में। मुझे देखता रह गया। उसकी आँखें चौड़ी हो गईं। जैसे... वो किसी फिल्म में हो। XXXXX नेहा रुक गई। उसकी उँगलियाँ मेरे लुंड पर रुक गईं। वो मेरी तरफ मुड़ी उसकी आँखें मेरी आँखों में टिकी हुईं थीं—उत्सुक, थोड़ा डरी हुई, लेकिन बहुत गहरी। वो कहानी में पहुँच चुकी थी उस पल तक... जहाँ उसने अंकल के पेशाब की आखिरी बूँदें अपने हाथ पर लीं... और फिर... उँगलियाँ मुँह में डालकर चाट लीं। पहली बार... किसी मर्द का पेशाब... टेस्ट किया। नमकीन... गरम... थोड़ा कड़वा। वो रुकी। मुझे देखा। उसकी साँसें थोड़ी तेज़ थीं। वो मेरी रिएक्शन का इंतज़ार कर रही थी। मैं... बस उसे देखता रहा। मेरा दिमाग... मान नहीं पा रहा था। मेरी नेहा... इतनी क्लीन... इतनी सेक्सी... इतनी घरेलू... वो इतनी नास्ती... इतनी मेस्सी... इतनी बेबाक कैसे हो सकती है? मैंने कभी सोचा भी नहीं था... वो ऐसा कुछ कर सकती है। पेशाब... चाटना... बिना घबराए... बिना शर्माए। और... वो सब... मुझे... बहुत एक्साइट कर रहा था। मेरा लुंड... पहले से ही रॉक हार्ड था। अब... और सख्त हो गया। दर्द करने लगा। फड़क रहा था... जैसे बाहर निकलने को बेताब हो। नेहा ने मेरी आँखों में देखा। उसने धीरे से पूछा—आवाज़ में थोड़ी हिचकिचाहट... थोड़ी डर— "सैम... तुम... ठीक हो? तुम्हें... बुरा लगा?" मैंने उसके बालों में हाथ फेरा। उसकी आँखों में देखा।
02-04-2026, 03:58 PM
वो मेरे लुंड को और तेज़ सहलाने लगी।
ऊपर-नीचे... टाइट ग्रिप। मैं कराह रहा था। मैं... कगार पर था। झड़ने वाला था। वो मेरे कान में फुसफुसाई— "और सुनना है... या... मैंने उसके बाल पकड़े। सुनना है... " वो हँसी। उसने अपना हाथ और तेज़ किया। एक हाथ से... मेरे लुंड को ऊपर-नीचे... बहुत तेज़। दूसरा हाथ... मेरे लुंड के हेड के सामने रख दिया। खुला... तैयार... सब कलेक्ट करने के लिए। मैं झड़ गया। बहुत सारा... बहुत जोर से। नेहा की हथेली में... गाढ़ा, गरम, सफेद रस भर गया। वो मेरे लुंड को अभी भी हल्के से पकड़े हुई थी—सब बाहर निकालने के लिए। फिर... उसने हाथ ऊपर उठाया। मेरे सामने... हथेली खोलकर दिखाई। रस... चमक रहा था... बहुत सारा... उँगलियों पर बह रहा था। वो मुस्कुराई—एक गहरी, नॉटी मुस्कान। "देखो... कितना सारा है... तुम बहुत एक्साइटेड लग रहे थे।" मैं... बस "हम्म..." कर पाया। आवाज़ निकली नहीं। दिमाग... अभी भी घूम रहा था।वो मेरी तरफ देखती रही। फिर... दूसरे हाथ की दो उँगलियाँ... मेरे रस में डुबोईं। धीरे से... उँगलियाँ उठाईं। मेरी आँखों के सामने... उँगलियाँ जीभ पर रखीं। चाट ली। धीरे-धीरे... पूरी तरह साफ़ की। उसकी जीभ... मेरे रस पर... चमक रही थी। वो मुझे देख रही थी—पूरी तरह। मैं... बस देखता रहा। ये... अलग था। उसने पहले भी मेरा रस टेस्ट किया था—कई बार। मेरे मुंह में... ब्लोजॉब के बाद मैंने धीरे से पूछा—आवाज़ में थोड़ी काँप, थोड़ी जिज्ञासा, थोड़ी हिम्मत— "नेहा... तुम... उस मर्द के लिए... इतनी गंदी क्यों हो गई थीं? मतलब... तुम बहुत यंग थीं... फिर भी..." वो मेरी तरफ देखती रही। एक पल... चुप। फिर... हल्के से मुस्कुराई—एक थकी हुई, लेकिन ईमानदार मुस्कान। उसने मेरे लुंड को फिर से हल्के से सहलाया। धीरे से बोली— "क्योंकि... मैं बहुत पोर्न देखती थी। हर रात। कॉलेज के बाद... जब कार पूल शुरू हुआ... मैंने हर दिन के लिए प्लान बना लिया था। कुछ नया... कुछ और गहरा... कुछ और गंदा। मैं... हर सुबह... सोचती थी... आज क्या ट्राई करूँ। उसके लुंड को कैसे छुऊँ... कैसे हिलाऊँ... कैसे उसे तड़पाऊँ। लेकिन... वो हमेशा रुक जाता था। कहता था—'तुम्हारा फ्यूचर... मैं खराब नहीं कर सकता।' फिर... सब खत्म हो गया। और... मैं... उस 5-6 घंटे के सफर में... हर चीज़ एक्सपीरियंस करना चाहती थी। क्योंकि... मैं जानती थी... ये आखिरी चांस है। शायद... कभी नहीं मिलेगा। फिर... वो एक उँगली को मेरे रस में डुबोई... और धीरे से... अपने गाल पर रगड़ दी। एक पतली लाइन... मेरे रस की... उसके गाल पर फैल गई। फिर... दूसरी उँगली... अपने होंठों पर... फिर माथे पर। वो... मेरे रस को... अपने चेहरे पर फैला रही थी। जैसे कोई मेकअप लगा रही हो। उसकी आँखें... मेरी आँखों में टिकी हुईं थीं—बहुत गहरी... बहुत नॉटी... बहुत प्यारी। आज... वो सब कुछ... अलग था। मेरी क्लीन, घरेलू नेहा... आज इतनी गंदी... इतनी बेबाक... इतनी सेक्सी। मैं... बस देखता रहा। मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। फिर... मैंने धीरे से पूछा— "फिर... क्या हुआ?" वो रुकी। उसकी जीभ अभी भी हथेली पर थी—मेरा रस साफ़ कर रही थी। वो मेरी तरफ देखकर मुस्कुराई। "अब बहुत देर हो गई है बेबी... सो जाना चाहिए।" मैंने उसके बाल पकड़े। उसे अपनी तरफ खींचा। "नहीं... मैं जानना चाहता हूँ। फिर क्या हुआ? कंटिन्यू करो... प्लीज़।" वो मेरी आँखों में देखती रही। फिर... धीरे से बोली—आवाज़ में थोड़ी हिचकिचाहट... थोड़ा डर... लेकिन बहुत प्यार। "तुम... सच में सुनना चाहते हो? कुछ पार्ट्स... तुम्हें पसंद नहीं आएँगे... मैं जानती हूँ।" मैंने उसके गाल पर हाथ फेरा—उसके चेहरे पर मेरे रस की वो हल्की लाइन अभी भी थी। "मैं तैयार हूँ। मैं तुमसे प्यार करता हूँ... और तुम्हारा हर पार्ट... मेरे लिए मायने रखता है। कोई फर्क नहीं पड़ेगा... मेरे फीलिंग्स में। बताओ... सब।" वो मेरी आँखों में देखती रही। फिर... धीरे से सिर हिलाया। नेहा बिस्तर के हेडबोर्ड पर पीठ टिकाकर बैठी थी। आधा लेटी हुई... आधा बैठी हुई। पैर फैलाए। ब्लैक पैंटी अभी भी पहनी हुई थी—पूरी गीली... चिपचिपी... मेरे रस से। मेरे तरफ देखा। उसकी आँखें मेरी आँखों में टिकी हुई थीं। मैं जानता था... वो क्या चाहती है। मैं धीरे से जांघों के बीच आया। मेरा सिर... मेरी जांघों के बीच। मेरी नाक... उसकी पुसी पर... पैंटी के ऊपर... हल्का-सा टच। मैं सूंघ रहा था। उसक रस... मेरी नाक पर... मेरी साँसों में। वो कराहा—बहुत धीमी... बहुत गहरी। "येस्स्स्स..." पैंटी पर नाक रगड़ रहा था। धीरे-धीरे... सर्कल बनाता हुआ। बाल पकड़े। करीब खींचा। फिर... कहानी जारी रखी—आवाज़ में अब वो पुरानी वाली चाहत... और थोड़ी सी शरारत। "उसने कार स्टार्ट की। हमारे पास कोई प्लान नहीं था। बस... डेस्टिनेशन तक ड्राइविंग। वो कुछ सोच रहा था। उसके चेहरे से साफ़ दिख रहा था। कैलकुलेट कर रहा था... रिस्क... फायदे... सब कुछ। मेरा हाथ... उसकी तरफ बढ़ा। ज़िप नीचे की। उसका लुंड बाहर निकाला। रॉक हार्ड। बड़ा। मोटा... गरम... जैसे कोई हॉट रॉड। मैंने उसे पकड़ा। ऊपर-नीचे... धीरे से... फिर तेज़।" दिखाने के लिए हाथ का इशारा किया—दोनों हाथों से... लंबाई और मोटाई दिखाई। जानबूझकर। शायद... बताने के लिए। शायद... जलाने के लिए। या... शायद... ह्यूमिलिएट करने के लिए। पैंटी पर नाक और गहराई से रगड़ रहा था। उसकी साँसें मेरी चूत पर लग रही थीं। कार चल रही थी। हाईवे अब पूरी तरह सुनसान हो चुका था। अंकल का लुंड मेरे हाथ में था—सख्त... गरम... फड़कता हुआ। मैंने उसे हल्के-हल्के जर्क किया। बहुत धीरे... बहुत कंट्रोल्ड। इतना कि वो ड्राइव कर सके... सोच सके... लेकिन इतना कि वो भूल न जाए कि मेरे हाथ में क्या है। उसकी साँसें तेज़ थीं।फिर... धीरे से पूछा—आवाज़ में वो पुरानी वाली हिचकिचाहट... और थोड़ी सी चाहत— "कॉलेज में... तुम कहाँ रहती हो?" मैंने मुस्कुराकर कहा— "गर्ल्स हॉस्टल में।" वो एक पल के लिए चुप रहा। उसकी आँखें... मेरी आँखों से मिलीं। वो जानता था... मैं क्या सोच रही हूँ। हमारा कॉलेज... दो शहरों के बीच में था। चारों तरफ सिर्फ़ होटल... और वो भी सिर्फ़ कॉलेज की वजह से। हर होटल में सख्त नियम थे—कॉलेज के स्टूडेंट्स को आईडी दिखानी पड़ती थी... पूछताछ होती थी... लोकल्स सब जानते थे। वो जगह... बहुत स्ट्रिक्ट थी। वो फिर बोला—आवाज़ में अब थोड़ी हिम्मत— "मेरे पास... एक जगह है... रास्ते में... लेकिन..." मैंने उसके लुंड को थोड़ा और टाइट पकड़ा। धीरे से जर्क किया। फिर... पूछा— "लेकिन क्या...?" अंकल की कार अब धीमी हो गई थी। वो स्टीयरिंग पर हाथ कसकर पकड़े हुए था। उसका लुंड अभी भी मेरे हाथ में था—सख्त, गरम, मेरे रस और उसके प्रीकम से गीला। मैंने धीरे से उसके हेड पर उँगली फेरी। कुछ प्रीकम... मेरी उँगली पर आ गया। मैंने उसे उसके लुंड पर ही फैलाया। धीरे-धीरे... मसाज करते हुए... गीला-गीला... चिकना। वो सिहर गया। एक लंबी, गहरी कराह निकली— "आह्ह..." वो मेरी तरफ देखा। उसकी आँखें... बहुत गहरी... बहुत भूखी। फिर... धीरे से बोला— "लेकिन... ये... होटल जैसी जगह नहीं है... ये... हमारे ड्राइवरों का चाय-स्नैक्स वाला अड्डा है।" मैंने उसके लुंड को और टाइट पकड़ा। धीरे से ऊपर-नीचे किया। उसकी साँसें रुक गईं। फिर... पूछा— "और...?" वो एक गहरी साँस ली। स्टीयरिंग पर हाथ और कस गया। "और... वहाँ... बहुत लोग आते हैं। ड्राइवर... ट्रक वाले... लोकल वाले... सब। "यहाँ... झोपड़ियाँ हैं... जहाँ ड्राइवर लोग दारू पीते हैं... और कभी-कभी..." मैंने उसकी बात पूरी करवाई— "कभी-कभी...?" वो एक गहरी साँस ली। फिर... बोला— "ट्रक ड्राइवर... हाईवे की रंडियों को... फक करते हैं।" मैंने एक पल के लिए रुककर उसे देखा। ये... मेरे लिए नया था। मैंने कभी नहीं सुना था... ऐसे। मैंने पूछा—क्यूरियोसिटी से... थोड़ी सी हैरानी से— "हाईवे की रंडियों... क्या होती हैं?" वो मेरी तरफ मुड़ा। उसकी आँखें... मेरी मासूमियत पर थोड़ा रुक गईं। फिर... धीरे से बोला— "रास्ते में... कुछ औरतें मिलती हैं... जो सेक्स के बदले पैसे लेती हैं। कभी-कभी... सिर्फ़ लिफ्ट के बदले... कभी... थोड़े पैसे के। ट्रक वाले...उन्हें ले जाते हैं... झोपड़ियों में... । ये... आम है... हाईवे पर।" मैंने उसके लुंड को हल्का-सा दबाया—बस इतना कि वो महसूस करे, लेकिन दर्द न हो। फिर... नॉटी स्माइल के साथ पूछा— "तुमने कभी किया?" वो तुरंत बोला—आवाज़ में सख्ती, लेकिन बहुत ईमानदारी— "नहीं... कभी नहीं।" मैंने फिर दबाया—थोड़ा और... शरारत से। उसकी साँस रुक गई। "क्यों? तुम बता सकते हो... अगर किया होता तो।" वो मेरी तरफ देखा। उसकी आँखें... मेरी आँखों में टिकीं। फिर... धीरे से बोला— "मैं तुम्हें कुछ भी बता सकता हूँ... लेकिन सच में... कभी नहीं किया। नहीं सोचा भी। ये... हाईवे वाली रंडियाँ... वो... कैसे समझाऊँ तुम्हें... मेरी बीवी... उससे कहीं बेहतर है। और वो... पुरानी... गंदी... ढीली... और सच कहूँ... तुमसे मिलने से पहले... मैं ऐसे में नहीं था। न कभी किया... न सोचा।" वो रुका। एक लंबा सन्नाटा। फिर... धीरे से बोला—आवाज़ में अब थोड़ी चिंता... थोड़ी फिक्र— "मुझे लगता है... तुम्हें वहाँ नहीं जाना चाहिए। ये... तुम्हारे लिए जगह नहीं है।" मैंने उसे हल्के-हल्के जर्क किया—बहुत धीरे, लेकिन जानबूझकर। उसकी साँसें तेज़ थीं। वो सोच रहा था... कैलकुलेट कर रहा था... रिस्क... फायदे... सब कुछ। मैंने धीरे से पूछा—आवाज़ में बहुत उत्सुकता... बहुत चाहत— "तो... कहाँ?" वो एक पल के लिए चुप रहा। फिर... धीरे से बोला— "हम... अगली बार देख लेंगे... इस बार... मुझे नहीं पता था कि तुम्हारे पापा ने मुझे ही बुक किया है।" उसकी आवाज़ में... थोड़ा दुख था... थोड़ा अफसोस। वो जानता था... ये मौका... शायद आखिरी था। मैंने उसके लुंड को और टाइट पकड़ा। तेज़ी से जर्क किया। उसकी साँस रुक गई। "नहीं... अगली बार नहीं। इस बार... अभी। झोपड़ियों में... चलो वहाँ। मैं... मैनेज कर लूँगी। कम से कम... जगह देख लें। अगर अच्छी नहीं लगी... तो... हम छोड़ देंगे। या... क्या... वहाँ खतरनाक है?" वो मेरी तरफ मुड़ा। उसकी आँखें... मेरी आँखों में टिकीं। फिर... धीरे से बोला—आवाज़ में अब थोड़ी हिम्मत— "नहीं... खतरनाक नहीं है। मैं इस रूट पर सालों से ड्राइव कर रहा हूँ। सेफ्टी की चिंता मत करो। वहाँ... लोग जानते हैं मुझे। कोई... कुछ नहीं करेगा।" मैंने उसके लुंड को और तेज़ जर्क किया। उसकी साँसें बहुत तेज़ हो गईं। वो कराहा—धीमी, गहरी। "तो... चलो... वहाँ। मैं... इसे छोड़ना नहीं चाहती... अगली बार के लिए। फिर... वो बोला—आवाज़ में अब थोड़ी हिम्मत, थोड़ी प्लानिंग— "ओके... एक काम करो। तुम्हारे लगेज में... कोई स्कर्ट और स्कार्फ है?" मैंने हल्के से मुस्कुराकर सिर हिलाया। "हाँ... है।" वो कार का डिकी खोलने के लिए बाहर निकला। मैंने बैग से स्कर्ट और स्कार्फ निकाला। एक , टाइट स्कर्ट... और एक लंबा स्कार्फ। वो वापस आया। डिकी बंद की। फिर... बोला— "यहाँ बदल लो। अभी।" मैंने कार के अंदर ही बदलना शुरू किया। नई स्कर्ट पहनी। स्कार्फ को कंधे पर रखा। वो... मुझे देखता रहा। उसकी आँखें... मेरी जांघों पर... मेरी चेस्ट पर... सब पर टिक रही थीं। वो धीरे से बोलता रहा—जैसे प्लानिंग कर रहा हो— "ये झोपड़ियाँ... पतली दीवारों वाली हैं। दरवाज़े नहीं... सिर्फ़ पर्दे हैं। कोई भी... आसानी से झाँक सकता है। तो... हमें ऐसी पोज़िशन में रहना है... जहाँ हमारी स्किन कम दिखे। और... तुम्हारा चेहरा... किसी को नहीं दिखना चाहिए। स्कार्फ... चेहरा ढकने के लिए यूज़ कर लो। मैंने लंबी स्कर्ट पहनी थी—घुटनों से नीचे तक, लेकिन टाइट, मेरी कमर और हिप्स का शेप साफ़ दिख रहा था। ऊपर सफेद शर्ट—बटन बंद, लेकिन कॉलर थोड़ा खुला। स्कार्फ... मेरे चेहरे पर लपेटा हुआ—सिर्फ़ आँखें दिख रही थीं। चेहरे का बाकी हिस्सा छुपा हुआ था। सुरक्षा... और थोड़ी सी मिस्ट्री। कार पार्क हुई। दिन का समय था। झोपड़ियों के बाहर... कुछ लोग चाय पी रहे थे। गपशप कर रहे थे। कुछ ट्रक वाले... कुछ लोकल ड्राइवर... सिगरेट-बीड़ी के धुएँ में बातें। मैंने चारों तरफ देखा। कोई मुझे नहीं पहचान रहा था। स्कार्फ... चेहरा छुपा रहा था। लेकिन... उनकी नज़रें... मेरी स्कर्ट पर... मेरी कमर पर... मेरी हिप्स पर... टिक रही थीं। मैंने अंकल के पीछे-पीछे चलना शुरू किया। वो काउंटर पर गया। एक आदमी खड़ा था—बिल्लू। काला... मोटा... गटके से दाँत गुलाबी... मुस्कुराता हुआ। उसने अंकल को देखा। "साहब... बहुत दिनों बाद?" अंकल ने हल्के से मुस्कुराकर कहा— "हाँ बिल्लू... एक झोपड़ी... एक बीयर... और कुछ खाने को।" बिल्लू ने मेरी तरफ देखा। उसकी आँखें मेरे स्कार्फ पर रुकीं... फिर नीचे स्कर्ट पर। वो मुस्कुराया—पूरे दाँत दिखाकर। "ओह्ह... ये आपके साथ हैं?" मैंने उसे देखा। स्कार्फ से सिर्फ़ आँखें दिख रही थीं। मैंने कुछ नहीं कहा। बस... नज़रें मिलाईं। उसकी मुस्कान... गंदी थी। बहुत गंदी। पीछे से... कुछ और लोगों की फुसफुसाहट आई। "क्या गांड है..." "कौन है?" "नई है..." मैंने सुना। मेरा दिल ज़ोर से धड़का। थोड़ा डर... थोड़ा थ्रिल। बिल्लू हमें झोपड़ी की तरफ ले गया। झोपड़ियाँ एक-दूसरे से सटी हुई थीं—पतली दीवारें, टिन की छतें, और सिर्फ़ पर्दे दरवाज़े की जगह। हमारी झोपड़ी सबसे आखिरी थी। पास की कुछ झोपड़ियों में से सिर्फ़ एक में रोशनी थी... और वहाँ से... हल्की-हल्की कराहें आ रही थीं। एक मर्द... एक औरत... बहुत स्पष्ट आवाज़ें। मैंने जल्दी से उस झोपड़ी को पार किया। दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। शर्म... थ्रिल... डर... सब एक साथ। बिल्लू अंकल के साथ चल रहा था। वो बात कर रहा था—उसकी आवाज़ में वो गंदी हँसी थी जो मुझे पहले भी सुनाई दी थी। "साहब... कब से शुरू किया ये सब?" अंकल कुछ नहीं बोला। बस... चलता रहा। बिल्लू ने फिर कहा— "ये शहर से हैं या हाईवे वाली?" मैंने सुना। मेरा चेहरा गर्म हो गया। स्कार्फ अभी भी चेहरे पर था—सिर्फ़ आँखें दिख रही थीं। लेकिन... वो सब समझ रहा था। फिर... बिल्लू ने सबसे आखिरी सवाल पूछा—बहुत बेशर्मी से— "कितना लिया?" अंकल ने उसे देखा। उसकी आँखें सख्त हो गईं। जैसे कोई बहुत गंदी बात कह दी गई हो। लेकिन... उसे झोपड़ी चाहिए थी। उसने बस इतना कहा—आवाज़ में गुस्सा, लेकिन कंट्रोल— "नहीं बिल्लू... बस दोस्त है।" बिल्लू हँसा—पूरे दाँत दिखाकर। गटके से गुलाबी दाँत... गंदी हँसी। "आह्ह... क्या मज़ाक है साहब... दोस्त? इतनी जवान... इतनी हॉट... अच्छा है साहब... अगर नई है तो... ये आखिरी बार नहीं होगा। अगली बार... रेट पूछ लूँगा।" मैं... शर्म से लाल हो गई। पहली बार... किसी ने मुझे... रंडी समझा। मेरा चेहरा जल रहा था।
09-04-2026, 03:45 PM
Please update next part
09-04-2026, 07:33 PM
हिंदी कहानी का शीर्षक अंग्रेजी में क्यों है?
09-04-2026, 07:59 PM
waiting for update..
good writing.
12-04-2026, 01:04 PM
pls update
15-04-2026, 12:02 PM
कमरा... छोटा था।
एक पुरानी मेज़... दो टूटी-फूटी कुर्सियाँ... और एक पलंग। मैट्रेस पर कोई चादर नहीं। रंग... लगभग काला... गंदगी से... चिकना... ग्रीस से भरा हुआ। किनारों पर पीले-भूरे दाग... पसीने के... और कुछ और के। हवा में... पसीने की तेज़ गंध... पुरानी दारू की... और कुछ ऐसा... जो मुझे एक साथ घिन और थ्रिल दे रहा था। मैंने चारों तरफ देखा। दीवारें पतली... लकड़ी की... बीच-बीच में छेद। पर्दा हल्का-सा हिल रहा था—बाहर से हवा आ रही थी। कभी-कभी... बाहर की फुसफुसाहट... हँसी... ट्रक का हॉर्न... सब सुनाई दे रहा था। अंकल मेरी तरफ मुड़ा। उसकी आँखें... अभी भी जल रही थीं। वो धीरे से बोला— "नेहा... ये जगह... वैसी नहीं है... जैसी तुम सोच रही होगी। XXXXXXXXXXXXX अभी मेरा सिर नेहा की जांघों के बीच में है। उसकी पैंटी पहले ही गायब हो चुकी है—कहीं फर्श पर पड़ी होगी, गीली और मुड़ी हुई। उसकी चूत मेरे मुँह के ठीक सामने है—गीली, गरम, थोड़ी सूजी हुई, उसकी खुशबू मेरी नाक में घुस रही है। मैं जीभ से उसे चाट रहा हूँ—धीरे-धीरे, लंबे स्ट्रोक में, क्लिट पर हल्का-सा दबाव डालते हुए। उसकी उँगलियाँ मेरे बालों में हैं—धीरे-धीरे ब्रश कर रही हैं, जैसे कोई बच्चा सहला रहा हो। वो कराह रही है—बहुत धीमी, बहुत गहरी— "येस... सैम... ऐसे ही... और गहरा... अपनी जीभ अंदर डालो..." उसकी आवाज़ मेरे कानों में गूँज रही है। मैंने जीभ को और अंदर डाला—उसकी दीवारें मेरी जीभ पर कस रही हैं, गीली और गरम। उसका रस मेरे होंठों पर फैल रहा है—नमकीन, मीठा, बहुत ज्यादा। मैं... पूरी तरह उसमें डूबा हुआ हूँ। लेकिन... मेरा दिमाग... कहीं और है। उसकी कहानी... अभी भी मेरे सिर में घूम रही है। झोपड़ी... पतली दीवारें... पर्दा... गंदा मैट्रेस... पसीने की गंध... अंकल... उसका लुंड मेरे दिमाग में है। बड़ा... मोटा... गरम। मैंने अपना सिर नेहा की चूत से ऊपर उठाया। उसका रस मेरे होंठों पर... मेरी ठोड़ी पर... अभी भी चिपका हुआ था। मैंने उसकी आँखों में देखा। वो मुझे देख रही थी—आँखें आधी बंद, होंठ थोड़े खुले, साँसें तेज़। उसकी उँगलियाँ मेरे बालों में अभी भी थीं—धीरे से ब्रश कर रही थीं। वो जानती थी... मैं क्या चाहता हूँ। मैं कुछ नहीं बोला। बस... नज़रों से कहा—कंटिन्यू करो। वो मुस्कुराई—एक गहरी, सेक्सी मुस्कान। फिर... धीरे से कहानी फिर से शुरू की—आवाज़ में अब वो पुरानी वाली चाहत... "हम... झोपड़ी में थे। एक-दूसरे को देख रहे थे। लग रहा था... अब सच में अकेले हैं। बाहर की आवाज़ें... हल्की-हल्की आ रही थीं... लेकिन अंदर... सिर्फ़ हम दोनों। समय कम था। बहुत कम। हम... जल्दी से एक-दूसरे से लिपट गए। मेरे स्तन... उसके चौड़े सीने से दब गए। उसका सीना... बहुत स्ट्रॉन्ग... बहुत गरम। उसके एक हाथ... मेरी गांड पर... स्कर्ट के ऊपर से। दूसरा हाथ... मेरे चेहरे पर। स्कार्फ उतारा। मेरा चेहरा... उसके सामने। उसने मेरी ठोड़ी ऊपर की। हमारे होंठ मिले। गहरा किस। बहुत लंबा... बहुत इंटेंस। जैसे... बहुत पुराने प्रेमी मिले हों। हमारे शरीर... एक-दूसरे से रगड़ रहे थे। उसकी उँगलियाँ मेरी गांड पर दबाव डाल रही थीं... मेरे स्तन उसके सीने से दबे हुए... मेरी चूत उसके लुंड से रगड़ रही थी। हम... एक-दूसरे में खो गए थे। समय... रुक गया था। बस... वो पल... वो स्पर्श... वो चाहत।" मैं... उसकी बातें सुनते हुए... उसकी चूत को फिर से चाटने लगा। धीरे-धीरे... लंबे स्ट्रोक में। अंकल ने मुझे दीवार से सटा रखा था। उसके हाथ... मेरे शरीर पर हर जगह घूम रहे थे। मेरे स्तनों पर... कमर पर... गांड पर... जांघों पर। लेकिन... वो कपड़े नहीं खोल रहा था। स्कर्ट अभी भी नीचे थी... शर्ट के बटन बंद। उसका दिमाग... बार-बार झोपड़ी के पर्दे की तरफ जा रहा था। वो हर कुछ सेकंड में सिर घुमाकर देखता था—कोई देख तो नहीं रहा। पर्दा हल्का-सा हिल रहा था—बाहर से हवा आ रही थी। उसकी आँखें... सतर्क थीं... लेकिन उसकी उँगलियाँ... अभी भी मेरे शरीर पर खेल रही थीं। उसकी कॉन्फिडेंस... बढ़ रही थी। मैं समझ गई—ये उसके लिए भी नया था। पहली बार... किसी के साथ... इतने खुले में... इतने रिस्क पर। उसके हाथ... धीरे से मेरी शर्ट के नीचे चले गए। शर्ट को ऊपर उठाया। मेरे स्तन... नंगे... उसके सामने। वो... एक पल के लिए... रुक गया। उन्हें देखा—जैसे पहली बार देख रहा हो। फिर... झुका। एक निप्पल को मुँह में लिया। चूसा। धीरे से... फिर गहरा। उसकी जीभ... मेरे निप्पल पर सर्कल बना रही थी। मैं... सिहर गई। "आह्ह... वो दूसरा स्तन भी चूसने लगा। फिर... एक पल के लिए... फिर से पर्दे की तरफ देखा। कोई नहीं था। वो फिर मेरी तरफ मुड़ा। मेरी शर्ट को और ऊपर किया। मेरे स्तन पूरी तरह बाहर। वो... फिर से चूसने लगा। बहुत जोर से... बहुत गहराई से। मैं कराह रही थी—धीमी... लेकिन गहरी। अंकल ने मेरे स्तनों से मुँह हटाया। उसकी साँसें मेरे चेहरे पर गरम लग रही थीं। उसने धीरे से मेरी शर्ट नीचे की। मेरी साँसें बहुत तेज़ थीं। छाती ऊपर-नीचे हो रही थी। उसकी ऊँचाई... मे गर्दन तक आ रही थी। मैंने उसकी गर्दन पर होंठ रख दिए। गर्दन... पसीने से गीली। नमकीन स्वाद। मैंने जीभ से चाटा—धीरे से... उसकी गर्दन पर... उसकी नसें फड़क रही थीं। मैंने उसके सीने की तरफ मुँह ले जाया। शर्ट के ऊपर से... उसके निप्पल्स को दाँतों से छुआ। हल्का-सा काटा। वो सिहर गया। एक छोटी सी कराह निकली—बहुत दबी हुई। वो मुझे देखता रहा। उसकी आँखें... बहुत गहरी। उसका एक हाथ... मेरी कमर पर... फिर पेट पर। उसकी उँगलियाँ... मेरे नाभि में चली गईं। बहुत गहरी नाभि में... उँगली अंदर। नाखून... हल्के से अंदर। वो... नाभि में खेल रहा था—जैसे कुछ निकालना चाहता हो। उँगली घुमा रहा था... दबा रहा था... फिर हल्का-सा खींच रहा था। टिकलिंग... बहुत ज्यादा। शरीर काँप रहा था। धीरे से बोला— "तुम्हारी नाभि... इतनी गहरी... इतनी सॉफ्ट... मैं... इसमें खो सकता हूँ।" "तो... खो जाओ..." हमारी साँसें एक-दूसरे के चेहरे पर लग रही थीं। अंकल का टेंट... मेरे ऊपरी पेट पर दब रहा था—सख्त, गरम, पैंट के कपड़े से भी महसूस हो रहा था। मेरा हाथ... बिना सोचे... नीचे चला गया। पैंट की ज़िप पकड़ी... नीचे की। उसका लुंड बाहर आया—फड़कता हुआ, बड़ा, गर्म। मैंने चारों तरफ देखा—क्या कोई देख रहा है? पर्दा हल्का-सा हिल रहा था... बाहर से हल्की आवाज़ें आ रही थीं... लेकिन कोई नहीं था। अंकल ने मेरी तरफ देखा। उसकी आँखें... बहुत शांत... लेकिन बहुत भूखी। वो धीरे से बोला— "इट्स ओके... हम मर्द हैं... कोई देख ले तो... मैं फाइन हूँ।" उसने एक झटके में पैंट और अंडअंकलयर दोनों नीचे कर दिए। अब उसके नीचे... कुछ नहीं। सिर्फ़ शर्ट। उसका लुंड... मेरे सामने... पूरी तरह नंगा। बड़े... भारी... लटकते हुए बैल्स... पहली बार इतने करीब से देख रही थी। मैंने हाथ बढ़ाया... उन्हें कप किया। नरम... गरम... भारी। उसने सिहरकर कराहा—बहुत धीमी। उसका हाथ... अब मेरी जांघों पर। धीरे-धीरे... स्कर्ट ऊपर उठाता रहा। उसकी उँगलियाँ मेरी पैंटी पर पहुँचीं। धीरे से... पैंटी नीचे सरकाई। मैंने भी मदद की—कमर उठाकर... पैंटी पैरों से निकाली। पैंटी फर्श पर गिर गई। स्कर्ट... वैसी ही रह गई—ऊपर सरकी हुई। मेरी चूत... अब पूरी तरह नंगी... अंकल ने मुझे पलंग पर बैठाया। मैट्रेस गंदा था—काला, चिकना मैं स्कर्ट और शर्ट में थी—पूरी तरह ड्रेस्ड, लेकिन पैंटी नहीं। वो मुझे पीठ के बल लिटाया। मेरे पैरों को बिस्तर पर ऊपर उठाया। स्कर्ट घुटनों तक सरक गई—मेरी चूत छुपी हुई थी, लेकिन सिर्फ़ स्कर्ट के कारण। वो जानता था... अगर कोई आ जाए... तो स्कर्ट नीचे खींचकर सब छुपा सकता है। उसकी जल्दबाज़ी साफ़ दिख रही थी। वो जल्दी से इसे खत्म करना चाहता था—शायद डर था... शायद ज्यादा समय नहीं था। मैं जानती थी... वो क्या चाहता है। और... मैं भी... उतना ही चाहती थी। उसका हाथ उसके लुंड पर गया। उसने टिप को मेरी चूत पर एडजस्ट किया। मैंने महसूस किया—उसके प्रीकम की गर्म बूँद मेरी चूत के मुंह पर लगी। लेकिन... बहुत टाइट था। उसका कॉक हेड... बहुत बड़ा दर्द हुआ—तेज़, गहरा। मेरे चेहरे पर दर्द साफ़ दिख रहा था। मैंने कुछ नहीं कहा। बस... दाँत भींचे... तैयार रही। वो रुक गया। मेरी आँखों में देखा। फिर... धीरे से पूछा—आवाज़ में थोड़ा हैरान, थोड़ा डर— "कितने लुंड... तुमने पहले लिए हैं?" मैंने सीधे उसकी आँखों में देखकर कहा— "कोई नहीं।" वो स्तब्ध रह गया। उसकी आँखें चौड़ी हो गईं। वो... जैसे यकीन नहीं कर पा रहा था। तभी... पर्दे के पीछे से आवाज़ आई— "सर... आपकी बीयर... नमकीन... और..." वो अंदर आ चुका था। बिल्लू। उसकी आँखें... अंकल की नंगी गांड पर टिक गईं। वो देख रहा था—अंकल मेरे ऊपर... लुंड मेरी चूत के मुंह पर... धक्का देने वाला। लेकिन... मेरी चूत... दिख नहीं रही थी—अंकल के शरीर ने छुपा रखा था। वो मेरे चेहरे को देख सकता था। मेरा दर्द... मेरी आँखें... मेरी साँसें। अंकल ने झटके से सिर घुमाया। उसका चेहरा लाल हो गया। वो चिल्लाया—आवाज़ में गुस्सा और शर्म— "बाहर निकलो! क्या देख रहा है?" बिल्लू हँसा—गंदी, बेशर्म हँसी। ट्रे हाथ में थी—बीयर की बोतल... नमकीन का पैकेट। वो बोला— "सॉरी साहब... बस... सर्व करने आया था। वो बाहर निकल गया। पर्दा गिरा। लेकिन... उसकी हँसी... अभी भी सुनाई दे रही थी। अंकल तुरंत उठ गया। उसका लुंड... अभी भी सख्त... मेरी चूत के मुंह पर से हट गया। वो खड़ा हो गया। मैंने जल्दी से स्कर्ट नीचे की। बिस्तर पर बैठ गई। दोनों पैर बंद किए। शरीर छुपाया। अंकल ने बीड़ी निकाली। जलाई। कुर्सी पर बैठ गया। कश लगाया। कुछ देर चुप रहा। फिर... धीरे से बोला—आवाज़ में बहुत अफसोस... बहुत गिल्ट— "मैं... सॉरी... बहुत सॉरी। मुझे नहीं करना चाहिए था। मेरी भी एक बेटी है... तुम्हारी उम्र की होगी। अगर... कुछ हो गया... तुम्हारी इमेज... सब बर्बाद हो जाएगा।" मैंने फ्रस्ट्रेशन में कहा— "ओह्ह... कुछ नहीं होगा... मैं उठी। उसके पास गई। उसके बालों में उँगलियाँ फेरीं। वो नीचे देख रहा था। फिर... धीरे से बोला— "तुमने पहले बताया क्यों नहीं... कि तुम वर्जिन हो?" मैंने हैरानी से कहा— "क्यों? ये तो अच्छी बात है ना... कि मैं वर्जिन हूँ?" वो बीड़ी का कश लिया। फिर... धीरे से बोला— "तुम जानती हो... मैं अपनी बीवी के साथ हनीमून पर था... पहली बार... जब मैंने किया... खून आया। हम... घबरा गए। हॉस्पिटल भागे। डॉक्टर ने... बहुत कुछ कहा। उसके लिए... बहुत दर्द हुआ। बहुत समय लगा... इस साइज़ को एडजस्ट करने में। मैं... ये ट्रॉमा... नहीं चाहता... तुम पर। अगर... कुछ गड़बड़ हुई... डॉक्टर सबसे पहले पूछेगा... कैसे हुआ? सब जानते हैं कैसे होता है... लेकिन... वो सवाल... तुम्हें... और तुम्हारे परिवार को... बहुत शर्मिंदगी देगा।" अंकल अब नीचे पूरी तरह नंगा था। पैंट और अंडअंकलयर फर्श पर पड़े थे। उसका लुंड अब सॉफ्ट हो चुका था—अभी भी बड़ा... लेकिन अब फड़कन नहीं थी। वो कुर्सी पर बैठा था... बीड़ी का कश ले रहा था। धुआँ मेरे चेहरे पर आ रहा था—नमकीन, कड़वा, पुरानी बीड़ी का स्वाद। मैं उसके सामने खड़ी थी—स्कर्ट नीचे, शर्ट के बटन बंद, लेकिन मेरी साँसें अभी भी तेज़ थीं। मैंने उसके बालों में उँगलियाँ फेरीं—धीरे-धीरे, प्यार से। वो मेरी तरफ देखा। फिर... धीरे से बोला—आवाज़ में बहुत अफसोस... बहुत गिल्ट— "इट्स ओके... हम फक नहीं करेंगे।" उसकी बातें... मेरे दिमाग में गूँज रही थीं। दर्द... रिस्क... हॉस्पिटल... डॉक्टर के सवाल... इमेज... परिवार... सब कुछ। उसकी हर बात... बहुत मायने रख रही थी। ये जगह.... बहुत अनजाना था। अगर दर्द बहुत हुआ... अगर कुछ गड़बड़ हुई... तो क्या होगा? मैं... अकेली... यहाँ... किसी को नहीं बता सकती थी। उसकी हर बात... सच्ची लग रही थी। और... सबसे बड़ी बात—वो ये सब मेरे लिए कर रहा था। मेरी केयर कर रहा था। मुझे बचाने की कोशिश कर रहा था। ये... मुझे बहुत एक्साइट कर रहा था। उसका प्यार... उसकी फिक्र... उसकी वो ईमानदारी... मैंने झुककर उसके सॉफ्ट लुंड को हाथ में लिया। धीरे से सहलाया। फिर... मुस्कुराकर कहा— "देखो... तुमने क्या कर दिया उसके साथ... " अंकल ने मेरी तरफ देखा। फिर... हँस पड़ा। एक गहरी, थकी हुई, लेकिन बहुत खुश हँसी। "तुम... कभी नहीं बदलती... नेहा।" "तुमने इसे डरा दिया... अभी तक मैंने ठीक से देखा भी नहीं था।" वो मुस्कुराया—एक थकी हुई, लेकिन खुश मुस्कान। मैं घुटनों पर बैठ गई। उसकी कुर्सी के सामने। उसने अपनी कुर्सी को थोड़ा घुमाया—पीठ पर्दे की तरफ, ताकि अगर कोई आए... तो हमें एडजस्ट करने का समय मिल जाए। वो अभी भी बीड़ी पी रहा था। धुआँ मेरे चेहरे पर आ रहा था—नमकीन, कड़वा। मैंने उसके लुंड को अच्छे से देखा। पहली बार... इतने करीब से... इतनी अच्छी तरह। मजबूत... मोटा... बड़ा हेड... पबिक हेयर्स घने, काले। गंध... बहुत तेज़—पसीना, प्रीकम, पेशाब... सब मिलकर। एक अजीब सी खुशबू—गंदी, लेकिन मुझे बहुत किक दे रही थी। मैंने उसे हाथ में लिया। अपने चेहरे के पास लाया।
15-04-2026, 12:22 PM
मैं घुटनों पर बैठी थी।
अंकल की कुर्सी के सामने। उसका लुंड... अभी भी सॉफ्ट था... लेकिन भारी, गरममैंने उसे दोनों हाथों में लिया। धीरे से... अपने चेहरे पर रख दिया। उसका गर्म, भारी लुंड... मेरे चेहरे पर फैल गया। बॉल्स मेरी ठोड़ी पर... हेड मेरे माथे तक। मैंने उसे अपनी स्किन पर दबाया—गाल पर, नाक पर, होंठों पर। उसकी गंध... पसीना, प्रीकम, पेशाब... सब मिलकर... मेरे नाक में घुस गई। बहुत तेज़... बहुत गंदी... लेकिन मुझे बहुत किक दे रही थी।अंकल... मुझे देख रहा था। बीड़ी का कश ले रहा था। धुआँ मेरे चेहरे पर आ रहा था। उसकी आँखें... हैरान... एक्साइटेड... थोड़ा शर्मिंदा। "क्या कर रही हो?"उसकी आवाज़ में एक्साइटमेंट था। मैंने होंठ उसके लुंड पर रखे हुए ही... धीरे से कहा— मेरे होंठ... उसके लुंड से टच होते हुए... हर शब्द उसके लुंड पर कंपन पैदा कर रहा था। "कैसी लग रही हूँ?" वो बीड़ी का कश लेता रहा। धुआँ छोड़ते हुए... मुझे घूरता रहा। फिर... धीरे से बोला—आवाज़ काँप रही थी— "बहुत... बहुत सेक्सी लग रही हो। मेरे लुंड को... अपने चेहरे पर... इस तरह... जैसे कोई ट्रॉफी हो। नेहा... तुम... सच में... पागल हो। लेकिन... मुझे... ये बहुत अच्छा लग रहा है।" मैंने मुस्कुराकर उसके लुंड को अपने चेहरे पर और दबाया। गाल पर... नाक पर... माथे पर... फिर होंठों पर। उसके प्रीकम से मेरा माथा गीला हो रहा था। मैंने छोटे-छोटे किस करने शुरू किए—उसकी पूरी लंबाई पर। उसकी आँखें... हैरानी, एक्साइटमेंट और थोड़ा शॉक से भरी हुई थीं। फिर... हँसते हुए बोला— "तुम... मुझे पागल कर दोगी। ये आइडिया... कहाँ से मिला तुम्हें? मैंने हँसकर कहा—जैसे ये सबसे नॉर्मल बात हो— "हर लड़की ये करती है।" वो और ज्यादा हैरान हो गया। उसने बीड़ी का कश लिया। फिर... धीरे से बोला— "क्या??" मैंने उसकी आँखों में देखा। फिर... मुस्कुराकर कहा— "क्या? क्यों? क्या गलत कहा मैंने?" वो कुछ नहीं बोला। बस... मुझे देखता रहा। उसके चेहरे पर... एक अजीब सा मिक्स था—मज़ा... शॉक... और थोड़ा डर। मैंने उसके लुंड पर छोटे-छोटे किस जारी रखे। फिर... टिप पर वापस आकर... हल्का-सा चूमा। "ये... गंदा है..." उसने कहा—आवाज़ में थोड़ी हिचकिचाहट। मैंने हँसकर कहा— "नहीं... गंदा नहीं है।" फिर... मैंने उसके हेड को होंठों से चूमा। धीरे से... जीभ से छुआ। वो और ज्यादा उत्तेजित हो गया। उसने बीयर की बोतल उठाई। एक बड़ा घूँट लिया। फिर... मुझे देखते हुए बोला— "तुमने... कभी किसी को... चूसा है?" मैंने हँसकर... अपनी गिगल वाली आवाज़ में कहा— "नहीं... लेकिन... आज... ट्राई कर रही हूँ।" वो बीयर का घूँट और लिया। उसकी आँखें... अब पूरी तरह जल रही थीं। मैंने धीरे से पूछा—आवाज़ में शरारत और क्यूरियोसिटी— "क्या किसी ने... कभी तुम्हारा लुंड चूसा है?" वो एक पल के लिए रुका। बीड़ी का कश लिया। फिर... धीरे से बोला— "सच में... कभी नहीं। मतलब... मेरी बीवी ने... एक बार... सिर्फ़ कुछ सेकंड के लिए... और वो भी... हमारे शादी के पूरे जीवन में सिर्फ़ एक बार।" मैंने दुखी चेहरा बनाया। "वाह... ये तो बहुत बुरा है।" वो हँसा—थोड़ा शर्माते हुए। "नहीं... बुरा नहीं है। यही समस्या है... मैंने कभी शिकायत नहीं की।" मैंने मुस्कुराकर उसके लुंड का फोरस्किन धीरे से पीछे सरकाया। पर्पल हेड... पूरी तरह बाहर आ गया। मैंने जीभ की नोक से... सिर्फ़ टिप को छुआ। धीरे से... हल्का-सा चाटा। फिर... जीभ को थोड़ा और इस्तेमाल करते हुए... और अच्छे से चाटा। "मम्म्म्ह्ह्ह..." वो बस इतना ही कह पाया। उसकी साँस रुक गई। मैंने ऊपर देखा। उसकी आँखों में देखकर मुस्कुराई। "कम्फर्टेबल हो?" फिर... बिना जवाब का इंतज़ार किए... अपने होंठ उसके लुंड पर रख दिए। धीरे से... ऊपर-नीचे... सहलाने लगी। मेरा मुँह... उसके लुंड को गर्म और गीला कर रहा था। वो मेरे बालों में उँगलियाँ फेरता रहा। उसकी साँसें तेज़ हो गईं। वो बस कराह रहा था—बहुत गहरी, बहुत दबी हुई कराह। मैं... धीरे-धीरे... और गहराई से... उसे चूसने लगी। अंकल ने कराहते हुए कहा— "तुम्हे पता है, अगर तुम नहीं चाहते तो आपको ऐसा करने की जरूरत नहीं है।" मैंने मुस्कुराकर ऊपर देखा। उसकी आँखों में देखकर बोली— "मुझे बिलकुल भी आपत्ति नहीं है." मैंने फिर से उसके लुंड को मुँह में लिया। धीरे-धीरे... गहराई में। ये मेरा पहला लुंड था। गर्म... मोटा... नमकीन... और मेरे मुँह में... बहुत अलग... बहुत अच्छा लग रहा था। मैंने पहली बार एक्सपीरियंस किया था... और मुझे तुरंत पसंद आ गया। मैंने और जोर से चूसना शुरू कर दिया। ऊपर-नीचे... तेज़... गहरा। सिर पीछे की तरफ झुक गया। वो लगभग चिल्लाया— "ओह... यह तुम्हारी चूत से बेहतर है!" उसके हाथ मेरे कानों को सहलाने लगे। बहुत प्यार से... लेकिन उत्तेजित होकर। मैंने और तेज़ चूसना शुरू कर दिया। मेरा सिर ऊपर-नीचे हो रहा था। उसका लुंड... मेरे मुँह में पूरी तरह गर्म और फड़क रहा था। मैंने पहली बार महसूस किया... कि लुंड चूसना... कितना पावरफुल फीलिंग देता है। मैं... पूरी तरह उसमें खो गई थी। मेरा मुंह... उसके लुंड को गीला और चमकदार बना रहा था। अंकल... बार-बार कराह रहा था... जैसे स्वर्ग में हो। "नेहा... तुम... बहुत अच्छा... कर रही हो... आह्ह... ये... स्वर्ग जैसा है..." मेरी जीभ उसके बड़े, मोटे हेड के चारों ओर घुमा रही थी — धीरे-धीरे, गोल-गोल, बहुत प्यार से। एक हाथ से मैं उसके लुंड को ऊपर-नीचे सहला रही थी, जबकि दूसरा हाथ... बहुत नरम तरीके से... उसके भारी अंडों को दबा रहा था। पूरा दिमाग सिर्फ़ एक जगह पर था — मेरी जीभ। हर चक्कर... हर चाट... हर छोटा-सा चूसना... अजीब सा रोमांच दे रहा था। मैं महसूस कर रही थी कि वो करीब आ रहा है। उसके अंडे मेरे हाथ में सिकुड़ने लगे थे। उसके लुंड से और ज़्यादा प्रीकम निकल रहा था — गाढ़ा, नमकीन, गरम। मैं उसे चख रही थी। हर बूँद मेरी जीभ पर। अंकल की साँसें बहुत तेज़ और बेतरतीब हो गई थीं। वो बार-बार फुसफुसा रहा था, जैसे खुद से बात कर रहा हो — “ये सच है... या मैं सपना देख रहा हूँ? क्या दूसरों के साथ भी ऐसा होता है... जो किस्मत वाले होते हैं?” मैंने ऊपर देखा।उसकी आँखों में देखकर... मुस्कुराई। फिर... एक शरारती आँख मारी। मुझे अचानक एहसास हुआ कि वो इस वक्त खुद को राजा समझ रहा होगा। एक साधारण ड्राइवर... जिसकी उम्र मेरे पापा के बराबर है... और मैं — पढ़ी-लिखी, जवान, सुंदर लड़की... जिसके बारे में मेरी उम्र के लड़के सपने देखते हैं... उसके पैरों के बीच फर्श पर बैठी हुई... उसका लुंड चूस रही हूँ। मैंने सारी वो चीजें कीं जो मैंने पोर्न में देखी थीं — अपनी पहली बार में ही। जीभ से हेड घुमाया, ऊपर-नीचे चूसा, हाथ से सहलाया। फिर मैंने नीचे झुककर उसके अंडों को चाटना शुरू कर दिया। वे बालों से भरे थे... पसीने और गंदगी से सने हुए... लेकिन मुझे कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। मैंने पूरी जीभ से उन्हें चाटा। अंकल ने झटके से कराहते हुए चिल्लाया — “ओह्ह... प्लीज... ये गंदा है...” मैंने ऊपर देखा, उसकी आँखों में देखकर सेक्सी मुस्कान दी और बोली — “अरे... तुम्हें अपने लुंड का ख्याल रखना चाहिए... इसे काफी ध्यान देना चाहिए... तुम्हारे पास इतना मोटा और तगड़ा लुंड है...” मैंने उसकी आँखों में देखते हुए मुस्कुराकर कहा — “ओह गॉड नेहा... तुम कितनी गंदी हो...” मैंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया — “तुम्हें ये पसंद है ना... कि मेरे मुँह में तुम्हारा गरम, सख्त लुंड हो... और मैं गंदी-गंदी बातें कर रही हूँ...” अंकल जैसे उड़ गया। उसकी साँसें रुक गईं।
15-04-2026, 12:25 PM
वो शायद सपने में भी नहीं सोच सकता था कि एक innocent सी लड़की उसके लुंड को चूसते हुए इतनी गंदी बातें करेगी।
वो सिर्फ़ कराह पा रहा था। मैंने फिर से उसके लुंड को मुँह में लिया और ऊपर देखकर मीठे-मीठे स्वर में कहा — “जब तुम झड़ोगे... तो मैं सारा का सारा निगल लूँगी... जैसे एक अच्छी लड़की करती है। थूकना... बहुत बदतमीजी है।” अंकल के मुँह से बस एक फुसफुसाहट निकली — “ओह... नेहा...” मैंने मुँह से लुंड निकालकर, ऊपर देखते हुए सेक्सी आवाज़ में पूछा — “तुम्हें पसंद है ना... कि मैं तुम्हारा ये लंबा, मोटा लुंड चूस रही हूँ?” फिर बिना जवाब का इंतज़ार किए, मैंने जितना हो सके उतना गहरा मुँह में ले लिया। लुंड मेरे गले तक पहुँच गया। मैं थोड़ा गैग हुई, लेकिन रुकी नहीं। अंकल एकदम पागल हो गया। उसने ज़ोर से चिल्लाकर कहा — “चूस मेरे लुंड को, साली चूस अच्छे से!” उसकी गाली सुनकर मेरे शरीर में करंट दौड़ गया। मैंने और जोर से चूसना शुरू कर दिया — ऊपर-नीचे, तेज़-तेज़, गहराई तक। अंकल का शरीर काँपने लगा। उसने मेरे बालों को मुठ्ठी में कस लिया और कराहते हुए बोला — “ओह ये बहुत अच्छा लग रहा है... मुझे लगता है... मैं झड़ने वाला हूँ!” उसने मेरे बालों को बहुत कसकर पकड़ लिया और एक ज़ोर की कराह के साथ झड़ गया। “आह्ह्ह्ह... नेहा...!” पहला झटका इतना तेज़ और मोटा था कि मेरे मुँह में तुरंत भर गया। गाढ़ा, सफेद-पीला, क्रीमी तरल... बहुत ज़्यादा। उसने महीनों से नहीं झड़ा था, और आज इस उत्तेजना में उसके अंडे पूरी तरह खाली हो गए। मैंने जितना हो सके निगलने की कोशिश की, लेकिन इतना सारा था कि मेरा मुँह भर गया। दूसरा, तीसरा और चौथा झटका... और भी ज़्यादा निकला। मेरे मुँह के कोनों से सफेद तरल बहने लगा। गर्म-गर्म... मेरी ठोड़ी पर... फिर मेरी शर्ट पर गिरा... स्कर्ट के ऊपरी हिस्से पर भी फैल गया। मैं अभी भी उसके लुंड को मुँह में लिए हुए थी। उसका लुंड फड़क रहा था... आखिरी बूँदें भी निकल रही थीं। मैंने जितना निगल सकी, निगल लिया... बाकी मेरे होंठों से, ठोड़ी से और कपड़ों पर बह रहा था। अंकल की साँसें बहुत तेज़ चल रही थीं। वो कुर्सी पर पीछे टिका हुआ था, आँखें बंद, जैसे अभी-अभी स्वर्ग से नीचे आया हो। मैंने ऊपर देखा। अंकल की आँखें पूरी तरह बंद थीं। उसका सिर कुर्सी के पीछे टिका हुआ था। वो जैसे उस पल को अपने अंदर कैद कर रहा हो। मैंने धीरे से उसका सारा वीर्य निगल लिया। गला हल्का-सा ऊपर-नीचे हुआ। मैं चाहती थी कि वो देखे... कि मैंने कितना सारा उसके मुँह में लिया था और निगल लिया। लेकिन वो आँखें बंद किए हुए था। मैंने उसके जाँघ पर हल्का-सा थपकी मारी। “अंकल...” वो धीरे से आँखें खोली। मुझे देखा। मैंने मुस्कुराते हुए पूछा — “कैसा लगा?” वो एक पल तक कुछ नहीं बोला। फिर... बहुत धीमी, थकी हुई आवाज़ में बोला — “तुम्हें... अच्छा लगा?” मैंने सिर हिलाया। मेरे होंठों पर अभी भी उसका वीर्य लगा हुआ था। “हाँ... बहुत अच्छा लगा। बहुत... बहुत ज़्यादा।” मैं अभी भी फर्श पर घुटनों के बल बैठी हुई थी। शर्ट और स्कर्ट पर उसके वीर्य की सफेद धारियाँ बिखरी हुई थीं। मैंने अपनी ठोड़ी पर लगे वीर्य को उँगली से पोंछा और उसे देखते हुए मुस्कुराई। सन्नाटा अच्छा लग रहा था। अंकल बीयर की बोतल गले से लगाकर बड़े-बड़े घूँट ले रहा था। मैं अभी भी फर्श पर घुटनों के बल बैठी थी। उसका लुंड मेरे हाथ में था — गीला, चिपचिपा, ढीला पड़ चुका था। मैं धीरे-धीरे उसे सहला रही थी, उँगलियों से खेल रही थी। तभी... बाहर की आवाज़ें अचानक कम हो गईं। सामान्य हँसी-मज़ाक की जगह अब कुछ और सुनाई दे रहा था। चप्पड़... चप्पड़... “रंडी साली...” “मादरचोद...” मेरा दिल ज़ोर से धड़कने लगा। अचानक पर्दा हटाकर बिल्लू अंदर घुसा — साँस फूली हुई, चेहरा घबराया हुआ। “साहब... सिक्युरिटी! सिक्युरिटी आ गई है! भागो... जल्दी भागो!” अंकल एक पल में खड़ा हो गया। उसने फटाफट पैंट ऊपर चढ़ाई, ज़िप लगाई। मैं भी घबरा गई। स्कर्ट नीचे की, शर्ट ठीक की। मेरे मुँह, ठोड़ी और कपड़ों पर अभी भी उसका वीर्य लगा हुआ था। अंकल ने पीछे की तरफ एक छोटा सा दरवाज़ा दिखाया। “इधर से... जल्दी!” सिक्युरिटी उस वक्त दूसरी झोपड़ी में थी — जहाँ वो दूसरा जोड़ा था। वहाँ से ज़ोर-ज़ोर की चीखें और गालियाँ आ रही थीं। हम तीनों — मैं, अंकल और बिल्लू — पीछे के दरवाज़े से निकले। दौड़ते हुए कार की तरफ गए। बिल्लू भी हमारे साथ दौड़ रहा था। कार में बैठते ही बिल्लू भी पीछे की सीट पर घुस गया। वो हाँफ रहा था। “साहब... यहाँ रह गया तो मुझे भी पकड़ लेंगे... अंकल ने तुरंत कार स्टार्ट की। इंजन की आवाज़ हुई और हम तेज़ी से वहाँ से निकल लिए। कार अब थोड़ी शांत गति से चल रही थी। हमने पीछे मुड़कर देखा — कोई पीछा नहीं कर रहा था। राहत की एक लंबी साँस निकली। बिल्लू आगे वाली सीट पर बैठा था। उसने मेरी जींस और पर्स को सामने वाली सीट से उठाया। पर्स खोला, मेरी ID कार्ड निकाला और अच्छे से पढ़ने लगा। फिर उसने धीरे से सिर घुमाया और मुझे देखा। उसकी आँखों में हैरानी और एक अजीब सी चमक थी। बिल्लू ने ID कार्ड को उँगलियों में घुमाते हुए कहा — कुछ देर तक उसे ध्यान से पढ़ा। फिर उसने सिर घुमाकर मुझे देखा। उसकी आँखों में एक गंदी, हैरान और लालची चमक थी। वो धीरे से, लेकिन बहुत गंदे अंदाज़ में बोला — “अरे साली... तू तो कॉलेज में पढ़ती है? पढ़ी-लिखी, ऊँची फैमिली की लड़की... और अभी कुछ देर पहले झोपड़ी में घुटनों के बल बैठकर ड्राइवर का लुंड चूस रही थी... मुँह में लेके चूस रही थी... और वो भी इतने शौक से... बहुत शर्म नहीं आती तुझे? इतनी पढ़ी-लिखी होकर भी... एक साधारण ड्राइवर के लुंड को चाट रही थी... और उसका माल भी निगल लिया... वाह बेटी... तू तो असली रंडी निकली।” बिल्लू ने मेरी जींस को अपनी गोद में रखा, फिर मेरी तरफ देखकर और गंदे स्वर में बोला — “नाम क्या है तेरा पूरा? नेहा... है ना? हम समझ गए... दोनों को देख लिया था... दीवार तो पतली थी, छेद भी थे... सब साफ़ दिख रहा था। अंकल एकदम भड़क गया। उसने गुस्से में चिल्लाकर कहा — “भैंचोद... अपना काम कर! चुपचाप बैठ!” बिल्लू भी तुरंत गरम हो गया। उसने मुस्कुराते हुए, लेकिन धमकी भरे स्वर में जवाब दिया — “अरे... अब जब मैंने तुम्हारी मदद कर दी, तो आँखें दिखा रहे हो? अगर मैं सिक्युरिटी को न बताता तो क्या होता, पता है ना? दोनों की हालत खराब हो जाती... खासकर इस पढ़ी-लिखी रंडी की।” वो एक पल रुका, फिर सीधे मेरी तरफ देखते हुए बोला — “मैं भी इसका स्वाद चखना चाहता हूँ...” वाक्य अधूरा छोड़ दिया, लेकिन मतलब बिल्कुल साफ़ था। अंकल ने गुस्से में लगभग हाथ उठा दिया। वो चिल्लाया — “भैंचोद... वो इन लड़कियों जैसी नहीं है! एक शब्द और बोला तो...” बिल्लू हँसा। वो बिल्कुल डरा नहीं था। उसने मेरी तरफ देखकर फिर कहा — “तो फिर... क्या करोगे साहब? मैंने तुम्हें बचाया... अब थोड़ा हिस्सा माँग रहा हूँ।” कार में सन्नाटा छा गया। वो धीरे-धीरे, लेकिन साफ़-साफ़ बोला — “अभी नहीं तो कभी और... मेरे पास उसका नाम और सारी जानकारी है। कॉलेज में भी आ सकता हूँ कभी... मिलने।” मुझे डर लग गया। मेरा शरीर सिहर गया। अंकल ने गुस्से में चिल्लाकर कहा — “मादरचोद... औकात दिखा दी ना अपनी!” बिल्लू बिल्कुल नहीं डरा। वो और ज़्यादा मुस्कुराया, अपने गंदे, गटके वाले दाँत दिखाते हुए बोला — “तो तेरे साथ कौन-सा मर्ज़ी से कर रही है? तूने भी तो किसी लड़के के साथ पकड़ा होगा तभी तो तुझे करने दे रही है... वरना तू मुझसे भी काफी बड़ा है ना... वो हँसा। बहुत गंदी, बेशर्म हँसी। “सुन... मैं कुछ ज़्यादा नहीं माँग रहा। बस एक बार चखना चाहता हूँ इस माल को। तूने तो पूरा मज़ा ले लिया... अब थोड़ा हिस्सा मुझे भी दे दे।” अंकल ने अचानक कार साइड में रोकी। इंजन बंद किया और बाहर निकल गया। मुझे भी इशारा किया कि मैं भी उतर जाऊँ। हम दोनों कार से नीचे उतरे और थोड़ा कोने में चले गए। अंकल ने धीमी, लेकिन गंभीर आवाज़ में कहा — “ये खतरनाक है... लेकिन सच ये भी है कि उसने हमें बचाया भी है।” मैंने सिर्फ़ सिर हिलाया। “हम्म...” अंकल ने मेरी आँखों में देखा। “तुम जानती हो वो क्या चाहता है?” मैंने फिर सिर हिलाया। “हम्म...” मेरी आँखें भर आई थीं। गला रुँध रहा था। फिर भी मैंने हिम्मत करके कहा — “मैं हैंडल कर लूँगी...” अंकल ने एक लंबी साँस ली। फिर मेरे सिर पर हाथ रखा और बोला — “ठीक है...” हम दोनों वापस कार में बैठ गए। अंकल ने कार स्टार्ट की। जैसे ही कार चलने लगी, अंकल ने बिल्लू की तरफ देखकर सख्त आवाज़ में कहा — “जा... पीछे जा के बैठ जा... लड़की के साथ।” कार अब मेरे कॉलेज की तरफ बढ़ रही थी। मैं और बिल्लू पीछे की सीट पर बैठे थे। अंकल आगे ड्राइव कर रहा था। सन्नाटा था। बहुत भारी सन्नाटा। मेरा दिल बहुत तेज़ धड़क रहा था। मैं डरी हुई थी... और चुपचाप उसके अगले कदम का इंतज़ार कर रही थी। अचानक बिल्लू ने अपना गंदा हाथ पजामा की जेब में डाला। कुछ ढूंढा और एक छोटा सा कपड़ा निकाला। वो मेरी तरफ बढ़ाते हुए बोला — “ये... तुम झोपड़ी में भूल गई थीं...” उसने मेरी पैंटी मेरे सामने की। पहले खुद उसको थोड़ा सूँघा... फिर मुझे थमा दी। मैं एक पल के लिए स्तब्ध रह गई। फिर... अचानक हँसी आ गई। मेरे मुँह से निकल गई — “हाहा...” बिल्लू भी हँस पड़ा। उसकी गंदी, बेशर्म हँसी कार में गूँज गई। और ठीक उसी पल... बिल्लू अचानक मेरे ऊपर आ गया। बिल्लू ने अचानक मुझे कार की पिछली सीट के कोने में लिटा दिया। उसका भारी, बदबूदार शरीर मेरे ऊपर आ गया। पसीने, गटके, बीड़ी और पुरानी गंदगी की मिली सकी आँखें मेरी आँखों में गड़ी हुई थीं। उसके होंठ मेरे होंठों के बहुत करीब थे। फिर उसने सिर घुमाकर अंकल की तरफ देखा। एक शैतानी, गंदी मुस्कान दी और धीरे से बोला — “खबूजा करेगा तो सब में बाँटेगा...” अंकल पूरी तरह स्तब्ध रह गया। उसने शायद सपने में भी नहीं सोचा था कि मैं ऐसी गंदी, मजदूरों वाली भाषा इस्तेमाल लेकिन उससे भी ज़्यादा शॉक उसको इस बात का लगा कि बिल्लू मुझे दोनों के बीच बाँटने की बात कर रहा है। बिल्लू ने फिर मेरी तरफ मुड़कर मेरे होंठों पर अपना मुँह रख दिया। पहला किस... बहुत गन्दा और अनाड़ी था। वो बस मेरे होंठ चूस रहा था, जैसे कभी किस करना नहीं सीखा हो। मैंने कोई रिएक्शन नहीं दिया। मेरी आँखें रियर व्यू मिरर में अंकल को देख रही थीं। अंकल भी मिरर में जितना हो सके हमें देख रहा था। बिल्लू ने मेरे होंठ छोड़कर फुसफुसाया — “मुँह खोल ना... जैसा साहब के लिए खोला था...” मैंने धीरे से अपना मुँह खोल दिया। बिल्लू का मुँह मेरे मुँह में घुस गया। उसकी जीभ... गटके से लाल, गंदी और बदबूदार। वो बहुत जोर से किस कर रहा था। मैंने आँखें बंद कर लीं। अंकल के लिए ये देखना और भी शॉकिंग था। वो जानता था कि बिल्लू का मुँह कितना गंदा है। उसके दाँत गटके से गहरे लाल और सड़े हुए थे। यहाँ तक कि जो रंडियाँ वे लोग बुलाते थे, वे भी बिल्लू को किस करने से मना कर देती थीं। बिल्लू ने किस करते हुए ही फुसफुसाया — “क्या रंडी है यार...” मैं अभी भी उसके नीचे दबी हुई थी। उसका भारी शरीर मुझे दबाए हुए था। कार तेज़ी से चल रही थी। मैं पीछे की सीट पर बिल्लू के नीचे दबी हुई थी। उसका भारी, बदबूदार शरीर मुझे दबाए हुए था। उसके होंठ मेरे होंठों पर थे — गटके से लाल, गंदे, सड़े हुए दाँतों वाला मुँह। मैंने पहला झटका महसूस किया जब उसकी जीभ मेरे मुँह में घुसी। गटके की कड़वाहट... तंबाकू की तेज़ बदबू... पुरानी सड़ाँध... सब कुछ मेरे मुँह में भर गया। मेरा दिमाग चकरा गया। मैंने आँखें बंद कर लीं। शुरू में तो मैं बस सहन कर रही थी... लेकिन फिर... कुछ हुआ। एक अजीब सा उन्माद मेरे शरीर में दौड़ गया। डर... उत्तेजना... और एक नई, अनजानी लालसा। मैंने खुद को रोकने की कोशिश की... लेकिन मेरे होंठ... खुद-ब-खुद उसकी जीभ से खेलने लगे। मैंने अपनी जीभ उसके मुँह में डाल दी। उसकी गंदी जीभ से खेलने लगी। किस... बहुत गहरा... बहुत भूखा... बहुत जंगली हो गया। बिल्लू हैरान था। वो उम्मीद कर रहा था कि मैं घृणा से मुँह फेर लूँगी। लेकिन मैंने नहीं फेरा। मैंने और जोर से चूसा। मेरे हाथ उसके कंधों पर चले गए। उसने भी मेरे चेहरे को दोनों हाथों से पकड़ लिया। उसकी खुरदरी हथेलियाँ मेरे गालों पर दब रही थीं। उसके नाखून मेरी स्किन में गड़ रहे थे। मैंने एक पल के लिए आँखें खोलीं। रियर व्यू मिरर में अंकल की आँखें दिख रही थीं। वो हमें देख रहा था। उसका चेहरा... सदमे से भर गया था। वो शायद सोच भी नहीं सकता था कि मैं... इतनी पढ़ी-लिखी, इतनी शालीन लड़की... बिल्लू जैसे गंदे आदमी के साथ... इतने जोश से किस कर रही हूँ। उसके हाथ मेरी शर्ट के अंदर चले गए। मेरे स्तनों पर... नरम-नरम दबाव डालते हुए... उँगलियाँ मेरे निप्पल्स के चारों ओर घुमा रहा था। हर छुअन से मेरे शरीर में बिजली-सी दौड़ रही थी। उसकी उत्तेजना... उसकी चाहत... साफ़ महसूस हो रही थी। उसकी साँसें मेरे चेहरे पर गरम-गरम पड़ रही थीं। फिर... मैंने धीरे से किस तोड़ा। मेरा चेहरा बिल्लू से थोड़ा दूर किया। हम दोनों एक पल के लिए एक-दूसरे की आँखों में देखते रहे। मैंने उसे देखा — उसकी गंदी, लाल आँखें... गटके से सने दाँत... पसीने से चिपचिपी त्वचा। मैंने धीरे से मुस्कुराई। अपना दायाँ अंगूठा उसके गाल पर रखा। बहुत नरमी से... प्यार से... गाल पर रगड़ा। बिल्लू की आँखें एक पल के लिए नरम पड़ गईं। उसके मन में शायद ये ख्याल आया — “कितनी नेक औरत है ये...” फिर मैंने धीरे से सिर घुमाया। रियर व्यू मिरर में अंकल की आँखें दिख रही थीं। वो हमें देख रहा था। मेरे होंठ अभी भी गीले थे — हमारी लार से... बिल्लू के गटके वाले मुँह की लार से। मैंने जानबूझकर... बहुत धीरे-धीरे... अपनी जीभ निकाली। होंठों पर लगी सारी नमी को जीभ से चाट लिया। अंकल की आँखें और चौड़ी हो गईं। वो सदमे में था। उसकी साँस अटक गई। मैंने धीरे से अपना दायाँ हाथ उठाया। तर्जनी उँगली से... रियर व्यू मिरर में अंकल को इशारा किया। “आ जाओ...” बिना बोले... सिर्फ़ उँगली से। मैं खुद नहीं समझ पा रही थी कि मैं ये क्यों कर रही हूँ। मुझे बस... अंकल को अपने पास चाह रही थी। उसे भी... इस गंदे पल में शामिल करना चाह रही थी। अंकल की आँखें मिरर में मेरी आँखों से टकराईं। उसके चेहरे पर जलन साफ़ दिख रही थी। वो कभी नहीं सोच सकता था कि मैं... बिल्लू जैसे गंदे आदमी के साथ... इतनी जल्दी घुल-मिल जाऊँगी। उसकी आँखों में गुस्सा... ईर्ष्या... और एक अजीब सी बेचैनी थी। मैंने उसे देखकर हल्की-सी wink मारी। अचानक... अंकल ने स्टीयरिंग को तेज़ी से घुमाया। कार ने तेज़ मोड़ लिया। रास्ता छोड़कर... सीधे खेत की तरफ। ऑफ-रोड... मिट्टी उड़ती हुई... झटके लगते हुए। कार बीच खेत में रुक गई। चारों तरफ... सिर्फ़ खेत... दूर-दूर तक कोई नहीं। कोई गाड़ी... कोई इंसान... कोई आवाज़ नहीं। अंकल ने इंजन बंद किया। कार में सन्नाटा छा गया। वो आगे से मुड़ा। पीछे की सीट की तरफ देखा। उसकी आँखें... मेरी आँखों में टिकी हुई थीं। उसके चेहरे पर अब गुस्सा कम था... और कुछ और था — एक अजीब सी चाहत। बिल्लू अभी भी मेरे ऊपर था। अंकल ने आगे की सीट से उठकर पीछे आ गया। कार की पिछली सीट पहले से ही तंग थी। अब हम तीनों एक साथ बैठे थे — मैं बीच में, बिल्लू मेरी बाईं तरफ, अंकल दाईं तरफ। सीट पर जगह कम थी... हमारे शरीर एक-दूसरे से सटे हुए थे। मेरी साँसें बहुत तेज़ चल रही थीं। दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था — डर, उत्तेजना, शर्म और एक अजीब सी लालसा सब मिलकर। अंकल बहुत करीब आ गया। उसकी आँखें मेरी आँखों में टिकी हुई थीं। उसकी नज़र में... जलन थी... लेकिन साथ ही बहुत गहरी चाहत भी। वो मेरे होंठों को देख रहा था — जो अभी भी बिल्लू के गटके वाले किस से गीले और लाल थे। वो जानता था... मेरे मुँह में अभी भी बिल्लू का स्वाद है। फिर भी... वो मेरे होंठों पर झुक गया। उसने मुझे बहुत गहराई से किस किया। जैसे... बिल्लू के स्वाद को भी अपने अंदर ले लेना चाहता हो। उसकी जीभ मेरी जीभ से खेल रही थी। बहुत जोश से... बहुत भूख से। मैंने भी जवाब दिया। हम तीनों... इतने करीब थे कि बिल्लू की साँसें भी मेरे गाल पर पड़ रही थीं। मैंने धीरे से किस तोड़ा। उसकी आँखों में देखा। फिर... बिल्लू की तरफ देखकर... नॉटी स्माइल के साथ बोली — “तुम... उससे बेहतर किस करते हो।” मेरा मतलब साफ़ था — बिल्लू से बेहतर। अंकल एक पल के लिए स्तब्ध रह गया। उसकी आँखें चौड़ी हो गईं। वो यकीन नहीं कर पा रहा था कि मैंने ये शब्द बोले हैं। बिल्लू भी हैरान था। लेकिन वो समझ गया कि मैं उसे चिढ़ा रही हूँ... और साथ ही अंकल की तारीफ कर रही हूँ।
Yesterday, 12:00 AM
क्या कहानी लिख रहे हो भाई एक नंबर सुपर अपडेट नेहा को पूरी तरह रंडी दिखाओ
9 hours ago
कहानी हिंदी में है. फिर इसका शीर्षक अंग्रेजी में क्यों है?
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